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  • रामनवमी 2026: प्रभु श्री राम से प्रेरित रंगोली से सजाएं घर

    रामनवमी 2026: प्रभु श्री राम से प्रेरित रंगोली से सजाएं घर


    नई दिल्ली । रामनवमी के पावन अवसर पर घर को सजाना और धार्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण प्रतीकों से सजावट करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी अवसर पर रंगोली बनाना न केवल घर की खूबसूरती बढ़ाता है, बल्कि इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। 2026 में रामनवमी पर लोग पारंपरिक रंगोली से हटकर प्रभु श्री राम से जुड़ी थीम-बेस्ड रंगोली बनाने को अधिक पसंद कर रहे हैं। ऐसे रंगोली डिज़ाइन न केवल सुंदर दिखाई देते हैं, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं।

    सबसे सरल और प्रभावशाली डिजाइन के रूप में धनुष-बाण वाली रंगोली को अपनाया जा सकता है। इसके लिए लाल और पीले रंगों का उपयोग कर बड़े धनुष का आकार बनाएं और बीच में “जय श्री राम” लिखें। किनारों पर गेंदे के फूल सजाने से रंगोली को एक पेशेवर लुक मिलता है। यह डिजाइन बच्चों और बड़ों दोनों के लिए आसान और आकर्षक होता है।

    भगवान राम के आगमन के प्रतीक के रूप में चरण पादुका वाली रंगोली भी बहुत लोकप्रिय है। मुख्य द्वार पर छोटी-छोटी चरण पादुकाएं कुमकुम और सफेद चौक से बनाई जाती हैं और इनके चारों ओर फूलों की पंखुड़ियों का घेरा तैयार किया जाता है। यह डिज़ाइन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है।

    अगर आपको चित्र बनाना कठिन लगता है, तो नाम मंत्र वाली रंगोली एक बेहतरीन विकल्प है। गहरे नीले या केसरिया रंग के बेस पर सफेद रंग से “राम” या “जय श्री राम” लिखें। बिंदुओं की मदद से इसे सजाना बेहद आसान है। इस तरह की रंगोली केवल 5 मिनट में तैयार हो सकती है और घर के मुख्य द्वार को खूबसूरती से सजाती है।

    दीपक और कमल के फूल का संयोजन भी रामलला के स्वागत के लिए अत्यंत आकर्षक विकल्प है। कमल के फूल का डिजाइन बनाएं और उसके बीच में मिट्टी का दीपक जलाएं। यह डिजाइन सादगी और भव्यता का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करता है। यदि सटीक लाइन खींचना मुश्किल हो, तो चूड़ी और चम्मच का उपयोग करके गोल घेरे और उभरे हुए डिजाइन तैयार किए जा सकते हैं।

    रंगों के साथ-साथ ताजे गेंदे और गुलाब के फूलों का प्रयोग रंगोली को जीवंत और आकर्षक बनाता है। इन डिज़ाइनों से न केवल घर महक उठता है बल्कि आने वाले मेहमान और पड़ोसी भी आपकी रचनात्मकता की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते। रंगोली बनाने का यह अनुभव धार्मिक, सौंदर्यात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से आनंददायक होता है।

    इस प्रकार, रामनवमी पर प्रभु श्री राम से प्रेरित रंगोली बनाना न केवल घर को सजाने का माध्यम है बल्कि यह श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी बनता है। चाहे धनुष-बाण हो, चरण पादुका, नाम मंत्र या दीपक-कमल का संयोजन, ये डिज़ाइन सभी उम्र के लोगों के लिए आसान और खूबसूरत विकल्प हैं। इस बार रामनवमी 2026 पर इन रंगोली डिज़ाइनों से घर को सजाएं और प्रभु श्री राम का स्वागत भव्य तरीके से करें।

  • गर्मियों में फटी एड़ियों और टैनिंग से राहत, घर पर करें आसान 15 मिनट पेडिक्योर

    गर्मियों में फटी एड़ियों और टैनिंग से राहत, घर पर करें आसान 15 मिनट पेडिक्योर


    नई दिल्ली । गर्मियों में पैरों की देखभाल पर ध्यान न देने से फटी एड़ियां, टैनिंग और रूखापन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। दिनभर जूतों में बंद रहने, पसीने और धूल के कारण पैर प्रभावित होते हैं और फंगल इंफेक्शन, खुजली और बदबू जैसी परेशानियां घर करने लगती हैं। ऐसे में महंगे पार्लर की बजाय आप घर पर ही आसान और प्राकृतिक उपायों से पैरों को फ्रेश और बेबी सॉफ्ट बना सकते हैं।

    सबसे पहले बात करते हैं पैरों की सफाई और नमी की सही देखभाल की। नहाने के बाद अक्सर लोग शरीर तो पोंछ लेते हैं, लेकिन पैरों की उंगलियों के बीच के हिस्से गीले छोड़ देते हैं। यही नमी फंगल इंफेक्शन की असली जड़ बन जाती है। इसलिए पैरों को तौलिये से अच्छी तरह सुखाएं और अगर संभव हो तो थोड़ी देर उन्हें हवा या हल्की धूप दिखाएं। यह कदम पैरों को संक्रमण और बैक्टीरिया से बचाने में मदद करता है।

    फुटवियर का चयन भी बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मियों में टाइट या सिंथेटिक जूते पहनने से बचें। ऐसे जूते चुनें जिनमें हवा का संचार आसानी से हो सके। कॉटन के मोज़े पहनना और समय-समय पर जूतों को धूप दिखाना पैरों की बदबू रोकने का सरल उपाय है।

    नीम का उपयोग आयुर्वेद में त्वचा की सुरक्षा के लिए सबसे प्रभावशाली माना गया है। गर्मियों में पैरों को फंगल इंफेक्शन और बैक्टीरिया से बचाने के लिए नहाने के पानी में नीम की पत्तियां डालें या नीम के तेल की 3-4 बूंदें मिलाएं। इसके एंटी-बैक्टीरियल गुण पैरों को साफ और स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

    पैरों की मृत त्वचा हटाने के लिए किचन में उपलब्ध प्राकृतिक स्क्रब का उपयोग करें। इसके लिए थोड़ी सी शक्कर या चीनी में नारियल तेल मिलाकर पैरों की हल्की मालिश करें। यह सप्ताह में एक बार करें। यह न केवल डेड स्किन को हटाता है बल्कि नारियल तेल पैरों को मखमली कोमलता और पोषण भी देता है। इसके साथ ही रक्त संचार भी बेहतर होता है, जिससे पैरों की त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रहती है।

    इसके अलावा, फटी एड़ियों से राहत पाने के लिए पैरों को नियमित रूप से मॉइश्चराइज करना जरूरी है। रात को सोने से पहले नारियल या बादाम के तेल से एड़ियों की मालिश करें और कपड़े के सोक्स पहन लें। इससे पैरों की त्वचा नमी बनाए रखती है और टैनिंग कम होती है।

    नियमित सफाई, सही फुटवियर, नीम और नारियल आधारित प्राकृतिक उपाय अपनाकर आप गर्मियों में पैरों को स्वस्थ, सुंदर और फ्रेश रख सकते हैं। फटी एड़ियों, टैनिंग और खुजली जैसी परेशानियों से राहत पाने के लिए बस 15 मिनट का नियमित पेडिक्योर काफी है। इस गर्मी अपने पैरों को भी वही देखभाल दें जो आप अपने चेहरे को देते हैं और घर पर ही बेबी सॉफ्ट पैरों का अनुभव पाएं।

  • हफ्ते से ज्यादा खांसी है तो हो जाए सावधान टीबी का संकेत हो सकता है

    हफ्ते से ज्यादा खांसी है तो हो जाए सावधान टीबी का संकेत हो सकता है

    नई दिल्ली:  टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस आज भी भारत में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। बदलते मौसम में खांसी होना आम बात है, लेकिन हर खांसी को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। कई बार साधारण दिखने वाली खांसी किसी बड़ी बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकती है

    सामान्य खांसी आमतौर पर 5 से 7 दिनों में ठीक हो जाती है, जो सर्दी, वायरल इंफेक्शन या एलर्जी के कारण होती है। लेकिन अगर खांसी 2 से 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक बनी रहती है और दवाओं से आराम नहीं मिलता, तो यह टीबी का संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है

    टीबी सिर्फ खांसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह शरीर को अंदर से कमजोर कर देती है। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे शाम के समय हल्का बुखार, रात में ज्यादा पसीना आना, बिना कारण वजन कम होना, लगातार थकान महसूस होना और सीने में दर्द

    टीबी के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और दूसरों में भी फैल सकती है। इसलिए अगर खांसी के साथ ये लक्षण नजर आएं, तो देरी न करें और तुरंत जांच कराएं

    विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता और समय पर इलाज ही टीबी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। अगर शुरुआती लक्षणों को पहचान लिया जाए, तो इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है
    हर खांसी को नजरअंदाज न करें। अगर यह लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे चेतावनी संकेत मानकर तुरंत मेडिकल सलाह लेना ही समझदारी है

  • बाल झड़ने और डैंड्रफ की समस्या? गर्मियों में एलोवेरा बनेगा आपका उपाय

    बाल झड़ने और डैंड्रफ की समस्या? गर्मियों में एलोवेरा बनेगा आपका उपाय


    नई दिल्ली। गर्मियों का मौसम बालों और स्कैल्प के लिए कई चुनौतियां लेकर आता है। तेज धूप, पसीना और धूल के कारण बाल कमजोर पड़ने लगते हैं, झड़ने लगते हैं और स्कैल्प में खुजली व डैंड्रफ की समस्या आम हो जाती है। ऐसे समय में शैंपू-कंडीशनर से ज्यादा असरदार और प्राकृतिक उपाय के रूप में एलोवेरा को माना जाता है।

    नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के विशेषज्ञों के अनुसार, एलोवेरा आयुर्वेद का सबसे भरोसेमंद और प्राकृतिक विकल्प है। यह बालों और स्कैल्प की गहराई तक सफाई करता है, जड़ों को मजबूत बनाता है और बालों को सिरे तक स्वस्थ बनाए रखता है। एलोवेरा में मौजूद प्राकृतिक एंजाइम, विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स बालों के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।

    एलोवेरा स्कैल्प पर जमा अतिरिक्त तेल को हटाता है, जिससे तैलीय बालों की समस्या कम होती है। यह बालों की जड़ों को पोषण देता है, टूटने-झड़ने से बचाता है और बालों को रिपेयर करने में मदद करता है। इसके एंटी-फंगल गुण डैंड्रफ और अन्य फंगल इंफेक्शन को रोकते हैं। साथ ही यह खुजली को शांत करता है और गर्मियों में पसीने से होने वाली जलन और इरिटेशन से तुरंत राहत देता है।

    एलोवेरा से बालों की देखभाल करना बेहद आसान है। इसके लिए ताजा एलोवेरा का जेल निकालकर सीधे स्कैल्प पर लगाएं और 30-40 मिनट बाद हल्के शैंपू से धो लें। सप्ताह में 2-3 बार एलोवेरा जेल में नारियल तेल मिलाकर सिर की मालिश करने से बालों की जड़ों को अतिरिक्त पोषण मिलता है और बाल मजबूत होते हैं। इसके अलावा, एलोवेरा जेल को नींबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से डैंड्रफ और तैलीयता कम होती है। बालों में एलोवेरा जेल को रातभर लगाकर सुबह धोने से बाल मुलायम, चमकदार और स्वस्थ बनते हैं।

    आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से एलोवेरा का उपयोग करने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, बालों का झड़ना कम होता है और स्कैल्प स्वस्थ रहता है। यह गर्मियों में केमिकल युक्त शैंपू के विकल्प के रूप में सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक तरीका है। एलोवेरा न केवल बालों को पोषण देता है बल्कि स्कैल्प को ठंडक और राहत भी प्रदान करता है।

    गर्मियों में एलोवेरा का उपयोग बालों की लंबी उम्र, उनकी मजबूती और प्राकृतिक चमक बनाए रखने के लिए अत्यंत प्रभावी है। इसे घर पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है और यह बालों की देखभाल को सरल, सुरक्षित और प्राकृतिक बनाता है। इस प्रकार, गर्मियों में बालों और स्कैल्प की पूरी देखभाल के लिए शैंपू-कंडीशनर की जगह एलोवेरा अपनाना न केवल फायदेमंद है बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी यह अत्यंत प्रभावशाली उपाय है।

  • अंकुरित अनाज: सही तरीका और सही व्यक्ति, नहीं तो हो सकता है नुकसान

    अंकुरित अनाज: सही तरीका और सही व्यक्ति, नहीं तो हो सकता है नुकसान


    नई दिल्ली । प्रोटीन और फाइबर शरीर के लिए ऊर्जा, ताकत और मांसपेशियों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, रोजमर्रा के आहार में इनकी पर्याप्त मात्रा शामिल करना अक्सर मुश्किल होता है। ऐसे में लोग अंकुरित अनाज यानी स्प्राउट्स का सहारा लेते हैं, क्योंकि यह पोषण का एक प्राकृतिक और समृद्ध स्रोत माना जाता है। लेकिन आयुर्वेद और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार अंकुरित आहार का सही सेवन और सही व्यक्ति के लिए ही लाभकारी होता है।

    अंकुरित अनाज कई तरह से शरीर को फायदा पहुंचाते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स की पर्याप्त मात्रा होती है, जो शरीर की ऊर्जा बढ़ाने, मांसपेशियों को मजबूत करने और कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होती है। लेकिन यदि इसे सही तरीके से नहीं लिया जाए तो यह पाचन संबंधी समस्याओं का कारण भी बन सकता है।

    आयुर्वेद के अनुसार अंकुरित अनाज पचने में थोड़ा भारी होता है और अधिक सेवन से वात दोष और गैस की समस्या बढ़ सकती है। इससे शरीर में रूखापन बढ़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि स्प्राउट्स को हमेशा हल्का पकाकर, घी या तेल के साथ और सीमित मात्रा में ही लिया जाए। ऐसा करने से यह शरीर को ताकत देने के साथ पाचन को भी संतुलित रखता है।

    विशेष रूप से जिन लोगों का पाचन मंद है और कब्ज की समस्या रहती है, उन्हें अंकुरित आहार से बचना चाहिए। पाचन मंद होने पर अंकुरित अनाज शरीर में ठीक से पच नहीं पाता और पोषण की जगह शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा हो सकते हैं। इसी कारण बच्चे और बुजुर्गों को भी अंकुरित अनाज देने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इन उम्र में पाचन सबसे कमजोर होता है।

    इसके अलावा वात प्रवृत्ति वाले लोग भी इस आहार का सेवन सीमित मात्रा में ही करें। आयुर्वेद में वात दोष को बढ़ाने वाले आहार से बचने की सलाह दी जाती है, और अंकुरित अनाज वात में वृद्धि कर सकता है। इसलिए इसे हल्का पकाकर, घी या तेल के साथ, और उचित मात्रा में लेना ही फायदेमंद होता है।

    अंकुरित अनाज का सेवन करते समय कुछ विशेष उपाय भी ध्यान में रखने चाहिए। सबसे पहले इसे कच्चा खाने से बचें। अंकुरित अनाज को हल्का उबालकर या घी/तेल में पकाकर ही खाना चाहिए। इसके अलावा अंकुरित अनाज को तुरंत ही सेवन करना चाहिए। ज्यादा लंबे समय तक अंकुरित रहने पर इसके पोषक तत्वों पर असर पड़ सकता है।

    इस प्रकार, अंकुरित अनाज का सेवन शरीर के लिए लाभकारी है, लेकिन केवल सही व्यक्ति और सही तरीके से ही। नियमित रूप से नियंत्रित मात्रा में और हल्का पकाकर सेवन करने से यह ऊर्जा, ताकत और पाचन दोनों में सुधार करता है। वहीं, गलत तरीके या अधिक मात्रा में लेने पर यह पाचन और वात दोष जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक दृष्टि से स्प्राउट्स को संतुलित, समय पर और विधिपूर्वक ही आहार में शामिल करना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।

  • कम उम्र में सफेद बाल? पित्त दोष हो सकता है वजह, जानें आयुर्वेदिक कारण और असरदार उपाय

    कम उम्र में सफेद बाल? पित्त दोष हो सकता है वजह, जानें आयुर्वेदिक कारण और असरदार उपाय


    नई दिल्ली:आज के समय में कम उम्र में ही बालों का सफेद होना एक आम समस्या बनती जा रही है। पहले जहां सफेद बालों को बढ़ती उम्र की निशानी माना जाता था, वहीं अब यह युवाओं में भी तेजी से देखने को मिल रहा है। आयुर्वेद के अनुसार इसका एक बड़ा कारण पित्त दोष का असंतुलन है, जो शरीर में कई तरह की समस्याओं को जन्म देता है।

    आयुर्वेद में बताया गया है कि जब पित्त दोष बढ़ जाता है, तो इसका सीधा असर बालों के रंगद्रव्य यानी मेलानिन पर पड़ता है। इससे बाल समय से पहले सफेद होने लगते हैं। इसके अलावा गलत खान-पान, अत्यधिक तनाव, अनियमित दिनचर्या और नींद की कमी भी इस समस्या को बढ़ावा देते हैं। यही कारण है कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में यह परेशानी तेजी से बढ़ रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सफेद बालों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले पित्त को संतुलित करना जरूरी है। इसके लिए खान-पान में सुधार करना बेहद अहम भूमिका निभाता है। ज्यादा मसालेदार, तैलीय और खट्टे भोजन से दूरी बनानी चाहिए। चाय, कॉफी और अधिक नमक वाले खाद्य पदार्थ भी पित्त को बढ़ाते हैं, इसलिए इनका सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए।

    इसके साथ ही आहार में पोषक तत्वों को शामिल करना भी जरूरी है। आयुर्वेद में आंवला, चुकंदर, घी, काली मुनक्का, शतावरी और त्रिफला जैसे तत्वों को बेहद फायदेमंद माना गया है। ये न केवल शरीर को अंदर से पोषण देते हैं, बल्कि बालों की जड़ों को भी मजबूत बनाते हैं।

    बाहरी देखभाल भी उतनी ही जरूरी है। बालों में नियमित रूप से तेल लगाना बहुत लाभकारी होता है। खासतौर पर नारियल तेल और भृंगराज तेल से हफ्ते में दो बार मालिश करने से बालों को पोषण मिलता है और सफेद बालों की गति को धीमा किया जा सकता है। यह उपाय बालों को मजबूत और चमकदार बनाने में भी मदद करता है।

    मानसिक तनाव भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है। आजकल की व्यस्त जीवनशैली में लोग पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, जिससे शरीर और दिमाग दोनों पर नकारात्मक असर पड़ता है। गुस्सा, चिड़चिड़ापन और लगातार तनाव बालों की सेहत को खराब कर देते हैं। इसलिए जरूरी है कि आप अपनी दिनचर्या में सुधार करें, समय पर सोएं और खुद को मानसिक रूप से शांत रखने की कोशिश करें।

    योग, ध्यान और प्रकृति के बीच समय बिताना भी इस दिशा में काफी मददगार साबित हो सकता है। खुली हवा में टहलना और सकारात्मक सोच अपनाना न केवल मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि बालों की सेहत पर भी अच्छा असर डालता है।

    सफेद बालों की समस्या को रोकने के लिए केवल बाहरी उपाय ही नहीं, बल्कि अंदर से संतुलन बनाए रखना जरूरी है। सही खान-पान, संतुलित जीवनशैली और आयुर्वेदिक उपाय अपनाकर आप इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं।
  • मार्च-अप्रैल में ट्रिप का प्लान? इन जगहों से दूरी ही बेहतर, वरना खराब हो सकता है पूरा मजा!

    मार्च-अप्रैल में ट्रिप का प्लान? इन जगहों से दूरी ही बेहतर, वरना खराब हो सकता है पूरा मजा!


    नई दिल्ली:मार्च और अप्रैल का महीना भारत में घूमने-फिरने के लिहाज से काफी लोकप्रिय माना जाता है। स्कूल-कॉलेज की परीक्षाएं खत्म होने लगती हैं और छुट्टियों का माहौल बन जाता है, ऐसे में ज्यादातर परिवार ट्रिप प्लान करने लगते हैं। लेकिन हर जगह इस मौसम में घूमने के लिए सही नहीं होती। कई डेस्टिनेशन ऐसे हैं जहां इस दौरान या तो भीषण गर्मी पड़ती है या फिर इतनी ज्यादा भीड़ हो जाती है कि आपका पूरा ट्रैवल एक्सपीरियंस खराब हो सकता है।

    सबसे पहले बात करें राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों की, खासकर जैसलमेर, बीकानेर और बाड़मेर जैसे शहरों की। मार्च की शुरुआत से ही यहां तापमान तेजी से बढ़ने लगता है और दिन में पारा 35 डिग्री से ऊपर पहुंच जाता है। तेज धूप और गर्म हवाएं बाहर घूमना मुश्किल बना देती हैं। ऐसे में अगर आप आरामदायक ट्रिप चाहते हैं तो इन जगहों को इस समय टालना ही बेहतर रहेगा।

    दूसरा नाम आता है मसूरी का, जिसे ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ कहा जाता है। आमतौर पर यह एक बेहतरीन हिल स्टेशन है, लेकिन मार्च-अप्रैल में यहां टूरिस्ट सीजन पीक पर होता है। स्कूल की छुट्टियों के कारण यहां भारी भीड़ उमड़ती है। मॉल रोड पर चलना भी मुश्किल हो जाता है, होटल महंगे हो जाते हैं और ट्रैफिक जाम आम बात बन जाती है। अगर आप शांति और सुकून की तलाश में हैं, तो इस समय मसूरी जाना निराश कर सकता है।

    तीसरी जगह है आगरा, जो अपने ऐतिहासिक महत्व और ताजमहल के लिए दुनियाभर में मशहूर है। लेकिन मार्च और अप्रैल में यहां की गर्मी परेशान कर सकती है। धूप इतनी तेज होती है कि दिन में घूमना मुश्किल हो जाता है, खासकर अगर आप लंबे समय तक बाहर रहना चाहते हैं। भीड़ और गर्म मौसम का कॉम्बिनेशन ट्रिप का मजा कम कर सकता है।

    इन सबके अलावा एक और बात ध्यान रखने वाली है कि इन महीनों में कई जगहों पर होटल और ट्रांसपोर्ट की कीमतें भी बढ़ जाती हैं, जिससे आपका बजट भी बिगड़ सकता है। इसलिए ट्रिप प्लान करते समय सिर्फ जगह की खूबसूरती नहीं, बल्कि मौसम, भीड़ और सुविधा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

    अगर आप सच में इस समय एक अच्छा ट्रैवल अनुभव चाहते हैं, तो ऐसी जगहों का चुनाव करें जहां मौसम सुहावना हो, भीड़ कम हो और आप आराम से घूम सकें। सही प्लानिंग और सही डेस्टिनेशन का चुनाव ही आपकी छुट्टियों को यादगार बना सकता है।

  • तरबूज खरीदने का सीक्रेट फॉर्मूला हर बार मिलेगा लाल मीठा और पानी से भरपूर फल

    तरबूज खरीदने का सीक्रेट फॉर्मूला हर बार मिलेगा लाल मीठा और पानी से भरपूर फल


    नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम आते ही बाजार में तरबूज की भरमार दिखाई देने लगती है और यह फल हर घर की पहली पसंद बन जाता है क्योंकि इसमें भरपूर पानी होता है जो शरीर को ठंडक और ताजगी देता है लेकिन अक्सर लोगों के साथ एक बड़ी समस्या होती है कि बाहर से हरा और अच्छा दिखने वाला तरबूज अंदर से फीका या कच्चा निकल जाता है जिससे पैसे और उम्मीद दोनों खराब हो जाते हैं

    अक्सर लोग दुकान पर तरबूज को कटवाकर चेक करते हैं लेकिन यह तरीका सही नहीं माना जाता क्योंकि इससे फल जल्दी खराब हो सकता है और साफ सफाई की दृष्टि से भी यह सुरक्षित नहीं होता ऐसे में जरूरी है कि आप बिना काटे ही अच्छे तरबूज की पहचान करना सीखें ताकि हर बार मीठा और लाल फल ही घर लाएं

    तरबूज खरीदते समय सबसे पहले उसके नीचे बने पीले धब्बे पर ध्यान देना चाहिए जिसे फील्ड स्पॉट कहा जाता है यह धब्बा इस बात का संकेत होता है कि फल कितने समय तक जमीन पर पड़ा रहा और कितनी अच्छी तरह पका अगर यह धब्बा गहरा पीला या नारंगी रंग का है तो समझ लीजिए कि तरबूज पूरी तरह पका हुआ है और स्वाद में मीठा होगा वहीं अगर यह धब्बा हल्का हरा या सफेद है तो इसका मतलब है कि फल समय से पहले तोड़ा गया है और अंदर से कच्चा निकल सकता है

    इसके अलावा तरबूज को हल्के हाथ से थपथपाकर उसकी आवाज जरूर सुनें अगर उसमें से गूंजदार और खोखली आवाज आती है तो यह संकेत है कि फल अंदर से रसीला और पका हुआ है लेकिन अगर आवाज भारी या दबाव वाली लगे तो वह तरबूज कच्चा हो सकता है यह एक बहुत ही आसान और असरदार तरीका है जिसे अनुभवी लोग हमेशा अपनाते हैं

    वजन भी तरबूज की गुणवत्ता पहचानने का एक अहम तरीका है अगर आप एक जैसे आकार के दो तरबूज उठाते हैं और उनमें से एक ज्यादा भारी लगता है तो वही बेहतर होता है क्योंकि ज्यादा वजन का मतलब है उसमें पानी और रस की मात्रा अधिक है जो उसे मीठा और ताजा बनाता है

    तरबूज के बाहरी रंग और बनावट पर भी ध्यान देना चाहिए हमेशा गहरे हरे रंग और हल्के मैट फिनिश वाले तरबूज ही चुनें बहुत ज्यादा चमकदार तरबूज अक्सर कच्चे होते हैं इसके अलावा अगर तरबूज की सतह पर हल्की भूरी जाली जैसी रेखाएं दिखती हैं तो यह संकेत है कि परागण अच्छे से हुआ है और फल का स्वाद ज्यादा मीठा होगा

    अंत में तरबूज के डंठल को जरूर देखें अगर डंठल सूखा और भूरा है तो इसका मतलब है कि फल बेल पर पूरी तरह पक चुका है लेकिन अगर डंठल हरा है तो समझ लें कि उसे जल्दी तोड़ लिया गया है और उसका स्वाद उतना अच्छा नहीं होगा इन आसान लेकिन बेहद कारगर तरीकों को अपनाकर आप हर बार बाजार से सही तरबूज चुन सकते हैं और गर्मियों में ठंडक और मिठास का पूरा आनंद ले सकते हैं

  • छुट्टियों का असर, Ajmer बना पर्यटकों की पहली पसंद, हर जगह दिखा उत्साह..

    छुट्टियों का असर, Ajmer बना पर्यटकों की पहली पसंद, हर जगह दिखा उत्साह..


    नई दिल्ली:ईद के बाद वीकेंड आते ही Ajmer एक बार फिर पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार नजर आने लगा है, शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर न केवल स्थानीय लोग बल्कि आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग परिवार और दोस्तों के साथ घूमने पहुंच रहे हैं, छुट्टियों के इस अनुकूल माहौल ने लोगों को घरों से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया है जिससे पूरे शहर में एक अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है

    सुबह से ही शहर के पर्यटन स्थलों पर लोगों की आवाजाही शुरू हो जाती है जो देर शाम तक बनी रहती है, खासतौर पर Ana Sagar Lake और Subhash Udyan इन दिनों पर्यटकों की पहली पसंद बने हुए हैं, झील के किनारे बैठकर लोग सुकून के पल बिता रहे हैं तो वहीं बच्चे खेलकूद और मस्ती में व्यस्त नजर आते हैं, शाम के समय इन स्थानों का दृश्य और भी आकर्षक हो जाता है जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है

    पर्यटकों की बढ़ती संख्या का सकारात्मक असर स्थानीय कारोबार पर भी साफ दिखाई दे रहा है, झील और उद्यान के आसपास लगे खाने-पीने के स्टॉल, खिलौनों की दुकानें और छोटे व्यापारियों के यहां अच्छी खासी भीड़ देखने को मिल रही है, व्यापारियों का कहना है कि ईद के बाद आई इस भीड़ ने उनके कारोबार को नई गति दी है, जिससे लंबे समय बाद बाजारों में रौनक लौटती नजर आ रही है

    इसके साथ ही शहर के होटल और अन्य पर्यटन सेवाओं में भी हलचल बढ़ी है, बाहर से आने वाले पर्यटक यहां रुककर शहर की खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्व का आनंद ले रहे हैं, इससे पूरे पर्यटन तंत्र को मजबूती मिल रही है और रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं

    स्थानीय लोगों का कहना है कि शहर के बीच स्थित ये पर्यटन स्थल हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहे हैं, लेकिन त्योहारों और छुट्टियों के बाद यहां की रौनक कुछ अलग ही होती है, खास बात यह भी है कि Ajmer Sharif Dargah पर जियारत के लिए आने वाले जायरीन भी इन स्थलों का रुख करते हैं, जिससे पर्यटकों की संख्या और बढ़ जाती है

    रमजान के दौरान जहां पर्यटकों की आवाजाही में थोड़ी कमी आई थी, वहीं अब ईद के बाद यह सिलसिला फिर से तेज हो गया है, शहर में हर ओर खुशहाल और जीवंत माहौल नजर आ रहा है, लोग अपने परिवार के साथ समय बिताने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी आनंद ले रहे हैं
     

    अजमेर में पर्यटन गतिविधियों की यह वापसी न केवल शहर की रौनक को बढ़ा रही है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे रही है, आने वाले दिनों में भी यदि ऐसा ही माहौल बना रहा तो पर्यटन क्षेत्र और अधिक गति पकड़ सकता है
  • लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा

    लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा


    नई दिल्ली:टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस एक संक्रामक बीमारी है, जो Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि यह दिमाग, हड्डियों, किडनी और शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले सकती है

    लेकिन टीबी की एक स्थिति ऐसी भी होती है, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। इस स्थिति में टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद तो रहते हैं, लेकिन निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इसका मतलब यह है कि संक्रमित व्यक्ति को कोई लक्षण महसूस नहीं होते और न ही वह दूसरों में संक्रमण फैलाता है

    हर साल विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों के अनुसार लेटेंट टीबी को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह छुपी हुई स्थिति कभी भी सक्रिय टीबी में बदल सकती हैजब लेटेंट टीबी सक्रिय हो जाती है, तब इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। इनमें लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में पसीना आना और थकान जैसे संकेत शामिल हैं। इसलिए अगर इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है

    लेटेंट टीबी का खतरा उन लोगों में ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। इसमें एचआईवी संक्रमित, डायबिटीज के मरीज, कैंसर से पीड़ित लोग या लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा छोटे बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका जोखिम अधिक होता हैविश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी लेटेंट टीबी से प्रभावित है और भारत जैसे देशों में इसका खतरा और अधिक है। इसलिए समय रहते इसकी जांच और इलाज बेहद जरूरी है

    लेटेंट टीबी की पहचान के लिए ब्लड टेस्ट या ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट किया जाता है। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो डॉक्टर आमतौर पर 3 से 9 महीने तक दवाएं देते हैं, जिससे यह संक्रमण सक्रिय टीबी में बदलने से रोका जा सके

    बचाव के लिए जरूरी है कि अगर परिवार में किसी को लंबे समय तक खांसी, बुखार या अचानक वजन कम होने जैसी समस्या हो, तो तुरंत जांच कराई जाए। सही समय पर पहचान और इलाज से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता हैलेटेंट टीबी एक छिपा हुआ खतरा है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। समय पर जांच और उपचार ही इससे बचने का सबसे प्रभावी तरीका है

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