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  • New Drug Rules: अब डॉक्टर की पर्ची के बिना नहीं मिलेगी 12% से अधिक अल्कोहल वाली दवाएं…

    New Drug Rules: अब डॉक्टर की पर्ची के बिना नहीं मिलेगी 12% से अधिक अल्कोहल वाली दवाएं…


    नई दिल्ली।
    अगर आप भी अब तक पास के मेडिकल स्टोर (Medical Store) से ऐसी सिरप (Syrup) या दूसरी पीने वाली दवाएं ले आते थे जिनमें अल्कोहल (Alcohol) होता है, तो यह खबर आपके लिए जरूरी है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने शुक्रवार (10 जुलाई 2026) को दवा नियमों (New Drug Rules) में दसवां संशोधन जारी किया है। यह नया नियम, सरकारी गजट में प्रकाशित होने के छह महीने बाद प्रभावी होगा।

    नए नियमों (New Drug Rules) के तहत 30 एमएल से बड़ी पैकिंग और 12% से ज्यादा एथिल अल्कोहल (Ethyl Alcohol) वाली सभी ओरल दवाओं को शेड्यूल H1 में शामिल कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अब ये दवाएं केवल डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर ही बेची जा सकेंगी। मेडिकल स्टोर को इनकी बिक्री का रिकॉर्ड भी निर्धारित नियमों के अनुसार रखना होगा।

    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ड्रग्स रूल्स, 1945 में किए गए इस बड़े बदलाव का उद्देश्य उन दवाओं के गलत इस्तेमाल को रोकना है जिनमें एथिल अल्कोहल (Ethyl Alcohol) की मात्रा अधिक होती है। इस कदम का मकसद उन प्रोडक्ट्स को रेगुलेट करना है जिनमें अल्कोहल का ज्यादा कंसंट्रेशन होता है और जिन्हें शायद नॉन-मेडिकल इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

    अभी तक कुछ आयुर्वेदिक दवाओं जैसे इलायची, अदरक और अन्य सुगंधित टिंचर को शेड्यूल-के के तहत लाइसेंस की अनिवार्यता से छूट प्राप्त थीं। इन दवाओं में कई बार 80 से 90 प्रतिशत तक एथिल अल्कोहल होता है। सरकार को आशंका थी कि इनका इस्तेमाल इलाज की बजाय नशे के लिए किया जा सकता है। इस संबंध में कई राज्यों ने भी चिंता जताई थी।

    इसी को देखते हुए सरकार ने नियमों में संशोधन किया है। अब 12 प्रतिशत से अधिक एथिल अल्कोहल (v/v) वाली और 30 मिलीलीटर से अधिक पैकिंग में बिकने वाली ऐसी सभी दवाओं को शेड्यूल के की छूट नहीं मिलेगी। यानी इन दवाओं के निर्माण और बिक्री के लिए अब ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।


    दवाओं की निगरानी होगी बेहतर

    सरकार का कहना है कि इस बदलाव से अधिक अल्कोहल वाली दवाओं की निगरानी बेहतर होगी। इनका वितरण केवल अधिकृत दवा चैनलों के माध्यम से होगा। इससे गलत इस्तेमाल या नशे के लिए दुरुपयोग की आशंका कम होगी। साथ ही, जिन मरीजों को वास्तव में इन दवाओं की जरूरत है, उन्हें ये पहले की तरह उपलब्ध होती रहेंगी। सरकार के अनुसार यह कदम देश में दवा नियमन को और मजबूत बनाने, दवाओं के सही उपयोग को बढ़ावा देने और लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।

  • वन नेशन-वन इलेक्शन 2029 के आम चुनाव तक लागू करने की तैयारी….99% लोग प्रस्ताव के समर्थन में

    वन नेशन-वन इलेक्शन 2029 के आम चुनाव तक लागू करने की तैयारी….99% लोग प्रस्ताव के समर्थन में


    नई दिल्ली।
    एक देश- एक चुनाव (One Nation, One Election) को लेकर हलचल तेज होती दिख रही है। संसद (Parliament) की संयुक्त समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने शुक्रवार को गोवा में इसको लेकर बड़ा बयान दिया है। वहीं, भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर (Anurag Thakur) ने इसे गेम चेंजर बताया है। आपको बता दें कि समिति एक साथ चुनाव कराने संबंधी विधेयकों की समीक्षा कर रही। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है जिससे ‘एक देश, एक चुनाव’ सुधार को 2029 के आम चुनाव तक लागू किया जा सके।

    समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने दावा करते हुए कहा कि अबतक जिन नागरिक संस्थाओं से सुझाव लिया गया है उसमें से करीब 99 फीसदी ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। प्रस्ताव का उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनाव से होने वाले अनुमानित सात लाख करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान को रोकना है।

    पीपी चौधरी ने कहा कि गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली समेत कई राज्यों का दौरा पूरा हो चुका है। यहां संविधान विशेषज्ञों, नागरिक संस्थाओं, शिक्षाविदों और अन्य संबंधित लोगों से बातचीत हुई है। जिन लोगों से सलाह ली गई उनमें से अधिकतर ने एक साथ चुनाव कराने के विचार का समर्थन किया है। अब कोशिश ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसे सभी राजनीतिक दल स्वीकार करें। इसे लागू करने की समय सीमा के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि समिति कई विकल्पों पर विचार कर रही है।


    गेंम चेंजर साबित होगी व्यवस्था

    वहीं, इस मुद्दे पर भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा है कि एक देश- एक चुनाव पूरे देश के लिए गेम चेंजर साबित होगा। नई व्यवस्था से शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी, निवेश बढ़ेगा और बार-बार चुनाव कराने में लगने वाले समय एवं संसाधनों की बचत से रोजगार के अधिक अवसर पैदा होंगे। उन्होंने जीएसटी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र, एक कर की व्यवस्था से देश को व्यापक लाभ मिला है। बार-बार होने वाले चुनावों का असर राज्यों के राजस्व, सरकारी कामकाज, न्याय व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है।


    संविधान संसोधन विधेयक पर चर्चा

    समिति ने गोवा में संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 पर चर्चा शुरू की। इसकी शुरुआत मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ बातचीत से हुई जिसमें एकसाथ चुनाव कराने में आने वाली चुनौतियों और उनसे निपटने के तरीकों पर उनकी राय मांगी गई। चौधरी ने बताया कि मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ ‘एक देश, एक चुनाव’ को कैसे लागू किया जा सकता है, इसमें क्या चुनौतियां हैं और सभी को स्वीकार्य संतुलन बनाए रखते हुए उन चुनौतियों को कैसे कम किया जा सकता है।

  • सात राज्यों में होने वाले हैं विधानसभा चुनाव, बिना CM चेहरे के मैदान में उतरेगी BJP, जानिए क्‍या है नई रणनीति?

    सात राज्यों में होने वाले हैं विधानसभा चुनाव, बिना CM चेहरे के मैदान में उतरेगी BJP, जानिए क्‍या है नई रणनीति?


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत अगले साल होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी रणनीति पर मंथन शुरू कर दिया है। पार्टी चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा करने से बचने की योजना बना रही है। इसके बजाय भाजपा सामूहिक नेतृत्व और मौजूदा संगठनात्मक ढांचे के साथ चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।

    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, पिछले कुछ चुनावों के अनुभवों को देखते हुए भाजपा नेतृत्व का मानना है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा नहीं करने से कई बार राजनीतिक लाभ मिलता है। इससे पार्टी के भीतर संभावित गुटबाजी की आशंका कम रहती है और चुनाव अभियान को व्यापक स्तर पर चलाने में मदद मिलती है।

    मौजूदा मुख्यमंत्रियों को मिल सकता है मौका
    भाजपा की रणनीति के अनुसार, जिन राज्यों में पार्टी की सरकार है, वहां मौजूदा मुख्यमंत्री को चुनाव अभियान में प्रमुख भूमिका दी जा सकती है। हालांकि, चुनाव से पहले यह स्पष्ट घोषणा नहीं की जाएगी कि वही नेता दोबारा मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे। पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि वर्तमान नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ना फायदेमंद रहेगा, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर पहले से घोषणा करने से सत्ता विरोधी माहौल बनने और पार्टी के अंदर अलग-अलग धड़े सक्रिय होने की संभावना बढ़ सकती है।

    सत्ता वाले राज्यों को बचाने पर फोकस
    अगले साल देश के सात राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इनमें पांच राज्यों में फरवरी-मार्च के दौरान और दो राज्यों में दिसंबर में चुनाव होने हैं। भाजपा की सरकार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और गुजरात में है, जबकि पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पार्टी सत्ता में नहीं है। भाजपा का लक्ष्य अपने मौजूदा राज्यों में सरकार बनाए रखना और बाकी राज्यों में भी बेहतर प्रदर्शन करना है।

    नई रणनीति पर पार्टी में मंथन
    भाजपा नेतृत्व चुनावी रणनीति में नए बदलावों पर विचार कर रहा है। पार्टी का मानना है कि सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ने से संगठन के सभी स्तरों को सक्रिय भूमिका मिलती है और विरोधियों को किसी एक चेहरे के खिलाफ अभियान चलाने का मौका कम मिलता है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यह रणनीति भाजपा के लिए कितनी प्रभावी साबित होगी, इसका फैसला चुनावी नतीजों के बाद ही होगा।

  • E20 पेट्रोल विवाद को लेकर संजय राउत का दावा, बोले- गडकरी की छवि को खुद BJP पहुंचा रही नुकसान

    E20 पेट्रोल विवाद को लेकर संजय राउत का दावा, बोले- गडकरी की छवि को खुद BJP पहुंचा रही नुकसान


    नई दिल्‍ली । शिवसेना यूबीटी संजय राउत (Sanjay Raut) ने शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Union Minister Nitin Gadkari) को लेकर एक बड़ा दावा कर दिया है। संजय राउत के मुताबिक केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की छवि को खुद भारतीय जनता पार्टी (BJP) नुकसान पहुंचाना चाहती है क्योंकि गडकरी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने के लिए एक मजबूत दावेदार हैं। संजय राउत ने कहा है कि नितिन गडकरी को बदनाम करने के पीछे कोई बाहरी ताकत नहीं, बल्कि खुद बीजेपी के ही कुछ बड़े नेता शामिल हैं।

    संजय राउत ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि गडकरी को लेकर जनता के बीच जो भी भ्रम फैलाया जा रहा है, उसके पीछे उनकी अपनी ही पार्टी के लोग हैं। राउत ने कहा, “गडकरी साहब को लेकर जो भ्रम फैला है, उसमें उनके ही पार्टी के लोगों का हाथ है। नितिन गडकरी को बदनाम करने में और कोई नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के ही लोग हैं…वे उन्हें किसी न किसी तरह से एक जाल में फंसाना चाहते हैं।”

    2014 से पहले का दिया हवाला
    राउत ने अतीत का जिक्र करते हुए कहा, “2014 से पहले भी जब गडकरी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में दूसरे कार्यकाल देने की चर्चा चल रही थी, तब भी उन्हें इसी तरह फंसाने की कोशिशें हुईं।” उन्होंने दावा किया कि नितिन गडकरी की लोकप्रियता अच्छी है और वे पीएम पद के अगले दावेदार हो सकते थे इसलिए भाजपा खुद ही साजिश रच रही। राउत ने कहा, “वे पीएम पद के एक मजबूत दावेदार हैं, इसलिए उन्हें इतना बदनाम कर दो कि जनता के बीच उनकी छवि खराब हो जाए। ये उनकी ही पार्टी के लोग कह रहे हैं। उनको भी सब पता है।”

    नितिन गडकरी क्यों चर्चा में?
    गौरतलब है कि नितिन गडकरी केंद्रीय मंत्री इन दिनों E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल) को लेकर विवादों में हैं। दरअसल भारत सरकार ने देश में 20 फीसदी एथेनॉल मिले हुए पेट्रोल को अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस कदम का खूब विरोध हो रहा है। हालांकि नितिन गडकरी ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी है कि E20 फ्यूल से गाड़ियों में कोई खराबी नहीं आती है। इस चुनौती के बाद बहस और तेज हो गई है। वाहन मालिकों का आरोप है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों के माइलेज में गिरावट आ रही है, पुरानी गाड़ियों के इंजन को नुकसान पहुंच रहा है और लोगों को जबरन इसे अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आरोप हैं कि नितिन गडकरी के इसमें निजी हित भी हैं।

  • पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड से जुड़े उरांव आदिवासी समुदाय के एक पैतृक संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तराधिकार संबंधी पारंपरिक व्यवस्था की कानूनी व्याख्या स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार कर लेने से उसे पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक संबंधित समुदाय की स्थापित परंपरा में ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट आधार मौजूद न हो। इस निर्णय के साथ सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालतों और उच्च न्यायालय के फैसलों को निरस्त कर दिया।

    मामला झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय की एक पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा था। विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब परिवार के एक सदस्य की संतान नहीं थी और उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। एक पक्ष का कहना था कि मृतक ने अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए वही संपत्ति का वैध उत्तराधिकारी है। वहीं दूसरे पक्ष ने दावा किया कि उरांव समुदाय की पारंपरिक व्यवस्था में ऐसी कोई मान्यता नहीं है और संपत्ति का अधिकार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को मिलना चाहिए।

    सर्वोच्च अदालत की पीठ ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और समुदाय की प्रचलित परंपराओं का परीक्षण करने के बाद कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि उरांव समाज में चाचा अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बनाकर उत्तराधिकारी नियुक्त करने की कोई स्थापित और मान्य परंपरा मौजूद है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रथा या रिवाज को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब उसके अस्तित्व और निरंतर पालन के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं।

    अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यदि संपत्ति के स्वामी का कोई प्रत्यक्ष पुरुष उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी स्थिति में समुदाय की पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था के अनुसार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होगा। इसी आधार पर अदालत ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया।

    यह मामला पहले ट्रायल कोर्ट, फिर प्रथम अपीलीय अदालत और उसके बाद झारखंड हाई कोर्ट तक पहुंचा था। इन सभी अदालतों ने ‘घर दामाद’ के पक्ष में दिए गए तर्कों को स्वीकार किया था। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन निर्णयों में संबंधित समुदाय की वास्तविक परंपराओं का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया और स्थापित प्रथाओं के समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किए गए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आदिवासी समुदायों में प्रचलित पारंपरिक उत्तराधिकार कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी भी समुदाय की परंपराओं को मान्यता देने के लिए उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और कानूनी आधार का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। केवल पारिवारिक व्यवस्था या व्यक्तिगत सहमति के आधार पर उत्तराधिकार संबंधी अधिकार स्वतः स्थापित नहीं किए जा सकते।

    इस निर्णय को भविष्य में आदिवासी समुदायों से जुड़े संपत्ति विवादों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह फैसला इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि पारंपरिक कानूनों की व्याख्या साक्ष्यों और स्थापित रिवाजों के आधार पर ही की जाएगी, न कि केवल मौखिक दावों या व्यक्तिगत व्यवस्थाओं के आधार पर।

  • राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

    नई दिल्ली । देश में राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन की मांग एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और अन्य वैधानिक संस्थाओं की तरह पुरुषों के लिए भी एक अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए जाने की मांग पिछले कई वर्षों से उठती रही है। हालांकि यह मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आने के बावजूद अब तक किसी ठोस कानूनी रूप में सामने नहीं आ सका है। इसके पीछे कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियां बताई जाती हैं।

    हाल के वर्षों में पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, आत्महत्या के मामलों और कुछ कानूनों के कथित दुरुपयोग को लेकर कई संगठनों ने अलग आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया है। समर्थकों का कहना है कि पुरुषों से जुड़े ऐसे मामलों की सुनवाई और अध्ययन के लिए एक समर्पित संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे उनकी शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सके और आवश्यक सुझाव सरकार तक पहुंच सकें।

    राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर न्यायपालिका और संसद दोनों स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। इस विषय पर जनहित याचिकाएं दायर हुईं और एक निजी सदस्य विधेयक भी प्रस्तुत किया गया। हालांकि अब तक यह पहल कानून का रूप नहीं ले सकी है। संसदीय प्रक्रिया में निजी सदस्य विधेयकों का कानून बनना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है और इस विषय पर सरकार की ओर से भी अब तक कोई आधिकारिक विधेयक पेश नहीं किया गया है।

    इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या पुरुष आयोग की स्थापना से मौजूदा महिला आयोग या महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर कोई प्रभाव पड़ेगा। आयोग के समर्थकों का कहना है कि उनका उद्देश्य महिला आयोग का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि पुरुषों से जुड़े मामलों के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत व्यवस्था बनाना है। उनका तर्क है कि दोनों आयोग समानांतर रूप से काम कर सकते हैं और किसी भी वर्ग के अधिकारों को कमजोर किए बिना न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाया जा सकता है।

    वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और असमानता अब भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि पुरुष आयोग का गठन किया जाता है तो उसकी भूमिका, अधिकार और दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक होगा, ताकि किसी प्रकार का कानूनी टकराव उत्पन्न न हो।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पुरुषों से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, सामाजिक दबाव और आत्महत्या जैसे विषयों पर अधिक शोध और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संस्थागत व्यवस्था बनती है तो वह नीति निर्माण, शोध, परामर्श सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उपयोगी भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा समान रूप से हो और किसी भी वर्ग के हित प्रभावित न हों।

    फिलहाल राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन केवल प्रस्ताव और बहस के स्तर पर है। इसके कानून बनने के लिए सरकार की पहल, व्यापक राजनीतिक सहमति और संसद की मंजूरी आवश्यक होगी। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह सरकार के रुख, संसदीय प्रक्रिया और समाज में बनने वाली व्यापक सहमति पर निर्भर करेगा।

  • राम मंदिर टिप्पणी के बीच युगों की चर्चा पर छिड़ा नया राजनीतिक विवाद, अनुपम खेर के बयान पर कांग्रेस ने साधा निशाना

    राम मंदिर टिप्पणी के बीच युगों की चर्चा पर छिड़ा नया राजनीतिक विवाद, अनुपम खेर के बयान पर कांग्रेस ने साधा निशाना

    नई दिल्ली । राम मंदिर को लेकर अभिनेता अनुपम खेर की एक टिप्पणी के बाद धार्मिक संदर्भों और सनातन काल गणना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सोशल मीडिया पर अभिनेता के एक वीडियो का उल्लेख करते हुए उनके बयान की आलोचना की और कहा कि सनातन परंपरा में वर्णित युगों के क्रम को सही ढंग से समझना आवश्यक है। इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।

    विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें अनुपम खेर राम मंदिर से जुड़े एक मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने भगवान राम और द्वापर युग का उल्लेख किया। उनके इस कथन को लेकर कांग्रेस ने आपत्ति जताई और कहा कि सनातन परंपरा के अनुसार भगवान राम का अवतार त्रेता युग में माना जाता है, जबकि द्वापर युग भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। इसी आधार पर कांग्रेस ने अभिनेता के बयान को तथ्यात्मक रूप से गलत बताते हुए उनकी आलोचना की।

    सुप्रिया श्रीनेत ने अपने बयान में सनातन धर्म की पारंपरिक काल गणना का उल्लेख करते हुए चारों युगों का क्रम बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग क्रमशः चार युग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीराम का अवतार त्रेतायुग में और भगवान श्रीकृष्ण का अवतार द्वापरयुग में माना जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने अभिनेता पर तंज कसते हुए कहा कि सार्वजनिक रूप से धार्मिक विषयों पर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों की जानकारी होना आवश्यक है।

    दूसरी ओर, अनुपम खेर का मूल बयान राम मंदिर से जुड़े एक कथित चोरी के मामले पर था। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि किसी संस्था या आस्था से जुड़े स्थान पर यदि कोई गलत घटना होती है तो उसके आधार पर पूरे संस्थान या परंपरा पर प्रश्न नहीं उठाया जाना चाहिए। इसी दौरान युगों का उल्लेख करते हुए हुई कथित तथ्यात्मक त्रुटि विवाद का कारण बन गई। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके बयान का वीडियो तेजी से साझा किया जाने लगा और विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

    यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक परंपराओं की जानकारी और सार्वजनिक जीवन में तथ्यों की शुद्धता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया। राजनीतिक दलों के नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने इसे सामान्य भाषाई चूक बताया, जबकि अन्य ने धार्मिक विषयों पर बोलते समय अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    वर्तमान विवाद ऐसे समय सामने आया है जब राम मंदिर और उससे जुड़े विषय लगातार सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच यह घटनाक्रम एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि इस पूरे मामले में दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों पर कायम हैं, लेकिन इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़े विषयों पर सार्वजनिक बयान देते समय तथ्यात्मक सटीकता और संतुलित भाषा का विशेष महत्व होता है।

  • युद्ध और आतंक का खतरनाक हथियार बना CRSV, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा पर उठाई कड़ी आपत्ति

    युद्ध और आतंक का खतरनाक हथियार बना CRSV, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा पर उठाई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में भारत ने संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा (Conflict-Related Sexual Violence-CRSV) को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए इसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा की है। भारत ने कहा कि युद्ध, आतंकवाद, सशस्त्र संघर्ष और राजनीतिक दमन के दौरान इस प्रकार की हिंसा का इस्तेमाल एक सुनियोजित हथियार के रूप में किया जाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने का आह्वान किया है।

    संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा ऐसे अपराधों को कहा जाता है जो किसी युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवादी गतिविधि, सशस्त्र संघर्ष या राजनीतिक अस्थिरता के दौरान किए जाते हैं। इन अपराधों में बलात्कार, यौन दासता, जबरन वेश्यावृत्ति, जबरन गर्भधारण, जबरन नसबंदी और अन्य प्रकार के यौन उत्पीड़न शामिल होते हैं। इनका उद्देश्य केवल शारीरिक नुकसान पहुंचाना नहीं होता, बल्कि पीड़ितों और पूरे समुदाय के मनोबल को तोड़ना भी होता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार की हिंसा का सबसे अधिक शिकार महिलाएं और लड़कियां बनती हैं। हालांकि कई संघर्ष क्षेत्रों में पुरुषों और बच्चों के भी ऐसे अपराधों का शिकार बनने के मामले सामने आए हैं। युद्ध और हिंसक संघर्ष के दौरान कमजोर और असुरक्षित आबादी को निशाना बनाकर विरोधी पक्ष में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करने की कोशिश की जाती है। यही कारण है कि इसे केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि व्यापक मानवाधिकार उल्लंघन माना जाता है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा को युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में देखा जाता है। ऐसे मामलों का असर केवल पीड़ित व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है। कई बार भय के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पलायन करना पड़ता है, जिससे मानवीय संकट और गहरा हो जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र ने इस समस्या से निपटने के लिए कई वर्षों से विशेष प्रयास किए हैं। संगठन ने सदस्य देशों के सहयोग से ऐसे अपराधों को रोकने, पीड़ितों को न्याय दिलाने और दोषियों को जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय ढांचे और तंत्र विकसित किए हैं। साथ ही संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में शांति स्थापना, मानवाधिकार संरक्षण और पुनर्वास की दिशा में भी लगातार काम किया जा रहा है।

    भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपने वक्तव्य के दौरान इस बात पर जोर दिया कि संघर्ष-संबंधी यौन हिंसा को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत का मानना है कि ऐसे अपराधों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रभावी कानूनी कार्रवाई और पीड़ितों को न्याय उपलब्ध कराना वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए आवश्यक है। साथ ही संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं, बच्चों और अन्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि मानव गरिमा, अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और वैश्विक शांति से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाने, दोषियों को सजा दिलाने और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए सभी देशों को मिलकर समन्वित प्रयास करने होंगे, तभी संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति और न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा।

  • CBSE का बड़ा कदम, कक्षा 8 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए AI, Python और Cyber Security समेत 19 मुफ्त ऑनलाइन कोर्स शुरू

    CBSE का बड़ा कदम, कक्षा 8 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए AI, Python और Cyber Security समेत 19 मुफ्त ऑनलाइन कोर्स शुरू

    नई दिल्ली । केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों के लिए 19 निःशुल्क ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इन पाठ्यक्रमों का उद्देश्य स्कूली स्तर पर ही विद्यार्थियों को डिजिटल तकनीकों, प्रोग्रामिंग और उभरते तकनीकी क्षेत्रों की शुरुआती जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि वे भविष्य की शिक्षा और रोजगार की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को बेहतर ढंग से तैयार कर सकें।

    इन सभी ऑनलाइन पाठ्यक्रमों को एनआईईएलआईटी डिजिटल यूनिवर्सिटी (NDU) के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया है। छात्र अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार इनमें पंजीकरण कर सकते हैं तथा अपनी गति से पढ़ाई पूरी कर सकते हैं। बोर्ड का मानना है कि डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने वाली यह पहल विद्यार्थियों में तकनीकी समझ, नवाचार की सोच और व्यावहारिक कौशल विकसित करने में मदद करेगी।

    इन पाठ्यक्रमों की अवधि विषय के अनुसार अलग-अलग निर्धारित की गई है। कुछ कोर्स लगभग डेढ़ घंटे में पूरे किए जा सकते हैं, जबकि कई पाठ्यक्रमों की अवधि 20 घंटे या उससे अधिक है। इस लचीली व्यवस्था के कारण विद्यार्थी अपनी नियमित स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ अतिरिक्त तकनीकी ज्ञान भी आसानी से प्राप्त कर सकेंगे।

    पाठ्यक्रमों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जेनरेटिव एआई, पाइथन प्रोग्रामिंग, डेटा साइंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सिक्योरिटी, वेब डिजाइनिंग एवं पब्लिशिंग, कंप्यूटर कॉन्सेप्ट्स, सेमीकंडक्टर डिजाइन, वीएलएसआई डिजाइन फ्लो, चिप डिजाइन, थ्री-डी प्रिंटिंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग तथा AWS DevSecOps जैसे आधुनिक और रोजगारोन्मुख विषय शामिल किए गए हैं। इन विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को नई तकनीकों की बुनियादी समझ विकसित करने का अवसर मिलेगा।

    सीबीएसई का मानना है कि आने वाले वर्षों में डिजिटल और तकनीकी कौशल का महत्व लगातार बढ़ेगा। इसी उद्देश्य से विद्यार्थियों को प्रारंभिक स्तर पर ही नई तकनीकों से परिचित कराया जा रहा है। इससे उनमें प्रोग्रामिंग क्षमता, तार्किक सोच, समस्या समाधान की योग्यता और तकनीकी नवाचार के प्रति रुचि विकसित होगी। यह पहल केवल परीक्षा आधारित शिक्षा तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान भी प्रदान करेगी।

    इन पाठ्यक्रमों का लाभ उठाने के इच्छुक विद्यार्थी एनआईईएलआईटी डिजिटल यूनिवर्सिटी के ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर पंजीकरण कर सकते हैं। पंजीकरण के बाद वे अपनी पसंद का कोर्स चुनकर तुरंत ऑनलाइन अध्ययन शुरू कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को सरल और सुविधाजनक बनाया गया है ताकि अधिक से अधिक विद्यार्थी इसका लाभ उठा सकें।

    शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल स्तर पर तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने से विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे भविष्य की प्रतिस्पर्धी दुनिया के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकेंगे। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के दौर में ऐसी पहलें विद्यार्थियों को नई संभावनाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आधुनिक तकनीकों की प्रारंभिक समझ उन्हें उच्च शिक्षा, नवाचार और करियर के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए मजबूत आधार प्रदान करेगी।

  • फिरोजाबाद में मासूम को पटककर मारने वाले हत्यारे को कोर्ट ने सुनाई फांसी की सजा

    फिरोजाबाद में मासूम को पटककर मारने वाले हत्यारे को कोर्ट ने सुनाई फांसी की सजा


    फिरोजाबाद । फिरोजाबाद में डेढ़ साल के बच्चे के हत्यारे को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। युवक ने बच्चे को जमीन पर 8 बार पटक-पटक कर मार डाला था। वह एकतरफा प्यार में बच्चे की मां से शादी की जिद कर रहा था। बच्चे की मां के मना करने के बाद से युवक गुस्से में था।

    कोर्ट ने शुक्रवार को 2.45 बजे अपना फैसला सुनाया। बच्चे की हत्या का सीसीटीवी भी सामने आया था। इसमें युवक बच्चे की हत्या करते हुए देखा गया था। पुलिस ने आरोपी के दोनों पैर में गोली मारकर उसे गिरफ्तार किया था। घटना 30 मई की शिकोहाबाद क्षेत्र की है।

    एक महीने 10 दिन में कोर्ट ने फैसला सुनाया
    सरकारी वकील राजीव प्रियदर्शी ने बताया कि कोर्ट ने 1 महीने 10 दिन में फैसला दिया है। पुलिस ने 6 दिन में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। बचाव की पक्ष की तरफ से दलील दी गई थी कि घटना के वक्त आरोपी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। लेकिन, कोर्ट ने विराज को आरोपी माना है।

    हत्यारे को फांसी की सजा सुनाने में सबसे अहम भूमिका सीसीटीवी फुटेज की रही। कोर्ट में जब फुटेज दिखाया गया तो आरोपी खुद अपने आप को थप्पड़ मारने लगा था। वह घटना से काफी दुखी प्रतीत हो रहा था। वकील ने कहा कि देश स्तर पर फैसले का संदेश जाएगा। साथ ही लोगों में भी विश्वास पैदा होगा।

    यह है मामला
    अरांव इलाके के बामई गांव की रहने वाली पिंकी बेटी रति और डेढ़ साल के नाती आरव के साथ यादव कॉलोनी में सहेली पुष्पलता पाठक से मिलने आई थीं। पुष्पलता हाल ही में एक सड़क हादसे में घायल हुई थीं। रति की शादी करीब 3 साल पहले बदायूं के सियारण नगर निवासी सुनीत से हुई थी, लेकिन पति-पत्नी के बीच पारिवारिक विवाद चल रहा।

    आरोप है कि सुनीत की बुआ का बेटा बदायूं के शेखूपुर निवासी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक लंबे समय से रति पर शादी का दबाव बना रहा था। परिवार वालों के मुताबिक, रति ने उसका प्रपोजल ठुकरा दिया था। इसके बाद से विराज नाराज था। 30 मई की दोपहर तीन बजे विराज भी पुष्पलता के घर पहुंच गया।

    टॉफी दिलाने के बहाने बच्चे को साथ ले गया
    विराज आरव को टॉफी दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया। कुछ दूर जाकर गली में उसने सन्नाटा देखकर बच्चे को 8 बार जमीन पर पटका। इससे आरव के सिर में गंभीर चोटें आईं। उसकी मौत हो गई। इसके बाद विराज आरव को गोद में लेकर आया। उसे घर के बाहर छोड़कर फरार हो गया।

    परिजनों की नजर पड़ी तो वह आरव को अस्पताल लेकर गए। यहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने घटनास्थल के पास लगे सीसीटीवी चेक किए तो उसमें विराज बच्चे को पटकता हुआ दिखाई दिया।