Category: Lifestyle

  • ब्राइडल लुक के लिए परफेक्ट: पायल के साथ खूब जचेंगे बिछिया के ये 6 यूनिक डिज़ाइन

    ब्राइडल लुक के लिए परफेक्ट: पायल के साथ खूब जचेंगे बिछिया के ये 6 यूनिक डिज़ाइन


    नई दिल्ली । भारतीय परंपरा में बिछिया और पायल को सुहाग और सौंदर्य का खास प्रतीक माना जाता है। शादी या किसी खास मौके पर अगर पायल के साथ सही डिजाइन की बिछिया पहनी जाए तो दुल्हन का पूरा लुक और भी आकर्षक नजर आता है। अक्सर दुल्हनें अपने लहंगे, ज्वेलरी और मेकअप पर ज्यादा ध्यान देती हैं, लेकिन पैरों का श्रृंगार भी ब्राइडल लुक का अहम हिस्सा होता है।अगर आप भी अपने पैरों को खास और स्टाइलिश बनाना चाहती हैं, तो इन ट्रेंडी बिछिया डिजाइन्स को ट्राई कर सकती हैं।

    मल्टी-लेयर या चेन बिछिया

    आजकल पायल से जुड़ी चेन वाली बिछिया काफी ट्रेंड में हैं। इसमें पायल से एक पतली चेन निकलकर बिछिया से जुड़ी होती है, जो पैरों को हेवी और रॉयल ब्राइडल लुक देती है।
    कुंदन और स्टोन वर्क बिछिया
    रॉयल लुक के लिए कुंदन और स्टोन वर्क वाली बिछिया बेहतरीन विकल्प है। भारी पायल के साथ पहनने पर यह डिजाइन पैरों को बेहद आकर्षक बनाता है।

    ऑक्सीडाइज्ड सिल्वर बिछिया

    अगर आपकी पायल एंटीक या ऑक्सीडाइज्ड फिनिश वाली है तो उसी स्टाइल की बिछिया चुनना बेहतर रहेगा। इनमें छोटे घुंघरू या नक्काशीदार पैटर्न बहुत पसंद किए जाते हैं।

    मीनाकारी बिछिया

    रंग-बिरंगी मीनाकारी वाली बिछिया इन दिनों काफी ट्रेंड में है। आप अपने लहंगे के रंग के अनुसार लाल, हरे या गुलाबी रंग की मीनाकारी डिज़ाइन चुन सकती हैं।

    फ्लोरल और लीफ पैटर्न

    फूल और पत्तियों से प्रेरित डिजाइन हमेशा फैशन में बने रहते हैं। हल्की पायल के साथ यह डिजाइन बेहद एलिगेंट और नाजुक लुक देता है।

    एडजस्टेबल विंटेज बैंड

    अगर आप आरामदायक और सिंपल स्टाइल चाहती हैं तो चौड़े विंटेज बैंड वाली बिछिया ट्राई करें। ये हर साइज की उंगली में आसानी से फिट हो जाती हैं और बोहो-चिक लुक देती हैं। अगर आप अपने ब्राइडल लुक को हेड-टू-टो परफेक्ट बनाना चाहती हैं, तो पायल के साथ सही बिछिया डिजाइन चुनना न भूलें। सही ज्वेलरी आपके पूरे लुक को और भी खास बना सकती है।

  • चने के सेवन के सही तरीके: भुना, भीगा या पकाया हुआ कौन फायदेमंद

    चने के सेवन के सही तरीके: भुना, भीगा या पकाया हुआ कौन फायदेमंद


    नई दिल्ली :
    शरीर के स्वस्थ संचालन और मांसपेशियों की मजबूती के लिए प्रोटीन बेहद जरूरी है। महंगे सप्लीमेंट की बजाय किचन में मौजूद चना प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत है। चना आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर माना जाता है और इसमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स जैसे जरूरी पोषक तत्व होते हैं।

    आयुर्वेद के अनुसार भुना चना, भीगा हुआ चना, पकाया हुआ चना और चने से बना सत्तू अलग-अलग तरीकों से शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। इसका सही मात्रा और सही तरीके से सेवन करना जरूरी है, ताकि पाचन ठीक रहे और शरीर को पूरा फायदा मिले।

    भुना चना
    भुने हुए चने में कैलोरी कम और फाइबर अधिक होता है। यह वजन नियंत्रण में मदद करता है और कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज और हृदय रोगों में लाभकारी है। भुना चना सुबह या दोपहर के समय सेवन करना सबसे अच्छा माना जाता है।

    भीगा और पकाया हुआ चना
    काला चना रात में भिगोकर सुबह उबालकर खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और यह वजन बढ़ाने में मददगार है। जिम जाने वाले या पसीना बहाने वाले लोग इसके सेवन से ताकत और ऊर्जा पा सकते हैं। अगर इसे देसी घी के साथ हल्का सा छौंक लगाकर पकाया जाए तो यह वात दोष को कम करने और चने की रूखापन दूर करने में भी मदद करता है। इसे नाश्ते या शाम में हल्की भूख लगने पर खाया जा सकता है।

    चने से बना सत्तू
    सत्तू प्रोटीन से भरपूर होता है और गर्मियों में इसे खाने से पेट को ठंडक मिलती है। इसके सेवन से थकान कम होती है और नेत्र से जुड़े रोगों में भी राहत मिलती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मियों में तीनों प्रकार के चने का सेवन किया जा सकता है। हालांकि, वात दोष की अधिकता वाले लोग चने का सेवन सावधानी से करें।इस प्रकार चना केवल प्रोटीन का स्रोत ही नहीं बल्कि ऊर्जा देने और शरीर को स्वस्थ रखने का प्राकृतिक उपाय भी है।

  • हरी सब्जियों को खाएं सही तरीके से, बुजुर्ग और बच्चों के लिए विशेष सलाह…

    हरी सब्जियों को खाएं सही तरीके से, बुजुर्ग और बच्चों के लिए विशेष सलाह…


    नई दिल्ली: हरी सब्जियां स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती हैं। आयुर्वेद में भी हरी पत्तेदार सब्जियों को खाने का सही तरीका बताया गया है, ताकि पाचन ठीक रहे और शरीर को पूरा पोषण मिल सके।

    हालांकि आजकल सैंडविच, सलाद और नूडल्स में कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल आम हो गया है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार कई हरी सब्जियां कच्ची खाने से पाचन में समस्या हो सकती है और वात दोष बढ़ा सकती हैं।

    कैसे खाएं हरी सब्जियां:

    पालक, शिमला मिर्च और गोभी जैसी हरी सब्जियों को कच्चा खाने से बचें। इनमें परजीवी टेपवर्म होने का खतरा रहता है।

    सब्जियों को पहले उबालें, फिर अतिरिक्त पानी निचोड़कर घी या तेल में हल्का भूनकर पकाएं।

    बुजुर्ग और बच्चों को हरी सब्जियों का सेवन कम मात्रा में दें।

    आयुर्वेद में बुजुर्गों और बच्चों के पाचन को ध्यान में रखते हुए कुछ सब्जियों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। इनमें तोरई, टिंडा, लौकी, परवल और कुंदरू शामिल हैं। ये हरी सब्जियों जितनी ही पौष्टिक होती हैं और पचाने में हल्की होती हैं। यदि बच्चे इन सब्जियों को कम पसंद करें, तो इन्हें आटे में मिलाकर पराठा या मीठे के रूप में दिया जा सकता है।

    सही मात्रा और सही तरीके से हरी सब्जियों का सेवन करने से पाचन बेहतर रहता है, प्रतिरक्षा मजबूत होती है और हृदय स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता है।

  • पंचतत्व और हमारी उंगलियां: जानें शरीर में इन्हें सक्रिय करने के आसान तरीके

    पंचतत्व और हमारी उंगलियां: जानें शरीर में इन्हें सक्रिय करने के आसान तरीके


    नई दिल्ली: हमारा शरीर पंचभूतों से बना है -पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। आयुर्वेद और प्राचीन ज्ञान के अनुसार ये पंचतत्व हमारे शरीर और स्वास्थ्य के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृत्यु के बाद शरीर इन्हीं पंचतत्वों में विलीन हो जाता है, लेकिन जीवन में इनके संतुलन और सक्रियता को बनाए रखना भी जरूरी है।

    हाथ की पांचों उंगलियां हमारे शरीर के पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अंगूठा पृथ्वी तत्व, तर्जनी वायु, मध्यमा आकाश, अनामिका अग्नि और कनिष्ठा जल का प्रतीक है।

    पृथ्वी तत्व अंगूठा:
    प्रकृति से जुड़ने से पृथ्वी तत्व सक्रिय होता है। हरियाली के बीच समय बिताएं, नंगे पैर घास पर चलें, मिट्टी को हाथ लगाएं और बागवानी करें।

    वायु तत्व तर्जनी:
    सांस और प्राणायाम से वायु तत्व संतुलित होता है। रोजाना खुली हवा में अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम करें। आहार में हल्की कड़वी चीजें शामिल करें।

    आकाश तत्व मध्यमा:
    आकाश तत्व को संतुलित करने के लिए ध्यान और मौन की प्रक्रिया अपनाएं। ध्यान मुद्रा में बैठकर ओम का उच्चारण करें। यह मानसिक चेतना बढ़ाता है और मन को शांति प्रदान करता है।

    अग्नि तत्व अनामिका:
    अग्नि तत्व पाचन से जुड़ा है। इसे सक्रिय करने के लिए सूर्य नमस्कार, नौकासन और कपालभाति जैसी योग मुद्राएं करें। साथ ही हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन लें। सही पाचन से कई रोग अपने आप ठीक हो सकते हैं।

    जल तत्व कनिष्ठा:
    जल तत्व हमारे शरीर का 50-65 फीसदी हिस्सा बनाता है। इसे सक्रिय करने के लिए पर्याप्त तरल पदार्थ लें, जल मुद्रा का अभ्यास करें और स्विमिंग करें।इस प्रकार पंचतत्वों को सक्रिय और संतुलित रखने से न केवल स्वास्थ्य बेहतर रहता है बल्कि मानसिक शांति और ऊर्जा भी बढ़ती है।

  • पेड़ पर खिलने वाला यह लाल फूल सेहत का खजाना: डायबिटीज से इम्यूनिटी तक देता है कई फायदे

    पेड़ पर खिलने वाला यह लाल फूल सेहत का खजाना: डायबिटीज से इम्यूनिटी तक देता है कई फायदे


    नई दिल्ली । अनार फल तो लगभग हर कोई खाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके लाल फूल भी सेहत के लिए बेहद लाभकारी माने जाते हैं। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में अनार के फूलों का उपयोग सदियों से कई बीमारियों के उपचार में किया जाता रहा है।

    पोषक तत्वों से भरपूर
    अनार का फूल देखने में जितना सुंदर होता है, इसके अंदर मौजूद तत्व उतने ही प्रभावशाली होते हैं। इसमें टैनिन, गैलिक एसिड और ट्राइटरपेनॉइड्स जैसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं, जो शरीर की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने और संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं।

    डायबिटीज नियंत्रण में सहायक
    अनार के फूल मधुमेह यानी डायबिटीज के मरीजों के लिए लाभकारी माने जाते हैं। कई शोधों के अनुसार इसमें ऐसे गुण होते हैं जो ब्लड शुगर लेवल को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं और शरीर में इंसुलिन की संवेदनशीलता को बेहतर बनाते हैं। आयुर्वेद में अक्सर इसके सूखे फूलों से बने चूर्ण के सेवन की सलाह दी जाती है।

    घाव और सूजन में फायदेमंद

    अगर शरीर में चोट या सूजन हो तो अनार का फूल प्राकृतिक मरहम की तरह काम कर सकता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण त्वचा की कोशिकाओं को जल्दी ठीक करने और सूजन कम करने में मदद करते हैं। पुराने समय में इसके सूखे फूलों का लेप घावों पर लगाया जाता था ताकि संक्रमण न फैले।

    इम्युनिटी बढ़ाने में मददगार

    अनार के फूलों में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर को हानिकारक फ्री रेडिकल्स से बचाते हैं। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और कई गंभीर बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।

    उपयोग से पहले रखें सावधानी

    हालांकि अनार का फूल प्राकृतिक औषधि माना जाता है, लेकिन इसका सेवन करने से पहले किसी विशेषज्ञ या आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी है। हर व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति अलग होती है, इसलिए सही मात्रा और सही तरीका जानना जरूरी होता है।

  • व्रत में मीठा भी और हेल्दी भी, खजूर से बने साबूदाना फ्रूट कस्टर्ड की आसान रेसिपी

    व्रत में मीठा भी और हेल्दी भी, खजूर से बने साबूदाना फ्रूट कस्टर्ड की आसान रेसिपी


    नई दिल्ली:नवरात्रि के व्रत शुरू होते ही ज्यादातर घरों में खाने का मेन्यू लगभग एक जैसा हो जाता है। साबूदाना खिचड़ी, साबूदाना वड़ा या फिर साधारण फलाहार बार-बार बनने लगता है। कुछ ही दिनों में लोगों को कुछ अलग और हल्का खाने का मन होने लगता है। ऐसे समय में अगर व्रत के दौरान कुछ मीठा, ठंडा और हेल्दी मिल जाए तो स्वाद के साथ ऊर्जा भी मिलती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर ऐसी ही एक खास रेसिपी तेजी से ट्रेंड कर रही है, जिसे बिना चीनी का साबूदाना फ्रूट कस्टर्ड कहा जा रहा है।

    इस रेसिपी को फूड कंटेंट क्रिएटर वृत्ता साहनी ने शेयर किया है और खास बात यह है कि इसमें चीनी का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जाता। मिठास के लिए खजूर का उपयोग किया जाता है, जो प्राकृतिक स्वीटनर की तरह काम करता है। इसके साथ मखाने, बादाम, काजू और ताजे फलों का मिश्रण इसे स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाता है। यही वजह है कि यह डिश व्रत रखने वालों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

    नवरात्रि के दौरान लोग सात्विक और हल्का भोजन करना पसंद करते हैं, लेकिन विकल्प सीमित होने की वजह से अक्सर एक ही तरह का खाना बनता है। साबूदाना फ्रूट कस्टर्ड इसी पारंपरिक फलाहार का एक नया और हेल्दी रूप है। इसमें साबूदाना, दूध, ड्राई फ्रूट्स और ताजे फलों का संतुलित मिश्रण होता है, जिससे शरीर को ऊर्जा भी मिलती है और स्वाद भी बरकरार रहता है।

    इस रेसिपी की एक और खासियत यह है कि इसमें बाजार में मिलने वाले कस्टर्ड पाउडर की जरूरत नहीं पड़ती। कस्टर्ड का बेस पूरी तरह से मखाने और मेवों से तैयार किया जाता है। इसके लिए लगभग एक कप भुने हुए मखाने, आधा कप बादाम, दस काजू, थोड़ा केसर और इलायची पाउडर लिया जाता है। मिठास के लिए लगभग बारह से पंद्रह खजूर का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी चीजें स्वाद बढ़ाने के साथ शरीर को जरूरी पोषण भी देती हैं, जो व्रत के दिनों में काफी फायदेमंद होता है।

    कस्टर्ड बनाने के लिए सबसे पहले बादाम, काजू, मखाने, खजूर, केसर और इलायची को एक बाउल में डालकर उसमें एक कप गर्म दूध मिला दिया जाता है। इस मिश्रण को लगभग तीस मिनट तक भिगोकर रखा जाता है ताकि खजूर मुलायम हो जाएं और मेवे अच्छी तरह फूल जाएं। इसके बाद इन सभी चीजों को मिक्सर में पीसकर गाढ़ा और क्रीमी पेस्ट तैयार किया जाता है। यही पेस्ट पूरे कस्टर्ड का बेस बनता है और इसमें खजूर की हल्की मिठास और केसर की खुशबू स्वाद को खास बना देती है।

    इसके बाद एक बर्तन में करीब दो कप दूध हल्का गर्म किया जाता है और उसमें तैयार किया हुआ मेवों का पेस्ट डालकर धीमी आंच पर चलाया जाता है। अब इसमें पहले से उबला या स्टीम किया हुआ साबूदाना मिलाया जाता है। पकने के बाद साबूदाना पारदर्शी मोतियों जैसा दिखने लगता है, जो कस्टर्ड में अच्छा टेक्सचर देता है। कुछ देर तक मिश्रण को चलाने के बाद यह कस्टर्ड जैसा गाढ़ा हो जाता है।

    जब यह थोड़ा ठंडा हो जाए तो इसमें कटे हुए ताजे फल जैसे आम, केला, अनार और अंगूर मिलाए जाते हैं। फल न केवल स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि शरीर को विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट भी देते हैं।

    तैयार साबूदाना फ्रूट कस्टर्ड को एक से दो घंटे के लिए फ्रिज में रख दिया जाए तो इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। परोसते समय ऊपर से कटे हुए पिस्ता या गुलाब की पंखुड़ियां डालकर इसे और आकर्षक बनाया जा सकता है। यह डिश न केवल स्वादिष्ट है बल्कि मखाने, दूध और ड्राई फ्रूट्स की वजह से लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराती है। इसी कारण इसे नवरात्रि व्रत के दौरान एक हेल्दी और एनर्जी देने वाला विकल्प माना जा रहा है।

  • चेहरे पर नेचुरल ग्लो चाहते हैं? रोज़ डाइट में शामिल करें ये 5 फल, 15 दिनों में दिखेगा फर्क

    चेहरे पर नेचुरल ग्लो चाहते हैं? रोज़ डाइट में शामिल करें ये 5 फल, 15 दिनों में दिखेगा फर्क


    नई दिल्ली । स्वस्थ और चमकदार त्वचा के लिए सिर्फ महंगे स्किनकेयर प्रोडक्ट्स पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार कुछ फलों में मौजूद विटामिन एंटीऑक्सीडेंट और पोषक तत्व त्वचा को अंदर से पोषण देते हैं और प्राकृतिक निखार लाते हैं। प्रदूषण तनाव और गलत खानपान अक्सर चेहरे पर दाग धब्बे और झुर्रियों का कारण बनते हैं। ऐसे में फलों का नियमित सेवन आपकी त्वचा को स्वस्थ जवान और ग्लोइंग बनाए रख सकता है।

    पपीता

    पपीता में पपेन नामक एंजाइम होता है जो मृत त्वचा कोशिकाओं को हटाने में मदद करता है। यह त्वचा की रंगत को साफ करता है और हाइड्रेशन बनाए रखता है। विटामिन ए से भरपूर पपीता पाचन सुधारने के साथ साथ त्वचा को अंदर से पोषण भी देता है।

    संतरा

    संतरा विटामिन सी और सिट्रिक एसिड का बेहतरीन स्रोत है। यह कोलेजन उत्पादन को बढ़ाता है जिससे त्वचा का ढीलापन कम होता है और चेहरे पर प्राकृतिक निखार आता है। इसके नियमित सेवन से डार्क स्पॉट्स हल्के पड़ते हैं और त्वचा स्वस्थ दिखती है।

    अनार

    अनार को जवानी का फल कहा जाता है। यह शरीर में खून बढ़ाता है और चेहरे पर गुलाबी निखार लाता है। इसमें मौजूद पॉलीफेनोल्स सूरज की हानिकारक यूवी किरणों से त्वचा की सुरक्षा करते हैं और समय से पहले झुर्रियों को रोकते हैं।

    तरबूज
    तरबूज में लगभग 92% पानी होता है जो त्वचा की कोशिकाओं को अंदर से हाइड्रेटेड प्लंप और फ्रेश रखता है। इसमें मौजूद लाइकोपीन त्वचा को सूरज की जलन और लालिमा से बचाता है। गर्मियों में तरबूज का सेवन स्किन ग्लो के लिए बेहद फायदेमंद है।

    कीवी

    कीवी में विटामिन सी और ई की उच्च मात्रा होती है। यह त्वचा की मरम्मत में मदद करता है दाग धब्बों को कम करता है और आंखों के नीचे काले घेरे घटाता है। नियमित सेवन से त्वचा में कसावट और निखार आता है।

    कैसे और कब खाएं
    फलों का पूरा फायदा उठाने के लिए उन्हें सुबह खाली पेट या दोपहर के नाश्ते में खाना सबसे अच्छा है। जूस के बजाय साबुत फल खाएं ताकि फाइबर भी मिल सके। यदि आप लगातार 15 दिनों तक इन 5 फलों को अपनी डाइट में शामिल करते हैं तो चेहरे पर साफ और प्राकृतिक ग्लो महसूस किया जा सकता है।

  • भारत में सबसे ज्यादा बारिश कहां होती है, मेघालय का मावसिनराम क्यों है दुनिया का सबसे बरसाती इलाका

    भारत में सबसे ज्यादा बारिश कहां होती है, मेघालय का मावसिनराम क्यों है दुनिया का सबसे बरसाती इलाका


    नई दिल्ली:भारत एक ऐसा देश है जहां मौसम और भौगोलिक विविधता की वजह से हर क्षेत्र का जलवायु अलग दिखाई देता है। कहीं रेगिस्तान की तपती गर्मी है तो कहीं पहाड़ों की ठंडी हवाएं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे ज्यादा बारिश किस जगह होती है। इसका जवाब है मेघालय राज्य का एक छोटा सा गांव मावसिनराम। यह स्थान न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में सबसे अधिक वर्षा वाले इलाके के रूप में जाना जाता है।

    Mawsynram मेघालय के East Khasi Hills जिले में स्थित है। यहां सालाना औसतन लगभग 11872 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जाती है। इतनी अधिक वर्षा के कारण इस जगह का नाम Guinness World Records में भी दर्ज किया गया है। तुलना के लिए अगर भारत के बड़े शहरों को देखें तो वहां सालभर में औसतन केवल 700 से 1000 मिलीमीटर बारिश होती है। यानी मावसिनराम में होने वाली बारिश कई शहरों की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज्यादा है।

    इस इलाके में इतनी ज्यादा बारिश होने के पीछे सबसे बड़ी वजह इसकी भौगोलिक स्थिति है। मावसिनराम खासी पहाड़ियों की दक्षिणी ढलानों पर स्थित है और सीधे बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाओं के रास्ते में पड़ता है। जब दक्षिण पश्चिम मानसून की नमी से भरी हवाएं इन पहाड़ियों से टकराती हैं तो वे ऊपर की ओर उठती हैं और भारी बारिश होती है। इस प्रक्रिया को विज्ञान की भाषा में Orographic Rainfall कहा जाता है।

    मावसिनराम में खासकर जून से सितंबर के बीच मानसून के दौरान लगातार बारिश होती रहती है। कई बार तो यहां एक ही दिन में 1000 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश भी दर्ज की गई है। यही वजह है कि यह इलाका दुनिया के सबसे ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में गिना जाता है।

    बारिश को मापने के लिए आमतौर पर मिलीमीटर यानी मिमी का पैमाना इस्तेमाल किया जाता है। एक मिलीमीटर बारिश का मतलब होता है कि यदि पानी जमीन से बहकर कहीं और न जाए और न ही वाष्पित हो, तो जमीन पर एक मिलीमीटर मोटी पानी की परत बन जाएगी। इस हिसाब से अगर मावसिनराम में सालभर में 11872 मिमी बारिश होती है तो इसका मतलब है कि वहां लगभग 11.8 मीटर तक पानी जमा हो सकता है।

    बारिश को मापने के लिए रेन गेज नामक उपकरण का उपयोग किया जाता है। भारत में मौसम संबंधी आंकड़े एकत्र करने का काम India Meteorological Department यानी आईएमडी करता है। यही संस्था देशभर में बारिश और मौसम के आंकड़ों को रिकॉर्ड करती है।

    मावसिनराम की अत्यधिक वर्षा इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से बेहद खूबसूरत बनाती है। यहां चारों तरफ हरियाली, झरने और बादलों से ढकी पहाड़ियां देखने को मिलती हैं। हालांकि इतनी ज्यादा बारिश के कारण यहां भूस्खलन और मिट्टी कटाव जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं।

    इस तरह कहा जा सकता है कि मेघालय का मावसिनराम भारत का सबसे ज्यादा वर्षा वाला स्थान है और अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और मानसूनी प्रभाव के कारण यह दुनिया भर में खास पहचान रखता है।

  • हार्ट अटैक का खतरा कम! रोज सुबह खाली पेट खाएं शहद और लहसुन

    हार्ट अटैक का खतरा कम! रोज सुबह खाली पेट खाएं शहद और लहसुन


    नई दिल्ली । दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखना आज के जीवन में बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार शहद और लहसुन में मौजूद पोषक तत्व हृदय और इम्यूनिटी दोनों के लिए लाभकारी हैं। आयुर्वेद और प्राचीन चिकित्सा पद्धति में इसे प्राकृतिक स्वास्थ्य संजीवनी माना जाता है।

    लहसुन के फायदे

    लहसुन सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं है बल्कि यह नसों में जमा बैड कोलेस्ट्रॉल को घटाने में मदद करता है। इसमें एलिसिन नामक तत्व प्राकृतिक एंटीबायोटिक और एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है। यह रक्त संचार को सुचारू रखता है और खून को गाढ़ा होने से रोकता है जिससे स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा कम होता है। लहसुन में मौजूद सल्फर और अन्य रसायन इसे जीवाणुरोधी बनाते हैं।

    शहद के फायदे
    शहद में फ्लेवोनोइड्स और पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। यह इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ साथ त्वचा के संक्रमण खुजली और लालिमा को कम करता है। इसके एंटीवायरल और एंटीफंगल गुण श्वसन रोगों में लाभकारी हैं।

    शहद लहसुन का मिश्रण

    जब लहसुन की कलियों को शहद में भिगोया जाता है तो इनके औषधीय गुण दोगुने हो जाते हैं। यह मिश्रण  रक्त वाहिकाओं को लचीला बनाता और ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है। पुरानी खांसी सर्दी जुकाम और अस्थमा में मदद करता है। शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकालता और कब्ज जैसी समस्याएं दूर करता है। एंटी इंफ्लेमेटरी गुण जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करते हैं।

    कैसे तैयार करें

    एक साफ कांच की बरनी लें। उसमें ताजा लहसुन की कलियों को छीलकर डालें। बरनी को शुद्ध शहद से भरें और ढक्कन बंद कर दें। इसे 5 7 दिन के लिए छोड़ दें ताकि लहसुन और शहद फर्मेंट हो जाएं।

    सेवन का तरीका

    रोज सुबह खाली पेट इस मिश्रण से एक लहसुन की कली और थोड़ा शहद चबाकर खाएं। यह आपके हृदय और इम्यून सिस्टम के लिए बेहद फायदेमंद है।

  • कम उम्र में बढ़ रहा किडनी रोग का खतरा खराब लाइफस्टाइल और अनकंट्रोल शुगर जिम्मेदार

    कम उम्र में बढ़ रहा किडनी रोग का खतरा खराब लाइफस्टाइल और अनकंट्रोल शुगर जिम्मेदार


    नई दिल्ली:आज के समय में खराब लाइफस्टाइल और असंतुलित खानपान के कारण कई गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें किडनी की बीमारियां सबसे चिंताजनक मानी जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार किडनी से जुड़ी कई बीमारियां शरीर में बिना किसी स्पष्ट संकेत के धीरे धीरे विकसित होती रहती हैं। यही वजह है कि इन्हें साइलेंट किलर भी कहा जाता है। जब तक इसके लक्षण सामने आते हैं तब तक कई बार बीमारी काफी गंभीर स्थिति में पहुंच चुकी होती है।

    देश में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और ये दोनों ही समस्याएं किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कारण मानी जाती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक शुगर या ब्लड प्रेशर की समस्या रहती है तो उसे नियमित रूप से किडनी की जांच करानी चाहिए। समय पर जांच से बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है और गंभीर स्थिति से बचाव संभव हो सकता है।

    नोएडा एक्सटेंशन स्थित यथार्थ हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर उपेंद्र सिंह के अनुसार पिछले दो से तीन वर्षों में किडनी से जुड़ी समस्याओं के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब 30 से 45 वर्ष की आयु के लोगों में भी किडनी की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसके पीछे सेडेंटरी लाइफस्टाइल अत्यधिक तनाव शरीर में पानी की कमी और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

    डॉक्टरों के मुताबिक क्रॉनिक किडनी डिजीज और किडनी स्टोन के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। क्रॉनिक किडनी डिजीज एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे धीरे शरीर को प्रभावित करती है। कई मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं जब यह बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है और किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो जाती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर आज भी किडनी रोग के सबसे बड़े जोखिम कारक हैं। अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीजों में इन दोनों में से एक या दोनों समस्याएं मौजूद होती हैं। इसके अलावा दर्द निवारक दवाओं का अधिक उपयोग बिना डॉक्टर की सलाह के जिम सप्लीमेंट या स्टेरॉयड लेना शरीर में पानी की कमी और खराब जीवनशैली भी किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कारण बन रहे हैं।

    कई मामलों में बीमारी की देर से पहचान होने के कारण मरीजों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ जाती है जिससे परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ जाता है। हालांकि समय रहते सावधानी बरती जाए तो किडनी की बीमारियों से काफी हद तक बचाव संभव है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पैरों या चेहरे पर सूजन दिखाई दे पेशाब में झाग आए पेशाब की मात्रा या रंग में बदलाव महसूस हो या लगातार थकान और भूख में कमी महसूस हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा उल्टी आना जी मिचलाना या अचानक ब्लड प्रेशर का बढ़ जाना भी किडनी से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट क्रिएटिनिन टेस्ट और यूरिन टेस्ट करवाते रहना चाहिए। इसके साथ ही रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना नमक का सेवन सीमित करना धूम्रपान से दूर रहना और वजन को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से किडनी को स्वस्थ रखा जा सकता है और किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।