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  • भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर

    भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर


    नई दिल्ली ।
    भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 19 और 20 अप्रैल 2026 को दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर श्रीलंका जाएंगे। यह दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह उपराष्ट्रपति के रूप में उनका पहला द्विपक्षीय श्रीलंका दौरा होगा और इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    इस दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके और प्रधानमंत्री डॉ हरिनी अमरसूर्या से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वह अन्य वरिष्ठ नेताओं अधिकारियों और श्रीलंका में रह रहे भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी संवाद करेंगे।

    भारत और श्रीलंका के संबंध ऐतिहासिक सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद मजबूत रहे हैं। श्रीलंका भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” और “विजन महासागर” नीति का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में यह दौरा हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करेगा।

    इस बीच वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की स्थिति ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर श्रीलंका पर भी पड़ा जहां ईंधन संकट की स्थिति बनने लगी थी। ऐसे समय में भारत ने आगे बढ़कर मदद करते हुए 38 000 मीट्रिक टन ईंधन की आपूर्ति की जिससे श्रीलंका को राहत मिली।

    भारत की इस सहायता के लिए श्रीलंका के नेताओं ने आभार व्यक्त किया। सांसद नमल राजपक्षे ने भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की सराहना करते हुए कहा कि भारत संकट के समय हमेशा श्रीलंका के साथ खड़ा रहा है। उन्होंने श्रीलंका सरकार को भारत की आर्थिक नीतियों विशेष रूप से फ्यूल टैक्स एडजस्टमेंट मॉडल को अपनाने की सलाह भी दी।

    वहीं राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने भी भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई थी जिसमें उन्होंने ईंधन संकट की स्थिति साझा की थी और भारत ने तुरंत सहायता उपलब्ध कराई। कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति का यह दौरा न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह दोनों देशों के बीच सहयोग विश्वास और साझेदारी को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

  • ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी हादसा सरकार बोली सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

    ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी हादसा सरकार बोली सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया में तेल रिफाइनरी में लगी आग के बाद ईंधन आपूर्ति को लेकर उठी चिंताओं के बीच प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस घटना का देश की फ्यूल सप्लाई पर बहुत कम असर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि रिफाइनरी में लगी आग गंभीर जरूर थी, लेकिन उत्पादन काफी हद तक सामान्य बना हुआ है।

    प्रधानमंत्री अल्बानीज अपने ब्रुनेई और मलेशिया के आधिकारिक दौरे को बीच में छोड़कर वापस लौटे और Viva Energy की रिफाइनरी का निरीक्षण किया। यह रिफाइनरी जिलॉन्ग शहर के पास स्थित है, जो मेलबर्न से करीब 65 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है।

    बताया गया कि बुधवार रात उपकरण में खराबी के कारण रिफाइनरी में आग लग गई थी, जिसे गुरुवार दोपहर तक काबू में कर लिया गया। घटना के समय को लेकर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि उसी समय मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से प्रभावित है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की स्थिति नियंत्रण में है।

    रिफाइनरी के दौरे के दौरान मीडिया से बातचीत में अल्बानीज ने बताया कि डीजल और एविएशन फ्यूल का लगभग 80 प्रतिशत उत्पादन जारी है। वहीं पेट्रोल उत्पादन, जो देश की कुल सप्लाई का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा देता है, फिलहाल 60 प्रतिशत क्षमता पर चल रहा है और आने वाले दिनों में इसके बढ़ने की उम्मीद है।

    सरकार ने भरोसा दिलाया है कि ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही शनिवार को फ्यूल स्टॉकपाइल के स्तर को लेकर नियमित साप्ताहिक अपडेट भी जारी किया जाएगा, जिससे स्थिति पर नजर रखी जा सके।

    गौरतलब है कि यह रिफाइनरी ऑस्ट्रेलिया की केवल दो सक्रिय रिफाइनरियों में से एक है, इसलिए इस तरह की घटना का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि शुरुआती आशंकाओं के विपरीत, उत्पादन पर सीमित असर की खबर ने राहत दी है। फायर और रेस्क्यू अधिकारियों के अनुसार, आग लगने की वजह तकनीकी खराबी थी और घटना की जांच जारी है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और सप्लाई चेन को सुचारु बनाए रखने पर ध्यान दिया जा रहा है।

  • भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    भारत की रिपोर्ट से लीक हो गई US-इंडोनेशिया की सीक्रेट एयरस्पेस डील, बवाल के बाद हटना पड़ा पीछे

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ जंग रहे युद्ध के बीच अमेरिका साउथ ईस्ट एशिया में स्थित एक मुस्लिम देश संग मिलकर बड़ा खेल करने की तैयारी में था। हालांकि एक भारतीय रिपोर्ट ने इस प्लान पर पानी फेर दिया है। बीते दिनों अमेरिका और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया के बीच एक सीक्रेट समझौते की तैयारी चल रही थी, लेकिन अब इंडियन मीडिया की एक रिपोर्ट से हुए खुलासे के बाद हड़कंप मच गया है।

    दरअसल अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक डिफेंस डील साइन होनी थी। हालांकि डील साइन होने से ठीक पहले 12 अप्रैल को एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अमेरिका इंडोनेशिया के एयरस्पेस में अपने सैन्य विमानों को पूरी इजाजत देने की योजना बना रहा है। इस लीक के बाद इंडोनेशिया में भारी हंगामा हुआ और आखिरकार इस प्रावधन को फाइनल डील से बाहर कर दिया गया है।
    रिपोर्ट में हुआ खुलासा

    इस डील की पूरी जानकारी रिपोर्ट ‘संडे गार्जियन’ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच कई महीने से इस गुप्त योजना पर काम कर रही थी। फरवरी में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच वाइट हाउस में हुई बैठक में भी इस पर चर्चा हुई थी। इसे 13 अप्रैल को अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री शाफ्री जमसोएद्दीन की बैठक में औपचारिक रूप से शामिल किया जाना था, लेकिन विवाद के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

    डील में क्या था?

    इस प्रस्तावित डील के तहत अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के एयरस्पेस में बिना किसी रोक-टोक के उड़ान भरने की इजाजत मिल जाती। आधिकारिक तौर पर इसे इमरजेंसी और संकट के समय इस्तेमाल के लिए बताया गया, लेकिन इसका असली मकसद इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में निगरानी बढ़ाना था, खासकर उस समय जब ईरान ने होर्मुज पर दबाव बढ़ा दिया है और ग्लोबल ऑयल सप्लाई प्रभावित हो रही है। ऐसे में अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत करना चाहता था, जो दुनिया का सबसे व्यस्त तेल व्यापार मार्ग है और जहां से करीब 30 प्रतिशत समुद्री तेल और 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार गुजरता है।
    इंडोनेशिया ही क्यों?

    इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति इस रणनीति के केंद्र में है, क्योंकि वह मलक्का के पास स्थित है।

    अमेरिका के लिए यह डील इंडो-पैसिफिक में चीन पर नजर रखने के लिए अहम साबित हो सकती थी, क्योंकि फिलहाल उसे उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के सैन्य ठिकानों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो दूरी के लिहाज से कम प्रभावी हैं।
    क्यों हटना पड़ा पीछे?

    हालांकि जैसे ही यह रिपोर्ट सामने आई, इंडोनेशिया में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया। जकार्ता में सांसदों ने इस तरह के किसी भी समझौते की वैधता पर सवाल उठाए। संसद के डिप्टी चेयर सुकामता ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी सैन्य सहयोग के लिए संसद से सलाह लेना जरूरी है और बिना कानूनी आधार के एयरस्पेस देना संभव नहीं है।

    इस विरोध के बाद प्रबोवो सरकार दबाव में आ गई। इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने तुरंत सफाई देते हुए कहा कि अमेरिकी विमानों को ओवरफ्लाइट एक्सेस देने का प्रस्ताव फाइनल डील का हिस्सा नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह सिर्फ “लेटर ऑफ इंटेंट” के स्तर पर चर्चा में था और अभी न तो अंतिम है और न ही बाध्यकारी। साथ ही यह भी कहा गया कि किसी भी समझौते में इंडोनेशिया की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब यह डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।
  • होर्मुज के पास आमने-सामने भारत-पाक नौसेना, बढ़ते तनाव के बीच 18 समुद्री मील की दूरी पर जहाज

    होर्मुज के पास आमने-सामने भारत-पाक नौसेना, बढ़ते तनाव के बीच 18 समुद्री मील की दूरी पर जहाज


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास एक असामान्य स्थिति देखने को मिली, जब भारत और पाकिस्तान की नौसेनाएं बेहद कम दूरी पर सक्रिय नजर आईं। अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर के बावजूद इलाके में तनाव बरकरार है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों से जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाई है, जबकि ईरान का दावा है कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण कायम है।

    ओमान तट के पास दिखा असामान्य सैन्य मूवमेंट

    ओपन सोर्स इंटेलिजेंस एनालिस्ट डेमियन साइमन के अनुसार, ओमान के तट के पास भारत और पाकिस्तान के नौसैनिक जहाज एक-दूसरे से केवल 18 समुद्री मील की दूरी पर देखे गए। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि दोनों देश पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच अपने-अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा में जुटे हैं।

    समुद्री मार्गों की सुरक्षा में जुटी भारतीय नौसेना

    भारतीय नौसेना ने ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अहम समुद्री रास्तों पर अपनी तैनाती बढ़ा दी है। इसका उद्देश्य भारत आने वाले एलपीजी, एलएनजी और कच्चे तेल के जहाजों को सुरक्षित रास्ता देना है। नौसेना के अनुसार, फारस की खाड़ी से लेकर होर्मुज और अरब सागर तक जहाजों को सुरक्षा प्रदान की जा रही है, ताकि वे बिना किसी बाधा के अपनी यात्रा पूरी कर सकें। बताया जा रहा है कि 10 से अधिक भारतीय जहाज फिलहाल होर्मुज क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिन्हें सुरक्षित निकालने के प्रयास जारी हैं।

    अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव, बातचीत जारी
    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिका जहां ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर पीछे हटने की मांग कर रहा है, वहीं ईरान इस पर पूरी तरह सहमत नहीं है। हालांकि, दोनों देशों के बीच मतभेद कम करने और होर्मुज क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए बातचीत जारी है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह ओमान की दिशा से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, बशर्ते कोई ठोस समझौता हो।

    समझौते की उम्मीद और ट्रंप का संकेत

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान के साथ वार्ता में प्रगति हो रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि शांति समझौता होता है, तो वह हस्ताक्षर प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं। ट्रंप ने कहा कि अगर समझौता इस्लामाबाद में होता है, तो वे वहां जाने पर भी विचार कर सकते हैं।

  • शहबाज शरीफ की इज्जत बच गई! कंगाल पाकिस्तान को सऊदी प्रिंस ने दिए 2 अरब डॉलर

    शहबाज शरीफ की इज्जत बच गई! कंगाल पाकिस्तान को सऊदी प्रिंस ने दिए 2 अरब डॉलर

    इस्‍लमाबाद। किस्तान के केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने गुरुवार को पुष्टि की कि उसे सऊदी अरब से 2 अरब अमेरिकी डॉलर प्राप्त हो गए हैं। यह राशि वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब द्वारा एक दिन पहले घोषित की गई 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता का हिस्सा है।

    तो पाकिस्तान की इज्जत बच गई? सऊदी अरब से पाकिस्तान को 2 अरब अमेरिकी डॉलर की माली मदद मिली है। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) ने गुरुवार को पुष्टि की कि उसे सऊदी अरब से 2 अरब अमेरिकी डॉलर प्राप्त हो गए हैं। यह राशि वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब द्वारा एक दिन पहले घोषित की गई 3 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता का हिस्सा है। एसबीपी ने सोशल मीडिया पर जारी एक पोस्ट में बताया कि यह धनराशि 15 अप्रैल ( बुधवार ) को प्राप्त हुई है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

    सऊदी अरब ने मंगलवार को पाकिस्तान के लिए अपनी मौजूदा 5 अरब डॉलर की सुविधा को तीन वर्ष और बढ़ा दिया है तथा अतिरिक्त 3 अरब डॉलर की जमा राशि देने का वादा भी किया है।

    वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने अमेरिका से कहा कि मौजूदा 5 अरब डॉलर की जमा राशि अब सालाना रोलओवर व्यवस्था के अधीन नहीं रहेगी और इसे लंबी अवधि तक बढ़ा दिया गया है। वहीं, एसबीपी के प्रवक्ता ने बताया कि 2 अरब डॉलर पहले ही प्राप्त हो चुके हैं, जबकि शेष 1 अरब डॉलर जल्द ही आने वाला है। इस नई जमा राशि के साथ सऊदी अरब पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में कुल 8 अरब डॉलर की नकद जमा रखने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है।

    पाकिस्तान को यह मदद सऊदी ने ऐसे समय में किया है जब पाकिस्तान इस महीने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को 3.5 अरब डॉलर चुकाने की तैयारी कर रहा है, जो उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। आईएमएफ ने शर्त रखी है कि पाकिस्तान के तीन प्रमुख द्विपक्षीय ऋणदाताओं ( सऊदी अरब, चीन और यूएई) को चल रहे तीन वर्षीय कार्यक्रम के पूरा होने तक अपनी नकद जमा राशि बनाए रखनी होगी।
    तीन देशों की यात्रा पर हैं शहबाज शरीफ

    बता दें कि यह वित्तीय सहायता प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पश्चिम एशिया यात्रा के दौरान प्राप्त हुई है। बुधवार को तीन देशों की यात्रा पर निकले शरीफ ने कहा कि सऊदी अरब का यह समर्थन पाकिस्तान की बाहरी वित्तीय जरूरतों के लिए ‘नाजुक समय’ पर आया है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और देश के बाहरी खाते को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री शरीफ ने कहा कि सरकार आईएमएफ समर्थित कार्यक्रम के तहत अपने बाजार दायित्वों और लक्ष्यों के अनुरूप भंडार बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

    वित्तीय वर्ष के अंत तक लगभग 18 अरब डॉलर का भंडार बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जो करीब 3.3 महीने के आयात कवर के बराबर है।

    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 27 मार्च तक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 16.4 अरब डॉलर था, जो लगभग तीन महीने के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त था। हालांकि, यूएई को ऋण चुकाने की मांग ने भंडार पर नया दबाव डाला था। मार्च में पाकिस्तान यूएई के साथ 3.5 अरब डॉलर की सुविधा बढ़ाने के समझौते में विफल रहा था, जो सात वर्षों में ऐसी पहली विफलता मानी जा रही है।

  • यूरोप पर मंडरा रहा ‘फ्यूल संकट’ का खतरा: सिर्फ 6 हफ्तों का जेट ईंधन, उड़ानें रद्द होने की आशंका

    यूरोप पर मंडरा रहा ‘फ्यूल संकट’ का खतरा: सिर्फ 6 हफ्तों का जेट ईंधन, उड़ानें रद्द होने की आशंका

    वाशिंगटन। मिडल ईस्ट में जारी तनाव अब वैश्विक ऊर्जा संकट का रूप लेता दिख रहा है।
    अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने चेतावनी दी है कि यूरोप के पास जेट ईंधन का भंडार बेहद सीमित रह गया है—सिर्फ करीब छह सप्ताह या उससे थोड़ा अधिक। अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में फ्लाइट्स कैंसल होने की नौबत आ सकती है।

    होर्मुज बना संकट का ‘गला दबाने वाला पॉइंट’

    बिरोल ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को इस पूरे संकट का सबसे बड़ा कारण बताया। यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है। मौजूदा युद्ध के चलते यहां आपूर्ति बाधित है, जिससे तेल, गैस और अन्य जरूरी संसाधनों की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ रहा है।

    उन्होंने साफ कहा—अगर यह मार्ग जल्द नहीं खुला, तो यह “अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट” साबित हो सकता है।

    यूरोप में ईंधन की किल्लत, दुनिया पर असर

    IEA प्रमुख के मुताबिक, यूरोप में जेट ईंधन की कमी सबसे पहले नजर आएगी।

    फ्लाइट्स रद्द होने लगेंगी
    पेट्रोल, गैस और बिजली महंगी होगी
    सप्लाई चेन प्रभावित होगी

    इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा—महंगाई बढ़ेगी और विकास दर धीमी पड़ सकती है।

    गरीब देशों पर सबसे ज्यादा मार

    बिरोल ने चेताया कि इस संकट का असर सभी देशों पर पड़ेगा, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को झेलना पड़ेगा।

    उनके मुताबिक,

    आर्थिक नुकसान असमान होगा
    कमजोर अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा प्रभावित होंगी
    कुछ देशों में मंदी तक की स्थिति बन सकती है
    ‘टोल बूथ’ सिस्टम पर आपत्ति

    ईरान द्वारा होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क (टोल) लगाने की कोशिश पर भी बिरोल ने कड़ी आपत्ति जताई।

    उन्होंने कहा कि अगर यह व्यवस्था स्थायी हो गई, तो भविष्य में अन्य अहम समुद्री रास्तों—जैसे मलक्का स्ट्रेट—पर भी ऐसा हो सकता है, जो वैश्विक व्यापार के लिए खतरनाक संकेत है।

    टैंकर फंसे, उत्पादन ठप
    फारस की खाड़ी में 110+ तेल टैंकर और 15+ LNG जहाज फंसे हुए हैं
    युद्ध में 80 से ज्यादा ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रभावित
    उत्पादन सामान्य होने में कई महीने, पूरी रिकवरी में 2 साल तक लग सकते हैं
    आगे क्या?

    बिरोल के अनुसार, अगर मई के अंत तक हालात नहीं सुधरे, तो दुनिया को

    ऊंची महंगाई
    धीमी आर्थिक वृद्धि
    और संभावित मंदी
    का सामना करना पड़ सकता है।

    उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह संकट भविष्य में परमाणु ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर दुनिया को तेजी से मोड़ सकता है।

    ऊर्जा और भू-राजनीति का यह टकराव अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेता दिख रहा है। अगर होर्मुज स्ट्रेट जल्द नहीं खुला, तो आने वाले हफ्तों में इसका असर सीधे लोगों की जेब और यात्रा दोनों पर दिखेगा।

  • Lenskart विवाद: हिजाब की इजाजत और बिंदी पर रोक की खबर से बवाल, पीयूष बंसल ने दी सफाई

    Lenskart विवाद: हिजाब की इजाजत और बिंदी पर रोक की खबर से बवाल, पीयूष बंसल ने दी सफाई

    नई दिल्ली। आईवियर कंपनी Lenskart इन दिनों सोशल मीडिया पर बड़े विवाद में घिर गई है। कंपनी की कथित “स्टाफ यूनिफॉर्म और ग्रूमिंग गाइड” सामने आने के बाद आरोप लगे कि कर्मचारियों को हिजाब या पगड़ी पहनने की अनुमति है, लेकिन बिंदी और तिलक जैसे धार्मिक प्रतीकों पर रोक लगाई गई है।

    इस खबर के सामने आते ही लोगों में नाराजगी फैल गई और कंपनी पर भेदभाव के आरोप लगने लगे।

    क्या है पूरा विवाद?

    सोशल मीडिया पर वायरल दस्तावेज में दावा किया गया कि Lenskart स्टोर कर्मचारियों को काले रंग का हिजाब और पगड़ी पहनने की छूट देता है, लेकिन “धार्मिक टीका/तिलक और बिंदी/स्टिकर” की अनुमति नहीं है।
    इसी कथित नियम को लेकर यूजर्स ने सवाल उठाए और इसे धार्मिक असमानता से जोड़कर देखा।

    पीयूष बंसल की सफाई

    विवाद बढ़ने के बाद कंपनी के संस्थापक पीयूष बंसल ने सामने आकर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि वायरल दस्तावेज कंपनी की मौजूदा नीति का हिस्सा नहीं है और यह एक पुराना ड्राफ्ट है।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि कंपनी किसी भी तरह के धार्मिक प्रतीकों पर रोक नहीं लगाती और कर्मचारियों को बिंदी, तिलक समेत सभी प्रतीक पहनने की पूरी स्वतंत्रता है।
    साथ ही, उन्होंने इस पूरे मामले से पैदा हुए भ्रम के लिए माफी भी मांगी।

    सफाई पर भी उठे सवाल

    हालांकि, बंसल की सफाई के बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने दावा किया कि वायरल दस्तावेज हाल ही (फरवरी 2026) का है, इसलिए इसे “पुराना” बताना सही नहीं है।

    कुछ लोगों ने कंपनी से मौजूदा नीति सार्वजनिक करने की मांग की, जबकि अन्य ने यह सवाल उठाया कि अगर यह पुरानी पॉलिसी भी थी, तो उस समय ऐसे नियम क्यों बनाए गए थे।

    सोशल मीडिया पर बढ़ा दबाव

    यह मामला अब कंपनी की ब्रांड छवि से जुड़ गया है। यूजर्स लगातार पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं और स्पष्ट नीति सामने लाने की बात कह रहे हैं।

    फिलहाल कंपनी ने अपनी स्थिति साफ कर दी है, लेकिन सोशल मीडिया पर जारी बहस से यह साफ है कि मामला अभी पूरी तरह थमा नहीं है।

  • पश्चिम एशिया संकट के बीच ईरान ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों के निर्यात पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध….

    पश्चिम एशिया संकट के बीच ईरान ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों के निर्यात पर लगाया पूर्ण प्रतिबंध….


    तेहरान।
    इजरायल (Israel) द्वारा ईरान (Iran) के प्रमुख औद्योगिक बुनियादी ढांचे पर किए गए सटीक हमलों की श्रृंखला के बाद ईरानी सरकार ने घरेलू आपूर्ति (Household Supplies) की सुरक्षा के लिए पेट्रोकेमिकल उत्पादों के निर्यात (Petrochemical Products export) पर पूर्ण प्रतिबंध (Complete ban) लगा दिया है। राष्ट्रीय पेट्रोकेमिकल कंपनी के डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार एक वरिष्ठ अधिकारी ने मंगलवार को जारी निर्देश में सभी पेट्रोकेमिकल कंपनियों को अगले आदेश तक निर्यात निलंबित करने का आदेश दिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब इस्लामी गणराज्य हालिया संघर्षों से उत्पन्न उत्पादन व्यवधानों से अपने घरेलू विनिर्माण आधार को बचाने की कोशिश कर रहा है।

    एक रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रतिबंध का मुख्य उद्देश्य हालिया हमलों से हुए नुकसान के बाद घरेलू बाजारों को स्थिर करना और विभिन्न उद्योगों को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है। तेहरान उम्मीद कर रहा है कि इन सामग्रियों के अंतरराष्ट्रीय निर्यात को रोककर वह घरेलू स्तर पर औद्योगिक संकट को रोकेगा। दरअसल, हाल के हफ्तों में इजरायल ने ईरान के असलुयेह (साउथ पार्स) और महशहर स्थित प्रमुख पेट्रोकेमिकल उत्पादन केंद्रों को निशाना बनाया। इन हमलों में विशेष रूप से पेट्रोकेमिकल संयंत्रों को बिजली, पानी और ऑक्सीजन जैसी उपयोगिताएं प्रदान करने वाली कंपनियों पर हमला किया गया, जिससे उत्पादन बुरी तरह बाधित हो गया।

    इस आंतरिक उत्पादन संकट को और गंभीर बनाने वाला कारक समुद्री क्षेत्र में बढ़ता नाकाबंदी का दबाव भी है। अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले जहाजों की आवाजाही रोकने के लिए अभियान शुरू किया है, जिसका मकसद ईरान के निर्यात राजस्व को कम करना और तेहरान पर दबाव बढ़ाना है। दोनों पक्ष मौजूदा युद्धविराम के दौरान शांति वार्ता के अगले दौर पर विचार कर रहे हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता के बावजूद ईरानी सरकार आंतरिक स्थिरता की छवि पेश करने का प्रयास कर रही है। न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक कीमतों में उछाल के बावजूद पेट्रोकेमिकल और संबंधित उत्पादों की घरेलू कीमतें संघर्ष से पहले के स्तर पर बरकरार हैं। यह नीति स्थानीय उपभोक्ताओं और कारखानों को मुद्रास्फीति के झटके से बचाने के लिए अपनाई गई है।

    हालांकि, इस रोक का ईरानी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ने की आशंका है। न्यूज एजेंसी के अनुसार, ईरान प्रतिवर्ष लगभग 29 मिलियन टन पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्यात करता है, जिससे करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का राजस्व प्राप्त होता है। विदेशी मुद्रा के इस बड़े नुकसान के बावजूद सरकार ने घरेलू जरूरतों और अस्तित्व को प्राथमिकता देते हुए निर्यात निलंबित करने का फैसला लिया है।

  • पाकिस्तान में आतंकियों पर ‘मौत का साया’: हाफिज के करीबी हमजा पर हमला, रहस्यमयी 'धुरंधर' से दहशत

    पाकिस्तान में आतंकियों पर ‘मौत का साया’: हाफिज के करीबी हमजा पर हमला, रहस्यमयी 'धुरंधर' से दहशत

    नई दिल्ली। पाकिस्तान में पनाह लिए भारत के मोस्ट वॉन्टेड आतंकियों के लिए अज्ञात हमलावर लगातार खतरा बनते जा रहे हैं। बीते बुधवार को प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के संस्थापक सदस्य और हाफिज सईद के करीबी आमिर हमजा को लाहौर में निशाना बनाया गया। पुलिस के मुताबिक, मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने उस पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। गंभीर रूप से घायल हमजा को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसका इलाज जारी है।

    रहस्यमयी हमलों से आतंकियों में खौफ
    पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों के कई बड़े आतंकियों की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या हुई है। स्थानीय मीडिया अक्सर इन घटनाओं के पीछे अज्ञात बंदूकधारियों का हाथ बताता है। खासकर 2023 के बाद ऐसे मामलों में तेजी आई, जब सात महीनों में सात बड़े आतंकी मारे गए।

    ‘अनजान शिकारी’ के निशाने पर बड़े नाम
    इन हमलों में कई कुख्यात आतंकी ढेर हो चुके हैं—
    मोहम्मद ताहिर अनवर: जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर का भाई, जिसकी हाल ही में संदिग्ध मौत हुई।
    अबू कतल (कतल सिंधी): हाफिज सईद का करीबी और 2024 रियासी हमले का मास्टरमाइंड, मार्च 2023 में मारा गया।
    शाहिद लतीफ: 2016 पठानकोट हमले का मुख्य आरोपी, अक्टूबर 2023 में सियालकोट में ढेर।
    परमजीत सिंह पंजवड़: मई 2023 में लाहौर में सुबह की सैर के दौरान गोली मार दी गई।
    मुफ्ती कैसर फारूक: हाफिज सईद का सहयोगी, कराची में अक्टूबर 2023 में निशाना बनाया गया।
    ख्वाजा शाहिद (मियां मुजाहिद): PoK से अगवा, बाद में सिर कटी लाश बरामद हुई।
    अकरम खान गाजी: लश्कर की भर्ती से जुड़ा चेहरा, नवंबर 2023 में बाइक सवार हमलावरों ने मार डाला।

    पुराने मामलों का भी हो रहा हिसाब
    यह सिलसिला केवल हाल के आतंकियों तक सीमित नहीं है। 1999 के IC-814 विमान अपहरण कांड के एक मुख्य आरोपी मिस्त्री जहूर इब्राहिम को भी मार्च 2022 में कराची में मार दिया गया था। वह लंबे समय से फर्जी पहचान के साथ छिपा हुआ था, लेकिन हमलावरों से बच नहीं सका।

    कौन है इन हमलों के पीछे? बना हुआ है रहस्य

    लगातार हो रही इन घटनाओं ने पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। वहीं, आतंकी संगठनों के बीच डर का माहौल गहराता जा रहा है। इन हमलों को अंजाम देने वाला ‘धुरंधर’ कौन है, यह अब तक साफ नहीं हो सका है, जिससे यह रहस्य और भी गहरा हो गया है।

  • क्यूबा के राष्ट्रपति की दो टूक…. बोले- US ने सैन्य कार्रवाई की तो उनका देश जवाब देने को तैयार….

    क्यूबा के राष्ट्रपति की दो टूक…. बोले- US ने सैन्य कार्रवाई की तो उनका देश जवाब देने को तैयार….


    हवाना।
    क्यूबा के राष्ट्रपति मिगेल डियाज-कैनेल (Cuban President Miguel Diaz-Canel) ने गुरुवार को कहा कि क्यूबा (Cuba) नहीं चाहता कि अमेरिका (America) उस पर सैन्य कार्रवाई करे। उन्होंने कहा, अगर ऐसा होता है तो उनका देश लड़ने के लिए तैयार है। डियाज-कैनेल ने यह बात एक रैली में कही, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए थे। यह रैली क्यूबा की क्रांति के 65 साल पूरे होने पर आयोजित की गई थी, जब क्यूबा ने खुद को समाजवादी देश घोषित किया था।

    डियाज-कैनेल ने कहा, यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय है और हमें एक बार फिर गंभीर खतरों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा, जैसे 16 अप्रैल 1961 को थे। इन खतरों में (संभावित) सैन्य हमला भी शामिल है। हम यह नहीं चाहते, लेकिन इससे बचने के लिए तैयारी करना हमारा कर्तव्य है और अगर यह टालना संभव न हो, तो हमें इसे हराना होगा।


    अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्या चेतावनी दी?

    उन्होंने यह बात ऐसे समय में कही, जब दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। अमेरिका की ऊर्जा नाकेबंदी के कारण क्यूबा का संकट और गहरा गया है। इस हफ्ते की शुरुआत में ट्रंप ने कहा था कि ईरान के साथ जंग खत्म होने के बाद उनका प्रशासन क्यूबा पर फोकस कर सकता है। उन्होंने कहा, हम इसे खत्म करने के बाद क्यूबा की ओर भी जा सकते हैं। उन्होंने क्यूबा को ‘विफल देश’ बताया और कहा कि यह लंबे समय से खराब तरीके से चलाया जा रहा है।

    जनवरी के शुरुआत में ट्रंप ने पहले भी क्यूबा में दखल की धमकी दी थी, जब अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर हमला किया और वहां से आने वाले तेल की आपूर्ति रोक दी। कुछ हफ्तों बाद ट्रंप ने उन देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी, जो क्यूबा को तेल बेचते हैं या उपलब्ध कराते हैं। ट्रंप और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के माता-पिता 1950 के दशक में क्रांति से पहले क्यूबा से प्रवास कर गए थे। दोनों ने क्यूबा की सरकार को अक्षम और दमनकारी बताया है।

    डियाज-कैनेल ने उन पर आरोप लगाया कि वे एक ऐसा ‘कहानी’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका कोई आधार नहीं है। उन्होंने कहा, क्यूबा असफल देश नहीं है। क्यूबा एक घिरा हुआ देश है। क्यूबा एक ऐसा देश है, जो कई तरह के हमलों का सामना कर रहा है। इनमें आर्थिक युद्ध, कड़ी नाकेबंदी और ऊर्जा नाकेबंदी शामिल हैं।

    उन्होंने कहा, क्यूबा एक ऐसा देश है जिसे धमकाया जाता रहा है, लेकिन वह झुकता नहीं है। हर चीज के बावजूद समाजवाद की वजह से क्यूबा एक ऐसा देश है, जो संघर्ष करता है, आगे बढ़ता है और याद रखिए, यह देश जीतकर रहेगा।

    क्यूबा और अमेरिका दोनों ने माना है कि तनाव कम करने के लिए बातचीत चल रही है। लेकिन इसके बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की गई है। क्यूबा के राष्ट्रपति ने क्रांति से मिली उपलब्धियों को भी याद किया। उन्होंने कहा कि देश की समाजवादी व्यवस्था के कारण निशुल्क शिक्षा मिली है, जिससे हजारों पेशेवर तैयार हुए। लेकिन अब संकट के कारण उनमें से कई लोगों को देश छोड़ना पड़ा है।