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  • बदरीनाथ मंदिर चढ़ावा विवाद पर तेज हुई जांच, कांग्रेस का सत्याग्रह ऐलान, CCTV फुटेज पर टिकी नजर

    बदरीनाथ मंदिर चढ़ावा विवाद पर तेज हुई जांच, कांग्रेस का सत्याग्रह ऐलान, CCTV फुटेज पर टिकी नजर


    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर के बाद अब उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में चढ़ावे की कथित हेराफेरी का मामला चर्चा का विषय बन गया है। मंदिर प्रशासन ने पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए जांच प्रक्रिया तेज कर दी है। बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने चार सदस्यीय जांच समिति गठित कर दी है जिसे एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। इस मामले में सबसे अहम पहलू यह सामने आया है कि मंदिर परिसर में एक जून से नए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे जबकि कथित घटना दो जुलाई की बताई जा रही है। ऐसे में जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि फुटेज से पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आ सकेगी।

    मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी सोहन सिंह रांगड़ ने बताया कि जांच समिति सभी साक्ष्यों वैज्ञानिक तथ्यों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही है। उन्होंने चढ़ावा गणना में लगे कर्मचारियों और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी तरह के दस्तावेज सीसीटीवी फुटेज या अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखे गए हैं ताकि जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके।

    मंदिर प्रशासन के अनुसार सीसीटीवी प्रणाली में लगभग 45 दिनों का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है। चूंकि नए कैमरे एक जून से सक्रिय हैं इसलिए दो जुलाई की कथित घटना से जुड़ा पूरा वीडियो रिकॉर्ड उपलब्ध होने की संभावना है। जांच टीम इन्हीं फुटेज और अन्य दस्तावेजों के आधार पर पूरे मामले की कड़ियां जोड़ रही है।

    मामले की जांच के लिए गठित समिति में वित्त नियंत्रक हेम कांडपाल विधि अधिकारी एसएस वर्त्वाल मुख्य प्रशासनिक अधिकारी राजन नैथानी और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डीएस भुजवाण को शामिल किया गया है। समिति सभी संबंधित कर्मचारियों से पूछताछ करने के साथ चढ़ावा गणना की पूरी प्रक्रिया की भी समीक्षा कर रही है।

    इस बीच मामला राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। उत्तराखंड कांग्रेस ने आठ जुलाई को पूरे प्रदेश में उपवास और सत्याग्रह करने की घोषणा की है। कांग्रेस का आरोप है कि मंदिरों से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। पार्टी ने यह भी मांग की है कि पूरे मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक स्तर पर कराई जाए ताकि किसी तरह का संदेह न रहे।

    उधर श्री बदरीश पंडा पंचायत ने भी मंदिर की गरिमा से जुड़े इस मामले पर चिंता जताई है। पंचायत का कहना है कि यदि किसी स्तर पर वित्तीय अनियमितता हुई है तो दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में किसी उच्च अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। तीर्थपुरोहितों और पुजारियों ने भी इस पूरे घटनाक्रम को धाम की प्रतिष्ठा से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।

    अब पूरे मामले में सभी की नजर जांच समिति की रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज पर टिकी हुई है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बड़ा संदेश देगा।

  • राम मंदिर दान विवाद पर उद्धव ठाकरे का हिंदुत्व दांव, 'राम रक्षा आंदोलन' से BJP पर साधा निशाना

    राम मंदिर दान विवाद पर उद्धव ठाकरे का हिंदुत्व दांव, 'राम रक्षा आंदोलन' से BJP पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस मुद्दे पर राम रक्षा आंदोलन की शुरुआत करते हुए भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुत्व के नाम पर सत्ता हासिल करने वालों ने अब मंदिरों और आस्था का भी राजनीतिक इस्तेमाल शुरू कर दिया है। साथ ही उन्होंने कहा कि हिंदुओं को जागरूक करने की जरूरत है क्योंकि उनका वशीकरण किया गया है।

    मुंबई के दादर स्थित हनुमान मंदिर में उद्धव ठाकरे ने हनुमान चालीसा हनुमान स्तोत्र और राम रक्षा स्तोत्र का पाठ किया। इसके बाद आयोजित सभा में उन्होंने राम मंदिर चढ़ावा मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि यदि किसी मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा धन सुरक्षित नहीं है तो इसकी जांच पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए। उनका कहना था कि जिस पर आरोप लगे हों उसी से जांच नहीं कराई जा सकती क्योंकि इससे निष्पक्ष परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती।

    उद्धव ठाकरे ने भाजपा पर हिंदुत्व के राजनीतिक उपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि भगवान राम किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे देश के हैं। उन्होंने कहा कि यदि हिंदुत्व के नाम पर मंदिरों और धार्मिक आस्था का दुरुपयोग किया जाएगा तो समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से राम रक्षा आंदोलन को गांव गांव तक ले जाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आस्था और जवाबदेही का विषय है।

    उधर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि आखिरकार उद्धव ठाकरे को भगवान राम की याद आ गई। उन्होंने कहा कि यदि वे भगवान राम के बताए मार्ग पर चलेंगे तो यह उनके लिए भी अच्छा होगा। फडणवीस ने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उद्धव केवल एक दिन नहीं बल्कि नियमित रूप से राम रक्षा का पाठ करेंगे।

    राम मंदिर चढ़ावा विवाद का मामला जून में सामने आया था। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की शुरुआती जांच के बाद एफआईआर दर्ज की गई और चढ़ावे की सुरक्षा तथा गिनती से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। मामले की जांच अभी जारी है और प्रशासन का कहना है कि सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जाएगी।

    उद्धव ठाकरे ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि मंदिरों से जुड़े अन्य मामलों में भी पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि यदि धार्मिक संस्थानों की गरिमा बनाए रखनी है तो किसी भी तरह की अनियमितता पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना ने हमेशा हिंदुत्व को सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है और आगे भी उसी विचार के साथ काम करती रहेगी।

    राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बीच शुरू हुआ राम रक्षा आंदोलन अब महाराष्ट्र की राजनीति में नया मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है जबकि जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर भी सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • केतन हत्याकांड ने ली एक और जान! पोते की मौत का सदमा नहीं सह सके दादा देवचंद अग्रवाल, कार्डियक अरेस्ट से निधन के बाद परिवार में शोक की लहर

    केतन हत्याकांड ने ली एक और जान! पोते की मौत का सदमा नहीं सह सके दादा देवचंद अग्रवाल, कार्डियक अरेस्ट से निधन के बाद परिवार में शोक की लहर

    पुणे । चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड में एक और भावुक कर देने वाला घटनाक्रम सामने आया है। केतन की हत्या के महज 16 दिन बाद उनके 71 वर्षीय दादा देवचंद अग्रवाल का कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। परिवार के लिए यह दूसरी बड़ी त्रासदी है, जिसने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। परिजनों का कहना है कि पोते की असामयिक मौत का गहरा मानसिक आघात उन्हें लगातार भीतर से तोड़ रहा था और इसी कारण उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई।

    देवचंद अग्रवाल पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में उपचाराधीन थे। चिकित्सकीय निगरानी के बावजूद उनकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका और अंततः कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया। परिवार के सदस्यों के अनुसार, केतन की मौत के बाद वह लगातार मानसिक तनाव में थे और न्याय की मांग को लेकर बेहद व्यथित रहते थे।

    केतन अग्रवाल की मौत 18 जून को लोहगढ़ किले के समीप हुई थी। शुरुआती स्तर पर इसे दुर्घटना माना गया था, लेकिन जांच आगे बढ़ने पर मामला हत्या की साजिश का निकला। इसके बाद पुलिस ने जांच के आधार पर केतन की मंगेतर सिया गोयल और उसके कथित करीबी चेतन चौधरी को गिरफ्तार किया। दोनों पर हत्या और आपराधिक साजिश सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

    जांच एजेंसियों का दावा है कि दोनों आरोपियों ने पहले से पूरी योजना बनाकर वारदात को अंजाम दिया। पुलिस के अनुसार, घटनास्थल की पहले रेकी की गई थी और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत तैयारी के बाद हत्या की साजिश को अमल में लाया गया। मामले की जांच के दौरान डिजिटल और तकनीकी साक्ष्यों को भी महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है।

    पुलिस को जांच के दौरान दोनों आरोपियों के बीच बड़ी संख्या में हुई फोन बातचीत का रिकॉर्ड मिला है। इसके अलावा मोबाइल फोन से हटाए गए डिजिटल डेटा और संदेशों को भी पुनः प्राप्त किया गया है। जांच टीम ने सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों तथा वित्तीय लेन-देन से जुड़े तथ्यों को भी अपने रिकॉर्ड में शामिल किया है, जिन्हें मामले की कड़ियों को जोड़ने में अहम माना जा रहा है।

    घटनास्थल पर अपराध के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी पूरी की गई है। इस दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां और वस्तुएं सामने आने का दावा किया गया है। पुलिस का कहना है कि फोरेंसिक रिपोर्ट, डिजिटल साक्ष्य और गवाहों के बयान जांच को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    दूसरी ओर, आरोपियों की ओर से सभी आरोपों से इनकार किया गया है। बचाव पक्ष का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष सुनवाई अदालत में होगी और वहीं सच्चाई सामने आएगी। फिलहाल दोनों आरोपी न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।

    इस बीच देवचंद अग्रवाल के निधन से परिवार गहरे शोक में डूब गया है। परिजनों का कहना है कि उन्होंने अंतिम समय तक अपने पोते के लिए न्याय मिलने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी। अब परिवार की अपेक्षा है कि मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच पूरी हो तथा दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। पुलिस ने भी स्पष्ट किया है कि जांच अभी जारी है और उपलब्ध सभी साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

  • उत्तर प्रदेश फतह के मिशन पर भाजपा, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने नेताओं, एनडीए सहयोगियों, साहित्यकारों और कलाकारों से किया व्यापक मंथन

    उत्तर प्रदेश फतह के मिशन पर भाजपा, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने नेताओं, एनडीए सहयोगियों, साहित्यकारों और कलाकारों से किया व्यापक मंथन


    लखनऊ । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक गतिविधियों को तेज कर दिया है। इसी क्रम में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लखनऊ में एक दिन के दौरान कई महत्वपूर्ण बैठकों और संवाद कार्यक्रमों में भाग लेकर संगठन, सहयोगी दलों तथा समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से व्यापक चर्चा की। इस दौरे को आगामी चुनावों की रणनीतिक तैयारी और संगठनात्मक मजबूती की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष ने पार्टी पदाधिकारियों, वरिष्ठ नेताओं और एनडीए सहयोगी दलों के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग बैठकों में संगठन की कार्यप्रणाली, चुनावी तैयारियों और जनसंपर्क अभियान पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्र और प्रदेश सरकार के कार्यों के आधार पर पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में भी मजबूत जनसमर्थन हासिल करेगी।

    उन्होंने कहा कि भाजपा का संगठन लगातार बूथ स्तर तक सक्रिय रहकर जनता के बीच कार्य करता है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। उनके अनुसार विकास, सुशासन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार के कार्यों को लेकर जनता में सकारात्मक माहौल है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी आगामी चुनाव में पहले से बेहतर प्रदर्शन के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है।

    अपने कार्यक्रम के दौरान नितिन नवीन ने वरिष्ठ नेताओं के साथ भी अनौपचारिक मुलाकात की। इस दौरान प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व के बीच समन्वय और संगठनात्मक एकजुटता पर भी चर्चा हुई। राजनीतिक हलकों में इस बैठक को आगामी चुनावों से पहले नेतृत्व के बीच तालमेल को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    राष्ट्रीय अध्यक्ष ने साहित्य, संस्कृति और कला जगत से जुड़े प्रमुख लोगों से भी मुलाकात कर संवाद स्थापित किया। इस दौरान प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परंपरा, लोककला और स्थानीय खानपान जैसे विषयों पर चर्चा हुई। उपस्थित लोगों ने सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक सहभागिता जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार साझा किए। बैठक का माहौल पूरी तरह अनौपचारिक रहा और इसमें राजनीतिक विषयों पर चर्चा नहीं की गई।

    दौरे के दौरान उन्होंने भाजपा की वरिष्ठ नेता अपर्णा यादव से भी मुलाकात की और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। इसके अलावा पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों के साथ आयोजित बैठक में संगठन की वर्तमान स्थिति, राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक समीकरणों पर विस्तृत मंथन किया गया। इन चर्चाओं के आधार पर भविष्य की रणनीति और संगठन विस्तार की दिशा में सुझावों पर भी विचार हुआ।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक सक्रिय बनाने, सहयोगी दलों के साथ तालमेल मजबूत करने तथा समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। लखनऊ में आयोजित बैठकों और संवाद कार्यक्रमों को इसी व्यापक अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।

    आने वाले महीनों में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के प्रदेशभर में लगातार दौरे और संगठनात्मक कार्यक्रमों की संभावना है। इन गतिविधियों का उद्देश्य कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, जनसंपर्क बढ़ाना और चुनावी तैयारियों को समय रहते मजबूत आधार प्रदान करना माना जा रहा है।

  • बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की सीधी एंट्री, भाजपा के मजबूत गढ़ में मुकाबले ने बढ़ाया बिहार की राजनीति का तापमान

    बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की सीधी एंट्री, भाजपा के मजबूत गढ़ में मुकाबले ने बढ़ाया बिहार की राजनीति का तापमान

    नई दिल्ली । बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से होने वाले उपचुनाव में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। पार्टी की कोर कमेटी की बैठक के बाद उनके नाम पर अंतिम मुहर लगाई गई। इस घोषणा के साथ ही राज्य की राजनीति में उपचुनाव को लेकर नई हलचल शुरू हो गई है और सभी प्रमुख दलों की रणनीतियों पर नजरें टिक गई हैं।

    बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। यह सीट पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई है। राजधानी पटना के प्रमुख शहरी क्षेत्र में स्थित इस सीट पर वर्षों से भाजपा का मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में उतरने से मुकाबला पहले की तुलना में अधिक दिलचस्प माना जा रहा है।

    जन सुराज की ओर से आयोजित प्रेस वार्ता में पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि स्थानीय लोगों की राय और संगठन की सहमति के आधार पर प्रशांत किशोर को उम्मीदवार बनाया गया है। पार्टी का कहना है कि वह इस चुनाव को केवल एक सीट का मुकाबला नहीं बल्कि बेहतर राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करने के अवसर के रूप में देख रही है।

    उम्मीदवारी की घोषणा के बाद प्रशांत किशोर ने कहा कि यदि जनता उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनती है तो वह विधानसभा में लोगों की आवाज को मजबूती से उठाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने दावा किया कि जन सुराज का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को प्रभावी ढंग से सदन तक पहुंचाना है। उन्होंने यह भी कहा कि जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना उनकी प्राथमिकता होगी।

    प्रशांत किशोर लंबे समय तक चुनावी रणनीतिकार के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन अब यह पहला अवसर है जब उन्होंने स्वयं चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। इससे पहले भी उनके चुनाव लड़ने को लेकर कई बार चर्चाएं हुई थीं, लेकिन उन्होंने प्रत्यक्ष राजनीति में कदम नहीं रखा था। इस बार उन्होंने औपचारिक रूप से चुनावी मुकाबले में उतरकर अपनी राजनीतिक भूमिका को नया आयाम दिया है।

    राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं कि उपचुनाव में विपक्षी दल किस रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगे। कुछ राजनीतिक संकेत ऐसे भी मिल रहे हैं कि कुछ विपक्षी दल अपने उम्मीदवार उतारने के बजाय साझा रणनीति पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक किसी दल की ओर से आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    बांकीपुर विधानसभा सीट पर मतदान 30 जुलाई को प्रस्तावित है। भाजपा ने अभी अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, जिसके कारण राजनीतिक उत्सुकता और बढ़ गई है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा, चुनाव प्रचार और स्थानीय मुद्दों के साथ यह उपचुनाव बिहार की राजनीति का प्रमुख केंद्र बनने की संभावना रखता है। सभी दलों की नजरें अब इस प्रतिष्ठित सीट पर होने वाले मुकाबले और उसके संभावित राजनीतिक संदेश पर टिकी हुई हैं।

  • अमित शाह के कोलकाता दौरे से पहले बढ़ा सियासी तनाव, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के चबूतरे में तोड़फोड़ से गरमाया माहौल

    अमित शाह के कोलकाता दौरे से पहले बढ़ा सियासी तनाव, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के चबूतरे में तोड़फोड़ से गरमाया माहौल


    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कोलकाता दौरे से ठीक पहले पश्चिम बंगाल की राजधानी में एक संवेदनशील घटना सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। मध्य कोलकाता के सुखिया स्ट्रीट क्षेत्र में हाल ही में स्थापित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के चबूतरे में तोड़फोड़ पाए जाने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और पूरे मामले की जांच विभिन्न पहलुओं से की जा रही है।

    जानकारी के अनुसार, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर इस प्रतिमा की स्थापना हाल ही में की गई थी। प्रतिमा के चबूतरे पर नाम पट्टिका भी लगाई जा चुकी थी और स्थापना से जुड़ा कार्य शनिवार रात तक पूरा हो गया था। रविवार सुबह स्थानीय लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने जब स्थल का निरीक्षण किया तो चबूतरे का निचला हिस्सा क्षतिग्रस्त मिला। इसके बाद तत्काल पुलिस को सूचना दी गई और मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार प्रारंभिक जांच से संकेत मिले हैं कि घटना आधी रात के बाद हुई हो सकती है। आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की जा रही है ताकि घटना में शामिल लोगों की पहचान की जा सके। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य एकत्र किए हैं और विभिन्न तकनीकी पहलुओं की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही घटना के पीछे की वास्तविक वजह स्पष्ट हो सकेगी।

    घटना के सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इसे गंभीर बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। भारतीय जनता युवा मोर्चा की ओर से संबंधित थाने में शिकायत देकर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सार्वजनिक स्मारकों के साथ इस प्रकार की तोड़फोड़ लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है और जिम्मेदार लोगों की जल्द पहचान कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सोमवार को कोलकाता पहुंचने वाले हैं। उनका दौरा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए निर्धारित है। कार्यक्रम के दौरान वह उनके आवास पर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे और बाद में न्यू टाउन स्थित इको पार्क में प्रस्तावित 125 फीट ऊंची प्रतिमा की आधारशिला रखने के कार्यक्रम में भी शामिल होंगे। इसके बाद उनका जयंती समारोह में भाग लेने का कार्यक्रम तय है।

    भाजपा नेताओं ने इस दौरे को संगठन के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए व्यापक तैयारियां की हैं। पार्टी का कहना है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों और योगदान को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में प्रतिमा का अनावरण और अन्य आयोजन भी प्रस्तावित हैं।

    फिलहाल प्रशासन का पूरा ध्यान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और घटना की निष्पक्ष जांच पर केंद्रित है। अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के साथ संवेदनशील क्षेत्रों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि दोषियों की पहचान के लिए उपलब्ध सभी तकनीकी और प्रत्यक्ष साक्ष्यों की जांच की जा रही है। जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस बीच, अमित शाह के प्रस्तावित दौरे और उससे जुड़े कार्यक्रमों को लेकर सुरक्षा व्यवस्था भी और अधिक सख्त कर दी गई है।

  • फिल्म, विवाद और सियासत के बीच दिलजीत दोसांझ चर्चा में, क्या 'सतलुज' के बाद बदलने वाली है पंजाब की राजनीति?

    फिल्म, विवाद और सियासत के बीच दिलजीत दोसांझ चर्चा में, क्या 'सतलुज' के बाद बदलने वाली है पंजाब की राजनीति?

    नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ एक बार फिर अपनी फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। लंबे समय तक विवादों और इंतजार के बाद ओटीटी पर रिलीज हुई यह फिल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और 1990 के दशक की घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के सामने आने के साथ ही पंजाब में फिल्मों और राजनीति के पुराने रिश्ते पर नई बहस शुरू हो गई है। साथ ही, दिलजीत के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी अटकलों का दौर तेज हो गया है।

    फिल्म में पंजाब के उस दौर को दिखाया गया है जब राज्य उग्रवाद और सुरक्षा अभियानों के कारण लगातार सुर्खियों में था। कहानी कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और उन मामलों की पड़ताल पर केंद्रित है, जिन्होंने वर्षों तक सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया। इसी संवेदनशील विषय के कारण फिल्म लंबे समय तक विवादों में रही और इसके शीर्षक तथा अन्य पहलुओं को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।

    पंजाब में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों की चर्चा चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है। हालांकि इस बात पर राय अलग-अलग है कि फिल्म का सीधा चुनावी असर कितना होगा। कुछ लोगों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित रहेगा, जबकि अन्य इसे जनभावनाओं और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाला मान रहे हैं।

    पंजाब में फिल्मों और राजनीतिक विवादों का इतिहास नया नहीं है। राज्य के इतिहास, धार्मिक भावनाओं, सामाजिक मुद्दों और राजनीतिक घटनाओं पर आधारित कई फिल्मों को पहले भी विरोध और विवाद का सामना करना पड़ा है। विभिन्न अवसरों पर सेंसर प्रक्रिया, प्रदर्शन और सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं ने इन फिल्मों को चर्चा का विषय बनाया है। ऐसे मामलों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन पर भी सवाल खड़े किए हैं।

    दिलजीत दोसांझ भी पिछले कुछ वर्षों में कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखने के कारण चर्चा में रहे हैं। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने किसानों के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी थी। हालांकि उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और खुद को केवल एक कलाकार मानते हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि राजनीति में आने की उनकी कोई योजना नहीं है।

    बीते समय में देश और विदेश में आयोजित कार्यक्रमों के दौरान भी दिलजीत कई बार सुर्खियों में रहे। उन्होंने विभिन्न मंचों पर पंजाबी संस्कृति और प्रवासी समुदाय की उपलब्धियों का उल्लेख किया, वहीं विवादित राजनीतिक प्रतीकों और अलगाववादी विचारों से दूरी बनाए रखने की भी कोशिश की। उनके इन बयानों को कई लोगों ने संतुलित सार्वजनिक रुख के रूप में देखा।

    राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि लोकप्रिय कलाकार भविष्य में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन सकते हैं। दिलजीत के मामले में भी ऐसी अटकलें लगती रही हैं, लेकिन उन्होंने अब तक किसी राजनीतिक दल से जुड़ने या चुनाव लड़ने का संकेत नहीं दिया है। उनके हालिया बयान भी यही दर्शाते हैं कि फिलहाल उनका पूरा ध्यान अभिनय, संगीत और सामाजिक विषयों पर आधारित रचनात्मक कार्यों पर है।

    फिलहाल ‘सतलुज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास, सामाजिक विमर्श और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई चर्चा का माध्यम बन गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को दर्शकों का कितना व्यापक समर्थन मिलता है और क्या इससे जुड़ी राजनीतिक चर्चाएं चुनावी माहौल तक कोई प्रभाव छोड़ पाती हैं।

  • पति की हत्या के बाद रची गई साजिश की परतें खुलीं, बाथरूम का फर्श बनवाने बुलाया राजमिस्त्री, पूछताछ में सामने आई चौंकाने वाली कहानी

    पति की हत्या के बाद रची गई साजिश की परतें खुलीं, बाथरूम का फर्श बनवाने बुलाया राजमिस्त्री, पूछताछ में सामने आई चौंकाने वाली कहानी

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के आगरा में सामने आए चर्चित बाथरूम हत्याकांड की जांच आगे बढ़ने के साथ ही नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। पुलिस की जांच में अब उस राजमिस्त्री का बयान भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसने कथित तौर पर आरोपी महिला के घर पहुंचकर बाथरूम का फर्श तैयार किया था। उसके बयान ने पूरे घटनाक्रम की कई नई परतों को उजागर कर दिया है।

    जांच के अनुसार, आरोपी महिला पर अपने पति की हत्या करने के बाद शव को घर के बाथरूम में खोदे गए गड्ढे में छिपाकर उसके ऊपर फर्श बनवाने का आरोप है। मामले में गिरफ्तार महिला से पूछताछ के बाद पुलिस ने बाथरूम का फर्श खुदवाया, जहां से शव बरामद किया गया। इसके बाद जांच एजेंसियां हत्या की पूरी साजिश और उससे जुड़े सभी तथ्यों की पड़ताल में जुटी हैं।

    राजमिस्त्री ने पुलिस को बताया कि करीब डेढ़ महीने पहले उसे एक महिला का फोन आया था, जिसने घर के बाथरूम का फर्श तत्काल बनवाने की बात कही थी। जब वह मौके पर पहुंचा तो देखा कि बाथरूम का फर्श पूरी तरह टूटा हुआ था। महिला ने उसे बताया कि उसके पति घर से बाहर गए हैं और उनके लौटने से पहले फर्श तैयार कर देना जरूरी है।

    राजमिस्त्री के अनुसार, उस समय उसे सबसे अधिक हैरानी इस बात पर हुई कि महिला खुद बाल्टी से गड्ढे में कंक्रीट और मलबा डाल रही थी। उसने उसी दिन काम करने से इनकार करते हुए अगले दिन आने की बात कही। अगले दिन महिला ने उसे सीमेंट खरीदने के लिए पैसे दिए, जिसके बाद उसने बाथरूम का फर्श तैयार कर दिया। उस दौरान उसे इस बात का कोई अंदेशा नहीं था कि जिस जगह पर फर्श बनाया जा रहा है, उसके नीचे किसी का शव दबा हो सकता है।

    राजमिस्त्री ने यह भी बताया कि काम के दौरान महिला की बेटी से उसकी बातचीत हुई थी। बच्ची ने घर में माता-पिता के बीच अक्सर होने वाले विवाद और पैसों को लेकर होने वाले झगड़ों का जिक्र किया था। हालांकि उस समय इन बातों को उसने सामान्य पारिवारिक विवाद मानकर अधिक महत्व नहीं दिया।

    पुलिस के अनुसार, महिला ने अपने पति के लापता होने की शिकायत भी दर्ज कराई थी, ताकि किसी को उस पर शक न हो। लेकिन पूछताछ के दौरान मिले तथ्यों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर जांच का रुख बदला। इसके बाद पुलिस ने घर के बाथरूम की खुदाई कराई, जहां से शव बरामद हुआ। प्रारंभिक जांच में हत्या के बाद शव को छिपाने की योजना सामने आई है।

    फिलहाल पुलिस पूरे मामले में वैज्ञानिक साक्ष्यों, फोरेंसिक रिपोर्ट और पूछताछ के आधार पर जांच को आगे बढ़ा रही है। अधिकारियों का कहना है कि मामले से जुड़े हर पहलू की गहन जांच की जा रही है ताकि हत्या की पूरी साजिश, उसका कारण और इसमें यदि किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका रही हो तो उसे भी स्पष्ट किया जा सके।

  • केन्द्र सरकार का बड़ा फैसला… मिडिल ईस्ट तनाव के बीच गैस सप्लाई पर लागू किए गए विशेष प्रावधान हटाए

    केन्द्र सरकार का बड़ा फैसला… मिडिल ईस्ट तनाव के बीच गैस सप्लाई पर लागू किए गए विशेष प्रावधान हटाए


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट (Middle East) में तनाव कम होने के बाद भारत सरकार (Government of India) ने नेचुरल गैस सप्लाई (Natural gas supply) को लेकर बड़ा फैसला लिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से जहाजों की आवाजाही फिर शुरू होने के बाद सरकार ने मार्च 2026 में लागू किए गए आपातकालीन गैस सप्लाई नियमों में बदलाव किया है. नए आदेश के तहत पहले लागू किए गए कई विशेष प्रावधान हटा दिए गए हैं. यह फैसला तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है।

    दरअसल, मार्च 2026 में मिडिल ईस्ट के तनाव की वजह से समुद्र के रास्ते आने वाली एलएनजी (Liquefied Natural Gas) की सप्लाई बुरी प्रभावित हो गई थी. कुछ विदेशी कंपनियों ने भी हाथ खड़े कर दिए थे और गैस देने से मना कर दिया था. ऐसे बिगड़े हालातों को संभालने के लिए सरकार ने 9 मार्च 2026 को नेचुरल गैस (सप्लाई रेगुलेशन) ऑर्डर लागू किया था।

    इस आदेश का मकसद यह था कि देश में उपलब्ध गैस की सप्लाई प्राथमिकता वाले क्षेत्रों तक बिना रुकावट पहुंचती रहे. इसके लिए सरकार ने गैस के उत्पादन, आवंटन और वितरण को लेकर विशेष नियम लागू किए थे।

    सरकार के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में अब युद्धविराम लागू हो चुका है. वहां शांति के लिए बातचीत का दौर भी चल रहा है. इसी बीच होर्मुज के रास्ते जहाजों का आना-जाना फिर से शुरू हो गया है. हालात में आए इसी बड़े बदलाव को देखते हुए पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने 4 जुलाई 2026 को नया आदेश जारी किया है।

    9 मार्च 2026 को जारी किए गए आदेश में सरकार ने आपातकालीन हालात से निपटने के लिए कई विशेष प्रावधान लागू किए थे. अब नए आदेश के जरिए इन्हें हटा दिया गया है. इनमें मुख्य तौर पर ये प्रावधान शामिल थे।

    गैस के उत्पादन और बंटवारे पर नियंत्रण: संकट के समय सरकार ने यह नियम बनाया था कि देश में नेचुरल गैस का कितना उत्पादन होगा और वह किस सेक्टर को कितनी दी जाएगी, यह सब सरकार ही तय करेगी।


    जरूरी क्षेत्रों को प्राथमिकता:

    गैस की कमी को देखते हुए सबसे पहले घरेलू इस्तेमाल और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों तक गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई थी.


    सप्लाई और इस्तेमाल पर पाबंदियां:

    नेचुरल गैस और एलएनजी (LNG) की सप्लाई, उसके वितरण और इस्तेमाल को लेकर कुछ समय के लिए कड़े नियम लागू कर दिए गए थे, ताकि कोई इसका गलत इस्तेमाल न कर सके.

    अब मिडिल ईस्ट में युद्धविराम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से समुद्री आवाजाही फिर शुरू होने के बाद सरकार ने ये विशेष प्रावधान हटा दिए हैं. इससे गैस सप्लाई व्यवस्था फिर पहले जैसे सामान्य नियमों के तहत चलेगी।


    इसका क्या असर होगा?

    सरकार का मानना है कि समुद्री मार्ग दोबारा खुलने से गैस की आपूर्ति व्यवस्था पहले के मुकाबले आसान होगी. इसी वजह से आपातकालीन व्यवस्था के तहत लागू कुछ नियमों की अब जरूरत नहीं रही. हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया है कि हालात पर लगातार नजर रखी जाएगी. अगर भविष्य में फिर कोई संकट पैदा होता है, तो जरूरत के मुताबिक नए कदम उठाए जा सकते हैं.

  • मॉनसून सत्र 20 जुलाई से….. मोदी सरकार अधिक संख्याबल के साथ पहुंचेगी संसद

    मॉनसून सत्र 20 जुलाई से….. मोदी सरकार अधिक संख्याबल के साथ पहुंचेगी संसद


    नई दिल्ली।
    मोदी सरकार (Modi government) द्वारा लाया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक फेल हो गया। वजह थी सरकार के पास पर्याप्त दो-तिहाई बहुमत नहीं था। तब से लेकर अब तक भारतीय राजनीति में काफी कुछ बदलाव हुआ है। दल-बदल और पार्टियों की टूट के बाद मोदी सरकार की ताकत में वृद्धि हुई है। अब, जबकि संसद (Parliament) का मॉनसून सत्र (Monsoon Session) 20 जुलाई से शुरू होने वाला है, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) मजबूत स्थिति में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ताकतवर होकर संसद पहुंच रही मोदी सरकार की नजर कुछ ऐसे फैसलों पर है, जिन्हें वह पिछले काफी समय से करना चाहती थी, लेकिन संसद में संख्या बल न होने की वजह से अभी तक फेल होती आ रही थी।

    अप्रैल में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक लाने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने संसद के पटल पर खड़े होकर विपक्षी नेताओं से एक बात कही थी। उन्होंने कहा कि था कि आज अगर आप इसका समर्थन करते हैं, तो इसका श्रेय आपको भी जाएगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर इसका श्रेय केवल एनडीए सरकार को ही जाएगा। उस समय एनडीए को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। पिछले तीन महीनों में एनडीए को कई विधायकों और सांसदों का समर्थन मिला है। फिर चाहे वह राज्यसभा हो या लोकसभा भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है। लेकिन क्या भाजपा और उसका गठबंधन इतना मजबूत है कि वह आसानी से संविधान संशोधन कर सके?


    मोदी सरकार के लिए क्यों आसान नहीं है संवैधानिक संशोधन

    अप्रैल में जब एनडीए सरकार द्वारा लाया गया 131वां संविधान संशोधन विधेयक फेल हुआ था, तब उसे 352 वोटों की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में केल 298 वोट ही पड़े थे। चूंकि किसी भी संविधान संसोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। इसलिए 352 के आंकड़े को छूने के लिए केंद्र सरकार 54 वोट पीछे रह गई।

    वर्तमान स्थिति की बात करते हैं। तृणमूल कांग्रेस के सांसद, उद्धव ठाकरे के सांसद इन सब को मिलाकर एनडीए गठबंधन अभी 320 के पार पहुंच गया है। लेकिन इसके बाद भी वह पूर्ण रूप से भरे सदन के दो-तिहाई बहुमत के करीब नहीं पहुंच पाया है।

    राज्यसभा की बात करें, तो भले ही भाजपा ने आम आदमी पार्टी के सांसदों को तोड़ लिया हो। लेकिन अभी भी उसकी स्थिति मजबूत नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह बाकी बची संख्या को कहां से लाएगी?


    तीन संवैधानिक संशोधनों पर भाजपा की नजर
    1. पीएम-सीएम को हटाने वाले विधेयक पर होगा फैसला?

    भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 130वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्य मंत्री को हटाने का प्रस्ताव लेकर आई थी। लेकिन बहुमत न होने की वजह से केंद्र ने इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक मॉनसून सत्र के ठीक पहले यह समिति अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है, जिसके बाद यह विधेयक एक बार फिर से संसद में पेश किया जा सकता है।

    दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जब जेल से सरकार चला रहे थे। उस वक्त भारतीय जनता पार्टी ने इसे एक बहुत बड़ा मुद्दा बनाया था। इसी घटनाक्रम के बाद सरकार यह बिल लेकर आई थी। इसके अनुसार अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्य मंत्री 5 साल तक सजा वाले किसी मामले में 30 दिनों तक जेल में रहता है। तो उसका पद अपने आप ही समाप्त हो जाएगा।

    केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कई बार जेल से सरकार चलाने के लिए अरविंद केजरीवाल पर निशाना साध चुके हैं। उन्होंने इस बिल को जवाबदेही तय करने वाला करार दिया था। उनसे जब सवाल पूछा गया कि अगर किसी पर झूठा मामला होता है तब क्या होगा। इसका जवाब देते हुए गृहमंत्री ने कहा था कि अगर मामला झूठा होता है, तो अदालतें जमानत देगीं। लेकिन यदि जमानत नहीं मिलती है, तो फिर पद छोड़ना होगा।


    2. वन नेशन, वन इलेक्शन पर नजर

    भारतीय जनता पार्टी के कोर मुद्दों में से एक वन नेशन, वन इलेक्शन को भी इस मॉनसून सत्र में देखा जा सकता है। पिछले वर्ष लाया गया यह 129वां संविधान संसोधन विधेयक इस वक्त 39 सदस्यीय संसदीय समिति के पास विचाराधीन पड़ा हुआ है। पीएम मोदी का मत है कि देश में हर समय होने वाले चुनाव विकास के बाधक हैं। इसलिए एक देश एक चुनाव पर सहमति बनाकर सभी को इसके लिए राजी रहना चाहिए। हालांकि, अन्य मुद्दों की तरफ विपक्ष और अन्य लोग इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेरते हुए नजर आते हैं। वर्तमान में यह विधेयक भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के पास है। इसका कार्यकाल बढ़ा दिया गया है।


    3. महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक

    अप्रैल में एनडीए सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक लेकर आई थी। लेकिन दो-तिहाई बहुमत न होने की वजह से सदन में यह बिल पास नहीं हो पाया था। सरकार का तर्क है कि 2023 में पारित महिला आरक्षण बिल को जल्दी लागू करने के लिए 2029 चुनाव के पहले परिसीमन करवाना अनिवार्य है। लेकिन विपक्ष की इस पर अलग राय है। विपक्ष का कहना है कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक की आड़ में परिसीमन लागू कर लोकसभा की सीटों को अपने हिसाब से बांटना चाहती है।

    दक्षिण भारत के राज्यों में भी इस विधेयक को लेकर अपना डर है। उनका कहना है कि इस फैसले से उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य राज्यों को लाभ मिलेगा। क्योंकि उनकी जनसंख्या अधिक है। हालांकि, सरकार ने उनको भरोसे में लेने की कोशिश की लेकिन विपक्ष मानने को तैयार नहीं है।

    विपक्ष का आरोप है कि अगर सरकार को महिला आरक्षण कि इतनी ही चिंता है तो क्यों न इसे वर्तमान सीट संख्या पर ही लागू कर दिया जाए?