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  • कैंसर पर जोंटी रोड्स का बड़ा संदेश, फिटनेस के साथ सही खानपान और जीवनशैली को बताया अहम

    कैंसर पर जोंटी रोड्स का बड़ा संदेश, फिटनेस के साथ सही खानपान और जीवनशैली को बताया अहम


    नई दिल्ली । दक्षिण अफ्रीका के पूर्व क्रिकेटर जोंटी रोड्स ने कैंसर को लेकर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। अपने क्रिकेट करियर में शानदार फील्डिंग के लिए दुनिया भर में पहचान बनाने वाले रोड्स ने मुंबई में आयोजित एक कैंसर जागरूकता कार्यक्रम में जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े विकल्पों पर बात की। वह SSO Cancer Hospitals से ब्रांड एंबेसडर के तौर पर जुड़े हुए हैं और हाल ही में अस्पताल की ओर से शुरू किए गए Head and Neck Cancer Centre of Excellence के उद्घाटन कार्यक्रम में भी शामिल हुए।

    रोड्स ने कहा कि कैंसर जैसी बीमारी को केवल अचानक होने वाली समस्या के तौर पर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने अपनी बात रखते हुए आदतों तनाव और जीवनशैली से जुड़े फैसलों को स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे विकल्प चुनने चाहिए जो लंबे समय तक उसके स्वास्थ्य के लिए बेहतर साबित हों। हालांकि कैंसर के मामले में यह समझना भी जरूरी है कि बीमारी का कोई एक कारण नहीं होता और हर मरीज के कैंसर को उसकी जीवनशैली से जोड़ना सही नहीं है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैंसर कई तरह की बीमारियों का समूह है और इसके पीछे आनुवंशिक कारणों के साथ पर्यावरणीय और व्यवहार से जुड़े कई कारक हो सकते हैं। तंबाकू का सेवन शराब अस्वास्थ्यकर खानपान शारीरिक निष्क्रियता अधिक वजन वायु प्रदूषण और कुछ संक्रमण कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं। WHO के मुताबिक 2022 में दुनिया भर में कैंसर के नए मामलों में करीब 37 प्रतिशत मामले ऐसे कारणों से जुड़े थे जिन्हें रोकथाम की रणनीतियों के जरिए कम किया जा सकता है।

    रोड्स ने अपनी फिटनेस यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि खिलाड़ी होने के कारण व्यायाम और फिटनेस उनकी जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिट व्यक्ति को कैंसर नहीं हो सकता ऐसा कहना सही नहीं होगा। उनका संदेश मुख्य रूप से लोगों को अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक करने और बेहतर विकल्प चुनने पर केंद्रित था। दरअसल कैंसर का जोखिम कम करने के लिए केवल व्यायाम ही पर्याप्त नहीं है बल्कि तंबाकू से दूरी स्वस्थ वजन संतुलित खानपान नियमित शारीरिक गतिविधि और शराब से बचाव जैसे कई कदम महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    जोंटी रोड्स ने भारत में अपने परिवार के साथ लंबे समय तक रहने का अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह भारत को केवल एक पर्यटक के रूप में नहीं देखते। उन्होंने यहां लोगों की जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को करीब से देखने की बात कही। उनका उद्देश्य अपने अनुभव के जरिए लोगों को कैंसर के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने और समय रहते जागरूक होने के लिए प्रेरित करना है।

    कैंसर को लेकर जागरूकता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समय पर जांच और इलाज भी है। WHO के अनुसार कई तरह के कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने और उचित उपचार मिलने पर इलाज संभव है। यही वजह है कि शरीर में लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच और जोखिम कारकों को कम करने की कोशिश बीमारी के बोझ को घटाने में मदद कर सकती है।

    रोड्स ने कैंसर को लेकर डर के बजाय जागरूकता और सकारात्मक सोच पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत में कैंसर के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर और चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं और मरीजों को बीमारी का सामना हिम्मत के साथ करना चाहिए। उनका संदेश यही है कि स्वास्थ्य को लेकर छोटे लेकिन लगातार किए जाने वाले सही फैसले लंबे समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को कैंसर होने या न होने का फैसला केवल उसकी जीवनशैली से नहीं किया जा सकता और किसी भी लक्षण या जोखिम की स्थिति में डॉक्टर की सलाह ही सबसे महत्वपूर्ण है।

  • दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    नई दिल्ली :आधुनिक दौर में सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण अधिकांश लोग पतले दिखने को ही अच्छी फिटनेस का पर्याय मानने लगे हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल वजन कम होना या दुबला दिखना किसी व्यक्ति के पूर्ण स्वस्थ होने का प्रमाण नहीं है। वास्तविक फिटनेस का सीधा संबंध इस बात से है कि आपका शरीर दैनिक जीवन के कार्यों को कितनी सहजता और ऊर्जा के साथ पूरा करता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल बाहरी शारीरिक बनावट के आधार पर किसी के स्वास्थ्य का सही आकलन नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति दिखने में सामान्य या पतला है, लेकिन दिनभर सुस्ती महसूस करता है, सीढ़ियां चढ़ने में हांफने लगता है या उसकी नींद पूरी नहीं होती, तो उसे पूर्णतः स्वस्थ नहीं माना जा सकता। असली फिटनेस शरीर को क्रियाशील, ऊर्जावान और बीमारियों से मुक्त बनाए रखने में निहित है।

    शारीरिक क्षमता का परीक्षण दैनिक गतिविधियों से होता है। थोड़ा सा चलने, वजन उठाने या सामान्य मेहनत के काम करने पर अत्यधिक थकान या सांस फूलना खराब कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस का संकेत हो सकता है। यदि पहले की तुलना में सामान्य काम करने में भी परेशानी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय अपनी जीवनशैली और आहार में आवश्यक सुधार करना चाहिए।

    एक स्वस्थ शरीर के लिए लचीलापन और शारीरिक संतुलन भी बेहद महत्वपूर्ण घटक हैं। बिना किसी कठिनाई के झुकना, मुड़ना और दैनिक गतिविधियों के दौरान संतुलन बनाए रखना अच्छी शारीरिक स्थिति को दर्शाता है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर की स्थिरता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से हल्का व्यायाम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।

    शारीरिक संकेतकों की बात करें तो रेस्टिंग हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पैमाना हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, सामान्य स्थिति में नियंत्रित ब्लड प्रेशर और स्थिर हृदय गति अंदरूनी रूप से मजबूत शरीर का संकेत देती है। बाहर से फिट दिखने वाले व्यक्ति भी उच्च रक्तचाप या अन्य आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो सकते हैं, इसलिए नियमित जांच आवश्यक है।

    शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का संतुलन भी उतना ही अनिवार्य है। अत्यधिक तनाव, चिड़चिड़ापन या उदासी व्यक्ति की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि न केवल मांसपेशियों को मजबूत करती है, बल्कि मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग केवल वजन घटाने वाले भ्रामक पैमानों के पीछे न भागें। संतुलित पोषण, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनावमुक्त दिनचर्या को अपनाकर ही वास्तविक फिटनेस हासिल की जा सकती है। अपने शरीर के संकेतों को समझना और आंतरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना ही लंबे समय तक स्वस्थ रहने का सबसे कारगर तरीका है।

  • शरीर में बढ़ रही है पेट की चर्बी तो न करें नजरअंदाज, ब्लड शुगर बढ़ने के साथ बढ़ सकता है बीमारियों का जोखिम

    शरीर में बढ़ रही है पेट की चर्बी तो न करें नजरअंदाज, ब्लड शुगर बढ़ने के साथ बढ़ सकता है बीमारियों का जोखिम


    नई दिल्ली । आज की बदलती जीवनशैली में वजन बढ़ना और ब्लड शुगर का असंतुलन तेजी से चिंता का विषय बनता जा रहा है। लंबे समय तक बैठकर काम करना कम शारीरिक गतिविधि करना और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाला भोजन लेना शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने का कारण बन सकता है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी को मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है। शोधों में पेट की चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध भी सामने आया है। इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति सामान्य तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करतीं जिससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

    जब शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा खर्च नहीं हो पाती है तो उसका कुछ हिस्सा फैट के रूप में जमा होने लगता है। लगातार वजन बढ़ना और खासकर कमर के आसपास चर्बी बढ़ना टाइप 2 डायबिटीज और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं के जोखिम से जुड़ा पाया गया है। भारत में हुए अध्ययनों की समीक्षा में भी अधिक वजन और मोटापे को मेटाबॉलिक सिंड्रोम के ज्यादा जोखिम से जोड़ा गया है। इसलिए केवल वजन मशीन पर दिखने वाले आंकड़े पर ध्यान देने के बजाय कमर के आसपास बढ़ती चर्बी और पूरी जीवनशैली पर नजर रखना भी जरूरी है।

    दूसरी ओर ब्लड शुगर शरीर के लिए ऊर्जा का जरूरी स्रोत है लेकिन इसका स्तर लंबे समय तक सामान्य सीमा से अधिक रहना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। टाइप 2 डायबिटीज में इंसुलिन का प्रभाव कम हो सकता है और समय के साथ शरीर के लिए ब्लड ग्लूकोज को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। लगातार हाई ब्लड शुगर रहने पर रक्त वाहिकाओं और नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटीज का लंबे समय तक खराब नियंत्रण हृदय रोग स्ट्रोक किडनी की बीमारी और आंखों से जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।

    फैट और शुगर के इस संबंध को समझने के लिए इंसुलिन रेजिस्टेंस को समझना जरूरी है। जब शरीर में अतिरिक्त फैटी एसिड का बोझ बढ़ता है तो इसका असर मांसपेशियों लिवर और शरीर के दूसरे हिस्सों में ग्लूकोज के इस्तेमाल पर पड़ सकता है। इससे इंसुलिन सिग्नलिंग प्रभावित हो सकती है और ब्लड शुगर बढ़ने की स्थिति बन सकती है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता और आनुवंशिकता उम्र नींद तनाव खानपान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई कारक भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

    इस जोखिम को कम करने के लिए सबसे पहले रोजमर्रा की गतिविधियों को बेहतर बनाना जरूरी है। नियमित तेज चाल से चलना साइकिल चलाना तैराकी या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी शारीरिक गतिविधियां की जा सकती हैं। वयस्कों के लिए सामान्य स्वास्थ्य लाभ के लिहाज से हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि और सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधि की सलाह दी जाती है।

    खानपान में भी संतुलन जरूरी है। अत्यधिक मीठे पेय पदार्थों और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाले भोजन को सीमित करना और भोजन में सब्जियों दालों साबुत अनाज तथा पर्याप्त प्रोटीन जैसे पौष्टिक विकल्पों को शामिल करना मददगार हो सकता है। केवल किसी एक भोजन को छोड़ देने या लंबे समय तक भूखे रहने को हर व्यक्ति के लिए जरूरी उपाय नहीं माना जाना चाहिए। खासकर डायबिटीज गर्भावस्था या किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों को डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेनी चाहिए।

    अगर वजन लगातार बढ़ रहा है कमर का घेरा बढ़ रहा है या बार बार ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा मिल रहा है तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है। समय रहते वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और ब्लड शुगर पर ध्यान देने से मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि केवल सुबह खाली पेट 20 मिनट चलने या किसी एक खास डाइट से सभी लोगों में फैट और शुगर तेजी से कम होने की गारंटी नहीं होती। स्वास्थ्य संबंधी बदलाव व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किए जाने चाहिए।

  • रक्तदान से पहले डॉक्टर की ये बातें जरूर जान लें, कौन दे सकता है ब्लड और किसे करना चाहिए परहेज

    रक्तदान से पहले डॉक्टर की ये बातें जरूर जान लें, कौन दे सकता है ब्लड और किसे करना चाहिए परहेज


    नई दिल्ली । रक्तदान को जीवन बचाने वाला सबसे बड़ा सामाजिक योगदान माना जाता है। एक यूनिट रक्त को अलग अलग घटकों में इस्तेमाल किया जाए तो इससे एक से अधिक मरीजों की मदद हो सकती है। यही वजह है कि अस्पतालों और ब्लड बैंकों की ओर से लोगों को नियमित रक्तदान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि रक्तदान करने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि हर व्यक्ति ब्लड डोनेट करने के लिए योग्य नहीं होता। शरीर की सामान्य स्थिति उम्र वजन और स्वास्थ्य से जुड़े कई मानकों की जांच के बाद ही रक्तदान की अनुमति दी जाती है। भारत सरकार के e-RaktKosh के अनुसार सामान्य तौर पर स्वस्थ व्यक्ति की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए और उसका वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

    रक्तदान से पहले ब्लड बैंक में व्यक्ति की सामान्य स्वास्थ्य जांच की जाती है। इसमें मेडिकल हिस्ट्री के साथ ब्लड प्रेशर पल्स और शरीर का तापमान देखा जाता है। इसके अलावा उंगली से लिए गए रक्त के नमूने से हीमोग्लोबिन या आयरन की पर्याप्तता की जांच की जाती है। यदि जांच में कोई ऐसी स्थिति सामने आती है जिसमें रक्तदान करना सुरक्षित नहीं है तो व्यक्ति को उस समय रक्तदान से रोक दिया जाता है। इसलिए केवल उम्र और वजन सही होना ही पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए।

    आम तौर पर स्वस्थ वयस्क रक्तदान कर सकते हैं लेकिन यदि किसी व्यक्ति को गंभीर एनीमिया है या वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है तो उसे रक्तदान से बचना चाहिए। हाल ही में हुई सर्जरी या कुछ चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के बाद भी कुछ समय तक रक्तदान टाला जा सकता है। इसी तरह कुछ संक्रमणों और स्वास्थ्य स्थितियों में डॉक्टर या ब्लड बैंक की मेडिकल टीम रक्तदान को अस्थायी या स्थायी रूप से रोक सकती है। इसलिए यदि आप किसी बीमारी का इलाज करा रहे हैं या नियमित दवाएं लेते हैं तो रक्तदान से पहले इसकी जानकारी ब्लड बैंक के चिकित्सकीय स्टाफ को देना जरूरी है।

    गर्भावस्था के दौरान रक्तदान नहीं किया जाता। डिलीवरी के बाद भी महिला को तुरंत रक्तदान नहीं करना चाहिए और उचित समय तथा स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार ही दोबारा रक्तदान किया जाना चाहिए। इसी तरह हाल में टीकाकरण या टैटू जैसी कुछ परिस्थितियों में भी रक्तदान कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। इन मामलों में प्रतीक्षा की अवधि हर स्थिति के लिए एक जैसी नहीं होती इसलिए अंतिम निर्णय संबंधित ब्लड सेंटर की मेडिकल स्क्रीनिंग के आधार पर लिया जाना चाहिए।

    रक्तदान से पहले कुछ सामान्य सावधानियां भी मददगार होती हैं। खाली पेट रक्तदान करने से बचना चाहिए और पर्याप्त पानी पीना चाहिए। अच्छी नींद लेना भी जरूरी है। रक्तदान से पहले हल्का और संतुलित भोजन करना बेहतर माना जाता है। शराब का सेवन करके रक्तदान करने से बचना चाहिए। रक्तदान के बाद भी शरीर को पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ देना चाहिए। e-RaktKosh के अनुसार रक्तदान के बाद अगले 24 से 48 घंटे तक तरल पदार्थ बढ़ाने और कुछ समय तक भारी शारीरिक मेहनत तथा वजन उठाने से बचने की सलाह दी जाती है।

    रक्तदान के दौरान किसी तरह की कमजोरी या चक्कर महसूस हो तो तुरंत मेडिकल स्टाफ को बताना चाहिए। रक्तदान के बाद कुछ देर आराम करना और उपलब्ध कराए गए हल्के जलपान का सेवन करना उपयोगी होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रक्तदान नेक काम जरूर है लेकिन इसे केवल उत्साह में आकर नहीं करना चाहिए। अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सही जानकारी देकर ही रक्तदान करें। अंतिम पात्रता का निर्णय ब्लड बैंक की मेडिकल स्क्रीनिंग और लागू रक्तदान दिशानिर्देशों के अनुसार होता है।

  • डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    नई दिल्ली । मौसम में बदलाव और संक्रामक बीमारियों के प्रसार के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेंगू और स्वाइन फ्लू अर्थात एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के मामले सामने आ रहे हैं। दोनों ही बीमारियों में तेज बुखार, सिरदर्द और शारीरिक दर्द जैसे शुरुआती लक्षण एक समान प्रतीत होते हैं। इस कारण आम नागरिकों के लिए शुरुआती चरण में इनके बीच अंतर समझ पाना कठिन हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों बीमारियों के फैलने के कारण और इनके संक्रमण का माध्यम पूरी तरह से भिन्न हैं।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के बीच सबसे बड़ा बुनियादी अंतर इनके संचरण की प्रक्रिया में निहित है। डेंगू का प्रसार संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो मुख्य रूप से साफ और ठहरे हुए पानी में पनपते हैं। इसके विपरीत, स्वाइन फ्लू एक श्वसन संबंधी वायरस संक्रमण है जो किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने अथवा छींकने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से हवा में आसानी से फैलता है। इसी वजह से दोनों बीमारियों की रोकथाम के लिए अलग-अलग सावधानियां बरतनी आवश्यक होती हैं।

    स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, डेंगू के मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार आना, आंखों के पिछले हिस्से में तीव्र दर्द, मांसपेशियों तथा जोड़ों में ऐंठन, उल्टी आना और त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना शामिल हैं। इसके लक्षण आमतौर पर मच्छर के काटने के चार से दस दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं और यह स्थिति एक सप्ताह तक बनी रह सकती है। गंभीर स्थिति में पेट दर्द, मसूड़ों या नाक से रक्तस्राव और सांस लेने में तकलीफ जैसे चेतावनी संकेत भी उभर सकते हैं।

    दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू के लक्षणों में अचानक बुखार के साथ सूखी खांसी, गले में खराश, ठंड लगना, अत्यधिक थकान और नाक बहना शामिल हैं। कुछ मरीजों में पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे उल्टी या दस्त भी देखे जा सकते हैं। यदि समय पर इस स्थिति का प्रबंधन न किया जाए तो यह बढ़कर निमोनिया का रूप ले सकती है, जिससे श्वसन तंत्र पर गंभीर असर पड़ता है।

    दोनों ही बीमारियों के उपचार में सटीक चिकित्सीय परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेंगू की पुष्टि के लिए विशिष्ट रक्त जांच की आवश्यकता होती है, जिससे प्लेटलेट्स की संख्या और एंटीजन की स्थिति का पता चलता है। वहीं स्वाइन फ्लू का निदान रोगी के क्लिनिकल मूल्यांकन और स्वाब टेस्ट के आधार पर किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का लक्षण उभरने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल योग्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत और पर्यावरणीय स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। डेंगू से बचने के लिए घरों और आसपास जलभराव न होने देना और मच्छर रोधी उपायों का प्रयोग करना प्रभावी होता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्वाइन फ्लू से सुरक्षा के लिए हाथों की नियमित सफाई, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर सावधानी और चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार टीकाकरण कराने की सलाह दी जाती है।

  • बालों की चमक और मजबूती बढ़ाने के लिए घर पर बनाएं ये 8 आसान हेयर रिंस, जानें इस्तेमाल करने का सही तरीका

    बालों की चमक और मजबूती बढ़ाने के लिए घर पर बनाएं ये 8 आसान हेयर रिंस, जानें इस्तेमाल करने का सही तरीका

    नई दिल्ली । बालों की चमक, मुलायमपन और खूबसूरती बनाए रखने के लिए नियमित हेयर केयर रूटीन जरूरी है। बदलते मौसम, धूल, प्रदूषण और बालों में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग उत्पादों के कारण कई बार बाल रूखे और बेजान नजर आने लगते हैं। ऐसे में महंगे उत्पादों के अलावा कुछ आसान घरेलू रिंस भी सामान्य हेयर केयर रूटीन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। रोजमेरी, आंवला, चावल और ग्रीन टी जैसी चीजों से घर पर आसानी से रिंस तैयार किया जा सकता है।

    ग्रीन टी रिंस बालों और स्कैल्प की सामान्य देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इसे तैयार करने के लिए ग्रीन टी बनाकर पूरी तरह ठंडा कर लें। बालों में शैंपू करने के बाद इसे अंतिम रिंस के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को पहली बार इस्तेमाल करने से पहले थोड़ी मात्रा में परीक्षण करना चाहिए।

    राइस वॉटर यानी चावल का पानी भी बालों की देखभाल में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसे बालों में लगाने से बालों में मुलायमपन और स्मूदनेस महसूस हो सकती है। चावल को पानी में भिगोकर या उबालकर तैयार किए गए पानी को ठंडा करने के बाद इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे बालों पर लगाने के बाद कुछ समय तक रखने के बजाय अच्छी तरह धोना बेहतर है।

    आंवला वॉटर भी पारंपरिक हेयर केयर का हिस्सा रहा है। आंवले में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं और इसका इस्तेमाल बालों की सामान्य देखभाल के लिए किया जाता है। आंवले को पानी में उबालकर या आंवला पाउडर को पानी में मिलाकर रिंस तैयार किया जा सकता है। इसे बालों की लंबाई और स्कैल्प पर लगाया जा सकता है।

    रोजमेरी वॉटर इन दिनों हेयर केयर रूटीन में काफी लोकप्रिय है। इसे रोजमेरी की पत्तियों को पानी में उबालकर तैयार किया जा सकता है। पानी ठंडा होने के बाद इसे छानकर बालों पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि किसी भी हर्बल मिश्रण से हर व्यक्ति को एक जैसा फायदा मिले, यह जरूरी नहीं है। जलन या लालिमा महसूस होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    मेथी वॉटर भी रूखे बालों की सामान्य देखभाल में इस्तेमाल किया जा सकता है। मेथी के दानों को कुछ घंटे पानी में भिगोकर रखने के बाद पानी छान लें। तैयार पानी को बालों पर लगाया जा सकता है। मेथी का इस्तेमाल बालों को मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे लगाने के बाद बालों को अच्छी तरह साफ करना जरूरी है।

    प्याज का पानी भी घरेलू हेयर केयर में इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग इसे बालों की ग्रोथ और स्कैल्प केयर के लिए आजमाते हैं। हालांकि प्याज का रस या पानी कुछ लोगों की त्वचा में जलन पैदा कर सकता है। इसलिए इसे लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है और तेज जलन या खुजली होने पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    एलोवेरा रिंस ड्राई स्कैल्प और बेजान बालों की सामान्य देखभाल में उपयोगी हो सकता है। एलोवेरा जेल को पानी में अच्छी तरह मिलाकर हल्का मिश्रण तैयार किया जा सकता है। इसे बालों पर लगाने के बाद अच्छी तरह धोना चाहिए, ताकि कोई अवशेष न रह जाए।

    केला और तेल आधारित रिंस या हेयर पैक भी रूखे बालों में नमी और मुलायमपन देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। केले को अच्छी तरह मैश करके थोड़ी मात्रा में तेल मिलाया जा सकता है। इसे मुख्य रूप से बालों की लंबाई पर लगाया जाए और कुछ समय बाद अच्छी तरह धो लिया जाए। इस्तेमाल से पहले किसी भी घरेलू मिश्रण का पैच टेस्ट करना बेहतर है। खुजली, जलन, लालिमा या सूजन होने पर इसे तुरंत धो दें। लगातार बाल झड़ने या स्कैल्प संबंधी समस्या रहने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • घर पर सिर्फ 15 मिनट में बनाएं होटल जैसा खिला-खिला जीरा राइस, स्वाद और खुशबू से मेहमान भी पूछेंगे रेसिपी

    घर पर सिर्फ 15 मिनट में बनाएं होटल जैसा खिला-खिला जीरा राइस, स्वाद और खुशबू से मेहमान भी पूछेंगे रेसिपी

    नई दिल्ली । घर पर मेहमान आने वाले हों और खाने की टेबल पर कुछ स्वादिष्ट और खास परोसना हो तो जीरा राइस एक बेहतरीन विकल्प है। इसकी खुशबूदार महक, लंबे और खिले-खिले चावल के दाने और घी में भुने जीरे का स्वाद साधारण खाने को भी खास बना देता है। अच्छी बात यह है कि सही तरीका अपनाकर इसे घर पर कम समय में आसानी से तैयार किया जा सकता है।

    जीरा राइस बनाने के लिए सबसे पहले लंबे दाने वाले बासमती चावल लें। करीब दो कप चावल को दो से तीन बार साफ पानी से धो लें, ताकि अतिरिक्त स्टार्च निकल जाए। इसके बाद चावल को लगभग 15 से 20 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रखें। इससे चावल के दाने अच्छी तरह फूलते हैं और पकने के बाद लंबे दिखाई देते हैं।

    अब चावल को पर्याप्त पानी और थोड़ा नमक डालकर पकाएं। ध्यान रखें कि चावल को पूरी तरह गलने तक न पकाएं। जीरा राइस के लिए चावल लगभग 90 प्रतिशत पकना चाहिए। जब दाने अंदर से हल्के कड़े रहें, तब अतिरिक्त पानी निकाल दें। पके हुए चावल को कुछ देर खुला रखने से उनकी भाप निकल जाएगी और वे आपस में चिपकेंगे नहीं।

    अब एक चौड़ी कड़ाही या पैन को मध्यम आंच पर गर्म करें। इसमें करीब दो बड़े चम्मच घी डालें। घी गर्म होने के बाद उसमें एक से डेढ़ चम्मच जीरा डालें। जब जीरा चटकने लगे तो इसमें तेजपत्ता, हरी इलायची, छोटी दालचीनी और लौंग डालकर कुछ सेकंड भूनें। इसके बाद लंबाई में कटी हुई हरी मिर्च डालें। साबुत मसालों का यह तड़का जीरा राइस की खुशबू को काफी बढ़ा देता है।

    तड़का तैयार होने के बाद पके हुए चावल को कड़ाही में धीरे-धीरे डालें। यहां सबसे ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत होती है। चावल को तेज हाथ से चलाने के बजाय हल्के हाथ से पलटें। ज्यादा चलाने से बासमती के लंबे दाने टूट सकते हैं और चावल देखने में चिपचिपे लगने लगते हैं।

    अब स्वाद के अनुसार नमक डालें और थोड़ा सा नींबू का रस मिलाएं। नींबू की हल्की खटास जीरा राइस के स्वाद को संतुलित करने में मदद करती है। इसके बाद कड़ाही को ढककर धीमी आंच पर करीब दो से तीन मिनट तक पकाएं। फिर गैस बंद कर दें और चावल को कुछ मिनट के लिए ढका रहने दें।

    जीरा राइस को होटल जैसा बनाने की सबसे महत्वपूर्ण ट्रिक यही है कि चावल ज्यादा न पकाएं और उन्हें तड़के के साथ मिलाते समय ज्यादा न चलाएं। साथ ही चौड़े बर्तन का इस्तेमाल करने से चावल आसानी से फैल जाते हैं और दाने टूटने की संभावना कम रहती है। घी में जीरे और साबुत मसालों को सही समय तक भूनना भी इसके स्वाद में बड़ा अंतर पैदा करता है।

    तैयार जीरा राइस को ऊपर से बारीक कटे हरे धनिये से सजाकर गरमा-गरम परोसें। इसे दाल तड़का, राजमा, छोले, मटर पनीर या शाही पनीर के साथ सर्व किया जा सकता है। चाहें तो परोसते समय ऊपर से थोड़ा गर्म घी डाल सकते हैं। इस आसान तरीके से घर पर तैयार जीरा राइस न केवल स्वादिष्ट लगेगा, बल्कि इसके लंबे और अलग-अलग दाने इसे बिल्कुल होटल स्टाइल लुक भी देंगे।

  • वॉशिंग मशीन में ज्यादा डिटर्जेंट डालना कपड़ों की सफाई नहीं बढ़ाता, मशीन के ड्रम और ड्रेनेज सिस्टम को पहुंचा सकता है नुकसान

    वॉशिंग मशीन में ज्यादा डिटर्जेंट डालना कपड़ों की सफाई नहीं बढ़ाता, मशीन के ड्रम और ड्रेनेज सिस्टम को पहुंचा सकता है नुकसान

    नई दिल्ली । वॉशिंग मशीन ने कपड़े धोने का काम काफी आसान कर दिया है, लेकिन मशीन का सही इस्तेमाल न किया जाए तो सुविधा देने वाला यह उपकरण धीरे-धीरे खराब भी हो सकता है। ऐसी ही एक आम गलती जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट डालना है। कई लोगों को लगता है कि अधिक डिटर्जेंट से कपड़े ज्यादा साफ और चमकदार होंगे, जबकि वास्तविकता में ज्यादा डिटर्जेंट सफाई बढ़ाने के बजाय कपड़ों और मशीन दोनों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।

    वॉशिंग मशीन में आवश्यकता से अधिक डिटर्जेंट डालने पर सामान्य से ज्यादा झाग बन सकता है। यह झाग कपड़ों के रेशों के बीच फंस सकता है और कई बार पूरी तरह पानी के साथ बाहर नहीं निकल पाता। इसका असर कपड़ों पर सफेद अवशेष, कड़ापन या अजीब गंध के रूप में दिखाई दे सकता है। खासकर गहरे रंग के कपड़ों पर डिटर्जेंट के निशान आसानी से नजर आ सकते हैं।

    अतिरिक्त डिटर्जेंट का असर केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक ज्यादा डिटर्जेंट इस्तेमाल करने पर इसके अवशेष मशीन के ड्रम, पाइप, फिल्टर और ड्रेनेज सिस्टम के कुछ हिस्सों में जमा हो सकते हैं। इससे पानी की निकासी प्रभावित हो सकती है और मशीन को अपना सामान्य चक्र पूरा करने में परेशानी हो सकती है।

    मशीन के अंदर लगातार नमी और डिटर्जेंट के अवशेष जमा होने से रबर गैसकेट और दूसरे हिस्सों के आसपास गंदगी तथा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण भी बन सकता है। इसका एक संकेत मशीन के अंदर से आने वाली बदबू हो सकता है। खासकर फ्रंट लोड मशीन में दरवाजे के आसपास मौजूद रबर सील की नियमित सफाई नहीं करने पर यह समस्या अधिक महसूस हो सकती है।

    डिटर्जेंट की सही मात्रा हर स्थिति में एक जैसी नहीं होती। यह मशीन के प्रकार, कपड़ों की संख्या, पानी की गुणवत्ता और कपड़ों पर मौजूद गंदगी की मात्रा पर निर्भर करती है। इसलिए डिटर्जेंट के पैकेट पर दिए गए निर्देश और वॉशिंग मशीन के निर्माता की सलाह को प्राथमिकता देना बेहतर होता है।

    फ्रंट लोड मशीनें सामान्यतः कम पानी का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए इनमें अत्यधिक डिटर्जेंट डालने से झाग बनने की समस्या ज्यादा हो सकती है। दूसरी ओर टॉप लोड मशीनों में पानी की मात्रा अलग होती है, इसलिए डिटर्जेंट की जरूरत भी मशीन और उसके वॉश प्रोग्राम के अनुसार बदल सकती है।

    अगर कपड़े बहुत ज्यादा गंदे हैं तो केवल डिटर्जेंट की मात्रा बढ़ाना सही तरीका नहीं है। कपड़ों को उपयुक्त तरीके से पहले भिगोना या मशीन में सही वॉश प्रोग्राम चुनना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे कम डिटर्जेंट में भी प्रभावी सफाई मिल सकती है।

    मशीन की बेहतर कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए डिटर्जेंट डालने वाले ड्रॉअर, फिल्टर और रबर सील की समय-समय पर सफाई करना भी जरूरी है। वॉशिंग साइकल पूरा होने के बाद मशीन का दरवाजा कुछ समय खुला रखने से अंदर की नमी कम होने में मदद मिल सकती है।

    इसलिए अगली बार कपड़े ज्यादा साफ करने के इरादे से डिटर्जेंट की मात्रा बढ़ाने से पहले मशीन और डिटर्जेंट के निर्देश जरूर देखें। सही मात्रा में डिटर्जेंट का इस्तेमाल न केवल कपड़ों पर अवशेष और बदबू की समस्या कम कर सकता है, बल्कि मशीन की सफाई व्यवस्था और लंबे समय तक उसकी कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद कर सकता है।

  • मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    नई दिल्ली ।देश के कुछ हिस्सों में मानसून और बदलते मौसम के बीच इन्फ्लूएंजा ए H1N1, जिसे आमतौर पर स्वाइन फ्लू कहा जाता है, के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। दिल्ली में भी इस साल संक्रमण के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 6 अगस्त 2026 तक राजधानी में H1N1 के 1,349 पुष्ट मामले सामने आ चुके थे। इसके बाद कुछ अस्पतालों में भी ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी सामने आई है।

    स्वाइन फ्लू एक वायरल श्वसन संक्रमण है, जिसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे दिखाई दे सकते हैं। मानसून के दौरान मौसम में बदलाव, तापमान में उतार-चढ़ाव और लोगों के बीच संपर्क बढ़ने जैसी परिस्थितियां श्वसन संक्रमण के फैलाव के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती हैं। हालांकि, ज्यादातर मामलों में बीमारी हल्की रहती है और उचित आराम, निगरानी तथा चिकित्सकीय सलाह से मरीज ठीक हो जाते हैं।

    स्वाइन फ्लू का खतरा सभी लोगों को हो सकता है, लेकिन कुछ समूहों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग विशेष सावधानी की श्रेणी में आते हैं। इनके अलावा पहले से फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, डायबिटीज या किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या वाले मरीजों में भी जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है।

    H1N1 संक्रमण होने पर अचानक बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द, थकान और नाक से संबंधित परेशानी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों में लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं, जबकि जोखिम वाले लोगों में बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों को सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    विशेष रूप से सांस लेने में परेशानी, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, सीने में बेचैनी, अत्यधिक कमजोरी, असामान्य रूप से ज्यादा नींद आना या तेजी से बिगड़ती तबीयत गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को जल्द चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से गंभीर बीमारी वाले मरीजों में लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    स्वाइन फ्लू के उपचार में मरीज की स्थिति और लक्षणों के आधार पर चिकित्सा प्रबंधन किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर शुरुआती चरण में ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवा की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, दवा की जरूरत, उसकी मात्रा और उपचार की अवधि मरीज की स्थिति देखकर चिकित्सक तय करते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर खुद से एंटीवायरल या अन्य दवाएं लेना उचित नहीं है।

    संक्रमण से बचाव के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा बीमार व्यक्ति के संपर्क में अनावश्यक रूप से आने से बचना महत्वपूर्ण है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। संक्रमित व्यक्ति को भी दूसरों से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि संक्रमण फैलने का खतरा कम किया जा सके।

    फ्लू से बचाव के लिए टीकाकरण भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे लेकर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बदलते मौसम के दौरान सावधानी, शुरुआती लक्षणों पर निगरानी और जोखिम वाले लोगों की समय पर चिकित्सकीय जांच संक्रमण को गंभीर होने से रोकने में मदद कर सकती है।

  • पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    नई दिल्ली ।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पेट की गहराई में जमा होने वाली आंतरिक चर्बी यानी विसरल फैट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाले सामान्य फैट से पूरी तरह भिन्न होती है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, आंत और अग्न्याशय के आसपास जमा होती है।

    चिकित्सकों के मुताबिक देखने में सामान्य या पतले नजर आने वाले व्यक्तियों में भी विसरल फैट की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को थिन आउटसाइड-फैट इनसाइड कहा जाता है। कमर का घेरा बढ़ना और पेट का बाहर निकलना इस समस्या का प्रमुख प्राथमिक संकेत हो सकता है।

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि शरीर में विसरल फैट की अत्यधिक मात्रा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। इससे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो सकता है।

    इसके अतिरिक्त यह आंतरिक चर्बी शरीर में पुरानी सूजन और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बनती है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों में बदल सकता है।

    असंतुलित खानपान, बहुत ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधि की कमी को विसरल फैट बढ़ने का मुख्य कारण माना गया है। घंटों बैठकर काम करने की आधुनिक जीवनशैली के कारण दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित देश भर के शहरी इलाकों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम जैसे वॉक, साइकिलिंग और एरोबिक्स बेहद जरूरी हैं। साथ ही आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों, हरी सब्जियों और साबुत अनाज को शामिल कर तथा मीठे पेय पदार्थों से परहेज रखकर इस जोखिम से बचा जा सकता है।