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  • वेट लॉस के लिए मूंग दाल क्यों मानी जाती है बेहतर, जानिए प्रोटीन फाइबर से भरपूर हेल्दी रेसिपी का आसान तरीका

    वेट लॉस के लिए मूंग दाल क्यों मानी जाती है बेहतर, जानिए प्रोटीन फाइबर से भरपूर हेल्दी रेसिपी का आसान तरीका

    नई दिल्ली । वजन कम करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए डाइट में ऐसी चीजों को शामिल करना जरूरी माना जाता है, जो स्वाद के साथ शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी दें। रोजाना के भोजन में शामिल दाल इस लिहाज से एक उपयोगी विकल्प हो सकती है। खास तौर पर मूंग दाल को हल्के और संतुलित भोजन के तौर पर डाइट में शामिल किया जा सकता है।

    मूंग दाल में प्रोटीन और फाइबर पाए जाते हैं। प्रोटीन शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व है, जबकि फाइबर युक्त भोजन लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है। इससे बार बार कुछ खाने की इच्छा को नियंत्रित करने और भोजन के बीच अनहेल्दी स्नैकिंग कम करने में सहायता मिल सकती है।

    वजन घटाने के लिए मूंग दाल को बनाने का तरीका भी महत्वपूर्ण है। यदि दाल में बहुत अधिक तेल, घी या क्रीम का इस्तेमाल किया जाए तो भोजन की कुल कैलोरी बढ़ सकती है। इसलिए इसे हल्के मसालों और सीमित मात्रा में तेल के साथ तैयार करना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    मूंग दाल की आसान रेसिपी बनाने के लिए सबसे पहले दाल को अच्छी तरह साफ करके धो लें। इसे करीब 15 से 20 मिनट के लिए पानी में भिगोया जा सकता है। इसके बाद दाल को कुकर में पानी, हल्दी, नमक और कटे हुए टमाटर के साथ डालकर पकाएं। दाल के अच्छी तरह नरम होने के बाद इसमें जीरा, हींग और लहसुन का हल्का तड़का लगाया जा सकता है।

    वेट लॉस डाइट के दौरान तड़के में तेल या घी की मात्रा कम रखना बेहतर रहता है। स्वाद बढ़ाने के लिए धनिया, हरी मिर्च और दूसरे हल्के मसालों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे दाल स्वादिष्ट भी रहेगी और भोजन को अनावश्यक रूप से भारी बनाने से भी बचा जा सकेगा।

    मूंग दाल को और ज्यादा पौष्टिक बनाने के लिए इसमें अलग अलग सब्जियां भी मिलाई जा सकती हैं। पालक, लौकी, गाजर, टमाटर और तोरई जैसी सब्जियों को दाल के साथ पकाने से भोजन में पोषक तत्व और फाइबर की मात्रा बढ़ सकती है। इस तरह तैयार दाल दोपहर या रात के भोजन का हिस्सा बन सकती है।

    हालांकि वजन कम करने के लिए केवल किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है। दाल के साथ भोजन में हरी सब्जियां और सलाद शामिल किए जा सकते हैं। जरूरत के अनुसार रोटी या चावल की संतुलित मात्रा भी ली जा सकती है। भोजन की मात्रा और पूरे दिन की कुल कैलोरी का ध्यान रखना भी वजन प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।

    इसके अलावा नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त पानी और संतुलित भोजन की आदत वजन घटाने की कोशिश में मददगार हो सकती है। हर व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरत अलग हो सकती है, इसलिए किसी विशेष स्वास्थ्य स्थिति या लंबे समय से चल रही समस्या में व्यक्तिगत डाइट के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहता है।

    मूंग दाल को इसलिए वजन घटाने की कोई जादुई चीज नहीं माना जाना चाहिए। यह प्रोटीन और फाइबर वाले संतुलित भोजन का एक हिस्सा हो सकती है। सही मात्रा, कम तेल में तैयारी और सब्जियों के साथ इसका सेवन रोजाना की डाइट को अधिक संतुलित और पौष्टिक बनाने में मदद कर सकता है।

  • खर्राटे लेने वालों के लिए जरूरी खबर सांस रुकने से लेकर हाई बीपी तक इन संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

    खर्राटे लेने वालों के लिए जरूरी खबर सांस रुकने से लेकर हाई बीपी तक इन संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज

    नई दिल्ली । खर्राटे लेना आम समस्या है और बहुत से लोगों को सोते समय इसकी परेशानी होती है लेकिन हर बार खर्राटों को सामान्य मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई बार खर्राटे केवल सोने के दौरान गले और मुंह के आसपास मौजूद ऊतकों में कंपन के कारण आते हैं लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही खर्राटे शरीर में चल रही गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकते हैं। खासतौर पर अगर खर्राटों के साथ सोते समय सांस रुकने लगे हांफते हुए नींद खुले रात में बार बार आंख खुले या सुबह उठने के बाद भी अत्यधिक थकान महसूस हो तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

    दरअसल जब व्यक्ति सोता है तो गले जीभ और मुंह के आसपास के कुछ ऊतक ढीले पड़ जाते हैं। इससे सांस लेने का रास्ता कुछ संकरा हो सकता है। जब हवा इस संकरे रास्ते से गुजरती है तो आसपास के ऊतकों में कंपन पैदा होता है और इसी कंपन की आवाज खर्राटे के रूप में सुनाई देती है। अधिक वजन धूम्रपान शराब का सेवन और सोने की कुछ स्थितियां खर्राटों की समस्या को बढ़ा सकती हैं। हालांकि लगातार और बहुत तेज खर्राटे हमेशा सामान्य कारणों से ही हों यह जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा खतरा तब माना जाता है जब सोते समय कुछ सेकंड के लिए सांस रुकती है और इसके बाद व्यक्ति अचानक जोर से सांस लेने लगता है। परिवार के किसी सदस्य को अगर ऐसा बार बार दिखाई देता है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में नींद के दौरान सांस की ऊपरी नली बार बार संकरी या बंद हो सकती है जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा प्रभावित होती है और नींद बार बार बाधित होती रहती है। इसका असर यह होता है कि व्यक्ति पर्याप्त समय सोने के बावजूद सुबह उठकर तरोताजा महसूस नहीं करता।

    खर्राटों के साथ हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी है तो विशेष सावधानी जरूरी है। लंबे समय से तेज खर्राटे आने और ब्लड प्रेशर नियंत्रित न रहने की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है क्योंकि नींद में सांस रुकने की समस्या का संबंध हाई ब्लड प्रेशर और हृदय तथा रक्त वाहिकाओं से जुड़ी परेशानियों से हो सकता है। इसलिए केवल खर्राटे कम करने के उपाय करने के बजाय उनके पीछे छिपे कारण को समझना जरूरी है।

    अगर दिन के समय लगातार नींद आती है काम करते समय थकान महसूस होती है एकाग्रता प्रभावित होती है या रात में घुटन और हांफने के कारण बार बार नींद खुलती है तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए। समय रहते समस्या की पहचान होने पर उचित उपचार और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल सकती है।

    खर्राटों की समस्या में वजन को नियंत्रित रखना करवट लेकर सोना धूम्रपान से बचना और शराब का सेवन सीमित करना मददगार हो सकता है। लेकिन अगर खर्राटों के साथ सांस रुकने जैसे संकेत दिखाई दे रहे हैं तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना ज्यादा जरूरी है। शरीर रात में जिन संकेतों के जरिए अपनी परेशानी बता रहा हो उन्हें नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते समझना ही बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में पहला कदम है।

  • बॉयफ्रेंड के लिए गिफ्ट चुनने में हैं कन्फ्यूज तो उनकी पसंद के हिसाब से आजमाएं ये पर्सनलाइज्ड और यादगार विकल्प

    बॉयफ्रेंड के लिए गिफ्ट चुनने में हैं कन्फ्यूज तो उनकी पसंद के हिसाब से आजमाएं ये पर्सनलाइज्ड और यादगार विकल्प


    नई दिल्ली ।
    बॉयफ्रेंड के लिए सही गिफ्ट चुनना कई बार आसान नहीं होता। खासकर तब जब आप ऐसा तोहफा देना चाहती हों जो सिर्फ महंगा या आकर्षक न हो, बल्कि आपके रिश्ते की खासियत और आपकी भावनाओं को भी जाहिर करे। ऐसे में गिफ्ट चुनते समय उनकी पसंद, जरूरत और रोजमर्रा की आदतों को ध्यान में रखना सबसे बेहतर तरीका हो सकता है।

    अगर आप ऐसा तोहफा देना चाहती हैं जिसका इस्तेमाल वह रोज कर सकें और साथ ही उससे आपकी कोई खास याद भी जुड़ी हो, तो पर्सनलाइज्ड वॉलेट और कीचेन अच्छा विकल्प हो सकता है। वॉलेट पर उनका नाम, किसी खास तारीख या तस्वीर को शामिल कराया जा सकता है। वहीं कीचेन पर दोनों के नाम के शुरुआती अक्षर या छोटा सा संदेश लिखवाकर इसे और व्यक्तिगत बनाया जा सकता है।

    यादों से जुड़ा गिफ्ट देने की इच्छा हो तो स्क्रैपबुक एक अलग और भावनात्मक विकल्प बन सकती है। इसमें रिश्ते से जुड़ी तस्वीरों के साथ पहली मुलाकात, कोई यादगार यात्रा, खास तारीख या साथ बिताए गए किसी महत्वपूर्ण पल का जिक्र किया जा सकता है। इसके साथ उनकी पसंद की चॉकलेट, छोटा सा उपयोगी सामान और हाथ से लिखा नोट रखकर सरप्राइज बॉक्स तैयार किया जा सकता है।

    अगर आपके बॉयफ्रेंड को अपने लुक और पर्सनैलिटी का ध्यान रखना पसंद है, तो उनकी पसंद की खुशबू वाला परफ्यूम और ग्रूमिंग किट भी उपयोगी तोहफा हो सकता है। गिफ्ट खरीदते समय उनकी पसंद को प्राथमिकता देना जरूरी है, क्योंकि पसंद के मुताबिक चुना गया साधारण सामान भी महंगे लेकिन बिना सोचे-समझे चुने गए तोहफे से ज्यादा प्रभावी हो सकता है।

    गिफ्ट चुनने का एक और अच्छा तरीका उनकी हॉबी को समझना है। अगर उन्हें क्रिकेट पसंद है तो क्रिकेट से जुड़ी कोई उपयोगी चीज दी जा सकती है। गेमिंग पसंद करने वाले व्यक्ति के लिए गेमिंग से जुड़ा सामान, संगीत पसंद करने वाले के लिए उनकी पसंद के कलाकार या शैली से संबंधित वस्तु और किताबें पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए उनकी रुचि की किताब बेहतर विकल्प हो सकती है।

    फिटनेस में रुचि रखने वाले बॉयफ्रेंड के लिए उनकी जरूरत के अनुसार फिटनेस एक्सेसरी भी चुनी जा सकती है। इसी तरह रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला कोई सामान भी अच्छा गिफ्ट बन सकता है। इसका फायदा यह है कि तोहफा केवल सजावट तक सीमित नहीं रहता और लंबे समय तक उपयोग में आता है।

    गिफ्ट चुनते समय बजट को लेकर दबाव लेने की जरूरत नहीं है। किसी तोहफे की कीमत से ज्यादा उसमें शामिल व्यक्तिगत सोच महत्वपूर्ण हो सकती है। एक छोटा फोटो फ्रेम, पर्सनलाइज्ड कीचेन या हाथ से लिखा संदेश भी रिश्ते के लिए खास महत्व रख सकता है।

    तोहफा देने का तरीका भी उसे यादगार बना सकता है। किसी खास दिन डिनर के दौरान सरप्राइज देना, किसी पुरानी याद से जुड़ी जगह पर गिफ्ट देना या साधारण तरीके से हाथ से लिखा नोट साथ रखना पल को खास बना सकता है। इसलिए बॉयफ्रेंड के लिए गिफ्ट चुनते समय महंगे विकल्प तलाशने के बजाय उनकी पसंद और आपके रिश्ते से जुड़ी भावनाओं को प्राथमिकता देना बेहतर रहेगा।

  • सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सावन का महीना शुरू होते ही देश के कई हिस्सों में लोग खानपान में बदलाव करते हैं। बहुत से परिवारों में इस दौरान मांस, मछली, चिकन और अंडे से दूरी बनाई जाती है। कुछ लोग प्याज और लहसुन का सेवन भी छोड़ देते हैं। आमतौर पर इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे जीवनशैली, संयम, जीवदया और मानसून के दौरान खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी समझा जा सकता है।

    हिंदू परंपरा में सावन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और ध्यान तथा धार्मिक गतिविधियों में समय देते हैं। धार्मिक दृष्टि से साधना के समय भोजन में सादगी और संयम को महत्व दिया जाता है। इसी सोच के तहत कई लोग मांसाहार छोड़कर हल्का और सात्त्विक भोजन अपनाते हैं।

    सात्त्विक भोजन की अवधारणा ताजे, पौष्टिक और अपेक्षाकृत हल्के भोजन से जुड़ी है। इसका उद्देश्य केवल खानपान को बदलना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को शांत रखने की साधना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि धार्मिक ग्रंथों में सावन के दौरान हर व्यक्ति के लिए मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित होने का सीधा निर्देश नहीं मिलता। यह परंपरा धार्मिक आचार, स्थानीय मान्यताओं और लंबे समय से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा बनी है।

    सावन चातुर्मास की अवधि में भी आता है। परंपरागत रूप से यह समय तप, व्रत, दान और आत्मसंयम के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु में साधु-संतों द्वारा यात्राएं सीमित करने की परंपरा भी रही है। इसे मौसम की कठिन परिस्थितियों के साथ-साथ छोटे जीवों को अनजाने में नुकसान से बचाने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

    बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और कई प्रकार के सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मांस, मछली, चिकन और अंडे जैसे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इनके सुरक्षित भंडारण और उचित तापमान पर रखे जाने की जरूरत होती है। कच्चे मांस को गलत तरीके से रखने या संभालने पर उसमें मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीव दूसरे खाद्य पदार्थों तक भी पहुंच सकते हैं।

    मानसून में जलभराव, दूषित पानी, अस्वच्छ बाजार और बिजली आपूर्ति में बाधा जैसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों की स्वच्छता को प्रभावित कर सकती हैं। पुराने समय में रेफ्रिजरेशन और सुरक्षित परिवहन की सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे वातावरण में जल्दी खराब होने वाले भोजन से दूरी बनाना व्यावहारिक सावधानी भी रही होगी।

    हालांकि विज्ञान यह नहीं कहता कि सावन के महीने में मांसाहार अपने आप हानिकारक हो जाता है। बीमारी का जोखिम मुख्य रूप से भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, भंडारण और पकाने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि मांस या मछली ताजा हो, उचित तापमान पर रखी गई हो और पूरी तरह पकाई जाए तो संक्रमण का खतरा कम किया जा सकता है।

    इसी तरह यह दावा भी सही नहीं है कि सावन में हर व्यक्ति की पाचन शक्ति निश्चित रूप से कमजोर हो जाती है। उमस, कम शारीरिक गतिविधि, अनियमित खानपान और बहुत अधिक तला या मसालेदार भोजन कुछ लोगों में अपच और भारीपन बढ़ा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति की स्थिति और खानपान पर निर्भर करता है।

    इसलिए सावन में नॉनवेज खाना या छोड़ना व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं पर निर्भर कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से इसे संयम और जीवदया का माध्यम माना जाता है, जबकि स्वास्थ्य की दृष्टि से मानसून में भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित रखरखाव पर विशेष ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सावन की इस परंपरा को केवल डर या बीमारी से जोड़कर देखने के बजाय इसके व्यापक भाव को समझना जरूरी है। इसमें कुछ समय के लिए स्वाद और इच्छाओं पर नियंत्रण, सादगी अपनाने, प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने और भोजन को लेकर सावधानी बरतने की भावना शामिल है।

  • अलसी से बनाएं घर पर आसान फेस पैक और जेल, त्वचा को रखें मुलायम और हाइड्रेटेड; जानें इस्तेमाल का सही तरीका

    अलसी से बनाएं घर पर आसान फेस पैक और जेल, त्वचा को रखें मुलायम और हाइड्रेटेड; जानें इस्तेमाल का सही तरीका


    नई दिल्ली। स्किन केयर के लिए लोग अक्सर महंगे प्रोडक्ट्स और अलग अलग तरह के घरेलू नुस्खे आजमाते हैं। लेकिन रसोई में मौजूद कुछ साधारण चीजें भी त्वचा की देखभाल में उपयोगी हो सकती हैं। अलसी उन्हीं चीजों में शामिल है। अलसी को आमतौर पर सेहत के लिए फायदेमंद बीज माना जाता है लेकिन इसमें मौजूद ओमेगा 3 फैटी एसिड और अन्य पोषक तत्वों के कारण इसका इस्तेमाल त्वचा की देखभाल के लिए भी किया जाता है। खासकर रूखी और बेजान त्वचा वाले लोग अलसी से बने जेल या फेस पैक को अपने स्किन केयर रूटीन में शामिल कर सकते हैं।

    अलसी से जेल बनाना काफी आसान है। इसके लिए एक से दो चम्मच अलसी को पानी में डालकर धीमी आंच पर कुछ देर उबालें। जब पानी थोड़ा गाढ़ा होकर जेल जैसा दिखाई देने लगे तो इसे ठंडा करके छान लें। तैयार जेल को साफ चेहरे पर थोड़ी मात्रा में लगाया जा सकता है। इसे कुछ समय तक त्वचा पर रहने देने के बाद सामान्य पानी से चेहरा धो लें। अलसी का जेल त्वचा को मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है और रूखी त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए उपयोगी हो सकता है।

    अलसी का फेस पैक भी बनाया जा सकता है। इसके लिए अलसी को पीसकर उसमें थोड़ा दही या एलोवेरा जेल मिलाया जा सकता है। इस मिश्रण को चेहरे पर पतली परत के रूप में लगाएं और सूखने के बाद धीरे से साफ कर लें। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू नुस्खे को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। खासकर संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

    स्किन केयर में अलसी का इस्तेमाल करते समय एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि केवल घरेलू नुस्खे ही त्वचा की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होते। अगर त्वचा बहुत ज्यादा रूखी है तो नियमित मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल भी जरूरी है। दिन के समय घर से बाहर निकलते समय सनस्क्रीन लगाना भी त्वचा की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और चेहरे की नियमित सफाई करना भी स्किन केयर का अहम हिस्सा है।

    अलसी का इस्तेमाल करते समय साफ और ताजा जेल तैयार करना बेहतर होता है। घर पर बनाए गए जेल को लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए क्योंकि इसमें प्रिजर्वेटिव नहीं होते। अगर इस्तेमाल के बाद त्वचा पर जलन लालिमा खुजली या किसी तरह की परेशानी महसूस हो तो तुरंत इसे धो दें और दोबारा इस्तेमाल न करें। किसी गंभीर त्वचा समस्या या लगातार बने रहने वाली परेशानी में त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है।

    कुल मिलाकर अलसी को स्किन केयर रूटीन में एक सरल घरेलू विकल्प के तौर पर शामिल किया जा सकता है। इससे बना जेल त्वचा को मुलायम और हाइड्रेटेड महसूस कराने में मदद कर सकता है। हालांकि बेहतर त्वचा के लिए नियमित देखभाल सबसे ज्यादा जरूरी है। घरेलू उपायों के साथ त्वचा की जरूरत के अनुसार सही मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना अधिक प्रभावी रूटीन बना सकता है।

  • फिट और स्वस्थ रहने का आसान फॉर्मूला, अच्छी डाइट से पर्याप्त नींद तक रोज अपनाएं ये जरूरी आदतें और रहें बीमारियों से दूर

    फिट और स्वस्थ रहने का आसान फॉर्मूला, अच्छी डाइट से पर्याप्त नींद तक रोज अपनाएं ये जरूरी आदतें और रहें बीमारियों से दूर


    नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग काम और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। लंबे समय तक बैठे रहना अनियमित खानपान कम नींद और लगातार तनाव जैसी आदतें धीरे धीरे शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं। स्वस्थ रहने के लिए किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ अच्छी आदतों को शामिल करना ज्यादा जरूरी है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित भोजन नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद और मानसिक शांति पर ध्यान देना चाहिए।

    सबसे पहले खानपान पर ध्यान देना जरूरी है। भोजन में अलग अलग तरह की सब्जियां फल दालें साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन को शामिल करना चाहिए। बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन अत्यधिक मीठा और ज्यादा नमक वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना बेहतर माना जाता है। भोजन की मात्रा और समय का भी ध्यान रखना चाहिए। लंबे समय तक भूखे रहने या बार बार जरूरत से ज्यादा खाने की आदत से बचना चाहिए।

    शरीर को स्वस्थ रखने में पानी की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना शरीर में हाइड्रेशन बनाए रखने में मदद करता है। गर्मी या अधिक शारीरिक गतिविधि के दौरान शरीर को पानी की जरूरत और बढ़ सकती है। हालांकि पानी की जरूरत हर व्यक्ति की उम्र गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है।

    व्यायाम को स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है। रोज कुछ समय पैदल चलना योग करना स्ट्रेचिंग करना या अपनी क्षमता के अनुसार कोई अन्य शारीरिक गतिविधि करना शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। अगर आपका काम लंबे समय तक कुर्सी पर बैठकर करने वाला है तो बीच बीच में उठकर थोड़ा चलना भी उपयोगी आदत हो सकती है। किसी नई या कठिन एक्सरसाइज की शुरुआत धीरे धीरे करना बेहतर रहता है।

    अच्छी सेहत के लिए नींद को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पर्याप्त और नियमित नींद शरीर को आराम देने के साथ मानसिक ताजगी बनाए रखने में मदद करती है। रात में देर तक मोबाइल या अन्य स्क्रीन देखने की आदत कम करने और सोने का नियमित समय तय करने से नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। हर व्यक्ति की नींद की जरूरत अलग हो सकती है लेकिन लगातार नींद की कमी को सामान्य मानकर नहीं चलना चाहिए।

    मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण है। लगातार तनाव महसूस होने पर काम के बीच आराम लेना परिवार और दोस्तों से बातचीत करना संगीत पढ़ने या पसंद की गतिविधियों के लिए समय निकालना मददगार हो सकता है। अगर तनाव लंबे समय तक बना रहे और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करे तो विशेषज्ञ की मदद लेना उचित है।

    इसके अलावा नियमित स्वास्थ्य जांच भी महत्वपूर्ण है। उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार ब्लड प्रेशर ब्लड शुगर आंखों और अन्य जरूरी स्वास्थ्य जांच के बारे में डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है। किसी बीमारी के लक्षण लंबे समय तक बने रहने पर खुद से दवा लेने के बजाय चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

    कुल मिलाकर अच्छी सेहत किसी एक दिन की मेहनत से नहीं बल्कि रोज की छोटी छोटी आदतों से बनती है। संतुलित भोजन नियमित गतिविधि पर्याप्त नींद तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश और समय समय पर स्वास्थ्य जांच को जीवनशैली का हिस्सा बनाकर लंबे समय तक स्वस्थ रहने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।

  • बंद कमरे में बार बार एयर फ्रेशनर छिड़कना पड़ सकता है भारी, जानें किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए

    बंद कमरे में बार बार एयर फ्रेशनर छिड़कना पड़ सकता है भारी, जानें किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए

    नई दिल्ली ।कमरे को खुशबूदार और ताजा रखने के लिए रूम फ्रेशनर, एयर फ्रेशनर और सुगंधित स्प्रे का इस्तेमाल आम हो गया है। घर, कार्यालय और कार में इन उत्पादों का उपयोग खास तौर पर तब बढ़ जाता है, जब बारिश या नमी के कारण कमरे में सीलन और अप्रिय गंध महसूस होने लगती है। हालांकि, लगातार और जरूरत से ज्यादा रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल करने से कुछ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है।

    रूम फ्रेशनर में खुशबू पैदा करने वाले फ्रेगरेंस कंपाउंड, सॉल्वेंट और दूसरे रासायनिक पदार्थ हो सकते हैं। इन पदार्थों का प्रभाव हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। कुछ संवेदनशील लोगों को तेज खुशबू के संपर्क में आने के बाद सिरदर्द, छींक, खांसी, आंखों में जलन या गले में परेशानी महसूस हो सकती है। कुछ मामलों में सांस लेने में असहजता भी हो सकती है।

    बंद कमरे में लगातार स्प्रे करने से समस्या बढ़ सकती है। कमरे में हवा का पर्याप्त आवागमन नहीं होने पर फ्रेशनर से निकलने वाले रसायनों की मौजूदगी कुछ समय तक हवा में बनी रह सकती है। इसलिए किसी छोटे या पूरी तरह बंद कमरे में बार बार एयर फ्रेशनर का इस्तेमाल करने के बजाय खिड़की और दरवाजे खोलकर हवा का संचार बनाए रखना बेहतर माना जाता है।

    रूम फ्रेशनर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यह आमतौर पर बदबू के वास्तविक स्रोत को खत्म नहीं करता। अगर कमरे में सीलन, गीला कचरा, नमी, गंदे कपड़े या किसी अन्य कारण से दुर्गंध पैदा हो रही है, तो केवल खुशबू वाला स्प्रे उस समस्या को कुछ समय के लिए ढक सकता है। इसलिए दुर्गंध का कारण पता लगाकर उसे दूर करना ज्यादा प्रभावी तरीका है।

    तेज खुशबू के प्रति संवेदनशील लोगों को ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल विशेष सावधानी से करना चाहिए। बच्चों और बुजुर्गों के आसपास भी जरूरत से ज्यादा सुगंधित उत्पादों का इस्तेमाल करने से बचना बेहतर है। जिन लोगों को फ्रेगरेंस या परफ्यूम से परेशानी होती है, उन्हें हल्की खुशबू या बिना तेज सुगंध वाले विकल्पों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

    अगर रूम फ्रेशनर इस्तेमाल करने के बाद लगातार सिरदर्द, आंखों में जलन, खांसी या सांस लेने में परेशानी महसूस हो, तो उसका इस्तेमाल बंद कर ताजी हवा में जाना चाहिए। लक्षण बने रहने या गंभीर होने की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल करना हो तो उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करना चाहिए। जरूरत से ज्यादा मात्रा में स्प्रे करने से बचें और इसे चेहरे या शरीर के बेहद करीब से इस्तेमाल न करें। भोजन, खाने के बर्तनों और ऐसी सतहों पर सीधे स्प्रे नहीं करना चाहिए जहां खाद्य सामग्री रखी जाती है।

    एक साथ कई अलग अलग सुगंधित उत्पादों का इस्तेमाल करना भी जरूरी नहीं है। एयर फ्रेशनर के साथ सुगंधित मोमबत्ती, स्प्रे और दूसरे फ्रेगरेंस उत्पाद लगातार इस्तेमाल करने के बजाय सीमित मात्रा में किसी एक विकल्प का इस्तेमाल करना बेहतर है।

    कमरे को वास्तव में साफ और ताजा रखने के लिए नियमित सफाई सबसे महत्वपूर्ण है। कूड़ा समय पर बाहर निकालना, गीली चीजों को कमरे में जमा नहीं होने देना, सीलन और नमी को नियंत्रित करना तथा खिड़की दरवाजे खोलकर पर्याप्त वेंटिलेशन बनाए रखना ज्यादा उपयोगी उपाय हैं।

    इसलिए रूम फ्रेशनर को कमरे की सफाई का विकल्प नहीं समझना चाहिए। सीमित मात्रा में इस्तेमाल और पर्याप्त हवा का आवागमन रखते हुए इसका उपयोग किया जा सकता है, लेकिन लगातार तेज खुशबू बनाए रखने के लिए बार बार स्प्रे करना उचित नहीं है। साफ हवा, नियमित सफाई और दुर्गंध के वास्तविक कारण को दूर करना कमरे को स्वस्थ और आरामदायक बनाए रखने का बेहतर तरीका है।

  • गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने पर मिल सकती है राहत, जानिए सही तरीका और किन बातों का रखें ध्यान

    गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने पर मिल सकती है राहत, जानिए सही तरीका और किन बातों का रखें ध्यान

    नई दिल्ली । गले में खराश, दर्द या जलन होने पर गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना लंबे समय से अपनाया जाने वाला घरेलू उपाय है। मौसम में बदलाव, वायरल संक्रमण, एलर्जी, अधिक बोलने या गले में जलन जैसी स्थितियों में यह उपाय कुछ लोगों को अस्थायी राहत दे सकता है। हालांकि, नमक के पानी से गरारे किसी संक्रमण या बीमारी का इलाज नहीं करते, बल्कि लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

    गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने का सबसे प्रमुख फायदा गले की खराश और हल्के दर्द में राहत मिलना माना जाता है। नमक पानी गले के ऊतकों में मौजूद अतिरिक्त तरल पदार्थ को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे सूजन और असहजता कुछ हद तक घट सकती है। इसी कारण हल्के गले के दर्द में इसे सहायक उपाय के तौर पर अपनाया जाता है।

    दूसरा फायदा गले में जमा बलगम से जुड़ा है। सर्दी या वायरल संक्रमण के दौरान गले में म्यूकस जमा होने से बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस हो सकती है। गरारे करने से जमा बलगम ढीला पड़ सकता है और उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। इससे गले में भारीपन और जलन की अनुभूति कम हो सकती है।

    नमक के पानी से गरारे मुंह और गले की सफाई बनाए रखने में भी मदद कर सकते हैं। नमक वाला पानी मुंह के वातावरण को प्रभावित करता है, जिससे कुछ सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां कम हो सकती हैं। हालांकि, इसे संक्रमण खत्म करने वाली दवा नहीं माना जाना चाहिए। बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण होने पर चिकित्सकीय सलाह की जरूरत पड़ सकती है।

    इस उपाय का एक अन्य लाभ मुंह की दुर्गंध को लेकर हो सकता है। यदि सांसों की बदबू मुंह में जमा बैक्टीरिया या खराब ओरल हाइजीन से जुड़ी है, तो नमक के पानी से कुल्ला या गरारे करने से मुंह की सफाई में कुछ मदद मिल सकती है। लेकिन लगातार बदबू बनी रहने पर इसके पीछे मसूड़ों, दांतों या किसी अन्य समस्या की जांच जरूरी हो सकती है।

    नमक के पानी से गरारे मुंह के छोटे घावों, हल्के छालों या मसूड़ों की मामूली परेशानी में भी कुछ राहत दे सकते हैं। दांत निकलवाने जैसी कुछ परिस्थितियों में भी डॉक्टर कभी-कभी नमक के पानी से कुल्ला करने की सलाह देते हैं। हालांकि, गंभीर घाव, लगातार रक्तस्राव या बढ़ते दर्द की स्थिति में घरेलू उपाय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    गरारे करने के लिए एक गिलास गुनगुने पानी में लगभग आधा चम्मच नमक मिलाया जा सकता है। पानी बहुत गर्म नहीं होना चाहिए। तैयार घोल को मुंह और गले में करीब 15 से 30 सेकंड तक घुमाकर गरारे करें और फिर उसे थूक दें। नमक का पानी निगलने से बचना चाहिए। जरूरत के अनुसार दिन में दो से तीन बार गरारे किए जा सकते हैं।

    यह भी समझना जरूरी है कि हर तरह की गले की समस्या में केवल नमक का पानी पर्याप्त नहीं होता। तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, निगलने में गंभीर कठिनाई, लगातार बढ़ता दर्द या लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बच्चों को गरारे कराते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि वे पानी निगल सकते हैं।

    कुल मिलाकर, गुनगुने नमक के पानी से गरारे गले की खराश, हल्की सूजन, बलगम और मुंह की कुछ परेशानियों में अस्थायी आराम देने वाला आसान उपाय हो सकते हैं। लेकिन इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। लक्षणों की वजह और गंभीरता के अनुसार सही उपचार के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।

  • रोज खाली पेट एंटासिड खाने की आदत पड़ सकती है भारी, शुरुआत में दिखने वाले इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    रोज खाली पेट एंटासिड खाने की आदत पड़ सकती है भारी, शुरुआत में दिखने वाले इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    नई दिल्ली । सुबह उठते ही खाली पेट सीने में जलन, खट्टी डकार या पेट में एसिडिटी महसूस होने पर तुरंत एंटासिड लेना कई लोगों की आदत बन जाती है। कभी-कभार एंटासिड का इस्तेमाल आम तौर पर परेशानी की बात नहीं होता, लेकिन यदि हर दिन इसकी जरूरत पड़ रही है तो इसे सामान्य गैस समझकर लगातार लेते रहना उचित नहीं है। बार-बार एसिडिटी होना किसी अन्य पाचन संबंधी समस्या का संकेत हो सकता है और ऐसे में केवल लक्षणों को दबाने के बजाय उसके कारण का पता लगाना जरूरी है।

    एंटासिड ऐसी दवाएं हैं जो पेट में मौजूद अतिरिक्त एसिड को निष्क्रिय करके कुछ समय के लिए जलन और असहजता से राहत देती हैं। अलग-अलग एंटासिड में अलग-अलग सक्रिय तत्व मौजूद हो सकते हैं। कैल्शियम या एल्यूमिनियम आधारित दवाओं के अधिक इस्तेमाल से कुछ लोगों को कब्ज की समस्या हो सकती है, जबकि मैग्नीशियम आधारित दवाओं से दस्त हो सकते हैं। लंबे समय तक या जरूरत से अधिक सेवन करने पर कुछ परिस्थितियों में शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन और किडनी के कामकाज पर भी असर पड़ सकता है।

    बार-बार एंटासिड या अन्य एसिड कम करने वाली दवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोगों में कुछ पोषक तत्वों के अवशोषण पर भी प्रभाव पड़ सकता है। लंबे समय तक एसिड कम करने वाली दवाओं के इस्तेमाल से कुछ लोगों में विटामिन बी12 या मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों की कमी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि इसका खतरा दवा के प्रकार, मात्रा, इस्तेमाल की अवधि और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए लंबे समय तक दवा लेने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    रोज खाली पेट एंटासिड लेने की सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह है कि इससे बार-बार होने वाली एसिडिटी के वास्तविक कारण की पहचान में देरी हो सकती है। लगातार सीने में जलन या खट्टी डकार गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज यानी जीईआरडी, गैस्ट्राइटिस या पेप्टिक अल्सर जैसी स्थितियों से जुड़ी हो सकती है। ऐसे मामलों में केवल एंटासिड लेकर लक्षणों को दबाते रहना समस्या के उचित मूल्यांकन में देरी कर सकता है।

    शुरुआती तौर पर लंबे या बार-बार इस्तेमाल के दौरान कब्ज, दस्त, पेट में असहजता, मतली या कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि इन लक्षणों का मतलब हमेशा एंटासिड से होने वाला नुकसान नहीं होता और इनके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसी तरह लगातार एसिडिटी बने रहना भी इस बात का संकेत हो सकता है कि दवा समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं कर रही है।

    एसिडिटी से राहत के लिए खान-पान और दिनचर्या में बदलाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भोजन कम मात्रा में और नियमित समय पर लेना, बहुत तला-भुना तथा मसालेदार भोजन कम करना, खाने के तुरंत बाद न लेटना और रात में सोने से कुछ घंटे पहले भोजन कर लेना मददगार हो सकता है। अधिक वजन होने की स्थिति में वजन कम करने से भी रिफ्लक्स के लक्षणों में सुधार हो सकता है।

    यदि एसिडिटी लगातार कई सप्ताह से बनी हुई है या बार-बार एंटासिड लेने की जरूरत पड़ती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। निगलने में कठिनाई, लगातार उल्टी, खून की उल्टी, काला मल, बिना कारण वजन कम होना या तेज सीने का दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। एंटासिड कभी-कभार राहत देने वाली दवा हो सकती है, लेकिन रोज खाली पेट इसकी जरूरत पड़ना समस्या के मूल कारण की जांच कराने का संकेत है।

  • रसोई में बची ताजी मिर्च से भी तैयार किया जा सकता है पौधा, सही नमी, धूप और देखभाल से अच्छी पैदावार संभव

    रसोई में बची ताजी मिर्च से भी तैयार किया जा सकता है पौधा, सही नमी, धूप और देखभाल से अच्छी पैदावार संभव

    नई दिल्ली । घर की रसोई में रखी हरी मिर्च का इस्तेमाल आमतौर पर सब्जी और चटनी का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है, लेकिन अगर आप चाहें तो इसी मिर्च की मदद से घर में नया पौधा तैयार करने की कोशिश भी कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए एक जरूरी बात समझना बेहद जरूरी है कि पूरी तरह बीजरहित मिर्च से सीधे नया पौधा तैयार नहीं किया जा सकता। पौधा विकसित करने के लिए मिर्च के अंदर मौजूद विकसित बीज या किसी उपयुक्त पौधे की कटिंग की जरूरत होती है। इसलिए बाजार से लाई गई मिर्च को इस्तेमाल करने से पहले उसके अंदर मौजूद छोटे बीजों को ध्यान से अलग किया जा सकता है।

    अगर मिर्च में बीज मौजूद हैं तो सबसे पहले उन्हें सावधानी से निकालकर साफ पानी से धो लें। इसके बाद बीजों को कुछ समय के लिए छाया में सुखाना बेहतर रहता है। बीजों में नमी पूरी तरह खत्म होने के बाद इन्हें हल्की और उपजाऊ मिट्टी में लगाया जा सकता है। मिर्च के बीजों को बहुत अधिक गहराई में दबाने की जरूरत नहीं होती। लगभग आधा सेंटीमीटर गहराई पर्याप्त रहती है।

    गमले का चुनाव भी पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। शुरुआत में छोटे गमले या सीडलिंग ट्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है। मिट्टी ऐसी होनी चाहिए जिसमें पानी आसानी से निकल सके और वह लंबे समय तक पानी से भरी न रहे। सामान्य गार्डन मिट्टी के साथ जैविक खाद और थोड़ी रेत या अन्य जलनिकासी वाली सामग्री मिलाने से मिट्टी को बेहतर बनाया जा सकता है।

    बीज लगाने के बाद मिट्टी में हल्की नमी बनाए रखना जरूरी है। बहुत ज्यादा पानी देने से बीज सड़ सकते हैं और नई जड़ें विकसित होने में परेशानी हो सकती है। गमले को ऐसी जगह रखें जहां पर्याप्त रोशनी और गर्माहट मिले। मिर्च के पौधे को अच्छी वृद्धि के लिए धूप पसंद होती है, इसलिए पर्याप्त प्रकाश मिलने पर पौधा मजबूत बनने की संभावना बढ़ती है।

    कुछ समय बाद जब छोटे पौधे दिखाई देने लगें और उनमें कई वास्तविक पत्तियां विकसित हो जाएं, तब उन्हें बड़े गमले में स्थानांतरित किया जा सकता है। पौधे को निकालते समय उसकी जड़ों को नुकसान न पहुंचाएं। बड़े गमले में लगाने के बाद मिट्टी को हल्का दबाएं और जरूरत के अनुसार पानी दें।

    मिर्च का पौधा बढ़ने के दौरान नियमित देखभाल मांगता है। जब पौधा पर्याप्त ऊंचाई हासिल कर ले तो उसकी ऊपरी बढ़त को हल्का पिंच करने से शाखाएं ज्यादा निकलने में मदद मिल सकती है। इससे पौधा अधिक घना हो सकता है और आगे चलकर उसमें ज्यादा फूल और मिर्च आने की संभावना बढ़ सकती है।

    फूल आने के समय पौधे को पोषक तत्वों की जरूरत बढ़ जाती है। इस दौरान अच्छी तरह सड़ी जैविक खाद या उपयुक्त संतुलित खाद का इस्तेमाल किया जा सकता है। मिट्टी में लगातार नमी बनाए रखें, लेकिन पानी जमा न होने दें। पौधे पर एफिड, सफेद मक्खी या अन्य छोटे कीट दिखाई दें तो समय रहते उनकी जांच और नियंत्रण करना जरूरी है।

    अच्छी धूप, सही मिट्टी, संतुलित पानी और नियमित देखभाल मिलने पर मिर्च का पौधा कुछ महीनों में फल देना शुरू कर सकता है। लगभग दो महीने में मिर्च आने का दावा परिस्थितियों और पौधे की किस्म पर निर्भर करता है, इसलिए हर पौधे में बिल्कुल इसी समय पर फल लगना जरूरी नहीं है। फल अच्छी लंबाई हासिल कर लें तो उन्हें हरा रहते हुए तोड़ा जा सकता है। नियमित रूप से तैयार मिर्च तोड़ने से पौधे पर नई फलियों के विकास को बढ़ावा मिल सकता है। इस तरह थोड़ी मेहनत और धैर्य के साथ बालकनी या छत के छोटे से हिस्से में भी घर की ताजी हरी मिर्च उगाई जा सकती है।