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  • क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही तीन-भाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नई भाषा को सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस नीति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नए नियमों के तहत अंग्रेजी को गैर-मूल भाषा की श्रेणी में रखा गया है, जिससे छात्रों के सामने भाषाई चयन का संकट खड़ा हो गया है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दायर नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आगामी 22 जुलाई की तारीख तय की है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने के लिए दस दिनों का समय मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है, हालांकि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और उनके वर्गीकरण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सीबीएसई का यह सर्कुलर बिना उचित कानूनी अधिकार के जारी किया गया है, जो छात्रों पर जबरन भाषा थोपने जैसा है। नई नीति के अनुसार, कक्षा नौ के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो कक्षा पांच से निरंतर एक निश्चित भाषाई पैटर्न का पालन कर रहे हैं। वकीलों ने चिंता जताई कि यदि कोई छात्र संस्कृत के स्थान पर पंजाबी या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा चुनना चाहता है, तो स्कूलों के पास न तो पर्याप्त योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक पाठ्यपुस्तकें।

    अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि भले ही बोर्ड ने छात्रों को संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया है, लेकिन देश के सभी स्कूलों के लिए इतने बड़े पैमाने पर भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति करना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके अतिरिक्त, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर निर्धारित समय सीमा के बाद भी केवल तीन भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार की गई इस त्रिभाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर बच्चों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। ऐतिहासिक रूप से इस फॉर्मूले को पहली बार वर्ष 1964-66 में शिक्षा आयोग द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया। नई व्यवस्था के तहत भाषाई चुनाव की प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया है कि यदि कोई छात्र पहली दो भाषाओं के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में एक और भारतीय भाषा या फिर अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा का चयन करना होगा।

    प्रशासनिक स्पष्टीकरण के अनुसार, यह नई त्रिभाषा व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 में केवल नौवीं कक्षा के छात्रों पर ही पूरी तरह लागू होगी। वर्तमान में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे छात्र पुरानी द्विभाषी व्यवस्था के तहत ही अपनी बोर्ड परीक्षाएं देंगे। नए नियमों के मुताबिक, यदि कोई छात्र अंग्रेजी विषय का चयन करता है, तो वह अन्य किसी विदेशी भाषा जैसे कोरियन, जापानी, फ्रेंच या जर्मन का चुनाव नहीं कर सकेगा। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल असेसमेंट के दौरान तीसरी भाषा में उत्तीर्ण हुए बिना छात्रों को दसवीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाएगा।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा पति की आय का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी को देना कोई अनिवार्य कानूनी नियम नहीं है। अदालत ने कहा कि यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालतें इससे कम या अधिक गुजारा भत्ता तय कर सकती हैं।

    जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कानपुर देहात के एक दंपति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी को मिलने वाला मासिक गुजारा भत्ता 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये करने का आदेश दिया।

    यह मामला पिंकी उर्फ प्रीति और उनके पति श्री जय प्रकाश से संबंधित है। पति ने पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया था। तलाक के आदेश के आधार पर पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए गुजारा भत्ते को चुनौती दी, जबकि पत्नी ने भत्ते की राशि अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल तलाक हो जाने से पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने दोबारा विवाह नहीं किया है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ नहीं रह रही है, तो वह गुजारा भत्ते की हकदार रहेगी।

    अदालत ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य केवल जीवन-निर्वाह भर की राशि उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिला को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना है।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि रिवीजन कोर्ट सामान्य परिस्थितियों में निचली अदालत द्वारा तय की गई भत्ते की राशि में बदलाव नहीं करती, क्योंकि उसका दायित्व केवल आदेश की वैधानिकता की समीक्षा करना होता है। हालांकि, यदि निचली अदालत का निर्णय गलत तथ्यों पर आधारित हो या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई हो, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

    मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पति का मासिक वेतन 86,674 रुपये है, जबकि विभिन्न कटौतियों के बाद उसके खाते में 67,043 रुपये प्राप्त होते हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना गुजारा भत्ता निर्धारित कर दिया था। साथ ही, पति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अपनी संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया था।

    इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को दिए अपने फैसले में पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मासिक गुजारा भत्ता 20 हजार रुपये निर्धारित किया, जो आवेदन की तारीख से प्रभावी होगा।

  • यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में

    यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में


    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन के लिए तीसरे चरण का सर्वे पूरा कर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, अब तक हुए तीनों सर्वे में करीब 20 संभावित दावेदारों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। इनमें मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, नगर पालिका चेयरमैन और संगठन से जुड़े कई पदाधिकारी शामिल हैं।

    तीन चरण पूरे, अभी दो सर्वे बाकी
    भाजपा विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार सक्रिय है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य भी हाल के महीनों में मुरादाबाद का दौरा कर चुके हैं। इसके साथ ही पार्टी विभिन्न अभियानों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है।

    उम्मीदवार चयन के लिए भाजपा अलग-अलग एजेंसियों से सर्वे करा रही है। पहला सर्वे जनवरी में, दूसरा मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर करीब एक महीने तक चला, जबकि तीसरा सर्वे जून में कराया गया, जिसकी प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है।

    इन सीटों पर ये नाम सबसे अधिक चर्चा में

    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तीनों सर्वे में निम्न विधानसभा क्षेत्रों से इन संभावित दावेदारों के नाम सबसे अधिक चर्चा में रहे—
    मुरादाबाद नगर: विधायक रितेश गुप्ता, पूर्व महानगर अध्यक्ष मनोज गुप्ता, महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला।
    मुरादाबाद देहात: डॉ. के.के. मिश्रा, श्याम बिहारी मिश्रा, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष (अनुसूचित मोर्चा) रजनीकांत जाटव।
    कांठ: पूर्व विधायक राजेश कुमार सिंह ‘चुन्नू’, डिलारी ब्लॉक प्रमुख पूनम चौधरी, जिला पंचायत सदस्य विनोद सैनी और राजपाल सिंह।
    ठाकुरद्वारा: पूर्व जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह चौहान, अजय प्रताप सिंह और पूर्व सांसद सर्वेश सिंह की पत्नी साधना सिंह।
    बिलारी: परमेश्वर लाल सैनी, पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेश सैनी, नगर पालिका चेयरमैन रघुराज सिंह यादव और ऋषिपाल चौधरी।
    कुंदरकी: विधायक रामवीर सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. शैफाली सिंह और किसान मोर्चा के क्षेत्रीय महामंत्री दिनेश ठाकुर।

    सर्वे में पूछे गए ये प्रमुख सवाल

    भाजपा की सर्वे एजेंसियों ने मतदाताओं और स्थानीय लोगों से कई बिंदुओं पर फीडबैक लिया। प्रमुख सवालों में शामिल रहे—
    – विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की वर्तमान स्थिति कैसी है?
    – मौजूदा विधायक या संभावित दावेदार की लोकप्रियता कितनी है?
    – केंद्र सरकार की योजनाओं को जनता किस नजरिए से देख रही है?
    – योगी सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की क्या राय है?
    – विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चुनने का आधार क्या होना चाहिए?
    – यदि पहला विकल्प न हो तो दूसरे संभावित उम्मीदवार का नाम कौन हो सकता है?

    सितंबर या दिसंबर में होगा अंतिम सर्वे
    भाजपा सूत्रों के अनुसार, उम्मीदवारों के चयन से पहले कुल पांच चरणों में सर्वे कराए जाने हैं। फिलहाल दो सर्वे बाकी हैं। यदि विधानसभा चुनाव समय से पहले नवंबर या दिसंबर में होते हैं, तो सितंबर में होने वाला चौथा सर्वे अंतिम माना जाएगा। वहीं, यदि चुनाव तय समय पर हुए तो दिसंबर में पांचवां और अंतिम सर्वे कराया जाएगा।

    क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम तीसरे सर्वे में आया
    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, एक क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम पहले दो सर्वे में चर्चा में नहीं था, लेकिन तीसरे सर्वे में वह सामने आया। हालांकि, एजेंसी को यह नाम मुख्य रूप से पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में मिला, जबकि आम जनता के बीच उनकी पहचान सीमित पाई गई।

    भाजपा महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला ने कहा कि सर्वे की प्रक्रिया लगातार चल रही है और यह अंतिम सर्वे नहीं है। वहीं, भाजपा जिलाध्यक्ष आकाश पाल का कहना है कि पार्टी एजेंसियों के माध्यम से जमीनी स्तर पर फीडबैक लेकर संगठन और संभावित उम्मीदवारों की स्थिति का आकलन करती है।

  • भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है, जिससे अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष को असुविधा न हो और धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण ढंग से संचालित हो सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम प्रकृति की होगी और इससे किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकारों या दावों पर कोई अंतिम प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवेदनशील मामलों में शांति, सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करे, जिससे सभी संबंधित पक्षों की आवश्यकताओं का संतुलित समाधान हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम व्यवस्था को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। एक पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग करता है। इसी विवाद से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है और मामला अभी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है।

    सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि पूर्व की व्यवस्था में बदलाव के कारण धार्मिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ा है। वहीं दूसरे पक्ष ने अपने ऐतिहासिक और धार्मिक दावों को दोहराते हुए संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखा। दोनों पक्षों ने विस्तृत कानूनी तर्क प्रस्तुत किए, जिन पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया।

    कार्यवाही के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी संयम बरतने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील विषय है और बहस के दौरान प्रयुक्त भाषा तथा शब्दों का चयन अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।

    अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले की अंतिम सुनवाई विस्तृत रूप से की जाएगी। इसके लिए दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तिथि निर्धारित की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर पूरे दिन सुनवाई कर सभी पक्षों के तर्कों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

    इस बीच मध्य प्रदेश सरकार पर अंतरिम व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी रहेगी। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक परिसर में शांति, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बना रहे तथा किसी भी समुदाय के अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े।

    भोजशाला विवाद देश के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में शामिल रहा है। सर्वोच्च अदालत के ताजा निर्देशों के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार द्वारा बनाई जाने वाली अंतरिम व्यवस्था और आगामी विस्तृत सुनवाई पर टिकी हैं। अंतिम फैसला आने तक न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार सभी पक्षों के दावों और अधिकारों पर विधिक परीक्षण जारी रहेगा।

  • फर्जी पहचान, शादी और करोड़ों के सपनों का जाल! खुद को IAS बताने वाली महिला पर ठगी और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज

    फर्जी पहचान, शादी और करोड़ों के सपनों का जाल! खुद को IAS बताने वाली महिला पर ठगी और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से कथित फर्जी पहचान के जरिए शादी करने का एक मामला सामने आया है। आरोप है कि एक महिला ने स्वयं को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी बताकर युवक से विवाह किया। बाद में जब उसके दावों की सत्यता पर सवाल उठे तो पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने महिला को गिरफ्तार कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

    पुलिस के अनुसार, युवक और महिला की पहचान सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी। बातचीत के दौरान महिला ने स्वयं को IAS अधिकारी बताया और दावा किया कि एक न्यायिक मामले के कारण उसकी नियुक्ति लंबित है। युवक का आरोप है कि महिला और उसके परिजनों ने भी इसी बात की पुष्टि करते हुए भरोसा दिलाया कि मामला समाप्त होते ही वह प्रशासनिक सेवा में कार्यभार संभाल लेगी। इन दावों पर विश्वास करने के बाद दोनों ने विवाह कर लिया।

    शिकायत में कहा गया है कि विवाह के शुरुआती दिनों के बाद महिला का व्यवहार बदलने लगा। पति का आरोप है कि उसने परिवार के बहुमूल्य आभूषण और अन्य कीमती सामान अपने कब्जे में ले लिया। आरोप यह भी है कि बाद में परिवार पर बड़ी धनराशि की मांग का दबाव बनाया गया और आर्थिक लाभ के लिए जमीन बेचने का सुझाव दिया गया। जब परिवार ने इसका विरोध किया तो कथित रूप से झूठे मुकदमों में फंसाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।

    पति ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि एक रात महिला ने कथित रूप से उसका गला दबाकर हत्या करने का प्रयास किया। उसने तत्काल पुलिस सहायता ली, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर मामले को सुलझाने का प्रयास भी किया गया। हालांकि विवाद समाप्त नहीं हुआ और बाद में पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

    मामले में दर्ज प्राथमिकी में महिला के साथ उसके पिता, भाई और एक अन्य रिश्तेदार को भी नामजद किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सभी ने मिलकर महिला की पहचान और नौकरी को लेकर गलत जानकारी देकर विवाह कराया। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि क्या इस तरह की शिकायतें पहले भी सामने आई थीं और क्या अन्य लोगों के साथ भी इसी प्रकार की घटनाएं हुई हैं।

    पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच और दर्ज मुकदमे के आधार पर महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य और अन्य प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। साथ ही नामजद अन्य व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    यह मामला एक बार फिर ऑनलाइन पहचान और वैवाहिक संबंधों में तथ्यों के सत्यापन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से बनने वाले संबंधों में व्यक्तिगत और पेशेवर दावों की पुष्टि करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार के विवादों और धोखाधड़ी की संभावनाओं को कम किया जा सके। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और पुलिस सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही है।

  • राम मंदिर में चढ़ावे पर मचे विवाद के बीच बड़ा कदम: सुरक्षा और रसीद का सबूत मांगने वाले दानदाताओं का समर्पण लौटाने की तैयारी में ट्रस्ट

    राम मंदिर में चढ़ावे पर मचे विवाद के बीच बड़ा कदम: सुरक्षा और रसीद का सबूत मांगने वाले दानदाताओं का समर्पण लौटाने की तैयारी में ट्रस्ट

    नई दिल्ली । राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे की सुरक्षा और उसकी रसीदों को लेकर उपजे विवाद के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने एक बेहद कड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। मंदिर प्रबंधन उन सभी दानदाताओं का समर्पण और भेंट की गई बहुमूल्य वस्तुएं वापस लौटाने की योजना पर विचार कर रहा है, जिन्होंने हाल के दिनों में चढ़ावे की सुरक्षा पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे और मीडिया के समक्ष गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि ट्रस्ट ने स्पष्ट किया है कि इस अति-संवेदनशील विषय पर अभी कोई अंतिम और औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन इस पर आंतरिक रूप से गंभीर विमर्श का दौर जारी है।

    इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में श्रद्धालुओं द्वारा लगाए गए वे आरोप हैं जिनमें कहा गया था कि उनके द्वारा समर्पित की गई बहुमूल्य सामग्रियों की न तो उचित रसीद प्रदान की गई और न ही उन्हें मंदिर परिसर में उचित स्थान पर प्रदर्शित या सुरक्षित रखा गया। इन दावों के सामने आने के बाद ट्रस्ट की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि मंदिर के गर्भगृह में स्थान अत्यंत सीमित और निश्चित है, जिसके कारण हर श्रद्धालु की भेंट को वहां स्थायी रूप से सजाकर रखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। मंदिर प्रशासन के अनुसार, केवल समय-समय पर आवश्यक और उपयोगी वस्तुओं को ही पूजा-अर्चना के विधान में शामिल किया जाता है और उसके बाद उन्हें पुनः सुरक्षित तिजोरियों में रखवा दिया जाता है।

    इसके साथ ही धातु के रूप में मिलने वाले दान और उसकी रसीद की प्रक्रिया को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। ट्रस्ट का मानना है कि श्रद्धालुओं द्वारा सौंपी जाने वाली मूल्यवान धातुओं की शुद्धता का वैज्ञानिक परीक्षण किए बिना तत्काल रसीद जारी करना संभव नहीं है। शुद्धता की जांच होने के बाद ही धातु का वास्तविक मूल्य और मात्रा निर्धारित होती है, जिसके आधार पर रसीद में उल्लेख किया जाता है। दानदाताओं द्वारा दी जाने वाली वस्तुओं को धातु के मूल रूप में ही रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है, इसलिए तत्क्षण रसीद की मांग करना तार्किक रूप से सही नहीं है।

    उल्लेखनीय है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई प्रतिष्ठित दानदाताओं ने अपना बहुमूल्य चढ़ावा गायब होने या उसका उचित हिसाब न मिलने की शिकायतें की थीं। इन सामग्रियों में पूर्व गृह सचिव एस लक्ष्मीनारायण द्वारा भेंट की गई स्वर्ण मंडित श्रीरामचरितमानस, सिंधी समाज की ओर से दी गई दो सौ किलोग्राम चांदी की ईंटें, सराफा व्यवसायियों द्वारा समर्पित लगभग साठ किलोग्राम चांदी, चांदी की बनी कागभुसंडि आकृति, अत्यंत कीमती हार और चांदी की चरण पादुकाएं शामिल थीं। इस विवाद पर विराम लगाने के उद्देश्य से मंदिर न्यास ने छह जुलाई को बकायदा साक्ष्यों के साथ पूरे चढ़ावे का हिसाब सार्वजनिक रूप से पेश किया था, जिसमें कई मूल्यवान वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित किया गया था और चांदी को पिघलाकर सुरक्षित रखने के प्रमाण भी मीडिया के सामने रखे गए थे।

    इस पूरे प्रकरण ने अब कानूनी रूप भी अख्तियार कर लिया है और राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विवाद तथा वित्तीय प्रबंधन को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। पहली याचिका में चढ़ावा चोरी के आरोपों की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराने के साथ-साथ मंदिर ट्रस्ट के समस्त वित्तीय लेन-देन का भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से ऑडिट कराने की मांग की गई है। दूसरी याचिका में विभिन्न जांच एजेंसियों के विशेषज्ञों को मिलाकर एक संयुक्त विशेष जांच दल के गठन की गुहार लगाई गई है ताकि न्यास के प्रशासनिक कामकाज में सामने आ रही कथित वित्तीय अनियमिताओं की तह तक जाया जा सके।

    तीसरी याचिका के माध्यम से पूरे ट्रस्ट के वित्तीय संचालन का एक व्यापक फोरेंसिक ऑडिट कराने की मांग उठाई गई है। इस याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और मंदिर ट्रस्ट को एक ऐसी मजबूत विनियामक और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश देने की मांग की गई है जो भविष्य में इस तरह के विवादों को रोक सके। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि देश और दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उनके द्वारा दिए जाने वाले दान की शुचिता को बनाए रखने के लिए एक अत्यंत पारदर्शी ऑडिट सिस्टम का होना अनिवार्य है, ताकि मंदिर प्रशासन की जवाबदेही हर स्तर पर सुनिश्चित की जा सके।

  • छह साल बाद भी नहीं भरे दिल्ली दंगों के जख्म: नाले को देखकर आज भी कांप उठती है रूह, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के भाई ने की सभी दोषियों के लिए फांसी की मांग

    छह साल बाद भी नहीं भरे दिल्ली दंगों के जख्म: नाले को देखकर आज भी कांप उठती है रूह, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के भाई ने की सभी दोषियों के लिए फांसी की मांग

    नई दिल्ली । वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़के भीषण सांप्रदायिक दंगों के दौरान देश को झकझोर देने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। विशेष अदालत के न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने इस नृशंस हत्याकांड में आम आदमी पार्टी के पूर्व स्थानीय पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच आरोपियों को दोषी करार दिया है। अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए अन्य अपराधियों में हसीन उर्फ मुल्लाजी, नजीम, कासिम और समीर खान शामिल हैं। इस न्यायिक फैसले से पीड़ित परिवार को एक कानूनी राहत तो जरूर मिली है, लेकिन उनके जीवन में आया खालीपन और अपनों को खोने का गहरा दर्द आज छह साल बाद भी उतना ही ताजा और तकलीफदेह बना हुआ है।

    न्यायालय के इस बड़े फैसले के बाद अंकित शर्मा के परिवार की वह खौफनाक यादें एक बार फिर जीवंत हो गई हैं, जिन्होंने उनके हंसते-खेलते परिवार को पूरी तरह उजाड़ दिया था। सुरक्षा कारणों और उस डरावने घटनाक्रम के मानसिक आघात के चलते पीड़ित परिवार उत्तर-पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास स्थित अपने पैतृक मकान को हमेशा के लिए छोड़कर जा चुका है और तब से एक किराए के मकान में रहने को विवश है। अंकित शर्मा के बड़े भाई अंकुर शर्मा ने एक साक्षात्कार में अपने दिल का गुबार निकालते हुए न्याय व्यवस्था से मांग की है कि उनके भाई की हत्या करने वाले सभी दोषियों को कानूनन फांसी की सजा मिलनी चाहिए ताकि पीड़ित आत्मा को सच्ची शांति मिल सके।

    घटनाक्रम के अनुसार, 25 फरवरी 2020 को आईबी अधिकारी अंकित शर्मा घर का कुछ जरूरी सामान लेने के लिए बाहर निकले थे, जिसके बाद वह अचानक लापता हो गए। जांच एजेंसियों और पुलिस के मुताबिक, उग्र दंगाइयों की एक हिंसक भीड़ ने अंकित को अगवा कर लिया था और बेहद क्रूरतापूर्वक उन पर धारदार हथियारों से हमला किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि देश की सुरक्षा एजेंसी में कार्यरत इस युवा अधिकारी को अपराधियों ने 52 बार चाकू से गोदा था। इस वीभत्स वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारों ने साक्ष्य छिपाने के उद्देश्य से उनके खून से लथपथ शव को पास के ही एक गंदे नाले में फेंक दिया था, जिसे अगली सुबह पुलिस ने बरामद किया था।

    अंकित शर्मा के परिजनों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अंकित को केवल उनकी धार्मिक पहचान यानी हिंदू होने के कारण सोची-समझी साजिश के तहत निशाना बनाया गया था। उनके भाई अंकुर ने बताया कि अंकित एक बेहद मिलनसार और धर्मनिरपेक्ष सोच वाले व्यक्ति थे, जिनके मित्रों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही समुदायों के लोग शामिल थे। दुःख की बात यह रही कि जब दंगाइयों की भीड़ ने उन पर हमला किया, तो उनके कुछ स्थानीय मुस्लिम दोस्तों ने भी अंकित को बचाने के बजाय कातिलों का साथ दिया। इस खौफनाक मंजर की यादें परिवार को इस कदर प्रताड़ित करती हैं कि आज भी दंगों के क्षेत्र या उस नाले के पास से गुजरते समय उनका दिल भारी हो जाता है।

    इस भयावह त्रासदी का अंकित शर्मा के माता-पिता के स्वास्थ्य पर अत्यंत प्रतिकूल और गंभीर प्रभाव पड़ा है। जवान बेटे की इस तरह हुई असमय और क्रूर मौत के सदमे के कारण उनके माता-पिता गंभीर रूप से उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) और मानसिक तनाव का शिकार हो चुके हैं। अदालती कार्यवाही या दंगों से जुड़ी किसी भी चर्चा मात्र से ही उनका पूरा परिवार भारी अवसाद और तनाव की स्थिति में आ जाता है। पीड़ित परिवार का स्पष्ट रूप से मानना है कि उनके साथ पूर्ण और वास्तविक न्याय तभी होगा जब देश के लिए बलिदान देने वाले उनके बेटे के हत्यारों को कानून के तहत अधिकतम और कठोरतम संभव दंड दिया जाएगा।

  • मेलबर्न मीट्स मोदी कार्यक्रम में नहीं थी भाड़े की भीड़…. आयोजक बोले… माफी मांगे राहुल गांधी और खरगे

    मेलबर्न मीट्स मोदी कार्यक्रम में नहीं थी भाड़े की भीड़…. आयोजक बोले… माफी मांगे राहुल गांधी और खरगे


    नई दिल्ली।
    ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न (Melbourne, Australia) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के स्वागत के लिए आयोजित ‘मेलबर्न मीट्स मोदी’ (Melbourne Meets Modi) कार्यक्रम के आयोजकों ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) को एक खुला खत लिखा है. इस खत में उन्होंने कांग्रेस नेताओं की तरफ से लगाए गए उन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है, जिसमें कार्यक्रम में शामिल लोगों को ‘पेड क्राउड’ यानी पैसे देकर जुटाई गई भीड़ बताया गया था. आयोजकों ने दोनों नेताओं से यह आरोप वापस लेने के साथ ही सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है।

    यह खुला खत उन कम्युनिटी वॉलंटियर्स की तरफ से जारी किया गया है, जिन्होंने 9 जुलाई को मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में हुए कार्यक्रम के लिए सिडनी से मेलबर्न तक ‘मोदी एयरवेज’ नाम की चार्टर्ड फ्लाइट का इंतजाम किया था. आयोजकों का साफ कहना है कि कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों के आने-जाने और रहने का खर्च बीजेपी, भारत सरकार या ऑस्ट्रेलिया सरकार ने नहीं उठाया था. उन्होंने बताया कि सभी लोगों ने अपना खर्च खुद उठाया, जबकि कुछ लोग सामुदायिक सहयोग से इस कार्यक्रम में पहुंचे थे।

    आयोजकों में से एक, अमित कारंत ने कहा कि कांग्रेस नेताओं की ऐसी टिप्पणी बेहद निराशाजनक है. उनके मुताबिक सिडनी, एडिलेड, पर्थ और ब्रिस्बेन समेत ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग शहरों से लोग अपनी मर्जी से मेलबर्न पहुंचे थे. किसी भी सरकारी एजेंसी या राजनीतिक दल ने उनके आने-जाने पर एक भी पैसा खर्च नहीं किया. यह पूरी व्यवस्था स्थानीय वॉलंटियर्स ने आपस में मिलकर संभाली थी।

    आयोजकों का कहना है कि कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने कार्यक्रम को ‘प्रायोजित’ बताकर वहां पहुंचे हजारों भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की ईमानदारी और उनकी स्वतंत्र सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस चार्टर्ड फ्लाइट से सफर करने वालों में ऑस्ट्रेलियाई नागरिक, वहां के पक्के निवासी, कामकाजी पेशेवर, कारोबारी, छात्र और बुजुर्ग शामिल थे.

    खत में लिखा गया है कि इन लोगों को भाड़े की राजनीतिक भीड़ कहना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करना नहीं है, बल्कि यह उन हजारों प्रवासियों की गरिमा का अपमान है. ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला भारतीय समुदाय किसी एक राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़ा है. वहां कांग्रेस को पसंद करने वाले लोग भी हैं, बीजेपी को चाहने वाले भी और ऐसे भी कई लोग हैं जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।


    महीनों की कड़ी मेहनत पर कांग्रेस ने फेरा पानी

    आयोजकों ने बताया कि इस चार्टर्ड फ्लाइट का इंतजाम करने में महीनों की प्लानिंग लगी थी, जिसके लिए यात्रियों से तालमेल बिठाने से लेकर कागजी कार्रवाई तक पर दिन-रात काम किया गया. कई वॉलंटियर्स ने अपने बिजनेस समेत परिवारों को छोड़कर इस कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा योगदान दिया. इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के सामने तीन बड़ी मांगें रखी हैं. पहली, ये कि सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया जाए कि इस फ्लाइट के लिए बीजेपी या भारत सरकार ने कोई फंडिंग नहीं की थी. दूसरी, ‘पेड क्राउड’ वाले आरोप वापस लिए जाएं. वहीं, तीसरी मांग यह है कि सभी वॉलंटियर्स, यात्रियों सहित पूरे भारतीय समुदाय से सार्वजनिक माफी मांगी जाए।


    मार्वल स्टेडियम में जुटे थे 30 हजार लोग

    मेलबर्न के मार्वल स्टेडियम में 9 जुलाई को आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में करीब 30 हजार लोग शामिल हुए थे. इस दौरान पीएम मोदी के साथ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज और विक्टोरिया की प्रीमियर जैसिंटा एलन भी मंच पर मौजूद थीं. आयोजकों ने साफ कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन भारत की घरेलू राजनीति के चक्कर में विदेश में रह रहे भारतीय समुदाय को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।

  • Survey: एथेनॉल मिक्स E 20 पेट्रोल से सहज नहीं लोग…. NDA के 53% वोटर्स भी हिचक रहे

    Survey: एथेनॉल मिक्स E 20 पेट्रोल से सहज नहीं लोग…. NDA के 53% वोटर्स भी हिचक रहे


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिक्स E20 पेट्रोल (E20 Ethanol-Blended Petrol) को बढ़ावा दे रही है. सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, प्रदूषण कम होगा और गन्ना किसानों को फायदा मिलेगा. हालांकि, C-Voter के हालिया सर्वे से सामने आया है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी E20 पेट्रोल को लेकर सहज नहीं हैं. सर्वे के मुताबिक, आधे से अधिक लोग न केवल E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, बल्कि उन्हें यह भी डर है कि इससे उनकी गाड़ी की माइलेज कम हो सकती है और इंजन को नुकसान पहुंच सकता है।


    NDA समर्थकों में भी E20 को लेकर हिचक

    सर्वे में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सत्ता पर काबिज NDA के समर्थकों में भी E20 पेट्रोल को लेकर उत्साह नहीं दिखा. सर्वे के अनुसार, 52.5 प्रतिशत NDA समर्थकों ने कहा कि वे अपनी गाड़ियों में E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहेंगे. केवल 18.1 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया, जबकि 29.5 प्रतिशत लोग अभी भी इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर पाए हैं. विपक्षी दलों के समर्थकों में E20 के प्रति विरोध और ज्यादा देखने को मिला।


    E20 से बचने का महंगा रास्ता चुन रहे लोग, 5 गुना बढ़ी प्रीमियम पेट्रोल की मांग

    57.9 प्रतिशत विपक्षी समर्थकों ने कहा कि वे अपनी गाड़ियों में E20 पेट्रोल नहीं डलवाना चाहते. वहीं, अन्य राजनीतिक दलों के समर्थकों में भी 55 प्रतिशत लोगों ने इसे अस्वीकार किया. कुल मिलाकर 55.1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे E20 पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, जबकि केवल 17.1 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया।


    गडकरी के बयान के बाद बढ़ी चर्चा

    यह सर्वे ऐसे समय सामने आया है जब केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने E20 पेट्रोल के विरोधियों को चुनौती देते हुए कहा था कि वे ऐसा एक भी व्यक्ति सामने लाएं जिसकी गाड़ी को एथेनॉल मिक्स पेट्रोल से नुकसान हुआ हो. इसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उनके पास ऐसे छह लोग हैं, जिनकी गाड़ियों पर E20 का प्रतिकूल असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि वे मीडिया के सामने आने से पहले गडकरी से मिलना चाहते हैं।

    सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि E20 पूरी तरह सुरक्षित है और विशेषज्ञों की राय भी इसी के पक्ष में है. दूसरी ओर, कई वाहन मालिकों का कहना है कि E20 पेट्रोल से माइलेज कम हो जाती है और खासकर E10 या उससे पुराने मानकों के लिए बनी गाड़ियों में इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    सरकार की नीति को भी सीमित समर्थन

    सर्वे में केवल E20 पेट्रोल ही नहीं, बल्कि एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी पर भी लोगों की राय ली गई. इसमें 52 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की सरकारी पॉलिसी का समर्थन नहीं करते. इसके मुकाबले सिर्फ 22 प्रतिशत लोगों ने इस नीति का समर्थन किया, जबकि बाकी लोग असमंजस में रहे. NDA समर्थकों में भी 48.2 प्रतिशत लोगों ने इस नीति का विरोध किया. केवल 24.4 प्रतिशत लोगों ने इसका समर्थन किया, जबकि 27.4 प्रतिशत लोग निर्णय नहीं ले सके।


    माइलेज घटने और इंजन खराब होने की चिंता

    सर्वे के अनुसार, लोगों की सबसे बड़ी चिंता वाहन की परफॉर्मेंस को लेकर है. 52.8 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों की माइलेज कम हो जाती है. NDA समर्थकों में 51.2 प्रतिशत और विपक्षी समर्थकों में 55.4 प्रतिशत लोगों ने भी यही चिंता जताई. इंजन को नुकसान पहुंचने को लेकर भी लोगों की आशंकाएं काफी मजबूत हैं. 54.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल अधिकांश वाहनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है. NDA समर्थकों में यह आंकड़ा 49.9 प्रतिशत रहा, जबकि विपक्षी समर्थकों में 60.2 प्रतिशत लोगों ने ऐसा माना।

    इसके अलावा 14.3 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 केवल कुछ विशेष प्रकार के वाहनों को नुकसान पहुंचा सकता है. वहीं, केवल 10.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इससे वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता।


    पुराने वाहनों के मालिकों की चिंता

    सर्वे में यह भी सामने आया कि 56.3 प्रतिशत लोगों का मानना है कि E20 पेट्रोल को अनिवार्य बनाना पुराने वाहनों के मालिकों के साथ अन्याय होगा. NDA समर्थकों में 49.2 प्रतिशत और विपक्षी समर्थकों में 65.8 प्रतिशत लोगों ने इस राय से सहमति जताई।


    लोग चाहते हैं विकल्प मिले

    हालांकि E20 को लेकर विरोध काफी अधिक है, लेकिन सर्वे में एक बात पर लगभग सभी वर्गों में सहमति दिखाई दी. 75.9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि बाजार में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल और सामान्य पेट्रोल दोनों उपलब्ध रहने चाहिए, ताकि उपभोक्ता अपनी जरूरत और वाहन के अनुसार विकल्प चुन सकें. NDA समर्थकों में भी 72.4 प्रतिशत लोगों ने इस मांग का समर्थन किया. इसी तरह 74.5 प्रतिशत लोगों का मानना है कि यदि E20 पेट्रोल बेचा जाता है तो इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल से कम होनी चाहिए. NDA समर्थकों में 75.6 प्रतिशत लोगों ने भी यही राय दी।

    हालांकि कीमत कम होने पर भी लोगों का भरोसा पूरी तरह नहीं बनता दिखा. केवल 40.8 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर E20 सस्ता होगा तो वे इसका इस्तेमाल करेंगे, जबकि 40.4 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि कम कीमत होने के बावजूद वे इसे नहीं अपनाएंगे।


    सरकार के दावे पर बंटी राय

    केंद्र सरकार का कहना है कि E20 नीति से भारत का कच्चे तेल का आयात कम होगा. इस दावे पर 37.2 प्रतिशत लोगों ने पूरी तरह सहमति जताई, जबकि 19.5 प्रतिशत लोगों ने आंशिक सहमति व्यक्त की. दूसरी ओर, 17.1 प्रतिशत लोगों ने इस दावे से पूरी तरह असहमति जताई और 14.1 प्रतिशत लोगों ने आंशिक असहमति व्यक्त की. जब लोगों से पूछा गया कि सरकार E20 पेट्रोल को बढ़ावा क्यों दे रही है, तो 27.5 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य कच्चे तेल के आयात को कम करना है. 21.3 प्रतिशत लोगों का मानना था कि सरकार गन्ना किसानों को लाभ पहुंचाना चाहती है, जबकि 11 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसका प्रमुख उद्देश्य प्रदूषण कम करना है।


    कैसे हुआ सर्वे?

    यह सर्वे C-Voter ने 8 और 9 जुलाई के बीच Computer Assisted Telephone Interviewing (CATI) पद्धति से कराया. इसमें देशभर के 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के 1,641 लोगों से बातचीत की गई. C-Voter के अनुसार, सर्वे के आंकड़ों को जनगणना और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के आधार पर देश की जनसांख्यिकीय संरचना के अनुरूप वेटेज दिया गया. सर्वे का मार्जिन ऑफ एरर मैक्रो स्तर पर ±3 प्रतिशत और माइक्रो स्तर पर ±5 प्रतिशत बताया गया है।

  • बिहार-बंगाल समेत पूर्वोत्तर में आज भारी बारिश का अलर्ट… अन्य हिस्सों में साफ रहेगा मौसम

    बिहार-बंगाल समेत पूर्वोत्तर में आज भारी बारिश का अलर्ट… अन्य हिस्सों में साफ रहेगा मौसम


    नई दिल्ली।
    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मंगलवार, 14 जुलाई को पूर्वोत्तर भारत (Northeast India), बिहार (Bihar) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) में एक और दिन भारी बारिश (Heavy rain) का अनुमान लगाया है. वहीं उत्तर-पश्चिम, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत के ज्यादातर हिस्सों में मॉनसून की गतिविधियां कमजोर रहने की उम्मीद है।

    मौसम का यह पैटर्न दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में चल रहे ठहराव को दिखाता है, जिसमें मॉनसून ट्रफ हिमालय की तलहटी के करीब खिसक रही है. नतीजतन, भारी बारिश की गतिविधियां देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर हिस्सों में केंद्रित हो गई हैं, जबकि अन्य बड़े हिस्सों में बारिश कमजोर पड़ गई है।

    IMD के अनुसार, अगले तीन से चार दिनों तक पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल और बिहार में कुछ जगहों पर भारी से बहुत भारी बारिश जारी रहेगी।

    सबसे अधिक बारिश मेघालय में होने की उम्मीद जताई जा रही है, जहां कुछ जगहों पर 20 सेमी से अधिक बारिश हो सकती है. उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम के कुछ हिस्सों में भी तेज बारिश की संभावना है.

    यह अनुमान पिछले 24 घंटों में हुई भारी बारिश के बाद लगाया गया है. उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में बहुत ज़्यादा बारिश दर्ज की गई, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बहुत भारी बारिश हुई है. अरुणाचल प्रदेश, गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से भी 7 से 11 सेमी के बीच भारी बारिश की सूचना मिली है.

    IMD ने इस लगातार बारिश का कारण कई सक्रिय मौसम प्रणालियों को बताया है, जिनमें श्री गंगानगर से मणिपुर तक फैली मॉनसून ट्रफ, दक्षिण बांग्लादेश, उत्तरी बंगाल की खाड़ी और पूर्वी बांग्लादेश के ऊपर साइक्लोनिक सर्कुलेशन, और उत्तर-पश्चिम बिहार से मणिपुर तक फैली एक ट्रफ शामिल हैं. मध्य पाकिस्तान के ऊपर बना एक पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) भी उत्तरी भारत के मौसम को प्रभावित कर रहा है.