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  • US-Iran War: ईरान युद्ध ने दुनिया में बना दिए इमरजेंसी के हालात

    US-Iran War: ईरान युद्ध ने दुनिया में बना दिए इमरजेंसी के हालात


    तेहरान।
     पश्चिम एशिया में ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद छिड़ी भीषण जंग 25 दिनों बाद भी जारी है। इस युद्ध की आंच दुनिया के कई देशों तक पहुंच गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे प्रमुख जलमार्ग बाधित होने की वजह से ईंधन आपूर्ति पर बेहद बुरा असर पड़ा है, जिसकी जद में कई देश आए हैं। हाल यह है कि एक देश में तो आपातकाल तक लागू करना पड़ा है। ऐसे में यह स्थिति लोगों को कोरोना काल के दौरान बनी स्थिति की याद दिला रही है।

    बता दें कि युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावी रूप से ठप हो गई है। यह इसीलिए अहम है क्योंकि इस रास्ते से दुनिया की ईंधन खपत का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। ईरान ने कहा है कि वह अमेरिका और उसके हितों वाले जहाजों को होर्मुज से गुजरने नहीं देगा। इसके बाद कई एशियाई देशों में पर्याप्त सप्लाई की कमी हो गई है। बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने लोगों को परेशान किया है। वहीं कई गंभीर उपाय भी लागू करने पड़े हैं। जानिए किस देश में कैसे हैं हालात:

    फ़िलिपींस

    युद्ध की वजह से हुई ईंधन आपूर्ति में कमी के बाद फ़िलिपींस ने मंगलवार को राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया है। 2020 में कोविड-19 महामारी के बाद यह पहली बार है जब फ़िलिपींस ने राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति घोषित की है। फ़िलिपींस के राष्ट्रपति फ़र्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने एक कार्यकारी आदेश में कहा है कि ऊर्जा सप्लाई के बहुत कम होने का बड़ा ख़तरा है और मौजूदा स्थिति से निपटने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि ऊर्जा सप्लाई स्थिर रहे और जरूरी सेवाओं पर कोई असर ना पड़े तत्काल उपायों की जरूरत है।

    जानकारी के मुताबिक 20 मार्च तक फ़िलिपींस के पास लगभग 45 दिनों का तेल भंडार है। बता दें कि फ़िलिपींस अपनी तेल सप्लाई के लिए पूरी तरह से पश्चिम एशिया पर निर्भर है। इमरजेंसी घोषित किए जाने के अलावा फ़िलिपींस में अधिकारियों से ईंधन बचाने के लिए हफ्ते में चार दिन काम करने को कहा गया है। अधिकारियों से लंच ब्रेक के दौरान कंप्यूटर बंद करने को भी कहा गया है। सरकार ने एयर कंडीशनिंग के तापमान पर भी 24°C की सीमा तय कर दी है और कहा है कि इसे इससे नीचे नहीं किया जाना चाहिए।

    पाकिस्तान

    पाकिस्तान की हालत भी खराब है। देश में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। अब बिना किसी औपचारिक घोषणा के जेट ईंधन और केरोसिन की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। इससे पहले देश में मंत्रियों, अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों की वेतन में कटौती की गई थी। वहीं वर्क फ्रॉम होम भी लागू किया गया है।
    वियतनाम

    वियतनाम में लोगों से ईंधन बचाने के लिए घर से काम करने की अपील की गई है। युद्ध के कारण ईंधन की कमी से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में वियतनाम भी शामिल है। इस महीने की शुरुआत में वियतनाम सरकार द्वारा जारी एक बयान में कहा गया था कि कंपनियों को यात्रा और परिवहन की जरूरत को कम करने के लिए, जब भी संभव हो, घर से काम करने को बढ़ावा देना चाहिए।
    बांग्लादेश

    बांग्लादेश ने अपने सभी विश्वविद्यालयों (निजी और सरकारी दोनों) को बंद कर दिया है और साथ ही ईंधन की राशनिंग भी लागू कर दी है। स्थानीय अखबार डेली स्टार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण बांग्लादेश का सालाना जीवाश्म ईंधन आयात बिल 4.8 बिलियन डॉलर तक बढ़ने का अनुमान है।
    श्रीलंका

    ईंधन बचाने के प्रयास में श्रीलंका की सड़कों पर अंधेरा छा गया है। देश में मंगलवार को सड़कों की लाइटें, नियॉन साइन और बिलबोर्ड की लाइटें बंद करने का ऐलान कर दिया गया है। इसके अलावा, सरकारी प्रवक्ता नलिंदा जयतिस्सा ने बताया कि सभी सरकारी संस्थानों से एयर कंडीशनिंग पर अपनी निर्भरता कम करने को कहा गया है, क्योंकि देश पहले से ही ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सामना कर रहा है। वहीं यहां भी 4 दिनों का वर्क विक लागू किया गया है।

  • ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला

    ईरान को अमेरिका की चेतावनी- हार नहीं मानी तो होगा और भीषण हमला


    वॉशिंगटन.
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब और गहरा होता जा रहा है। जहां एक ओर युद्धविराम को लेकर बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी और सैन्य दबाव तेज हो गया है। व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि वार्ता अभी डेड एंड पर नहीं पहुंची है, लेकिन हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।

    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को और तेज कर सकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तेहरान अपनी सैन्य हार को स्वीकार नहीं करता है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले से भी अधिक कड़ा कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

    पाकिस्तान में संभावित बैठक पर बयान

    लेविट ने कहा कि पाकिस्तान में ईरान से वार्ता को लेकर कई अटकलें हैं, लेकिन व्हाइट हाउस द्वारा आधिकारिक घोषणा के बिना किसी को भी इसे मान्य नहीं समझना चाहिए। लेविट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप धमकी नहीं देते, बल्कि कार्रवाई करते हैं। उन्होंने ईरान को चेतावनी दी कि पिछली गलत गणना ने उनकी वरिष्ठ नेतृत्व टीम, नौसेना, वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ तीन दिनों तक उपजाऊ बातचीत की, जिसके कारण कुछ हमलों को अस्थायी रूप से स्थगित किया गया। ईरान के लिए यह एक और अवसर है कि वे अपने परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से छोड़ें और अमेरिका व उसके सहयोगियों को खतरा न बनें।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर फोकस
    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य रणनीति का एक प्रमुख लक्ष्य होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।उन्होंने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से तेल टैंकरों के गुजरने का निर्णय केवल राष्ट्रपति ट्रंप ही कर सकते हैं। फिलहाल इस बारे में कोई निश्चित समयसीमा नहीं है, लेकिन प्रशासन इस पर तेजी से काम कर रहा है।

    लेविट ने यह भी कहा कि ट्रंप ने यह दिखाया है कि वे मुक्त दुनिया के नेता और सबसे शक्तिशाली सेना के प्रमुख हैं। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों में यह साबित किया कि अमेरिका के सहयोगी उनके नेतृत्व में फैसलों का समर्थन करते हैं, जो अमेरिका और वैश्विक हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर वार्ता तय
    व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने जानकारी दी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच लंबे समय से प्रस्तावित बैठक अब 14 और 15 मई को बीजिंग में आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि यह बैठक दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक में पश्चिम एशिया संघर्ष का निष्कर्ष चर्चा का पूर्व शर्त नहीं था। केवल बैठक की तारीख को पुनर्निर्धारित किया गया।

    साथ ही, आगे चलकर राष्ट्रपति ट्रंप और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप, राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन की मेजबानी वॉशिंगटन डीसी में भी करेंगे। इस पारस्परिक दौरे की तारीखों की घोषणा फिलहाल बाद में की जाएगी। यह पहल दोनों वैश्विक शक्तियों के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

    ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का असर
    प्रेस ब्रीफिंग में लेविट ने बताया कि अमेरिकी सेना द्वारा चलाया जा रहा ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अब तक बड़ी सफलता हासिल कर चुका है। उन्होंने दावा किया कि तीन हफ्तों के भीतर 9,000 से अधिक लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है। उनके अनुसार, इस अभियान के बाद ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमलों में लगभग 90% की कमी आई है। साथ ही, अमेरिका ने ईरान की नौसेना को भी भारी नुकसान पहुंचाया है और 140 से अधिक नौसैनिक जहाजों को नष्ट किया गया है।

    ईरान की नौसेना के 140 से अधिक जहाज, जिनमें लगभग 50 माइन लेयर शामिल हैं, नष्ट किए गए। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी तीन-सप्ताह के अभियान में सबसे बड़ी नौसेना ध्वंस कार्रवाई है। अमेरिका ईरान की रक्षा औद्योगिक क्षमता को भी व्यवस्थित नष्ट कर रहा है, ताकि भविष्य में क्षेत्रीय खतरे को रोका जा सके। लेविट ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी सेना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ऊर्जा के मुक्त प्रवाह और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से केंद्रित है।

    लेविट ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के विवरण सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के प्रमुख सदस्य हैं और उन्होंने पूरे प्रशासनिक कार्यकाल में महत्वपूर्ण वार्ता में हिस्सा लिया है, जिनमें इस्राइल और गाजा के बीच युद्धविराम और बंधकों की रिहाई शामिल है।

    घरेलू मुद्दों पर भी हमला
    प्रेस सचिव ने इस दौरान अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने सैंक्चुअरी सिटी नीतियों को लेकर डेमोक्रेटिक राज्यों की आलोचना करते हुए कहा कि अवैध प्रवासियों को सुरक्षा देना अमेरिकी नागरिकों के हितों के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया आखिर कितने और अमेरिकियों की जान जाएगी, तब जाकर यह नीतियां खत्म होंगी?

  • UN में ब्रिटेन के खिलाफ किस प्रस्ताव पर भारत ने किया वोट? लंदन की बढ़ी टेंशन

    UN में ब्रिटेन के खिलाफ किस प्रस्ताव पर भारत ने किया वोट? लंदन की बढ़ी टेंशन


    संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन को एक बड़ा झटका लगा है. अफ्रीकी देशों की मांग पर UN जनरल असेंबली में एक प्रस्ताव पास किया गया है, जिसमें ब्रिटेन और अन्य पूर्व उपनिवेशवादी देशों से ट्रांसअटलांटिक गुलाम व्यापार के लिए मुआवजा देने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव में गुलाम व्यापार को मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध बताया गया है.

    यह प्रस्ताव अफ्रीकी देश घाना की ओर से अफ्रीकी संघ के तत्वावधान में पेश किया गया था. इस पर हुए वोटिंग में 124 देशों ने समर्थन किया, जिसमें भारत भी शामिल है. इस प्रस्ताव का तीन देशों ने विरोध किया और 52 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.

    इस बिल का विरोध करने वाले देशों में अमेरिका, इजराइल और अर्जेंटीना शामिल हैं. वहीं ब्रिटेन के साथ फ्रांस और यूरोपीय संघ (European Union) के कई देशों ने वोटिंग से परहेज किया है. ब्रिटेन ने साफ कर दिया कि वह इस प्रस्ताव से सहमत नहीं है. ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने कहा कि उन्हें प्रस्ताव में इस्तेमाल की गई कानूनी भाषा पर आपत्ति है. ब्रिटेन के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा, “ब्रिटेन का रुख साफ है, हम मुआवजा नहीं देंगे.”

    यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह अफ्रीकी देशों के लिए एक बड़ी राजनयिक जीत है. अब अफ्रीकी देश इस मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं. उनका तर्क है कि गुलाम व्यापार की वजह से अफ्रीका का विकास रुका और आज भी इसकी वजह से नस्लभेद की समस्या बनी हुई है.

    अमेरिका ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि वह मानवता के खिलाफ अपराधों की रैंकिंग बनाने का विरोध करता है. अमेरिका ने उन मुस्लिम देशों के गुलाम व्यापार का भी मुद्दा उठाया जो 20वीं सदी तक जारी रहा. UN में ब्रिटेन के खिलाफ पारित इस प्रस्ताव में मुआवजे की मांग की गई है. भारत ने इसके समर्थन में वोट किया, जिससे ब्रिटेन की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अब अगला दौर अंतरराष्ट्रीय अदालत में लड़ा जा सकता है.

  • बांग्लादेश में बड़ा हादसा: अनियंत्रित बस नदी में गिरी, 18 लोगों की मौत

    बांग्लादेश में बड़ा हादसा: अनियंत्रित बस नदी में गिरी, 18 लोगों की मौत

    नई दिल्ली।  बांग्लादेश में एक दिल दहला देने वाला सड़क हादसा सामने आया है, जहां एक यात्री बस अनियंत्रित होकर पद्मा नदी में गिर गई। इस भीषण दुर्घटना में अब तक 18 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई यात्री अब भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसा राजबारी जिले के गोवालैंड उपजिला स्थित दौलतदिया फेरी टर्मिनल पर बुधवार शाम करीब 5:15 बजे हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बस नदी पार करने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही थी, तभी अचानक नियंत्रण खो बैठी और सीधे नदी में जा गिरी।

    स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बस कुश्तिया के कुमारखाली से ढाका जा रही थी और रास्ते में अलग-अलग स्थानों से यात्रियों को बैठाया गया था। बताया जा रहा है कि बस में कुल करीब 50 लोग सवार थे, जबकि बस की क्षमता 40 सीटों की थी। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और तुरंत राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया गया।

    बचाव अभियान के तहत ‘हमजा’ नामक रेस्क्यू शिप को लगाया गया, जिसने करीब छह घंटे की मशक्कत के बाद डूबी हुई बस को नदी से बाहर निकाला। देर रात करीब 11:30 बजे क्रेन की मदद से बस को पानी से बाहर निकाला गया। इसके बाद बस के अंदर से 16 शव बरामद किए गए, जिनमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल थे। इससे पहले दो घायलों को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया, जिससे कुल मृतकों की संख्या 18 हो गई।

    फरीदपुर फायर सर्विस के कमांडर मोहम्मद बेलाल उद्दीन ने बताया कि हादसे के बाद बड़ी संख्या में लोग लापता हो गए थे। राहत दल लगातार नदी में सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं और गोताखोरों की मदद से बस के आसपास तलाशी ली जा रही है। हालांकि बस के दरवाजे और खिड़कियां टूट जाने के कारण अंदर पहुंचना काफी मुश्किल हो गया था।

    हादसे की वजह अभी साफ नहीं हो पाई है, लेकिन शुरुआती जांच में ड्राइवर द्वारा नियंत्रण खोने की आशंका जताई जा रही है। प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और मृतकों के परिजनों को हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है।

    इस दर्दनाक हादसे के बाद पीड़ित परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है। वहीं स्थानीय प्रशासन और बचाव दल पूरी मुस्तैदी से लापता लोगों की तलाश में जुटे हुए हैं।

  • ईरान पर हमलों को ऑस्ट्रेलिया में कम समर्थन, सेना भेजने का विरोध

    ईरान पर हमलों को ऑस्ट्रेलिया में कम समर्थन, सेना भेजने का विरोध


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल के हमलों की वजह से तनाव की स्थिति बरकरार है। एक सर्वे से पता चला है कि ऑस्ट्रेलिया की केवल 26 फीसदी जनता ही ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के हमलों को सही मानती है। वहीं 50 फीसदी आबादी ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की तैनाती को ठीक नहीं मानती।

    न्यूज एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, स्वतंत्र फर्म ‘एसेंशियल रिसर्च’ के एक मासिक पोल, ‘द एसेंशियल रिपोर्ट’ के ताजा अपडेट में बताया गया है कि 10 फीसदी लोग ईरान पर हमले शुरू करने के अमेरिका-इजरायल के फैसले को पूरी तरह से जायज हमला मानते हैं और 16 फीसदी लोग इसे ठीक-ठाक कार्रवाई करार दे रहे हैं।

    वहीं ऑस्ट्रेलियाई आबादी का 27 फीसदी हिस्सा इस संघर्ष के सख्त खिलाफ है। 15 फीसदी लोगों ने कहा कि वे इसे नामंजूर करते हैं, जबकि बाकी लोग या तो निष्पक्ष रहने में यकीन रखते हैं या इस फैसले को लेकर असमंजस में हैं।

    संघर्ष में ऑस्ट्रेलिया के शामिल होने के बारे में पूछे जाने पर, पोल में शामिल 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे ईरान में अमेरिका-इजरायल के जमीनी अभियान के समर्थन में सेना भेजने का विरोध करेंगे, जबकि 21 प्रतिशत ने कहा कि वे ऐसे कदम के पक्ष में हैं।

    दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया ने ईरान से आने वाले यात्रियों पर बैन लगाने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से यह खतरा बढ़ गया है कि शॉर्ट-टर्म वीजा खत्म होने के बाद वे घर जाने से मना कर देंगे।

    गृह विभाग का कहना है कि अगले छह महीनों तक ईरानी पासपोर्ट पर यात्रा करने वाले लोगों को पर्यटन या काम के लिए ऑस्ट्रेलिया आने से रोक दिया जाएगा।

    एक बयान में कहा गया है, “ईरान में लड़ाई की वजह से यह खतरा बढ़ गया है कि कुछ अस्थायी वीजा होल्डर्स अपने वीजा खत्म होने पर ऑस्ट्रेलिया से बाहर नहीं जा पाएंगे या शायद ही जा पाएं।”

    विभाग ने आगे कहा कि वीजा मामले में थोड़ी सी राहत कुछ खास मामलों में दी जाएंगी, जैसे कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों के माता-पिता के लिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 85,000 से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ईरान में पैदा हुए थे और सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में रहने वाले ईरानी समुदाय के पाए जाते हैं।

    इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने इस महीने मेहमान महिला फुटबॉल टीम की सात खिलाड़ियों और अधिकारियों को अपने देश में शरण दी। ऑस्ट्रेलिया के इस कदम से ईरान में भारी नाराजगी है।

    दरअसल, एशियन कप मैच के दौरान खेल शुरू होने से पहले खिलाड़ियों ने ईरान का राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया। इस कदम के बाद ईरान में इन खिलाड़ियों को देशद्रोही करार दिया गया। खिलाड़ियों की इस हरकत को इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ बगावत के तौर पर देखा गया।

    उन सात में से पांच ने बाद में ऑस्ट्रेलिया में पनाह लेने का अपना फैसला बदल दिया, जिससे यह शक और बढ़ गया कि उनके परिवार खतरे में आ गए हैं।

  • बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती

    बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती


    नई दिल्ली।  भारत की वैश्विक कूटनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। एस. जयशंकर दो दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हो रहे हैं, जहां वे जी-7 विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल भारत-फ्रांस संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी और प्रभावशाली बनाएगा।

    फ्रांस में होगी अहम कूटनीतिक बैठक

    विदेश मंत्री जयशंकर फ्रांस के अब्बे डेस वॉक्स-डी-सेर्ने में आयोजित बैठक में शामिल होंगे। उन्हें फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने आमंत्रित किया है। इस दौरान जयशंकर कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी कर सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    वैश्विक मुद्दों पर होगी गहन चर्चा

    इस जी-7 बैठक में दुनिया के कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसमें यूक्रेन में जारी युद्ध, पुनर्निर्माण की योजनाएं, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। साथ ही, सप्लाई चेन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखने पर भी विचार-विमर्श होगा।

    यूक्रेन संकट पर विशेष फोकस

    बैठक में यूक्रेन के पुनर्निर्माण को लेकर खास सत्र आयोजित होंगे। इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी, ह्यूमैनिटेरियन डीमाइनिंग और फंडिंग सिस्टम पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी जोर रहेगा, जो यूक्रेन की आर्थिक बहाली में मदद कर सकते हैं।

    समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर

    वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद अहम है। इस बैठक में मैरीटाइम रूट की सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाने के प्रयास किए जाएंगे।

    ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम में सुधार की पहल

    जी-7 देश वैश्विक शासन प्रणाली को और आधुनिक बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसमें ऐसे नए ढांचे तैयार करने पर जोर होगा, जो बदलती वैश्विक चुनौतियों जैसे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़े जोखिमो का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

    भारत समेत कई देशों की भागीदारी

    इस बैठक की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ जी-7 देश ही नहीं, बल्कि भारत, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ब्राजील और यूक्रेन जैसे कई साझेदार देश भी शामिल होंगे। यह जी-7 की बढ़ती आउटरीच और सहयोग की नीति को दर्शाता है।

    इवियन समिट की तैयारी का मंच

    यह बैठक जून में होने वाले जी-7 लीडर्स समिट (इवियन समिट) की तैयारी का अहम चरण मानी जा रही है। यहां होने वाली चर्चाएं भविष्य की वैश्विक रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • फ्रांस दौरे पर विदेश मंत्री जयशंकर, G7 बैठक में भारत की होगी अहम भूमिका

    फ्रांस दौरे पर विदेश मंत्री जयशंकर, G7 बैठक में भारत की होगी अहम भूमिका


    नई दिल्ली। भारत की वैश्विक कूटनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। एस. जयशंकर दो दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हो रहे हैं, जहां वे जी-7 विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल भारत-फ्रांस संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी और प्रभावशाली बनाएगा।

    फ्रांस में होगी अहम कूटनीतिक बैठक

    विदेश मंत्री जयशंकर फ्रांस के अब्बे डेस वॉक्स-डी-सेर्ने में आयोजित बैठक में शामिल होंगे। उन्हें फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने आमंत्रित किया है। इस दौरान जयशंकर कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी कर सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    वैश्विक मुद्दों पर होगी गहन चर्चा

    इस जी-7 बैठक में दुनिया के कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसमें यूक्रेन में जारी युद्ध, पुनर्निर्माण की योजनाएं, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। साथ ही, सप्लाई चेन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखने पर भी विचार-विमर्श होगा।

    यूक्रेन संकट पर विशेष फोकस

    बैठक में यूक्रेन के पुनर्निर्माण को लेकर खास सत्र आयोजित होंगे। इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी, ह्यूमैनिटेरियन डीमाइनिंग और फंडिंग सिस्टम पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी जोर रहेगा, जो यूक्रेन की आर्थिक बहाली में मदद कर सकते हैं।

    समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर

    वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद अहम है। इस बैठक में मैरीटाइम रूट की सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाने के प्रयास किए जाएंगे।

    ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम में सुधार की पहल

    जी-7 देश वैश्विक शासन प्रणाली को और आधुनिक बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसमें ऐसे नए ढांचे तैयार करने पर जोर होगा, जो बदलती वैश्विक चुनौतियों—जैसे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़े जोखिमों—का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

    भारत समेत कई देशों की भागीदारी

    इस बैठक की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ जी-7 देश ही नहीं, बल्कि भारत, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ब्राजील और यूक्रेन जैसे कई साझेदार देश भी शामिल होंगे। यह जी-7 की बढ़ती आउटरीच और सहयोग की नीति को दर्शाता है।

    इवियन समिट की तैयारी का मंच

    यह बैठक जून में होने वाले जी-7 लीडर्स समिट (इवियन समिट) की तैयारी का अहम चरण मानी जा रही है। यहां होने वाली चर्चाएं भविष्य की वैश्विक रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • स्पेस रेस में चीन की बढ़त से अमेरिका अलर्ट, अधिकारियों की सख्त चेतावनी

    स्पेस रेस में चीन की बढ़त से अमेरिका अलर्ट, अधिकारियों की सख्त चेतावनी


    नई दिल्ली। अंतरिक्ष की दौड़ एक बार फिर तेज हो गई है और इस बार मुकाबला सीधे तौर पर अमेरिका और चीन के बीच नजर आ रहा है। अमेरिकी सांसदों और अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में चीन तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, जिससे अमेरिका की स्पेस लीडरशिप को चुनौती मिल सकती है।

    आईएसएस के बाद का दौर बना चुनौती

    इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पिछले 25 सालों से मानव अंतरिक्ष मिशनों और रिसर्च का केंद्र रहा है। लेकिन अब यह स्टेशन पुराना हो रहा है और इसके अगले चरण को लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ गई है। हाउस साइंस कमेटी के चेयरमैन ब्रायन बैबिन ने कहा कि ISS अमेरिकी स्पेस प्रोग्राम की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अब इसके बाद की योजना बेहद सावधानी से बनानी होगी।

    चीन की बढ़ती मौजूदगी से बढ़ी टेंशन

    चीन ने तियांगोंग स्पेस स्टेशन के जरिए लो अर्थ ऑर्बिट में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कर ली है। 2022 में लॉन्च हुए इस स्टेशन पर लगातार अंतरिक्ष यात्री काम कर रहे हैं। अमेरिकी सांसद माइक हरिडोपोलोस ने कहा कि अमेरिका को इस क्षेत्र में अपनी लीड बनाए रखने के लिए तेजी से कदम उठाने होंगे।

    सुरक्षा और तकनीकी जोखिम भी बड़ी चिंता

    एयरोस्पेस सेफ्टी एक्सपर्ट चार्ल्स जे. प्रीकोर्ट ने चेतावनी दी कि ISS अब अपने सबसे जोखिम भरे दौर में है। पुराने होते सिस्टम और तकनीकी घिसावट के कारण खतरे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगातार सुरक्षित ऑपरेशन के लिए कड़ी इंजीनियरिंग और रिस्क मैनेजमेंट जरूरी है।

    ‘स्पेस गैप’ का खतरा

    विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि ISS से कमर्शियल स्पेस प्लेटफॉर्म पर ट्रांजिशन के दौरान अमेरिका की मानव अंतरिक्ष क्षमता में गैप आ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर रिसर्च और भविष्य के मिशनों पर पड़ेगा।

    तेजी से बढ़ रहा स्पेस बिजनेस

    कमर्शियल स्पेस सेक्टर भी तेजी से विस्तार कर रहा है। कमर्शियल स्पेस फेडरेशन के अध्यक्ष डेविड कैवोसा के मुताबिक, वैश्विक स्पेस मार्केट पहले ही 57,000 करोड़ डॉलर का हो चुका है और 2035 तक इसके 1.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में इस क्षेत्र में देरी या नीति की अस्पष्टता निवेश को प्रभावित कर सकती है।

    नासा की नई रणनीति

    नासा अब ISS के बाद के दौर के लिए कमर्शियल स्पेस स्टेशनों पर फोकस कर रहा है। स्पेस ऑपरेशंस के अधिकारी जोएल आर. मोंटालबानो ने कहा कि एजेंसी 2030 तक एक मजबूत कमर्शियल स्पेस इकोसिस्टम तैयार करना चाहती है, जहां वह खुद भी एक ग्राहक के रूप में शामिल होगी।

    निर्णायक होंगे आने वाले साल

    अमेरिकी सांसदों का मानना है कि अगले कुछ साल यह तय करेंगे कि लो अर्थ ऑर्बिट में किसकी बादशाहत होगी। दशकों तक लगातार अंतरिक्ष में मौजूदगी के बाद अगर अमेरिका के मिशनों में कोई गैप आता है, तो इसका सीधा फायदा चीन को मिल सकता है।

  • पाकिस्तान में सुबह-सुबह भूकंप के तेज झटके से कांपी धरती, 4.6 मापी गई तीव्रता

    पाकिस्तान में सुबह-सुबह भूकंप के तेज झटके से कांपी धरती, 4.6 मापी गई तीव्रता


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) में भूकंप (Earthquake) के तेज झटके लगे हैं. नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी National Center for Seismology.- (NCS) के अनुसार, आज सुबह पाकिस्तान में 4.6 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। इसका केंद्र बलूचिस्तान के बारखान से लगभग 55 किलोमीटर उत्तर में स्थित था.


    सुबह-सुबह कांपी धरती

    एनसीएस के अनुसार, भूकंप 26 मार्च 2026 को सुबह 5:56 बजे (भारतीय समय) आया. भूकंप का केंद्र 30.394° उत्तरी अक्षांश और 69.534° पूर्वी देशांतर पर दर्ज किया गया, जबकि इसकी गहराई 10 किलोमीटर थी. भूकंप के झटके आसपास के इलाकों में भी महसूस किए गए, जिससे कुछ समय के लिए लोगों में दहशत फैल गई।


    जान-माल का नुकसान नहीं

    फिलहाल किसी बड़े जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है. प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान एक भूकंप संभावित क्षेत्र में स्थित है, क्योंकि यह भारतीय, यूरेशियाई और अरब टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा के पास आता है, जिस कारण इस क्षेत्र में अक्सर भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की जाती रहती हैं.


    क्यों आता है भूकंप?

    भूकंप पृथ्वी की सतह के अचानक कंपन को कहते हैं, जो जमीन के अंदर टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने, घर्षण या ऊर्जा मुक्त होने के कारण आता है. यह ऊर्जा शॉक वेव्स के रूप में फैलती है, जिससे जमीन हिलती है और इमारतें गिर सकती हैं. भूकंप को रिक्टर पैमाने पर मापा जाता है और इसके कारण भूस्खलन, सुनामी या आग जैसी आपदाएं आ सकती हैं.

    केंद्र (Epicenter): जमीन के अंदर वह स्थान जहां से भूकंप शुरू होता है, उसे ‘फोकस’ कहते हैं, और ठीक ऊपर सतह पर स्थित स्थान को ‘एपिसेंटर’ कहते हैं.


    भूकंप के दौरान क्या करें?

    मेज के नीचे छिपें और उसे पकड़ें. अगर संभव हो तो इमारतों से दूर, खुले मैदान में चले जाएं. लिफ्ट का प्रयोग न करें. भूकंप के दौरान हमेशा सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.

  • भारत-इजरायल साझेदारी से IMEC मजबूत, चीन की पकड़ को संतुलित करने की रणनीति

    भारत-इजरायल साझेदारी से IMEC मजबूत, चीन की पकड़ को संतुलित करने की रणनीति


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायली यात्रा ने भारत और इजरायल के नागरिकों और आर्थिक संबंधों को और मजबूत किया है। ‘द जेरूसलम स्ट्रेटेजिक ट्रिब्यून’ में प्रकाशित लेख के अनुसार, यह कदम भारत की व्यापक नागरिक सोच का हिस्सा है, जिसमें चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना और पश्चिमी देशों के साथ समन्वय बढ़ाना शामिल है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कनेसेट में अपने भाषण में संकेत दिया कि भारत स्थिर और भरोसेमंद सहयोगियों के साथ सहयोग बढ़ाकर अपनी नागरिकता स्वतंत्रता मजबूत करना चाहता है। इस योजना का केंद्र भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) है। आईएमईसी केवल व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि इसे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) का संतुलित विकल्प माना जा रहा है। इसका उद्देश्य एशिया और यूरोप के बीच व्यापार और ऊर्जा पर चीन के प्रभाव को कम करना है।

    लेख में बताया गया है कि चीन ने परिवहन, ऊर्जा और टेलीकॉम सेक्टर में बड़े निवेश से कई देशों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। इसके जवाब में आईएमईसी इंटर्नशिप, साझेदारी और साझा हितों को प्राथमिकता देता है। भारत के लिए इस कॉरिडोर में इजरायल और ग्रीस जैसे देश अहम हैं, जो स्थिर व्यवस्था और तकनीकी क्षमता प्रदान करते हैं। हालांकि, चीन के पास पहले से ही कई बड़े प्रोजेक्ट जैसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर पोर्ट हैं, साथ ही ईरान और खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध भी उसकी ताकत बढ़ाते हैं।

    आईएमईसी के सामने चुनौती सिर्फ चीन का विकल्प प्रस्तुत करने की नहीं, बल्कि खुद को भरोसेमंद और टिकाऊ मॉडल साबित करने की है। लेख के अनुसार, इस कॉरिडोर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सुरक्षित, निष्पक्ष और सभी देशों के हितों को संतुलित करने वाला सिस्टम बन सके। इस पहल से भारत अपने दुश्मनों और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए वैश्विक परिदृश्य में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।