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  • दांत में फिलिंग कराने के बाद भी क्यों लौट आती है कैविटी, जानिए दोबारा सड़न होने के प्रमुख कारण और बचाव के तरीके

    दांत में फिलिंग कराने के बाद भी क्यों लौट आती है कैविटी, जानिए दोबारा सड़न होने के प्रमुख कारण और बचाव के तरीके

    नई दिल्ली । दांत में कैविटी होने पर खराब हिस्से को साफ करके फिलिंग करना सामान्य उपचार है। इससे दांत की क्षतिग्रस्त संरचना को बचाने में मदद मिलती है, लेकिन फिलिंग हो जाने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में उसी दांत में दोबारा सड़न नहीं हो सकती। कुछ लोगों में समय बीतने के बाद फिलिंग के आसपास फिर से कैविटी विकसित हो जाती है।

    फिलिंग के बाद दोबारा होने वाली सड़न को सेकेंडरी कैरीज या रिकरेंट कैरीज कहा जाता है। इसके पीछे एक से ज्यादा कारण हो सकते हैं। व्यक्ति का कैविटी का जोखिम, मुंह में बनने वाला प्लाक, दांतों की सफाई, मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन और फिलिंग की स्थिति इसमें भूमिका निभा सकती है।

    यदि मुंह में प्लाक ज्यादा बनता है या ओरल हाइजीन ठीक नहीं रहती, तो फिलिंग के बाद भी दांतों में सड़न का खतरा बना रह सकता है। इसी तरह बार-बार मीठे खाद्य पदार्थ या पेय लेने और पहले से कई दांतों में कैविटी होने की स्थिति में भी जोखिम कम नहीं होता। इसलिए फिलिंग को कैविटी के खिलाफ स्थायी सुरक्षा नहीं माना जा सकता।

    फिलिंग और प्राकृतिक दांत के मिलने वाले हिस्से को रिस्टोरेशन मार्जिन कहा जाता है। यह जगह प्लाक जमा होने के लिए संवेदनशील हो सकती है, खासकर जब वहां सही तरीके से सफाई नहीं हो पाती। मुंह में मौजूद बैक्टीरिया भोजन से मिलने वाली शुगर का इस्तेमाल करके एसिड बनाते हैं। बार-बार होने वाली इस प्रक्रिया से दांतों के मिनरल्स को नुकसान पहुंच सकता है और फिलिंग के किनारे मौजूद इनेमल या डेंटिन में नई कैविटी विकसित हो सकती है।

    पुरानी फिलिंग की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। समय के साथ डेंटल फिलिंग में टूट-फूट या दूसरे प्रकार के डिफेक्ट हो सकते हैं। जिन दांतों पर चबाने का दबाव अधिक पड़ता है, वहां फिलिंग के टूटने का जोखिम हो सकता है। अगर फिलिंग का कोई हिस्सा टूट गया हो, किनारा खुला महसूस हो, उस जगह भोजन बार-बार फंसता हो या चबाते समय दर्द होता हो, तो दांत की जांच कराना जरूरी है।

    हर खराब फिलिंग को तुरंत पूरी तरह बदलना जरूरी नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में केवल खराब हिस्से की रिपेयर भी की जा सकती है। इसका निर्णय दांत की स्थिति की जांच के बाद किया जाता है।

    मीठे और चिपचिपे खाद्य पदार्थों का सेवन भी कैविटी के जोखिम से जुड़ा है। केवल कुल कितनी चीनी खाई गई, यह ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि दिन में कितनी बार दांत शुगर के संपर्क में आते हैं, यह भी मायने रखता है। चॉकलेट, टॉफी, कैंडी, बिस्किट, मीठे स्नैक्स और शुगरी ड्रिंक्स का बार-बार सेवन दांतों पर एसिड अटैक की घटनाएं बढ़ा सकता है। चिपचिपे खाद्य पदार्थ दांतों पर अधिक समय तक रह सकते हैं।

    ब्रशिंग की गलत आदतें भी समस्या बढ़ा सकती हैं। बहुत जल्दी ब्रश करना, दांतों की अंदरूनी सतहों और पीछे के दांतों की सफाई छोड़ देना, बहुत अधिक जोर लगाना या फ्लोराइड टूथपेस्ट का सही इस्तेमाल न करना सफाई को प्रभावित कर सकता है।

    इसलिए फिलिंग को कैविटी से स्थायी सुरक्षा कवच नहीं समझना चाहिए। सही तरीके से ब्रशिंग, दांतों की सफाई, शुगर के सेवन को नियंत्रित करना और नियमित डेंटल चेकअप दोबारा कैविटी के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं।

  • थायरॉइड की बीमारी आंखों पर भी कर सकती है अटैक नजर जाने तक की आ सकती है नौबत इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

    थायरॉइड की बीमारी आंखों पर भी कर सकती है अटैक नजर जाने तक की आ सकती है नौबत इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज


    नई दिल्ली । थायरॉइड की बीमारी को अक्सर लोग वजन बढ़ने या घटने थकान कमजोरी और हार्मोन के असंतुलन से जोड़कर देखते हैं लेकिन इसका असर केवल शरीर के वजन या ऊर्जा के स्तर तक सीमित नहीं रहता। कुछ मरीजों में थायरॉइड की बीमारी आंखों को भी प्रभावित कर सकती है। इसे थायरॉइड आई डिजीज कहा जाता है। इस स्थिति में आंखों में सूजन लालिमा जलन आंखों का बाहर की ओर उभरना और दोहरा दिखाई देना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर स्थिति में मरीज की आंखों की रोशनी भी प्रभावित होने का खतरा रहता है। इसी को देखते हुए दुनियाभर के विशेषज्ञों ने बीमारी की पहचान और इलाज को लेकर नई ग्लोबल गाइडलाइंस जारी की हैं।

    नई गाइडलाइंस वर्ल्ड सोसाइटी ऑफ ऑप्थेलमिक प्लास्टिक रिकंस्ट्रक्टिव एंड एस्थेटिक सर्जरी और इंटरनेशनल थायराइड आई डिजीज सोसाइटी की ओर से तैयार की गई हैं। इन्हें मेडिकल जर्नल ऑप्थेलमिक प्लास्टिक एंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी में प्रकाशित किया गया है। नई व्यवस्था का उद्देश्य अलग अलग देशों में मरीजों की बीमारी की गंभीरता के हिसाब से जांच और उपचार की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार थायरॉइड आई डिजीज में शरीर का इम्यून सिस्टम आंखों के आसपास मौजूद मांसपेशियों और टिश्यू को प्रभावित करने लगता है। इसके कारण आंखों के आसपास सूजन और लालपन हो सकता है। आंखों में जलन महसूस हो सकती है और कुछ मरीजों में आंखें बाहर की तरफ उभरने लगती हैं। आंखों की मांसपेशियों पर असर पड़ने से दोहरा दिखाई देने की समस्या भी हो सकती है। ऐसे लक्षणों को केवल सामान्य थायरॉइड समस्या समझकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।

    सबसे गंभीर स्थिति तब बन सकती है जब बीमारी के कारण आंख के पीछे मौजूद ऑप्टिक नर्व पर दबाव पड़ने लगे। इससे नजर कमजोर होने का खतरा बढ़ सकता है और गंभीर मामलों में रोशनी जाने तक की स्थिति बन सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक थायरॉइड आई डिजीज के मामले बढ़ रहे हैं। महिलाओं में इस बीमारी के मामले अधिक देखे जा सकते हैं जबकि पुरुषों में गंभीर आंखों की समस्या और दृष्टि प्रभावित होने का खतरा ज्यादा हो सकता है। हाइपरथायरायडिज्म यानी थायरॉइड हार्मोन बढ़ने की स्थिति वाले मरीजों में भी इसका खतरा अधिक माना जाता है।

    नई ग्लोबल गाइडलाइंस में थायरॉइड आई डिजीज को तीन स्तरों में बांटने की सिफारिश की गई है। इनमें बेसिक इंटरमीडिएट और एडवांस स्तर शामिल हैं। इसका उद्देश्य बीमारी की गंभीरता के अनुसार मरीज का उपचार तय करना है। अगर किसी मरीज की स्थिति ज्यादा गंभीर है तो उसे बेहतर सुविधाओं वाले बड़े अस्पताल या विशेषज्ञ केंद्र में रेफर करने की व्यवस्था भी की जा सकती है।

    नई गाइडलाइंस में मरीज की आंखों की जांच के साथ थायरॉइड हार्मोन आंखों की रोशनी और डबल विजन जैसी समस्याओं का मूल्यांकन करने पर जोर दिया गया है। जरूरत पड़ने पर CT स्कैन MRI और अन्य एडवांस जांच भी कराई जा सकती हैं। इसलिए अगर थायरॉइड की समस्या के साथ आंखों में सूजन आंखों का उभरना लालिमा धुंधला दिखाई देना या दोहरा दिखना जैसे लक्षण सामने आएं तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। समय पर बीमारी की पहचान होने से गंभीर जटिलताओं को रोकने और आंखों की रोशनी को सुरक्षित रखने की संभावना बेहतर हो सकती है।

  • स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए आज से बदलें ये आदतें खांसी बुखार और सांस से जुड़े लक्षण दिखें तो रहें सतर्क जानें कब डॉक्टर से लेना चाहिए परामर्श

    स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए आज से बदलें ये आदतें खांसी बुखार और सांस से जुड़े लक्षण दिखें तो रहें सतर्क जानें कब डॉक्टर से लेना चाहिए परामर्श


    नई दिल्ली। बदलते मौसम के साथ सर्दी खांसी बुखार और गले में खराश जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। कई बार लोग इन लक्षणों को सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन कुछ मामलों में यही लक्षण इन्फ्लूएंजा संक्रमण का संकेत भी हो सकते हैं। स्वाइन फ्लू को एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक प्रकार का इन्फ्लूएंजा संक्रमण है जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान निकलने वाली सांस की बूंदों के संपर्क में आने से फैल सकता है। इसलिए संक्रमण से बचाव के लिए रोजमर्रा की छोटी छोटी सावधानियां काफी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

    स्वाइन फ्लू से बचने के लिए सबसे पहले हाथों की स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए। बाहर से घर लौटने के बाद साबुन और पानी से हाथों को अच्छी तरह साफ करना जरूरी है। यदि किसी जगह पर साबुन और पानी उपलब्ध नहीं है तो अल्कोहल आधारित हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल किया जा सकता है। बिना हाथ साफ किए आंख नाक और मुंह को छूने से बचना चाहिए। संक्रमित सतह को छूने के बाद हाथ चेहरे तक पहुंचने पर संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

    खांसते और छींकते समय मुंह तथा नाक को टिश्यू या कोहनी से ढकने की आदत डालनी चाहिए। इस्तेमाल किए गए टिश्यू को तुरंत उचित स्थान पर फेंकना चाहिए। यदि घर परिवार या कार्यालय में किसी व्यक्ति को बुखार खांसी या फ्लू जैसे लक्षण हैं तो उसके बेहद करीब जाने से बचना बेहतर है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल भी संक्रमण से बचाव में मदद कर सकता है।

    स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए पर्याप्त नींद लेना और संतुलित भोजन करना भी जरूरी है। रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और भोजन में फल सब्जियां तथा अन्य पौष्टिक चीजों को शामिल करना चाहिए। हालांकि किसी खास खाद्य पदार्थ या घरेलू नुस्खे को स्वाइन फ्लू से बचाव का निश्चित उपाय नहीं माना जा सकता। संक्रमण से बचने के लिए साफ सफाई और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों को प्राथमिकता देना ज्यादा जरूरी है।

    कुछ लोगों में फ्लू का संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। छोटे बच्चे बुजुर्ग गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को तेज बुखार लगातार खांसी गले में दर्द शरीर में दर्द अत्यधिक कमजोरी या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें तो चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। सांस लेने में गंभीर परेशानी या हालत तेजी से बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।

    लक्षण दिखाई देने पर दूसरों से उचित दूरी बनाए रखना भी जरूरी है ताकि संक्रमण आगे न फैले। बीमारी के दौरान पर्याप्त आराम करना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लेना चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक या दूसरी दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन्फ्लूएंजा वायरल संक्रमण है और हर स्थिति में एंटीबायोटिक उपयोगी नहीं होती।

    कुल मिलाकर स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए हाथों की नियमित सफाई खांसते समय सावधानी भीड़भाड़ वाली जगहों पर सतर्कता और बीमार व्यक्ति से उचित दूरी जैसी आदतें अपनाना जरूरी है। साथ ही लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बीमारी को गंभीर होने से रोकने में मदद कर सकता है। जागरूकता और सावधानी के जरिए संक्रमण के जोखिम को कम करने की कोशिश की जा सकती है।

  • ग्लोइंग स्किन के लिए महंगे प्रोडक्ट्स की जरूरत नहीं, हल्दी के ये घरेलू उपाय आएंगे काम

    ग्लोइंग स्किन के लिए महंगे प्रोडक्ट्स की जरूरत नहीं, हल्दी के ये घरेलू उपाय आएंगे काम


    नई दिल्ली। आज के समय में हर कोई साफ और चमकदार त्वचा चाहता है लेकिन धूल मिट्टी प्रदूषण तेज धूप और बदलते मौसम के कारण त्वचा की प्राकृतिक चमक कम होने लगती है। ऐसे में लोग कई तरह के स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों को भी त्वचा की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। हल्दी इन्हीं चीजों में शामिल है। भारतीय घरों में हल्दी का इस्तेमाल लंबे समय से घरेलू देखभाल और पारंपरिक सौंदर्य उपायों में किया जाता है। इसमें करक्यूमिन नामक यौगिक पाया जाता है जिसे एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों से जोड़ा जाता है।

    स्किन केयर में हल्दी का इस्तेमाल कई तरह से किया जा सकता है। अगर त्वचा रूखी और बेजान नजर आ रही है तो हल्दी में दही या शहद मिलाकर फेस पैक तैयार किया जा सकता है। दही त्वचा को मुलायम बनाए रखने में मदद कर सकता है जबकि शहद त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए जाना जाता है। इस मिश्रण को चेहरे पर हल्की परत के रूप में लगाकर कुछ मिनट के लिए छोड़ सकते हैं और फिर सामान्य पानी से धो सकते हैं। इसके बाद त्वचा के प्रकार के अनुसार मॉइस्चराइजर लगाना बेहतर रहता है।

    ऑयली स्किन वाले लोग हल्दी के साथ बेसन का इस्तेमाल कर सकते हैं। बेसन को पारंपरिक रूप से त्वचा की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी और बेसन में थोड़ा पानी या गुलाब जल मिलाकर पेस्ट बनाया जा सकता है। इसे चेहरे पर लगाते समय त्वचा को जोर से रगड़ने से बचना चाहिए। सूखने के बाद इसे धीरे से साफ करना चाहिए। इससे त्वचा साफ और फ्रेश महसूस हो सकती है।

    हल्दी का इस्तेमाल करते समय मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी है। बहुत ज्यादा हल्दी लगाने से त्वचा पर पीला रंग दिखाई दे सकता है और कुछ लोगों की संवेदनशील त्वचा पर जलन या लालिमा भी हो सकती है। इसलिए पहली बार इस्तेमाल करने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर माना जाता है। अगर खुजली जलन या लालिमा दिखाई दे तो इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हल्दी कोई जादुई स्किन केयर उपचार नहीं है। दाग धब्बे मुंहासे या त्वचा से जुड़ी किसी गंभीर समस्या में केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना ज्यादा उचित है। साथ ही दिन में सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना त्वचा की देखभाल का अहम हिस्सा है।

    हल्दी को स्किन केयर रूटीन में शामिल करते समय अपनी त्वचा के प्रकार और उसकी संवेदनशीलता को ध्यान में रखना चाहिए। सही तरीके और सीमित मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह घरेलू स्किन केयर रूटीन का हिस्सा बन सकती है। चमकदार त्वचा के लिए पर्याप्त पानी पीना संतुलित खानपान पूरी नींद और नियमित त्वचा की सफाई भी उतनी ही जरूरी है।

  • पंजाब की गलियों में मिलेगा धर्म इतिहास और देसी रंग का अनोखा संगम: अमृतसर से पटियाला और चंडीगढ़ तक ऐसे बनाएं यादगार ट्रैवल प्लान

    पंजाब की गलियों में मिलेगा धर्म इतिहास और देसी रंग का अनोखा संगम: अमृतसर से पटियाला और चंडीगढ़ तक ऐसे बनाएं यादगार ट्रैवल प्लान


    नई दिल्ली । पंजाब का नाम सामने आते ही आंखों के सामने दूर तक फैले खेत सरसों की खुशबू ढोल की थाप पंजाबी रंग और स्वादिष्ट खाने की तस्वीर उभरने लगती है। लेकिन पंजाब की खूबसूरती सिर्फ उसके खेतों और खानपान तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश धार्मिक आस्था इतिहास संस्कृति वास्तुकला और देशभक्ति से जुड़ी ऐसी कई जगहों को अपने भीतर समेटे हुए है जहां पहुंचकर यात्रा केवल घूमने तक सीमित नहीं रहती बल्कि एक यादगार अनुभव में बदल जाती है। अगर आप परिवार दोस्तों या अकेले पंजाब घूमने का प्लान बना रहे हैं तो अमृतसर से अपनी यात्रा शुरू करना सबसे शानदार विकल्प हो सकता है।

    अमृतसर पंजाब की यात्रा का सबसे खास पड़ाव माना जा सकता है। यहां स्थित श्री हरमंदिर साहिब यानी स्वर्ण मंदिर अपनी आध्यात्मिक शांति और अद्भुत वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। मंदिर के आसपास का पवित्र सरोवर और सुबह शाम होने वाली धार्मिक गतिविधियां यात्रियों को अलग ही अनुभव देती हैं। यहां लंगर की परंपरा भी लोगों को सेवा और समानता का संदेश देती है। अमृतसर पहुंचने के बाद जलियांवाला बाग जाना भी जरूरी माना जाता है क्योंकि यह स्थान देश के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके बाद अटारी वाघा बॉर्डर की ओर रुख किया जा सकता है जहां सीमा पर होने वाली बीटिंग द रिट्रीट सेरेमनी देशभक्ति के माहौल से भर देती है।

    पंजाब की यात्रा केवल धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक सीमित नहीं है। यहां का खानपान भी यात्रा का बड़ा हिस्सा है। अमृतसर की गलियों में अमृतसरी कुलचा छोले लस्सी और पंजाबी व्यंजनों की खुशबू यात्रियों को अपनी ओर खींचती है। स्थानीय बाजारों में फुलकारी के कपड़े पंजाबी जूतियां पारंपरिक सामान और कई तरह के हस्तशिल्प भी खरीदे जा सकते हैं। इस तरह अमृतसर में घूमना केवल स्मारकों को देखने का अनुभव नहीं बल्कि पंजाब की रोजमर्रा की संस्कृति को करीब से महसूस करने जैसा है।

    इसके बाद यात्रा को पटियाला की ओर बढ़ाया जा सकता है। पटियाला को पंजाब की शाही विरासत से जोड़कर देखा जाता है। यहां मोती बाग पैलेस शीश महल बारादरी गार्डन और किला बहादुरगढ़ जैसे स्थान इतिहास और वास्तुकला में दिलचस्पी रखने वाले यात्रियों को आकर्षित करते हैं। पटियाला की गलियों में पारंपरिक पंजाबी संस्कृति और बाजारों का अलग ही रंग दिखाई देता है। सरकारी पर्यटन जानकारी में भी यहां के कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को प्रमुख आकर्षण के तौर पर दर्ज किया गया है।

    अगर आपको आधुनिक शहर और खूबसूरत शहरी वास्तुकला पसंद है तो चंडीगढ़ को यात्रा में शामिल किया जा सकता है। चौड़ी सड़कों हरे भरे स्थानों और प्रसिद्ध रॉक गार्डन के कारण यह पंजाब यात्रा को एक अलग अनुभव देता है। चंडीगढ़ से आसपास के कई पर्यटन स्थलों के लिए यात्रा कार्यक्रम भी तैयार किए जा सकते हैं। पर्यटन मंत्रालय के मास्टर प्लान में चंडीगढ़ से पंजाब के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाले कई संभावित पर्यटन सर्किट भी बताए गए हैं।

    पंजाब घूमने का असली मजा तब आता है जब यात्रा में जल्दबाजी न हो। हर शहर को महसूस करने के लिए थोड़ा समय दें स्थानीय भोजन का स्वाद लें लोगों की जीवनशैली देखें और ऐतिहासिक स्थलों की कहानियों को समझें। अक्टूबर से मार्च के बीच का समय पंजाब के कई हिस्सों में घूमने के लिए अपेक्षाकृत आरामदायक माना जाता है।

    इस तरह पंजाब की यात्रा एक ऐसी यात्रा बन सकती है जिसमें एक तरफ स्वर्ण मंदिर की आध्यात्मिक शांति मिलेगी तो दूसरी तरफ जलियांवाला बाग का इतिहास देश के संघर्ष की याद दिलाएगा। वाघा बॉर्डर का जोश पटियाला की शाही विरासत चंडीगढ़ की आधुनिकता और पंजाब का शानदार खानपान इस सफर को लंबे समय तक याद रखने लायक बना सकते हैं। अगर आप ऐसी जगह घूमना चाहते हैं जहां हर पड़ाव पर कोई नई कहानी और नया अनुभव आपका इंतजार करे तो पंजाब यात्रा आपके अगले ट्रैवल प्लान में जरूर शामिल की जा सकती है।

  • बीमारी से बचना है तो आज से बदलें अपनी दिनचर्या: सही खानपान नियमित एक्सरसाइज पर्याप्त नींद और तनाव पर काबू रखने से ऐसे रखें अपनी सेहत का ख्याल

    बीमारी से बचना है तो आज से बदलें अपनी दिनचर्या: सही खानपान नियमित एक्सरसाइज पर्याप्त नींद और तनाव पर काबू रखने से ऐसे रखें अपनी सेहत का ख्याल


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग काम और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। लंबे समय तक बैठकर काम करना अनियमित खानपान नींद की कमी तनाव और शारीरिक गतिविधि का कम होना धीरे धीरे शरीर पर असर डाल सकता है। अच्छी सेहत के लिए किसी एक दिन की मेहनत काफी नहीं होती बल्कि रोजमर्रा की आदतों में छोटे और लगातार बदलाव जरूरी होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ खानपान नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद तंबाकू से दूरी और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल खुद की सेहत संभालने के अहम हिस्से हैं।

    स्वास्थ्य देखभाल की शुरुआत सबसे पहले भोजन से होती है। रोज के खाने में अलग अलग प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करना शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने में मदद करता है। साबुत अनाज दालें फल सब्जियां और जरूरत के अनुसार प्रोटीन के अच्छे स्रोत भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। दूसरी तरफ बहुत ज्यादा नमक चीनी अस्वास्थ्यकर वसा और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना बेहतर माना जाता है। WHO के अनुसार स्वस्थ आहार पर्याप्तता संतुलन संयम और विविधता जैसे सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।

    इसके साथ शारीरिक गतिविधि को रोज की दिनचर्या में जगह देना बेहद जरूरी है। इसके लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति जिम जाए। तेज चाल से चलना साइकिल चलाना तैरना योग करना खेलना या रोजमर्रा के कामों में सक्रिय रहना भी शारीरिक गतिविधि का हिस्सा हो सकता है। WHO के अनुसार वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि या उसके बराबर अधिक तीव्र गतिविधि करने की सलाह दी जाती है। जो लोग लंबे समय से सक्रिय नहीं हैं उन्हें अचानक बहुत ज्यादा व्यायाम करने के बजाय धीरे धीरे शुरुआत करनी चाहिए।

    स्वास्थ्य देखभाल में नींद को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए। देर रात तक मोबाइल चलाना लगातार काम करना और सोने का समय बदलते रहना शरीर की दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखने की कोशिश करें। सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और शांत वातावरण बनाना भी बेहतर नींद की आदत विकसित करने में मदद कर सकता है। अगर लंबे समय तक नींद से जुड़ी समस्या बनी रहती है तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    मानसिक स्वास्थ्य भी शरीर की सेहत से अलग नहीं है। लगातार तनाव चिंता चिड़चिड़ापन या थकान महसूस होने पर व्यक्ति को अपने काम के बीच आराम और सामाजिक जुड़ाव के लिए समय निकालना चाहिए। परिवार और दोस्तों से बातचीत करना पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खुद की देखभाल का मतलब यह नहीं है कि बीमारी होने पर डॉक्टर की जरूरत नहीं है। WHO भी स्पष्ट करता है कि self care स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों की जगह नहीं लेती बल्कि उनकी देखभाल को बेहतर तरीके से पूरा करती है।

    तंबाकू से दूरी बनाना भी स्वास्थ्य सुरक्षा का बेहद महत्वपूर्ण कदम है। इसी तरह शराब के सेवन से बचना या उसे सीमित करना कई स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में मदद कर सकता है। जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर डायबिटीज या अन्य पुरानी बीमारी है उन्हें नियमित जांच और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं को अपनी मर्जी से बंद नहीं करना चाहिए। WHO की सलाह के मुताबिक जीवनशैली में बदलाव कई बीमारियों के प्रबंधन में मदद कर सकते हैं लेकिन कई स्थितियों में दवा और चिकित्सकीय निगरानी भी जरूरी रहती है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि स्वस्थ रहने के लिए किसी बड़े बदलाव का इंतजार न करें। रोज थोड़ी शारीरिक गतिविधि पौष्टिक भोजन पर्याप्त आराम तनाव को संभालने की कोशिश और समय पर चिकित्सकीय सलाह जैसी छोटी आदतें लंबे समय में बड़ा अंतर ला सकती हैं। अपने शरीर के संकेतों को समझना और लगातार बनी रहने वाली परेशानी को नजरअंदाज न करना भी उतना ही जरूरी है। स्वास्थ्य की सही देखभाल बीमारी के बाद शुरू नहीं होती बल्कि बीमारी से बचाव और बेहतर जीवनशैली की आदतों से पहले ही शुरू हो जाती है।

  • फैटी लिवर सिर्फ मोटे लोगों की बीमारी नहीं, दुबले-पतले लोगों में भी बढ़ सकता है खतरा; जानें किन कारणों से लिवर में जमा होती है चर्बी

    फैटी लिवर सिर्फ मोटे लोगों की बीमारी नहीं, दुबले-पतले लोगों में भी बढ़ सकता है खतरा; जानें किन कारणों से लिवर में जमा होती है चर्बी

    नई दिल्ली । फैटी लिवर की समस्या दुनियाभर में तेजी से बढ़ती हुई देखी जा रही है। शराब का सेवन न करने वाले लोगों में होने वाली नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज का नाम बदलकर अब मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज किया गया है। यह लिवर की सबसे आम क्रोनिक बीमारियों में शामिल है और बड़ी संख्या में वयस्कों को प्रभावित करती है।

    भारत में भी फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आमतौर पर इसे अधिक वजन और मोटापे से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि जिन लोगों का वजन ज्यादा होता है, उनमें लिवर में चर्बी जमा होने का खतरा अधिक रहता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुबले-पतले या सामान्य वजन वाले लोग इससे पूरी तरह सुरक्षित हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर का वजन सामान्य होने के बावजूद लिवर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। मेडिकल क्षेत्र में ऐसे मामलों को लंबे समय से लीन फैटी लिवर के रूप में जाना जाता रहा है। फैटी लिवर वाले कुछ लोगों का शरीर दुबला हो सकता है, इसलिए केवल शरीर का आकार देखकर लिवर को स्वस्थ मान लेना सही नहीं है।

    दुबले-पतले लोगों में फैटी लिवर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस, पेट के अंदर जमा आंतरिक चर्बी, डायबिटीज, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल जैसी मेटाबोलिक समस्याएं इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।

    इसके अलावा शराब का सेवन, कुछ दवाएं और लिवर से जुड़ी अन्य बीमारियां भी लिवर में चर्बी जमा होने का कारण बन सकती हैं। इसलिए यह मानना सही नहीं है कि दुबला शरीर होने की वजह से फैटी लिवर का खतरा नहीं हो सकता।

    सामान्य बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि शरीर में चर्बी का वितरण भी स्वस्थ है। कुछ लोगों का शरीर बाहर से दुबला दिखाई दे सकता है, लेकिन पेट के आसपास या शरीर के अंदर अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। ऐसी स्थिति में मेटाबोलिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है और फैटी लिवर का खतरा बढ़ सकता है।

    डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड जैसी समस्याओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। दुबले-पतले लोगों में यदि इनमें से कोई जोखिम मौजूद है तो डॉक्टर से सलाह लेकर आवश्यक जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    फैटी लिवर की शुरुआत अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के होती है। कई लोगों को बीमारी के शुरुआती चरण में कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। यदि जांच के दौरान लिवर एंजाइम बार-बार बढ़े हुए मिल रहे हैं या डायबिटीज जैसी मेटाबोलिक समस्या मौजूद है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर लिवर के स्वास्थ्य और फैटी लिवर के जोखिम का मूल्यांकन कराया जा सकता है।

    फैटी लिवर से बचाव के लिए सिर्फ वजन कम करना ही पर्याप्त नहीं है। दुबले-पतले लोगों के लिए भी नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित खानपान और अत्यधिक चीनी तथा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से दूरी बनाए रखना जरूरी है। डायबिटीज, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी लिवर के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

    अगर जांच में फैटी लिवर की पुष्टि हो चुकी है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिवर की स्थिति और फाइब्रोसिस के जोखिम का मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। समय रहते खानपान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव करने तथा जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार लेने से बीमारी के बढ़ने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • नीम से निखरेगी त्वचा और ऑयलीनेस पर भी लगेगी लगाम? चेहरे पर लगाने से पहले जान लें सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    नीम से निखरेगी त्वचा और ऑयलीनेस पर भी लगेगी लगाम? चेहरे पर लगाने से पहले जान लें सही तरीका और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । आज के समय में धूल मिट्टी प्रदूषण तेज धूप और लगातार बदलती लाइफस्टाइल का असर सबसे पहले त्वचा पर दिखाई देता
    है। चेहरे पर ऑयलीनेस पिंपल छोटे दाने और त्वचा की थकान जैसी परेशानियां आम हो गई हैं। ऐसे में लोग महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स के साथ घरेलू नुस्खों की ओर भी रुख करते हैं। नीम इन्हीं पारंपरिक घरेलू उपायों में शामिल है। नीम की पत्तियों का इस्तेमाल लंबे समय से त्वचा की साफ सफाई के लिए किया जाता रहा है। हालांकि इसे किसी त्वचा रोग का पक्का इलाज मानने के बजाय एक घरेलू स्किन केयर विकल्प के तौर पर ही इस्तेमाल करना बेहतर है।

    अगर आपकी त्वचा बहुत ऑयली है तो नीम की साफ और ताजी पत्तियों को अच्छी तरह धोकर हल्का पीसकर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें जरूरत के अनुसार पानी मिलाकर पतला पेस्ट बनाया जा सकता है। इसे चेहरे पर बहुत मोटी परत में लगाने के बजाय हल्की परत लगाएं और थोड़ी देर बाद सामान्य पानी से चेहरा धो लें। इसके बाद त्वचा को रगड़ने के बजाय मुलायम तौलिए से हल्के हाथों से सुखाएं। त्वचा में रूखापन महसूस हो तो हल्का नॉन कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइजर लगाया जा सकता है। त्वचा को जरूरत से ज्यादा सुखाना भी ठीक नहीं है क्योंकि अत्यधिक ड्राई और इरिटेटेड त्वचा परेशानी बढ़ा सकती है।

    नीम का इस्तेमाल करते समय सबसे जरूरी बात यह है कि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है। किसी को घरेलू नुस्खा आराम दे सकता है तो किसी की त्वचा पर जलन लालिमा खुजली या सूखापन हो सकता है। इसलिए पूरे चेहरे पर लगाने से पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर है। अगर जलन या खुजली महसूस हो तो तुरंत इसे धो दें और दोबारा इस्तेमाल न करें। नीम में नींबू बेकिंग सोडा टूथपेस्ट या किसी तेज रसायन को मिलाकर लगाने से बचना चाहिए। त्वचा को ज्यादा रगड़ना या बार बार नए नुस्खे आजमाना भी नुकसान पहुंचा सकता है। विशेषज्ञ भी मुंहासों वाली त्वचा पर स्क्रबिंग और ऐसी चीजों से बचने की सलाह देते हैं जो त्वचा को इरिटेट कर सकती हैं।

    अगर चेहरे पर कभी कभार छोटे पिंपल निकलते हैं तो नीम आधारित हल्की देखभाल के साथ चेहरे को दिन में जरूरत के अनुसार सौम्य क्लींजर से साफ रखना ज्यादा जरूरी है। मेकअप और स्किन केयर प्रोडक्ट चुनते समय ऑयल फ्री और नॉन कॉमेडोजेनिक विकल्पों को प्राथमिकता दी जा सकती है। दिन में सनस्क्रीन लगाना भी स्किन केयर रूटीन का अहम हिस्सा है। खासकर अगर मुंहासों के बाद चेहरे पर काले दाग रह जाते हैं तो धूप से बचाव जरूरी हो जाता है।

    हालांकि अगर पिंपल लगातार निकल रहे हैं चेहरे पर दर्दनाक गांठें बन रही हैं या मुंहासों के बाद दाग और निशान बढ़ते जा रहे हैं तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। ऐसे मामलों में त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी के अनुसार मुंहासों के इलाज में कई प्रमाणित टॉपिकल उपचार उपलब्ध हैं और सही उपचार का चुनाव त्वचा की स्थिति और मुंहासों की गंभीरता के आधार पर किया जाता है।

    इसलिए नीम को स्किन केयर रूटीन में शामिल करना हो तो इसे सरल और सीमित तरीके से इस्तेमाल करें। चेहरे पर कुछ भी लगाने से पहले अपनी त्वचा की संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। खूबसूरत त्वचा के लिए किसी एक घरेलू नुस्खे से ज्यादा जरूरी है नियमित सफाई पर्याप्त मॉइस्चराइजिंग धूप से सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह। नीम आपकी घरेलू देखभाल का हिस्सा हो सकता है लेकिन स्वस्थ त्वचा के लिए पूरी स्किन केयर रूटीन का विकल्प नहीं है।

  • वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    वजन सामान्य और शरीर फिट दिखने के बावजूद 30 के बाद क्यों जरूरी है नियमित हेल्थ चेकअप, जानें किन बीमारियों का खतरा

    नई दिल्ली । क्या आपकी उम्र 30 साल या उससे ज्यादा है? अगर हां, तो अब अपनी सेहत को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने का समय है। कई ऐसी बीमारियां हैं जो पहले अधिक उम्र के लोगों में आम मानी जाती थीं, लेकिन अब कम उम्र में भी सामने आ रही हैं। खास बात यह है कि शुरुआती दौर में इन बीमारियों के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में व्यक्ति खुद को पूरी तरह स्वस्थ समझता रहता है, जबकि शरीर के भीतर बीमारी धीरे-धीरे बढ़ रही होती है।

    सिर्फ सामान्य वजन होना या रोजमर्रा के काम आसानी से कर पाना हमेशा अच्छी सेहत की गारंटी नहीं है। हाई ब्लड प्रेशर और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल लंबे समय तक बिना किसी खास संकेत के रह सकते हैं। इसी तरह प्रीडायबिटीज और डायबिटीज भी शुरुआती चरण में कई लोगों में बिना स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। इसलिए केवल बाहरी फिटनेस के आधार पर अपनी सेहत का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता।

    भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की गाइडलाइन के अनुसार, बिना लक्षण वाले लोगों में भी 30 वर्ष की उम्र के बाद डायबिटीज और लिपिड प्रोफाइल की जांच पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति को कितनी बार और कौन-कौन से टेस्ट कराने चाहिए, यह उसकी उम्र, पारिवारिक इतिहास और स्वास्थ्य जोखिमों के आधार पर अलग हो सकता है।

    भारतीयों में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा महत्वपूर्ण है। ब्लड शुगर बढ़ने के बावजूद कई लोगों को लंबे समय तक प्यास अधिक लगना, बार-बार पेशाब आना या अत्यधिक थकान जैसे स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। ऐसे में नियमित स्क्रीनिंग से ब्लड शुगर में होने वाले बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सकता है।

    परिवार में अगर किसी सदस्य को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या अधिक वजन की समस्या रही है तो 30 वर्ष के बाद स्वास्थ्य को लेकर अधिक सतर्क रहना जरूरी हो जाता है। पारिवारिक इतिहास के साथ कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित खानपान और अधिक वजन जैसे कारक भी मेटाबोलिक बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    हाई ब्लड प्रेशर को अक्सर साइलेंट बीमारी कहा जाता है, क्योंकि बहुत से लोगों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। सिरदर्द या चक्कर नहीं आ रहा है, इसका मतलब यह नहीं है कि ब्लड प्रेशर सामान्य है। इसी तरह बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल भी आमतौर पर कोई खास लक्षण नहीं देता और इसका पता रक्त जांच के जरिए लगाया जाता है।

    सामान्य वजन वाले लोगों को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उन्हें मेटाबोलिक समस्याओं का खतरा नहीं है। शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान, धूम्रपान और पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास जैसे कारण सामान्य वजन के बावजूद जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    30 वर्ष के बाद नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराना महत्वपूर्ण हो सकता है। डायबिटीज की स्क्रीनिंग और जोखिम के अनुसार लिपिड प्रोफाइल भी कराया जा सकता है। डॉक्टर आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास, वजन, खानपान और ब्लड प्रेशर जैसे कारकों को देखकर तय कर सकते हैं कि आपके लिए कौन-कौन से परीक्षण जरूरी हैं।

    अगर लगातार थकान, वजन में असामान्य बदलाव या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या महसूस हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच से संभावित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान शुरुआती चरण में की जा सकती है।

  • बालों का झड़ना रोकना है तो इन आदतों को बदलें: डाइट से लेकर हेयर केयर तक जानिए बालों को मजबूत रखने के आसान तरीके

    बालों का झड़ना रोकना है तो इन आदतों को बदलें: डाइट से लेकर हेयर केयर तक जानिए बालों को मजबूत रखने के आसान तरीके


    नई दिल्ली। बालों का झड़ना आज के समय में एक आम समस्या बन गई है। मौसम में बदलाव तनाव नींद की कमी खानपान में पोषक तत्वों की कमी और बालों की गलत तरीके से देखभाल करने जैसी कई वजहों से बाल कमजोर होकर टूटने लग सकते हैं। कुछ मात्रा में बालों का रोज झड़ना सामान्य हो सकता है लेकिन अगर लगातार बाल पहले से ज्यादा गिर रहे हों सिर की त्वचा दिखाई देने लगी हो या बालों की मोटाई तेजी से कम हो रही हो तो इसके कारण पर ध्यान देना जरूरी है। केवल महंगे हेयर प्रोडक्ट इस्तेमाल करने के बजाय बालों की देखभाल के साथ खानपान और रोजमर्रा की आदतों में सुधार करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

    बालों को मजबूत बनाए रखने के लिए सबसे पहले संतुलित आहार पर ध्यान देना चाहिए। शरीर को पर्याप्त प्रोटीन आयरन जिंक विटामिन और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिलना बालों के सामान्य विकास के लिए महत्वपूर्ण है। भोजन में दालें अंडे दूध दही हरी सब्जियां फल मेवे और बीज जैसे पौष्टिक विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति के भोजन में पोषक तत्वों की कमी है तो इसका असर बालों पर भी पड़ सकता है। हालांकि बिना जांच के आयरन या किसी अन्य सप्लीमेंट का सेवन शुरू करना उचित नहीं है।

    बालों की सफाई भी जरूरी है लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा रगड़कर धोने से बचना चाहिए। अपनी स्कैल्प और बालों के प्रकार के अनुसार हल्के शैंपू का इस्तेमाल किया जा सकता है। शैंपू लगाते समय नाखूनों से जोर से सिर की त्वचा खरोंचने के बजाय उंगलियों के पोरों से धीरे धीरे सफाई करना बेहतर है। बाल धोने के बाद उन्हें जोर से रगड़कर सुखाने के बजाय मुलायम तौलिये से हल्के हाथों से पानी सोखना चाहिए। गीले बाल अपेक्षाकृत नाजुक होते हैं इसलिए उन्हें जोर से कंघी करने से टूटने का खतरा बढ़ सकता है।
    बालों की सफाई भी जरूरी है लेकिन उन्हें बहुत ज्यादा रगड़कर धोने से बचना चाहिए। अपनी स्कैल्प और बालों के प्रकार के अनुसार हल्के शैंपू का इस्तेमाल किया जा सकता है। शैंपू लगाते समय नाखूनों से जोर से सिर की त्वचा खरोंचने के बजाय उंगलियों के पोरों से धीरे धीरे सफाई करना बेहतर है। बाल धोने के बाद उन्हें जोर से रगड़कर सुखाने के बजाय मुलायम तौलिये से हल्के हाथों से पानी सोखना चाहिए। गीले बाल अपेक्षाकृत नाजुक होते हैं इसलिए उन्हें जोर से कंघी करने से टूटने का खतरा बढ़ सकता है।

    हेयर स्टाइलिंग की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। लगातार बहुत टाइट पोनीटेल जूड़ा या ऐसी हेयर स्टाइल जिसमें बालों की जड़ों पर खिंचाव पड़ता है बालों को कमजोर कर सकती है। बार बार हेयर स्ट्रेटनिंग कर्लिंग और अत्यधिक गर्म उपकरणों का इस्तेमाल भी बालों की बाहरी परत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए हीट स्टाइलिंग कम करना और जरूरत पड़ने पर हीट प्रोटेक्शन का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प हो सकता है। बालों को बार बार केमिकल ट्रीटमेंट देने से भी बचना चाहिए।

    तनाव और नींद की कमी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लंबे समय तक तनाव शरीर पर कई तरह से असर डाल सकता है और कुछ लोगों में इसके बाद बाल झड़ने की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए नियमित नींद हल्की शारीरिक गतिविधि योग या ध्यान जैसी स्वस्थ आदतों को दिनचर्या में शामिल करना उपयोगी हो सकता है। पर्याप्त पानी पीना भी शरीर और त्वचा की सामान्य सेहत के लिए जरूरी है।

    अगर बाल अचानक बहुत ज्यादा झड़ने लगें या लंबे समय तक समस्या बनी रहे तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। थायरॉयड संबंधी समस्या आयरन की कमी हार्मोनल बदलाव कुछ दवाएं आनुवंशिक कारण या स्कैल्प से जुड़ी समस्याएं भी बाल झड़ने की वजह हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना और जरूरत पड़ने पर जांच कराना बेहतर रहता है। कारण पता चलने के बाद ही सही उपचार तय किया जा सकता है।

    कुल मिलाकर बालों को झड़ने से रोकने के लिए किसी एक घरेलू उपाय या तेल को चमत्कारी समाधान मानना सही नहीं है। पौष्टिक भोजन नियमित नींद तनाव को नियंत्रित रखना स्कैल्प की उचित सफाई और बालों के साथ कम से कम खिंचाव वाला व्यवहार लंबे समय में बेहतर हेयर केयर रूटीन बनाने में मदद कर सकता है। अगर बालों के झड़ने की समस्या लगातार बढ़ रही है तो समय पर विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे समझदारी भरा कदम है।