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  • पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    पश्चिम बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई तेज, रिजू दत्ता बोले- अब भी नहीं चेतीं ममता तो संगठन का अस्तित्व खतरे में

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। पार्टी से निष्कासित नेताओं द्वारा लगातार किए जा रहे दावों और बयानों ने राज्य की सियासत को नई दिशा दे दी है। इसी कड़ी में निष्कासित नेता रिजू दत्ता ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ा राजनीतिक बदलाव आकार ले रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते हालात को नहीं समझा तो संगठन केवल नाममात्र का ढांचा बनकर रह जाएगा।

    रिजू दत्ता का यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी के एक अन्य निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। बागी खेमे का कहना है कि इन विधायकों ने उन्हें अपना नेता चुना है और इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को भी समर्थन पत्र सौंपा जा चुका है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इससे राज्य की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।

    रिजू दत्ता ने कहा कि बागी गुट की ओर से उठाया गया कदम पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत किया गया है। उनके अनुसार, समय के साथ ऋतब्रत बनर्जी को समर्थन देने वाले विधायकों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि अधिकांश विधायक अब भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और उन्हें पार्टी का प्रमुख चेहरा मानते हैं, लेकिन संगठन में दूसरे नेतृत्व को लेकर असंतोष मौजूद है।

    बागी नेताओं ने विशेष रूप से अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व शैली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती जा रही है और कई वरिष्ठ नेताओं तथा विधायकों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा। इसी असंतोष ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को जन्म दिया है।

    तृणमूल कांग्रेस के लिए यह संकट ऐसे समय सामने आया है जब हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। कभी राज्य विधानसभा में भारी बहुमत रखने वाली पार्टी की संख्या अब काफी कम हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी झटकों के बाद संगठन के भीतर उभर रहे मतभेद नेतृत्व के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकते हैं।

    इस बीच, पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास भी जारी हैं। हालांकि बागी नेताओं के लगातार बयान यह संकेत दे रहे हैं कि असंतोष केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व शैली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और कानूनी प्रक्रियाएं इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में नजरें इस बात पर टिकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस चुनौती का सामना किस तरह करता है। एक ओर बागी गुट अपने समर्थन का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश में जुटा हुआ है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष राज्य की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक बन सकता है।

  • मुजफ्फरपुर अस्पताल अग्निकांड में 95 वर्षीय दादी बनीं जीवनरक्षक, सूझबूझ से बचीं कई मरीजों की जान

    मुजफ्फरपुर अस्पताल अग्निकांड में 95 वर्षीय दादी बनीं जीवनरक्षक, सूझबूझ से बचीं कई मरीजों की जान

    नई दिल्ली । बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित प्रसाद हॉस्पिटल में हुए दर्दनाक अग्निकांड के बीच एक 95 वर्षीय महिला की सूझबूझ और साहस की कहानी सामने आई है, जिसने इस त्रासदी के बीच उम्मीद की एक किरण जगा दी। अस्पताल के आईसीयू में भर्ती राधा देवी ने समय रहते आग और धुएं की जानकारी नर्सिंग स्टाफ को देकर कई मरीजों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई। यही कारण है कि उन्हें अब इस हादसे की ‘मसीहा’ के रूप में देखा जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि अस्पताल की पांचवीं मंजिल पर स्थित आईसीयू में देर रात आग लग गई थी। आग लगने के बाद कुछ ही मिनटों में पूरे क्षेत्र में धुआं फैलने लगा, जिससे वहां भर्ती गंभीर मरीजों की स्थिति और अधिक जोखिमपूर्ण हो गई। कई मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे और धुएं के कारण उनका दम घुटने लगा। इस हादसे में पांच मरीजों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि कई अन्य मरीजों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में जारी है।

    इसी आईसीयू में छपरा मेघ क्षेत्र की निवासी 95 वर्षीय राधा देवी भी भर्ती थीं। उम्र और बीमारी के बावजूद उन्होंने सबसे पहले स्थिति की गंभीरता को समझा। परिजनों के अनुसार, धुआं फैलते ही उन्होंने अपने चेहरे से ऑक्सीजन मास्क हटाया और स्वयं बाहर निकलकर नर्स को आग लगने की जानकारी दी। उनके इस कदम के बाद अस्पताल प्रशासन सक्रिय हुआ और मरीजों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू की गई।

    राधा देवी ने स्थानीय बज्जिका बोली में घटना का वर्णन करते हुए बताया कि अचानक धुआं फैलने लगा और आसपास अंधेरा सा महसूस होने लगा। उन्होंने कहा कि आग कैसे लगी, यह उन्हें नहीं पता, लेकिन धुआं देखते ही वह बाहर निकलीं और तुरंत नर्स को इसकी सूचना दी। इसके बाद अस्पताल कर्मियों ने स्थिति की जांच की और राहत कार्य शुरू किए।

    परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यदि राधा देवी समय रहते सतर्कता नहीं दिखातीं, तो मृतकों की संख्या कहीं अधिक हो सकती थी। रात करीब साढ़े तीन बजे आग लगने की बात सामने आई, जबकि कुछ ही देर बाद अस्पताल प्रशासन और अग्निशमन विभाग को इसकी सूचना दी गई। इसके बाद राहत और बचाव अभियान शुरू किया गया।

    अग्निशमन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सूचना मिलते ही टीम मौके पर पहुंची और आग पर काबू पाने के साथ-साथ अस्पताल में फंसे लोगों को बाहर निकालने का काम शुरू किया। बचाव दल ने करीब 15 से 20 मरीजों को सुरक्षित बाहर निकाला। हालांकि धुएं और आग की चपेट में आने से कई मरीज गंभीर रूप से प्रभावित हुए, जिनमें से पांच की मौत हो चुकी है।

    घटना के बाद अस्पताल के आईसीयू की तस्वीरों ने हादसे की भयावहता को उजागर कर दिया है। आग में बेड, चिकित्सा उपकरण और अन्य जरूरी संसाधन बुरी तरह जल गए। प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है और आग लगने के कारणों का पता लगाया जा रहा है।

    इस दर्दनाक हादसे के बीच राधा देवी की सतर्कता और साहस ने यह साबित कर दिया कि संकट की घड़ी में जागरूकता और त्वरित निर्णय कई जिंदगियों को बचा सकते हैं। उनकी भूमिका को स्थानीय लोग और प्रभावित परिवार एक असाधारण मानवीय उदाहरण के रूप में देख रहे हैं, जिसने एक बड़े हादसे को और भयावह होने से रोकने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  • मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर भाजपा का राष्ट्रव्यापी अभियान, उपलब्धियों का लेखा-जोखा लेकर जनता के बीच उतरेंगे नेता

    मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर भाजपा का राष्ट्रव्यापी अभियान, उपलब्धियों का लेखा-जोखा लेकर जनता के बीच उतरेंगे नेता

    नई दिल्ली । केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी ने व्यापक स्तर पर जनसंपर्क और जागरूकता अभियान चलाने की तैयारी पूरी कर ली है। पार्टी आगामी दिनों में देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार की उपलब्धियों, जनकल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को जनता के सामने प्रस्तुत करेगी। इस अभियान का उद्देश्य पिछले बारह वर्षों के शासनकाल के दौरान हुए प्रमुख बदलावों और नीतिगत निर्णयों को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाना है।

    पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस विशेष अभियान के तहत सरकार की उपलब्धियों का विस्तृत विवरण पांच अलग-अलग बुकलेट में प्रकाशित किया जाएगा। इन बुकलेटों को विभिन्न विषयों के आधार पर तैयार किया गया है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में किए गए कार्यों और उपलब्धियों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जा सके। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आधारभूत संरचना विकास, सामाजिक कल्याण, आर्थिक सुधार और जनहित से जुड़े प्रमुख फैसलों का उल्लेख किया जाएगा।

    बताया गया है कि “राष्ट्र प्रथम” शीर्षक वाली बुकलेट में उन महत्वपूर्ण निर्णयों को शामिल किया जाएगा, जिन्हें राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए लागू किया गया। वहीं “राष्ट्र निर्माण” में देशभर में सड़कों, रेल, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का विवरण दिया जाएगा। इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य क्षमता से जुड़े विषयों को भी अलग श्रेणी में शामिल किया गया है, जिसमें सशस्त्र बलों की उपलब्धियों और सुरक्षा अभियानों का उल्लेख रहेगा।

    भाजपा इस पूरे अभियान को “बारह साल विश्वास के, विकास के, जन कल्याण के” थीम के साथ आयोजित करेगी। पार्टी का दावा है कि पिछले एक दशक से अधिक समय में गरीबों, किसानों, महिलाओं, युवाओं और वंचित वर्गों के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गईं, जिनका व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव देखने को मिला है। इसी उपलब्धि को जनता तक पहुंचाने के लिए विभिन्न स्तरों पर कार्यक्रमों की श्रृंखला तैयार की गई है।

    कार्यक्रमों के तहत 8 जून से 12 जून तक देशभर में मीडिया संवाद आयोजित किए जाएंगे। केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता इन संवादों में सरकार की नीतियों और उपलब्धियों पर विस्तार से जानकारी देंगे। इसी अवधि में विशेष बुकलेटों का भी औपचारिक विमोचन किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि इससे सरकार के कार्यों की जानकारी अधिक संगठित और प्रभावी तरीके से आम जनता तक पहुंचेगी।

    8 जून से 14 जून के बीच विशेष जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा, जिसके अंतर्गत सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में नागरिकों से सीधा संवाद करेंगे। इस दौरान विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं और स्थानीय उपलब्धियों की जानकारी साझा की जाएगी। साथ ही वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, प्रगति पथ यात्राएं और “विकसित भारत संकल्प सम्मेलन” जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

    पार्टी ने प्रत्येक जिले में कम से कम 500 प्रमुख व्यक्तियों से संपर्क स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इसके माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों, पेशेवर संगठनों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का संदेश पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है।

    12 जून से 20 जून के बीच देशभर में जनकल्याण शिविर लगाए जाएंगे। इन शिविरों में आयुष्मान भारत, पीएम स्वनिधि, पीएम सूर्य घर और अन्य प्रमुख योजनाओं के लाभार्थियों का पंजीकरण कराया जाएगा। भाजपा संगठन को निर्देश दिया गया है कि पात्र लोगों को शिविरों तक पहुंचाने और योजनाओं से जोड़ने में सक्रिय सहयोग दिया जाए।

    अभियान के दौरान पर्यावरण दिवस पर “एक पेड़ मां के नाम” कार्यक्रम तथा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर मंडल स्तर तक योग कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यह अभियान केवल उपलब्धियों के प्रचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विकसित भारत के लक्ष्य को लेकर जनभागीदारी बढ़ाने का माध्यम भी बनेगा।

  • चुनावी हार के बाद बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां, बागी विधायकों के बाद अब सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने बढ़ाई चिंता

    चुनावी हार के बाद बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां, बागी विधायकों के बाद अब सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव के बाद जारी सियासी उथल-पुथल अब राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती दिखाई दे रही है। राज्य में चुनावी पराजय के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इसी बीच ऐसे दावे भी किए जा रहे हैं कि पार्टी के कुछ सांसद भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं और भविष्य में राजनीतिक समीकरणों में बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    सूत्रों के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं और वैकल्पिक राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि कई सांसदों और भाजपा नेतृत्व के बीच विभिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है। यदि भविष्य में इस तरह का कोई राजनीतिक घटनाक्रम सामने आता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति और संसद में विपक्षी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

    तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक शक्ति रही है। हालांकि हालिया विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही संगठन के भीतर असंतोष की खबरें सामने आने लगी थीं। पार्टी के कुछ नेताओं और विधायकों ने नेतृत्व की कार्यशैली, संगठनात्मक निर्णयों और विभिन्न विवादों के प्रबंधन को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए थे।

    राज्य विधानसभा में भी राजनीतिक स्थिति तेजी से बदली है। बड़ी संख्या में विधायकों द्वारा अलग रुख अपनाने और नए नेतृत्व के समर्थन की खबरों ने तृणमूल कांग्रेस के सामने संगठनात्मक संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े चुनावी झटके के बाद दलों के भीतर नेतृत्व और रणनीति को लेकर असहमति उभरना असामान्य नहीं है, लेकिन यदि यह असंतोष लगातार बढ़ता है तो इसका असर पार्टी की भविष्य की राजनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है।

    संसद में तृणमूल कांग्रेस विपक्ष की प्रमुख पार्टियों में गिनी जाती रही है। ऐसे में सांसदों के संभावित राजनीतिक बदलाव की अटकलें विपक्षी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संसद में किसी भी बड़े दल की संख्या में बदलाव राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

    दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व संगठन को एकजुट रखने और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में जुटा हुआ है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाए रखना और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास कायम रखना होगा। इसके साथ ही पार्टी को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि चुनावी हार के बाद उत्पन्न असंतोष और मतभेदों को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

    फिलहाल राजनीतिक परिदृश्य में अनिश्चितता बनी हुई है और सभी की निगाहें संभावित घटनाक्रमों पर टिकी हैं। यदि सांसदों के पाला बदलने संबंधी दावे आगे चलकर वास्तविक रूप लेते हैं तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण बदलाव का कारण बन सकता है। वहीं यदि पार्टी नेतृत्व स्थिति को संभालने में सफल रहता है तो यह संकट उसके लिए संगठनात्मक पुनर्गठन का अवसर भी साबित हो सकता है।

  • दिल्ली-एनसीआर में मौसम ने अचानक ली करवट, दिन में छाया अंधेरा; तेज आंधी और झमाझम बारिश से मिली गर्मी से राहत

    दिल्ली-एनसीआर में मौसम ने अचानक ली करवट, दिन में छाया अंधेरा; तेज आंधी और झमाझम बारिश से मिली गर्मी से राहत

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर क्षेत्र में गुरुवार को मौसम ने अचानक करवट ले ली। दोपहर तक जहां तेज धूप और उमस लोगों को परेशान कर रही थी, वहीं कुछ ही समय बाद आसमान में घने बादल छा गए और तेज धूल भरी आंधी के साथ बारिश शुरू हो गई। मौसम के इस अप्रत्याशित बदलाव ने राजधानी और आसपास के इलाकों में दिन के समय ही रात जैसा माहौल पैदा कर दिया। कई स्थानों पर दृश्यता प्रभावित हुई, जबकि तेज हवाओं और बारिश ने लोगों को भीषण गर्मी और लू से बड़ी राहत दिलाई।

    दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के कई क्षेत्रों में अचानक मौसम बदलने से तापमान में गिरावट दर्ज की गई। दिनभर की चिलचिलाती गर्मी से परेशान लोगों ने बारिश का स्वागत किया। कई जगहों पर तेज हवाओं के कारण पेड़ों की शाखाएं झूलती नजर आईं, जबकि सड़कों पर वाहन चालकों को सावधानी बरतनी पड़ी। बारिश शुरू होते ही कई इलाकों में यातायात की रफ्तार भी प्रभावित हुई।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही दिल्ली-एनसीआर के लिए गरज-चमक, तेज हवाओं और हल्की से मध्यम बारिश की संभावना जताई थी। विभाग ने 4 और 5 जून के लिए येलो अलर्ट जारी करते हुए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ और स्थानीय मौसमी गतिविधियों के प्रभाव से अगले कुछ दिनों तक मौसम में बदलाव बना रह सकता है।

    मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार गुरुवार को अधिकतम तापमान सामान्य से नीचे रह सकता है, जबकि रात के समय भी बादलों की आवाजाही और हल्की बारिश की संभावना बनी हुई है। इससे तापमान में और गिरावट आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव राजधानी क्षेत्र में पिछले कई दिनों से जारी भीषण गर्मी के दौर को कुछ समय के लिए कमजोर कर सकता है।

    पूर्वानुमान के मुताबिक शुक्रवार को भी दिल्ली-एनसीआर में मौसम का यही रुख बना रह सकता है। गरज-चमक के साथ हल्की बारिश और तेज हवाओं की संभावना जताई गई है। इसके चलते अधिकतम तापमान में कमी बनी रह सकती है और लोगों को गर्मी से राहत मिलती रहेगी। हालांकि मौसम विभाग ने खुले स्थानों, ऊंचे पेड़ों और बिजली के खंभों के आसपास अनावश्यक रूप से खड़े न रहने की सलाह दी है।

    मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून पूर्व गतिविधियों के कारण इस तरह के बदलाव सामान्य हैं, लेकिन तेज हवाओं और बिजली गिरने की घटनाओं को देखते हुए सावधानी बरतना आवश्यक है। खासकर दोपहिया वाहन चालकों, खुले में काम करने वाले लोगों और किसानों को मौसम संबंधी अपडेट पर नजर बनाए रखनी चाहिए।

    आने वाले दिनों में राजधानी क्षेत्र में मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहने की संभावना है। हालांकि सप्ताहांत तक तापमान में फिर से कुछ बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन फिलहाल बारिश और बादलों ने लोगों को झुलसाने वाली गर्मी से बड़ी राहत पहुंचाई है। मौसम विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आवश्यकतानुसार नई चेतावनियां जारी की जा सकती हैं।

  • मालवीय नगर अग्निकांड ने उठाए गंभीर सवाल: 21 लोगों की मौत के बाद होटल मालिक पर शिकंजा, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी

    मालवीय नगर अग्निकांड ने उठाए गंभीर सवाल: 21 लोगों की मौत के बाद होटल मालिक पर शिकंजा, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी

    नई दिल्ली । राजधानी के मालवीय नगर क्षेत्र में स्थित एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड के मामले में जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। 21 लोगों की मौत के बाद दिल्ली पुलिस ने होटल मालिक लवकेश बजाज को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस द्वारा दर्ज मामले में गैर इरादतन हत्या समेत विभिन्न धाराओं के तहत जांच आगे बढ़ाई जा रही है। हादसे ने एक बार फिर राजधानी में संचालित हो रहे होटलों और व्यावसायिक भवनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना 3 जून की सुबह सामने आई थी, जब होटल के बेसमेंट में संचालित एक रेस्टोरेंट क्षेत्र में अचानक आग लग गई। शुरुआती आग कुछ ही मिनटों में पूरे भवन में फैल गई और होटल के कई हिस्से धुएं तथा लपटों की चपेट में आ गए। आग लगने के समय होटल में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। हादसे में कुल 21 लोगों की मौत हुई, जिनमें 11 विदेशी और 10 भारतीय नागरिक शामिल बताए गए हैं। मृत विदेशी नागरिकों में अफ्रीकी देशों और तुर्कमेनिस्तान के लोग भी शामिल थे।

    पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया है कि होटल परिसर में मूल संरचना से अधिक कमरे तैयार किए गए थे। पूछताछ के दौरान होटल मालिक ने स्वीकार किया कि कारोबार विस्तार के उद्देश्य से भवन में अतिरिक्त कमरे जोड़े गए थे। हालांकि उसने दावा किया कि होटल के संचालन, प्रबंधन और वित्तीय गतिविधियों की जिम्मेदारी अन्य लोगों को सौंप रखी गई थी। पुलिस अब इस दावे की भी जांच कर रही है कि होटल में किए गए निर्माण और संशोधन संबंधित नियमों के अनुरूप थे या नहीं।

    जांच एजेंसियों का ध्यान विशेष रूप से भवन की संरचना और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर केंद्रित है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार होटल में बाहर निकलने के लिए सीमित मार्ग उपलब्ध था, जिससे आग लगने के बाद कई लोग अंदर फंस गए। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यावसायिक भवन में पर्याप्त आपात निकास मार्ग और अग्नि सुरक्षा उपाय अत्यंत आवश्यक होते हैं। ऐसे में यह जांच का महत्वपूर्ण विषय बन गया है कि होटल में सुरक्षा मानकों का पालन किस स्तर तक किया गया था।

    हादसे के बाद दिल्ली प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाया है। उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को घटना की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन ने जिला मजिस्ट्रेट की निगरानी में मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए हैं। इस जांच का उद्देश्य आग लगने के वास्तविक कारणों, संभावित लापरवाही और नियमों के उल्लंघन से जुड़े तथ्यों को सामने लाना है।

    घटनास्थल के आसपास संचालित अन्य होटल और होमस्टे भी अब जांच के दायरे में आ सकते हैं। जानकारी के अनुसार संबंधित होटल समूह के कई प्रतिष्ठान उसी इलाके में संचालित हो रहे हैं, जहां देश-विदेश से आने वाले लोग ठहरते हैं। ऐसे में प्रशासन सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा की तैयारी कर रहा है ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

    मालवीय नगर अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि शहरी सुरक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि हादसा केवल तकनीकी कारणों से हुआ या फिर इसके पीछे प्रशासनिक और प्रबंधन स्तर की गंभीर लापरवाही भी जिम्मेदार थी। फिलहाल पुलिस, प्रशासन और संबंधित विभाग सभी पहलुओं की जांच में जुटे हुए हैं।

  • एक साल से बंद पड़े छात्रसंघ कक्ष का ताला खुलते ही सामने आया चौंकाने वाला सच, नकदी और रिवॉल्वर बरामद होने पर सियासत गरमाई

    एक साल से बंद पड़े छात्रसंघ कक्ष का ताला खुलते ही सामने आया चौंकाने वाला सच, नकदी और रिवॉल्वर बरामद होने पर सियासत गरमाई

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित प्रतिष्ठित सुरेंद्रनाथ कॉलेज इन दिनों एक सनसनीखेज मामले को लेकर चर्चा के केंद्र में है। कॉलेज परिसर के एक वर्ष से बंद पड़े छात्रसंघ कक्ष को खोले जाने के बाद वहां से बड़ी मात्रा में नकदी, एक रिवॉल्वर और अन्य सामग्री मिलने का दावा किया गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल शैक्षणिक जगत को चौंकाया है, बल्कि राज्य की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है। मामले के सामने आने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है और जांच की मांग तेज हो गई है।

    जानकारी के अनुसार कॉलेज प्रशासन ने राज्य सरकार के निर्देशों के बाद छात्रसंघ से संबंधित कक्षों और निधियों की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की थी। इसी क्रम में लंबे समय से बंद पड़े छात्रसंघ कक्ष को खोला गया। बताया जा रहा है कि कमरे की सफाई और निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को वहां रखी अलमारियों और बक्सों में बड़ी मात्रा में नकदी मिली। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार बरामद रकम करीब एक करोड़ रुपये बताई जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, लंबे समय तक बंद रहने के कारण नकदी का एक हिस्सा खराब अवस्था में पाया गया।

    मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। निरीक्षण के दौरान कमरे से एक रिवॉल्वर और कुछ अन्य वस्तुएं भी मिलने का दावा किया गया है। इन बरामदगी की खबर सामने आते ही कॉलेज परिसर और राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई। शिक्षा संस्थान में इस तरह की सामग्री मिलने को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर भी इस पूरे मामले की जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी ने राज्य सरकार और सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि बरामद नकदी की उत्पत्ति और उसके संभावित उपयोग की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पार्टी ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय सहित केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने की मांग उठाई है। भाजपा का आरोप है कि यह मामला केवल कॉलेज प्रशासन तक सीमित नहीं हो सकता और इसकी गहन जांच आवश्यक है।

    दूसरी ओर, मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया लगातार बढ़ रही है। विपक्षी दल इस घटना को राज्य की शिक्षा व्यवस्था और संस्थागत पारदर्शिता से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में प्रमुख स्थान ले सकता है।

    कॉलेज प्रशासन का कहना है कि बरामद सामग्री की सूचना संबंधित अधिकारियों को दे दी गई है और आगे की कार्रवाई नियमानुसार की जाएगी। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। फिलहाल यह पता लगाया जा रहा है कि नकदी और अन्य सामान वहां कब से रखा गया था तथा उसका वास्तविक स्रोत क्या है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों की पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो उसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। फिलहाल पूरे मामले पर सभी की निगाहें जांच एजेंसियों और प्रशासनिक कदमों पर टिकी हुई हैं।

  • पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    पाकिस्तान में फ्रांसीसी महिला से दरिंदगी के दोषियों को होगी फांसी: उच्च न्यायालय ने खारिज की अपील, वैश्विक स्तर पर न्यायिक कड़ेपन का समर्थन

    नई दिल्ली। पाकिस्तान की न्यायपालिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित और संवेदनशील ‘लाहौर मोटरवे सामूहिक दुष्कर्म मामले’ में एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। लाहौर उच्च न्यायालय (LHC) ने इस बर्बर कांड के दो मुख्य दोषियों, आबिद अली और शफकत अली की फांसी की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। दोनों दोषियों ने साल 2021 में आतंकवाद निरोधी अदालत (ATC) द्वारा दी गई मौत की सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने अभियोजन पक्ष के पुख्ता सबूतों के आलोक में सिरे से खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब दोनों अपराधियों की मौत की सजा का क्रियान्वयन तय माना जा रहा है, जिसने वैश्विक स्तर पर भी मानवाधिकारों और महिला सुरक्षा से जुड़े संगठनों का ध्यान आकर्षित किया है।

    यह अत्यंत क्रूर और खौफनाक घटना 9 सितंबर 2020 की है, जब पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर कार से यात्रा कर रही थी। देर रात अचानक कार का ईंधन समाप्त हो जाने के कारण उनका परिवार सुनसान सड़क के किनारे असहाय स्थिति में फंस गया था। महिला अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार के दरवाजे बंद कर भीतर ही मदद की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी दौरान हथियारों से लैस हमलावरों ने वाहन की खिड़की का शीशा तोड़कर महिला को जबरन बाहर घसीट लिया और उसके ही रोते-बिलखते बच्चों के सामने बंदूक की नोक पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात को अंजाम दिया। अपराधी वहां से भागने से पहले पीड़ित परिवार से नकदी, आभूषण और बैंक कार्ड भी लूट ले गए थे।

    इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद पूरे पाकिस्तान में जनाक्रोश भड़क उठा था और कार्यस्थलों तथा सार्वजनिक मार्गों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानूनों की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे। जनभावनाएं उस समय और अधिक उग्र हो गई थीं, जब तत्कालीन लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख ने प्रशासनिक विफलता को छुपाने के लिए उल्टा पीड़िता के समय और मार्ग चयन पर ही अनुचित सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि, बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अभियान चलाया। जांचकर्ताओं ने अत्याधुनिक मोबाइल फोन डेटा विश्लेषण और घटनास्थल से एकत्र किए गए डीएनए नमूनों की सहायता से आरोपियों को दबोचा था। बाद में न्यायिक कार्यवाही के दौरान पीड़िता ने भी दोनों की पहचान की थी और एक आरोपी ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।

    उच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान दोषियों के विधिक सलाहकारों ने दलील दी थी कि जांच एजेंसी की प्रक्रिया में कई तकनीकी कमियां हैं और साक्ष्य पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं। इसके विपरीत, सरकारी वकीलों ने अदालत के समक्ष अकाट्य वैज्ञानिक (डीएनए) और तकनीकी (सेलुलर लोकेशन) प्रमाण प्रस्तुत किए, जो सीधे तौर पर अपराधियों की अपराध स्थल पर उपस्थिति और संलिप्तता को प्रमाणित करते थे। उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को वैध मानते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का फैसला पूर्णतः न्यायसंगत था। इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध वैश्विक उद्यमी और टेस्ला प्रमुख एलन मस्क ने भी सोशल मीडिया पर ‘शाबाश पाकिस्तान’ लिखते हुए न्यायिक कड़ेपन की सराहना की और कहा कि पश्चिमी देशों को भी हिंसक अपराधों के खिलाफ ऐसे ही कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।

  • बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

    बंगाल में नंबर गेम बनाम कानूनी लड़ाई: 58 विधायकों के दावे के बावजूद टीएमसी पर नियंत्रण आसान नहीं, स्पीकर की भूमिका होगी सबसे अहम

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पनपे एक बड़े बागी गुट ने विधानसभा के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के अपने साथ होने का दावा ठोक दिया है। इस संख्या बल ने देश को कुछ समय पहले हुए महाराष्ट्र के शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) विवाद की याद दिला दी है। हालांकि, देश के संवैधानिक कानून और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों के आलोक में देखा जाए, तो बागी गुट के लिए केवल 58 विधायकों के समर्थन के दम पर पूरी पार्टी पर नियंत्रण हासिल कर लेना इतना आसान नहीं होने वाला है। इस पूरे सियासी घमासान को सुलझाने और यह तय करने में कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस कौन सी है, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और कानूनी कसौटियों से बंधी होगी।

    इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं को समझें तो साल 2003 में संसद द्वारा किए गए एक महत्वपूर्ण संशोधन के बाद संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से पैराग्राफ 3 को पूरी तरह हटा दिया गया था। इस पैराग्राफ के हटने से पहले तक यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायक अलग होते थे, तो वे पार्टी में ‘विभाजन’ या स्प्लिट का तर्क देकर अयोग्यता की कार्रवाई से बच जाते थे। परंतु अब कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। वर्तमान नियमों के तहत यदि किसी राजनीतिक दल या उसके विधायी विंग में कोई फूट होती है और दोनों प्रतिद्वंद्वी गुट एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका दायर करते हैं, तो कोई भी गुट स्वतः ही खुद को मूल या असली पार्टी होने का वैधानिक दावा नहीं कर सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना विवाद की लंबी सुनवाई के बाद अपने ऐतिहासिक फैसले में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था कि दलबदल के मामलों में केवल विधानसभा के भीतर का नंबर गेम असली पार्टी का निर्धारण नहीं कर सकता। देश की शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जब किसी दल में दो स्पष्ट फाड़ हो जाते हैं, तो विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं पर विचार करते समय स्पीकर को अंधमूल्यांकन या केवल सिरों की गिनती करने से बचना होगा। अध्यक्ष को यह जांचना अनिवार्य है कि विधानसभा के बाहर, यानी मूल राजनीतिक संगठन में पार्टी का नेतृत्व ढांचा कैसा है और आम कार्यकर्ताओं तथा संगठन के पदाधिकारियों का झुकाव किस तरफ है। कोर्ट ने साफ कहा था कि यह महज आंकड़ों की बाजीगरी नहीं है, बल्कि संगठन की मूल आत्मा को पहचानना अनिवार्य है।

    अदालत के आदेशानुसार, असली पार्टी की पहचान करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को उस दल के मूल संविधान, नियमों और विनियमों को सर्वोपरि मानना होगा जो पार्टी के आंतरिक नेतृत्व के ढांचे को परिभाषित करते हैं। यदि विवाद के दौरान दोनों गुट अपने-अपने फायदे के हिसाब से पार्टी संविधान के अलग-अलग रूप या दस्तावेज पेश करते हैं, तो अध्यक्ष को केवल उसी दस्तावेज को वैध और प्रामाणिक मानना होगा जो राजनीतिक विवाद शुरू होने से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास आधिकारिक तौर पर जमा था। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि कोई भी बागी गुट रातों-रात बहुमत के प्रभाव में आकर पार्टी के मूल नियमों और लोकतांत्रिक ढांचे में मनमाना संशोधन न कर सके।

    इस संवैधानिक स्थिति को देखते हुए साफ है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खड़ा हुआ बागी गुट यदि सिर्फ 58 विधायकों के हस्ताक्षर दिखाकर खुद को असली टीएमसी घोषित करने की मांग करता है, तो विधानसभा अध्यक्ष उसे सीधे मान्यता नहीं दे सकते। पश्चिम बंगाल के स्पीकर को कानूनन बाध्य होकर विधायकों की संख्या के अतिरिक्त, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज टीएमसी के सांगठनिक ढांचे, पार्टी अध्यक्ष की शक्तियों और मुख्य संगठन की जमीनी स्थिति को भी अपनी जांच के दायरे में लाना होगा। ऐसे में जब तक संगठन पर पकड़ साबित नहीं होती, तब तक बागी विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटकती रहेगी और टीएमसी पर पूर्ण नियंत्रण का उनका सपना कानूनी दांवपेंच में उलझा रहेगा।

  • कर्नाटक में 'शिवकुमार युग' की शुरुआत: डीके शिवकुमार ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, कैबिनेट में दिखा सिद्धारमैया का दबदबा

    कर्नाटक में 'शिवकुमार युग' की शुरुआत: डीके शिवकुमार ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, कैबिनेट में दिखा सिद्धारमैया का दबदबा

    नई दिल्ली। कर्नाटक के राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय से चल रहा नेतृत्व का इंतजार आखिरकार समाप्त हो गया, जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु के लोक भवन में आयोजित एक भव्य और गरिमामय समारोह में राज्य के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। इस ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाक्रम के साथ ही राज्य में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई है। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मुख्यमंत्री शिवकुमार ने तुमकुरु जिले के श्रद्धेय शैव संत वीरा गंगाधर अज्जैया के नाम पर और हाथ में भारत के संविधान की प्रति लेकर मुख्यमंत्री पद की कसम खाई। इस समारोह में कांग्रेस आलाकमान के वरिष्ठ नेताओं सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की, जिससे यह आयोजन पार्टी के लिए एक बड़े शक्ति प्रदर्शन में तब्दील हो गया।

    हालांकि, सत्ता की शीर्ष कमान डीके शिवकुमार के हाथों में सौंपे जाने के बावजूद, नवगठित मंत्रिपरिषद के स्वरूप को देखकर यह साफ हो गया है कि संगठन के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का राजनीतिक सिक्का और प्रभाव अभी भी मजबूती से कायम है। नई सरकार की शुरुआती कैबिनेट में सिद्धारमैया के वफादारों और करीबियों का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। राज्य के एक प्रमुख दलित चेहरे जी. परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जबकि शुरुआती चरण में कैबिनेट रैंक के मंत्री के रूप में 12 अन्य विधायकों को भी शामिल किया गया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया न केवल अपने गुट के वरिष्ठ विधायकों को मंत्रिपरिषद में तरजीह दिलाने में सफल रहे, बल्कि उन्होंने अपने बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को भी नई कैबिनेट में सुरक्षित स्थान दिलाकर राजनीतिक रूप से पूरी तरह स्थापित कर दिया है। इसके साथ ही, एमएलसी बीके हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिसकी आधिकारिक घोषणा शपथ ग्रहण के कुछ घंटों बाद ही कर दी गई।

    मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते ही डीके शिवकुमार पूरी तरह से प्रशासनिक एक्शन में नजर आए। उन्होंने तुरंत अपनी पहली कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की और अपनी सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए इसे ‘युवा युग’ के आगाज़ का नाम दिया। इस बैठक में युवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के लिए कई बड़े और दूरगामी फैसलों पर मुहर लगाई गई। सरकार ने राज्य के सभी स्कूली छात्रों से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक के विद्यार्थियों के लिए मुफ्त बस पास की सुविधा देने का बड़ा निर्णय लिया है। इसके साथ ही बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए निजी क्षेत्र की नौकरियों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से एक विशेष डिजिटल रोजगार एक्सचेंज पोर्टल स्थापित करने की घोषणा की गई है। युवाओं को सरकारी तंत्र में पारदर्शी अवसर देने के लिए समयबद्ध भर्ती कैलेंडर जारी करने और राज्य भर में 10,000 ‘भारत जोड़ो युवा क्लब’ बनाने का फैसला भी लिया गया है। इसके अतिरिक्त, शहरी विकास को गति देने के लिए सड़कों की मरम्मत हेतु 2,000 करोड़ रुपये का विशेष बजट स्वीकृत किया गया है और आवासीय निर्माण को बढ़ावा देने के लिए बिल्डिंग नियमों में रियायत दी गई है।

    नई कैबिनेट के गठन में कांग्रेस आलाकमान ने राज्य के जटिल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को संतुलित करने का पूरा प्रयास किया है। जातीय गणित के लिहाज से कर्नाटक के तीन सबसे प्रभावशाली समुदायों यानी वोक्कालिगा, लिंगायत और अनुसूचित जाति (SC) को प्रतिनिधित्व देते हुए प्रत्येक वर्ग से 3-3 मंत्री बनाए गए हैं। इसके अलावा सिद्धारमैया के अपने कुरुबा समुदाय से 2 मंत्रियों को जगह मिली है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST), मुस्लिम और ईसाई समुदायों से एक-एक चेहरे को मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। हालांकि, शुरुआती सूची में किसी भी महिला विधायक को जगह न मिलने पर राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं। राज्य में कुल स्वीकृत मंत्रियों की संख्या 34 है, जिसे देखते हुए माना जा रहा है कि आगामी 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के ठीक बाद कैबिनेट का दूसरा विस्तार किया जाएगा, जिसमें शेष खाली पदों को भरा जाएगा और क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जाएगा। फिलहाल, बेंगलुरु के इस भव्य समारोह में एआईसीसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया है कि कांग्रेस दक्षिण के इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी पकड़ को और मजबूत करने के लिए पूरी रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है।