Category: Madhya Pradesh

  • सादगी का संदेश वाराणसी में सीएम डॉ मोहन यादव ने रोका काफिला और आम लोगों संग किया स्वाद का सफर

    सादगी का संदेश वाराणसी में सीएम डॉ मोहन यादव ने रोका काफिला और आम लोगों संग किया स्वाद का सफर


    भोपाल/वाराणसी । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अपने वाराणसी दौरे के दौरान ऐसा सहज और मानवीय रूप दिखाया जिसने लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ दी आमतौर पर वीआईपी मूवमेंट और सख्त सुरक्षा घेरे में रहने वाले मुख्यमंत्री का यह अंदाज लोगों के लिए किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था जब उनका काफिला एयरपोर्ट की ओर बढ़ रहा था तभी अचानक उन्होंने मिंट हाउस क्षेत्र में स्थित श्रीराम भंडार पर रुकने का निर्णय लिया यह फैसला न सिर्फ अप्रत्याशित था बल्कि इसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को उत्साहित कर दिया

    सीएम के काफिले के अचानक रुकने से पहले तो लोगों को समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है लेकिन जैसे ही उन्होंने मुख्यमंत्री को अपने बीच देखा माहौल पूरी तरह बदल गया लोग उत्साह से भर उठे और उनके साथ बातचीत करने के लिए आगे बढ़े इस दौरान मुख्यमंत्री ने बिना किसी औपचारिकता के स्थानीय लोगों से मुलाकात की उनकी बातें सुनी और पूरी आत्मीयता के साथ संवाद किया

    श्रीराम भंडार पर रुककर मुख्यमंत्री ने बनारस के प्रसिद्ध व्यंजनों का स्वाद लिया जिसमें कचौड़ी पूरी राम भाजी और जलेबी शामिल थीं उन्होंने बड़े चाव से इन पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लिया और स्थानीय स्वाद की सराहना की मुख्यमंत्री ने इस मौके पर कहा कि भारत की असली पहचान उसकी विविधता में छिपी है हर राज्य हर शहर और हर गली का अपना अलग स्वाद और संस्कृति होती है यही विविधता हमारे देश को खास बनाती है

    उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय खान पान सिर्फ भोजन नहीं बल्कि उस क्षेत्र की संस्कृति और परंपरा का प्रतीक होता है ऐसे व्यंजन पीढ़ियों से लोगों की यादों और जीवनशैली का हिस्सा बने हुए हैं और इन्हें अनुभव करना किसी भी जगह को समझने का सबसे सरल और सजीव तरीका है

    मुख्यमंत्री के इस सहज व्यवहार ने वहां मौजूद लोगों को खासा प्रभावित किया कई लोगों ने उनके साथ तस्वीरें लीं तो कई ने सीधे संवाद कर अपनी बात रखी स्थानीय नागरिकों का कहना था कि मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि वे किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति से बात कर रहे हैं बल्कि ऐसा लगा जैसे वे अपने ही बीच के किसी व्यक्ति से मिल रहे हों

    सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम की तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं लोग मुख्यमंत्री के इस सरल और जमीन से जुड़े अंदाज की जमकर तारीफ कर रहे हैं कई यूजर्स ने इसे एक सकारात्मक संदेश बताया है कि सत्ता में रहते हुए भी आम जनता से जुड़ाव बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है

    यह घटना सिर्फ एक छोटे से ठहराव की कहानी नहीं है बल्कि यह दर्शाती है कि जब नेतृत्व में सादगी और संवेदनशीलता होती है तो वह सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचती है सीएम मोहन यादव का यह कदम न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि को मजबूत करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि जनप्रतिनिधि और जनता के बीच की दूरी को कम करना संभव है अगर इरादा सच्चा हो

  • एमपी में 45 जिलों में आंधी-बारिश की चेतावनी, कई जगह ओलावृष्टि की भी संभावना

    एमपी में 45 जिलों में आंधी-बारिश की चेतावनी, कई जगह ओलावृष्टि की भी संभावना

    भोपाल। मध्य प्रदेश में साइक्लोनिक सर्कुलेशन (चक्रवात) और टर्फ से बना मजबूत वेदर सिस्टम सक्रिय बना हुआ है, जिससे पूरे प्रदेश में मौसम का मिजाज बदला हुआ है। पिछले चार दिनों से लगातार आंधी, बारिश और ओलावृष्टि का असर देखने को मिल रहा है। शुक्रवार को भी 20 से अधिक जिलों में इसी तरह का मौसम बना रहा।

    मौसम विभाग ने अगले 24 घंटों के दौरान भोपाल और ग्वालियर सहित 45 जिलों में तेज आंधी और बारिश की संभावना जताई है। विभाग के अनुसार, प्रदेश के मध्य भाग से एक टर्फ लाइन गुजर रही है, जबकि दूसरी ऊपरी हिस्से में सक्रिय है। इसके अलावा पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों में दो साइक्लोनिक सर्कुलेशन भी बने हुए हैं।

    कई जिलों में ओले-बारिश का अलर्ट
    इन सभी मौसम प्रणालियों के संयुक्त प्रभाव से प्रतिदिन 30 से 35 जिलों में मौसम परिवर्तन हो रहा है। शनिवार को जबलपुर, छतरपुर, पन्ना, दमोह और कटनी में ओलावृष्टि के साथ बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। वहीं, भोपाल, ग्वालियर, श्योपुर, मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी, गुना, अशोकनगर, नीमच, मंदसौर, आगर-मालवा, राजगढ़, शाजापुर, सीहोर, हरदा, खंडवा, बुरहानपुर, बैतूल, नर्मदापुरम, रायसेन, सागर, विदिशा, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, पांढुर्णा, सिवनी, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी, अनूपपुर, उमरिया, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज, रीवा, सतना, मैहर, निवाड़ी और टीकमगढ़ में गरज-चमक के साथ आंधी और बारिश का सिलसिला जारी रह सकता है।

    तेज रफ्तार से चलेंगी हवाएं
    मौसम विभाग के मुताबिक, अगले चार दिनों यानी 7 अप्रैल तक प्रदेश में तेज हवाएं भी चलेंगी। कुछ इलाकों में हवा की गति 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह 30 से 40 किमी प्रति घंटा के बीच रह सकती है।

    7 अप्रैल से नया सिस्टम होगा एक्टिव
    प्रदेश में मौसम की सक्रियता अभी जारी रहेगी। 7 अप्रैल से एक नया वेस्टर्न डिस्टरबेंस (पश्चिमी विक्षोभ) प्रभावी होगा, जिसके कारण 10 अप्रैल तक कहीं आंधी तो कहीं बारिश का दौर बना रह सकता है।

    इसके बाद यह सिस्टम आगे बढ़ जाएगा और प्रदेश में गर्मी का असर बढ़ने लगेगा। अप्रैल के दूसरे सप्ताह से तापमान में तेजी आएगी और महीने के अंतिम सप्ताह में ग्वालियर, धार, खरगोन, बड़वानी और नौगांव-खजुराहो जैसे क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।

    दतिया, मुरैना, श्योपुर, बड़वानी, खरगोन और धार में भी तापमान में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। दरअसल, अप्रैल के दौरान प्रदेश के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में गर्म हवाएं चलने लगती हैं, जिससे इन इलाकों में भीषण गर्मी का असर बढ़ जाता है।

  • MP: इंदौर में एक माह तक नहीं मिलेगा नया LPG कनेक्शन, अस्थायी रूप से बंद किया पोर्टल

    MP: इंदौर में एक माह तक नहीं मिलेगा नया LPG कनेक्शन, अस्थायी रूप से बंद किया पोर्टल


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर (Indore) शहर में एलपीजी गैस कनेक्शन (LPG Gas Connection) लेने की प्रक्रिया फिलहाल अस्थायी रूप से प्रभावित हो गई है। खाद्य आपूर्ति विभाग (Food Supply Department) ने नए गैस कनेक्शन के लिए उपयोग में आने वाले ऑनलाइन पोर्टल को एक महीने के लिए बंद कर दिया है। इसके चलते अब नागरिकों को नए एलपीजी कनेक्शन के लिए आवेदन करने हेतु कम से कम एक माह तक इंतजार करना होगा।

    खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारी मोहनलाल मारू ने बताया कि विभागीय स्तर पर कुछ तकनीकी और प्रक्रिया संबंधी कारणों के चलते पोर्टल को अस्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान ई-केवाईसी (e-KYC) की प्रक्रिया भी स्थगित रहेगी। एक महीने बाद जब पोर्टल फिर से शुरू किया जाएगा, तब ई-केवाईसी की प्रक्रिया पूरी कर नए कनेक्शन जारी किए जाएंगे।


    घरेलू उपयोग के लिए 5 किलोग्राम वाले सिलेंडर

    अधिकारी मारू ने यह भी बताया कि जिन उपभोक्ताओं को तत्काल गैस की आवश्यकता है, उनके लिए विभाग द्वारा वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। ऐसे लोगों को घरेलू उपयोग के लिए 5 किलोग्राम वाले छोटे गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ताकि उन्हें किसी प्रकार की गंभीर असुविधा का सामना न करना पड़े। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक नियमित कनेक्शन देने की प्रक्रिया फिर से शुरू नहीं हो जाती।

    उन्होंने आगे कहा कि इस दौरान यदि किसी नागरिक को गैस संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या या परेशानी होती है, तो वे अपने नजदीकी गैस एजेंसी से संपर्क कर सकते हैं। विभाग की ओर से सभी एजेंसियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं, ताकि आम लोगों को यथासंभव राहत मिल सके।


    यह एक अस्थायी व्यवस्था

    पोर्टल बंद होने से शहर के कई लोगों को अस्थायी रूप से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, खासकर उन लोगों को जो नए कनेक्शन के लिए आवेदन करने की तैयारी में थे। हालांकि, विभाग का कहना है कि यह एक अस्थायी व्यवस्था है और जल्द ही सभी सेवाएं फिर सामान्य कर दी जाएंगी। खाद्य आपूर्ति विभाग ने नागरिकों से अपील की है कि वे इस अवधि में धैर्य बनाए रखें और विभाग का सहयोग करें, ताकि आगामी समय में गैस कनेक्शन की प्रक्रिया को और अधिक सुगम और व्यवस्थित बनाया जा सके।

  • मध्य प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला… 489 मदिरा दुकानों के संचालन के लिए बनेगा निगम-मंडल

    मध्य प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला… 489 मदिरा दुकानों के संचालन के लिए बनेगा निगम-मंडल


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश में आबकारी विभाग के लिए गठित मंत्री-मंडलीय समिति की शुक्रवार को हुई वर्चुअल बैठक में 12 दौर की नीलामी प्रक्रिया के बाद शेष बची दुकानों की स्थिति की समीक्षा की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि नीलामी के बाद शेष 489 दुकानों के संचालन के लिए आबकारी विभाग स्वयं एक निगम/मंडल गठित कर इन दुकानों के संचालन की संभावना पर विचार करेगा।

    मंत्री-मंडल समिति में उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह, वाणिज्यिक कर विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर और आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना मौजूद रहे।

    उप मुख्यमंत्री देवड़ा की अध्यक्षता में हुई बैठक में नीलामी के बाद शेष बची 489 मदिरा दुकानों को सीधे निगम/मंडल के माध्यम से संचालित करने के विकल्प पर चर्चा की गई। यह कदम शेष शराब दुकानों का निस्तारण करने और राजस्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

  • वाराणसी की पावन धरा पर महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का हुआ ऐतिहासिक मंचन

    वाराणसी की पावन धरा पर महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का हुआ ऐतिहासिक मंचन


    भोपाल।
    उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) की पावन धरती पर शुक्रवार शाम को महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का ऐतिहासिक मंचन हुआ। महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ के भव्य मंचन और ओजस्वी प्रस्तुति से दर्शकों को हजारों वर्ष पुराने स्वर्णिम युग की यात्रा कराई।

    मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित इस महानाट्य का आरंभ सम्राट विक्रमादित्य के उस संकल्प से हुआ, जब वे विदेशी आक्रांताओं के चंगुल से मातृ भूमि को मुक्त कराने का प्रण लेते हैं। रंगमंच पर कलाकारों के सजीव अभिनय ने उस कालखंड को जीवंत कर दिया, जब शकों के आतंक से त्रस्त प्रजा की रक्षा के लिए एक महानायक का उदय हुआ था। विशाल और भव्य सेट, ऊंचे दुर्ग और उस दौर के राजसी वैभव को दर्शाते दृश्यों ने दर्शकों को से बांधे रखा। प्रकाश संयोजन और संगीत की स्वर लहरियों ने हर दृश्य को इतना प्रभावशाली बना दिया कि युद्ध के दृश्यों में जहाँ वीरता का सजीव आभास हुआ, वहीं सम्राट की न्यायप्रियता के प्रसंगों ने दर्शकों को गौरव की भावना से भर दिया।

    महानाट्य की सबसे बड़ी विशेषता इसका यथार्थवादी चित्रण था, जिसमें मदमस्त हाथियों, सरपट दौड़ते घोड़ों और ऊंटों के काफिलों के प्रयोग ने युद्ध के दृश्यों और राजसी वैभव को अभूतपूर्व भव्यता प्रदान की। हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ो की टापों ने मंच पर रणभूमि का साक्षात दृश्य उपस्थित कर दिया, जिससे दर्शक रोमांचित हो उठे। लगभग 400 से अधिक कलाकारों ने आधुनिक लाइट-एंड-साउंड तकनीक के साथ सम्राट की न्यायप्रियता, अदम्य शौर्य और विक्रम संवत की स्थापना के प्रसंगों को बड़े प्रभावशाली रूप प्रस्तुत किया। मंच पर निर्मित ऊंचे दुर्ग और राजप्रासाद के सेट ने इतिहास को जीवंत कर दिया।

    महानाट्य में सम्राट विक्रमादित्य के व्यक्तित्व के उन अनछुए पहलुओं को भी प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया, जो उन्हें एक साधारण राजा से ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बनाते हैं। वह दृश्य अत्यंत ह्रदय स्पर्शी था जब सम्राट अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए रात्रि के अंधकार में वेश बदलकर निकलते हैं। उनके द्वारा स्थापित ‘विक्रम संवत’ की प्रासंगिकता और भारतीय काल-गणना के महत्व को जिस सरल और साहित्यिक भाषा में संवादों के माध्यम से पिरोया गया, वह सराहनीय था। कलाकारों के संवादों में वह ओज और स्पष्टता थी, जिसने इतिहास को मंच पर साक्षात कर दिया। सम्राट का न्याय और ‘सिंहासन बत्तीसी’ के प्रसंगों ने यह संदेश दिया कि नेतृत्व केवल सत्ता का भोग नहीं, बल्कि त्याग और न्याय की वेदी पर खुद को समर्पित करना है।

    तीन दिवसीय महानाट्य की पहली गरिमामयी शाम में जनता और पर्यटक इस कदर उमड़े कि कार्यक्रम स्थल छोटा प्रतीत होने लगा नाटक के चरमोत्कर्ष पर पहुंचतें ही “जय महाकाल” और “सम्राट विक्रमादित्य” के जयकारों से आकाश गुंजायमान हो गया। यह महानाट्य केवल मंचन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ। अंतिम दृश्य में जब सम्राट का राज्याभिषेक हुआ और पुष्प वर्षा हुई, तो हर नागरिक का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया।

    इस अवसर पर मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के मंत्रीगण अनिल, राजेश सचान, रविंद्र जायसवाल, महापौर अशोक तिवारी जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्या, राज्यसभा सदस्य बाल योगी उमेश नाथ. विधायक, स्थानीय जन-प्रतिनिधि सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

    कार्यक्रम की समाप्ति के बाद भी देर रात तक दर्शक उस जादुई वातावरण के प्रभाव में रहे। महानाट्य के सफल आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में भव्यता के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वह आज भी जनमानस को गौरवान्वित करता है। यह महानाट्य आने वाले समय में एक सांस्कृतिक मील का पत्थर साबित होगा।


    वाराणसी में तीन दिवसीय सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य के विशेष आकर्षण

    समारोह स्थल पर म.प्र. संस्कृति और पर्यटन विभाग द्वारा भव्य चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। प्रदर्शनी में ऋषियों वैदिक ज्ञान तथा सांस्कृतिक गौरव को आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

    महानाट्य में 200 से अधिक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुख्य मंच से दर्शकों के बीच जाकर सम्राट विक्रमादित्य के जीवन का सजीव मंचन अत्यंत आकर्षक बना हुआ है। महानाट्य में तीन भव्य मंच बनाए गए हैं, जिनमें से एक मंच पर उज्जैन के महाकाल मंदिर की प्रतिकृति प्रदर्शित की गई, जो विशेष आकर्षण का केन्द्र बनी।

    महानाट्य में 18 घोड़े, दो रथ, चार ऊंट एक पालकी और एक हाथी के साथ जीवंत दृश्य से विक्रमादित्य का गौरव साकार हो रहा है। महानाट्य में आधुनिक सूचना संचार तकनीक का उपयोग कर युद्ध के दृश्य आतिशबाजी और प्राचीन परंपरा को अद्भुत ढंग से संजीव किया गया है। महानाट्य में सम्राट विक्रमादित्य के जन्म से लेकर राजतिलक तक की गाथा विक्रम बेताल की कथा और सनातन धर्म के उत्थान की महाकाव्य कथा को प्रदर्शित किया जा रहा है।

  • सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन का संदेश देता है महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन का संदेश देता है महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य: मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सुशासन की उत्कृष्ट परंपरा के नायक सम्राट विक्रमादित्य के जीवन काल से हम सब परिचित हो रहे हैं। सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य उनके सुशासन का संदेश देता है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव वाराणसी (काशी) में शुक्रवार को तीन दिवसीय सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य के मंचन पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कर्मस्थली काशी में इस महानाट्य के मंचन के अवसर पर यह कहना प्रासंगिक होगा कि प्रधानमंत्री मोदी के सुशासन से राष्ट्र को दिए जा रहे योगदान के लिए वे अभिनंदन के पात्र हैं।

    इससे पहले मुख्यमंत्री डॉ. यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समारोह का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आज बदलते दौर में दो राज्यों के मध्य सांस्कृतिक संबंध को प्रगाढ़ करने के लिए यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। दोनों राज्य विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के आशीर्वाद से दोनों राज्यों को अंतरराज्यीय केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की सौगात मिली है। यह दोनों राज्यों में सिंचाई, कृषि उत्पादन और पेयजल प्रदाय में सहयोग करने वाली महत्वपूर्ण परियोजना है। यह प्रधानमंत्री मोदी का सुशासन भी है, जिसके अंतर्गत राज्यों के बीच परस्पर सहयोग को बढ़ाने की दिशा में कार्य हो रहा है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी सुशासन के इस काल में सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में स्थापित सुशासन का स्मरण आना स्वभाविक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के स्वाभिमान के सम्राट विक्रमादित्य के राष्ट्र प्रेम, पराक्रम, न्यायप्रियता, प्रजा वात्सल्य और ज्ञान विज्ञान परम्परा की पुनर्स्थापना के गुणों की जानकारी युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए महानाट्य माध्यम बन रहा है।

    उन्होंने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य के युग का पुनर्स्मरण करने के लिए महानाट्य का मंचन किया जा रहा है। सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य का पहले नई दिल्ली में भी मंचन हुआ है। इस नाटक में अनेक इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और अन्य व्यवसायों से जुड़े प्रतिभाशाली व्यक्ति विभिन्न पात्रों के रूप में मंच पर भूमिका निभाते हैं। इससे प्रतिभाओं को तो मंच मिल ही रहा है, एक कुशल शासक के योगदान से देश के नागरिक भी परिचित हो रहे हैं। इस तरह यह महानाट्य लोकरंजन के साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को भी आज जीवंत करने में माध्यम बना है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत में भाइयों की तीन जोड़ियां प्रसिद्ध हुई हैं। इनमें भगवान श्रीराम और लक्ष्मण, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ सम्राट विक्रमादित्य और राजा भतृहरि की जोडी शामिल है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने एक करोड़ एक लाख रुपये का सम्राट विक्रमादित्य अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रारंभ किया है। एक राष्ट्रीय सम्मान 21 लाख रुपये राशि का और तीन राज्य स्तरीय सम्मान 5-5 लाख रुपये राशि के स्थापित किए गए हैं। वर्ष 2024 में हुए विक्रमोत्सव को सर्वाधिक अवधि वाली धार्मिक- आध्यात्मिक फैस्टिवल का महाद्वीप स्तरीय वॉव अवार्ड भी मिला है। यही नहीं प्रतिष्ठित ईमैक्स ग्लोबल अवार्ड भी विक्रमोत्सव को प्राप्त हुआ है।


    विक्रमादित्य महानाट्य मंचन यादगार क्षण: योगी आदित्यनाथ

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विक्रमादित्य महानाट्य मंचन को यादगार क्षण बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के भाव को साकार करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बाबा विश्वनाथ की इस धरा को बाबा महाकाल की धरा से नाट्य मंचन के माध्यम से जोड़ने का विशिष्ट कार्य किया है।

    योगी ने भाइयों की जोड़ी का जिक्र करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य और राजा भरथरी की जोड़ी का उल्लेख है। महाराजा ने नाथ संप्रदाय में दीक्षा लेकर काशी की भूमि और चुनार के किले में साधना की थी। सम्राट विक्रमादित्य ने ही आज से दो हजार साल पहले अयोध्या नगरी की खोज की थी और महाराज लव के बाद सबसे पहले भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण करवाया था। सम्राट विक्रमादित्य नीति शास्त्र और न्याय के पर्याय थे।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उज्जैन महाकाल की नगरी है और काशी पंचांग की नगरी है दोनों मिलकर नया इतिहास बनाते हुए प्रेम और सहयोग किया परंपरा मजबूती से आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ज्ञान परंपरा को उचित स्थान देकर पूरे विश्व में प्रतिष्ठित किया है। आज योग और आयुर्वेद की पूरी दुनिया में स्वीकार्यता बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2024 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया गया। इसमें 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने मां गंगा में स्नान किया।


    मप्र के मुख्यमंत्री ने भेंट की वैदिक घड़ी
    मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ को वैदिक घड़ी भेंट की। यह घड़ी बाबा विश्वनाथ के मंदिर में वैदिक काल को वर्तमान में जनता के बीच पुनर्स्थापित करने में सहायक होगी। इस घड़ी में प्राचीन वैदिक परंपरा तथा आधुनिक ज्ञान विज्ञान का मिश्रण करके कल की अचूक गणना का समावेश किया गया है।

    इसके बाद वाराणसी की पावन धरा पर महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का ऐतिहासिक मंचन हुआ। समारोह में उत्तर प्रदेश के मंत्रीगण अनिल, राजेश सचान, रविंद्र जायसवाल, महापौर अशोक तिवारी जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्या, राज्यसभा सदस्य बाल योगी उमेश नाथ. विधायक, स्थानीय जन-प्रतिनिधि सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

  • विश्व काल-गणना के केंद्र के रूप में उज्जैन की भूमिका पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

    विश्व काल-गणना के केंद्र के रूप में उज्जैन की भूमिका पर विशेषज्ञों ने किया मंथन


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में महाकाल की पावन धरा उज्जैन में शुक्रवार को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” की शुरुआत हुई। सम्मेलन में देश-विदेश के प्रख्यात खगोलविदों, वैज्ञानिकों और शीर्षस्थ विद्वानों ने भारतीय काल-गणना की वैज्ञानिकता और उसकी प्राचीन श्रेष्ठता पर गहन मंथन किया।

    इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य उज्जैन की गौरवशाली पहचान को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करना है। उज्जैन नगरी युगों तक विश्व के प्रधान मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) और काल-गणना का केंद्र रही है। विद्वानों ने एक स्वर में यह आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हम समय की वैश्विक अवधारणा के ‘भारतीयकरण’ की ओर बढ़ें और अपनी उस वैज्ञानिक विरासत को जीवंत करें, जो सदियों तक मानवता के लिए समय का बोध कराती रही है।

    सम्मेलन के प्रथम सत्र का मुख्य विषय “समय क्या है? इसका मापन कैसे हुआ तथा प्रधान मध्यान्ह (मेरेडियन) रेखा के रूप में उज्जैन का महत्व” रहा। सत्र का संचालन करते हुए आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. तडीकोंडा वेंकट भारत ने समय के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारत काल-गणना के क्षेत्र में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शक था। कालांतर में सांस्कृतिक संक्रमण के कारण हमारा यह अमूल्य ज्ञान पाश्चात्य पद्धतियों के अधीन हो गया। अब समय की मांग है कि हम आधुनिक विज्ञान और शोध के माध्यम से अपनी विरासत का पुनरुद्धार करें।

    राज्यसभा की एस. राधाकृष्णन पीठ के इतिहासविद् डॉ. एम.एल. राजा ने गर्व के साथ भारत को ‘काल-गणना का देवता’ निरूपित किया। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य जगत जिस कालखंड की सूक्ष्मता को समझने का प्रयास कर रहा है, वह भारतीय मनीषियों के लिए हजारों वर्ष पूर्व भी प्रत्यक्ष सत्य था। डॉ. राजा ने भारतीय कैलेंडर की वैज्ञानिकता सिद्ध करते हुए बताया कि हमारी पद्धति में लीप ईयर जैसी कोई विसंगति नहीं है; यह खगोलीय पिंडों की गति का शुद्ध गणित है। उन्होंने ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक संवत’ का दूरगामी विचार प्रस्तुत करते हुए भारतीय साक्ष्यों को अकाट्य प्रमाणों के साथ विश्व के सम्मुख रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

    काशी के प्रो. विनय कुमार पांडेय ने उज्जैन (अवंतिका) के शास्त्रीय और खगोलीय महत्व को नए आयाम दिए। उन्होंने स्कंद पुराण, नारद पुराण और सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों का उदाहरण देते हुए बताया कि “काल-गणना का वास्तविक मूल केन्द्र अवंतिका ही है।” उन्होंने कहा कि उज्जैन विश्व का वह अनूठा भौगोलिक स्थल है जहाँ श्मशान और शक्तिपीठ एक साथ विद्यमान हैं, जो इसे समय की उत्पत्ति और लय का केंद्र बनाते हैं।

    खगोलशास्त्री पं. कैलाशपति नायक ने समय के आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष को जोड़ते हुए कहा कि समय के चक्र को गति देने वाले स्वयं भगवान महाकाल हैं। उन्होंने पंचांग की महत्ता को रेखांकित करते हुए उज्जैन को पुनः समय के मानक केंद्र के रूप में स्थापित करने के इस प्रयास की मुक्त कंठ से सराहना की।

    सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव आधुनिक विज्ञान और प्राचीन परंपरा का अद्भुत समन्वय रहा। सीएसआईआर-एनपीएल के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने वर्तमान युग की परिशुद्ध समय मापन तकनीकों और एटॉमिक क्लॉक्स की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि नैनो सेकंड स्तर की सटीकता बनाए नहीं रखी जाए तो जीपीएस जैसी तकनीकों की सटीकता भी प्रभावित हो सकती है। डॉ. शर्मा ने यह महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि आधुनिक विज्ञान की यह सूक्ष्म परिशुद्धता वास्तव में हमारी प्राचीन भारतीय गणना पद्धतियों में पहले से ही अंतर्निहित रही है। उन्होंने पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया।

    सम्मेलन का द्वितीय सत्र “काल चक्र: इनवॉल्यूशन एण्ड इवॉल्यूशन ऑफ सिविलाइजेशन इन टाइम एण्ड स्पेस” विषय पर केंद्रित रहा। सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, चेन्नई के अध्यक्ष प्रो. एम.डी. श्रीनिवास और कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि भारतीय कालचक्र की अवधारणा केवल एक रेखीय गति नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित चक्रीय व्यवस्था है, जो नैतिक मूल्यों और पर्यावरणीय संतुलन को भी अपने भीतर समेटे हुए है। भारतीय ज्ञान परंपरा नवाचार को प्राचीन सिद्धांतों की पुनर्खोज के रूप में देखती है, जो ज्ञान की निरंतरता को बनाए रखते हुए उसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने का मार्ग प्रदान करती है।

    सम्मेलन के दोनों सत्रों में यह प्रतिपादित किया गया कि उज्जैन केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह विश्व के समय चक्र का वैज्ञानिक उद्गम स्थल भी है। विद्वानों ने इस संकल्प को दोहराया कि भारत की समृद्ध काल-गणना परंपरा को आधुनिक अनुसंधान के साथ जोड़कर भविष्य के लिए और अधिक उपयोगी बनाया जाएगा। यह अंतर्राष्ट्रीय मंथन न केवल उज्जैन की ऐतिहासिक भूमिका को पुनः स्थापित करने में सफल रहेगा, बल्कि इसने आने वाले समय में भारत को काल-विज्ञान के क्षेत्र में पुनः ‘विश्व गुरु’ के रूप में प्रतिष्ठित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

  • उज्जैन वह स्थान है जहां अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है : केंद्रीय मंत्री प्रधान

    उज्जैन वह स्थान है जहां अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है : केंद्रीय मंत्री प्रधान


    भोपाल । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन वह स्थान है जहाँ अध्यात्म और विज्ञान के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है और एक नई दृष्टि का जन्म होता है। भारत के जितने भी प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र हैं चाहे वह उज्जैन हो काशी हो कांची हो या पुरी धाम सभी भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ऐसी जीती-जागती प्रयोगशालाएं हैं जहाँ विज्ञान कला संस्कृति साहित्य और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय मिलता है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव शुक्रवार को उज्जैन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पधारे विद्वानों और विशेषज्ञों का स्वागत अभिनंदन किया। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने विज्ञान और आध्यात्मिकता के अटूट संबंध पर विशेष बल दिया।

    उन्होंने कहा कि विज्ञान आध्यात्मिकता के बिना अधूरा है और इसका सबसे सटीक उदाहरण स्वयं उज्जैन नगरी और महाकाल मंदिर की व्यवस्थाओं में दिखाई देता है। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने महाकाल मंदिर के एक वैज्ञानिक अनुष्ठान का उल्लेख करते हुए बताया कि वैशाख मास के पहले दिन से भगवान शिव के ऊपर मटके से निरंतर जल की धारा प्रवाहित करने की व्यवस्था केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि ग्रीष्मकाल की चुनौतियों का एक वैज्ञानिक समाधान और पर्यावरणीय प्रबंधन है। यह दर्शाता है कि हमारा समाज सदियों से काल गणना और प्रकृति के बदलावों के अनुसार अपनी जीवनशैली को ढालने की वैज्ञानिक समझ रखता था। भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व और संतुलित जीवन प्रवाह हमेशा से केंद्र में रहा है।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलावों का जिक्र करते हुए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने जोर दिया कि हमें अपनी शिक्षा पद्धति को केवल रटने की पुरानी परिपाटी से निकालकर सृजनशीलता डिजाइन थिंकिंग और क्रिटिकल थिंकिंग की ओर ले जाना होगा। आज का युग एआई और कंप्यूटेशनल थिंकिंग का है भारत के विद्यार्थी वैश्विक स्तर पर इस दौड़ में पीछे न रहें इसके लिए स्कूली स्तर पर ही एआई जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रधान ने स्पष्ट किया कि ज्ञान पर किसी भाषा का एकाधिकार नहीं हो सकता इसलिए शिक्षा को भारतीय भाषाओं और लोक-संस्कृतियों के साथ जोड़ा जा रहा है जिससे हर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जटिल वैज्ञानिक विषयों को सरलता से समझ सके।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि उज्जैन वह स्थान है जहाँ से कर्क रेखा गुजरती है और यहीं से प्राचीन काल में दुनिया की काल गणना होती थी इसलिए अब समय आ गया है कि हम ‘ग्रीनविच मीन टाइम के स्थान पर ‘महाकाल स्टैंडर्ड टाइम की तार्किक स्थापना करें। उन्होंने कहा कि आधुनिक एआई उपकरण भी यह स्वीकार करते हैं कि काल गणना का मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र है अतः हमें अपने वैज्ञानिक स्वाभिमान को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करना होगा और यह इस विमर्श का मुख्य उद्देश्य है।

    केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि भारत आज अंतरिक्ष ड्रोन और सूचना प्रौद्योगिकी में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले दो दशकों में भारत न केवल अपनी आवश्यकताओं को पूरा करेगा बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम की भावना के साथ पूरे विश्व की पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान भी प्रदान करेगा। उज्जैन में ‘विज्ञान केंद्र और ‘तारामंडल का सुदृढ़ीकरण इसी दिशा में एक बड़ा कदम है जिससे आने वाली पीढ़ी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ सके।

    प्रख्यात चिंतक एवं लेखक सुरेश सोनी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में काल (समय) की अवधारणा अत्यंत गहन और वैज्ञानिक है। भारतीय कालगणना खगोलीय पिंडों की गति ऋतु चक्र और प्रकृति के नियमों से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य की समग्र प्रगति के लिए विज्ञान एवं तकनीक कला अध्यात्म सामाजिकता और सामाजिक अर्थशास्त्र के बीच संतुलित समन्वय आवश्यक है। उज्जैन में स्थापित कालयंत्र इस प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने युवाओं से भारतीय वैज्ञानिक विरासत को समझने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने और विज्ञान को मानवीय मूल्यों से जोड़ने का आह्वान किया।

    नीति आयोग के सदस्य एवं प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. वी. के. सारस्वत ने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से कालगणना और खगोल विज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा है। उन्होंने वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को विकसित भारत@2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन स्वच्छ ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान नवाचार और स्वदेशी अनुसंधान से ही संभव है। उन्होंने आत्मनिर्भर भारत की आवश्यकता पर बल देते हुए एआई क्वांटम तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे डीप टेक क्षेत्रों में अनुसंधान बढ़ाने R&D में निवेश विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं की क्षमता से भारत 2047 तक तकनीकी रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनेगा।

    विज्ञान भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री शिव कुमार शर्मा ने कहा कि यह आयोजन विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा में नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है। शिक्षा केवल जानकारी का माध्यम नहीं बल्कि समाज को परिवर्तनकारी दृष्टि देने का साधन है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लर्निंग बाइ डूइंग सिद्धांत के तहत विद्यार्थी विज्ञान मंथन 2026-27 का शुभारंभ किया गया जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति गौरव भाव जगाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार क्षमता का विकास करना है।

    राष्ट्रीय समन्वयक आईकेएस नई दिल्ली डॉ. गांती एस. मूर्ति ने कहा कि यह सम्मेलन अतीत के ज्ञान के संरक्षण नवाचार के सृजन और ज्ञान के निरंतर प्रवाह पर आधारित है। सम्मेलन में बच्चों के लिए भौतिकी प्रशिक्षण विशेष सत्र और प्रदर्शनी के माध्यम से खगोल विज्ञान एवं आधुनिक नवाचारों को प्रस्तुत किया गया है।

    महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम

    अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का मूल ध्येय भारत की उस समृद्ध वैज्ञानिक थाती को आधुनिक जगत के साथ एकाकार करना है जो सदियों से हमारी पहचान रही है। इस युगांतरकारी आयोजन का सबसे प्रमुख संकल्प उज्जैन को ‘विश्व के मेरिडियन शून्य रेखा के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव के विजन के अनुरूप यह सम्मेलन ‘विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने की दिशा में ‘स्पेस इकोनॉमी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के नए द्वार खोलेगा। यहाँ खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान की आधुनिक प्रगति का प्राचीन भारतीय काल-ज्ञान के साथ अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य वेदांग और सिद्धांत ज्योतिष के कालजयी सूत्रों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसकर पंचांग पद्धतियों में आने वाली सूक्ष्म त्रुटियों का वैज्ञानिक परिमार्जन करना है।

  • उज्जैन की माटी में विज्ञान, गणित, खगोल और ब्रह्मांड चिंतन सदियों से विद्यमान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    उज्जैन की माटी में विज्ञान, गणित, खगोल और ब्रह्मांड चिंतन सदियों से विद्यमान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि उज्जैन धर्म की नगरी होने के साथ विज्ञान की भी नगरी है। उज्जैन की माटी में विज्ञान गणित खगोल और ब्रह्मांड चिंतन सदियों से विद्यमान है। उज्जैन काल गणना का केंद्र रहा है जहां प्राचीन काल में सूर्य की छाया से समय नापने की कला विकसित हुई। प्राचीन भारतीय भूगोल के अनुसार उज्जैन कर्क रेखा पर स्थित है और इसे पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। ग्रीनविच के वैश्विक मानक के अस्तित्व में आने से सदियों पहले शून्य देशांतर रेखा पावन नगरी उज्जैन से होकर गुजरती थी। जब पश्चिम में खगोल शास्त्र का ज्ञान भी नहीं था तब उज्जैन के ज्योतिषी और विद्वान काल गणना कर नक्षत्रों की स्थिति बता रहे थे। जब दुनिया समय को परिभाषित करना सीख रही थी तब यहां महर्षियों ने खगोलीय गणनाओं का वैश्विक मानक स्थापित कर लिया था।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव शुक्रवार को उज्जैन में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में पधारे विद्वानों और विशेषज्ञों का स्वागत अभिनंदन किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने उज्जैन साइंस सेंटर का लोकार्पण और तारा मंडल में लगी विज्ञान प्रदर्शनी का शुभारंभ एवं अवलोकन भी किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के लिए 4 लेन उज्जैन बायपास और सम्राट विक्रमादित्य – द हेरिटेज परियोजना का भूमि-पूजन किया। इस अवसर पर विचारक एवं समाजसेवी सुरेश सोनी विशेष रूप से उपस्थित रहे।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि विज्ञान के अनुसार ब्रह्मांड की हर वस्तु समय के अधीन है लेकिन शिव उस अनंत का प्रतीक हैं जहां से समय जन्म लेता है और जहां समय का अंत होता है। इसीलिए वे काल के अधिष्ठाता अर्थात मास्टर ऑफ टाइम हैं। विज्ञान मानता है कि समय और अंतरिक्ष एक दूसरे से अविभाज्य हैं हमारे शास्त्रों में युगों पहले शिव को विश्व स्वरूप और महाकाल कहकर इसी वैज्ञानिक सत्य को प्रतिपादित किया था।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने ग्रीनविच भ्रमण के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उज्जैन और डोंगला के आधार पर होने वाली खगोलीय गणनाओं की सटीकता अद्भुत है। डोंगला को एस्ट्रोनोमिकल स्टडीज के लिए विकसित किया जा रहा है। इस दिशा में उज्जैन का यह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन मील का पत्थर सिद्ध होगा। भूमध्य रेखा और कर्क रेखा का कटाव या केंद्र बिंदु पहले उज्जैन में था जो अब उज्जैन से 32 किलोमीटर दूर डोंगला में शिफ्ट हो गया है। यहां 21 जून को सूर्य की छाया शून्य हो जाती है। ग्रीनविच के मीन टाइम में रात को 10 बजे तक सूर्य के दर्शन होते हैं। यह केंद्र बिंदु कैसे हो सकता है। आज समय और स्पेस दोनों को एक दूसरे से समेकित रूप से समझने की आवश्यकता है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि यह हम सब के लिए गौरव का विषय है कि उज्जैन को साइंस सिटी के रूप में स्थापित किया जा रहा है। इसी उद्देश्य से आज 15 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमें केंद्र सरकार का भी सहयोग निरंतर प्राप्त हो रहा है। वास्तव में यह अपनी वैज्ञानिक विरासत को पुनर्जीवित करने का सशक्त प्रयास है। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए हो रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार इस नीति की भावना के अनुरूप युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की दिशा में गंभीर प्रयास कर रही है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आने वाला सिंहस्थ 2028 हमारे लिए उज्जैन की गरिमा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का स्वर्णिम अवसर है। हमारा लक्ष्य है की सिंहस्थ 2028 में उज्जैन आने वाले श्रद्धालु महाकाल दर्शन का पुण्य प्राप्त करने के साथ काल गणना के इस केंद्र का वैज्ञानिक महत्व भी जाने। वर्ष 2028 के सिंहस्थ को व्यवस्थित रूप से संपन्न करना हमारा दायित्व है। इसी उद्देश्य से 700 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले बायपास रोड का भूमि-पूजन भी हुआ है। इस सौगात के लिए उज्जैनवासी बधाई के पात्र हैं। उज्जैन सिंहस्थ विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। इस विशाल आयोजन में श्रद्धालुओं के लिए सर्व-सुविधा संपन्न प्रबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में राज्य सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मंच से सभी को वर्ष 2028 के भव्य और दिव्य सिंहस्थ के लिए आमंत्रित किया।

    विद्यार्थी विज्ञान मंथन की वेबसाइट ब्रोशर एवं पुस्तिका का किया विमोचन

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव और केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान ने विद्यार्थी विज्ञान मंथन की वेबसाइट ब्रोशर एवं पुस्तिका का विमोचन किया। कार्यक्रम में वैज्ञानिक नेतृत्व को तैयार करने की दिशा में विकसित बहु-स्तरीय मूल्यांकन प्रणाली पर आधारित एक वीडियो फिल्म भी प्रदर्शित की गयी।

    सिंहस्थ 2028 के लिए उज्जैन में 725 करोड़ के विकास कार्यों का किया भूमि-पूजन
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव एवं केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान ने उज्जैन में मध्यप्रदेश पर्यटन की इकाई सम्राट विक्रमादित्य द हेरिटेज की विस्तार परियोजना का भूमि-पूजन किया। वर्तमान में इस हेरिटेज इकाई में 19 कक्ष रूफटॉप सहित 3 रेस्टोरेंट पंचकर्म केंद्र एवं पुस्तकालय संचालित हैं। धार्मिक पर्यटन में लगातार हो रही वृद्धि और आगामी सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए 22.52 करोड़ रुपये की लागत से इसका विस्तार किया जाएगा। इस विस्तार के तहत 14 नए कक्ष एक सुव्यवस्थित डॉर्मिटरी परिसर को जोड़ने वाले कनेक्टिंग पाथवे तथा आकर्षक गार्डन एवं लैंडस्केपिंग विकसित किए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 701.86 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले 19.80 किमी लंबे उज्जैन सिंहस्थ बायपास (4-लेन) सड़क निर्माण कार्य का भूमि-पूजन भी किया। इस परियोजना से लगभग 5 लाख लोगों एवं सिंहस्थ 2028 में आने वाले श्रद्धालुओं को लाभ होगा। साथ ही 4-लेन मार्ग बनने से आवागमन और यातायात प्रबंधन सुगम होगा। मार्ग के 14 कि.मी. का 4-लेन उन्नयन एवं 5.8 कि.मी. का 4-लेन विस्तारीकरण किया जाना है जो इंदौर-उज्जैन 6-लेन मार्ग के शांति पैलेस चौराहा से प्रारंभ होकर उज्जैन-इंदौर ग्रीनफील्ड मार्ग उज्जैन-जावरा मार्ग तथा उज्जैन-गरोठ मार्ग को जोड़ते हुए उज्जैन-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 552-जी ग्राम सुरासा के समीप समाप्त होगा।

    नव-निर्मित उज्जैन साइंस सेंटर का किया लोकार्पण

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव और केन्द्रीय मंत्री प्रधान ने उज्जैन में 15 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से नव-निर्मित उज्जैन साइंस सेंटर का लोकार्पण कर विज्ञान केंद्र के फोल्डर का विमोचन किया। इसमें गैलरी ऑन साइंस आउटडोर साइंस पार्क इनोवेशन एवं स्टुडेंट एक्टिविटी हॉल हेरिटेज थीम आधारित गैलरी और एग्जिबिट डेवलपमेंट लैब जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इससे विद्यार्थियों शोधार्थियों और आमजन में वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन मिलेगा।

    महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम विषय पर केंद्रित प्रदर्शनी का अवलोकन

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव और केन्द्रीय मंत्री प्रधान ने महाकाल द मास्टर ऑफ टाइम विषय पर आयोजित प्रदर्शनी का अवलोकन किया। प्रदर्शनी में भारत की प्राचीन ऋषि-वैज्ञानिक परंपरा आधुनिक ड्रोन तकनीक और उज्जैन को वैश्विक टाइम स्केल सेंटर के रूप में स्थापित करने से संबंधित विषयों को आकर्षक एवं ज्ञानवर्धक रूप में प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनी में परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय को विशेष रूप से दर्शाया गया। साथ ही आरती के लिए डिजाइन की गई रोबोटिक आर्म का प्रदर्शन भी देखा और सराहा। प्रदर्शनी में इसरो मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद आईआईटी इंदौर आरआरकैट नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी और सम्राट विक्रमादित्य शोधपीठ सहित विभिन्न संस्थानों ने अपने मॉडल और शोध कार्य प्रदर्शित किए। इंडियन नॉलेज सिस्टम के स्टॉल पर प्राचीन भारतीय ग्रंथों का प्रदर्शन किया गया। इसमें मेडिकल एग्री और एयर टैक्सी ड्रोन के साथ एएसएलवी मंगलयान और चंद्रयान के मॉडल आकर्षण का केंद्र रहे।

    सैटेलाइट मेकिंग वर्कशॉप में विद्यार्थियों से चर्चा कर किया उत्साहवर्धन

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव और केंद्रीय मंत्री प्रधान ने प्रदर्शनी में आयोजित सैटेलाइट मेकिंग वर्कशॉप का अवलोकन कर वहां उपस्थित विद्यार्थियों से चर्चा की और उनका उत्साहवर्धन किया। वर्कशॉप में 10 इंजीनियरिंग महाविद्यालयों के 120 से अधिक विद्यार्थियों ने नैनो सैटेलाइट बनाने की प्रक्रिया सीखी।

  • वैशाख माह में इन चीजों का दान दिलाएगा अक्षय पुण्य, साल भर बनी रहेगी भगवान विष्णु की कृपा

    वैशाख माह में इन चीजों का दान दिलाएगा अक्षय पुण्य, साल भर बनी रहेगी भगवान विष्णु की कृपा


    नई दिल्ली । आज से हिंदू नववर्ष का दूसरा महीना वैशाख प्रारंभ हो गया है, जिसे सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान किए गए स्नान, दान और पूजन का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों में वैशाख को माधव मास भी कहा गया है, क्योंकि इसी अवधि में भगवान विष्णु ने मधु नामक राक्षस का वध किया था और मधुसूदन स्वरूप में उनकी पूजा की जाती है।

    स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि वैशाख माह में किया गया दान अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक फल प्रदान करता है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे पुण्य कार्य भी अक्षय फल देने वाले माने जाते हैं। मान्यता है कि इस महीने में भगवान विष्णु की कृपा विशेष रूप से प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है वैशाख महीने में जल दान को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। गर्मी के इस मौसम में प्यासे लोगों को जल उपलब्ध कराना न केवल मानवता का कार्य है बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पुण्यदायी है।

    शास्त्रों के अनुसार इस माह में जल से भरा घड़ा दान करने या प्यासों को पानी पिलाने से कई तीर्थों के दर्शन के बराबर फल मिलता है। साथ ही सूर्य देव को जल अर्पित करने से भी विशेष पुण्य प्राप्त होता है।इसके अलावा पंखा दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। तेज गर्मी में जरूरतमंद लोगों को शीतलता प्रदान करना पुण्य का कार्य माना गया है। ताड़ के पंखे का दान करने से व्यक्ति पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु का प्रिय बनता है।

    फलों का दान भी इस महीने में अत्यंत शुभ माना गया है। तरबूज, खरबूजा और बेल जैसे मौसमी फलों का दान करने से घर में सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती है। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से लाभकारी है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है। सत्तू का दान और सेवन भी वैशाख माह में विशेष महत्व रखता है। सत्तू शरीर को ठंडक देता है और गर्मी से बचाव करता है। इसलिए इस महीने में जरूरतमंदों को सत्तू का दान करना पुण्यकारी माना गया है।

    इसके साथ ही पादुका यानी जूते-चप्पल और चटाई का दान भी अत्यंत फलदायी बताया गया है। गर्मी के मौसम में यह वस्तुएं जरूरतमंदों के लिए राहत प्रदान करती हैं। शास्त्रों के अनुसार इनका दान करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं और उसे उत्तम फल की प्राप्ति होती है। कुल मिलाकर वैशाख माह सेवा, दया और दान का महीना है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे दान भी जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं और भगवान विष्णु की कृपा से व्यक्ति का जीवन सुखमय बन सकता है।