Category: National

  • यूपी पुलिस में 15 वरिष्ठ IPS अधिकारियों के तबादले, तरुण गाबा बने लखनऊ के नए पुलिस कमिश्नर

    यूपी पुलिस में 15 वरिष्ठ IPS अधिकारियों के तबादले, तरुण गाबा बने लखनऊ के नए पुलिस कमिश्नर


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस महकमे में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए 15 वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के तबादले किए हैं। इस बदलाव में तरुण गाबा को लखनऊ का नया पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया गया है, जबकि अशोक मुथा को पुलिस महानिदेशक (डीजी) अग्निशमन एवं आपात सेवाएं की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव पुलिस व्यवस्था को अधिक प्रभावी, जवाबदेह और सुचारु बनाने के उद्देश्य से किया गया है।

    तबादला सूची के अनुसार, मधुर अशोक जैन को पुलिस महानिदेशक मुख्यालय से स्थानांतरित कर पुलिस महानिदेशक अग्निशमन एवं आपात सेवाएं बनाया गया है। वहीं, लखनऊ के पुलिस आयुक्त अमरेंद्र कुमार सेंगर को पुलिस महानिरीक्षक (अभिसूचना) मुख्यालय भेजा गया है।

    राम कुमार को लखनऊ रेंज से गोरखपुर जोन का अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) नियुक्त किया गया है। नवीन अरोरा को तकनीकी सेवाओं से हटाकर वाराणसी जोन की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि पीयूष मोर्डिया को वाराणसी जोन से प्रयागराज का पुलिस आयुक्त बनाया गया है।

    इसी क्रम में संजय गुप्ता को पुलिस मुख्यालय से एडीजी कानून-व्यवस्था, धर्मेंद्र सिंह को प्रयागराज रेंज का पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) नियुक्त किया गया है। इसके अलावा मोहित गुप्ता, विनीत कुमार सिंह, राजेंद्र कुमार, आनंद प्रकाश तिवारी, अरुण कुमार सिंह और आनंद कुमार समेत अन्य अधिकारियों को भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।

    सरकार ने सभी स्थानांतरित अधिकारियों को जल्द से जल्द नई तैनाती पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए हैं। इस फेरबदल को प्रदेश की कानून-व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • युवा उद्यमिता को नई दिशा देने की तैयारी, 'यूथ अड्डा' से आत्मनिर्भरता पर यूपी सरकार का बड़ा फोकस

    युवा उद्यमिता को नई दिशा देने की तैयारी, 'यूथ अड्डा' से आत्मनिर्भरता पर यूपी सरकार का बड़ा फोकस


    नई दिल्ली । बदलती अर्थव्यवस्था और डिजिटल युग में युवाओं की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। पारंपरिक नौकरी की बजाय बड़ी संख्या में युवा अब स्टार्टअप, नवाचार, डिजिटल कारोबार और स्वरोजगार को अपने भविष्य के रूप में देख रहे हैं। इसी बदलते परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने युवाओं को उद्यमिता की ओर प्रोत्साहित करने के लिए ‘यूथ अड्डा’ पहल को विस्तार देने की दिशा में काम तेज किया है। इस पहल का उद्देश्य युवाओं को केवल रोजगार तलाशने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाला बनाना है।

    राज्य सरकार का मानना है कि आज की पीढ़ी केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उसे ऐसा मंच चाहिए जहां विचारों को व्यवसाय में बदलने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, तकनीकी सहयोग और बाजार तक पहुंच की सुविधा एक ही स्थान पर मिल सके। इसी सोच के साथ ‘यूथ अड्डा’ को एक समग्र उद्यमिता मंच के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां बिजनेस आइडिया से लेकर वित्तीय सहयोग और व्यवसाय विस्तार तक की पूरी प्रक्रिया में सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

    इस पहल का मुख्य फोकस विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, पॉलीटेक्निक संस्थानों और आईटीआई में पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर रखा गया है। सरकार चाहती है कि छात्र अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद केवल नौकरी की तलाश तक सीमित न रहें, बल्कि अपनी क्षमता और नवाचार के आधार पर नए उद्यम स्थापित करने की दिशा में भी आगे बढ़ें। इसके लिए उन्हें प्रारंभिक स्तर से ही व्यवसाय योजना तैयार करने, बाजार की जरूरतों को समझने और उद्यम संचालन की जानकारी दी जाएगी।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए इस मंच पर आधुनिक तकनीकों से जुड़े प्रशिक्षण पर भी विशेष जोर दिया गया है। युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रिक व्हीकल, डिजिटल कॉमर्स, ई-कॉमर्स और अन्य उभरती तकनीकों की जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार का उद्देश्य है कि प्रदेश के युवा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप अपने कौशल को विकसित कर सकें और भविष्य की तकनीकी आवश्यकताओं के लिए तैयार रहें।

    ‘यूथ अड्डा’ केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा। यहां युवाओं को व्यवसाय योजना तैयार करने, परियोजना रिपोर्ट बनाने, बैंक ऋण प्राप्त करने, उद्यम पंजीकरण, जीएसटी प्रक्रिया, डिजिटल ब्रांडिंग, ऑनलाइन मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़ने तक निरंतर सहयोग प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। साथ ही नए उद्यमियों के जोखिम को कम करने के लिए विभिन्न फ्रेंचाइजी मॉडल और अनुभवी विशेषज्ञों की मेंटरशिप भी उपलब्ध कराई जाएगी।

    राज्य सरकार इस पहल को केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रखना चाहती। लक्ष्य है कि ‘यूथ अड्डा’ की सुविधाएं प्रदेश के सभी 75 जिलों तक पहुंचें, ताकि ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को भी समान अवसर मिल सकें। महिला स्वयं सहायता समूहों, स्थानीय उत्पादों और सूक्ष्म उद्योगों को भी इस पहल से जोड़कर उन्हें पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन संबंधी सहयोग उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सके।

    इस मंच पर वर्षभर विभिन्न गतिविधियां आयोजित करने की भी योजना है। बैंकर्स मीट, स्टार्टअप क्लिनिक, टेक्नोलॉजी वर्कशॉप, बिजनेस आइडिएशन कार्यक्रम, फाउंडर्स टॉक और उद्योग विशेषज्ञों के संवाद जैसे आयोजन युवाओं को व्यावहारिक अनुभव और नेटवर्किंग का अवसर देंगे। सरकार ने वर्ष 2027 तक लाखों युवाओं को इस पहल से जोड़ने, हजारों नए उद्यम स्थापित कराने और बड़े स्तर पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

    सरकार का मानना है कि यदि युवा रोजगार मांगने की बजाय रोजगार उपलब्ध कराने वाले बनते हैं, तो इससे प्रदेश की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी। साथ ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को भी मजबूती मिलेगी और आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी। इसी उद्देश्य से विभिन्न विभागों, वित्तीय संस्थानों और उद्योग विशेषज्ञों के सहयोग से ‘यूथ अड्डा’ को एक दीर्घकालिक उद्यमिता इकोसिस्टम के रूप में विकसित किया जा रहा है।

  • लोकसभा में एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक पेश, जितेंद्र सिंह बोले- तेज जांच और त्वरित सजा होगी

    लोकसभा में एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक पेश, जितेंद्र सिंह बोले- तेज जांच और त्वरित सजा होगी

    नई दिल्ली । देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और संगठित परीक्षा घोटालों पर प्रभावी रोक लगाने के उद्देश्य से सरकार ने लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ अब पहले से अधिक सख्त और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

    उन्होंने बताया कि यह संशोधन वर्ष 2024 में लागू किए गए पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में सामने आए परीक्षा घोटालों ने लाखों अभ्यर्थियों का भरोसा प्रभावित किया है। इसलिए कानून को और मजबूत बनाकर ऐसी घटनाओं पर निर्णायक रोक लगाने की आवश्यकता महसूस की गई।

    विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों की व्यवस्था है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार पेपर लीक से जुड़े मामलों की जांच अधिकतम दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी। इसके बाद संबंधित अदालत को तीन महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाना होगा। इस प्रकार किसी भी मामले में घटना से लेकर न्यायिक निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया अधिकतम पांच महीने में पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

    सरकार ने अपील प्रक्रिया को भी समयबद्ध बनाने का प्रस्ताव रखा है। यदि कोई पक्ष अदालत के फैसले से असंतुष्ट होता है तो उसे 30 दिनों के भीतर अपील करनी होगी। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचने के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया है, जिससे दोषियों के खिलाफ शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

    लोकसभा में चर्चा के दौरान जितेंद्र सिंह ने कहा कि पेपर लीक की घटनाएं किसी एक राज्य या किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं रही हैं। विभिन्न राज्यों में समय-समय पर कई प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं। उनका कहना था कि सरकार ऐसे संगठित अपराधों को समाप्त करने के लिए व्यापक कानूनी ढांचा तैयार कर रही है ताकि भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहे।

    उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि अतीत में रेलवे भर्ती परीक्षा और चिकित्सा प्रवेश परीक्षाओं सहित कई बड़े पेपर लीक मामलों के बावजूद ठोस कानूनी व्यवस्था विकसित नहीं की गई। उनके अनुसार पहले गठित विभिन्न समितियों ने केंद्रीय परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की सिफारिशें की थीं, लेकिन उन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का गठन किया और वर्ष 2024 में इस विषय पर व्यापक कानून लागू किया।

    केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि सरकार विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों को लगातार लागू कर रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न विशेषज्ञ समूहों और टास्क फोर्स की अधिकांश प्रमुख सिफारिशों को पहले ही लागू किया जा चुका है, जबकि शेष सुझावों पर भी चरणबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है। उनका कहना था कि नई व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से अधिक सुरक्षित बनाना भी है।

    सरकार का मानना है कि यह संशोधन लाखों विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करेगा और प्रतियोगी परीक्षाओं में निष्पक्षता तथा पारदर्शिता को मजबूत करेगा। चर्चा के दौरान यह भी दोहराया गया कि परीक्षा प्रणाली में किसी भी प्रकार की अनियमितता या संगठित धोखाधड़ी को अब गंभीर अपराध माना जाएगा और दोषियों के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। सरकार ने विश्वास व्यक्त किया कि प्रस्तावित संशोधन से छात्रों का भरोसा और मजबूत होगा तथा भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।

  • CJP के वायरल जश्न वीडियो पर सोनम वांगचुक की नसीहत, सफलता के साथ जिम्मेदारी निभाने की दी सलाह

    CJP के वायरल जश्न वीडियो पर सोनम वांगचुक की नसीहत, सफलता के साथ जिम्मेदारी निभाने की दी सलाह

    नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कुछ सदस्यों द्वारा मनाए गए जश्न का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इस वीडियो को लेकर शुरू हुई बहस के बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी उपलब्धि या सफलता का उत्सव मनाना स्वाभाविक है, लेकिन उसके साथ विनम्रता, जिम्मेदारी और गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। उन्होंने समर्थकों से आग्रह किया कि किसी भी आंदोलन की सफलता को ऐसे तरीके से मनाया जाए जिससे उसके मूल उद्देश्य और सामाजिक संदेश की गंभीरता बनी रहे।

    वांगचुक का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब सोशल मीडिया पर CJP के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के जश्न मनाने वाले वीडियो व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं। वायरल वीडियो में पार्टी से जुड़े कुछ लोग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खुशी जाहिर करते और उत्सव मनाते दिखाई दे रहे हैं। इन दृश्यों को लेकर अलग-अलग वर्गों में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं और इसे लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हो गई है।

    सोनम वांगचुक ने कहा कि किसी भी संघर्ष का उद्देश्य केवल लक्ष्य प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में सामाजिक मूल्यों और नैतिक जिम्मेदारियों को भी बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार जीत तभी सार्थक मानी जाएगी जब उसमें विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान भी दिखाई दे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि किसी भी जन आंदोलन की विश्वसनीयता उसके समर्थकों के आचरण से भी तय होती है।

    हाल के दिनों में वांगचुक CJP के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। उन्होंने छात्रों की मांगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। बाद में उन्हें स्वास्थ्य कारणों से पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने 23 जुलाई को अपनी 26 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त की थी। यह निर्णय उस आश्वासन के बाद लिया गया, जिसमें प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करने और NEET पेपर लीक प्रकरण के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित सहायता देने की बात कही गई थी।

    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सामने आए जश्न के वीडियो पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे आंदोलन की सफलता पर युवाओं की स्वाभाविक खुशी बताया, जबकि कई अन्य लोगों ने इसे अनुचित समय पर किया गया उत्सव करार दिया। आलोचकों का कहना था कि आंदोलन की पृष्ठभूमि छात्रों की समस्याओं और परीक्षा प्रणाली से जुड़े गंभीर मुद्दों पर आधारित थी, इसलिए जश्न का स्वरूप अधिक संयमित होना चाहिए था।

    इस बीच CJP की ओर से भी पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया दी गई। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि वायरल वीडियो में युवाओं का उत्साह और उनकी अभिव्यक्ति का तरीका दिखाई देता है। उनके अनुसार नई पीढ़ी अपने विचार अलग-अलग माध्यमों से व्यक्त करती है और लोकतांत्रिक आंदोलनों में भागीदारी के तरीके समय के साथ बदलते रहते हैं। उन्होंने कहा कि युवा सड़क पर बैठकर, सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से या अन्य रचनात्मक तरीकों से भी अपनी बात समाज के सामने रख सकते हैं।

    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शुरू हुई इस बहस ने आंदोलन की शैली, सार्वजनिक व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर आंदोलन की उपलब्धियों पर समर्थकों में उत्साह दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर कई लोग यह भी मान रहे हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक सफलता का उत्सव संवेदनशीलता, संतुलन और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ मनाया जाना चाहिए।

  • प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में आठ राज्यों को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, जांच पर दिया जोर

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज और बल प्रयोग के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी करते हुए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं में तथ्यों की जांच होना आवश्यक है ताकि यह तय किया जा सके कि हिंसा किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार करना भी जरूरी है।

    मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था, लेकिन बाद में हिंसा की स्थिति कैसे बनी, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके पीछे दो संभावनाएं हो सकती हैं। पहली यह कि पुलिस की ओर से आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया हो और दूसरी यह कि प्रदर्शनकारियों के बीच ऐसे तत्व शामिल हो गए हों जिन्होंने जानबूझकर हिंसा भड़काने का प्रयास किया हो। अदालत ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में कहा कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग कानून का उल्लंघन करते हैं तो पुलिस उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन जहां तक संभव हो बल प्रयोग से बचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे पुलिसकर्मी मौजूद थे जो वर्दी में नहीं थे और उनके पास हथियार भी थे। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इन लोगों ने भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का इस्तेमाल किया।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह मांग भी रखी गई कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों की डिजिटल तकनीक के माध्यम से पहचान कर उसे सार्वजनिक करने पर रोक लगाई जानी चाहिए, क्योंकि प्रदर्शन में कई छात्र और नाबालिग भी शामिल थे। अदालत ने इन दलीलों को रिकॉर्ड पर लेते हुए व्यापक पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता जताई।

    सुनवाई के दौरान बिहार में प्रदर्शन से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया गया। एक अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वहां कई नाबालिगों, यहां तक कि कम उम्र के बच्चों को भी हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आए हैं। इसी दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने जुनैद से जुड़े मामले का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें प्रताड़ित किए जाने की शिकायत है। इस पर केंद्र की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यह अलग विषय है और इसे वर्तमान मामले से अलग देखा जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सहित आठ राज्यों को नोटिस जारी किया। इन राज्यों में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, असम, केरल और अन्य संबंधित राज्य शामिल हैं। अदालत ने कहा कि उसके समक्ष विभिन्न राज्यों से ऐसे मामले आए हैं जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जीवन के अधिकार और प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि लाठीचार्ज, पैलेट गन और आंसू गैस के इस्तेमाल से कुछ लोगों, जिनमें मीडिया कर्मी भी शामिल हैं, के घायल होने की बातें सामने आई हैं।

    सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित मामलों की जांच जारी रह सकती है, लेकिन फिलहाल किसी प्रकार की जल्दबाजी में कार्रवाई करने के बजाय पहले तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट मानक और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

  • बांकीपुर सीट पर फिर कमल खिलने का दावा, नितिन नवीन बोले- जनता का विश्वास आज भी BJP के साथ

    बांकीपुर सीट पर फिर कमल खिलने का दावा, नितिन नवीन बोले- जनता का विश्वास आज भी BJP के साथ


    नई दिल्ली । 
    बिहार की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मतदान से पहले भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी की जीत का विश्वास जताते हुए कहा कि बांकीपुर की जनता का लंबे समय से भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर भरोसा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के लोगों का समर्थन इस बार भी भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में दिखाई देगा और विकास के मुद्दे पर जनता एक बार फिर पार्टी के साथ खड़ी होगी।

    नितिन नवीन ने कहा कि बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का जनाधार कई दशकों से मजबूत रहा है। उनके अनुसार यह विश्वास केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता और पार्टी के बीच लगातार बने संबंधों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा के समय से ही इस क्षेत्र में भाजपा को व्यापक जनसमर्थन मिलता रहा है और पार्टी ने हमेशा जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करने का प्रयास किया है।

    उन्होंने दावा किया कि भाजपा ने राजनीति को सेवा और विकास के माध्यम के रूप में आगे बढ़ाया है। उनका कहना था कि जनता ने हमेशा उन कार्यों को महत्व दिया है जिनका सीधा लाभ क्षेत्र के लोगों को मिला। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस बार भी मतदाता विकास, सुशासन और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता देते हुए भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा के पक्ष में मतदान करेंगे।

    विपक्षी दलों की चुनौती से जुड़े सवाल पर नितिन नवीन ने कहा कि लोकतंत्र में हर दल को चुनाव लड़ने का अधिकार है, लेकिन जनता अंततः उसी उम्मीदवार और दल का चयन करती है जिसने क्षेत्र के विकास के लिए लगातार कार्य किया हो। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इस विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक रहे हैं और अपने कार्यकाल के दौरान विकास परियोजनाओं तथा जनसुविधाओं को प्राथमिकता दी गई। उनका मानना है कि यही काम भाजपा के पक्ष में सकारात्मक माहौल तैयार करेगा।

    उन्होंने बिहार के राजनीतिक और प्रशासनिक हालात का भी उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य ने पिछले वर्षों में विकास और सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव देखा है। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था में कानून-व्यवस्था और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया है। उन्होंने कहा कि यदि जनता एक बार फिर भाजपा को समर्थन देती है तो विकास कार्यों की गति और तेज होगी तथा क्षेत्र में नई योजनाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।

    बांकीपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को मतदान प्रस्तावित है, जबकि मतगणना 3 अगस्त को होगी। यह उपचुनाव इसलिए कराया जा रहा है क्योंकि नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट रिक्त हो गई थी। वह इस क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक रहे हैं, जबकि उनके पिता भी कई बार इसी सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। वर्ष 1995 से यह सीट भाजपा के कब्जे में रही है, जिससे इस चुनाव का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।

    इस बार मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है। भाजपा ने नीरज सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा है। वहीं जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर भी चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में सभी दलों ने चुनाव प्रचार तेज कर दिया है और अब राजनीतिक दलों के साथ-साथ मतदाताओं की नजर भी 30 जुलाई के मतदान और 3 अगस्त को घोषित होने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। यही नतीजे तय करेंगे कि बांकीपुर की जनता इस बार किस उम्मीदवार और किस राजनीतिक दल पर अपना भरोसा जताती है।

  • जंतर-मंतर प्रदर्शन में भोजन व्यवस्था संभालने वाले जुनैद की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, परिवार को परेशान करने का लगाया आरोप

    जंतर-मंतर प्रदर्शन में भोजन व्यवस्था संभालने वाले जुनैद की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, परिवार को परेशान करने का लगाया आरोप

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर आयोजित CJP प्रदर्शन से जुड़े मोहम्मद जुनैद ने पुलिस द्वारा कथित उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने शीर्ष अदालत में दायर अपनी याचिका में दावा किया है कि उन्हें और उनके परिवार को लगातार परेशान किया जा रहा है। याचिका में न्यायालय से हस्तक्षेप कर उचित संरक्षण और राहत देने की मांग की गई है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब प्रदर्शन से जुड़े कई पहलुओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा जारी है।

    याचिका के अनुसार, जुनैद का आरोप है कि पुलिस उन्हें दिल्ली से अपने साथ ले गई और कई घंटे तक अपने कब्जे में रखने के बाद हरिद्वार के पास छोड़ दिया। उनका कहना है कि इस दौरान उन्हें कथित रूप से धमकाया भी गया। उन्होंने अदालत को बताया कि इस पूरी घटना के कारण वे मानसिक दबाव में हैं और उन्हें अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।

    जुनैद ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस की कार्रवाई केवल उनके तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी परेशान किया जा रहा है। उनके अनुसार, उनके पिता से पूछताछ की गई और उनकी बहन के ससुराल पक्ष के लोगों को भी अनावश्यक रूप से परेशान किया गया। उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराई जाए और उनके परिवार को किसी भी प्रकार के कथित उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की जाए।

    मोहम्मद जुनैद उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के नाहल गांव के निवासी हैं। CJP प्रदर्शन के दौरान उनकी भूमिका मुख्य रूप से आंदोलन में शामिल लोगों के लिए भोजन और पीने के पानी जैसी आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने की रही। शुरुआत में वे सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देते थे और पर्दे के पीछे रहकर व्यवस्थाएं संभालते थे, लेकिन प्रदर्शन के अंतिम चरण में उनकी पहचान प्रतिभागियों के बीच एक प्रमुख सहयोगी के रूप में बनने लगी।

    बताया गया है कि उन्होंने आंदोलन के भीतर कोई औपचारिक पद नहीं संभाला था। उनकी जिम्मेदारी प्रदर्शन स्थल पर आने वाले लोगों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना और व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखना थी। इसी भूमिका के कारण उनका नाम उस समय चर्चा में आया, जब पुलिस उनके घर पहुंची और तलाशी की कार्रवाई की गई।

    परिवार का कहना है कि तलाशी के दौरान कुछ दस्तावेज भी अपने कब्जे में लिए गए। उनके अनुसार, पुलिस उनके पिता को पूछताछ के लिए थाने भी लेकर गई थी। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके रिश्तेदारों को भी अलग-अलग स्थानों पर परेशान किया गया, जिससे पूरे परिवार में चिंता का माहौल बना हुआ है।

    दूसरी ओर, संबंधित पुलिस अधिकारियों की ओर से पहले इन आरोपों का खंडन किया जा चुका है। विशेष रूप से मेरठ में रिश्तेदारों को हिरासत में लेने या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई के दावों को पुलिस ने अस्वीकार करते हुए कहा था कि संबंधित थानों में ऐसी किसी कार्रवाई का रिकॉर्ड नहीं मिला। इस कारण मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं।

    अब इस पूरे प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके निर्देश महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अदालत याचिका में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध तथ्यों और संबंधित पक्षों के जवाब पर विचार करने के बाद आगे की प्रक्रिया तय करेगी। ऐसे में इस मामले की अगली सुनवाई और न्यायालय की टिप्पणी पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • 2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    2027 के विधानसभा चुनावों में कितना असर दिखाएंगे Gen Z, युवाओं की बढ़ती ताकत पर टिकी राजनीतिक दलों की नजर

    नई दिल्ली । हाल के वर्षों में देश में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेष रूप से हालिया छात्र आंदोलनों और सोशल मीडिया अभियानों के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनावों में Gen Z मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। राजनीतिक दल भी इस वर्ग को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए अलग-अलग स्तर पर युवाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    Gen Z में वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को शामिल किया जाता है। वर्ष 2026 के हिसाब से इस वर्ग की उम्र लगभग 14 से 29 वर्ष के बीच है। देश में इनकी आबादी करीब 37 करोड़ बताई जाती है, जबकि 18 वर्ष से अधिक आयु वाले मतदाताओं में भी इस वर्ग की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। यही कारण है कि आने वाले चुनावों में युवा मतदाता राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण समूह बनकर उभरे हैं।

    उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में वर्ष 2027 के दौरान विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इन राज्यों में बड़ी संख्या में युवा मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे। उत्तर प्रदेश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग चार करोड़ मतदाता हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 30 प्रतिशत माने जा रहे हैं। इसके अलावा पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

    पंजाब में भी बड़ी संख्या में युवा मतदाताओं की मौजूदगी को देखते हुए राजनीतिक दल उन्हें साधने की तैयारी में हैं। कई दल युवा उम्मीदवारों को अधिक अवसर देने और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं उत्तराखंड में भी युवा मतदाता कुल मतदाताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिससे चुनावी मुकाबले में उनकी भूमिका अहम मानी जा रही है।

    गुजरात में भी युवा मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। राज्य में 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल संगठन और नेतृत्व स्तर पर युवाओं को अधिक जिम्मेदारियां देने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। वहीं गोवा में भी नए मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे युवा वर्ग का चुनावी महत्व और बढ़ गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Gen Z की कार्यशैली पारंपरिक राजनीति से अलग है। यह वर्ग सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन संवाद के माध्यम से अपनी राय व्यक्त करने में अधिक सक्रिय रहता है। कई सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर डिजिटल अभियानों में युवाओं की भागीदारी ने यह संकेत दिया है कि वे केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि युवा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थन आधार नहीं माने जा सकते। यह वर्ग रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता, अवसर और शासन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देता है तथा परिस्थितियों के अनुसार अपना चुनावी निर्णय बदल सकता है। इसी कारण अधिकांश राजनीतिक दल युवाओं से जुड़े विषयों को अपने चुनावी एजेंडे में प्रमुख स्थान देने की तैयारी कर रहे हैं।

    हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि Gen Z अकेले चुनावी परिणाम तय कर देगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कई राज्यों में युवा मतदाता मुकाबले को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा होंगे कि युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी किस हद तक चुनावी नतीजों और राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करती है।

  • राजस्थान में निकाय और पंचायत चुनाव में 50% टिकट 50 साल से कम उम्र के नेताओं को देगी कांग्रेस

    राजस्थान में निकाय और पंचायत चुनाव में 50% टिकट 50 साल से कम उम्र के नेताओं को देगी कांग्रेस


    जयपुर। राजस्थान में होने वाले निकाय और पंचायत चुनावों से पहले कांग्रेस ने युवाओं को आगे बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने घोषणा की कि पार्टी शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में 50 वर्ष से कम आयु के उम्मीदवारों को 50 प्रतिशत टिकट देगी।

    पार्टी मुख्यालय में शहरी निकाय चुनावों की तैयारियों की समीक्षा बैठक के दौरान डोटासरा ने कहा कि कांग्रेस संगठन में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें नेतृत्व का अवसर देने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है।

    उन्होंने टिकट के दावेदारों को यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि केवल आवेदन करने से टिकट की गारंटी नहीं होगी। उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय परिस्थितियों, संगठन की जरूरतों और जीत की संभावनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।

    डोटासरा ने वार्ड बदलकर टिकट मांगने की प्रवृत्ति पर भी नाराजगी जताते हुए कहा कि एक वार्ड से दूसरे वार्ड में जाकर दावेदारी करने को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। टिकट वितरण पूरी तरह संगठनात्मक मानकों और स्थानीय समीकरणों के आधार पर होगा।

    राज्य चुनाव आयोग के अनुसार, पंचायत चुनावों की अधिसूचना 23 सितंबर के आसपास जारी होने की संभावना है। मतदान 13 अक्टूबर से 5 नवंबर के बीच विभिन्न चरणों में कराया जा सकता है, जबकि मतगणना 12 नवंबर तक पूरी होने की उम्मीद है।

    वहीं, शहरी निकाय चुनावों की घोषणा 17 अगस्त के आसपास होने की संभावना है। प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार 6 और 9 सितंबर को मतदान तथा 11 सितंबर को मतगणना कराई जा सकती है। हालांकि, अंतिम कार्यक्रम चुनाव आयोग की आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही तय होगा।

  • कोविड महामारी के दौरान मिले केंद्रीय कोष और उपकरणों के अप्रयुक्त रहने तथा वित्तीय अनियमितताओं पर विपक्षी दल ने जताई आपत्ति

    कोविड महामारी के दौरान मिले केंद्रीय कोष और उपकरणों के अप्रयुक्त रहने तथा वित्तीय अनियमितताओं पर विपक्षी दल ने जताई आपत्ति

    नई दिल्ली । राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत की गई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नवीनतम रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। प्रतिवेदन में स्वास्थ्य सेवाओं, प्राकृतिक आपदा राहत वितरण तथा बजटीय आवंटन के निष्पादन में कई स्तरों पर पाई गई कमियों को रेखांकित किया गया है। महामारी के संवेदनशील दौर में उपलब्ध कराए गए संसाधनों के पूर्ण उपयोग न होने और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में अनुपालन की अनिमितताओं पर विपक्षी दलों ने कड़ा रुख अपनाते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है।

    लेखा परीक्षा रिपोर्ट के मुख्य अंशों के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटित बजट का एक बड़ा हिस्सा निर्धारित समय सीमा तक अप्रयुक्त पड़ा रहा। वैश्विक महामारी के समय उपलब्ध कराए गए महत्वपूर्ण चिकित्सा संसाधनों, जैसे ऑक्सीजन संयंत्रों और सघन चिकित्सा इकाई उपकरणों के कई केंद्रों पर चालू न होने का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त, गंभीर प्राकृतिक आपदाओं के उपरांत राहत राशि के पुनरावृत्त वितरण के मामले भी सामने आए हैं, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा। इन निष्कर्षों ने आपदा प्रबंधन और लाभार्थी सत्यापन प्रणालियों की दक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    प्रतिवेदन में औद्योगिक विकास हेतु भूमि आवंटन और विभिन्न राज्य स्तरीय कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में भी प्रक्रियागत त्रुटियों की ओर संकेत किया गया है। निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन न होने से हुए वित्तीय नुकसान के साथ-साथ राज्य के समग्र राजकोषीय घाटे और बढ़ते ऋण भार को लेकर चिंता जताई गई है। बजट के एक बड़े हिस्से का वर्ष के अंत तक बिना खर्च हुए रह जाना और अतिरिक्त व्यय के लिए आवश्यक विधायी स्वीकृतियों के लंबित रहने को वित्तीय अनुशासन के दृष्टिकोण से गंभीर माना जा रहा है।

    संसदीय पटल पर रिपोर्ट की प्रति रखे जाने के उपरांत मुख्य विपक्षी दल ने इन निष्कर्षों को प्रशासनिक विफलता करार देते हुए कड़े दंडात्मक कदमों की मांग की है। विपक्षी प्रतिनिधियों का कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाओं में पाई गई यह ढिलाई राज्य के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, प्रशासनिक सूत्रों का तर्क है कि ऑडिट रिपोर्ट में उठाए गए अधिकांश बिंदु प्रक्रियागत और तकनीकी प्रकृति के हैं, जिन पर विभागीय समीक्षा के माध्यम से स्थिति स्पष्ट की जाएगी। फिलहाल, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।