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  • शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद सियासी संग्राम तेज, विपक्ष में श्रेय की होड़

    शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद सियासी संग्राम तेज, विपक्ष में श्रेय की होड़


    नई दिल्ली।
    नीट पेपर लीक विवाद और छात्रों के आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है। आंदोलन समाप्त होने के साथ ही कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच इस घटनाक्रम का राजनीतिक श्रेय लेने की प्रतिस्पर्धा तेज होती दिखाई दे रही है। विपक्षी दल इसे युवाओं के मुद्दे पर अपनी राजनीतिक बढ़त के रूप में पेश करने में जुटे हैं।

    उत्तर प्रदेश और पंजाब की आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए विपक्षी दल छात्र आंदोलन को चुनावी मुद्दे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव युवाओं और रोजगार के मुद्दों को प्रमुखता दे रहे हैं, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी भी परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक के मुद्दे को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना रही है।

    उत्तर प्रदेश और पंजाब पर विपक्ष की नजर

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को आगामी चुनावों तक जीवित रखना चाहती हैं। वहीं पंजाब में भी युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर राजनीतिक दल सक्रिय नजर आ रहे हैं।

    राहुल गांधी और अखिलेश यादव की हालिया मुलाकात को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों दल परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं।

    प्रधानमंत्री ने परीक्षा सुधारों का किया ऐलान

    इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि पेपर लीक रोकने के लिए कठोर कानूनी प्रावधान किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में एक हाई-पावर टास्क फोर्स गठित की गई है।

    प्रधानमंत्री के अनुसार, यह समिति परीक्षा सुधारों, तकनीकी सुरक्षा और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करने के लिए सुझाव देगी, ताकि भविष्य में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।

    आंदोलन के बाद श्रेय की राजनीति

    शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने आंदोलन की सफलता का श्रेय राहुल गांधी के नेतृत्व को दिया। दिल्ली में राहुल गांधी के समर्थन में पोस्टर भी लगाए गए। वहीं कांग्रेस नेताओं ने छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार हमला बोला।

    राहुल गांधी ने संसद के भीतर और बाहर पेपर लीक तथा परीक्षा प्रणाली के मुद्दे को उठाया, जबकि प्रियंका गांधी ने भी प्रदर्शन कर सरकार को घेरा। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी छात्रों के समर्थन में विरोध दर्ज कराया।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छात्र आंदोलन अब केवल परीक्षा सुधार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों की आगामी चुनावी राजनीति में भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है। विपक्षी दल इसे युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं, जबकि केंद्र सरकार परीक्षा सुधारों और नई कानूनी व्यवस्था के जरिए भरोसा बहाल करने की कोशिश में जुटी है।

  • पेपर लीक पर केंद्र का बड़ा दांव: नंदन नीलेकणि की अगुआई में 6 सदस्यीय हाई-पावर टास्क फोर्स, पूर्व ISRO प्रमुख और पूर्व IB निदेशक भी शामिल

    पेपर लीक पर केंद्र का बड़ा दांव: नंदन नीलेकणि की अगुआई में 6 सदस्यीय हाई-पावर टास्क फोर्स, पूर्व ISRO प्रमुख और पूर्व IB निदेशक भी शामिल


    नई दिल्ली।
    देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में छह सदस्यीय हाई-पावर टास्क फोर्स का गठन किया है। इस समिति का उद्देश्य नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) समेत देश की परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत बनाना है।

    समिति में अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा, खुफिया तंत्र, शिक्षा प्रशासन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों के अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। सरकार का लक्ष्य प्रश्नपत्रों की तैयारी, परिवहन, परीक्षा संचालन और मूल्यांकन प्रक्रिया में सुरक्षा की बहुस्तरीय व्यवस्था विकसित करना है।

    समिति में शामिल प्रमुख सदस्य

    नंदन नीलेकणि (अध्यक्ष)

    आधार परियोजना के प्रमुख वास्तुकार और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि समिति का नेतृत्व करेंगे। वे डिजिटल ढांचे को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने की रणनीति तैयार करेंगे।

    एस. सोमनाथ (पूर्व अध्यक्ष, इसरो)

    चंद्रयान-3 मिशन के नेतृत्व के लिए चर्चित रहे पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ परीक्षा प्रणाली को वैज्ञानिक और त्रुटिरहित बनाने के लिए तकनीकी सुझाव देंगे। उनका फोकस प्रक्रियाओं को अधिक विश्वसनीय और जोखिम-मुक्त बनाने पर रहेगा।

    तपन डेका (पूर्व निदेशक, इंटेलिजेंस ब्यूरो)

    आंतरिक सुरक्षा और खुफिया मामलों के विशेषज्ञ तपन डेका प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और संगठित पेपर लीक नेटवर्क की पहचान एवं रोकथाम से जुड़े सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने में योगदान देंगे।

    प्रो. वी. कामाकोटी (निदेशक, IIT मद्रास)

    साइबर सुरक्षा और स्वदेशी प्रोसेसर तकनीक के विशेषज्ञ प्रो. कामाकोटी परीक्षा से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म, सॉफ्टवेयर और डाटा सुरक्षा को मजबूत करने के उपाय सुझाएंगे। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित सुरक्षा तंत्र विकसित करने पर भी उनका ध्यान रहेगा।

    अनीता करवाल (पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव)

    पूर्व केंद्रीय शिक्षा सचिव और सीबीएसई की पूर्व अध्यक्ष अनीता करवाल प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए परीक्षा संचालन से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करेंगी।

    अमृत लाल मीणा (लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ)

    वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अमृत लाल मीणा प्रश्नपत्रों की छपाई, सुरक्षित परिवहन और वितरण प्रणाली को आधुनिक तकनीक के माध्यम से अधिक सुरक्षित बनाने की रणनीति तैयार करेंगे। जीपीएस ट्रैकिंग और डिजिटल सुरक्षा उपायों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है।

    परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार पर फोकस

    सरकार का मानना है कि यह टास्क फोर्स परीक्षा प्रणाली के प्रत्येक चरण की समीक्षा कर सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए ठोस सिफारिशें देगी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर एनटीए और अन्य राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों के कामकाज में संरचनात्मक बदलाव किए जाने की संभावना है, ताकि भविष्य में पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

  • कॉन्स्टिट्यूशन क्लब की दो बैठकों ने बदली संवाद की तस्वीर, छात्र आंदोलन के बाद सरकार की रणनीति में दिखा बदलाव

    कॉन्स्टिट्यूशन क्लब की दो बैठकों ने बदली संवाद की तस्वीर, छात्र आंदोलन के बाद सरकार की रणनीति में दिखा बदलाव

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय राजधानी में शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए छात्र आंदोलन के बाद सरकार और प्रदर्शनकारी प्रतिनिधियों के बीच हुई दो बैठकों ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दिया है। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित इन बैठकों की तस्वीरों और उनके माहौल को लेकर यह माना जा रहा है कि संवाद की शैली और प्रस्तुति में स्पष्ट बदलाव देखने को मिला। पहली बैठक और बाद की बैठक के दृश्य सोशल मीडिया तथा राजनीतिक विश्लेषण का विषय बने रहे, जहां दोनों पक्षों के बीच बातचीत के तौर-तरीकों में अंतर महसूस किया गया।

    पहली बैठक उस समय हुई थी जब छात्र आंदोलन अपने शुरुआती चरण में था। बैठक की तस्वीरों में सरकारी प्रतिनिधि और प्रदर्शनकारी अलग-अलग प्रकार की बैठकों की व्यवस्था में नजर आए, जिसे लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इसके बाद आंदोलन लगातार जारी रहा और प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से दबाव बनाए रखा। समय के साथ सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच एक और दौर की बातचीत हुई, जिसमें बैठक की व्यवस्था और दोनों पक्षों के व्यवहार को लेकर अलग तस्वीर सामने आई।

    दूसरी बैठक में प्रतिनिधियों के बीच बातचीत अपेक्षाकृत अधिक सहज वातावरण में होती दिखाई दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संवाद के इस बदले हुए स्वरूप ने यह संकेत दिया कि लंबे समय तक चले आंदोलन और सार्वजनिक दबाव के बाद वार्ता की प्रक्रिया अधिक संतुलित दिखाई देने लगी। हालांकि सरकार की ओर से इस बदलाव को लेकर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई, लेकिन बैठक की तस्वीरों और माहौल को लेकर व्यापक चर्चा होती रही।

    इस पूरे घटनाक्रम के दौरान छात्र आंदोलन लगातार अपने मूल मुद्दों पर केंद्रित रहा। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा व्यवस्था, जवाबदेही और शिक्षा प्रणाली से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाया। आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना था कि उनका उद्देश्य केवल निर्धारित मांगों पर समाधान प्राप्त करना है। दूसरी ओर, सरकार की ओर से भी समय-समय पर वार्ता के माध्यम से स्थिति को सामान्य बनाने का प्रयास किया गया।

    इस आंदोलन की एक विशेषता यह भी रही कि सोशल मीडिया ने इसकी पहुंच को काफी व्यापक बनाया। विभिन्न डिजिटल मंचों पर आंदोलन से जुड़े वीडियो, तस्वीरें और संदेश बड़ी संख्या में साझा किए गए। इससे बड़ी संख्या में युवाओं और छात्रों तक आंदोलन की जानकारी पहुंची। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों ने इस बार जनसमर्थन जुटाने और मुद्दों को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    राजनीतिक दलों की सक्रियता भी इस दौरान बढ़ती दिखाई दी। कई विपक्षी नेताओं ने छात्रों की मांगों का समर्थन किया, जबकि सरकार ने संवाद और प्रशासनिक कदमों के जरिए स्थिति संभालने का प्रयास किया। इस घटनाक्रम ने यह भी संकेत दिया कि शिक्षा और रोजगार जैसे विषय युवाओं के बीच महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं और इनसे जुड़े आंदोलनों का प्रभाव राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद, परामर्श और शांतिपूर्ण बातचीत किसी भी विवाद के समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई दोनों बैठकों ने यह दिखाया कि किसी भी लंबे आंदोलन के दौरान वार्ता की प्रक्रिया समय के साथ बदल सकती है। आने वाले समय में शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार तथा संबंधित पक्षों के बीच होने वाले संवाद पर भी सभी की नजर बनी रहेगी।

  • कैब में छूटा वॉलेट संभालकर रखा, बेंगलुरु के ड्राइवर की ईमानदारी ने सोशल मीडिया पर जीता दिल

    कैब में छूटा वॉलेट संभालकर रखा, बेंगलुरु के ड्राइवर की ईमानदारी ने सोशल मीडिया पर जीता दिल

    नई दिल्ली । तेज रफ्तार जिंदगी में जहां अक्सर खोई हुई चीजों के वापस मिलने की उम्मीद कम ही रहती है, वहीं बेंगलुरु से सामने आई एक घटना ने लोगों का भरोसा ईमानदारी और मानवीय मूल्यों पर फिर मजबूत कर दिया है। एक कैब ड्राइवर ने अपनी गाड़ी में छूटे यात्री के बटुए को चार दिन तक सुरक्षित संभालकर रखा और बाद में उसे सही-सलामत उसके मालिक को लौटा दिया। इस घटना की चर्चा सोशल मीडिया पर तेजी से हो रही है और लोग ड्राइवर की जिम्मेदारी तथा ईमानदारी की सराहना कर रहे हैं।

    पूरा मामला तब सामने आया जब एक यात्री ने सोशल मीडिया मंच पर अपना अनुभव साझा किया। उसने बताया कि कुछ दिन पहले वह कैब से अपने घर पहुंचा था। घर लौटने के बाद वह अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गया और उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि उसका बटुआ कैब में ही छूट गया है। करीब चार दिन बाद जब उसे अपने वॉलेट की जरूरत पड़ी, तब उसे एहसास हुआ कि वह उसके पास नहीं है।

    स्थिति का पता चलते ही यात्री ने कैब ड्राइवर से संपर्क किया। ड्राइवर ने बातचीत के दौरान बताया कि वाहन उस समय धुलाई के लिए गया हुआ है, लेकिन वह पूरी कोशिश करेगा कि बटुआ खोजकर यात्री को वापस दिया जा सके। ड्राइवर ने न तो कोई बहाना बनाया और न ही जिम्मेदारी से पीछे हटने की कोशिश की, बल्कि पूरे मामले को गंभीरता से लिया।

    कुछ घंटों बाद ड्राइवर ने स्वयं यात्री को फोन कर जानकारी दी कि गाड़ी की जांच के दौरान उसे बटुआ मिल गया है। यह सूचना मिलते ही यात्री ने राहत की सांस ली। बाद में बटुआ उसे सुरक्षित लौटा दिया गया। यात्री ने बताया कि बटुए में रखी जरूरी वस्तुएं और अन्य सामान भी सुरक्षित थे, जिससे उसे बड़ी परेशानी से बचने का अवसर मिला।

    इस अनुभव से प्रभावित होकर यात्री ने अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा की। उसने लिखा कि आज के समय में ऐसी ईमानदारी दुर्लभ होती जा रही है और कैब ड्राइवर के इस व्यवहार ने उसका लोगों पर भरोसा बढ़ा दिया। उसने ड्राइवर की जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और पेशेवर व्यवहार की खुलकर प्रशंसा की।

    पोस्ट सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने लिखा कि उनके साथ भी अलग-अलग शहरों में इसी तरह के सकारात्मक अनुभव हुए हैं, जहां टैक्सी या कैब चालकों ने खोई हुई वस्तुएं लौटाकर भरोसे की मिसाल पेश की। कुछ लोगों ने कहा कि समाज में ऐसे ईमानदार लोग ही इंसानियत की पहचान बनाए रखते हैं और उनके छोटे-छोटे कार्य दूसरों को भी सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में यात्रियों और सेवा प्रदाताओं के बीच विश्वास सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। जब चालक अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाते हैं, तो इससे न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि मजबूत होती है बल्कि पूरे सेवा क्षेत्र की विश्वसनीयता भी बढ़ती है। बेंगलुरु की यह घटना इसी विश्वास का एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आई है, जिसने यह संदेश दिया है कि ईमानदारी और जिम्मेदारी आज भी समाज में जीवित हैं और ऐसे कार्य लोगों के दिलों में लंबे समय तक अपनी जगह बना लेते हैं।

  • शेयर बाजार में तेज गिरावट का असर, देश की शीर्ष 10 में से केवल एक कंपनी का मार्केटकैप बढ़ा

    शेयर बाजार में तेज गिरावट का असर, देश की शीर्ष 10 में से केवल एक कंपनी का मार्केटकैप बढ़ा

    नई दिल्ली । वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता और घरेलू शेयर बाजार में लगातार बिकवाली के दबाव का असर देश की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों पर भी साफ दिखाई दिया। बीते कारोबारी सप्ताह में भारत की शीर्ष 10 कंपनियों में से नौ के संयुक्त बाजार पूंजीकरण में लगभग 2.74 लाख करोड़ रुपए की कमी दर्ज की गई। निवेशकों की सतर्कता और व्यापक मुनाफावसूली के कारण अधिकांश प्रमुख कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखने को मिली, जिससे उनके मार्केटकैप पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

    20 से 24 जुलाई के कारोबारी सप्ताह के दौरान भारतीय शेयर बाजार में कमजोरी का माहौल बना रहा। इस अवधि में सेंसेक्स 2,091.68 अंक यानी 2.68 प्रतिशत गिरकर 76,059.77 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 566.85 अंक यानी 2.33 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,767.45 पर आ गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, निवेशकों की सतर्क रणनीति और व्यापक बिकवाली ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया।

    बाजार पूंजीकरण के लिहाज से सबसे अधिक नुकसान एचडीएफसी बैंक को हुआ। सप्ताह के दौरान बैंक के मार्केटकैप में 1.18 लाख करोड़ रुपए से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज को भी बड़ा झटका लगा, जिसके बाजार पूंजीकरण में 65 हजार करोड़ रुपए से अधिक की कमी आई। देश की सबसे मूल्यवान सूचीबद्ध कंपनी होने के बावजूद रिलायंस का शीर्ष स्थान बरकरार रहा, लेकिन बाजार मूल्य में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

    अन्य प्रमुख कंपनियों में भारतीय स्टेट बैंक, बजाज फाइनेंस, आईसीआईसीआई बैंक, भारती एयरटेल, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, लार्सन एंड टुब्रो और भारतीय जीवन बीमा निगम के बाजार पूंजीकरण में भी कमी आई। इन कंपनियों के शेयरों में आई गिरावट का असर निवेशकों की संपत्ति पर भी दिखाई दिया। बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी और औद्योगिक क्षेत्र की कंपनियां इस सप्ताह बिकवाली के दबाव में रहीं।

    दूसरी ओर, शीर्ष 10 कंपनियों में केवल हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड ऐसी कंपनी रही, जिसके बाजार पूंजीकरण में मामूली बढ़त दर्ज की गई। हालांकि यह वृद्धि कुल गिरावट की तुलना में काफी सीमित रही और समग्र रूप से शीर्ष कंपनियों के संयुक्त मूल्यांकन पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

    सप्ताह के अंत तक बाजार पूंजीकरण के आधार पर रिलायंस इंडस्ट्रीज देश की सबसे मूल्यवान सूचीबद्ध कंपनी बनी रही। इसके बाद भारती एयरटेल, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, बजाज फाइनेंस, भारतीय जीवन बीमा निगम, लार्सन एंड टुब्रो तथा हिंदुस्तान यूनिलीवर का स्थान रहा। इन कंपनियों का प्रदर्शन भारतीय शेयर बाजार की समग्र दिशा का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक संकेतकों, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और आगामी कॉरपोरेट नतीजों पर बाजार की नजर बनी रहेगी। यदि वैश्विक परिस्थितियों में स्थिरता आती है और निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है, तो आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार में सुधार की संभावना बन सकती है। फिलहाल निवेशकों के लिए बाजार की चाल पर सतर्क निगरानी बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2028 विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का किया ऐलान, चुनावी राजनीति से संन्यास की घोषणा

    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2028 विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने का किया ऐलान, चुनावी राजनीति से संन्यास की घोषणा


    नई दिल्ली । 
    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया है कि वह वर्ष 2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने एक विस्तृत संदेश जारी कर अपने फैसले की जानकारी दी और कहा कि बढ़ती उम्र, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां तथा राजनीति में बढ़ते भ्रष्टाचार ने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव नहीं लड़ने के बावजूद वह सार्वजनिक जीवन और राजनीति में सक्रिय बने रहेंगे।

    सिद्धारमैया ने कहा कि वर्तमान राजनीतिक माहौल पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। उनके अनुसार, आज राजनीति में ईमानदारी और सिद्धांतों के साथ काम करना पहले से अधिक कठिन हो गया है। उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया में धनबल का प्रभाव बढ़ा है और अब चुनाव लड़ने के लिए परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि इसी बदलते माहौल को देखते हुए उन्होंने भविष्य में किसी भी चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनने का फैसला किया है।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि उनकी उम्र अब 79 वर्ष हो चुकी है और वर्तमान सरकार का कार्यकाल समाप्त होने तक उनकी आयु 81 से 82 वर्ष के बीच होगी। उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य और कार्यक्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है। पहले जैसी ऊर्जा और निरंतर सक्रियता बनाए रखना अब संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने समय रहते चुनावी राजनीति से अलग होने का निर्णय लिया है।

    उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी सार्वजनिक यात्रा वर्ष 1978 में तालुक बोर्ड सदस्य के रूप में शुरू हुई थी। पिछले लगभग पांच दशकों में उन्होंने जीत और हार दोनों का अनुभव किया, लेकिन हमेशा अपने सिद्धांतों और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ काम करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया और यही उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

    सिद्धारमैया ने यह भी बताया कि उनके निर्वाचन क्षेत्र वरुणा के लोग लगातार उनसे अगला चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदलने की बात कही। उनका कहना है कि वह जनता की भावनाओं का सम्मान करते हैं, लेकिन अब चुनावी राजनीति से पीछे हटना ही उचित मानते हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जनता की समस्याओं और सामाजिक मुद्दों को उठाने का उनका प्रयास आगे भी जारी रहेगा।

    उन्होंने अपने संदेश में राजनीति में बढ़ते आर्थिक प्रभाव पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि पहले चुनाव जनता के सहयोग और जनसमर्थन के बल पर लड़े जाते थे, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। उनके अनुसार, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए पारदर्शिता, नैतिकता और जनविश्वास आवश्यक हैं तथा इन मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता है।

    सिद्धारमैया के इस ऐलान को कर्नाटक की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। लंबे समय तक राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इस वरिष्ठ नेता के फैसले के बाद भविष्य में कांग्रेस की चुनावी रणनीति और नेतृत्व को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज होने की संभावना है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि चुनाव नहीं लड़ने के बावजूद वह संगठन और जनता के बीच सक्रिय रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे।

  • अभिनेता से अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी तक, राहुल बोस का बहुआयामी जीवन प्रेरणा का उदाहरण

    अभिनेता से अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी तक, राहुल बोस का बहुआयामी जीवन प्रेरणा का उदाहरण

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा में अपनी गंभीर और प्रभावशाली अभिनय शैली के लिए पहचाने जाने वाले राहुल बोस का व्यक्तित्व केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है। अभिनेता, फिल्म निर्माता, अंतरराष्ट्रीय रग्बी खिलाड़ी और समाजसेवी के रूप में उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देकर एक बहुआयामी पहचान बनाई है। 27 जुलाई 1967 को कोलकाता में जन्मे राहुल बोस ने अपने जीवन की दिशा केवल मनोरंजन जगत तक सीमित नहीं रखी, बल्कि खेल और सामाजिक सरोकारों को भी बराबर महत्व दिया।

    राहुल बोस की शुरुआती शिक्षा कोलकाता के प्रतिष्ठित स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। बचपन में उनकी मां ने उन्हें बॉक्सिंग और रग्बी जैसे खेलों से परिचित कराया। इसी दौरान उन्होंने क्रिकेट का प्रशिक्षण भी लिया और बॉक्सिंग प्रतियोगिता में रजत पदक हासिल किया। हालांकि आगे चलकर रग्बी उनका सबसे बड़ा जुनून बन गया और उन्होंने इसी खेल में देश का प्रतिनिधित्व करने का निर्णय लिया।

    वर्ष 1998 से 2009 तक राहुल बोस भारतीय राष्ट्रीय रग्बी टीम का हिस्सा रहे और लगभग 11 वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। अभिनय के व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने अपने फिल्मी काम और खेल के बीच संतुलन बनाए रखा। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्मों की शूटिंग भी रग्बी प्रतियोगिताओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अनुसार तय की, जिससे दोनों क्षेत्रों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।

    रग्बी से उनका जुड़ाव खिलाड़ी के रूप में ही समाप्त नहीं हुआ। बाद के वर्षों में उन्होंने खेल के विकास के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारी भी संभाली। भारतीय महिला रग्बी टीम की उपलब्धियों और देश में खेल को नई पहचान मिलने के दौर में उन्होंने रग्बी इंडिया के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। इस भूमिका में उन्होंने खेल के विस्तार और युवा खिलाड़ियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय योगदान दिया।

    अभिनय की दुनिया में राहुल बोस ने बचपन में स्कूल के एक नाटक से शुरुआत की थी। बाद में विज्ञापन क्षेत्र में कॉपीराइटर के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने फिल्मों की ओर कदम बढ़ाया। पहली ही प्रमुख फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने अभिनय को पूर्णकालिक पेशा बना लिया। उन्होंने हमेशा ऐसी फिल्मों को प्राथमिकता दी जिनमें मजबूत कहानी, सामाजिक संदेश और सशक्त अभिनय की गुंजाइश हो। यही कारण रहा कि उन्होंने समानांतर सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई और कई चर्चित फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों और समीक्षकों की सराहना हासिल की।

    राहुल बोस ने निर्देशन के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। उनकी पहली निर्देशित फिल्म को सीमित संसाधनों के बावजूद पूरा किया गया और बाद में उन्होंने एक ऐसी प्रेरणादायक जीवनी पर आधारित फिल्म बनाई, जिसमें कम उम्र में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भारतीय बालिका की उपलब्धि को पर्दे पर प्रस्तुत किया गया। उनके निर्देशन में भी सामाजिक संवेदनशीलता और प्रेरक विषयों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

    सिनेमा और खेल के साथ-साथ समाज सेवा राहुल बोस के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। वर्ष 2004 की सुनामी के दौरान राहत कार्यों में भाग लेने के बाद उन्होंने समाज के वंचित वर्गों के लिए स्थायी रूप से काम करने का संकल्प लिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने एक सामाजिक संस्था की स्थापना की, जिसके माध्यम से दूरदराज और संसाधनों से वंचित क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही बाल यौन शोषण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हजारों शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने जैसे अभियान भी संचालित किए गए हैं। अभिनय, खेल और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाकर राहुल बोस ने यह साबित किया है कि सफलता केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने से भी मापी जाती है।

  • प्रह्लाद जोशी ने संभाली शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी, पहले दिन वरिष्ठ अधिकारियों संग शिक्षा सुधारों पर मंथन

    प्रह्लाद जोशी ने संभाली शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी, पहले दिन वरिष्ठ अधिकारियों संग शिक्षा सुधारों पर मंथन

    नई दिल्ली । केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने रविवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यभार संभाल लिया। मंत्रालय की जिम्मेदारी ग्रहण करने के तुरंत बाद उन्होंने शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर विभाग की मौजूदा स्थिति, प्राथमिकताओं और आगे की कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा की। ऐसे समय में उन्हें यह अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है, जब देश में शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर व्यापक विमर्श जारी है।

    पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किए जाने के बाद प्रधानमंत्री की सलाह पर प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों से विभिन्न योजनाओं, लंबित मामलों और आगामी कार्यक्रमों की जानकारी ली। मंत्रालय के लिए यह शुरुआती बैठक आगे की नीतिगत दिशा तय करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    देश की शिक्षा व्यवस्था में हाल के वर्षों में कई बड़े बदलाव हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न प्रावधानों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। ऐसे में नए शिक्षा मंत्री के सामने इन सुधारों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने, राज्यों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों की गति बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी। विद्यालयी शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और अनुसंधान तक अनेक क्षेत्रों में नीतिगत निर्णयों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

    प्रह्लाद जोशी केंद्र सरकार के अनुभवी मंत्रियों में शामिल हैं। वह पहले से ही उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसके अतिरिक्त वह संसदीय कार्य, कोयला और खान मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व भी कर चुके हैं। लंबे प्रशासनिक अनुभव और संसदीय कार्यप्रणाली की गहरी समझ के कारण उन्हें सरकार में लगातार महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाते रहे हैं।

    कर्नाटक की धारवाड़ लोकसभा सीट से लगातार पांच बार सांसद चुने जा चुके प्रह्लाद जोशी को संगठनात्मक क्षमता और प्रभावी प्रशासनिक शैली के लिए भी जाना जाता है। शिक्षा मंत्रालय की नई जिम्मेदारी के साथ अब उनसे ऐसी नीतियों को आगे बढ़ाने की अपेक्षा की जा रही है, जो विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए अधिक प्रभावी और परिणामकारी साबित हों।

    मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को और मजबूत करना, परीक्षा प्रक्रिया में भरोसा कायम रखना तथा तकनीक आधारित मूल्यांकन प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना शामिल माना जा रहा है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान को प्रोत्साहन, डिजिटल शिक्षा का विस्तार, कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा और विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार भी आगामी कार्ययोजना का अहम हिस्सा रह सकते हैं।

    कार्यभार संभालने के साथ ही मंत्रालय में प्रारंभिक समीक्षा बैठकों का दौर शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में शिक्षा मंत्रालय परीक्षा सुधार, विश्वविद्यालयों के विकास, अनुसंधान को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों से जुड़े लंबित विषयों पर तेजी से निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ेगा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सभी पक्षों की निगाह अब इस बात पर रहेगी कि नए शिक्षा मंत्री अपने अनुभव के आधार पर शिक्षा प्रणाली में सुधारों को किस गति और प्रभावशीलता के साथ आगे बढ़ाते हैं।

  • कारगिल विजय दिवस पर देश ने याद किया वीरों का शौर्य, जयशंकर और राजनाथ सिंह ने बलिदान को दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

    कारगिल विजय दिवस पर देश ने याद किया वीरों का शौर्य, जयशंकर और राजनाथ सिंह ने बलिदान को दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

    नई दिल्ली । देश ने रविवार को 27वां कारगिल विजय दिवस पूरे सम्मान और गर्व के साथ मनाया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने कारगिल युद्ध के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के अदम्य साहस और समर्पण को नमन करते हुए कहा कि उनका शौर्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

    विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर अपने संदेश में कहा कि यह दिन उन बहादुर सैनिकों के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति को याद करने का अवसर है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों की सेवा और त्याग को देश हमेशा सम्मान और गर्व के साथ याद रखेगा। उनके अनुसार कारगिल के वीरों की गाथा केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प और आत्मविश्वास की पहचान भी है।

    कारगिल विजय दिवस भारत की उस ऐतिहासिक जीत की याद दिलाता है, जब वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए दुश्मन के कब्जे से रणनीतिक चोटियों को दोबारा अपने नियंत्रण में लिया था। बर्फ से ढकी ऊंची पहाड़ियों, प्रतिकूल मौसम और लगातार हो रही गोलाबारी के बीच भारतीय जवानों ने अद्वितीय साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। 26 जुलाई को मिली इस विजय ने भारतीय सेना की क्षमता और राष्ट्र की एकजुटता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया।

    कारगिल विजय दिवस के अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कारगिल युद्ध स्मारक पहुंचकर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने ध्वजारोहण समारोह में भाग लिया और शौर्य विजय यात्रा के समापन कार्यक्रम में भी शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना के जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि कारगिल युद्ध स्मारक पर लहराता तिरंगा उन वीर सैनिकों के अद्वितीय बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्ष 1999 में भारतीय सीमा पर हुई घुसपैठ का भारतीय सेना ने अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल के साथ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दुश्मन ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाने की कोशिश की थी, लेकिन भारतीय सैनिकों ने असाधारण वीरता का परिचय देते हुए सभी चुनौतियों को परास्त कर दिया। उन्होंने कहा कि कारगिल के योद्धाओं ने केवल ऊंची चोटियां ही नहीं जीतीं, बल्कि पूरे देश का विश्वास और सम्मान भी मजबूत किया।

    राजनाथ सिंह ने कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडे सहित अनेक वीर सैनिकों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी वीरगाथाएं आज भी देश के युवाओं को राष्ट्रसेवा, कर्तव्य और त्याग का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि कारगिल विजय दिवस केवल एक सैन्य जीत का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को देश के प्रति अपने दायित्वों का एहसास कराने वाला अवसर भी है। उनके अनुसार सेवा, समर्पण और बलिदान जैसे मूल्य ही किसी भी मजबूत राष्ट्र की आधारशिला होते हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सशस्त्र बल लगातार देश की सुरक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हर मोर्चे पर सजग हैं। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर पूरे देश ने वीर शहीदों के अद्वितीय योगदान को स्मरण करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। यह दिवस एक बार फिर देशवासियों को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने और वीर सैनिकों के बलिदान से प्रेरणा लेने का संदेश देता है।

  • 'मन की बात' के 136वें एपिसोड की एनडीए नेताओं ने की सराहना, बोले- समाज के सकारात्मक प्रयासों को मिलती है राष्ट्रीय पहचान

    'मन की बात' के 136वें एपिसोड की एनडीए नेताओं ने की सराहना, बोले- समाज के सकारात्मक प्रयासों को मिलती है राष्ट्रीय पहचान

    नई दिल्ली ।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 136वें एपिसोड को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इस कार्यक्रम को जनभागीदारी, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्र निर्माण को प्रोत्साहित करने वाला प्रभावी मंच बताया। नेताओं का कहना है कि यह कार्यक्रम राजनीति से अलग समाज के सकारात्मक प्रयासों, नवाचारों और प्रेरणादायी कहानियों को राष्ट्रीय पहचान देने का कार्य करता है।

    भाजपा नेताओं ने कहा कि ‘मन की बात’ के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे उल्लेखनीय कार्यों को व्यापक स्तर पर सामने लाया जाता है। उनका मानना है कि इस कार्यक्रम से आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय स्तर पर काम कर रहे लोगों के प्रयासों को सम्मान मिलता है, जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलती है। उन्होंने इसे समाज में सकारात्मक सोच विकसित करने का माध्यम बताया।

    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कार्यक्रम में राज्य से जुड़े विभिन्न प्रयासों का उल्लेख किए जाने पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि हाल के महीनों में बस्तर ओलंपिक्स, बस्तर पांडुम, मल्हार से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ और इस बार जल संरक्षण अभियान के तहत कोरबा की पहल का जिक्र राज्य के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने स्थानीय मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील को भी महत्वपूर्ण बताया।

    त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि ‘मन की बात’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सकारात्मक सोच और जनता से लगातार संवाद बनाए रखना है। उनके अनुसार, कार्यक्रम में त्रिपुरा में स्वदेशी रूप से तैयार किए गए पहले संगीत वाद्ययंत्र का उल्लेख होने से राज्य के कारीगरों और कलाकारों का उत्साह बढ़ा है। उन्होंने इसे स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला प्रयास बताया।

    केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कार्यक्रम में कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वीर सैनिकों को दी गई श्रद्धांजलि, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के योगदान के स्मरण और राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के संदर्भ को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय हस्तशिल्प, हथकरघा और स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने का संदेश देश के कारीगरों के लिए उत्साहवर्धक है।

    केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने कहा कि कार्यक्रम में राजनीतिक विषयों के बजाय समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा किए जा रहे प्रेरक कार्यों को प्रमुखता दी जाती है। उन्होंने जल संरक्षण, वृक्षारोपण, स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प जैसे विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने को इस कार्यक्रम की विशेषता बताया। वहीं भाजपा सांसद राधामोहन दास अग्रवाल ने कहा कि कार्यक्रम नागरिकों के योगदान को महत्व देता है और वर्षों से देशभर की प्रेरक कहानियों को लोगों तक पहुंचा रहा है।

    उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने ‘मन की बात’ को दुनिया के लोकप्रिय मासिक कार्यक्रमों में से एक बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से ऐसे लोगों की प्रेरक कहानियां सामने आती हैं, जिनकी मेहनत और उपलब्धियां सामान्यतः चर्चा में नहीं आ पातीं। वहीं बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने इसे देश के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों को जोड़ने वाला मंच बताया। पूर्व मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह ने कारगिल विजय दिवस पर वीर सैनिकों के साहस और बलिदान को याद करने को नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी संदेश बताया।