Category: Lifestyle

  • पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    नई दिल्ली । मानव स्वास्थ्य में पाचन तंत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालिया चिकित्सीय अध्ययनों और मेडिकल रिपोर्टों से यह स्पष्ट हुआ है कि क्रोनिक कब्ज यानी लंबे समय से चली आ रही पेट की समस्या केवल पाचन तंत्र को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि त्वचा के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पाचन तंत्र में गड़बड़ी होने पर शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं। जब आंतें इन अपशिष्ट पदार्थों को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पातीं, तो शरीर अन्य माध्यमों से इन्हें बाहर करने का प्रयास करता है, जिससे त्वचा पर मुंहासे, दाग-धब्बे, काले घेरे और चकत्ते जैसी समस्याएं उभरने लगती हैं।

    ताइवान में किए गए एक व्यापक अध्ययन के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि कब्ज से पीड़ित व्यक्तियों में सामान्य लोगों की तुलना में एक्जिमा जैसी त्वचा संबंधी बीमारी विकसित होने का जोखिम दो गुना तक अधिक देखा गया है। हालांकि इसके सटीक कारणों पर शोध अभी जारी है।

    चिकित्सकों के मुताबिक आंत और त्वचा दोनों ही शरीर में बाह्य तत्त्वों और एलर्जी के खिलाफ सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। जब आंतों के सामान्य कामकाज में रुकावट आती है, तो इसका प्रतिकूल असर चेहरे की चमक और त्वचा की रंगत पर साफ दिखाई देने लगता है।

    दिल्ली, मुंबई और मध्य प्रदेश के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सकों का मानना है कि असंतुलित खानपान और आधुनिक जीवनशैली के कारण कब्ज की समस्या आम होती जा रही है। महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही यह समस्या त्वचा की नई जटिलताओं को जन्म दे रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों और प्रोबायोटिक्स की मात्रा बढ़ानी चाहिए। भरपूर पानी का सेवन करने और नियमित दिनचर्या अपनाने से पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है जिससे त्वचा स्वस्थ बनी रहती है।

  • अमेरिका में साइक्लोस्पोरा संक्रमण से दो मौतें दूषित लेट्यूस और पत्तेदार सब्जियों के सेवन से बढ़ा खतरा

    अमेरिका में साइक्लोस्पोरा संक्रमण से दो मौतें दूषित लेट्यूस और पत्तेदार सब्जियों के सेवन से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । हरी पत्तेदार सब्जियों और सलाद के सेवन को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। अमेरिका के मिशिगन में साइक्लोस्पोरा नामक सूक्ष्म परजीवी के प्रकोप से दो लोगों की मौत की खबर के बाद आंतों के इस संक्रमण को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है।

    स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार साइक्लोस्पोरियासिस एक आंतों का संक्रमण है जो साइक्लोस्पोरा नामक सूक्ष्म परजीवी के कारण होता है। यह परजीवी मुख्य रूप से दूषित पानी, फलों और कच्ची पत्तेदार सब्जियों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है।

    प्रारंभिक जांच में मैक्सिको से आपूर्ति किए गए आइसबर्ग लेट्यूस यानी सलाद के पत्ते को इस संक्रमण का मुख्य जरिया माना गया था। यद्यपि बाद की प्रयोगशाला जांच में कुछ विरोधाभासी परिणाम सामने आए, लेकिन महामारी विज्ञान के साक्ष्य इसी आपूर्ति श्रृंखला की ओर संकेत कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह संक्रमण सामान्यतः जानलेवा नहीं होता, लेकिन इसके कारण मरीज को गंभीर दस्त, पेट दर्द, मतली, थकान और अत्यधिक निर्जलीकरण की समस्या हो सकती है। पहले से गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए यह स्थिति अधिक जोखिम भरी साबित हो सकती है।

    भारत में भी विशेषकर मानसून के मौसम में दूषित पानी और सब्जियों के जरिए इस प्रकार के परजीवी संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। दिल्ली, मुंबई और मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरी इलाकों के बाजारों में लेट्यूस और कच्ची सब्जियों की भारी मांग के चलते सावधानी बरतने की आवश्यकता जताई जा रही है।

    चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि ताजी सब्जियों का सेवन पूरी तरह बंद करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि स्वच्छता मानकों का कड़ाई से पालन करना जरूरी है। कच्चे सलाद और सब्जियों को पकाने या खाने से पहले स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोना बेहद आवश्यक है।

    खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार होटलों, रेस्तरां और घरों में उपयोग किए जाने वाले सलाद पत्ता, बर्गर और रैप्स में इस्तेमाल होने वाली सब्जियों की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संक्रमण के लक्षण दिखने पर तत्काल चिकित्सीय परामर्श लेने की सलाह दी गई है।

  • दूध से ज्यादा कैल्शियम देने वाली 6 भारतीय चीजें, हड्डियों की मजबूती के लिए डाइट में शामिल करना हो सकता है फायदेमंद

    दूध से ज्यादा कैल्शियम देने वाली 6 भारतीय चीजें, हड्डियों की मजबूती के लिए डाइट में शामिल करना हो सकता है फायदेमंद

    नई दिल्ली । हड्डियों को मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने के लिए कैल्शियम बेहद जरूरी पोषक तत्व है। आमतौर पर कैल्शियम की जरूरत पूरी करने के लिए दूध को सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है, लेकिन भारतीय खानपान में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद हैं जो कैल्शियम से भरपूर होते हैं। इनमें से कुछ खाद्य पदार्थों में प्रति 100 ग्राम कैल्शियम की मात्रा दूध की तुलना में काफी अधिक हो सकती है। हालांकि किसी भोजन में मौजूद कैल्शियम और शरीर द्वारा अवशोषित होने वाले कैल्शियम की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।

    रागी यानी नाचनी कैल्शियम का एक प्रमुख गैर-डेयरी स्रोत है। इसमें कैल्शियम की मात्रा काफी अधिक होती है और इसे भारतीय भोजन में आसानी से शामिल किया जा सकता है। रागी से रोटी, डोसा, चीला, दलिया और लड्डू तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा इसमें फाइबर और कई अन्य पोषक तत्व भी पाए जाते हैं, इसलिए संतुलित आहार में इसका इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है।

    तिल यानी सफेद या काले तिल भी कैल्शियम से भरपूर माने जाते हैं। इन्हें चटनी, लड्डू, सब्जी, सलाद या रोटी में मिलाकर खाया जा सकता है। तिल में कैल्शियम के साथ प्रोटीन, स्वस्थ वसा और कई खनिज भी पाए जाते हैं। हालांकि तिल ऊर्जा और वसा से भरपूर होते हैं, इसलिए इन्हें जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा में खाना बेहतर है।

    बादाम भी कैल्शियम उपलब्ध कराने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल हैं। इनमें कैल्शियम के साथ प्रोटीन, फाइबर, विटामिन ई और स्वस्थ वसा पाए जाते हैं। रोजाना कुछ बादाम स्नैक के तौर पर खाए जा सकते हैं। इन्हें दूध, दही, दलिया या अन्य व्यंजनों में मिलाकर भी आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    पनीर कैल्शियम और प्रोटीन दोनों का अच्छा स्रोत है। दूध से बने इस खाद्य पदार्थ को भारतीय भोजन में कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। सब्जी, पराठे, सलाद या हल्के स्नैक के रूप में पनीर लिया जा सकता है। हालांकि अलग-अलग प्रकार के पनीर में वसा और कैलोरी की मात्रा अलग हो सकती है, इसलिए संतुलित मात्रा में इसका सेवन करना बेहतर माना जाता है।

    राजगीरा यानी अमरनाथ भी कैल्शियम देने वाले पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों में शामिल है। इसके दानों का इस्तेमाल आटा, दलिया और लड्डू बनाने में किया जाता है। राजगीरा को भोजन में शामिल करने से कैल्शियम के साथ प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व भी मिल सकते हैं। इसी तरह चना और राजमा जैसी फलियां भी कैल्शियम के साथ प्रोटीन और फाइबर प्रदान करती हैं।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी कैल्शियम वाली डाइट का हिस्सा बनाई जा सकती हैं। मेथी और चौलाई जैसी सब्जियों में कैल्शियम के साथ कई विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। हालांकि पालक में कैल्शियम मौजूद होने के बावजूद उसमें पाए जाने वाले ऑक्सालेट के कारण शरीर इसका कैल्शियम पूरी तरह अवशोषित नहीं कर पाता। इसलिए कैल्शियम के लिए अलग-अलग खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर है।

    कैल्शियम का इस्तेमाल शरीर में सही तरीके से होने के लिए विटामिन डी भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त विटामिन डी न होने पर भोजन से मिलने वाले कैल्शियम का अवशोषण प्रभावित हो सकता है। इसलिए हड्डियों की मजबूती के लिए केवल कैल्शियम वाली चीजें खाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संतुलित आहार, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और विटामिन डी पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    दूध निश्चित रूप से कैल्शियम का सुविधाजनक स्रोत है, लेकिन इसे कैल्शियम का एकमात्र जरिया मानना जरूरी नहीं है। रागी, तिल, बादाम, पनीर, राजगीरा और फलियों जैसे भारतीय खाद्य पदार्थों को अलग-अलग रूप में भोजन में शामिल करके कैल्शियम की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है। किसी व्यक्ति को कैल्शियम की कमी की आशंका हो या सप्लीमेंट लेने की जरूरत महसूस हो, तो व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • चेहरे की खूबसूरती के लिए नीम का ऐसे करें इस्तेमाल: दाग-धब्बे और पिंपल्स से राहत पाने में मिल सकती है मदद

    चेहरे की खूबसूरती के लिए नीम का ऐसे करें इस्तेमाल: दाग-धब्बे और पिंपल्स से राहत पाने में मिल सकती है मदद


    नई दिल्ली । नीम को भारतीय घरों में लंबे समय से त्वचा और बालों की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। नीम की पत्तियों में प्राकृतिक रूप से कई ऐसे गुण पाए जाते हैं जिन्हें त्वचा के लिए फायदेमंद माना जाता है। खासतौर पर ऑयली स्किन और मुंहासों की समस्या से परेशान लोगों के बीच नीम का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय है। हालांकि त्वचा पर किसी भी प्राकृतिक चीज का इस्तेमाल करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है और किसी भी घरेलू उपाय का असर सभी पर एक जैसा नहीं होता।

    अगर आपकी त्वचा बहुत ऑयली है और चेहरे पर बार बार पिंपल्स निकलते हैं तो नीम का इस्तेमाल त्वचा की सफाई के लिए किया जा सकता है। नीम की कुछ साफ पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी को ठंडा करने के बाद चेहरे को धोने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे त्वचा की सफाई में मदद मिल सकती है। नीम में पाए जाने वाले कुछ प्राकृतिक यौगिकों में एंटीमाइक्रोबियल गुण बताए जाते हैं जो त्वचा पर मौजूद कुछ सूक्ष्मजीवों के खिलाफ काम कर सकते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से नीम को मुंहासे और त्वचा संबंधी परेशानियों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

    नीम की पत्तियों का पेस्ट भी त्वचा की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए ताजी और साफ नीम की पत्तियों को पीसकर हल्का पेस्ट बनाया जा सकता है। इसे चेहरे पर लगाने से पहले हाथ की त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर होता है। अगर जलन लालिमा खुजली या किसी तरह की एलर्जी दिखाई दे तो इसे चेहरे पर नहीं लगाना चाहिए। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि प्राकृतिक चीजें भी कुछ लोगों की त्वचा पर प्रतिक्रिया पैदा कर सकती हैं।

    मुंहासों के अलावा नीम को अत्यधिक तैलीय त्वचा के लिए भी उपयोगी माना जाता है। कई बार त्वचा में अतिरिक्त तेल जमा होने के कारण चेहरे पर चिपचिपाहट और बंद रोमछिद्रों की समस्या बढ़ सकती है। ऐसे में त्वचा की नियमित सफाई के साथ हल्के और त्वचा के अनुकूल उत्पादों का इस्तेमाल ज्यादा जरूरी है। नीम को इसका विकल्प नहीं माना जाना चाहिए बल्कि जरूरत के अनुसार अतिरिक्त देखभाल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    अगर चेहरे पर दाग धब्बे या पुराने मुंहासों के निशान हैं तो केवल नीम लगाने से इनके पूरी तरह खत्म होने की गारंटी नहीं है। ऐसे मामलों में सनस्क्रीन का इस्तेमाल त्वचा की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और त्वचा को बार बार छूने से बचना भी जरूरी है। पिंपल्स को दबाने या फोड़ने से बचना चाहिए क्योंकि इससे सूजन और दाग बढ़ सकते हैं।

    नीम का इस्तेमाल करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नीम का गाढ़ा पेस्ट या तेल हर किसी की त्वचा के लिए उपयुक्त नहीं होता। चेहरे पर नीम का तेल सीधे लगाने से कुछ लोगों को जलन या एलर्जी हो सकती है। अगर मुंहासे बहुत ज्यादा हैं दर्दनाक हैं बार बार हो रहे हैं या त्वचा पर लगातार लालिमा और खुजली बनी हुई है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

    कुल मिलाकर नीम त्वचा की देखभाल में एक पारंपरिक और उपयोगी प्राकृतिक विकल्प हो सकता है। खासकर त्वचा की सफाई और ऑयली स्किन से जुड़ी समस्याओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बेहतर परिणाम के लिए इसे सावधानी से इस्तेमाल करना जरूरी है। साफ सफाई मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन के साथ संतुलित स्किन केयर रूटीन अपनाना त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में ज्यादा मददगार हो सकता है।

  • मानसून में बुखार खांसी और कमजोरी से परेशान न हों, संक्रमण से बचने के लिए आज से अपनाएं ये जरूरी सावधानियां

    मानसून में बुखार खांसी और कमजोरी से परेशान न हों, संक्रमण से बचने के लिए आज से अपनाएं ये जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है वहीं बदलता मौसम अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी लेकर आता है। बारिश के दौरान तापमान में उतार चढ़ाव नमी बढ़ने और जगह जगह पानी जमा होने के कारण संक्रमण फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं। यही वजह है कि इन दिनों वायरल बुखार सर्दी जुकाम खांसी गले में खराश सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। खासतौर पर बच्चे बुजुर्ग और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को इस मौसम में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर को तापमान के साथ तालमेल बैठाने में परेशानी हो सकती है और संक्रमण होने का खतरा बढ़ सकता है।

    वायरल बुखार होने पर आमतौर पर शरीर का तापमान बढ़ना थकान कमजोरी सिरदर्द बदन दर्द ठंड लगना भूख कम लगना और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ लोगों में खांसी और नाक बहने की समस्या भी हो सकती है। हालांकि हर बुखार वायरल ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। डेंगू मलेरिया टाइफाइड और अन्य संक्रमणों में भी बुखार हो सकता है इसलिए लगातार तेज बुखार रहने पर इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    बारिश के मौसम में वायरल संक्रमण से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखा जाए। बाहर से घर लौटने के बाद हाथों को साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। बिना हाथ धोए आंख नाक और मुंह को छूने से बचना चाहिए क्योंकि संक्रमण फैलाने वाले वायरस शरीर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने के बाद हाथों की सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। घर में किसी व्यक्ति को सर्दी खांसी या बुखार हो तो उसके साथ बहुत नजदीकी संपर्क से बचना और जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल करना भी संक्रमण के प्रसार को कम कर सकता है।

    बारिश में भीगने के बाद लंबे समय तक गीले कपड़ों में रहने से बचना चाहिए। गीले कपड़े तुरंत बदलकर शरीर को अच्छी तरह सुखाना बेहतर होता है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें क्योंकि ठहरा हुआ पानी मच्छरों के पनपने का कारण बन सकता है। कूलर गमले छत और आसपास की खाली जगहों में जमा पानी को नियमित रूप से साफ करना जरूरी है। इससे मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है।

    अगर बुखार हो जाए तो पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ लेना जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक या अन्य दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि हर बुखार का कारण बैक्टीरियल संक्रमण नहीं होता। यदि बुखार कई दिनों तक बना रहे बहुत तेज हो जाए या उसके साथ सांस लेने में परेशानी लगातार उल्टी अत्यधिक कमजोरी बेहोशी त्वचा पर दाने या खून आने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    कुल मिलाकर बारिश और बदलते मौसम में वायरल बुखार से बचाव के लिए साफ सफाई पौष्टिक भोजन पर्याप्त नींद सुरक्षित पानी और आसपास की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। थोड़ी सी सावधानी अपनाकर संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है और मानसून का मौसम स्वस्थ रहते हुए बिताया जा सकता है।

  • चश्मे का नंबर बदलने पर बार-बार सिरदर्द और धुंधला दिखना नजरअंदाज न करें, रात में दिखने वाली परेशानी भी हो सकती है संकेत

    चश्मे का नंबर बदलने पर बार-बार सिरदर्द और धुंधला दिखना नजरअंदाज न करें, रात में दिखने वाली परेशानी भी हो सकती है संकेत


    नई दिल्ली ।
    कई लोग वर्षों तक एक ही चश्मे का इस्तेमाल करते रहते हैं और जब तक सामान्य रूप से दिखाई देता है, तब तक आंखों की दोबारा जांच कराने की जरूरत महसूस नहीं करते। हालांकि, समय के साथ आंखों की दृष्टि और चश्मे का नंबर बदल सकता है। ऐसी स्थिति में पुराने नंबर का चश्मा पहनने पर सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, आंखों में थकान और पढ़ने या स्क्रीन देखने के दौरान असहजता जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

    चश्मे का नंबर बदलने का एक आम संकेत यह हो सकता है कि पहले की तुलना में दूर या पास की चीजें साफ दिखाई न दें। किताब के अक्षर पढ़ने, मोबाइल देखने, कंप्यूटर पर काम करने या दूर लगे बोर्ड को देखने में अतिरिक्त प्रयास करना पड़े तो आंखों की जांच कराना उचित रहता है। हालांकि धुंधली नजर का कारण केवल चश्मे का नंबर बदलना नहीं होता। ड्राई आई, मोतियाबिंद और रेटिना से जुड़ी समस्याएं भी दृष्टि को प्रभावित कर सकती हैं।

    लगातार सिरदर्द भी नजर से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है, खासकर तब जब यह पढ़ने या लंबे समय तक पास की चीजों पर ध्यान केंद्रित करने के बाद बढ़ता हो। आंखों पर लगातार जोर पड़ने से थकान और असहजता महसूस हो सकती है। लेकिन सिरदर्द के कई दूसरे कारण भी होते हैं, इसलिए इसे केवल चश्मे के नंबर से जोड़कर देखना सही नहीं है।

    कुछ लोगों को साफ देखने के लिए आंखें सिकोड़ने की आदत हो जाती है। टीवी देखते समय, सड़क के संकेत पढ़ते हुए या मोबाइल स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करते समय बार-बार आंखें सिकोड़ना दृष्टि में बदलाव का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में आंखों की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि समस्या अपवर्तन संबंधी है या किसी अन्य कारण से।

    स्क्रीन पर लंबे समय तक काम करने के बाद आंखों में दर्द, भारीपन, जलन, सूखापन या थकान भी हो सकती है। डिजिटल स्क्रीन का लगातार इस्तेमाल आंखों पर दबाव बढ़ा सकता है और इससे सिरदर्द या अस्थायी धुंधलापन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गलत या अधूरा चश्मा नंबर भी ऐसे लक्षणों को बढ़ा सकता है। इसलिए लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए बीच-बीच में आंखों को आराम देना महत्वपूर्ण है।

    रात में वाहन चलाते समय सामने से आने वाली रोशनी बहुत तेज लगना, सड़क के संकेत स्पष्ट न दिखना या सामान्य परिस्थितियों की तुलना में नजर कमजोर महसूस होना भी जांच कराने का कारण हो सकता है। हालांकि रात में देखने में परेशानी के पीछे सिर्फ चश्मे का नंबर जिम्मेदार नहीं होता। आंखों की दूसरी स्थितियां भी इसका कारण बन सकती हैं।

    आंखों की जांच केवल चश्मे का सही नंबर पता करने तक सीमित नहीं है। नियमित परीक्षण के दौरान आंखों से जुड़ी कई समस्याओं का शुरुआती स्तर पर पता लगाने में मदद मिल सकती है। उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और पहले से मौजूद आंखों की बीमारी के आधार पर जांच की जरूरत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए जांच का अंतराल व्यक्ति की स्थिति के अनुसार नेत्र विशेषज्ञ से तय करना बेहतर है।

    यदि चश्मा पहनने के बावजूद लगातार धुंधला दिखाई दे रहा है, सिरदर्द बना रहता है, आंखों में दर्द या असामान्य थकान महसूस होती है या नजर में अचानक बदलाव आता है, तो खुद से नया नंबर अनुमान लगाने के बजाय नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। अचानक नजर कम होना, तेज आंख दर्द या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। सही समय पर आंखों की जांच से समस्या का वास्तविक कारण समझने और उचित उपचार या चश्मे का नंबर निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।

  • पेट फूलने को सिर्फ गैस समझना पड़ सकता है भारी, जानिए कब ब्लोटिंग बन सकती है गंभीर बीमारी का संकेत

    पेट फूलने को सिर्फ गैस समझना पड़ सकता है भारी, जानिए कब ब्लोटिंग बन सकती है गंभीर बीमारी का संकेत


    नई दिल्ली। अगर खाना खाने के बाद आपका पेट अचानक गुब्बारे की तरह फूल जाता है और यह समस्या बार बार परेशान करती है तो इसे हर बार सामान्य गैस मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कभी कभार पेट फूलना ज्यादा खाना खाने कब्ज गैस या भोजन के दौरान ज्यादा हवा निगलने की वजह से हो सकता है लेकिन अगर ब्लोटिंग लगातार बनी रहती है और इसके साथ पेट दर्द कब्ज दस्त वजन कम होना या भूख में बदलाव जैसे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं तो इसके पीछे कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक पेट फूलना अपने आप में कोई बीमारी नहीं बल्कि शरीर में चल रही किसी प्रक्रिया का संकेत हो सकता है। इसलिए लंबे समय तक बनी रहने वाली इस परेशानी के वास्तविक कारण को समझना जरूरी है।

    पेट फूलने की सबसे आम वजह पाचन तंत्र में गैस का बढ़ना मानी जाती है। कुछ खाद्य पदार्थ आंतों में ज्यादा गैस पैदा कर सकते हैं जबकि खाना खाते समय बहुत तेजी से खाने या बातचीत करते हुए ज्यादा हवा निगलने से भी पेट में फुलाव महसूस हो सकता है। इसके अलावा कब्ज की समस्या में आंतों में मल जमा रहने के कारण पेट भारी और फूला हुआ लग सकता है। कुछ लोगों को दूध या अन्य खाद्य पदार्थों को पचाने में परेशानी होती है जिसकी वजह से भी ब्लोटिंग बढ़ सकती है।

    गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के मुताबिक इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी IBS भी बार बार पेट फूलने की एक महत्वपूर्ण वजह हो सकती है। इस स्थिति में पेट फूलने के साथ पेट दर्द और शौच की आदतों में बदलाव देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों को लगातार कब्ज की परेशानी रहती है जबकि कुछ लोगों को बार बार दस्त हो सकते हैं। तनाव खानपान में गड़बड़ी और पाचन तंत्र से जुड़ी दूसरी परेशानियां भी इसके लक्षणों को बढ़ा सकती हैं। अगर लंबे समय से पेट दर्द के साथ शौच के तरीके में बदलाव हो रहा है तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

    पेट फूलने की समस्या सीलिएक डिजीज से भी जुड़ी हो सकती है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें ग्लूटेन के सेवन के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत को नुकसान पहुंचाने लगती है। ग्लूटेन गेहूं जौ और राई जैसे अनाजों में पाया जाने वाला प्रोटीन है। इस स्थिति में पेट फूलने के साथ दस्त पेट की परेशानी और वजन कम होने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और आहार में जरूरी बदलाव किए जाते हैं।

    कुछ मामलों में लगातार बढ़ता हुआ पेट लिवर से जुड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकता है। लिवर की गंभीर समस्या में पेट के भीतर तरल पदार्थ जमा हो सकता है जिसे जलोदर कहा जाता है। इसकी वजह से पेट धीरे धीरे बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है और पेट भारी या तना हुआ महसूस हो सकता है। इसके साथ पैरों में सूजन त्वचा या आंखों में पीलापन कमजोरी और भूख कम लगने जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं।

    इसलिए अगर पेट फूलने की समस्या कभी कभार होती है और सामान्य खानपान में बदलाव से ठीक हो जाती है तो बहुत ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर ब्लोटिंग लगातार बनी हुई है या इसके साथ तेजी से वजन कम होना मल में खून आना बार बार उल्टी होना तेज पेट दर्द या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दे रहे हैं तो डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। केवल घरेलू नुस्खों के सहारे समस्या को दबाने के बजाय उसके वास्तविक कारण की जांच कराना ज्यादा जरूरी है। सही समय पर कारण की पहचान और उपचार से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।

  • दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह

    दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह


    नई दिल्ली। छोटे बच्चों में कई बार ऐसी आदतें देखने को मिलती हैं जिन्हें देखकर माता पिता हैरान रह जाते हैं। कुछ बच्चे दीवार से चूना खुरचकर खाने लगते हैं तो कुछ मिट्टी चॉक कागज या दूसरी ऐसी चीजें मुंह में डालते हैं जो खाने योग्य नहीं होतीं। शुरुआत में माता पिता इसे बच्चे की शरारत या जिज्ञासा समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं लेकिन अगर बच्चा बार बार ऐसी चीजें खाने की कोशिश कर रहा है तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार गैर खाद्य चीजों को लगातार खाने की इच्छा Pica जैसी स्थिति से जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया जैसे पोषण संबंधी कारणों की भी जांच की जरूरत पड़ सकती है।

    बच्चे के चूना खाने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। छोटे बच्चे अक्सर आसपास की चीजों को देखकर और उन्हें छूकर समझने की कोशिश करते हैं इसलिए कभी कभी जिज्ञासा के कारण भी वे दीवार से निकला चूना मुंह में डाल सकते हैं। लेकिन अगर यह व्यवहार लगातार बना हुआ है और बच्चा चूने के अलावा मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य वस्तुएं भी खाने लगा है तो इसे सामान्य आदत मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है ताकि बच्चे की स्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों को समझा जा सके।

    चूना खाने से बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चूने के प्रकार और निगली गई मात्रा के आधार पर परेशानी अलग अलग हो सकती है। कुछ मामलों में पेट दर्द उल्टी कब्ज या पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। अगर बच्चे ने अधिक मात्रा में चूना निगल लिया है या उसके मुंह में जलन दर्द उल्टी अथवा सांस लेने जैसी परेशानी दिखाई दे रही है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

    बच्चे को इस आदत से बचाने के लिए सबसे पहले घर का वातावरण सुरक्षित बनाना जरूरी है। जहां से दीवार का चूना निकल रहा है उसे जल्द ठीक करवाएं और घर में रखा चूना पेंट पुट्टी या ऐसी दूसरी सामग्री बच्चे की पहुंच से दूर रखें। बच्चे को बार बार डांटने या डराने के बजाय प्यार से समझाएं और उसका ध्यान किसी खेल खिलौने या दूसरी गतिविधि की तरफ मोड़ें। इससे धीरे धीरे उसकी आदत को कम करने में मदद मिल सकती है।

    बच्चे के भोजन पर भी ध्यान देना जरूरी है। उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार आयरन प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार देना चाहिए। हरी सब्जियां दालें चना राजमा अंडा और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ बच्चे की डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। हालांकि केवल चूना खाने की आदत देखकर माता पिता को खुद से आयरन या कोई दूसरा सप्लीमेंट शुरू नहीं करना चाहिए। जरूरत होने पर डॉक्टर जांच के बाद उचित सलाह दे सकते हैं।

    अगर बच्चा लगातार चूना मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य चीजें खाता है तो बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे बेहतर कदम है। समय रहते कारण समझने और सही उपाय अपनाने से इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। माता पिता का धैर्य बच्चे की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत

    दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत


    नई दिल्ली। मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए लंबे समय से ध्यान और योग को फायदेमंद माना जाता रहा है। आमतौर पर मेडिटेशन को तनाव कम करने और मन को शांत रखने से जोड़कर देखा जाता है लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसके प्रभाव को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन में महज सात दिनों के गहन ध्यान और मन शरीर से जुड़े अभ्यास के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क और शरीर में कई मापने योग्य बदलाव देखे गए। शोधकर्ताओं को मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ रक्त में मौजूद जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा प्रणाली मेटाबॉलिज्म और शरीर की प्राकृतिक दर्द नियंत्रण प्रक्रिया में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अध्ययन में न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े बदलावों के संकेत भी दिखाई दिए।

    न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह प्राकृतिक क्षमता है जिसके जरिए वह नए अनुभवों और लगातार किए जाने वाले अभ्यास के आधार पर अपनी कार्यप्रणाली और तंत्रिका संबंधों में बदलाव कर सकता है। आसान भाषा में समझें तो मस्तिष्क पूरी तरह स्थिर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों और अनुभवों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ध्यान को केवल मानसिक शांति देने वाली गतिविधि के तौर पर नहीं बल्कि मस्तिष्क और शरीर के बीच होने वाली जटिल जैविक प्रक्रिया के रूप में भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।

    इस अध्ययन में 20 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों ने सात दिनों के एक आवासीय कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें रोजाना ध्यान से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया और कुल करीब 33 घंटे का निर्देशित ध्यान कराया गया। कार्यक्रम शुरू होने से पहले और समाप्त होने के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क की एफएमआरआई जांच की गई। इसके साथ ही उनके रक्त के नमूने लेकर शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया।

    शोधकर्ताओं के मुताबिक सात दिन के कार्यक्रम के बाद मस्तिष्क के उन हिस्सों की गतिविधि में कमी देखी गई जो लगातार चलने वाले आंतरिक विचारों और मानसिक बातचीत से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों ने इसे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में संभावित बेहतर दक्षता से जोड़कर देखा है। इसके अलावा रक्त में मौजूद कुछ जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा गतिविधि और मेटाबॉलिज्म से जुड़े बदलावों का भी अध्ययन किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि ध्यान का असर केवल व्यक्ति के मानसिक अनुभव तक सीमित नहीं हो सकता बल्कि शरीर की कई प्रक्रियाओं से भी इसका संबंध हो सकता है।

    हालांकि इस अध्ययन के नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं लेकिन इन्हें अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी। अध्ययन में केवल 20 स्वस्थ वयस्क शामिल थे और इसकी अवधि भी सिर्फ सात दिन रही। इसलिए यह जानने के लिए बड़े स्तर पर और लंबे समय तक शोध की जरूरत होगी कि ध्यान से होने वाले ये बदलाव कितने स्थायी हैं और अलग अलग उम्र तथा स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों पर इनका असर कितना अलग हो सकता है।

    फिलहाल यह अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है कि नियमित और गहन ध्यान मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के साथ शरीर की दूसरी जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। यानी ध्यान को सिर्फ तनाव कम करने का माध्यम मानने के बजाय मस्तिष्क और शरीर के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ी जीवनशैली की आदत के रूप में भी देखा जा सकता है।

  • गमले या आंगन में उगाएं जामुन का पेड़, पौधा लगाने से लेकर खाद-पानी और प्रूनिंग तक जानें आसान देखभाल के तरीके

    गमले या आंगन में उगाएं जामुन का पेड़, पौधा लगाने से लेकर खाद-पानी और प्रूनिंग तक जानें आसान देखभाल के तरीके

    नई दिल्ली । घर के आंगन, किचन गार्डन या बड़े गमले में फलदार पौधे लगाने का शौक रखने वालों के लिए जामुन का पौधा एक अच्छा विकल्प हो सकता है। जामुन गर्म जलवायु में अच्छी तरह विकसित होने वाला फलदार पेड़ है और उचित देखभाल मिलने पर लंबे समय तक बढ़ता रहता है। मानसून के दौरान मिट्टी में नमी रहने के कारण पौधे को नई जगह पर स्थापित होने में मदद मिल सकती है। हालांकि पौधा लगाने से पहले जगह, मिट्टी, पानी और धूप से जुड़ी कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।

    घर पर जामुन उगाने के लिए बीज के बजाय अच्छी नर्सरी से स्वस्थ पौधा लेना अधिक सुविधाजनक हो सकता है। बीज से तैयार पौधे को फल देने में ज्यादा समय लग सकता है, जबकि अच्छी किस्म का ग्राफ्टेड या नर्सरी से प्राप्त पौधा अपेक्षाकृत जल्दी फल देने की स्थिति में पहुंच सकता है। पौधा खरीदते समय उसकी किस्म, उम्र और फल आने की संभावित अवधि की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।

    जामुन का पौधा लगाने के लिए ऐसी जगह का चुनाव करें जहां रोजाना पर्याप्त मात्रा में धूप पहुंचती हो। सीधी धूप मिलने से पौधे की बढ़त बेहतर हो सकती है। अगर इसे जमीन में लगाया जा रहा है तो आसपास पर्याप्त खुली जगह होना जरूरी है, क्योंकि समय के साथ जामुन का पेड़ काफी बड़ा हो सकता है। इसे दीवार, पाइप, फर्श या दूसरी स्थायी संरचनाओं से उचित दूरी पर लगाना बेहतर रहता है।

    मिट्टी का चुनाव भी पौधे की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। जामुन के पौधे के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर रहती है जिसमें पानी आसानी से निकल सके। जिस मिट्टी में लंबे समय तक पानी जमा रहता है, वहां जड़ों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। पौधा लगाने से पहले मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद या कंपोस्ट मिलाने से मिट्टी की संरचना बेहतर करने और शुरुआती पोषण देने में मदद मिल सकती है।

    जमीन में पौधा लगाने के लिए उसकी जड़ों के आकार से थोड़ा बड़ा गड्ढा तैयार करें। गड्ढे में मिट्टी और कंपोस्ट का मिश्रण डालकर पौधे को सावधानी से रखें। इस दौरान जड़ों को मोड़ने या दबाने से बचें। पौधा लगाने के बाद आसपास की मिट्टी को हल्के हाथ से दबाएं और पर्याप्त पानी दें। हालांकि शुरुआती दिनों में मिट्टी को लगातार बहुत ज्यादा गीला रखने से बचना चाहिए।

    अगर जामुन का पौधा गमले में लगाना चाहते हैं तो सामान्य छोटे गमले के बजाय बड़ा और मजबूत कंटेनर चुनना बेहतर रहेगा। गमले के नीचे पानी की निकासी के लिए पर्याप्त छेद होने चाहिए। जैसे-जैसे पौधे की जड़ें और आकार बढ़ें, जरूरत के अनुसार उसे बड़े कंटेनर में स्थानांतरित किया जा सकता है। गमले में उगाए गए पौधे के लिए धूप और पानी की मात्रा पर विशेष नजर रखना जरूरी है।

    नए लगाए गए पौधे को शुरुआत में नियमित सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन हर बार पानी देने से पहले मिट्टी की ऊपरी परत की नमी जांचना बेहतर है। यदि मिट्टी पहले से नम है तो तुरंत पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। पौधे के स्थापित होने के बाद पानी की जरूरत मौसम, मिट्टी और पौधे की स्थिति के अनुसार बदल सकती है।

    अच्छी ग्रोथ के लिए समय-समय पर जैविक कंपोस्ट या उपयुक्त खाद दी जा सकती है। बहुत अधिक खाद देने से बचना चाहिए। सूखी, कमजोर और आपस में रगड़ खाने वाली शाखाओं को समय-समय पर हटाने से पौधे का आकार व्यवस्थित रखने में मदद मिल सकती है। फल आने का समय जामुन की किस्म, पौधे की उम्र, मौसम और देखभाल पर निर्भर करता है। इसलिए पौधा लगाते समय धैर्य रखना जरूरी है। सही पौधा, पर्याप्त धूप, अच्छी जल निकासी और संतुलित देखभाल के साथ घर में लगाया गया जामुन का पौधा आने वाले वर्षों में फलदार पेड़ का रूप ले सकता है।