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  • मानसून में तुलसी की सही देखभाल से बनी रहेगी हरियाली, इन आसान उपायों से पौधा रहेगा स्वस्थ और मजबूत

    मानसून में तुलसी की सही देखभाल से बनी रहेगी हरियाली, इन आसान उपायों से पौधा रहेगा स्वस्थ और मजबूत

    नई दिल्ली । भारतीय घरों में तुलसी का पौधा धार्मिक आस्था के साथ-साथ औषधीय गुणों और पर्यावरणीय महत्व के कारण विशेष स्थान रखता है। मानसून के मौसम में लगातार बारिश, अधिक नमी और सीमित धूप के कारण इस पौधे की देखभाल सामान्य दिनों की तुलना में अधिक आवश्यक हो जाती है। यदि इस दौरान उचित सावधानी न बरती जाए तो पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, जड़ों में सड़न आ सकती है और उसकी वृद्धि प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सरल उपाय अपनाकर बारिश के मौसम में भी तुलसी को स्वस्थ और हरा-भरा बनाए रखा जा सकता है।

    मानसून में सबसे पहले सिंचाई पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। लगातार वर्षा के कारण मिट्टी में पहले से ही पर्याप्त नमी रहती है, इसलिए रोजाना पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। पौधे में पानी डालने से पहले मिट्टी की ऊपरी सतह की नमी अवश्य जांच लेनी चाहिए। यदि मिट्टी गीली महसूस हो रही है तो अतिरिक्त पानी देने से बचना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक नमी जड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है।

    तुलसी के पौधे के लिए अच्छी जल निकासी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गमले के नीचे पर्याप्त छेद होने चाहिए ताकि अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके। यदि गमले में लंबे समय तक पानी जमा रहता है तो जड़ों में फफूंद और सड़न की समस्या उत्पन्न हो सकती है। गमले के नीचे रखी ट्रे में जमा पानी को भी समय-समय पर खाली करना लाभदायक माना जाता है।

    बारिश के दिनों में धूप कम मिलने के बावजूद जब भी मौसम साफ हो, पौधे को कुछ घंटों के लिए प्राकृतिक सूर्य प्रकाश में रखना चाहिए। प्रतिदिन तीन से चार घंटे की हल्की धूप मिलने से पौधे की वृद्धि बेहतर होती है और नई पत्तियों का विकास तेजी से होता है। पर्याप्त रोशनी मिलने से पौधे की प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत बनी रहती है।

    पौधे की नियमित सफाई और छंटाई भी मानसून के दौरान आवश्यक होती है। पीली, सूखी या रोगग्रस्त पत्तियों को समय-समय पर हटाने से पौधे की ऊर्जा नई शाखाओं और स्वस्थ पत्तियों के विकास में लगती है। इसके साथ ही संक्रमण फैलने की संभावना भी काफी कम हो जाती है और पौधा अधिक समय तक स्वस्थ बना रहता है।

    अधिक नमी के कारण इस मौसम में फफूंद और छोटे कीड़ों का खतरा बढ़ जाता है। यदि पत्तियों पर सफेद धब्बे, फफूंदी या कीट दिखाई दें तो तुरंत आवश्यक उपाय करने चाहिए। जैविक विकल्प के रूप में नीम के तेल का हल्का घोल उपयोग किया जा सकता है, जो पौधे को नुकसान पहुंचाए बिना कीटों और फफूंद को नियंत्रित करने में सहायक माना जाता है।

    पौधे को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने के लिए समय-समय पर जैविक खाद का उपयोग भी लाभकारी होता है। महीने में एक बार सीमित मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट या अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद डालने से पौधे की वृद्धि बेहतर होती है। हालांकि अत्यधिक खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे जड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उचित सिंचाई, पर्याप्त धूप, साफ-सफाई और संतुलित पोषण के साथ मानसून के दौरान भी तुलसी का पौधा लंबे समय तक स्वस्थ, हरा-भरा और आकर्षक बना रह सकता है।

  • गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

    गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य


    नई दिल्ली । गर्भावस्था का समय किसी भी महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान खानपान से लेकर जीवनशैली तक हर छोटी बड़ी बात का सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अब ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस नई दिल्ली की अगुवाई में हुई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉस्मेटिक्स पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और प्लास्टिक से जुड़े रसायन गर्भवती महिलाओं के शरीर में जमा होकर हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है।

    इस शोध में 641 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। गर्भावस्था के अलग अलग चरणों में उनके यूरिन सैंपल की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में कौन कौन से रसायन मौजूद हैं। जांच के दौरान सबसे अधिक मात्रा मिथाइलपैराबेन नामक रसायन की पाई गई। यह एक प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल सामान्य रूप से स्किन केयर प्रोडक्ट्स लोशन फेस क्रीम शैंपू मेकअप और अन्य पर्सनल केयर उत्पादों में किया जाता है।

    शोधकर्ताओं को मोनोएथाइल फ्थेलेट नामक रसायन भी अधिक मात्रा में मिला। यह रसायन प्लास्टिक उत्पादों और सिंथेटिक खुशबू वाले कई सामानों में इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रसायन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक पाया गया। यही वह समय होता है जब गर्भ में पल रहे शिशु के अंगों और शरीर का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील चरण में यदि हार्मोन के कार्य में किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

    एम्स के विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के शरीर में इन रसायनों का स्तर अधिक पाया गया उनके नवजात शिशुओं के जन्म के समय वजन लंबाई और विटामिन डी के स्तर में भी अंतर देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। इन निष्कर्षों की पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में और बड़े स्तर पर विस्तृत शोध किए जाने की आवश्यकता होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अनावश्यक कॉस्मेटिक्स के उपयोग से बचना चाहिए और जहां तक संभव हो कम रसायन वाले या सुरक्षित उत्पादों का चयन करना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग में लंबे समय तक भोजन रखने से भी बचना बेहतर हो सकता है। प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने से संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में ऐसे रसायनों के उपयोग और उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ताओं विशेषकर गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध हो सकें। जागरूकता बढ़ाने के साथ यदि महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उत्पादों का चयन करें तो गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • मलेरिया से बचाव के लिए जानिए जरूरी सावधानियां और घरेलू सुरक्षा उपाय जो रखेंगे पूरे परिवार को सुरक्षित

    मलेरिया से बचाव के लिए जानिए जरूरी सावधानियां और घरेलू सुरक्षा उपाय जो रखेंगे पूरे परिवार को सुरक्षित


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है वहीं कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। इनमें मलेरिया सबसे प्रमुख बीमारियों में शामिल है। यह बीमारी संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। यदि समय पर इलाज न मिले तो यह गंभीर रूप भी ले सकती है। ऐसे में बरसात के मौसम में कुछ जरूरी सावधानियां अपनाकर मलेरिया से बचाव किया जा सकता है।

    मलेरिया से बचने का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों को पनपने से रोकना है। घर के आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें क्योंकि रुका हुआ पानी मच्छरों के प्रजनन का सबसे बड़ा कारण होता है। कूलर गमले टायर बाल्टी और छत पर रखे बर्तनों का पानी नियमित रूप से बदलें। यदि कहीं लंबे समय तक पानी जमा रहता है तो उसे तुरंत साफ करें।

    घर के दरवाजों और खिड़कियों पर जाली लगाना भी मच्छरों को अंदर आने से रोकने का अच्छा उपाय है। रात में सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें। बच्चों बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को विशेष रूप से मच्छरों से बचाकर रखना चाहिए क्योंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर हो सकती है।

    शाम के समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना भी लाभदायक माना जाता है। हल्के रंग के पूरे बाजू के कपड़े और लंबे पायजामे पहनने से मच्छरों के काटने की संभावना कम हो जाती है। आवश्यकता होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार मच्छर भगाने वाली क्रीम या रिपेलेंट का भी उपयोग किया जा सकता है।

    घर और आसपास की साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें। नालियों की नियमित सफाई करें और कचरा खुले में जमा न होने दें। स्वच्छ वातावरण न केवल मलेरिया बल्कि डेंगू चिकनगुनिया जैसी कई बीमारियों के खतरे को भी कम करता है।

    स्वस्थ शरीर संक्रमण से लड़ने में अधिक सक्षम होता है। इसलिए संतुलित आहार लें पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और ताजे फल तथा हरी सब्जियों का सेवन करें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

    यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार ठंड लगना सिरदर्द शरीर में दर्द अत्यधिक पसीना या कमजोरी महसूस हो तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर से संपर्क करें और जांच कराएं। समय पर उपचार मिलने से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही इलाज कराना चाहिए। अधूरा उपचार बीमारी को जटिल बना सकता है। साथ ही यदि परिवार के किसी सदस्य को मलेरिया हो जाए तो घर के अन्य लोगों को भी मच्छरों से बचाव के उपाय और अधिक सावधानी से अपनाने चाहिए।

    बरसात के मौसम में थोड़ी सी सतर्कता और नियमित स्वच्छता की आदत मलेरिया जैसी गंभीर बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि हर व्यक्ति अपने घर और आसपास सफाई बनाए रखे तथा मच्छरों को पनपने का अवसर न दे तो मलेरिया के मामलों में काफी कमी लाई जा सकती है।

  • क्या बिल्ली पालने से बढ़ सकता है मानसिक बीमारी का खतरा? नई स्टडी ने चौंकाए वैज्ञानिक सावधानी बरतने की दी सलाह

    क्या बिल्ली पालने से बढ़ सकता है मानसिक बीमारी का खतरा? नई स्टडी ने चौंकाए वैज्ञानिक सावधानी बरतने की दी सलाह


    नई दिल्ली । घर में बिल्ली पालना आजकल केवल शौक नहीं बल्कि कई लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। पालतू जानवरों से लगाव तनाव कम करने और मानसिक सुकून देने के लिए भी जाना जाता है। हालांकि हाल ही में सामने आई एक वैज्ञानिक स्टडी ने बिल्ली पालने वालों का ध्यान एक संभावित स्वास्थ्य जोखिम की ओर खींचा है। शोध में दावा किया गया है कि बिल्लियों के संपर्क और एक गंभीर मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया के बीच संभावित संबंध देखा गया है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि इसका मतलब यह नहीं है कि बिल्ली पालने से हर व्यक्ति को यह बीमारी हो जाएगी।

    ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कई वर्षों में प्रकाशित विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण किया। इस समीक्षा में अलग अलग देशों के शोध आंकड़ों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि जिन लोगों का बिल्लियों से अधिक संपर्क रहा उनमें सिजोफ्रेनिया से जुड़े जोखिम कुछ मामलों में अधिक दिखाई दिए। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी माना कि इस संबंध को पूरी तरह साबित करने के लिए अभी और विस्तृत शोध की आवश्यकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस संभावित संबंध का कारण टोक्सोप्लाज्मा गोंडी नामक एक सूक्ष्म परजीवी माना जाता है। यह परजीवी मुख्य रूप से संक्रमित बिल्लियों के मल में पाया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति उचित स्वच्छता का पालन नहीं करता और किसी तरह यह परजीवी शरीर में प्रवेश कर जाए तो कुछ मामलों में यह मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है। हालांकि अधिकांश स्वस्थ लोगों में संक्रमण होने पर भी कोई गंभीर लक्षण दिखाई नहीं देते।

    डॉक्टरों का कहना है कि सिजोफ्रेनिया एक जटिल मानसिक बीमारी है जिसके पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं होता। आनुवंशिक प्रवृत्ति मानसिक तनाव मस्तिष्क में रासायनिक असंतुलन पर्यावरणीय प्रभाव और कई अन्य जैविक कारण भी इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए केवल बिल्ली पालने को इस बीमारी का सीधा कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि आप घर में बिल्ली पालते हैं तो घबराने की आवश्यकता नहीं है बल्कि कुछ सामान्य सावधानियां अपनाना ही पर्याप्त है। बिल्ली का लिटर बॉक्स साफ करने के बाद हमेशा साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएं। घर और पालतू जानवर दोनों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। नियमित रूप से पशु चिकित्सक से बिल्ली का स्वास्थ्य परीक्षण कराएं और गर्भवती महिलाओं कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों तथा छोटे बच्चों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि टोक्सोप्लाज्मा संक्रमण इन समूहों के लिए अधिक जोखिम पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पालतू जानवरों से मिलने वाले भावनात्मक और मानसिक लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इसलिए किसी एक अध्ययन के आधार पर बिल्ली पालना छोड़ देने की जरूरत नहीं है। जरूरी यह है कि वैज्ञानिक तथ्यों को समझते हुए स्वच्छता और जिम्मेदार देखभाल को प्राथमिकता दी जाए। संतुलित जानकारी और सावधानी ही आपको और आपके पालतू साथी दोनों को सुरक्षित रख सकती है।

  • Health Alert: अगर बार बार सूज रहे हैं पैर तो हो जाएं सतर्क शरीर दे रहा है गंभीर बीमारी का संकेत

    Health Alert: अगर बार बार सूज रहे हैं पैर तो हो जाएं सतर्क शरीर दे रहा है गंभीर बीमारी का संकेत


    नई दिल्ली । पैरों में सूजन आना एक ऐसी समस्या है जिसे अधिकतर लोग थकान लंबे समय तक खड़े रहने या अधिक चलने का परिणाम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि यदि यह परेशानी बार बार हो रही है या कई दिनों तक बनी रहती है तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पैरों में लगातार रहने वाली सूजन शरीर के अंदर चल रही किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकती है। इसलिए केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय समय रहते डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है।

    पैरों में सूजन तब होती है जब शरीर के ऊतकों में जरूरत से ज्यादा तरल पदार्थ जमा होने लगता है। इसे चिकित्सकीय भाषा में एडिमा कहा जाता है। कई बार यह समस्या लंबे समय तक बैठे रहने यात्रा करने या अधिक नमक खाने के कारण भी हो सकती है लेकिन यदि सूजन रोजाना होने लगे दर्द के साथ हो या केवल एक पैर में दिखाई दे तो यह चिंता का विषय बन सकता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि हृदय की कार्यक्षमता कमजोर होने पर शरीर में रक्त का संचार प्रभावित होता है जिससे पैरों और टखनों में सूजन दिखाई देने लगती है। इसी तरह किडनी की कार्यप्रणाली प्रभावित होने पर शरीर अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर नहीं निकाल पाता जिससे सूजन बढ़ सकती है। लीवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों में भी शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है और पैरों में सूजन दिखाई देने लगती है।

    इसके अलावा नसों की कमजोरी वैरिकोज वेन्स लिम्फ संबंधी समस्याएं थायरॉयड की गड़बड़ी मोटापा मधुमेह और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी पैरों में सूजन का कारण बन सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान भी कई महिलाओं में पैरों में सूजन देखी जाती है लेकिन यदि इसके साथ सिरदर्द धुंधला दिखना या रक्तचाप बढ़ा हुआ हो तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी होता है।

    अगर सूजन के साथ सांस लेने में तकलीफ सीने में दर्द तेज बुखार त्वचा का रंग बदलना या अचानक वजन बढ़ने जैसी समस्याएं भी महसूस हों तो इसे बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

    पैरों की सूजन से बचाव के लिए नियमित व्यायाम करना पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और नमक का सीमित सेवन करना लाभदायक माना जाता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने या खड़े रहने से बचें और बीच बीच में पैरों को हिलाते रहें। आराम करते समय पैरों को हल्का ऊंचा रखकर लेटना भी सूजन कम करने में मदद कर सकता है। यदि डॉक्टर ने किसी विशेष बीमारी का इलाज बताया है तो दवाओं का नियमित सेवन और समय समय पर जांच कराना भी जरूरी है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर अक्सर छोटी छोटी समस्याओं के जरिए बड़ी बीमारियों का संकेत देता है। इसलिए यदि पैरों की सूजन बार बार हो रही है या लंबे समय तक बनी रहती है तो स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेकर आवश्यक जांच कराना सबसे सुरक्षित कदम है। समय पर पहचान और सही उपचार गंभीर जटिलताओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • Rainy Season Health Care: बारिश में रोज पिएं अदरक की चाय शरीर रहेगा गर्म पाचन होगा बेहतर और बीमारियां रहेंगी दूर

    Rainy Season Health Care: बारिश में रोज पिएं अदरक की चाय शरीर रहेगा गर्म पाचन होगा बेहतर और बीमारियां रहेंगी दूर


    नई दिल्ली । बरसात का मौसम अपने साथ ठंडी हवाएं हरियाली और सुहाना माहौल लेकर आता है लेकिन यही मौसम सर्दी खांसी वायरल संक्रमण गले की खराश और पाचन संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ा देता है। ऐसे समय में अगर खानपान का सही ध्यान रखा जाए तो कई मौसमी बीमारियों से बचा जा सकता है। भारतीय घरों में बरसों से अदरक की चाय को बारिश के मौसम का सबसे भरोसेमंद घरेलू पेय माना जाता है। इसकी गर्म तासीर और औषधीय गुण शरीर को भीतर से मजबूत बनाने में मदद करते हैं और यही कारण है कि मानसून में इसकी मांग काफी बढ़ जाती है।

    अदरक में प्राकृतिक रूप से ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। नियमित और संतुलित मात्रा में अदरक वाली चाय पीने से मौसमी संक्रमण का खतरा कम हो सकता है। बारिश के दिनों में वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं ऐसे में अदरक का सेवन शरीर को संक्रमण से लड़ने में सहायक माना जाता है।

    बरसात के दौरान सर्दी जुकाम और गले में खराश की समस्या सबसे आम होती है। अदरक की गर्माहट गले को आराम देती है और बलगम को बाहर निकालने में मदद करती है। अगर चाय में तुलसी या काली मिर्च भी मिला दी जाए तो इसका असर और अधिक प्रभावी हो सकता है। यही वजह है कि कई लोग हल्की सर्दी महसूस होते ही सबसे पहले अदरक की चाय का सहारा लेते हैं।

    बारिश के मौसम में पाचन तंत्र भी अक्सर कमजोर पड़ जाता है। बाहर का भोजन या दूषित पानी पेट खराब होने की वजह बन सकता है। अदरक पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है और गैस अपच तथा पेट फूलने जैसी समस्याओं से राहत दिला सकता है। भोजन के बाद एक कप हल्की अदरक वाली चाय शरीर को आराम देने के साथ पाचन प्रक्रिया को भी बेहतर बना सकती है।

    अदरक की चाय शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाने और ठंड महसूस होने की स्थिति में शरीर को गर्म रखने में भी सहायक मानी जाती है। बारिश में भीगने के बाद एक कप गर्म अदरक की चाय शरीर को तुरंत सुकून देती है और थकान कम करने में मदद करती है। इसके अलावा इसमें मौजूद प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में भी भूमिका निभाते हैं।

    हालांकि अदरक की चाय का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अत्यधिक सेवन से कुछ लोगों को एसिडिटी या पेट में जलन की शिकायत हो सकती है। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर ब्लड थिनर दवाओं या किसी गंभीर बीमारी की समस्या है उन्हें नियमित रूप से अधिक मात्रा में अदरक लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं को भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही इसका सेवन करना चाहिए।

    बरसात के मौसम में केवल अदरक की चाय पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। संतुलित भोजन स्वच्छ पानी पर्याप्त नींद और साफ सफाई का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। यदि अदरक की चाय को स्वस्थ जीवनशैली के साथ शामिल किया जाए तो यह मानसून के दौरान शरीर को ऊर्जा देने रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने और मौसमी बीमारियों से बचाव में उपयोगी साबित हो सकती है।:

  • खून की कमी से बचने के लिए बदलें खानपान की आदतें, आयरन युक्त सुपरफूड्स और विटामिन C से मिल सकता है बेहतर पोषण

    खून की कमी से बचने के लिए बदलें खानपान की आदतें, आयरन युक्त सुपरफूड्स और विटामिन C से मिल सकता है बेहतर पोषण

    नई दिल्ली । शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य बनाए रखना अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हीमोग्लोबिन रक्त का वह प्रमुख घटक है जो शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है। जब इसका स्तर कम होने लगता है तो व्यक्ति को लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर आना, सांस फूलना और दैनिक कार्यों में ऊर्जा की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। महिलाओं, बच्चों और गर्भवती महिलाओं में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है। ऐसे में संतुलित और पोषणयुक्त आहार अपनाना स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल आयरन ही नहीं बल्कि फोलेट, विटामिन बी12 और विटामिन सी भी शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण और आयरन के बेहतर अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए भोजन में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए जो इन सभी आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर हों। यदि लंबे समय तक हीमोग्लोबिन का स्तर कम बना रहे तो चिकित्सकीय जांच और उचित उपचार भी आवश्यक होता है।

    पालक को आयरन, फोलेट और विटामिन ए का अच्छा स्रोत माना जाता है। नियमित रूप से पालक की सब्जी, सूप या अन्य रूपों में इसका सेवन शरीर को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है। इसके साथ विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थ लेने से आयरन के अवशोषण में भी सहायता मिल सकती है। इसी तरह चुकंदर में आयरन, फोलेट और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि केवल चुकंदर के सेवन से ही हीमोग्लोबिन बढ़ने का दावा वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं माना जाता, इसलिए संतुलित आहार सबसे महत्वपूर्ण है।

    अनार भी पोषण से भरपूर फलों में शामिल है। इसमें आयरन के साथ विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर को आवश्यक पोषण देने में सहायक हो सकते हैं। वहीं गुड़ और भुना चना पारंपरिक रूप से लोकप्रिय संयोजन हैं। गुड़ में सीमित मात्रा में आयरन होता है जबकि भुना चना प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है। हालांकि मधुमेह के मरीजों को गुड़ का सेवन चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

    दालें, राजमा, लोबिया और चना जैसे खाद्य पदार्थ आयरन तथा प्रोटीन से भरपूर होते हैं। इन्हें नियमित भोजन का हिस्सा बनाने से शरीर को आवश्यक पोषण मिल सकता है। अंकुरित अनाज और दालें भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती हैं। इसके अलावा खजूर और किशमिश जैसे सूखे मेवों में आयरन सहित कई महत्वपूर्ण खनिज पाए जाते हैं, जो सीमित मात्रा में सेवन करने पर ऊर्जा और पोषण प्रदान कर सकते हैं।

    आयरन युक्त भोजन के साथ संतरा, मौसमी, आंवला, नींबू और अमरूद जैसे विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन भी लाभकारी माना जाता है क्योंकि ये शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, नियमित स्वास्थ्य जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना आवश्यक है। यदि लगातार कमजोरी, चक्कर आना या हीमोग्लोबिन कम रहने की शिकायत बनी रहे तो स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सक से परामर्श लेकर उचित जांच और उपचार कराना सबसे सुरक्षित और प्रभावी उपाय माना जाता है।

  • Skin Care Tips: महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट छोड़िए दही से करें प्राकृतिक स्किन केयर हर मौसम में मिलेगा ग्लोइंग और हेल्दी चेहरा

    Skin Care Tips: महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट छोड़िए दही से करें प्राकृतिक स्किन केयर हर मौसम में मिलेगा ग्लोइंग और हेल्दी चेहरा


    नई दिल्ली । दही भारतीय रसोई का ऐसा खाद्य पदार्थ है जो स्वाद और सेहत दोनों के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह त्वचा की देखभाल के लिए भी किसी प्राकृतिक ब्यूटी ट्रीटमेंट से कम नहीं है। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड प्रोटीन कैल्शियम विटामिन बी और प्राकृतिक प्रोबायोटिक्स त्वचा को पोषण देने के साथ उसे साफ मुलायम और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। नियमित और सही तरीके से दही का उपयोग करने से त्वचा की कई सामान्य समस्याओं से राहत मिल सकती है और महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

    दही का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह त्वचा को गहराई से मॉइस्चराइज करता है। जिन लोगों की त्वचा रूखी और बेजान रहती है उनके लिए दही एक बेहतरीन प्राकृतिक मॉइस्चराइजर का काम करता है। चेहरे पर दही की पतली परत लगाकर लगभग पंद्रह से बीस मिनट तक छोड़ने के बाद सादे पानी से धोने पर त्वचा पहले से अधिक मुलायम और ताजगी भरी महसूस होती है।

    गर्मी और धूप के कारण होने वाली टैनिंग को कम करने में भी दही काफी असरदार माना जाता है। इसमें मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद करता है जिससे चेहरा साफ और चमकदार दिखाई देता है। यदि दही में थोड़ा सा बेसन या चावल का आटा मिलाकर फेस पैक बनाया जाए तो त्वचा की गहराई से सफाई होती है और प्राकृतिक निखार बढ़ता है।

    मुंहासों और ऑयली स्किन से परेशान लोगों के लिए भी दही लाभकारी हो सकता है। दही में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया त्वचा का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं जबकि इसका हल्का एक्सफोलिएटिंग प्रभाव रोमछिद्रों की सफाई करने में सहायक होता है। हालांकि जिन लोगों की त्वचा बहुत अधिक संवेदनशील है उन्हें पहले त्वचा के एक छोटे हिस्से पर इसका परीक्षण कर लेना चाहिए।

    अगर चेहरे पर हल्के दाग धब्बे या पिगमेंटेशन की समस्या है तो दही में थोड़ा सा शहद या हल्दी मिलाकर लगाया जा सकता है। यह मिश्रण त्वचा को पोषण देने के साथ रंगत को निखारने में मदद कर सकता है। नियमित उपयोग से त्वचा अधिक स्वस्थ और समान रंग की दिखाई देने लगती है। आंखों के नीचे की थकान कम करने के लिए भी ठंडे दही का हल्का प्रयोग किया जा सकता है जिससे त्वचा को ठंडक और ताजगी मिलती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक उपाय तभी प्रभावी होते हैं जब उनका नियमित और संतुलित उपयोग किया जाए। दही का इस्तेमाल सप्ताह में दो से तीन बार करना पर्याप्त माना जाता है। चेहरे पर लगाने से पहले त्वचा को अच्छी तरह साफ कर लें और उपयोग के बाद हल्के गुनगुने या सामान्य पानी से चेहरा धो लें। यदि किसी प्रकार की एलर्जी जलन या त्वचा संबंधी गंभीर समस्या हो तो त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहता है।

    स्वस्थ और चमकदार त्वचा केवल बाहरी देखभाल से नहीं बल्कि संतुलित आहार पर्याप्त पानी नियमित नींद और स्वस्थ जीवनशैली से भी जुड़ी होती है। दही को अपने भोजन और स्किन केयर रूटीन दोनों में शामिल करके त्वचा को प्राकृतिक रूप से स्वस्थ और दमकता हुआ बनाए रखा जा सकता है।

  • रीढ़ को मजबूत और मन को शांत रखने का आसान मंत्र है सरल धनुरासन जानिए सही तरीका और जबरदस्त फायदे

    रीढ़ को मजबूत और मन को शांत रखने का आसान मंत्र है सरल धनुरासन जानिए सही तरीका और जबरदस्त फायदे


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में लंबे समय तक कुर्सी पर बैठकर काम करना मोबाइल और लैपटॉप का लगातार उपयोग तथा शारीरिक गतिविधियों की कमी लोगों को कम उम्र में ही पीठ दर्द गर्दन की अकड़न और रीढ़ से जुड़ी समस्याओं की ओर धकेल रही है। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं बल्कि स्वस्थ जीवन जीने का प्रभावी माध्यम बनकर सामने आया है। योग विशेषज्ञों के अनुसार सरल धनुरासन ऐसा योगासन है जो पूरे शरीर को सक्रिय करने के साथ रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि आयुष मंत्रालय भी लोगों को नियमित रूप से इस योगासन का अभ्यास करने के लिए प्रेरित कर रहा है।

    सरल धनुरासन शरीर को धनुष के आकार में लाने वाला आसन है। यह पीठ कंधों कमर और पैरों की मांसपेशियों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। नियमित अभ्यास से शरीर की जकड़न धीरे धीरे कम होने लगती है और रीढ़ में लचीलापन बढ़ता है। यह आसन केवल शारीरिक मजबूती ही नहीं देता बल्कि मानसिक तनाव को कम करने और मन को शांत रखने में भी सहायक माना जाता है। दिनभर की थकान और तनाव के बाद इसका अभ्यास शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है।

    योग विशेषज्ञ बताते हैं कि सरल धनुरासन करने के लिए सबसे पहले समतल स्थान पर योगा मैट बिछाकर पेट के बल लेट जाएं। इसके बाद दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ें और हाथों से टखनों को पकड़ लें। अब गहरी सांस लेते हुए धीरे धीरे सिर छाती और घुटनों को ऊपर उठाएं। पैरों को पीछे की ओर खींचते हुए शरीर को धनुष जैसी आकृति में लाएं। इस स्थिति में कुछ सेकंड तक सामान्य सांस लेते हुए बने रहें। इसके बाद धीरे धीरे सांस छोड़ते हुए सामान्य अवस्था में लौट आएं और शरीर को आराम दें। शुरुआत में इस आसन को कम समय तक करें और धीरे धीरे अभ्यास की अवधि बढ़ाएं।

    इस योगासन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है शरीर का लचीलापन बढ़ता है पीठ और कंधों की मांसपेशियां मजबूत बनती हैं तथा रक्त संचार बेहतर होता है। यह पाचन तंत्र को सक्रिय करने में भी मदद करता है और शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ाता है। मानसिक रूप से भी यह आसन तनाव चिंता और थकान को कम करने में उपयोगी माना जाता है जिससे व्यक्ति अधिक शांत और सकारात्मक महसूस करता है।

    हालांकि किसी भी योगासन की तरह सरल धनुरासन करते समय सावधानी रखना भी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को गंभीर कमर दर्द रीढ़ की गंभीर समस्या हर्निया उच्च रक्तचाप हाल ही में हुई सर्जरी या गर्भावस्था जैसी स्थिति हो तो बिना विशेषज्ञ की सलाह के इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। अभ्यास के दौरान शरीर पर अनावश्यक दबाव डालने या झटके से ऊपर उठने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे चोट लगने का खतरा बढ़ सकता है।

    योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरल धनुरासन को नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाए और संतुलित खानपान तथा स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए तो यह शरीर और मन दोनों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकता है। रोजाना कुछ मिनट का यह अभ्यास न केवल रीढ़ को मजबूत बनाता है बल्कि व्यक्ति को तनावमुक्त ऊर्जावान और अधिक सक्रिय जीवन जीने में भी मदद करता है।

  • गोवा वेकेशन गाइड समुद्र तट वाटर स्पोर्ट्स स्वादिष्ट भोजन और शानदार सनसेट के साथ बनाएं यादगार छुट्टियां

    गोवा वेकेशन गाइड समुद्र तट वाटर स्पोर्ट्स स्वादिष्ट भोजन और शानदार सनसेट के साथ बनाएं यादगार छुट्टियां


    नई दिल्ली । अगर आप रोजमर्रा की भागदौड़ से कुछ दिन दूर सुकून और रोमांच दोनों का आनंद लेना चाहते हैं तो गोवा आपके लिए बेहतरीन डेस्टिनेशन साबित हो सकता है। अरब सागर के किनारे बसा यह राज्य अपने सुनहरे समुद्र तट प्राकृतिक खूबसूरती पुर्तगाली विरासत रंगीन बाजारों स्वादिष्ट सी फूड और शानदार नाइट लाइफ के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। हर साल लाखों पर्यटक यहां छुट्टियां बिताने पहुंचते हैं। चाहे आप परिवार के साथ घूमने जा रहे हों दोस्तों के साथ एडवेंचर ट्रिप की योजना बना रहे हों या फिर हनीमून मनाना चाहते हों गोवा हर तरह के यात्रियों को खास अनुभव देता है।

    गोवा घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच माना जाता है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और बीच एक्टिविटी का भरपूर आनंद लिया जा सकता है। अगर आपका बजट कम है तो मानसून के दौरान भी गोवा की हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता देखने लायक होती है। इस मौसम में होटल और रिसॉर्ट भी अपेक्षाकृत सस्ते मिल जाते हैं।

    गोवा पहुंचने के लिए हवाई रेल और सड़क तीनों विकल्प उपलब्ध हैं। देश के लगभग सभी बड़े शहरों से गोवा के लिए सीधी फ्लाइट मिल जाती है। ट्रेन से यात्रा करने वाले पर्यटक मडगांव या थिविम रेलवे स्टेशन उतर सकते हैं। सड़क मार्ग से भी मुंबई पुणे बेंगलुरु और अन्य शहरों से आरामदायक सफर किया जा सकता है।

    घूमने की शुरुआत नॉर्थ गोवा से करें जहां बागा कलंगुट अंजुना और कैंडोलिम बीच सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। यहां वाटर स्पोर्ट्स पैरासेलिंग जेट स्की बनाना राइड और स्कूबा डाइविंग जैसी रोमांचक गतिविधियों का आनंद लिया जा सकता है। शाम के समय बीच शैक में बैठकर समुद्र के किनारे सनसेट देखना किसी यादगार अनुभव से कम नहीं होता।

    अगर आप शांति और प्राकृतिक वातावरण पसंद करते हैं तो साउथ गोवा आपके लिए बेहतर विकल्प है। पालोलेम कोलवा और अगोंडा बीच अपनी साफ सफाई और शांत माहौल के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां भीड़ कम होती है और परिवार या कपल्स आराम से समय बिता सकते हैं।

    गोवा की ऐतिहासिक पहचान भी बेहद खास है। बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस चर्च से कैथेड्रल और फोर्ट अगुआड़ा जैसे स्थान इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। पुराने गोवा की गलियों में घूमते हुए आपको पुर्तगाली संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। वहीं स्थानीय बाजारों में हस्तशिल्प मसाले कपड़े और पारंपरिक वस्तुएं खरीदने का अलग ही आनंद मिलता है।

    गोवा यात्रा के दौरान स्थानीय भोजन का स्वाद जरूर लें। यहां सी फूड गोअन करी फिश थाली और पारंपरिक मिठाइयां पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। शाकाहारी यात्रियों के लिए भी अनेक स्वादिष्ट विकल्प आसानी से उपलब्ध हैं।

    अगर बजट की बात करें तो सामान्य ट्रिप के लिए प्रति व्यक्ति लगभग पंद्रह हजार से तीस हजार रुपए का खर्च आ सकता है। इसमें यात्रा होटल स्थानीय परिवहन भोजन और घूमने का खर्च शामिल हो सकता है। होटल पहले से बुक करने और ऑफ सीजन में यात्रा करने से अच्छी बचत की जा सकती है।

    गोवा यात्रा के दौरान पर्यावरण का ध्यान रखना भी जरूरी है। समुद्र तटों पर प्लास्टिक न फैलाएं स्थानीय नियमों का पालन करें और समुद्र में सुरक्षा निर्देशों का पालन करते हुए ही वाटर स्पोर्ट्स का आनंद लें। सही योजना और थोड़ी तैयारी के साथ गोवा की यात्रा जीवनभर याद रहने वाला खूबसूरत अनुभव बन सकती है।