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  • वाराणसी में ऐतिहासिक तैयारी,पीएम मोदी के दौरे से पहले शहर में रोशनी और विकास का अद्भुत नजारा

    वाराणसी में ऐतिहासिक तैयारी,पीएम मोदी के दौरे से पहले शहर में रोशनी और विकास का अद्भुत नजारा

    नई दिल्ली। वाराणसी इस समय एक अलग ही रंग में नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय दौरे से पहले पूरा शहर रोशनी, सजावट और उत्साह से भर गया है। सड़कें, चौराहे और प्रमुख मार्ग इस तरह सजाए गए हैं कि पूरा शहर किसी बड़े पर्व जैसा दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों से लेकर प्रशासन तक हर कोई इस दौरे को सफल बनाने में जुटा हुआ है।

    दौरे की शुरुआत धार्मिक परंपराओं के साथ हुई, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस पूजा ने पूरे कार्यक्रम को आध्यात्मिक शुरुआत दी और इसे केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा अवसर भी बना दिया। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों ने इस क्षण को बेहद महत्वपूर्ण बताया और इसे काशी की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा।

    इसके बाद शहर में तैयारियों का दायरा और बढ़ गया। जिन रास्तों से प्रधानमंत्री गुजरेंगे, उन्हें विशेष रूप से सजाया गया है। सड़क किनारे रोशनी, रंगीन सजावट और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा गया है। पूरा शहर एक नए रूप में नजर आ रहा है, जहां आधुनिक विकास और पारंपरिक संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिल रहा है।

    इस दौरे के दौरान एक बड़ा जनसंबोधन कार्यक्रम भी प्रस्तावित है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है। खासकर महिलाओं की भागीदारी को लेकर विशेष व्यवस्था की गई है, जिससे यह कार्यक्रम सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है। इस अवसर पर कई विकास परियोजनाओं की घोषणा और शुरुआत की जाएगी, जो क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही हैं।

    इन परियोजनाओं में सड़क, परिवहन और शहरी विकास से जुड़े कई बड़े काम शामिल हैं। इसके अलावा कुछ नई ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाई जाएगी, जिससे विभिन्न शहरों के बीच संपर्क और मजबूत होगा। इन सभी योजनाओं को क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। पूरे शहर में बड़ी संख्या में सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है। महिला पुलिस बल की भी मजबूत उपस्थिति देखने को मिल रही है। निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है और पूरे क्षेत्र को कई सुरक्षा स्तरों में बांटा गया है ताकि किसी भी स्थिति पर तुरंत नियंत्रण पाया जा सके।

    प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में एक लंबा रोड शो भी शामिल है, जहां वे जनता का अभिवादन करते हुए शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरेंगे। इस रोड शो को लेकर लोगों में खासा उत्साह है और बड़ी संख्या में नागरिक सड़कों पर उनका स्वागत करने की तैयारी में हैं।

    पूरे शहर का माहौल इस समय एक उत्सव जैसा है, जहां आस्था, विकास और जनसंपर्क एक साथ दिखाई दे रहे हैं। वाराणसी का यह दृश्य न केवल स्थानीय लोगों के लिए खास है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

  • काशी में हाई अलर्ट: पीएम मोदी के आगमन से पहले सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक-चौबंद

    काशी में हाई अलर्ट: पीएम मोदी के आगमन से पहले सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक-चौबंद

    नई दिल्ली। वाराणसी में प्रधानमंत्री के आगामी दौरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत किया गया है। पूरे शहर में सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं और हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण से लेकर वीआईपी मूवमेंट तक के लिए विशेष योजना तैयार की है, ताकि कार्यक्रम बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।

    शहर के प्रमुख आयोजन स्थलों और मार्गों पर भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। सुरक्षा व्यवस्था में महिला पुलिसकर्मियों की भी बड़ी संख्या शामिल है, जिन्हें विशेष रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। जिस स्थान पर बड़ा जनसमूह जुटने की संभावना है, वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया है।

    पूरे कार्यक्रम क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से लैस सुरक्षा घेरे में रखा गया है। निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का व्यापक नेटवर्क सक्रिय किया गया है, जिससे हर गतिविधि पर रियल टाइम नजर रखी जा सके। इसके साथ ही ड्रोन गतिविधियों को रोकने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम भी लगाया गया है।

    भीड़ प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है और यातायात को सुचारू रखने के लिए वैकल्पिक मार्गों की योजना बनाई गई है। इससे आम लोगों को कम से कम असुविधा हो और शहर में आवाजाही सामान्य बनी रहे।

    कार्यक्रम के दौरान एक बड़े महिला सम्मेलन का आयोजन भी प्रस्तावित है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं के शामिल होने की संभावना है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया गया है, ताकि पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।

    इसके अलावा प्रधानमंत्री के धार्मिक कार्यक्रमों को देखते हुए भी विशेष तैयारी की गई है। शहर में उत्साह का माहौल है और लोग उनके स्वागत के लिए तैयार हैं। प्रशासन का पूरा ध्यान इस बात पर है कि दौरा पूरी तरह सुरक्षित, व्यवस्थित और सफल रहे।

  • मुंबई में परिवार की मौत के बाद तरबूज पर सवाल, क्या इससे हो सकती है फूड प्वाइजनिंग? डॉक्टरों ने बताया सच

    मुंबई में परिवार की मौत के बाद तरबूज पर सवाल, क्या इससे हो सकती है फूड प्वाइजनिंग? डॉक्टरों ने बताया सच


    नई दिल्ली।
    गर्मियों में तरबूज को सबसे ताजगी देने वाले फलों में गिना जाता है, लेकिन हाल ही में मुंबई में हुई एक दर्दनाक घटना ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत के बाद आशंका जताई जा रही है कि मामला फूड प्वाइजनिंग से जुड़ा हो सकता है। बताया जा रहा है कि परिवार ने पहले बिरयानी खाई थी और उसके बाद घर में रखा तरबूज खाया था। कुछ ही घंटों बाद सभी की तबीयत बिगड़ गई और उल्टी-दस्त जैसे लक्षण सामने आए। अस्पताल पहुंचने पर सभी की मौत हो गई।

    पुलिस ने इस पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है और इसे फिलहाल संदिग्ध फूड प्वाइजनिंग मानते हुए खाद्य सामग्री को जांच के लिए भेजा गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद ही मौत के कारणों की स्पष्ट पुष्टि हो सकेगी।

    क्या तरबूज से हो सकती है मौत?
    इस घटना के बाद यह सवाल चर्चा में आ गया है कि क्या तरबूज खाना जानलेवा भी हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, तरबूज खुद में सुरक्षित फल है, लेकिन अगर यह दूषित हो जाए या गलत तरीके से स्टोर किया जाए तो इसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं, जिससे फूड प्वाइजनिंग हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि तरबूज में पानी और प्राकृतिक शुगर की मात्रा अधिक होती है, इसलिए खराब या संक्रमित होने पर यह बैक्टीरिया के लिए अनुकूल वातावरण बन सकता है। कुछ मामलों में इसमें मिठास बढ़ाने के लिए बाहरी पदार्थ मिलाने की भी आशंका रहती है, जो जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

    डॉक्टरों के मुताबिक फूड प्वाइजनिंग के लक्षणों में उल्टी, दस्त और पेट दर्द शामिल हैं। इसकी गंभीरता बैक्टीरिया के प्रकार और व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल तरबूज को दोष देना सही नहीं है। फूड प्वाइजनिंग किसी भी दूषित भोजन या असुरक्षित तरीके से रखे गए खाने से हो सकती है, इसलिए पूरे मामले की जांच के बाद ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

  • बंगाल की सियासी ज़मीन पर टकराव: IPS अधिकारी और TMC उम्मीदवार के बीच बयानबाज़ी से बढ़ा तनाव

    बंगाल की सियासी ज़मीन पर टकराव: IPS अधिकारी और TMC उम्मीदवार के बीच बयानबाज़ी से बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली।पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है और इसी बीच दक्षिण 24 परगना क्षेत्र में सामने आया एक विवाद अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है। इस घटनाक्रम में कानून व्यवस्था संभाल रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और एक राजनीतिक उम्मीदवार के बीच हुई बयानबाज़ी ने पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल पैदा कर दिया है। मामला सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह खुली राजनीतिक टकराव की स्थिति में बदल गया है।

    पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब कुछ स्थानीय लोगों ने शिकायत दर्ज कराई कि एक राजनीतिक उम्मीदवार के समर्थक इलाके में लोगों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए सुरक्षा एजेंसियों की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया गया। इसी दौरान पुलिस अधिकारी ने सख्त रुख अपनाते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी तरह की धमकी, अनुशासनहीनता या कानून तोड़ने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

    उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। कुछ ही समय बाद राजनीतिक उम्मीदवार ने भी सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी। अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत चाहे किसी भी तरफ से मानी जाए, लेकिन उसका अंत वही तय करेंगे। उनके शब्दों में आत्मविश्वास के साथ-साथ चुनौती का भाव भी साफ दिखाई दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी भी दबाव या सुरक्षा व्यवस्था से डरने वाले नहीं हैं और जनता उनके साथ मजबूती से खड़ी है।

    इस बयानबाज़ी के बाद इलाके का राजनीतिक माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया है। एक तरफ समर्थकों के बीच जोश और उत्साह देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। चुनावी समय में इस तरह की बयानबाज़ी अक्सर जनता की राय और राजनीतिक माहौल दोनों को प्रभावित करती है, जिससे तनाव और बढ़ जाता है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं चुनावी प्रक्रिया को और जटिल बना देती हैं। जब प्रशासनिक जिम्मेदारियों और राजनीतिक दावों के बीच सीधा टकराव जैसा माहौल बनता है, तो स्थिति को संभालना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में सभी पक्षों के लिए संयम और संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ सके।

  • अल्मोड़ा के श्मशान में जोड़े ने रचाई शादी, देवभूमि की परंपराओं पर छिड़ा भीषण विवाद

    अल्मोड़ा के श्मशान में जोड़े ने रचाई शादी, देवभूमि की परंपराओं पर छिड़ा भीषण विवाद

    नई दिल्ली। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने जीवन और मृत्यु के बीच की पारंपरिक मर्यादाओं को हिलाकर रख दिया है। आमतौर पर विवाह के लिए लोग पवित्र मंदिरों या आलीशान महलों का चुनाव करते हैं, लेकिन अल्मोड़ा के मर्चुला क्षेत्र में एक जोड़े ने इसके बिल्कुल उलट श्मशान घाट की दहलीज पर अपना नया जीवन शुरू करने का फैसला किया। रामगंगा और बदनगढ़ नदी के संगम पर स्थित यह वही स्थान है, जहां वर्षों से लोग अपनों को अंतिम विदाई देते आए हैं। इसी जगह पर फूलों का मंडप सजाया गया और मंत्रोच्चार के बीच जयमाला की रस्म पूरी की गई। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को स्तब्ध कर दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

    इस विवाह समारोह की जानकारी तब सार्वजनिक हुई जब समारोह का एक वीडियो इंटरनेट पर तेजी से प्रसारित होने लगा। वीडियो में देखा जा सकता है कि जिस स्थान पर अर्थियां जलाई जाती हैं, वहां बिजली की झालरें और भव्य सजावट की गई थी। मेहमानों की मौजूदगी में जोड़े ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। जैसे ही यह दृश्य स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने आया, विरोध के स्वर तेज हो गए। लोगों का कहना है कि श्मशान घाट को शास्त्रों में वैराग्य और दुख का स्थान माना गया है, वहां इस तरह का जश्न मनाना हिंदू परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का सीधा अपमान है। स्थानीय लोगों ने इसे आस्था के साथ खिलवाड़ करार देते हुए कड़ा ऐतराज जताया है।

    विरोध की आंच अब प्रशासन तक भी पहुंच गई है। अधिकारियों ने इस मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान, विशेषकर अंत्येष्टि स्थलों का उपयोग किसी निजी मांगलिक कार्य के लिए करना नियमों के खिलाफ है। प्रशासन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि आधुनिकता के नाम पर इस तरह के संवेदनशील स्थानों की गरिमा को ठेस पहुँचाना अनुचित है। फिलहाल, इस अनोखी लेकिन विवादित शादी ने देवभूमि में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां एक पक्ष इसे व्यक्तिगत चुनाव मान रहा है, तो वहीं दूसरा पक्ष इसे समाज और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन बता रहा है।

  • मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, घोषित करने की आवश्यकता नहीं

    मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, घोषित करने की आवश्यकता नहीं

    नई दिल्ली। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को नागपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अयोध्या राम मंदिर और भारत की सांस्कृतिक पहचान को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सत्ता में बैठे लोगों की प्रतिबद्धता और देशभर के लोगों के सहयोग से संभव हुआ है।

    यह कार्यक्रम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा उन लोगों के सम्मान में आयोजित किया गया था, जिन्होंने राम मंदिर निर्माण में नेतृत्व और योगदान दिया। भागवत ने कहा कि राम मंदिर भगवान राम की इच्छा का प्रतीक है और इसके निर्माण में पूरे समाज की भागीदारी रही है। उन्होंने इसकी तुलना गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा से करते हुए कहा कि जैसे भगवान कृष्ण की उंगली पर पर्वत टिक गया था, वैसे ही यह मंदिर भी सामूहिक सहयोग से संभव हुआ।

    भागवत ने योगी अरविंद का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए भारत का उभार आवश्यक है। उनके अनुसार यह प्रक्रिया 1857 से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों का जिक्र करते हुए ‘द गार्डियन’ के एक लेख का हवाला दिया, जिसमें भारत की राजनीतिक और ऐतिहासिक दिशा पर टिप्पणी की गई थी। भागवत ने कहा कि तकनीकी रूप से आजादी 1947 में मिली थी, लेकिन वास्तविक आत्मविश्वास बाद में मजबूत हुआ।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि सत्ता में बैठे लोग प्रतिबद्ध नहीं होते और जनआंदोलन नहीं चलता, तो राम मंदिर का निर्माण संभव नहीं था। भागवत के अनुसार, पहले ‘हिंदू राष्ट्र’ की बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन अब यह विचार व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने लगा है।

    उन्होंने कहा कि जैसे सूरज का पूर्व से उगना एक प्राकृतिक सत्य है और उसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही भारत का हिंदू राष्ट्र होना भी एक वास्तविकता है। अंत में उन्होंने कहा कि अब समय है देश को और अधिक समृद्ध और मजबूत बनाने की दिशा में काम करने का, और भारत का उदय पूरी दुनिया के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएगा।

  • अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….

    अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….


    नई दिल्ली।
    साल 2025 में दुनिया भर में अपनी सेनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों (Countries Spend Most Military) की सूची में भारत (India) पांचवें स्थान पर रहा है। भारत से आगे केवल चार देश हैं। वहीं पाकिस्तान (Pakistan) इस मामले में भारत के आसपास भी नहीं ठहरता है। पिछले साल दुनिया भर में हुए कुल सैन्य खर्च में भारत की हिस्सेदारी 3.2% रही है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं।


    भारत का रक्षा खर्च और ‘ऑपरेशन सिंदूर’

    स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा सोमवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका (USA), चीन, रूस और जर्मनी इस लिस्ट में सबसे आगे यानी टॉप 4 देश हैं। इसके बाद भारत नंबर 5 पर है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है।

    बढ़ोतरी का कारण: इस वृद्धि का एक बड़ा कारण पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था। इस सैन्य अभियान के दौरान सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखने हेतु सशस्त्र बलों ने आपातकालीन आधार पर हथियारों और साजो-सामान की कई महत्वपूर्ण खरीदारियां कीं।


    पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) की क्या स्थिति है?

    सिपरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पड़ोसियों ने भी अपनी सेना पर खर्च बढ़ाया है।

    चीन: दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश चीन है। उसने अपने रक्षा बजट में 7.4% की वृद्धि की है, जिससे उसका कुल खर्च 336 अरब डॉलर हो गया है।

    पाकिस्तान: आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य खर्च में 11% की वृद्धि देखी गई है। 11.9 अरब डॉलर के खर्च के साथ पाकिस्तान इस सूची के 40 देशों में 31वें स्थान पर है।


    वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में रक्षा खर्च रिकॉर्ड स्तर पर

    शीर्ष तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस मिलकर वैश्विक सैन्य खर्च का 51% हिस्सा कवर करते हैं। इन तीनों देशों ने कुल मिलाकर 1,480 अरब डॉलर खर्च किए। साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।


    यूरोप में भारी वृद्धि

    वैश्विक स्तर पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यूरोप रहा, जहां सैन्य खर्च में 14% की वृद्धि (कुल 864 अरब डॉलर) हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के चौथे साल में प्रवेश करने और यूरोपीय नाटो देशों द्वारा खुद को फिर से हथियारों से लैस करने की कोशिशों के कारण शीत युद्ध के बाद से मध्य और पश्चिमी यूरोप में यह सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है।


    हथियारों के आयात में भारत अभी भी आगे

    मार्च में प्रकाशित सिपरी की एक अन्य रिपोर्ट “ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स” के अनुसार- 2016-20 और 2021-25 की अवधि के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4% की गिरावट आई है। गिरावट के बावजूद, भारत अभी भी सैन्य हार्डवेयर का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हथियारों के आयात में 8.2% हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर चल रहा तनाव है।


    रूस पर निर्भरता कम कर रहा है भारत

    पिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियारों की खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब रूस के बजाय पश्चिमी देशों (खासकर फ्रांस, इजरायल और अमेरिका) की ओर रुख कर रहा है। 2011-15 के दौरान भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 70% थी, जो 2016-20 में घटकर 51% और 2021-25 में 40% रह गई है। इसके बावजूद, वर्तमान में भारत को सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति करने वाले शीर्ष तीन देश रूस, फ्रांस और इजरायल ही हैं।


    भविष्य की तैयारियां: रक्षा बजट 2026-27

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित की है: रक्षा बजट में 15% से अधिक की बढ़ोतरी की गई है।

    इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
    इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ का ‘पूंजीगत परिव्यय’ रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाएगा, जिसमें नए लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, आर्टिलरी गन, स्मार्ट हथियार, मिसाइलें, रॉकेट और कई तरह के मानव रहित (ड्रोन) सिस्टम खरीदना शामिल है।

  • भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता, 18 राज्यों के 151 जिले प्रभावित

    भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता, 18 राज्यों के 151 जिले प्रभावित


    नई दिल्ली।
    देश के कई राज्यों के भूजल (Groundwater) में यूरेनियम (Uranium) की खतरनाक मौजूदगी (Dangerous presence) सामने आई है। कई क्षेत्रों में पीने के पानी में भी यूरेनियम (Uranium) की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) के तय सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक है। कुल 14,377 नमूनों की जांच में यूरेनियम की सांद्रता 0 से 2,876 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई, जो डब्ल्यूएचओ की 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर सीमा से 96 गुना तक अधिक है।

    18 राज्यों के 151 जिले आंशिक रूप से इस समस्या से प्रभावित पाए गए हैं, जबकि पंजाब सबसे अधिक प्रभावित राज्य के रूप में सामने आया है। यह जानकारी सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की पहली राष्ट्रीय स्तर की निगरानी में सामने आई है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के अनुसार देश में पहली बार वर्ष 2019-20 में भूजल में यूरेनियम की राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी की गई। इसके तहत 14,377 भूजल नमूनों की जांच की गई, जिन्हें नियमित रूप से मॉनिटर किया जा रहा है।

    रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि कई क्षेत्रों में भूजल में यूरेनियम की सांद्रता सामान्य स्तर से काफी अधिक है, जिससे पेयजल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में यूरेनियम की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है। इसे पार्ट्स प्रति बिलियन यानी पीपीबी भी कहा जाता है। इसके विपरीत भारतीय मानक ब्यूरो ने अभी तक यूरेनियम के लिए कोई अलग मानक तय नहीं किया है।


    एईआरबी की 60 पीपीबी सीमा पर भी पंजाब शीर्ष पर

    परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर सीमा के आधार पर भी पंजाब सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहां 6 फीसदी कुओं में यूरेनियम की मात्रा 60 पीपीबी से अधिक पाई गई। दिल्ली में यह आंकड़ा 5 और हरियाणा में 4.4 फीसदी दर्ज किया गया।

    तेलंगाना में 2.6, आंध्र प्रदेश में 2, राजस्थान में 1.2 , छत्तीसगढ़ में 1.1, तमिलनाडु में 0.9, कर्नाटक में 0.7 , मध्य प्रदेश में 0.6 उत्तर प्रदेश में 0.4 तथा झारखंड में 0.25 फीसदी कुओं में यूरेनियम की सांद्रता एईआरबी द्वारा तय मानकों से अधिक मिली।


    स्वास्थ्य पर बढ़ी चिंता

    विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक यूरेनियम युक्त पानी के सेवन से सबसे अधिक असर किडनी पर पड़ता है, क्योंकि यूरेनियम एक रासायनिक रूप से विषैला तत्व भी है। इससे गुर्दों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, हड्डियों पर असर पड़ सकता है और लंबे समय में कैंसर जैसी आशंकाएं भी बढ़ सकती हैं, हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्यतः इसका रासायनिक विषाक्त प्रभाव विकिरण प्रभाव से अधिक गंभीर माना जाता है।

    बच्चों, गर्भवती महिलाओं और भूजल पर निर्भर ग्रामीण आबादी के लिए यह खतरा और अधिक संवेदनशील माना जाता है। खासतौर पर ग्रामीण और भूजल पर निर्भर आबादी के लिए यह स्थिति अधिक चिंता का विषय है।

  • बंगाल में हिंदुत्व को लेकर सियासी संग्राम शुरू, ‘जय महाकाली’ बनाम ‘जय श्रीराम’ का गूंज रहा नारा

    बंगाल में हिंदुत्व को लेकर सियासी संग्राम शुरू, ‘जय महाकाली’ बनाम ‘जय श्रीराम’ का गूंज रहा नारा


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय पहचान और वर्चस्व की लड़ाई में बदलती नजर आ रही है। ऊपर से चुनावी शोर और आरोप-प्रत्यारोप भले ही हावी हों, लेकिन भीतर ही भीतर हिंदुत्व की लहर एक अहम भूमिका निभाती दिख रही है। यह ऐसा कारक बन चुका है, जो स्थापित राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे रहा है और सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।

    राज्य की राजनीति अब पारंपरिक मुद्दों से आगे बढ़कर धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। यह मुकाबला एक तरह से शक्ति उपासना और ‘जय श्रीराम’ के नारों के बीच खिंचती रेखा जैसा बन गया है, जहां हर रैली और बयान का अलग राजनीतिक अर्थ निकाला जा रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंदिर दौरों को केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिणेश्वर, बेलूर मठ, मतुआ धाम और कालीघाट जैसे प्रमुख स्थलों पर उनकी मौजूदगी ने राजनीतिक माहौल को नया आयाम दिया है। इसके चलते राज्य में ‘जय महाकाली’ के साथ ‘जय श्रीराम’ का नारा भी तेजी से राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनता जा रहा है।

    भाजपा का मानना है कि पहले चरण के मतदान में मतदाताओं की सक्रियता बदलाव के संकेत दे रही है। पार्टी रणनीतिकार इसे मौन मतदाता की प्रतिक्रिया के रूप में देख रहे हैं, जो भविष्य के परिणामों को प्रभावित कर सकती है। चुनावी रणनीति के स्तर पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने खुद मैदान में उतरकर कमान संभाली है। कोलकाता में लगातार सक्रिय रहते हुए वे उन क्षेत्रों पर फोकस कर रहे हैं, जहां पहले भाजपा की पकड़ कमजोर मानी जाती थी। उनके साथ संगठनात्मक स्तर पर सुनील बंसल बूथ प्रबंधन को मजबूत करने में जुटे हैं, जिससे पार्टी जमीनी स्तर पर अपनी स्थिति बेहतर करने की कोशिश कर रही है।

    जिन सीटों पर मुकाबला होना है, वे तृणमूल कांग्रेस का गढ़ मानी जाती हैं। पिछले चुनाव में भाजपा यहां सीमित सफलता हासिल कर सकी थी, लेकिन इस बार पार्टी को माहौल अपने पक्ष में बदलता नजर आ रहा है। सुरक्षा और चुनाव के बाद भी केंद्रीय बलों की मौजूदगी को लेकर दिए गए संदेश को भाजपा समर्थकों के लिए भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस चुनौती का जवाब अपनी अलग रणनीति से देने का प्रयास किया है। उन्होंने बंगाली अस्मिता और धार्मिक समावेश को केंद्र में रखते हुए प्रचार तेज किया है। मंदिरों में जाकर वे यह संदेश दे रही हैं कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को बाहरी नजरिये से नहीं समझा जा सकता।

    इस रणनीति में अभिषेक बनर्जी की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। वे युवाओं को जोड़ने के लिए नए तरीके अपना रहे हैं और भाजपा के खिलाफ आक्रामक अभियान चला रहे हैं। तृणमूल के अन्य नेता भी जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर चुनावी विमर्श को धार्मिक मुद्दों से हटाकर विकास, अधिकार और केंद्र-राज्य संबंधों की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में यह चुनाव अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रतीकों, पहचान और विचारधाराओं की टकराहट का रूप ले चुका है, जहां हर पक्ष अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है।

  • पीएम रैली से पहले बंगाल में तनाव चरम पर: जगद्दल बना रणक्षेत्र, देसी बमों से दहला इलाका..

    पीएम रैली से पहले बंगाल में तनाव चरम पर: जगद्दल बना रणक्षेत्र, देसी बमों से दहला इलाका..

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और इसी कड़ी में उत्तर 24 परगना जिले का जगद्दल इलाका अचानक हिंसा की चपेट में आ गया। प्रधानमंत्री की प्रस्तावित रैली से पहले हुई इस घटना ने पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया। रात और सुबह के बीच अचानक भड़की इस हिंसा ने राजनीतिक टकराव को और अधिक गंभीर बना दिया है।

    प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इलाके में पहले छोटे स्तर पर विवाद शुरू हुआ जो देखते ही देखते दो पक्षों के बीच टकराव में बदल गया। कुछ ही देर में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पत्थरबाजी शुरू हो गई और उसके बाद देसी बमों का इस्तेमाल होने लगा। धमाकों की आवाज से पूरा इलाका दहल उठा और स्थानीय लोग दहशत में अपने घरों से बाहर निकल आए।

    हिंसा की सूचना मिलते ही सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे, लेकिन हालात को नियंत्रित करना आसान नहीं रहा। जैसे ही पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल ने स्थिति संभालने की कोशिश की, उपद्रवियों ने उन पर भी हमला कर दिया। इस दौरान एक सुरक्षा जवान गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि दो अन्य लोग भी चोटिल हुए हैं। घायलों को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनका इलाज जारी है।

    घटना के बाद पूरे इलाके में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई है। संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त और रूट मार्च किया जा रहा है ताकि स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सके। प्रशासन ने इलाके में निगरानी बढ़ाते हुए संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी है।

    इस घटना को लेकर राजनीतिक माहौल भी गर्मा गया है। एक पक्ष का आरोप है कि यह हिंसा जानबूझकर माहौल खराब करने और चुनावी गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए की गई, जबकि दूसरे पक्ष ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि घटना की शुरुआत उकसावे के कारण हुई।

    लगातार हो रही ऐसी घटनाओं ने प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। प्रधानमंत्री की रैली को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। ड्रोन कैमरों और अतिरिक्त बलों की मदद से पूरे इलाके पर नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की नई घटना को रोका जा सके।

    फिलहाल जगद्दल में तनाव की स्थिति बनी हुई है और लोगों में डर का माहौल है। प्रशासन का कहना है कि स्थिति को सामान्य करने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं और दोषियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।