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  • बलिया में लंबे अंतराल के बाद कोरोना की दस्तक, 32 वर्षीय महिला संक्रमित मिलने पर स्वास्थ्य विभाग ने बढ़ाई निगरानी

    बलिया में लंबे अंतराल के बाद कोरोना की दस्तक, 32 वर्षीय महिला संक्रमित मिलने पर स्वास्थ्य विभाग ने बढ़ाई निगरानी

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में लंबे समय बाद कोरोना संक्रमण का नया मामला सामने आने से स्वास्थ्य विभाग सतर्क हो गया है। आदर्श नगर पंचायत सहतवार के वार्ड संख्या-5 की 32 वर्षीय महिला में संक्रमण की पुष्टि होने के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य अधिकारियों ने तत्काल निगरानी व्यवस्था मजबूत कर दी है। जिले में कोरोना के नए मामले ने यह संकेत दिया है कि संक्रमण के प्रति लापरवाही अभी भी जोखिम पैदा कर सकती है, इसलिए एहतियात बरतना आवश्यक है।

    महिला का सैंपल 11 जुलाई को लखनऊ स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में जांच के लिए लिया गया था। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद 13 जुलाई को प्राप्त रिपोर्ट में उसके कोरोना संक्रमित होने की पुष्टि हुई। रिपोर्ट सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग ने निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए और संबंधित क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई।

    संक्रमण की पुष्टि के बाद चिकित्सा टीम तुरंत महिला के घर पहुंची और उसकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन किया। चिकित्सकों ने महिला को होम आइसोलेशन में रहने की सलाह दी है, जहां उसका उपचार और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग की टीम लगातार उसकी स्थिति पर नजर बनाए हुए है ताकि किसी प्रकार की जटिलता उत्पन्न होने पर समय रहते आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

    स्वास्थ्य विभाग ने संक्रमण की श्रृंखला को रोकने के उद्देश्य से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग अभियान भी शुरू किया। महिला के संपर्क में आए चार लोगों के नमूने लेकर उनकी जांच कराई गई। राहत की बात यह रही कि सभी चारों व्यक्तियों की जांच रिपोर्ट निगेटिव आई है। इससे फिलहाल संक्रमण के व्यापक फैलाव की आशंका कम मानी जा रही है, हालांकि विभाग ने निगरानी जारी रखने का निर्णय लिया है।

    जिला स्तर पर स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि संक्रमण के प्रत्येक मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। प्रभावित क्षेत्र में आवश्यक एहतियाती उपाय लागू किए गए हैं और चिकित्सा दल लगातार स्थानीय स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो आगे भी जांच और निगरानी का दायरा बढ़ाया जाएगा, ताकि संक्रमण को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके।

    कोरोना महामारी के बाद लंबे समय तक जिले में कोई नया मामला सामने नहीं आया था। ऐसे में इस संक्रमण की पुष्टि ने स्वास्थ्य तंत्र को एक बार फिर सतर्क रहने का संदेश दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संक्रमण के छिटपुट मामलों को हल्के में लेने के बजाय समय पर जांच, निगरानी और उपचार पर विशेष ध्यान देना जरूरी है ताकि किसी भी संभावित जोखिम को रोका जा सके।

    स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों से भी जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। यदि किसी व्यक्ति को बुखार, खांसी, सर्दी, गले में खराश या सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण महसूस हों तो बिना देरी चिकित्सकीय सलाह लेकर आवश्यक जांच करानी चाहिए। अधिकारियों ने यह भी कहा है कि व्यक्तिगत स्वच्छता, आवश्यक सावधानियों और स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन संक्रमण की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फिलहाल जिले में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन प्रशासन पूरी सतर्कता के साथ हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है।

  • दिल्ली में महिलाओं के लिए 56 स्पेशल इलेक्ट्रिक बसों की तैयारी, व्यस्त रूटों पर मिलेगी सुरक्षित और सुविधाजनक सफर की सुविधा

    दिल्ली में महिलाओं के लिए 56 स्पेशल इलेक्ट्रिक बसों की तैयारी, व्यस्त रूटों पर मिलेगी सुरक्षित और सुविधाजनक सफर की सुविधा


    नई दिल्ली ।
    राजधानी में महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुरक्षित, सुविधाजनक और आधुनिक बनाने की दिशा में दिल्ली सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। इस योजना के तहत दिल्ली परिवहन निगम महिलाओं के लिए 56 विशेष इलेक्ट्रिक बसों का संचालन शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इनमें 30 लेडीज स्पेशल इलेक्ट्रिक बसें और 26 यूनिवर्सिटी लेडीज स्पेशल (यू-एसपीएल) बसें शामिल होंगी। इस पहल का उद्देश्य कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को दैनिक आवागमन के दौरान सुरक्षित, समयबद्ध और आरामदायक यात्रा उपलब्ध कराना है।

    सरकार के अनुसार इन विशेष बसों का संचालन राजधानी के 28 प्रमुख और व्यस्त मार्गों पर किया जाएगा। ऐसे रूटों का चयन किया गया है जहां कार्यालय जाने वाली महिलाओं और शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाली छात्राओं की संख्या अधिक रहती है। सुबह और शाम के व्यस्त समय में सामान्य बसों में बढ़ने वाली भीड़ को कम करने के साथ महिलाओं को अधिक भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध कराना इस योजना की प्रमुख प्राथमिकता है।

    लेडीज स्पेशल इलेक्ट्रिक बसों का नेटवर्क राजधानी के प्रमुख कार्यालय क्षेत्रों, व्यावसायिक केंद्रों, संस्थागत परिसरों और महत्वपूर्ण मेट्रो इंटरचेंज को आपस में जोड़ेगा। इन बसों का संचालन विशेष रूप से कार्यालय आने-जाने वाली महिलाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय समय के अनुसार किया जाएगा। सुबह लगभग 7:52 बजे से 9:00 बजे तक और शाम 4:32 बजे से 6:15 बजे तक इन बसों की सेवाएं उपलब्ध रहेंगी, जिससे पीक आवर्स के दौरान महिला यात्रियों को अधिक सुविधा मिल सके।

    दूसरी ओर, यूनिवर्सिटी लेडीज स्पेशल बसें दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस, साउथ कैंपस तथा अन्य प्रमुख शिक्षण संस्थानों को राजधानी के विभिन्न आवासीय क्षेत्रों से जोड़ेंगी। इन बसों का लाभ नजफगढ़, रोहिणी, जनकपुरी, मुंडका, मयूर विहार, कालकाजी, पल्ला और धौलाकुआं सहित कई इलाकों में रहने वाली छात्राओं को मिलेगा। इससे कॉलेज और विश्वविद्यालय आने-जाने वाली छात्राओं के लिए यात्रा अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनने की उम्मीद है।

    योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षा से जुड़ा है। सभी 56 बसें पूरी तरह इलेक्ट्रिक होंगी और आधुनिक सुरक्षा सुविधाओं से लैस रहेंगी। इनमें सीसीटीवी कैमरे, ऑपरेशन कंट्रोल सेंटर से जुड़े पैनिक बटन, लो-फ्लोर रैंप जैसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। आवश्यकता के अनुसार बस मार्शल या महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती भी की जा सकेगी। साथ ही इन बसों की अलग पहचान के लिए विशेष ब्रांडिंग की जाएगी, ताकि महिला यात्री इन्हें आसानी से पहचान सकें।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन विशेष बसों को पिंक स्मार्ट कार्ड प्रणाली से जोड़ा जाएगा। इसके माध्यम से पात्र महिला यात्रियों को कैशलेस और निःशुल्क यात्रा की सुविधा उपलब्ध होगी। इससे यात्रा प्रक्रिया अधिक सरल और डिजिटल बनेगी तथा महिलाओं को टिकट संबंधी औपचारिकताओं से भी राहत मिलेगी। इलेक्ट्रिक बसों के उपयोग से प्रदूषण में कमी लाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने का लक्ष्य भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    परिवहन मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और सुविधाजनक यात्रा सुनिश्चित करना सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके अनुसार यह विशेष बस नेटवर्क महिला यात्रियों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। उन्होंने विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में शुरू की जा रही यह पहल राजधानी की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अधिक समावेशी, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल बनाएगी। साथ ही इससे कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के दैनिक सफर को अधिक सहज, भरोसेमंद और आरामदायक बनाने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।

  • दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण की अवधि बढ़ी, अब 19 अक्टूबर को जारी होगी अंतिम वोटर लिस्ट, सत्यापन को मिला अतिरिक्त समय

    दिल्ली में मतदाता सूची पुनरीक्षण की अवधि बढ़ी, अब 19 अक्टूबर को जारी होगी अंतिम वोटर लिस्ट, सत्यापन को मिला अतिरिक्त समय

    नई दिल्ली । निर्वाचन आयोग ने दिल्ली में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-एसआईआर) कार्यक्रम की समयसीमा में संशोधन करते हुए पूरी प्रक्रिया को दस दिन आगे बढ़ा दिया है। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार अब राजधानी की अंतिम मतदाता सूची 19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित की जाएगी। आयोग का कहना है कि इस निर्णय का उद्देश्य अधिक से अधिक पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने, जानकारी अद्यतन कराने और सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराना है।

    दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान 30 जून से शुरू किया गया था। इसके तहत बूथ लेवल अधिकारियों को घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करने, आवश्यक प्रपत्र उपलब्ध कराने तथा उन्हें वापस एकत्र करने की जिम्मेदारी दी गई थी। पहले यह अभियान 29 जुलाई तक पूरा होना था, लेकिन अब इसकी अंतिम तिथि बढ़ाकर 8 अगस्त कर दी गई है। इसी अवधि में मतदान केंद्रों के पुनर्गठन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी पूरी की जाएंगी ताकि संशोधित मतदाता सूची अधिक सटीक और अद्यतन बन सके।

    निर्वाचन आयोग के संशोधित कार्यक्रम के अनुसार मतदाता सूची का प्रारंभिक मसौदा अब 17 अगस्त को प्रकाशित किया जाएगा। पहले इसे 5 अगस्त को जारी किया जाना था। मसौदा सूची जारी होने के बाद नागरिकों को अपने नाम जोड़ने, हटाने या किसी प्रकार की त्रुटि में सुधार कराने का अवसर मिलेगा। इसके लिए 17 अगस्त से 16 सितंबर तक दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी। इसके बाद संबंधित अधिकारी सभी आवेदनों की जांच करेंगे और आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन करते हुए उनका निपटारा करेंगे।

    आयोग ने स्पष्ट किया है कि दावों और आपत्तियों की जांच की प्रक्रिया 17 अगस्त से 15 अक्टूबर तक चलेगी। इस दौरान पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने, गलत प्रविष्टियों में सुधार करने तथा आवश्यक संशोधन करने का कार्य पूरा किया जाएगा। सभी प्रक्रियाएं समाप्त होने के बाद 19 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी, जिसे आगामी चुनावी प्रक्रियाओं के लिए आधिकारिक आधार माना जाएगा।

    विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान अब तक सामने आए प्रारंभिक आंकड़े भी महत्वपूर्ण संकेत दे रहे हैं। सत्यापन के दौरान 30,907 ऐसे मतदाताओं की पहचान हुई है जिनका निधन हो चुका है। इसके अलावा 1,20,450 से अधिक मतदाता ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपना निवास स्थान बदल लिया है। वहीं 12,160 मतदाता ऐसे पाए गए जो घर-घर सत्यापन के समय अपने पंजीकृत पते पर उपलब्ध नहीं थे। इन आंकड़ों के आधार पर आयोग मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई कर रहा है।

    निर्वाचन आयोग के अनुसार दिल्ली में चल रहा यह अभियान देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के तीसरे चरण का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत 14 मई को की गई थी। इस चरण के पूरा होने के बाद हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। आयोग का मानना है कि नियमित अंतराल पर इस प्रकार का व्यापक सत्यापन लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने और मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

    दिल्ली के अलावा पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक सहित कई राज्यों में भी विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम की समयसीमा बढ़ाई गई है। आयोग का कहना है कि विभिन्न राज्यों से प्राप्त प्रशासनिक आवश्यकताओं और सत्यापन कार्य की प्रगति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है। इससे अधिक से अधिक पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने का अवसर मिलेगा और अंतिम सूची पहले की तुलना में अधिक सटीक तथा व्यापक रूप से अद्यतन हो सकेगी।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच पर इमरान मसूद के सवाल, बोले- गंभीर आरोप हैं तो अब तक FIR क्यों नहीं..

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच पर इमरान मसूद के सवाल, बोले- गंभीर आरोप हैं तो अब तक FIR क्यों नहीं..

    नई दिल्ली । राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस मामले की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं तो विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अब तक अलग से प्राथमिकी क्यों दर्ज नहीं की। उन्होंने मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करते हुए कहा कि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने आनी चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

    इमरान मसूद ने कहा कि इस मामले में प्रारंभिक शिकायत मंदिर ट्रस्ट की ओर से दर्ज कराई गई थी, जबकि आरोप भी ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों पर लगाए जा रहे हैं। ऐसे में जांच एजेंसी की भूमिका पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई देनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि जांच में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिल रहे हैं तो संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत आवश्यक कार्रवाई भी स्पष्ट रूप से सामने आनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक या सार्वजनिक संस्था से जुड़े मामले में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है, ताकि लोगों का भरोसा न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर कायम रहे। उनका कहना था कि जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए तथा किसी भी स्तर पर पक्षपात की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान पर भी इमरान मसूद ने प्रतिक्रिया दी, जिसमें मुख्यमंत्री ने कहा था कि जिन लोगों ने कभी रामलीला और कांवड़ यात्रा पर रोक लगाने का प्रयास किया, वही अब आस्था की बात कर रहे हैं। इस पर मसूद ने कहा कि उन्हें ऐसी किसी रोक की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि रामलीला लंबे समय से भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग सहभागिता करते आए हैं। उनके अनुसार, धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।

    कांग्रेस सांसद ने कहा कि समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी परंपरा या आयोजन को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के आधार पर समझा जाना चाहिए। उनका मानना है कि सभी धार्मिक आयोजनों के प्रति सम्मान का भाव बना रहना चाहिए।

    इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चल रही चर्चाओं पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि गठबंधन को लेकर अंतिम निर्णय दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व करेगा। उनके अनुसार, यदि किसी राजनीतिक गठबंधन की चर्चा हो रही है तो उसका प्रभाव केवल बयानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वह राजनीतिक स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देना चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि वह किसी गठबंधन के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकता कांग्रेस संगठन को मजबूत करना है। उनके अनुसार, राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक आधार को मजबूत करने के साथ-साथ जनता के मुद्दों पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। फिलहाल राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच जारी है और इस पर आए राजनीतिक बयानों के बीच अब सभी की नजर जांच एजेंसियों की आगे की कार्रवाई और संभावित निष्कर्षों पर बनी हुई है।

  • सोनम वांगचुक के अनशन पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली सरकार से मांगा जवाब, आज फिर होगी सुनवाई

    सोनम वांगचुक के अनशन पर हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और दिल्ली सरकार से मांगा जवाब, आज फिर होगी सुनवाई

    नई दिल्ली । सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आमरण अनशन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर न्यायिक प्रक्रिया तेज हो गई है। जंतर-मंतर पर जारी उनके अनशन के 19वें दिन अदालत ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। मामले की सुनवाई एक बार फिर निर्धारित की गई है, जबकि दूसरी ओर वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।

    सोनम वांगचुक 28 जून से जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनका आंदोलन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जुड़ा हुआ है। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि हाल के महीनों में सामने आए परीक्षा से जुड़े विवादों और कथित पेपर लीक की घटनाओं ने बड़ी संख्या में छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है। इसी मुद्दे को लेकर लगातार प्रदर्शन किया जा रहा है।

    अनशन के दौरान वांगचुक के कुछ वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं, जिनमें उनका स्वास्थ्य पहले की तुलना में काफी कमजोर दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि लंबे समय से भोजन नहीं लेने के कारण उनका वजन काफी कम हो गया है। इसके साथ ही कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द और निम्न रक्तचाप जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की भी चर्चा हो रही है। हालांकि उनकी चिकित्सकीय स्थिति को लेकर अंतिम आधिकारिक जानकारी संबंधित स्वास्थ्य परीक्षण के आधार पर ही स्पष्ट होगी।

    वांगचुक की सेहत को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि उनकी जान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक चिकित्सकीय कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने और चिकित्सकीय उपचार उपलब्ध कराने पर विचार किया जाए।

    मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने को कहा। अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले में अगली सुनवाई के दौरान सरकारों का पक्ष और अदालत की आगे की टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इस बीच आंदोलन से जुड़े संगठन ने भी आगामी दिनों के लिए अपनी रणनीति घोषित की है। संगठन ने संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के अवसर पर जंतर-मंतर से संसद भवन तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने की घोषणा की है। इसके लिए छात्रों, अभिभावकों और आम नागरिकों से भी बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की गई है।

    वांगचुक के समर्थन में विभिन्न सामाजिक संगठनों और छात्र समूहों की सक्रियता भी बढ़ती दिखाई दे रही है। आंदोलनकारी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की मांग को लेकर लगातार अपनी आवाज उठा रहे हैं। दूसरी ओर प्रशासन और न्यायालय की निगाहें अब प्रदर्शन की स्थिति और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर बनी हुई हैं।

    दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हैं। अदालत के समक्ष सरकार का जवाब, वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति और जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतें गिराने के आदेश पर सियासत तेज, विपक्ष ने सरकार की कार्रवाई पर उठाए सवाल

    जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतें गिराने के आदेश पर सियासत तेज, विपक्ष ने सरकार की कार्रवाई पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को अवैध निर्माण मानते हुए उन्हें गिराने के प्रशासनिक आदेश के बाद राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। इस कार्रवाई को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। एक ओर सरकार इसे कानून के दायरे में की जा रही कार्रवाई बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित कदम बताते हुए सरकार पर तीखे सवाल उठाए हैं।

    जिला प्रशासन ने विश्वविद्यालय परिसर की 40 में से 38 इमारतों को अवैध निर्माण की श्रेणी में रखते हुए उनके विध्वंस के आदेश जारी किए हैं। यह विश्वविद्यालय समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मोहम्मद आजम खान का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जाता है। प्रशासन का कहना है कि संबंधित निर्माणों को लेकर कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा रही है और सभी निर्णय नियमों के अनुरूप लिए गए हैं।

    मामले पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता कानून व्यवस्था बनाए रखना है। उनके अनुसार, सरकार किसी भी मामले में कानून से समझौता नहीं करेगी और जहां भी नियमों का उल्लंघन पाया जाएगा, वहां निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रशासन पूरी पारदर्शिता के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है।

    वहीं विपक्ष ने इस कार्रवाई को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। आरजेडी नेता मनोज कुमार झा ने विश्वविद्यालय को लेकर जारी विध्वंस नोटिस पर सवाल उठाते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों के प्रति इस तरह का रवैया उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बुलडोजर की कार्रवाई का चयनात्मक इस्तेमाल कर रही है और गंभीर अपराधों के मामलों में ऐसी सख्ती दिखाई नहीं देती। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा संस्थानों का सम्मान होना चाहिए और कानून का समान रूप से पालन कराया जाना चाहिए।

    जौहर विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2006 में की गई थी, जबकि इसका औपचारिक उद्घाटन वर्ष 2012 में हुआ था। विश्वविद्यालय लगभग 1500 बीघा भूमि में फैला हुआ है। परिसर के लिए खरीदी गई जमीन और निर्माण कार्य को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद जारी हैं। प्रशासन और जांच एजेंसियां पिछले कई वर्षों से विश्वविद्यालय से जुड़े विभिन्न मामलों की जांच कर रही हैं।

    बताया जाता है कि मोहम्मद आजम खान के खिलाफ दर्ज कई मामलों का संबंध भी जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े भूमि और निर्माण विवादों से है। इन्हीं मामलों के आधार पर समय-समय पर प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाती रही है। राज्य में वर्ष 2017 के बाद विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों में जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की गति तेज हुई, जिसके बाद कई कानूनी प्रक्रियाएं आगे बढ़ाई गईं।

    फिलहाल जौहर विश्वविद्यालय को लेकर जारी विध्वंस आदेश राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। सरकार इसे पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष निष्पक्षता और कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठा रहा है। अब सभी की नजर इस मामले में आगे होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका असर केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं बल्कि राज्य की राजनीतिक और कानूनी बहस पर भी पड़ सकता है।

  • मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित

    मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित


    नई दिल्ली ।
    संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर अपना आत्मविश्वास जाहिर किया है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रमुख रामदास अठावले ने दावा किया है कि अब एनडीए के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत है, जिसके आधार पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया है।

    अठावले ने कहा कि पिछले संसदीय सत्र में इन विधेयकों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था, जिसके कारण वे पारित नहीं हो पाए। उनके अनुसार उस समय विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संविधान संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। अब राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव आया है और सरकार को पहले की तुलना में अधिक समर्थन मिलने की संभावना है।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया जा सकता है। उनका कहना है कि सरकार इन महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है और गठबंधन के सहयोगी दल भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएंगे।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संसद में मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि कुछ दलों और सांसदों के समर्थन से गठबंधन का आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत तक पहुंच गया है। इसी आधार पर उन्होंने उम्मीद जताई कि संविधान संशोधन से जुड़े लंबित विधेयकों को इस बार आवश्यक समर्थन प्राप्त होगा।

    अठावले ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण लागू होने से वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। उनके अनुसार यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

    परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि समय-समय पर जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना आवश्यक होता है। उनका कहना था कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नियमित हिस्सा है और लंबे अंतराल के बाद इसे लागू करना आवश्यक माना जाता है ताकि प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और प्रभावी बन सके।

    उन्होंने विपक्षी दलों से भी अपील की कि राष्ट्रीय महत्व के इन विधेयकों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखा जाए। उनके अनुसार महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और निर्वाचन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने जैसे विषय व्यापक जनहित से जुड़े हैं, इसलिए इन पर सकारात्मक सहयोग मिलना चाहिए।

    उल्लेखनीय है कि पिछले संसदीय सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन प्रस्ताव अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सके थे। इसके बाद से इन विधेयकों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं लगातार जारी हैं। अब मानसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्री के इस दावे ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    आगामी संसद सत्र में सरकार की रणनीति, विपक्ष का रुख और सदन में संख्या बल की वास्तविक स्थिति पर सभी की नजरें रहेंगी। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में निर्णायक प्रगति देखने को मिल सकती है।

  • दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    नई दिल्ली । भारतीय वास्तुकला और प्राचीन इतिहास हमेशा से ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। समकालीन दुनिया में जब भी समय यात्रा या ‘टाइम ट्रेवल’ का उल्लेख होता है, तो सामान्यतः हॉलीवुड की फिल्मों या विज्ञान कथाओं का ध्यान आता है। लेकिन दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों ने आधुनिक विज्ञान और अनुसंधानकर्ताओं को एक नए विमर्श पर मजबूर कर दिया है। इन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इस सीमा तक विस्मयकारी है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उस दौर के शिल्पकारों को भविष्य की तकनीकों का आभास था या उनके पास कोई अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक समझ मौजूद थी।

    तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित पंचवर्णस्वामी मंदिर इस अनूठे रहस्य का एक अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर की एक दीवार पर एक ऐसी नक्काशी देखने को मिलती है जो आधुनिक इतिहासकारों को चकित कर देती है। इस नक्काशी में एक मानव आकृति को स्पष्ट रूप से दो पहियों वाली साइकिल जैसी सवारी चलाते हुए प्रदर्शित किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, आधुनिक दुनिया में साइकिल का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सदियों पहले के मूर्तिकारों ने एक ऐसी सवारी की परिकल्पना कैसे की, जिसे पैडल मारकर चलाया जाता है। इसे लेकर विभिन्न विशेषज्ञ प्राचीन विज्ञान के उन्नत होने के कयास लगा रहे हैं।

    इसी प्रकार का तकनीकी कौतूहल कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है। इस मंदिर की दीवारों पर स्थापित कुछ मूर्तियों के हाथों में ऐसे उपकरण और आकृतियां दिखाई देती हैं, जो वर्तमान समय के आधुनिक गैजेट्स, गियर अथवा यांत्रिक पुर्जों से अत्यधिक मेल खाती हैं। कुछ विशिष्ट आकृतियों में इतनी सूक्ष्मता से काम किया गया है कि वे किसी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी यंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। ग्रेनाइट जैसे अत्यंत कठोर पत्थरों पर इतनी फिनिशिंग और सटीकता के साथ आकृतियों को उकेरना आज की अत्याधुनिक मशीनों के बिना अत्यंत कठिन माना जाता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन काल में निर्माण तकनीक हमारी वर्तमान सोच से कहीं अधिक विकसित थी।

    इन सबमें सबसे अधिक चौंकाने वाला रहस्य कुछ मंदिरों के स्तंभों पर मिली वह नक्काशी है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट की वेशभूषा से मिलती-जुलती है। इस विशिष्ट आकृति के सिर पर एक गोल हेलमेट जैसी संरचना है और पीठ पर एक ऐसा उपकरण बंधा हुआ दिखाई देता है जो आधुनिक स्पेससूट के ऑक्सीजन टैंक जैसा प्रतीत होता है। उस प्राचीन काल में, जब विमानन तकनीक का विकास नहीं हुआ था, पत्थरों पर ऐसी आकृति का पाया जाना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है। यही कारण है कि जिज्ञासु और विश्लेषक इन प्राचीन धरोहरों को समय यात्रा के विजुअल साक्ष्यों से जोड़कर देखने लगे हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और इतिहासकार इन प्राचीन कलाकृतियों के पीछे छिपे वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं। जहां कुछ विश्लेषक इसे केवल एक संयोग या कलात्मक कल्पना का परिणाम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और विमानन शास्त्र का स्तर अत्यंत उच्च था। प्राचीन ग्रंथों और संहिताओं में भी ऐसी उन्नत तकनीकों के सांकेतिक संदर्भ मिलते हैं। कारण चाहे जो भी हो, दक्षिण भारत के ये ऐतिहासिक मंदिर इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करते हैं कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत में ऐसे अनेक रहस्य छिपे हैं, जिनकी पूर्ण व्याख्या करने में आधुनिक विज्ञान को अभी लंबा समय लगेगा।

  • न्यायिक गरिमा और आचार संहिता पर उठे गंभीर सवाल: कार्यकाल के दौरान गैस एजेंसी चलाने के विवाद में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश

    न्यायिक गरिमा और आचार संहिता पर उठे गंभीर सवाल: कार्यकाल के दौरान गैस एजेंसी चलाने के विवाद में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश

    नई दिल्ली । देश की उच्च न्यायपालिका में संवैधानिक पदों पर आसीन न्यायाधीशों के लिए निर्धारित नैतिक आचार संहिता और नियमों की अनदेखी का एक अत्यंत संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और बाद में मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दे चुके एक सेवानिवृत्त जस्टिस अपने लगभग 16 वर्षों के लंबे न्यायिक कार्यकाल के दौरान समानांतर रूप से एक एलपीजी गैस वितरण एजेंसी का संचालन भी करते रहे। इस पूरे मामले का आधिकारिक भंडाफोड़ सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़े एक डीलरशिप विवाद और एजेंसी के पूर्व प्रबंधक की विधवा द्वारा उच्च न्यायालय में दायर की गई एक रिट याचिका के माध्यम से हुआ है, जिसने न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

    प्राप्त विवरणों और दस्तावेजों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ने वर्ष 1984 में संबंधित व्यक्ति को किचन फ्लेम के नाम से एक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप आवंटित की थी। स्थापित नियमों और अलिखित न्यायिक आचार संहिता के अनुसार, संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के लिए यह अनिवार्य माना जाता है कि उनका सरकार, निजी पक्षों अथवा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ किसी भी प्रकार का आर्थिक, व्यावसायिक या संविदात्मक संबंध नहीं होना चाहिए ताकि हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो। इसके बावजूद, संबंधित न्यायाधीश नवंबर 2024 में मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने तक इस व्यावसायिक गैस एजेंसी के वैधानिक मालिक बने रहे, जिसे प्रथम दृष्टया स्थापित सेवा नियमों और नैतिक मापदंडों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।

    अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक पदों पर आसीन रहने के बावजूद इस व्यावसायिक समझौते को समय-समय पर नवीनीकृत भी कराया जाता रहा। संबंधित न्यायाधीश ने अस्सी के दशक के मध्य में एक अधिवक्ता के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी, जिसके बाद वर्ष 2008 में वे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए और वर्ष 2023 में पदोन्नत होकर मुख्य न्यायाधीश बने। इस पूरे सफर के दौरान गैस एजेंसी के अनुबंध को कई बार रिन्यू कराया गया, जिसकी वैधता वर्ष 2030 तक के लिए बढ़ा दी गई थी। तेल कंपनी के साथ हुए सबसे हालिया समझौते के आधिकारिक स्टाम्प पेपर पर संबंधित न्यायाधीश के हस्ताक्षर और तस्वीरें भी मौजूद पाई गईं, जो इस व्यावसायिक गतिविधि में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता को प्रमाणित करती हैं।

    इस पूरे गुत्थी का खुलासा तब हुआ जब उक्त गैस एजेंसी का कामकाज संभालने वाले पूर्व प्रबंधक की विधवा ने मालिकाना हक को अपने नाम पर स्थानांतरित करने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली। इसी विधिक प्रक्रिया के दौरान दिसंबर 2025 में प्रशासन के पास एक आधिकारिक जनशिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि गैस एजेंसी के वास्तविक मालिक एक पूर्णकालिक न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे हैं। इस गंभीर शिकायत के आधार पर तेल कंपनी ने संबंधित पूर्व न्यायाधीश को लगातार कई कारण बताओ नोटिस जारी किए। कंपनी का स्पष्ट रुख था कि बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी संवैधानिक पद पर रहते हुए व्यावसायिक एजेंसी चलाना नियमों का उल्लंघन है, इसलिए क्यों न इस आवंटन को रद्द कर दिया जाए।

    न्यायिक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी संबंधित व्यक्ति की ओर से तेल कंपनी द्वारा जारी किए गए किसी भी कारण बताओ नोटिस का कोई विधिक जवाब दाखिल नहीं किया गया। अंततः प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए जुलाई के प्रथम सप्ताह में किचन फ्लेम नामक इस एलपीजी डीलरशिप के लाइसेंस को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। लाइसेंस सस्पेंड होने के बाद पीड़ित परिवार ने दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिनका तर्क है कि मूल आवंटनकर्ता की गलतियों और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण उन्हें बेवजह आर्थिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह पूरा मामला एक ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायपालिका पहले से ही कुछ अन्य आंतरिक विवादों के कारण असहज स्थिति का सामना कर रही है, और इस नए घटनाक्रम ने न्यायिक शुचिता पर बहस को और तेज कर दिया है।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर टली सुनवाई, शीर्ष अदालत ने कहा- बातचीत चल रही है तो दे रहे हैं समय

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर टली सुनवाई, शीर्ष अदालत ने कहा- बातचीत चल रही है तो दे रहे हैं समय

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने मथुरा स्थित ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर होने वाली सुनवाई को आगामी 12 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, पीठ को यह अवगत कराया गया कि इस विवाद से जुड़े विभिन्न हिंदू पक्षों के बीच आपस में कुछ अनौपचारिक बातचीत का दौर चल रहा है। यह आंतरिक विचार-विमर्श इस मुख्य बिंदु पर केंद्रित है कि अदालत के समक्ष चल रहे विभिन्न मुकदमों में से किसे मुख्य मुकदमा माना जाए और किसका दावा प्राथमिक होगा। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने वादियों के बीच चल रही इसी ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा को ध्यान में रखते हुए मामले को आगे बढ़ाने का निर्देश जारी किया।

    अदालत की कार्यवाही की शुरुआत में ही पीठ ने विभिन्न हिंदू पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं से उनके बीच चल रही इस आंतरिक बातचीत की प्रगति के संबंध में सीधे सवाल पूछे। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यदि वादियों के बीच मामले को सुलझाने अथवा मुकदमों के एकीकरण को लेकर कोई गंभीर विमर्श चल रहा है, तो अदालत उन्हें उचित समय देने के लिए तैयार है। इस दौरान एक हिंदू पक्ष के वकील ने पीठ से यह भी आग्रह किया कि इस आंतरिक बातचीत को पूरी तरह अनौपचारिक रखा जाए और न्यायालय अपने लिखित आदेश में इस चर्चा का उल्लेख दर्ज न करे। हालांकि, पीठ ने तार्किक रुख अपनाते हुए कहा कि यदि पक्षकारों के बीच कोई सकारात्मक विमर्श चल रहा है, तो उसे आदेश में दर्ज करने में कोई विधिक बाधा नहीं होनी चाहिए।

    सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले को बार-बार स्थगित किए जाने की प्रवृत्ति पर भी ध्यान दिलाया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस संवेदनशील मामले को पूर्व में भी कई बार टाला जा चुका है, इसलिए इस बार स्थगन का आदेश केवल इसी ठोस आधार पर दिया जा रहा है कि पक्षकार आपसी सहमति और मुकदमों के स्वरूप को लेकर किसी निर्णय पर पहुंच सकें। अदालत ने वकीलों को आश्वस्त किया कि वे किसी भी पक्ष को बातचीत के लिए विवश नहीं कर रहे हैं, बल्कि वादियों के बीच के समन्वय को देखते हुए ही प्रक्रिया को समय दे रहे हैं।

    यह पूरा विधिक विवाद दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष 2025 के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में एक विशिष्ट मुकदमे से जुड़े हिंदू पक्ष को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों का आधिकारिक प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया था, जिसे दूसरे हिंदू पक्ष ने चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रकार का एकपक्षीय प्रतिनिधित्व अन्य वादियों के दावों को प्रभावित कर सकता है। अब सभी पक्षों की नजरें 12 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि हिंदू पक्षों की आपसी बातचीत से मुकदमों की रूपरेखा में क्या बदलाव आता है।