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  • TCS धर्मांतरण केस: फरार निदा खान को पकड़ने के लिए पुलिस का सीक्रेट ऑपरेशन, फिल्मी अंदाज में हुई गिरफ्तारी

    TCS धर्मांतरण केस: फरार निदा खान को पकड़ने के लिए पुलिस का सीक्रेट ऑपरेशन, फिल्मी अंदाज में हुई गिरफ्तारी



    नई दिल्ली। चर्चित TCS कथित धर्मांतरण मामले में फरार चल रही मुख्य आरोपी निदा खान को आखिरकार पुलिस ने एक बेहद गोपनीय और फिल्मी स्टाइल ऑपरेशन के जरिए गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार ठिकाने बदल रही निदा खान को छत्रपति संभाजीनगर के नरेगांव इलाके से पकड़ा गया।

    कई दिनों तक सादे कपड़ों में निगरानी
    पुलिस को सूचना मिली थी कि निदा खान नरेगांव की कैसर कॉलोनी में किराए के फ्लैट में छिपी हुई है। इसके बाद पुलिस ने बिना किसी हलचल के इलाके में निगरानी शुरू की।

    करीब 20 से ज्यादा पुलिसकर्मी कई दिनों तक सादे कपड़ों में आम लोगों की तरह इलाके में घूमते रहे। पुलिस ने सरकारी वाहन या वर्दी का इस्तेमाल भी नहीं किया ताकि किसी को शक न हो।

    मोबाइल लोकेशन और टेक्निकल सर्विलांस से मिला सुराग
    पुलिस ने तकनीकी निगरानी, मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिए निदा की मौजूदगी की पुष्टि की। जानकारी के मुताबिक, वह अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ फ्लैट में रह रही थी। सूत्रों के अनुसार, निदा खान हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की तैयारी कर रही थी और कुछ वकीलों से कानूनी सलाह भी ले रही थी। पुलिस को डर था कि अगर उसे कानूनी राहत मिल गई तो गिरफ्तारी मुश्किल हो सकती है।

    अचानक रेड कर पुलिस ने दबोचा
    करीब तीन-चार दिन तक लगातार निगरानी के बाद पुलिस ने सही समय देखकर अचानक छापा मारा और निदा खान को हिरासत में ले लिया। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक अधिकारी के आवास पर पेश किया गया, जहां से नासिक पुलिस ने ट्रांजिट रिमांड हासिल किया।

    क्या है पूरा मामला?
    जांच एजेंसियों के अनुसार, निदा खान 2021 से TCS में प्रोसेस एसोसिएट के तौर पर काम कर रही थी। उस पर आरोप है कि वह कर्मचारियों को धार्मिक रूपांतरण के लिए प्रभावित कर रही थी और इस्लामिक साहित्य, वीडियो व अन्य सामग्री भेजती थी। पुलिस को शक है कि यह मामला किसी बड़े संगठित नेटवर्क से जुड़ा हो सकता है। मामले में अब तक कुल आठ आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

  • विजय की पार्टी का बड़ा दांव,108 विधायकों के इस्तीफे से बदल सकता है तमिलनाडु का राजनीतिक भविष्य

    विजय की पार्टी का बड़ा दांव,108 विधायकों के इस्तीफे से बदल सकता है तमिलनाडु का राजनीतिक भविष्य

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां हालात सामान्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर संवैधानिक बहस का विषय बन गए हैं। राज्य में 108 विधायकों के संभावित सामूहिक इस्तीफे की चर्चा ने पूरे राजनीतिक माहौल को अस्थिर कर दिया है। यह स्थिति केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और शासन प्रणाली की परीक्षा के रूप में देखी जा रही है।

    राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार, सुपरस्टार विजय के नेतृत्व वाली पार्टी ने हाल ही में विधानसभा में 108 सीटों पर जीत दर्ज कर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। हालांकि, पूर्ण बहुमत के लिए आवश्यक संख्या हासिल नहीं होने के कारण सरकार गठन की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। इसी बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि सभी 108 विधायक एक साथ इस्तीफा देते हैं, तो यह राज्य की राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदल सकता है।

    इस संभावित कदम को लेकर दो अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि यह एक रणनीतिक दबाव की राजनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता पक्ष और अन्य दलों पर नैतिक और प्रशासनिक दबाव बनाना है। वहीं दूसरा पक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने वाला कदम बता रहा है, जिससे राज्य में अनिश्चितता का माहौल बन सकता है।

    संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो सामूहिक इस्तीफे की स्थिति बेहद जटिल होती है। विधानसभा के नियमों के अनुसार प्रत्येक विधायक का इस्तीफा व्यक्तिगत रूप से स्वीकार किया जाता है और इसकी पुष्टि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है। अध्यक्ष को यह सुनिश्चित करना होता है कि इस्तीफा स्वेच्छा से दिया गया है और इसके पीछे किसी प्रकार का दबाव या रणनीतिक बाध्यता नहीं है। ऐसे में एक साथ बड़ी संख्या में इस्तीफे स्वीकार करना प्रशासनिक और कानूनी दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    यदि यह इस्तीफे स्वीकार कर लिए जाते हैं, तो विधानसभा में भारी संख्या में सीटें खाली हो जाएंगी। इससे न केवल सरकार का गठन प्रभावित होगा, बल्कि कई प्रशासनिक कार्य भी रुक सकते हैं। बजट पारित करने से लेकर नीतिगत निर्णयों तक, राज्य का पूरा शासन तंत्र प्रभावित हो सकता है।

    इस स्थिति में राज्यपाल की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि उन्हें लगता है कि राज्य में स्थिर सरकार बनाना संभव नहीं है, तो वे केंद्र सरकार को संवैधानिक प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकते हैं। यह कदम तभी उठाया जाता है जब राज्य में शासन व्यवस्था पूरी तरह अस्थिर हो जाए।

    वहीं, दूसरी ओर उपचुनाव की संभावना भी सामने आती है। यदि सीटें रिक्त घोषित होती हैं, तो निर्धारित समय के भीतर उन पर चुनाव कराए जाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह स्थिति राज्य को एक अनिश्चित राजनीतिक दौर में ले जा सकती है, जहां बार-बार चुनाव और सत्ता परिवर्तन का माहौल बन सकता है।

    फिलहाल राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और सभी दल अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। सड़क से लेकर विधानसभा तक तनावपूर्ण माहौल देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक राजनीतिक निर्णयों और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

  • मुख्यमंत्री पद पर शुभेंदु अधिकारी का नाम आगे, महिला डिप्टी सीएम के तौर पर रूपा गांगुली की संभावना

    मुख्यमंत्री पद पर शुभेंदु अधिकारी का नाम आगे, महिला डिप्टी सीएम के तौर पर रूपा गांगुली की संभावना

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव और संभावित सत्ता समीकरणों को लेकर सुर्खियों में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं और सूत्रों के अनुसार राज्य में नई सरकार के गठन को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण मंथन जारी है। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी का नाम सबसे आगे चल रहा है, जबकि उपमुख्यमंत्री पद के लिए दो डिप्टी सीएम का फार्मूला अपनाया जा सकता है, जिसमें एक महिला और एक पुरुष उपमुख्यमंत्री शामिल होंगे। महिला डिप्टी सीएम के रूप में अभिनेत्री से नेता बनीं रूपा गांगुली का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यह पूरा निर्णय संगठनात्मक संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए लिया जा रहा है। उत्तर बंगाल और अन्य क्षेत्रों को भी सत्ता ढांचे में प्रतिनिधित्व देने की रणनीति पर काम किया जा रहा है, ताकि राज्य के विभिन्न हिस्सों को राजनीतिक संतुलन में शामिल किया जा सके। सूत्रों के मुताबिक, संभावित मुख्यमंत्री अपने पास गृह विभाग जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय भी रख सकते हैं, जिससे प्रशासनिक नियंत्रण और मजबूत किया जा सके।

    इसी बीच केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भूमिका भी देखने को मिल रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा विधायक दल की बैठक में नए नेता के चयन की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। यह बैठक राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसी में राज्य के नए नेतृत्व की औपचारिक घोषणा होने की उम्मीद है। इसके बाद नई सरकार के शपथ ग्रहण की तैयारी भी तेज कर दी गई है, जो बेहद भव्य तरीके से आयोजित किए जाने की योजना में बताया जा रहा है।

    शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं की उपस्थिति की संभावना भी राजनीतिक महत्व को और बढ़ा रही है। यह कार्यक्रम केवल एक औपचारिक सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राज्य की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक किसी भी नाम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में शुभेंदु अधिकारी और रूपा गांगुली के नामों की चर्चा लगातार तेज बनी हुई है।

    कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है, जहां आने वाले कुछ घंटों में बड़े राजनीतिक फैसले राज्य की दिशा और दशा तय कर सकते हैं। सभी की निगाहें अब आधिकारिक घोषणा और उसके बाद बनने वाली नई सरकार की संरचना पर टिकी हुई हैं।

  • मणिपुर: सुरक्षा स्थिति पर सेना की पैनी नजर, सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में तैयारियों की विस्तृत समीक्षा

    मणिपुर: सुरक्षा स्थिति पर सेना की पैनी नजर, सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में तैयारियों की विस्तृत समीक्षा

    नई दिल्ली ।मणिपुर में लगातार बनी हुई संवेदनशील सुरक्षा स्थिति के बीच भारतीय सेना ने राज्य में अपनी तैयारियों और तैनाती की व्यापक समीक्षा की है। हाल के दिनों में सामने आई हिंसक घटनाओं और सीमावर्ती क्षेत्रों में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए सेना ने अग्रिम इलाकों का दौरा कर जमीनी हालात का गहराई से आकलन किया। इस पूरी कवायद का उद्देश्य क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ सुरक्षा तंत्र को और अधिक मजबूत बनाना बताया जा रहा है।

    सेना के स्पीयर कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया ने राज्य के कई संवेदनशील और अग्रिम क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने न केवल तैनात जवानों से सीधे बातचीत की बल्कि स्थानीय परिस्थितियों और मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों की विस्तृत जानकारी भी ली। उनके दौरे के दौरान रेड शील्ड डिवीजन के अंतर्गत आने वाले विभिन्न रणनीतिक क्षेत्रों की स्थिति का भी आकलन किया गया, जहां हाल के समय में तनाव की घटनाएं सामने आई थीं।

    लेफ्टिनेंट जनरल कालिया ने प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण भी किया, जिससे उन्हें जमीन पर मौजूद हालात का व्यापक और वास्तविक चित्र देखने को मिला। विशेष रूप से हाल में हुई स्थानीय संघर्ष जैसी घटनाओं से प्रभावित इलाकों पर ध्यान केंद्रित किया गया, ताकि सुरक्षा रणनीति को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके। उन्होंने जवानों की सतर्कता, उनके पेशेवर रवैये और कठिन परिस्थितियों में भी शांति बनाए रखने के प्रयासों की सराहना की।

    दौरे के दौरान सेना के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में शांति बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसके लिए सभी स्तरों पर सतर्कता आवश्यक है। कोर कमांडर ने जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी भी प्रकार की लापरवाही की गुंजाइश नहीं है और हर स्थिति पर लगातार नजर रखना बेहद जरूरी है।

    इसके साथ ही लेफ्टिनेंट जनरल कालिया ने लेइमाखोंग स्थित सैन्य स्टेशन में रेड शील्ड ड्रोन लैब का भी निरीक्षण किया। इस निरीक्षण के दौरान उन्हें सेना द्वारा विकसित की जा रही स्वदेशी ड्रोन तकनीक, उसकी मरम्मत, असेंबली और प्रशिक्षण प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि आधुनिक निगरानी और मिशन आधारित ड्रोन तकनीक सुरक्षा अभियानों में तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    सेना प्रमुख ने तकनीकी नवाचारों की सराहना करते हुए कहा कि भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक और उन्नत निगरानी प्रणालियां बेहद आवश्यक हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बदलते सुरक्षा परिदृश्य में तकनीकी क्षमता को लगातार विकसित करना समय की मांग है।

    सेना की ओर से जारी बयान में कहा गया कि यह पूरा दौरा न केवल परिचालन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारतीय सेना मणिपुर में शांति, स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। राज्य में हालात को सामान्य करने और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती और तैयारियों को और अधिक मजबूत किया जा रहा है।

  • असम-बंगाल चुनाव परिणाम पर कांग्रेस असमंजस में, शर्मनाक हार के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल

    असम-बंगाल चुनाव परिणाम पर कांग्रेस असमंजस में, शर्मनाक हार के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।  हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। केरल को छोड़कर असम और पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा, जिसके बाद अब संगठन के भीतर गंभीर मंथन शुरू हो गया है।
    असम और पश्चिम बंगाल में मिली हार के बाद पार्टी ने समीक्षा बैठक बुलाने का निर्णय लिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन हारों की जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी। संगठन के भीतर अभी तक किसी भी स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं हो पाई है, जिससे असंतोष और बढ़ता जा रहा है।
    असम में हार के बाद प्रदेश प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन पार्टी हाईकमान ने अभी तक उस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि हार की विस्तृत समीक्षा के बाद ही आगे कोई कदम उठाया जाएगा।
    पिछले कुछ वर्षों में लगातार चुनावी असफलताओं के बावजूद संगठनात्मक स्तर पर जिम्मेदारी तय न किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जमीनी स्तर पर सुधार मुश्किल होगा।
    इसी संदर्भ में पार्टी के अंदर चल रहे संगठन सृजन कार्यक्रम पर भी चर्चा हो रही है, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2025 में अहमदाबाद अधिवेशन के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य जिला स्तर पर नेतृत्व को मजबूत करना और जवाबदेही तय करना था, लेकिन अब तक इसका प्रभाव सीमित ही दिखाई दिया है।
    कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पहले भी कहा था कि जिला अध्यक्षों और स्थानीय नेतृत्व को स्थायी पद नहीं माना जाएगा और प्रदर्शन के आधार पर ही उनकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। हालांकि जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था का प्रभाव अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो सका है।
    इसी बीच, आगामी 2027 के चुनावों को देखते हुए पार्टी पर प्रदर्शन सुधारने का दबाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि संगठन को पुनर्गठित किए बिना चुनावी स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
    वहीं दूसरी ओर, केरल में पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिली सफलता के बाद वहां सरकार गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है। मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी के भीतर कई नामों पर चर्चा चल रही है, जिनमें वीडी सतीशन, रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल प्रमुख बताए जा रहे हैं।
    हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अभी अंतिम फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया है, जिससे यह स्पष्ट है कि संगठन में निर्णय प्रक्रिया अब भी केंद्रीकृत बनी हुई है।
    कुल मिलाकर, असम और बंगाल में हार के बाद कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां समीक्षा तो शुरू हो चुकी है, लेकिन जवाबदेही तय करने और संगठन में वास्तविक सुधार की दिशा अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाई है।
  • बंगाल का नया CM कौन…. आज MLAs संग अमित शाह की बैठक पर सभी की नजरें

    बंगाल का नया CM कौन…. आज MLAs संग अमित शाह की बैठक पर सभी की नजरें


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) के नतीजों के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य की कमान किसके हाथों में होगी। भारतीय जनता पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर सस्पेंस बरकरार है। इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज कोलकाता में नवनिर्वाचित विधायकों के साथ एक हाई-प्रोफाइल बैठक करने वाले हैं। बैठक के बाद जल्द ही राज्य के अगले सीएम के नाम का आधिकारिक ऐलान कर दिया जाएगा।


    अमित शाह और मोहन चरण माझी को अहम जिम्मेदारी

    पार्टी आलाकमान ने विधायक दल के नेता के चुनाव की प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए वरिष्ठ केंद्रीय नेताओं को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है। पश्चिम बंगाल के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को मुख्य पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) की जिम्मेदारी दी गई है। उनके साथ ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी सह-पर्यवेक्षक की भूमिका निभाएंगे।


    बैठक में कैसे तय होगा विधायक दल का नेता?

    आज होने वाली इस बैठक में दोनों पर्यवेक्षक सभी नवनिर्वाचित विधायकों के साथ विस्तार से चर्चा करेंगे। सूत्रों के अनुसार, शाह व्यक्तिगत स्तर पर और सामूहिक रूप से विधायकों से बात करेंगे ताकि मुख्यमंत्री के नाम पर आम सहमति बनाई जा सके। विधायकों की राय जानने के बाद विधायक दल के नेता और अगले मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर लगाई जाएगी। माना जा रहा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता शमिक भट्टाचार्य बैठक में नए मुख्यमंत्री के नाम का प्रस्ताव रख सकते हैं, जिसके बाद इस फैसले को आधिकारिक रूप दिया जाएगा।


    9 मई को होगा भव्य शपथ ग्रहण समारोह

    नए मुख्यमंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया तुरंत शुरू कर दी जाएगी। इस बीच राजनीतिक हलचलें तेज हो गई हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 9 मई को नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए कोलकाता पहुंच रहे हैं। पीएम मोदी की मौजूदगी पश्चिम बंगाल की राजनीति में होने जा रहे इस बड़े बदलाव को और भी खास बनाएगी।


    रेस में और कौन?

    नंदीग्राम के बाद भवानीपुर में भी जीत का परचम लहराने वाले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे शुभेंदु अधिकारी का नाम इस रेस में सबसे आगे चल रहा है। हालांकि बीजेपी अक्सर अपने फैसलों से चौंकाती रही है। शुभेंदु के अलावा कुछ अन्य नामों पर भी चर्चा गर्म है।

    सुकांत मजूमदार: प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके शांत स्वभाव और आरएसएस (RSS) के साथ उनके गहरे जुड़ाव को देखते हुए उन्हें एक ‘डार्क हॉर्स’ माना जा रहा है।

    दिलीप घोष: पार्टी को जमीनी स्तर पर खड़ा करने वाले दिलीप घोष का नाम भी चर्चा से बाहर नहीं है। उनका आक्रामक अंदाज कार्यकर्ताओं में जोश भरता है।

    महिला कार्ड या नया चेहरा: महिला वोटरों को साधने के लिए बीजेपी किसी महिला विधायक या फिर केंद्र से किसी अनुभवी चेहरे को भी बंगाल की कमान सौंप सकती है।

    पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर लिया, जिससे राज्य में टीएमसी के लगातार 15 वर्षों के शासन का अंत हो गया। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने 80 सीटों पर जीत दर्ज की।

  • जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर छह ब्लैक स्पॉट…. हल्की बारिश में भूस्खलन, अमरनाथ यात्रा को लेकर बढ़ी चिंता

    जम्मू-श्रीनगर हाइवे पर छह ब्लैक स्पॉट…. हल्की बारिश में भूस्खलन, अमरनाथ यात्रा को लेकर बढ़ी चिंता


    जम्मू।
    जम्मू-कश्मीर हाईवे (Jammu Kashmir Highway) पर लगातार भूस्खलन (Frequent Landslides) ने अमरनाथ यात्रा (Amarnath Yatra) से पहले चिंता बढ़ा दी है। जम्मू से श्रीनगर के बीच करीब छह जगह ब्लैक स्पॉट (Black spot) चिह्नित किए गए हैं। हल्की बारिश के बाद यहां भारी भूस्खलन हो रहा है, जिससे हाल ही में कई बार हाईवे बाधित हो चुका है।

    अप्रैल में हुई बारिश के बाद रामबन-बनिहाल सेक्शन में बन रही लगभग तीन किलोमीटर लंबी सुरंग का काम भी फंस गया है। पहले मई में काम पूरा होने की संभावना थी, लेकिन अब कार्य आगे बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इससे यात्रा के दौरान जाम से मुक्ति मिलने की संभावना प्रभावित हो सकती है।

    जम्मू से श्रीनगर के बीच यात्रा के दौरान सबसे संवेदनशील हिस्सा उधमपुर से बनिहाल तक है। पिछले साल अप्रैल में रामबन में बादल फटने के बाद आई बाढ़ ने हाईवे का बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त कर दिया था। सितंबर में उधमपुर-रामबन के बीच करीब 200 मीटर हिस्सा दलदल में बदल गया, जिससे कश्मीर की सप्लाई चेन बाधित हुई।

    इस साल अप्रैल में हल्की बारिश के बाद सात अप्रैल को डिगडोल और खूनी नाला के बीच भारी भूस्खलन से तीन दिन तक यातायात बाधित रहा। अमरनाथ यात्रा तीन जुलाई से शुरू होगी और बारिश होने पर भूस्खलन की संभावना बनी रहेगी। हालांकि एनएचएआई ने संभावित जगहों पर विशेषज्ञों की मदद से सुरक्षा इंतजाम किए हैं और हाईवे की समीक्षा पूरी की है।


    हाईवे पर खतरे के ब्लैक स्पॉट

    रामबन, बनिहाल, नाशरी–चिनैनी, पंथियाल मेहर-कैफेटेरिया मोड़ और खूनी नाला शामिल हैं। अमरनाथ यात्रा के दौरान 2023 में रामबन के पास हाईवे पर भूस्खलन हुआ था। इससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा था।


    विशेषज्ञों की मदद से पूरे हो रहे सुधार कार्य

    हाईवे पर अमरनाथ यात्रा से पहले सुरक्षा इंतजाम किए जा रहे हैं। संभावित क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मदद से सुधार कार्य पूरे किए जा रहे हैं। टनल निर्माण का कार्य जारी है। यात्रा प्रभावित न हो इसके लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं।
    -आरएस यादव, क्षेत्रीय अधिकारी, एनएचएआई


    जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर कब-कब भूस्खलन

    – रामबन में 6 अप्रैल, 2026 को जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर भूस्खलन से आवाजाही प्रभावित हुई।
    – रामबन में 20 अप्रैल 2025 को बादल फटा। जम्मू-श्रीनगर हाईवे बंद होने से सैकड़ों वाहन फंस गए। कश्मीर की सप्लाई चेन टूट गई।
    – 30 अगस्त 2025 को रामबन में फिर बादल फटसे भारी भूस्खलन हुआ। हाईवे बाधित होने से कश्मीर जा रहे सैकड़ों ट्रक हाईवे पर फंस गए।
    – सितंबर 2025 में उधमपुर-रामबन के बीच हाईवे का करीब 200 मीटर हिस्सा दलदल में बदल गया। यह हादसा सेब सीजन के दौरान हुआ और इससे कश्मीर की आर्थिकी पर असर पड़ा।
    – चिनैनी-नाशनी टनल के बाहर और उधमपुर क्षेत्र में अगस्त-सितंबर में भूस्खलन की छोटी-बड़ी कई घटनाएं हुईं। इससे आवाजाही प्रभावित हुई।

  • डीके शिवकुमार ने राज्यपाल के फैसले पर जताई आपत्ति, बोले- ‘TVK को बहुमत साबित करने का मौका न मिलना गलत’

    डीके शिवकुमार ने राज्यपाल के फैसले पर जताई आपत्ति, बोले- ‘TVK को बहुमत साबित करने का मौका न मिलना गलत’

    बंगलूरू। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के उस कथित फैसले की आलोचना की है, जिसमें अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) को सरकार बनाने और विधानसभा में बहुमत साबित करने का अवसर नहीं दिए जाने की बात कही गई है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया।

    विधान सौधा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान डीके शिवकुमार ने कहा कि यदि किसी दल के पास बहुमत का दावा है तो राज्यपाल उसे सरकार गठन से नहीं रोक सकते। उनके अनुसार, राज्यपाल को विजय के नेतृत्व वाली पार्टी को सदन में बहुमत साबित करने का अवसर देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का यह रवैया उचित नहीं माना जा सकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी संख्या साबित करने का मौका मिलना चाहिए।

    शिवकुमार ने अपने तर्क के समर्थन में कर्नाटक और राष्ट्रीय राजनीति के कई पुराने उदाहरण भी गिनाए। उन्होंने कहा कि पहले भी राज्यपालों और राष्ट्रपतियों ने सबसे बड़े दलों या गठबंधनों को सरकार बनाने का अवसर दिया है, ताकि वे सदन में विश्वास मत हासिल कर सकें।

    उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का उदाहरण देते हुए कहा कि कर्नाटक में भी उन्हें सरकार बनाने का मौका दिया गया था। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन और एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यकाल का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय भी संवैधानिक परंपराओं का पालन करते हुए बहुमत परीक्षण को प्राथमिकता दी गई थी। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण भी दिया, जिन्हें सदन में बहुमत साबित करने का अवसर मिला था।

    डीके शिवकुमार ने कहा कि TVK को भी इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपना बहुमत साबित करने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में एक वोट भी बहुमत और अल्पमत तय कर सकता है। यदि कोई दल बहुमत साबित नहीं कर पाता, तब अगला संवैधानिक विकल्प अपनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की जनता के जनादेश और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र जनता की इच्छा से ही चलता है।

  • पंजाब में धमाकों से बढ़ी चिंता: सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती, सीमापार साजिश और आतंकी नेटवर्क की आशंका

    पंजाब में धमाकों से बढ़ी चिंता: सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती, सीमापार साजिश और आतंकी नेटवर्क की आशंका


    नई दिल्ली। पंजाब में मंगलवार रात सैन्य परिसरों के बाहर हुए दो धमाकों ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ घंटों के अंतराल में दो अलग-अलग शहरों में हुई इन घटनाओं ने न केवल प्रशासन की चिंता बढ़ाई है, बल्कि सीमावर्ती राज्य में पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी नेटवर्क की सक्रियता की आशंकाओं को भी मजबूत किया है।

    हालांकि इन धमाकों में किसी तरह के जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं है और जांच एजेंसियां मामले की पड़ताल में जुटी हैं, लेकिन घटनाओं ने सुरक्षा तंत्र की सतर्कता पर सवाल जरूर खड़े किए हैं। ऑपरेशन सिंदूर की बरसी की पूर्व संध्या पर सैन्य ठिकानों के आसपास हुए विस्फोट राज्य पुलिस की खुफिया व्यवस्था की कमजोरी की ओर इशारा करते हैं।

    पंजाब पुलिस के महानिदेशक ने इन घटनाओं के पीछे आईएसआई समर्थित साजिश की आशंका जताई है। इस दावे को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जालंधर धमाके की जिम्मेदारी खालिस्तान लिबरेशन आर्मी ने ली है। यह संगठन पहले भी आईएसआई और कनाडा से समर्थन मिलने के आरोपों में चर्चा में रहा है तथा केंद्रीय गृह मंत्रालय इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर चुका है।

    बीते कुछ महीनों में पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने वाली कई घटनाएं सामने आई हैं। अप्रैल में पटियाला-राजपुरा रेलवे ट्रैक पर आईईडी विस्फोट हुआ था। इससे पहले चंडीगढ़ के सेक्टर-37 स्थित भाजपा कार्यालय के बाहर ग्रेनेड हमला किया गया। जनवरी 2026 में गणतंत्र दिवस से पहले सरहिंद रेलवे ट्रैक पर धमाका हुआ, जबकि नवंबर 2025 में मोगा के सीआईए कार्यालय पर ग्रेनेड फेंका गया था। मार्च 2025 में अमृतसर के खंदवाला इलाके में धार्मिक स्थल के बाहर भी विस्फोट की घटना सामने आई थी।

    लगातार हो रही इन घटनाओं से संकेत मिलते हैं कि सीमापार बैठे तत्व पंजाब में अस्थिरता फैलाने की कोशिशों में जुटे हैं। यदि समय रहते इन गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आम लोगों के बीच भय का माहौल गहरा सकता है और राज्य एक बार फिर पुराने दौर की दर्दनाक यादों की ओर बढ़ सकता है।

    ऐसे संवेदनशील समय में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। साथ ही राजनीतिक दलों और नेताओं को भी इस तरह के मामलों में बयानबाजी से बचते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। मौजूदा हालात पंजाब में कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं, जिससे निपटने के लिए सीमाओं के साथ-साथ राज्य के भीतर भी चौकसी बढ़ाना बेहद जरूरी हो गया है।

  • ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वर्षगांठ पर देशभक्ति का संगम, इंदिरा गांधी कला केंद्र में काव्य-संग्रह का भव्य लोकार्पण

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वर्षगांठ पर देशभक्ति का संगम, इंदिरा गांधी कला केंद्र में काव्य-संग्रह का भव्य लोकार्पण


    नई दिल्ली।नई दिल्ली में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पहली वर्षगांठ के अवसर पर एक भव्य साहित्यिक आयोजन का आयोजन किया गया, जिसने साहित्य और देशभक्ति के संगम को एक नई ऊंचाई दी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के समवेत हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रसिद्ध लेखक डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल द्वारा संपादित और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ऑपरेशन सिंदूर: 100 सर्वश्रेष्ठ कविताएं’ का औपचारिक लोकार्पण किया गया।
    इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने पुस्तक का विमोचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की। अपने संबोधन में उन्होंने डॉ. बर्णवाल के रचनात्मक योगदान की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास साहित्य को नई दिशा देते हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अंतरराष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी समाप्त नहीं हुआ है और भविष्य में इसकी प्रासंगिकता बनी रह सकती है।
    कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पूर्व सेना अधिकारी कर्नल प्रदीप खरे, वरिष्ठ पत्रकार एवं एंकर सईद अंसारी, हास्य-व्यंग्य कवि सुदीप भोला तथा उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त वीरेंद्र वत्स उपस्थित रहे। सभी अतिथियों ने इस काव्य-संग्रह को देशभक्ति और सैन्य शौर्य का सशक्त साहित्यिक दस्तावेज बताया।
    कर्नल प्रदीप खरे ने भारतीय सेना के पराक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि सेना ने बेहद कम समय में दुश्मन के कई ठिकानों को ध्वस्त कर अपनी रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने इस पुस्तक को उस शौर्य गाथा का काव्यात्मक दस्तावेज बताया, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी पढ़ेंगी।
    सईद अंसारी ने प्रभात प्रकाशन की राष्ट्रभावना से जुड़ी प्रकाशन परंपरा की सराहना की और कहा कि यह पुस्तक केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि देशभक्ति की भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. बर्णवाल ने कई प्रतिभाशाली कवियों को मंच देकर साहित्यिक न्याय का कार्य किया है।
    पुस्तक के संपादक डॉ. हरीश चंद्र बर्णवाल ने बताया कि ‘एच.बी. पोएट्री’ द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में देशभर के 361 कवियों ने भाग लिया था। इनमें से चयनित 100 कविताओं को इस संग्रह में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि इस प्रयास का उद्देश्य राष्ट्रभावना से जुड़ी रचनाओं को एक मंच देना और उन्हें व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना है।
    कार्यक्रम के दौरान अनेक कवियों ने अपनी ओजस्वी कविताओं का पाठ किया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति के भावों से गूंज उठा। आयोजन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि देशभर के 80 से अधिक कवियों को उनके योगदान के लिए प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
    इस साहित्यिक आयोजन ने न केवल कवियों को एक साझा मंच प्रदान किया, बल्कि देशभक्ति, साहित्य और कला के संगम को भी सशक्त रूप में प्रस्तुत किया। पूरा कार्यक्रम भावनात्मक, प्रेरणादायक और राष्ट्रभाव से परिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।