Category: National

  • मैंने पुलिस पर भरोसा किया, आरोप मुझ पर लगा दिए', करूर हादसे पर मुख्यमंत्री विजय ने उठाए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

    मैंने पुलिस पर भरोसा किया, आरोप मुझ पर लगा दिए', करूर हादसे पर मुख्यमंत्री विजय ने उठाए सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

    नई दिल्ली । तमिलनाडु के करूर में वर्ष 2025 में हुई भगदड़ की घटना को लेकर मुख्यमंत्री विजय ने बड़ा बयान देते हुए पुलिस प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि कार्यक्रम के दौरान बढ़ती भीड़ की जानकारी समय रहते उन्हें दी गई होती तो स्थिति को संभाला जा सकता था और संभव है कि इस दुखद हादसे से बचाव हो जाता। मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने पुलिस पर भरोसा किया, लेकिन बाद में पूरे घटनाक्रम का आरोप उन्हीं पर लगाया गया।

    करूर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की और पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस दुर्घटना ने कई परिवारों से उनके बच्चे छीन लिए और यह क्षति ऐसी है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। उनके अनुसार यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गहरा आघात है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार पीड़ित परिवारों के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है और उन्हें हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन से जुड़े सभी प्रोटोकॉल की समीक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि जनसभाओं और बड़े आयोजनों में सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

    विजय ने अपने संबोधन में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि दूसरे जिलों में पुलिस ने समय रहते भीड़ बढ़ने की सूचना देकर प्रशासन को सतर्क किया था, लेकिन करूर में ऐसा नहीं हुआ। उनके अनुसार कार्यक्रम स्थल तक पुलिस ही उन्हें लेकर गई और उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों पर पूरा भरोसा किया। यदि समय रहते वास्तविक स्थिति से अवगत कराया गया होता तो हालात अलग हो सकते थे और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए जा सकते थे।

    मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर भी निशाना साधते हुए कहा कि इतने संवेदनशील मामले को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि किसी भी त्रासदी के बाद प्राथमिकता पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम सुनिश्चित करने की होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल इस घटना को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहे हैं।

    अपने संबोधन के दौरान विजय ने राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि पार्टी फंड के नाम पर अनियमितताएं की जा रही हैं और जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास हो रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का ध्यान केवल प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित रहेगा।

    करूर भगदड़ को लेकर राज्य में पहले से ही राजनीतिक बहस जारी है। मुख्यमंत्री के ताजा बयान के बाद इस मामले में पुलिस की भूमिका, सुरक्षा प्रबंधन और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर चर्चा और तेज होने की संभावना है। साथ ही उम्मीद की जा रही है कि जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद हादसे के कारणों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी स्पष्ट हो सकेगी।

  • बंगाल की राजनीति में बढ़ा सियासी तापमान, ममता बनर्जी ने भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप; पार्टी छोड़ने वालों को दी खुली चेतावनी

    बंगाल की राजनीति में बढ़ा सियासी तापमान, ममता बनर्जी ने भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप; पार्टी छोड़ने वालों को दी खुली चेतावनी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर तीखे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के कारण चर्चा में है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी पर उनकी पार्टी के नेताओं को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दबाव और कार्रवाई के बावजूद वह पीछे हटने वाली नहीं हैं। साथ ही उन्होंने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं और संगठन के भीतर असंतोष पैदा करने वालों को भी स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें अपना रुख सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए।

    ममता बनर्जी ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए कहा कि यदि कोई उनकी आवाज दबाना चाहता है तो उसे इससे भी आगे बढ़ना होगा। उनका कहना था कि उन्हें डराकर या दबाव बनाकर चुप नहीं कराया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को विभिन्न तरीकों से परेशान किया जा रहा है और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत कार्रवाई की जा रही है। उनके अनुसार यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित संकेत नहीं है।

    टीएमसी प्रमुख ने दावा किया कि पार्टी के कई नेताओं को लगातार जांच और अन्य प्रक्रियाओं के माध्यम से निशाना बनाया गया है। उन्होंने कुछ वरिष्ठ नेताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक कारणों से उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि हिरासत में मौजूद कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मानवीय गरिमा के अनुरूप व्यवहार नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की घटनाओं पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।

    ममता बनर्जी ने अपने संबोधन में पार्टी के भीतर अनुशासन और निष्ठा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति में विश्वास सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है और जनता जिस भरोसे के साथ प्रतिनिधियों को चुनती है, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि यदि कोई नेता पार्टी की विचारधारा से सहमत नहीं है या किसी अन्य दल में जाना चाहता है तो उसे खुलकर निर्णय लेना चाहिए। उनके अनुसार संगठन के भीतर रहकर किसी दूसरे दल के हित में काम करना कार्यकर्ताओं और समर्थकों के विश्वास के साथ न्याय नहीं होगा।

    राज्य की राजनीति में हाल के समय में कई नेताओं के दल बदलने के बाद यह बयान और अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ पूर्व सांसदों के दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होने के बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। आगामी राज्यसभा उपचुनावों को देखते हुए सभी प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटे हुए हैं। ऐसे माहौल में नेताओं के बयान राजनीतिक बहस को और तेज कर रहे हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा उपचुनाव और आगामी राजनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और तीखी हो सकती है। एक ओर दल अपने संगठन को मजबूत बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर विपक्ष नए राजनीतिक समीकरण बनाने में सक्रिय है। ऐसे समय में ममता बनर्जी का यह बयान उनके समर्थकों को एकजुट रखने और संगठनात्मक संदेश देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।

    आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र राज्यसभा उपचुनाव, दल-बदल की घटनाएं और प्रमुख दलों की रणनीति रहने की संभावना है। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, जबकि मतदाताओं की नजर अब इस बात पर रहेगी कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर राज्य की आगामी राजनीतिक दिशा पर किस प्रकार पड़ता है।

  • धर्मांतरण मामले में विशेष अदालत का मानवीय दृष्टिकोण, गर्भावस्था के आधार पर नीदा खान को जमानत, आदेश की कानूनी टिप्पणी चर्चा में

    धर्मांतरण मामले में विशेष अदालत का मानवीय दृष्टिकोण, गर्भावस्था के आधार पर नीदा खान को जमानत, आदेश की कानूनी टिप्पणी चर्चा में

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र के नासिक में धर्मांतरण से जुड़े एक मामले में विशेष अदालत ने आरोपी नीदा खान को जमानत प्रदान की है। अदालत का यह आदेश कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। न्यायालय ने अपने निर्णय में आरोपी की गर्भावस्था और अजन्मे बच्चे के हितों को महत्वपूर्ण आधार माना। साथ ही आदेश में भगवान कृष्ण के जन्म का संदर्भ देते हुए कहा गया कि किसी भी बच्चे को जेल में जन्म लेने से जुड़ी परिस्थितियों और उससे उत्पन्न सामाजिक प्रभावों का सामना नहीं करना चाहिए।

    विशेष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरोपी लगभग पांच माह की गर्भवती है और इस तथ्य को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं है। न्यायालय ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय केवल आरोपी की स्थिति ही नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के अधिकारों और भविष्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इसी आधार पर न्यायिक विवेक का उपयोग करते हुए जमानत मंजूर की गई।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में भगवान कृष्ण के जन्म का उल्लेख केवल एक मानवीय और सांस्कृतिक संदर्भ के रूप में किया गया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस टिप्पणी का मामले के आरोपों की सत्यता या असत्यता से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का निर्णय आरोपों के गुण-दोष पर आधारित अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

    मामले में नीदा खान पर आरोप है कि उन्होंने एक महिला सहकर्मी पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया और धार्मिक भावनाओं से जुड़े कथित आपत्तिजनक बयान दिए। जांच एजेंसियों के अनुसार, उन पर धार्मिक साहित्य वितरित करने, बुर्का उपलब्ध कराने और मोबाइल फोन में धार्मिक एप्लिकेशन इंस्टॉल कराने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायालय में सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा।

    विशेष अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस द्वारा आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। न्यायालय ने माना कि जांच पूरी होने के बाद आरोपी की निरंतर न्यायिक हिरासत की आवश्यकता का मूल्यांकन अलग दृष्टिकोण से किया जा सकता है। साथ ही मामले से जुड़े अन्य आरोपियों के विरुद्ध दर्ज विभिन्न मामलों की जांच अभी भी जारी है।

    कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में जमानत दिए जाने का अर्थ आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं होता। जमानत केवल एक अंतरिम कानूनी राहत होती है, जिसे न्यायालय उपलब्ध परिस्थितियों, जांच की स्थिति, आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना और अन्य कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए प्रदान करता है। अंतिम निर्णय मुकदमे की पूरी सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही दिया जाता है।

    इस मामले में भी अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसके आदेश को आरोपों की वैधता पर टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुकदमे की सुनवाई नियमानुसार आगे जारी रहेगी और अभियोजन तथा बचाव पक्ष को अपने-अपने साक्ष्य और तर्क प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलेगा। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

  • मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    मतदाता सूची शुद्धीकरण अभियान का व्यापक असर, ओडिशा सहित चार राज्यों से लाखों नाम हटे, निर्वाचन प्रक्रिया पर बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली । देश के चार राज्यों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान के बाद मतदाता सूचियों में बड़े स्तर पर बदलाव दर्ज किए गए हैं। ओडिशा, मणिपुर, मिजोरम और सिक्किम में अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद 22 लाख से अधिक नाम सूची से हटाए गए हैं। संशोधित सूची जारी होने के साथ ही राजनीतिक दलों के बीच इस विषय को लेकर चर्चा तेज हो गई है, जबकि निर्वाचन प्राधिकरण का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित नियमों और सत्यापन के आधार पर पूरी की गई है।

    इस अभियान का सबसे अधिक प्रभाव ओडिशा में देखने को मिला, जहां मतदाता सूची से 21 लाख से अधिक नाम हटाए गए। संशोधन के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3.25 करोड़ रह गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इनमें पुरुष और महिला मतदाताओं की संख्या लगभग संतुलित बनी हुई है तथा मतदाता लिंगानुपात में भी सुधार दर्ज किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि सूची से वे नाम हटाए गए हैं जो सत्यापन के दौरान मृत, स्थानांतरित या दोहराव वाले पाए गए।

    पूर्वोत्तर के राज्यों में भी विशेष पुनरीक्षण का असर दिखाई दिया। मणिपुर में हजारों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसके बाद राज्य की संशोधित मतदाता संख्या 20 लाख से अधिक दर्ज की गई। इसी प्रकार मिजोरम में भी व्यापक सत्यापन के बाद हजारों नाम हटाए गए। राज्य की नई मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नए युवा मतदाताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे चुनावी भागीदारी में नई पीढ़ी की हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

    देश के सबसे कम आबादी वाले राज्य सिक्किम में भी पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत हजारों नाम सूची से हटाए गए। हालांकि कुल संख्या अन्य राज्यों की तुलना में कम रही, लेकिन निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि उद्देश्य सभी राज्यों में मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना था। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन अभियान चलाया गया और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर आवश्यक संशोधन किए गए।

    इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद राजनीतिक दलों के बीच विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन के मानकों को लेकर सवाल उठाए हैं तथा प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। वहीं निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि प्रत्येक संशोधन विधिक प्रावधानों के अनुरूप किया गया है और केवल उन्हीं नामों को हटाया गया है जो निर्धारित मानकों पर पात्र नहीं पाए गए।

    निर्वाचन प्राधिकरण का मानना है कि समय-समय पर मतदाता सूची का अद्यतन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट नामों को हटाकर वास्तविक और पात्र मतदाताओं की सूची तैयार की जा सकती है। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी भी पात्र मतदाता को वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि संशोधित मतदाता सूची का प्रभाव आगामी चुनावों की रणनीतियों पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक दल अब नई मतदाता संरचना के आधार पर अपनी चुनावी तैयारियों और बूथ स्तर की रणनीति की समीक्षा कर सकते हैं। आने वाले समय में इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा जारी रहने की संभावना है, जबकि अंतिम उद्देश्य निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

  • बंगाल में भ्रष्टाचार की परतें खोलेगी सरकार टीएमसी के 15 साल के कार्यकाल पर तैयार होगा व्हाइट पेपर

    बंगाल में भ्रष्टाचार की परतें खोलेगी सरकार टीएमसी के 15 साल के कार्यकाल पर तैयार होगा व्हाइट पेपर


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने तृणमूल कांग्रेस के पिछले 15 वर्षों के शासनकाल के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार और वित्तीय कुप्रबंधन की विस्तृत जांच शुरू कर दी है। सरकार इस पूरे कार्यकाल का लेखा जोखा जनता के सामने रखने के लिए एक श्वेत पत्र तैयार करेगी जिसमें विभिन्न विभागों में सरकारी धन के उपयोग और कथित अनियमितताओं का विस्तृत ब्यौरा शामिल रहेगा। इस दिशा में गठित मंत्रियों के उच्च स्तरीय समूह ने राज्य सचिवालय नबन्ना में अपनी पहली बैठक कर आगे की कार्ययोजना पर चर्चा की।

    बैठक की अध्यक्षता राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने की। इसमें विभिन्न विभागों से जानकारी जुटाने की प्रक्रिया समय सीमा और रिपोर्ट तैयार करने के प्रारूप पर विस्तार से विचार किया गया। सरकार का कहना है कि यह दस्तावेज केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि विभागवार आधिकारिक रिकॉर्ड और वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया जाएगा ताकि पूरे मामले की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सके।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार श्वेत पत्र में उन मामलों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जहां सरकारी धन के दुरुपयोग हेरफेर या अनियमित खर्च की आशंका है। खास तौर पर केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए मिले फंड के उपयोग की गहन समीक्षा होगी। यह भी देखा जाएगा कि जिन योजनाओं के लिए धन स्वीकृत किया गया था क्या वह उसी उद्देश्य पर खर्च हुआ या फिर किसी अन्य कार्य में उसका इस्तेमाल किया गया। जिन परियोजनाओं में धन खर्च ही नहीं किया गया उनकी भी अलग से समीक्षा की जाएगी।

    सरकार ने सभी विभागों को अपने पुराने रिकॉर्ड वित्तीय दस्तावेज और संबंधित फाइलों की जांच कर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। विभागों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर मंत्रियों का समूह एक प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करेगा जिसे मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपा जाएगा। इसके बाद आवश्यक परीक्षण और समीक्षा पूरी होने पर अंतिम श्वेत पत्र सार्वजनिक किया जाएगा।

    बैठक में वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता के अलावा मंत्री दिलीप घोष तापस रॉय अरूप दास और दीपक बर्मन भी मौजूद रहे। सभी मंत्रियों ने संबंधित विभागों से पारदर्शी और तथ्य आधारित जानकारी जुटाने पर जोर दिया ताकि रिपोर्ट विश्वसनीय और प्रमाणिक बन सके।

    यह कदम राज्य सरकार द्वारा विधानसभा के बजट सत्र के दौरान की गई घोषणा के बाद उठाया गया है। सरकार पहले ही संकेत दे चुकी थी कि पिछले शासनकाल में हुए कथित वित्तीय कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार के मामलों का पूरा ब्यौरा तैयार कर जनता के सामने रखा जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी और भविष्य में सरकारी धन के उपयोग में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।

    दूसरी ओर इस पहल को लेकर राज्य की राजनीति भी गर्म होने लगी है। आने वाले समय में श्वेत पत्र के सामने आने के बाद राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि विभागों से जुटाए गए दस्तावेजों और आंकड़ों के आधार पर तैयार होने वाली रिपोर्ट में कौन कौन से तथ्य सामने आते हैं और उसका राज्य की राजनीति पर कितना व्यापक प्रभाव पड़ता है।

  • संसदीय समिति की चौंकाने वाली रिपोर्ट जेलों के भीतर मोबाइल और प्रतिबंधित सामान का खेल नहीं थम रहा

    संसदीय समिति की चौंकाने वाली रिपोर्ट जेलों के भीतर मोबाइल और प्रतिबंधित सामान का खेल नहीं थम रहा


    नई दिल्ली । देश की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्रीय गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति की ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि मोबाइल फोन समेत कई प्रतिबंधित सामान बड़ी आसानी से जेलों के भीतर पहुंच रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि आधुनिक सुरक्षा उपकरण जैमर और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने के बावजूद यह सिलसिला थम नहीं रहा है। रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में जेल स्टाफ के साथ अस्पताल से जुड़े कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत भी सामने आई है जिससे जेल सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।

    समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जेलों में लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनात रहने वाले कर्मचारियों और कैदियों के बीच नजदीकियां बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि कई मामलों में सांठगांठ विकसित हो जाती है और प्रतिबंधित सामान अंदर पहुंचाने का रास्ता आसान बन जाता है। समिति ने सुझाव दिया है कि जेल कर्मचारियों का नियमित अंतराल पर तबादला किया जाए ताकि इस तरह की मिलीभगत की संभावना कम हो सके।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश की अधिकांश जेलों में आधुनिक सुरक्षा संसाधनों की कमी है। कई स्थानों पर लगे जैमर प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं जबकि सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है। इसलिए गृह मंत्रालय से सिफारिश की गई है कि राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर हैंड हेल्ड स्कैनर बैगेज स्कैनर बॉडी वॉर्न कैमरे आधुनिक सीसीटीवी सिस्टम और अन्य सुरक्षा उपकरण खरीदे जा सकें। साथ ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कैदियों की पेशी को बढ़ावा देने की भी सलाह दी गई है जिससे जेल से बाहर ले जाने की जरूरत कम हो सके।

    हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने जेल सुरक्षा पर गंभीर चिंता बढ़ा दी है। गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के जेल के भीतर से मोबाइल फोन और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए आपराधिक नेटवर्क संचालित करने के आरोपों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी पहले कई बार यह संकेत दे चुकी है कि कुछ संगठित अपराधी जेल के भीतर से ही उगाही ड्रग तस्करी हवाला और टारगेट किलिंग जैसी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।

    पूर्व वरिष्ठ जेल अधिकारियों का भी मानना है कि जेल मैनुअल में समय के अनुसार बदलाव की जरूरत है। उनका कहना है कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि कई मामलों में प्रभावशाली लोगों का संरक्षण भी ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देता है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी तब तक सुधार की प्रक्रिया अधूरी रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जेल केवल अपराधियों को बंद रखने का स्थान नहीं बल्कि सुधार गृह भी हैं। यदि जेलों के भीतर ही आपराधिक गतिविधियां संचालित होती रहेंगी तो कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बढ़ेगा। ऐसे में संसदीय समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लागू करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है ताकि जेलों की सुरक्षा मजबूत हो सके और अपराधियों के नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

  • देशविरोधी कंटेंट पर सरकार का शिकंजा स्कूलों और कोचिंग सेंटरों की किताबों की होगी स्क्रीनिंग

    देशविरोधी कंटेंट पर सरकार का शिकंजा स्कूलों और कोचिंग सेंटरों की किताबों की होगी स्क्रीनिंग


    नई दिल्ली । जम्मू कश्मीर सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा और अहम फैसला लिया है। सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों के साथ साथ कोचिंग संस्थानों को निर्देश दिया है कि वे अपनी लाइब्रेरी कक्षाओं और अन्य शैक्षणिक स्थानों पर रखी सभी किताबों की गहन जांच करें। इस जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों तक ऐसी कोई पुस्तक या अध्ययन सामग्री न पहुंचे जिसमें देशविरोधी विचार अलगाववाद हिंसा या किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री शामिल हो। सरकार का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों में सकारात्मक सोच वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय मूल्यों का विकास करना है इसलिए किसी भी प्रकार की भ्रामक सामग्री को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनने दिया जाएगा।

    स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार सभी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों के प्रमुखों को सात दिनों के भीतर अपनी लाइब्रेरी और कक्षाओं में मौजूद पुस्तकों की जांच पूरी करनी होगी। इसके बाद उन्हें प्रमाणित करना होगा कि उनके संस्थान में ऐसी कोई पुस्तक मौजूद नहीं है जो राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हो या छात्रों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालती हो। यदि जांच के दौरान कोई संदिग्ध या आपत्तिजनक पुस्तक मिलती है तो उसकी पूरी जानकारी संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध करानी होगी ताकि आगे आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

    यह कदम हाल ही में सामने आए उस विवाद के बाद उठाया गया है जिसमें कुछ पुस्तकों में जम्मू कश्मीर को भारत के कब्जे वाला क्षेत्र बताया गया था और कुछ अलगाववादी व्यक्तियों का सकारात्मक चित्रण किया गया था। इन पुस्तकों के सामने आने के बाद प्रशासन ने इसे गंभीर मामला मानते हुए तत्काल जांच शुरू कर दी। इसके बाद उपराज्यपाल ने संबंधित शिक्षा अधिकारियों पर कार्रवाई करते हुए कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया और पूरे प्रदेश में शैक्षणिक सामग्री का ऑडिट कराने के निर्देश दिए।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी शिक्षण संस्थानों में उपयोग होने वाली सामग्री नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप होनी चाहिए। ऐसी किसी भी पुस्तक को स्वीकार नहीं किया जाएगा जो धार्मिक भावनाओं को आहत करे समाज में विभाजन पैदा करे या छात्रों को भटकाने का प्रयास करे। शिक्षा विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों और संस्थानों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

    इस पूरे मामले पर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे इतिहास और वैचारिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा है। कुछ नेताओं का कहना है कि किताबों की स्क्रीनिंग के नाम पर इतिहास को बदला नहीं जाना चाहिए जबकि सरकार का तर्क है कि छात्रों को तथ्य आधारित और संतुलित शिक्षा देना उसकी जिम्मेदारी है तथा किसी भी प्रकार की भ्रामक या राष्ट्रविरोधी सामग्री को शिक्षा का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता।

    इस बीच बाल अधिकारों से जुड़े संगठनों ने भी इस विषय को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि बच्चों को ऐसी सामग्री उपलब्ध कराना जो हिंसा अलगाववाद या भ्रामक विचारों को बढ़ावा देती हो उनके मानसिक विकास और भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए शैक्षणिक संस्थानों में पाठ्य सामग्री की समय समय पर समीक्षा आवश्यक है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा किसी भी समाज की सबसे मजबूत नींव होती है। ऐसे में स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों का तथ्यपरक संतुलित और संविधान की भावना के अनुरूप होना बेहद जरूरी है। यदि किसी सामग्री पर विवाद की आशंका हो तो उसकी निष्पक्ष समीक्षा कर उचित निर्णय लेना शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

  • दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे

    दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छे शहरों की सूची में दिल्ली 120वें स्थान पर, मुम्बई उससे भी पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया भर में रहने के लिहाज से सबसे अच्छे शहरों (Best Cities) की ताजा लिस्ट आ गई है। इस हफ्ते ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ ने अपनी नई ‘ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स 2026’ (Global Liveability Index 2026) रिपोर्ट जारी की है। इस सूचकांक में कुल 173 शहरों को वहां मौजूद सुविधाओं और रहने की स्थितियों के अलग-अलग पैमानों पर परखा गया है। अगर भारतीय शहरों की बात करें तो नई दिल्ली (New Delhi) को 120वां स्थान मिला है। वहीं, डेनमार्क का शहर कोपेनहेगन (Copenhagen) दुनिया के सबसे बेहतरीन और रहने लायक शहरों की लिस्ट में नंबर वन पर बरकरार है। कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना को पीछे छोड़ते हुए अपना पहला स्थान बरकरार रखा है। द इकोनॉमिस्ट मैगजीन की सहयोगी संस्था ईआईयू ने दुनिया भर के 173 शहरों को शिक्षा, स्थिरता, हेल्थकेयर, इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्कृति जैसे पैमानों पर परखा है।


    भारतीय शहरों की रैंकिंग

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के प्रमुख शहरों की रैंकिंग कुछ इस प्रकार है:
    – नई दिल्ली: 120वें पायदान पर
    – मुंबई: 121वें पायदान पर
    – चेन्नई: 123वें पायदान पर
    – बेंगलुरु: 127वें पायदान पर

    गौर करने वाली बात यह है कि देश की राजधानी नई दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई की रैंकिंग में पिछले साल के मुकाबले कोई बदलाव नहीं आया है। ये दोनों शहर अपनी पुरानी स्थिति पर ही बने हुए हैं।


    दुनिया के 10 सबसे बेहतरीन शहर

    रहने के लिहाज से डेनमार्क के कोपेनहेगन ने ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना और ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न को पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है:


    कोपेनहेगन क्यों है नंबर वन?

    रिपोर्ट के मुताबिक, कोपेनहेगन को स्थिरता, इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षा के मामले में “परफेक्ट” स्कोर मिला है। ईआईयू के एक प्रवक्ता ने बताया कि इस शहर की शानदार स्थिरता और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ बेहतरीन संस्कृति, पर्यावरण और उच्च गुणवत्ता वाली सार्वजनिक सेवाओं के बेजोड़ तालमेल ने इसे शीर्ष पर बनाए रखा है।


    अमेरिका और कनाडा का क्या है हाल?

    टॉप-10 की ग्लोबल लिस्ट में उत्तरी अमेरिका का केवल एक शहर जगह बना पाया है, और वह है कनाडा का वैंकूवर (9वां स्थान)। अगर अमेरिकी शहरों की बात करें तो न्यूयॉर्क तीन पायदान की छलांग लगाकर 66वें नंबर पर आ गया है। अपराध दर में कमी और आतंकी घटनाओं के कम होते खतरे की वजह से इसके ‘स्टेबिलिटी स्कोर’ में काफी सुधार हुआ है। हालांकि, दो पायदान नीचे खिसकने के बावजूद होनोलूलू (25वां स्थान) अभी भी अमेरिका का सबसे ऊंची रैंकिंग वाला शहर बना हुआ है।


    एशिया के स्कोर में सुधार, यूरोप में ठहराव

    इंडेक्स के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से दुनिया का सबसे शानदार क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि अब इसके औसत स्कोर में एक ठहराव आ गया है। इसके उलट, एशिया के औसत स्कोर में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साल 2025 की तुलना में इस बार चीन के 10 शहरों ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। इसके अलावा, रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि ईरान युद्ध की वजह से पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित हुई है।


    एशिया के हेल्थकेयर में सुधार से रैंकिंग उछली

    इस साल एशिया के औसत लिवेबिलिटी स्कोर में 0.3 अंकों की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह 73.9 हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की स्वास्थ्य सेवाओं (हेल्थकेयर) का मजबूत होना है। चीन के कई शहरों की रैंकिंग में भी उछाल आया है, जैसे फुझोऊ सात पायदान चढ़कर 93वें नंबर पर पहुंच गया है। ईआईयू की इंडस्ट्री डायरेक्टर एना निकोल्स के मुताबिक, एशिया के स्कोर में बढ़ोतरी का नतीजा यह है कि अब टॉप-20 में यूरोप के सात शहरों के साथ एशिया के नौ शहर शामिल हो गए हैं। वहीं, पश्चिमी यूरोप अभी भी रहने के लिहाज से सबसे मजबूत क्षेत्र बना हुआ है, हालांकि पिछले साल के मुकाबले इसका औसत स्कोर थोड़ा गिरकर 91.7 हो गया है।


    युद्ध की वजह से खाड़ी देशों को भारी नुकसान

    ईरान युद्ध के नतीजे खाड़ी (गल्फ) क्षेत्र के शहरों की रैंकिंग में साफ दिखाई दे रहे हैं, जहां स्थिरता स्कोर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मस्कट 14 पायदान गिरकर 123वें नंबर पर और कुवैत सिटी 12 स्थान खिसककर 105वें नंबर पर आ गया है। लिस्ट में सबसे नीचे सीरिया का दमिश्क शहर है, जो अभी भी दुनिया में रहने के लिहाज से सबसे खराब शहर माना गया है। इसके अलावा, युद्ध के कारण ईरान की राजधानी तेहरान खिसककर 164वें और यूक्रेन का कीव 166वें नंबर पर पहुंच गया है।

  • बंगाल की मासूम से दरिंदगी का आरोपी प्रभास मंडल एनकाउंटर में मारा गया अब CID करेगी पूरे घटनाक्रम की जांच

    बंगाल की मासूम से दरिंदगी का आरोपी प्रभास मंडल एनकाउंटर में मारा गया अब CID करेगी पूरे घटनाक्रम की जांच


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के बारुईपुर में 11 वर्षीय बच्ची के साथ हुई हैवानियत ने पूरे देश को झकझोर दिया। चार दिन तक चली पुलिस जांच के बाद इस सनसनीखेज मामले का मुख्य आरोपी प्रभास मंडल पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। जिस इलाके में मासूम की दर्दनाक मौत हुई थी उसी क्षेत्र के पास आरोपी की मौत होने से यह मामला और भी चर्चा में आ गया है। अब इस पूरे एनकाउंटर की जांच अपराध जांच विभाग यानी CID को सौंपी जा रही है जबकि न्यायिक जांच भी समानांतर रूप से जारी रहेगी।

    घटना की शुरुआत 4 जुलाई को हुई जब बारुईपुर के सूर्यपुर हाट क्षेत्र के एक तालाब से बोरे में बंद 11 वर्षीय बच्ची का शव बरामद हुआ। बच्ची अपनी सहेली के लिए उपहार खरीदने घर से निकली थी लेकिन वापस नहीं लौटी। जांच के दौरान सामने आया कि उसके साथ पहले दरिंदगी की गई और फिर उसे गंभीर रूप से घायल अवस्था में बोरे में भरकर तालाब में फेंक दिया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह भी संकेत मिले कि बच्ची तालाब में फेंके जाने के समय जीवित थी और उसके फेफड़ों तथा पेट में पानी मिला जिससे डूबने की पुष्टि हुई। शरीर पर कई चोटों के साथ निजी अंगों पर गंभीर जख्म और काटने के निशान भी पाए गए।

    जांच के दौरान पुलिस ने इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली। फुटेज में प्रभास मंडल आखिरी बार बच्ची के साथ दिखाई दिया। इसके बाद पुलिस ने उसके घर पर दबिश दी। शुरुआत में परिवार ने आरोपी के घर पर न होने का दावा किया लेकिन पुलिस ने घर के अंदर तलाशी ली तो वह एक कोने में छिपा मिला। पूछताछ के दौरान उसने पहले पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की और अन्य लोगों पर आरोप लगाया लेकिन बाद में कथित रूप से उसने अपराध में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली।

    घटना के चार दिन बाद देर रात पुलिस आरोपी को घटनास्थल पर लेकर पहुंची जहां पूरे घटनाक्रम का पुनर्निर्माण कराया जा रहा था। पुलिस के अनुसार इसी दौरान प्रभास मंडल ने एक पुलिस अधिकारी की पिस्तौल छीनकर भागने की कोशिश की और पुलिस पर फायरिंग भी की। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने गोली चलाई जो उसके सीने और शरीर के अन्य हिस्सों में लगी। घायल आरोपी को अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

    एनकाउंटर के बाद अब पूरे मामले की जांच CID को सौंपने की तैयारी की गई है क्योंकि मुठभेड़ में स्थानीय पुलिस के अधिकारी शामिल थे। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाती है। इसके साथ ही न्यायिक जांच भी जारी रहेगी ताकि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा की जा सके।

    यह मामला एक बार फिर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि ऐसे जघन्य अपराधों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कितनी आवश्यक है ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके और समाज में कानून के प्रति विश्वास बना रहे।

  • देशभर में सक्रिय हुआ मानसून…. दिल्ली-यूपी समेत 18 राज्यों में आज भारी बारिश का अलर्ट!

    देशभर में सक्रिय हुआ मानसून…. दिल्ली-यूपी समेत 18 राज्यों में आज भारी बारिश का अलर्ट!


    नई दिल्ली।
    देशभर में मानसून (Monsoon) अब पूरी तरह सक्रिय हो चुका है और कई राज्यों में इसका असर लगातार तेज होता जा रहा है. इसी बीच मौसम विभाग ने 10 जुलाई के लिए दिल्ली (Delhi), उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) सहित 18 राज्यों में भारी बारिश (Heavy rain), तेज आंधी और खराब मौसम को लेकर चेतावनी जारी की है. विभाग के अनुसार कुछ स्थानों पर हवा की रफ्तार 85 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है. ऐसे में लोगों से गैर-जरूरी यात्रा से बचने और मौसम से जुड़ी आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील की गई है।

    मौसम विभाग का कहना है कि उत्तर भारत के कई हिस्सों में अगले 48 घंटे के दौरान बारिश का दौर और तेज हो सकता है. दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में तेज बारिश के साथ आंधी चलने की संभावना है. कई स्थानों पर जलभराव, यातायात प्रभावित होने और पेड़ गिरने जैसी घटनाएं भी सामने आ सकती हैं।


    पहाड़ी राज्यों में बढ़ सकता है खतरा

    हिमालयी राज्यों में लगातार हो रही बारिश के कारण भूस्खलन, चट्टानें गिरने और नदियों-नालों के जलस्तर में बढ़ोतरी की आशंका जताई गई है. पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और पर्यटकों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है. प्रशासन भी संवेदनशील इलाकों पर नजर बनाए हुए है.


    पूर्वी भारत में बिजली गिरने का खतरा

    पूर्वी भारत के कई राज्यों में गरज-चमक के साथ बारिश और आकाशीय बिजली गिरने की संभावना बनी हुई है. मौसम विभाग ने लोगों से खराब मौसम के दौरान खुले मैदान, ऊंचे पेड़ों और बिजली के खंभों से दूर रहने की सलाह दी है.


    देश के 18 राज्यों में बारिश और तेज आंधी का अलर्ट

    भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने 10 जुलाई के लिए देश के 18 राज्यों में भारी बारिश और तेज आंधी की चेतावनी जारी की है. प्रभावित राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मेघालय, महाराष्ट्र और केरल शामिल हैं. विभाग के अनुसार कई इलाकों में 80 से 85 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं. वहीं, कुछ राज्यों में बड़े आकार के ओले गिरने की भी आशंका जताई गई है।


    मछुआरों के लिए विशेष चेतावनी

    समुद्र और नदी किनारे रहने वाले लोगों के साथ-साथ मछुआरों को भी सतर्क रहने को कहा गया है. विभाग ने खराब मौसम को देखते हुए समुद्र में नहीं जाने और नदी तटीय क्षेत्रों से दूरी बनाए रखने की सलाह जारी की है. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक उत्तर-पश्चिम मध्य प्रदेश और उससे सटे दक्षिण-पश्चिम उत्तर प्रदेश के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बना हुआ है. इसके साथ ही मानसून ट्रफ उत्तर-पश्चिम राजस्थान से उत्तर-पूर्व बंगाल की खाड़ी तक फैली हुई है. यही प्रणाली कई राज्यों में लगातार बारिश और तेज हवाओं की वजह बन रही है।


    किन राज्यों पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर?

    मौसम विभाग के अनुसार 10 जुलाई को दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत कुल 18 राज्यों में कहीं भारी तो कहीं बहुत भारी बारिश, तेज हवाएं और गरज-चमक का दौर देखने को मिल सकता है. कई जिलों के लिए अलग-अलग स्तर के अलर्ट भी जारी किए गए हैं. आगे हम राज्यवार और जिला स्तर पर जानेंगे कि 10 जुलाई को कहां सबसे ज्यादा बारिश की संभावना है, किन जिलों में तेज आंधी चल सकती है और किन इलाकों में लोगों को विशेष सतर्क रहने की जरूरत होगी।