Category: International

  • क्या सर्वाइकल कैंसर दुनिया से खत्म हो जाएगा? ऑस्ट्रेलिया की सफलता से भारत के लिए बड़ी सीख और नई उम्मीद

    क्या सर्वाइकल कैंसर दुनिया से खत्म हो जाएगा? ऑस्ट्रेलिया की सफलता से भारत के लिए बड़ी सीख और नई उम्मीद

    नई दिल्ली। सर्वाइकल कैंसर यानी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर दुनिया की महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक बना हुआ है, लेकिन अब इसे लेकर एक बड़ी उम्मीद भी सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने इस बीमारी को खत्म करने की दिशा में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है, जिससे दुनिया भर में इसके उन्मूलन की चर्चा तेज हो गई है।

    भारत की रहने वाली 40 वर्षीय सुनीता की कहानी इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाती है। लगातार थकान और असामान्य रक्तस्राव को उन्होंने सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज किया, लेकिन बाद में पता चला कि वह एडवांस स्टेज सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित हैं। देर से इलाज मिलने के कारण उनकी जान नहीं बच सकी। भारत में ऐसी लाखों महिलाएं हर साल इस बीमारी का शिकार बनती हैं, जिसका प्रमुख कारण जागरूकता की कमी और समय पर जांच न होना है।

    ऑस्ट्रेलिया ने कैसे बदली तस्वीर

    ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो सर्वाइकल कैंसर को लगभग खत्म कर सकता है। यह बीमारी मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) के कारण होती है। ऑस्ट्रेलिया ने 2006 में क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में विकसित HPV वैक्सीन ‘गार्डासिल’ को बड़े पैमाने पर लागू किया।

    2007 में वहां राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसके तहत 12-13 वर्ष की उम्र के बच्चों को स्कूलों में मुफ्त वैक्सीन दी जाने लगी। 2013 से यह कार्यक्रम लड़कों के लिए भी लागू किया गया, ताकि वायरस के फैलाव को रोका जा सके। इसके साथ ही 2017 में ऑस्ट्रेलिया ने पारंपरिक पैप स्मीयर टेस्ट की जगह अधिक प्रभावी HPV-आधारित स्क्रीनिंग शुरू की, जो हर पांच साल में एक बार की जाती है। महिलाओं को खुद सैंपल लेने का विकल्प भी दिया गया, जिससे जांच की पहुंच और आसान हो गई।

    ‘कैंसर खत्म’ का मतलब क्या है?
    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी बीमारी को खत्म करने का मतलब पूरी तरह शून्य केस नहीं, बल्कि प्रति 1 लाख लोगों पर 4 से कम मामले होना है। ऑस्ट्रेलिया फिलहाल इस लक्ष्य के बेहद करीब है और 2035 से पहले इसे हासिल कर सकता है। 2021 में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि 25 वर्ष से कम उम्र की किसी भी महिला में सर्वाइकल कैंसर का नया मामला वहां दर्ज नहीं हुआ।

    वैश्विक स्तर पर प्रयास तेज
    स्वीडन और रवांडा जैसे देश 2027 तक इस बीमारी को खत्म करने का लक्ष्य रख रहे हैं, जबकि ब्रिटेन 2040 तक इसे समाप्त करने की योजना पर काम कर रहा है। हालांकि विकासशील देशों के लिए यह चुनौती अभी भी बड़ी है, क्योंकि वैक्सीन और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है।

    भारत के लिए बड़ी उम्मीद
    भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। लेकिन हाल के वर्षों में इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। देश ने अपनी स्वदेशी HPV वैक्सीन ‘सर्वावैक’ विकसित की है, जिससे टीकाकरण अधिक किफायती और सुलभ हो गया है। सरकार 9 से 14 वर्ष की किशोरियों को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर टीकाकरण और नियमित जांच से इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

  • ट्रंप का नया दावा: भारत-पाकिस्तान जंग रुकवाने के पीछे टैरिफ की धमकी, भारत ने फिर किया खंडन

    ट्रंप का नया दावा: भारत-पाकिस्तान जंग रुकवाने के पीछे टैरिफ की धमकी, भारत ने फिर किया खंडन


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर यह दावा दोहराया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित सैन्य टकराव को रोकने में भूमिका निभाई थी। ट्रंप के मुताबिक, उन्होंने दोनों देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी देकर स्थिति को शांत कराया था। हालांकि भारत ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ कहा है कि संघर्षविराम किसी तीसरे देश के दबाव से नहीं, बल्कि सीधे सैन्य स्तर की बातचीत के बाद हुआ था।

    ट्रंप का दावा क्या है?
    ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अब तक कई युद्धों को रोका है, जिनमें भारत-पाकिस्तान तनाव भी शामिल है। उनके अनुसार, उस समय हालात इतने गंभीर थे कि परमाणु संघर्ष का खतरा पैदा हो गया था।ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने दोनों देशों को चेतावनी दी थी कि अगर लड़ाई जारी रही तो अमेरिका व्यापारिक प्रतिबंध और टैरिफ लगा सकता है। उनके मुताबिक, इसी दबाव में स्थिति शांत हुई।

    भारत का स्पष्ट जवाब
    भारत सरकार ने ट्रंप के इन दावों को पहले भी कई बार नकारा है और इस बार भी वही रुख दोहराया है। भारत का कहना है कि संघर्षविराम का निर्णय दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच सीधी बातचीत के बाद हुआ था।

    भारतीय पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी विदेशी देश की मध्यस्थता या दबाव की भूमिका नहीं थी।

    “ऑपरेशन सिंदूर” और तनाव की पृष्ठभूमि
    भारत ने हाल के घटनाक्रम में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ “ऑपरेशन सिंदूर” जैसी कार्रवाई की थी, जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया था।

    इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ा, लेकिन बाद में बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया गया। भारत के अनुसार, इसी प्रक्रिया के तहत संघर्षविराम पर सहमति बनी।

    पाकिस्तान का रुख और अंतरराष्ट्रीय बयानबाजी
    पाकिस्तान ने ट्रंप के दावों का समर्थन करते हुए उन्हें “मध्यस्थता” का श्रेय दिया था। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी अमेरिका की भूमिका की सराहना की थी।इसके उलट, भारत लगातार यह कहता रहा है कि यह एक द्विपक्षीय मुद्दा है और बाहरी हस्तक्षेप की कोई भूमिका नहीं रही।

    ट्रंप के बार-बार बदलते दावे
    डोनाल्ड ट्रंप इससे पहले भी कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान तनाव को रोका था। हर बार भारत ने इन बयानों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक राजनीति में व्यापारिक नीतियों और टैरिफ को लेकर फिर से बहस तेज है।

    भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर अमेरिका के दावों और भारत के आधिकारिक रुख में स्पष्ट अंतर बना हुआ है। जहां ट्रंप इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बताते हैं, वहीं भारत इसे पूरी तरह द्विपक्षीय सैन्य संवाद का परिणाम मानता है।

  • पेंटागन का 7 बड़ी टेक कंपनियों से एआई समझौता, सैन्य रणनीति में होंगे बड़े बदलाव, भारत के लिए भी अवसर

    पेंटागन का 7 बड़ी टेक कंपनियों से एआई समझौता, सैन्य रणनीति में होंगे बड़े बदलाव, भारत के लिए भी अवसर

    न्यूयॉर्क। अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने शुक्रवार को सात प्रमुख टेक कंपनियों के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है, जिसके तहत उनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) टूल्स का उपयोग पेंटागन के क्लासिफाइड नेटवर्क में किया जाएगा। यह कदम केवल तकनीकी सहयोग नहीं, बल्कि वैश्विक सैन्य रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

    इस समझौते से एआई को सीधे रक्षा और युद्ध क्षमताओं से जोड़ने की दिशा में अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल रूस, चीन और भारत सहित सभी प्रमुख देशों को अपनी सैन्य एआई क्षमताएं तेज करने के लिए प्रेरित करेगी। भविष्य के युद्धों में निर्णय लेने की गति और तकनीकी बढ़त निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

    किन कंपनियों के साथ हुआ करार
    एक रिपोर्ट के अनुसार इस समझौते में एलन मस्क की स्पेसएक्स, ओपनएआई, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया, अमेजन वेब सर्विसेज और रिफ्लेक्शन जैसी बड़ी टेक कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों की एआई तकनीकों का उपयोग अमेरिकी सेना के विभिन्न परिचालन क्षेत्रों में किया जाएगा।

    एआई आधारित ‘फाइटिंग फोर्स’ की ओर कदम

    पेंटागन का लक्ष्य अपनी सेना को एआई-फर्स्ट फाइटिंग फोर्स में बदलना है। इसके तहत जमीन, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष और साइबर जैसे सभी क्षेत्रों में तेज और सटीक निर्णय क्षमता विकसित की जाएगी। इस पहल से सैन्य ऑपरेशंस अधिक स्वचालित और तकनीकी रूप से उन्नत होने की उम्मीद है।

    एंथ्रोपिक को क्यों नहीं मिली जगह?
    रिपोर्ट के अनुसार पहले एंथ्रोपिक का क्लॉड एआई मॉडल पेंटागन के क्लासिफाइड नेटवर्क का हिस्सा था। लेकिन बाद में कंपनी ने अपने एआई के उपयोग को लेकर कुछ सीमाएं तय कीं, खासकर स्वायत्त हथियार और व्यापक निगरानी जैसे मामलों में। इसी कारण उसे नए समझौते से बाहर रखा गया।

    वैश्विक असर और भारत के लिए संभावनाएं
    इस बिग टेक–पेंटागन साझेदारी के बाद रूस और चीन भी अपनी एआई-आधारित सैन्य प्रणालियों को तेजी से विकसित कर सकते हैं। चीन में बाइडू, अलीबाबा, टेनसेंट और हुआवेई जैसी कंपनियां पहले से ही रक्षा क्षेत्र में एआई तकनीक को मजबूत कर रही हैं।

    भारत के संदर्भ में यह विकास नए अवसरों के द्वार खोल सकता है। टाटा ग्रुप, रिलायंस जियो प्लेटफॉर्म्स, इंफोसिस, एचसीएलटेक और टेक महिंद्रा जैसी कंपनियों के साथ-साथ डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए रक्षा एआई क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ सकती हैं। सरकार की पहलें जैसे आईडेक्स और डीआरडीओ के साथ सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में सैन्य शक्ति के संतुलन को बहुध्रुवीय दिशा में ले जा सकती है, जहां एआई सबसे अहम रणनीतिक हथियार बनकर उभरेगा।

  • जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते

    जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते


    वाशिंगटन।
    ईरान (Iran) के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका (America) के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका (America) ने जर्मनी (Germany) से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज (German Chancellor Friedrich Merz) पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।


    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी

    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।

    ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।

    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी
    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।


    NATO में पैदा हो गया नया तनाव

    डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही नाटो को महत्व कम देते थे। वहीं जब होर्मुज बंद होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों का आह्वान किया तो किसी ने साथ नहीं दिया। ऐसे में ईरान संकट के बीच नाटो में भी काफी तनाव पैदा हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि नाटो देशों ने होर्मुज खुलवाने में उनका साथ नहीं दिया।

    इसी बीच वाइट हाउस ने संसद को लिखे एक पत्र में कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सशस्त्र बलों की निरंतर उपस्थिति के बावजूद वह ईरान के साथ युद्ध को खत्म ही मानता है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस संदेश के जरिए ईरान के साथ युद्ध जारी रखने के लिए संसद सदस्यों की मंजूरी प्राप्त करने की एक मई की कानूनी समय सीमा को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया है।

  • फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….

    फारस की खाड़ी से वापस लौटा दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत….


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच जारी तनाव के बीच नया घटनाक्रम सामने आया है। दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत (World’s largest Aircraft Carrier) USS जेराल्ड आर. फोर्ड (USS Gerald R. Ford) अब फारस की खाड़ी से वापस लौट रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब दोनों देशों के बीच बातचीत ठप पड़ गई है और किसी ठोस समझौते की संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है। यह युद्धपोत पिछले 10 महीनों से अधिक समय से समुद्र में तैनात था और इस दौरान उसने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई।

    इस विमानवाहक पोत की वापसी को अमेरिका की सैन्य रणनीति में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इसे पूरी तरह से पीछे हटना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि क्षेत्र में अभी भी अन्य अमेरिकी युद्धपोत मौजूद हैं। फोर्ड की वापसी से यह तो साफ है कि अमेरिका अब लंबे समय तक भारी सैन्य तैनाती बनाए रखने के बजाय दूसरी नीति पर काम कर रहा है।


    अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में गतिरोध

    जानकारों का मानना है कि यह कदम सैनिकों को राहत देने और जहाज की मरम्मत जैसी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भी लिया गया होगा। मालूम हो कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। दोनों पक्ष कई अहम मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाए हैं, जिसमें सुरक्षा, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय नियंत्रण जैसे विषय शामिल हैं। बातचीत के ठप पड़ने से तनाव और बढ़ गया है और क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति और संवेदनशील हो गई है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति करता है। फिलहाल, विमानवाहक पोत की वापसी एक बड़े भू-राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जा रही है। यह न केवल अमेरिका की रणनीति में बदलाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कूटनीतिक समाधान अभी दूर है। अगर बातचीत जल्द शुरू नहीं होती तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

  • US: ट्रंप ने फिर फोड़ा टैरिफ बम…. UN से आने वाले वाहनों पर लगाया 25% टैक्स

    US: ट्रंप ने फिर फोड़ा टैरिफ बम…. UN से आने वाले वाहनों पर लगाया 25% टैक्स


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने एक बार फिर से टैरिफ बम (Tariff Bomb) फोड़ा है। इस बार उन्होंने कहा कि वह अगले हफ्ते से यूरोपीय यूनियन (European Union) से आने वाली कारों और ट्रकों पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ा देंगे। वह इसे बढ़ाकर 25 फीसदी कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह गुट पहले हुए एक व्यापार समझौते का पालन नहीं कर रहा है।

    उन्होंने अपने ‘ट्रुथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर लिखा, “इस तथ्य के आधार पर कि यूरोपीय यूनियन हमारे पूरी तरह से सहमत व्यापार समझौते का पालन नहीं कर रहा है, अगले सप्ताह मैं अमेरिका में आने वाली कारों और ट्रकों पर यूरोपीय यूनियन से लिए जाने वाले टैरिफ को बढ़ा दूंगा। टैरिफ को बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।”

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा, ”हालांकि, यदि वे अमेरिका के प्लांट्स में कारों और ट्रकों का प्रोडक्शन करते हैं, तो कोई टैरिफ नहीं लगेगा। कई ऑटोमोबाइल और ट्रक प्लांट्स वर्तमान में निर्माणाधीन हैं, जिनमें 100 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया जा रहा है। जो कार और ट्रक निर्माण के इतिहास में एक रिकॉर्ड है। ये प्लांट्स, जिनमें अमेरिकी कर्मचारी काम करेंगे, जल्द ही खुलने वाले हैं। आज अमेरिका में जो हो रहा है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ! इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।

    ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ व्यापार नीति को और आक्रामक रूप से लागू करते हुए भारत समेत कई देशों पर टैरिफ लगाया है। इन टैरिफ का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को सस्ती विदेशी आयात से बचाना और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती देना बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा और कई देशों के बीच व्यापारिक तनाव भी तेज हो सकता है। भारत पर ट्रंप ने पहले 25 फीसदी का टैरिफ लगाया था, लेकिन फिर रूस से तेल खरीदने को लेकर इसे बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया था। हालांकि, बाद में ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल आयात नहीं करेगा, जिसकी वजह से 25 फीसदी टैरिफ हटा दिया गया।

  • पाकिस्तान में ‘टारगेट किलिंग’ से दहशत: भारत विरोधी आतंकियों का एक हफ्ते में खात्मा, खुफिया नेटवर्क पर उठे सवाल

    पाकिस्तान में ‘टारगेट किलिंग’ से दहशत: भारत विरोधी आतंकियों का एक हफ्ते में खात्मा, खुफिया नेटवर्क पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठनों से जुड़े कमांडरों और कार्यकर्ताओं की रहस्यमयी मौतों ने सुरक्षा तंत्र में हलचल मचा दी है। पिछले एक सप्ताह के भीतर हिजबुल, लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कम से कम तीन आतंकियों की हत्या या संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सामने आई है, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।

    सबसे ताजा मामला हिजबुल आतंकी सज्जाद अहमद का है, जिसे इस्लामाबाद में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। सज्जाद लंबे समय से भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय माना जाता था और उसे हिजबुल का स्थानीय कमांडर बताया जा रहा था। उसकी मौत की पुष्टि उसके पड़ोसी द्वारा की गई, जबकि आधिकारिक स्तर पर अभी तक कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है।

    लगातार निशाने पर आतंकी नेटवर्क
    इसके कुछ दिन पहले जैश-ए-मोहम्मद के टॉप कमांडर सलमान अजहर की मौत की खबर आई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक उसकी मौत एक संदिग्ध सड़क हादसे में हुई, हालांकि कई सुरक्षा विशेषज्ञ इसे सामान्य घटना मानने से इनकार कर रहे हैं। सलमान को जैश प्रमुख मसूद अजहर का करीबी सहयोगी माना जाता था और संगठन की कई अहम गतिविधियों की जिम्मेदारी उसके पास थी।

    इसी तरह, लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े शेख यूसुफ अफरीदी की भी खैबर पख्तूनख्वा में अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा मार्च में मसूद अजहर के भाई ताहिर अजहर की भी रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।

    20 से अधिक मौतों का पैटर्न
    सूत्रों के अनुसार 2019 के बाद से पाकिस्तान में इस तरह की टारगेट किलिंग की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। अब तक 20 से अधिक आतंकी या तो मारे जा चुके हैं या संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो चुकी है। खास बात यह है कि इन मामलों में पाकिस्तान सरकार या उसकी खुफिया एजेंसियां कोई स्पष्ट जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करतीं।

    सुरक्षा तंत्र पर सवाल
    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाएं पाकिस्तान के भीतर चल रहे गुप्त संघर्ष और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों की ओर इशारा करती हैं। आतंकियों के खिलाफ हो रही इन लगातार घटनाओं ने एक अनदेखे नेटवर्क की मौजूदगी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पाकिस्तान में लश्कर और जैश जैसे संगठनों से जुड़े हजारों आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में इनकी अचानक हो रही मौतें क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी असर डाल सकती हैं।

    रहस्य बरकरार
    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन लगातार हो रही हत्याओं के पीछे कौन है और क्या यह किसी संगठित रणनीति का हिस्सा है या आंतरिक संघर्ष का परिणाम। पाकिस्तान सरकार की चुप्पी ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया है।

  • ढाका में गैंगवार का खूनी खेल: 127 गैंगों के बीच राजधानी बनी ‘नया ल्यारी’, नाइन स्टार गैंग सबसे ताकतवर

    ढाका में गैंगवार का खूनी खेल: 127 गैंगों के बीच राजधानी बनी ‘नया ल्यारी’, नाइन स्टार गैंग सबसे ताकतवर


    नई दिल्ली। इलाके और वर्चस्व की जंग ने राजधानी को दहला दिया। बांग्लादेश की राजधानी ढाका एक बार फिर गंभीर आपराधिक हालात से गुजर रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि शहर की तुलना पाकिस्तान के बदनाम ल्यारी इलाके से की जा रही है। राजधानी में गैंगवार ने सड़कों को युद्धक्षेत्र में बदल दिया है, जहां दिनदहाड़े हत्याएं और हिंसक झड़पें आम होती जा रही हैं।

    पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार ढाका में इस समय लगभग 127 सक्रिय गैंग मौजूद हैं, जो वसूली, ड्रग्स तस्करी, जमीन कब्जाने और अवैध कारोबार में शामिल हैं। इन गिरोहों के बीच इलाके के नियंत्रण को लेकर खूनी संघर्ष तेज हो गया है।

    चार बड़े गैंगों के बीच सीधा टकराव
    हालिया हिंसा में कम से कम चार प्रमुख गैंग एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर लड़ाई पर उतर आए हैं। शहर के कई इलाकों में कुल्हाड़ी, चाकू और अन्य धारदार हथियारों से हत्याएं की जा रही हैं। पुलिस का कहना है कि यह पूरा संघर्ष ‘टर्फ वॉर’ यानी इलाके पर कब्जे की लड़ाई का नतीजा है।

    ढाका पुलिस इन सभी गैंगों को नियंत्रित करने और स्थिति को काबू में लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन लगातार बढ़ती हिंसा ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    कैसे शुरू हुई गैंगवार की आग?
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, गैंगवार की शुरुआत उस समय तेज हुई जब राजनीतिक बदलाव के बाद कई पुराने अपराधियों को जमानत पर रिहा किया गया। जेल से बाहर आने के बाद इन अपराधियों ने फिर से अपने-अपने इलाकों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया।

    सबसे पहला बड़ा मामला मामून की हत्या का था, जिसे मोबाइल चोरी के विवाद में मारा गया। इसके बाद टाइटन नामक गैंगस्टर की हत्या बीच चौराहे पर कुल्हाड़ी से कर दी गई, जिससे पूरे शहर में दहशत फैल गई।जनवरी से मार्च के बीच ढाका में लगभग 107 हत्याएं दर्ज की गई हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं।

    कौन-कौन से गैंग हैं सबसे प्रभावशाली?
    ढाका के अपराध जगत में कई गैंग सक्रिय हैं, लेकिन कुछ गिरोह सबसे ज्यादा प्रभावशाली माने जा रहे हैं।नाइन स्टार गैंग: इसे ढाका का सबसे ताकतवर गैंग माना जाता है। इसका प्रभाव मीरपुर और आसपास के क्षेत्रों में है।
    डॉन गैंग: यह मोहम्मदपुर इलाके में सक्रिय है और वसूली तथा ड्रग नेटवर्क में शामिल बताया जाता है।
    खान गैंग: हजारीबाग और जिगतोला क्षेत्र में इसका दबदबा है।

    इसके अलावा पिच्ची हेलाल और एमोन जैसे अपराधी भी शहर में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जो छोटे-छोटे गैंगों को नियंत्रित करते हैं।

    अपराध विशेषज्ञों की चेतावनी
    अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति कानून-व्यवस्था की कमजोरी का नतीजा है। जेल से रिहाई और कमजोर निगरानी ने गैंगस्टरों को फिर से संगठित होने का मौका दिया है। यही कारण है कि शहर में अपराध तेजी से बढ़ रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार अगर जल्द सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो ढाका में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती
    ढाका पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन 127 गैंगों को नियंत्रित करना है। शहर में पहले से मौजूद आतंकवाद के खतरे के बीच यह गैंगवार सुरक्षा व्यवस्था के लिए दोहरी चुनौती बन गया है। 

  • दुबई नेटवर्क से जुड़े ड्रग माफिया का खुलासा: तुर्किए में ‘हमजा’ बनकर छिपा था सलीम डोला, भारत लाकर NCB की बड़ी कार्रवाई

    दुबई नेटवर्क से जुड़े ड्रग माफिया का खुलासा: तुर्किए में ‘हमजा’ बनकर छिपा था सलीम डोला, भारत लाकर NCB की बड़ी कार्रवाई


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी रैकेट पर सुरक्षा एजेंसियों की सख्त कार्रवाई, अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी नेटवर्क के खिलाफ भारत को बड़ी सफलता मिली है। तुर्किये से प्रत्यर्पित कर भारत लाए गए कुख्यात तस्कर मोहम्मद सलीम डोला को लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जांच में पता चला है कि वह तुर्किये में ‘हमजा’ नाम से रह रहा था और उसने पहचान छुपाने के लिए कथित तौर पर बुल्गारियाई पासपोर्ट का इस्तेमाल किया था।

    मुंबई की एक स्थानीय अदालत ने शुक्रवार को उसे 8 मई तक नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की हिरासत में भेज दिया है। अधिकारियों के अनुसार, डोला की गतिविधियां लंबे समय से जांच एजेंसियों की रडार पर थीं और उसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

    फर्जी पहचान और विदेशी पासपोर्ट का खेल
    प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि सलीम डोला तुर्किये में ‘हमजा’ नाम से रह रहा था और उसके पास बुल्गारियाई पासपोर्ट था। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह पासपोर्ट वैध था या फर्जी। सुरक्षा एजेंसियां इस बात की गहन जांच कर रही हैं कि उसे यह दस्तावेज कैसे और किस नेटवर्क के जरिए मिला।

    इस खुलासे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फर्जी पहचान और पासपोर्ट रैकेट के एक बड़े नेटवर्क की आशंका को भी मजबूत किया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि ऐसे दस्तावेजों का इस्तेमाल अक्सर ड्रग तस्करी और अवैध कारोबार को छिपाने के लिए किया जाता है।

    दाऊद इब्राहीम कनेक्शन की जांच
    NCB ने मुंबई अदालत को बताया कि सलीम डोला का नाम कुख्यात अपराधी दाऊद इब्राहीम के नेटवर्क से जुड़ा हुआ पाया गया है। उसे अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी रैकेट में एक प्रमुख सप्लायर के रूप में देखा जा रहा है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, डोला का नाम पहली बार तब सामने आया जब जून 2023 में दक्षिण मुंबई से मेफेड्रोन की बड़ी खेप जब्त की गई थी। इस मामले में वह मुख्य आपूर्तिकर्ता माना जा रहा है। इसके बाद से ही उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

    भारत वापसी के बाद बढ़ी जांच की रफ्तार
    तुर्किये से भारत लाए जाने के बाद NCB ने उससे पूछताछ तेज कर दी है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि उसका नेटवर्क किन-किन देशों तक फैला हुआ है और इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं।

    साथ ही यह भी जांच का विषय है कि वह इतने लंबे समय तक विदेश में फर्जी पहचान के साथ कैसे छिपा रहा और उसे किस अंतरराष्ट्रीय मदद नेटवर्क का सहारा मिला।

    अंतरराष्ट्रीय ड्रग रैकेट पर बड़ा वार
    इस गिरफ्तारी को भारत की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क पर एक बड़ा प्रहार माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों से यह स्पष्ट होता है कि ड्रग तस्करी अब सीमाओं से परे एक वैश्विक संगठित अपराध बन चुकी है।

    आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासों की संभावना जताई जा रही है, जिससे कई देशों में फैले नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता है। 

  • ट्रंप का बड़ा आर्थिक दांव: ब्रिटेन को राहत, स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ हटाकर रिश्तों में नई गर्माहट

    ट्रंप का बड़ा आर्थिक दांव: ब्रिटेन को राहत, स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ हटाकर रिश्तों में नई गर्माहट

    नई दिल्ली। अमेरिकी राजनीति और वैश्विक कूटनीति में एक अहम कदम उठाते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन की मशहूर स्कॉच व्हिस्की पर लगाए गए टैरिफ को हटाने का ऐलान किया है। यह फैसला तब सामने आया जब ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय और क्वीन कैमिला ने चार दिन का अमेरिका दौरा पूरा किया। इस दौरे को सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं बल्कि ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्तों को फिर से मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

    ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह निर्णय किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला के सम्मान में लिया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस उच्चस्तरीय मुलाकात ने अमेरिका के व्यापारिक रुख को प्रभावित किया है। स्कॉच व्हिस्की पर टैरिफ हटाने का फैसला न केवल आर्थिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह अमेरिका और ब्रिटेन के बीच वर्षों से चले आ रहे व्यापारिक तनाव को कम करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    रिश्तों में सुधार की रणनीति
    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के पीछे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति भी है। अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हाल के वर्षों में व्यापारिक मुद्दों और टैरिफ विवादों को लेकर खटास देखी गई थी। ऐसे में स्कॉच व्हिस्की जैसे प्रतिष्ठित ब्रिटिश उत्पाद पर राहत देना एक सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    ट्रंप प्रशासन के इस कदम को तीन प्रमुख कारणों से जोड़ा जा रहा है। पहला, ब्रिटेन के साथ बिगड़ते रिश्तों को सुधारना। दूसरा, लंबे समय से चल रहे व्यापारिक दबाव को कम करना। और तीसरा, अमेरिका की आजादी के 250 साल पूरे होने जैसे ऐतिहासिक अवसर पर एक प्रतीकात्मक संदेश देना।

    प्रतीकात्मक कूटनीति और आर्थिक संकेत
    किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला का यह दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं था, बल्कि इसे अमेरिका-ब्रिटेन संबंधों में नई ऊर्जा भरने के प्रयास के रूप में देखा गया। ट्रंप का यह निर्णय इस बात का संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में प्रतीकात्मक घटनाएं भी बड़ी नीतिगत बदलावों को जन्म दे सकती हैं।

    स्कॉच व्हिस्की ब्रिटेन के सबसे महत्वपूर्ण निर्यात उत्पादों में से एक है, और इस पर टैरिफ हटने से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को भी राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं अमेरिकी बाजार में भी इसकी उपलब्धता और व्यापारिक संतुलन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    वैश्विक राजनीति में संदेश
    यह कदम वैश्विक स्तर पर भी एक संदेश देता है कि अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच व्यापार और रक्षा सहयोग में और मजबूती देखने को मिल सकती है।

    इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कूटनीति केवल बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं होती, बल्कि प्रतीकात्मक निर्णय भी वैश्विक रिश्तों की दिशा बदल सकते हैं।