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  • बकरा मंडियों में दिखी त्योहार की चमक, लाखों के बकरों ने खींचा ध्यान, खरीदारों के सामने बढ़ी नई चुनौतियां

    बकरा मंडियों में दिखी त्योहार की चमक, लाखों के बकरों ने खींचा ध्यान, खरीदारों के सामने बढ़ी नई चुनौतियां

    नई दिल्ली। बकरीद के त्योहार से पहले देशभर की बकरा मंडियों में रौनक अपने चरम पर पहुंच गई है। उत्तर भारत से लेकर मध्य और पश्चिम भारत तक मंडियों में बड़ी संख्या में खरीदारों और व्यापारियों की भीड़ दिखाई दे रही है। त्योहार के करीब आते ही बाजारों में खरीदारी की रफ्तार बढ़ गई है और खास नस्ल के बकरों की मांग तेजी से बढ़ती नजर आ रही है। इस बार कई ऐसे बकरे लोगों का ध्यान खींच रहे हैं जिनकी कीमत लाखों रुपये तक पहुंच गई है।

    विशेष बकरों ने बढ़ाया आकर्षण

    देश के कई शहरों की मंडियों में दूर-दराज इलाकों से व्यापारी अपने खास बकरे लेकर पहुंचे हैं। कई बकरे अपने भारी वजन, अलग पहचान और विशेष नस्ल के कारण चर्चा में बने हुए हैं। कुछ स्थानों पर ऐसे बकरे भी पहुंचे हैं जिनकी कीमत 11 लाख रुपये तक बताई जा रही है। इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मंडियों का रुख कर रहे हैं। कई खरीदार इन बकरों के साथ तस्वीरें लेते भी दिखाई दे रहे हैं।

    त्योहारी बाजार में बढ़ी हलचल
    त्योहार नजदीक आने के साथ बाजारों में खरीदारी का माहौल और अधिक सक्रिय हो गया है। सुबह से देर रात तक मंडियों में भीड़ बनी हुई है। कई लोग अपनी पसंद और बजट के अनुसार बकरों का चयन कर रहे हैं। व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ी है और आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आने की उम्मीद है।

    महंगाई बनी बड़ी चुनौती
    इस बार व्यापारियों और खरीदारों दोनों के सामने बढ़ती लागत एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। चारा, परिवहन और देखभाल का खर्च बढ़ने का असर बकरों की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। कई व्यापारियों का कहना है कि पहले की तुलना में खर्च काफी बढ़ चुका है, जिसके कारण कीमतों में भी अंतर दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर ग्राहक भी बजट के हिसाब से खरीदारी करने की कोशिश कर रहे हैं।

    भीषण गर्मी ने बढ़ाई परेशानी
    त्योहार की तैयारियों के बीच तेज गर्मी ने भी चिंता बढ़ाई है। लगातार बढ़ते तापमान का असर व्यापारियों और पशुओं दोनों पर देखा जा रहा है। कई जगह व्यापारी बकरों को गर्मी से बचाने के लिए विशेष इंतजाम कर रहे हैं। छाया, पानी और देखभाल पर अतिरिक्त ध्यान दिया जा रहा है ताकि पशुओं की सेहत प्रभावित न हो।

    मंडियों में बढ़ी उम्मीदें
    व्यापारियों को उम्मीद है कि त्योहार से पहले के अंतिम दिनों में बिक्री और बढ़ेगी। खरीदार भी अपने परिवार और परंपराओं के अनुसार तैयारी में जुटे हुए हैं। हर साल की तरह इस बार भी बकरीद की तैयारियों ने बाजारों में अलग उत्साह पैदा किया है और देशभर की मंडियां इस उत्साह का केंद्र बन गई हैं।

  • चारधाम यात्रा : अब तक 22 लाख तीर्थयात्री कर चुके हैं दर्शन…. 5 हफ्तों में 92 श्रद्धालुओं की मौत

    चारधाम यात्रा : अब तक 22 लाख तीर्थयात्री कर चुके हैं दर्शन…. 5 हफ्तों में 92 श्रद्धालुओं की मौत


    देहरादून।
    उत्तराखंड (Uttarakhand) में चारधाम यात्रा (Chardham Yatra) के शुरुआती 5 हफ्तों में विभिन्न स्वास्थ्य कारणों की वजह से 92 तीर्थयात्रियों की मौत हो चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा 45 मौतें केदारनाथ (Kedarnath) में हुईं, जबकि बदरीनाथ (Badrinath) में 24, यमुनोत्री में 13 और गंगोत्री (Gangotri) में 10 तीर्थयात्रियों ने अपनी जान गंवाई। इनत तमाम चुनौतियों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, सोमवार शाम तक 22 लाख से अधिक श्रद्धालु चारों धामों के दर्शन कर चुके हैं।

    केदारनाथ में सबसे अधिक 44 मौतें
    उत्तराखंड के राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (एसईओसी) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, केदारनाथ में सबसे अधिक 44 मौतें दर्ज की गई हैं। बदरीनाथ में 24 , मुनात्री और गंगोत्री में क्रमशः 13 और 10 श्रद्धालुओं की मौतें हुई हैं। ये मौतें विभिन्न स्वास्थ्य कारणों से हुई हें। इनमें ऊंचाई से संबंधित बीमारियां और हृदय गति रुकना शामिल हैं। एक अन्य व्यक्ति की मौत केदारनाथ में प्राकृतिक आपदा के कारण हुई है।


    चारधाम यात्रा में 92 पहुंचा मौतों का आंकड़ा

    इस साल चारधाम यात्रा में मौतों का आंकड़ा 92 पर पहुंच गया है। आंकड़े बतलाते हैं कि सोमवार शाम सात बजे तक 22 लाख से अधिक श्रद्धालु चारधामों के दर्शन के लिए पहुंच चुके हैं। केदारनाथ में सबसे अधिक 8.72 लाख श्रद्धालु पहुंचे। इसके बाद बदरीनाथ में 6.13 लाख, गंगोत्री और यमुनोत्री में क्रमश: 3.85 एवं 3.87 लाख श्रद्धालु पहुंचे।


    अलर्ट मोड पर आपदा प्रबंधन विभाग

    उच्च हिमालयी क्षेत्र की इस यात्रा को लेकर आपदा प्रबंधन विभाग अलर्ट मोड पर है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शीर्ष अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि मौसम प्रतिकूल होने पर हर एक श्रद्धालु की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए। इतना ही नहीं सिक्खों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल श्री हेमकुंड साहिब भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।


    गंगा दशहरा के मौके पर लगाई आस्था की डुबकी

    इस बीच गंगा दशहरा के मौके पर सोमवार को हरिद्वार में गंगा किनारे बहुत से श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई। लोगों ने नियम-कानून के साथ गंगा जी में स्नान किया। माना जाता है कि इस पवित्र मौके पर गंगा में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं। गंगा दशहरा पर्व उस घटना का प्रतीक है जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई थीं। इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थीं। शास्त्रों के मुताबिक गंगा दशहरा गंगा नदी के धरती पर आगमन की याद में मनाया जाता है।

  • अफ्रीका में इबोला के प्रकोप के बाद भारत सरकार अलर्ट मोड पर … कोविड जैसे प्रोटोकॉल लागू

    अफ्रीका में इबोला के प्रकोप के बाद भारत सरकार अलर्ट मोड पर … कोविड जैसे प्रोटोकॉल लागू


    नई दिल्ली।
    अफ्रीका (Africa) के कुछ हिस्सों में इबोला (Ebola) के प्रकोप के मद्देनजर भारत सरकार (Government of India) अलर्ट मोड पर नजर आ रही है। खबर है कि विमानन नियामक डीजीसीए ने एयरलाइनों से विभिन्न उपायों को लागू करने के लिए कहा है। इनमें उड़ान के दौरान उद्घोषणाएं करना और प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों से अनिवार्य रूप से स्व-घोषणा प्रपत्र या सेल्फ डिक्लेरेशन फॉर्म भरवाना शामिल है।


    भारत में क्या है स्थिति

    सरकार ने सोमवार को कहा कि देश में अब तक इबोला वायरस (Ebola Virus) के संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा (JP Nadda) ने भारत में बीमारी के किसी भी प्रसार को रोकने के लिए तैयारियों और निगरानी के उपायों की समीक्षा की। नड्डा ने अधिकारियों को देश भर में हवाई अड्डों, बंदरगाहों और भूमि सीमा पार करने सहित देश के सभी प्रवेश बिंदुओं पर इबोला स्क्रीनिंग व्यवस्था को पूरी तरह से सतर्क और मजबूत रखने का निर्देश दिया।

    WHO यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला के प्रकोप को ‘अंतरराष्ट्रीय चिंता वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित किया है जिसके बाद केंद्र सरकार ने एहतियाती कदम तेज कर दिए हैं।


    यहां के यात्रियों को भरने होंगे फॉर्म

    नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने इबोला रोग के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों को लेकर SOP जारी की है। युगांडा और कांगो के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क रखने वाली एयरलाइनों को यात्रियों को विमान से उतारने से पहले स्व-घोषणा प्रपत्रों को अनिवार्य रूप से भरवाना और एकत्र करना होगा।


    सूची में ये एयरलाइन्स

    एअर इंडिया, इंडिगो, अकासा एयर, एमिरेट्स, एयर फ्रांस, एतिहाद एयरवेज और इजिप्टएयर उन 13 एयरलाइनों में शामिल हैं, जो कांगो से यात्रियों को ले जाने वाली एयरलाइनों की सूची में हैं। युगांडा से यात्रियों को ले जाने वाली 17 एयरलाइनों की सूची में एअर इंडिया, इंडिगो और केएलएम शामिल हैं।


    ये लक्षण दिखने पर तुरंत करना होगा सूचित

    एयरलाइनों को उड़ान के दौरान यह उद्घोषणा करना भी अनिवार्य किया गया है कि इबोला रोग के वर्तमान खतरे को देखते हुए, बुखार, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, गले में खराश, उल्टी, दस्त, चकत्ते, रक्तस्राव जैसे लक्षण वाले किसी भी यात्री को आगमन पर तुरंत चालक दल और आव्रजन/चिकित्सा इकाई को सूचित करना चाहिए।

    विमान में संदिग्ध मामलों के लिए, डीजीसीए ने कहा कि अन्य उपायों के अलावा, यात्री को विमान के पिछले हिस्से में भेजा जाना चाहिए और यदि संभव हो तो संबंधित यात्री के आगे और बगल की तीन पंक्तियां खाली रखी जानी चाहिए। एयरलाइनों को यह भी सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि उनके पास तीन तह वाले मास्क, एक बार उपयोग में लाये जाने वाले दस्ताने, पीपीई किट, सैनिटाइजर के पर्याप्त भंडार हो।


    शुरू हुई जांच

    गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया ने सोमवार को कहा कि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इबोला के प्रकोप के मद्देनजर अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर युगांडा, कांगो और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों की जांच की जा रही है। पानसेरिया ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग प्रभावित अफ्रीकी देशों से आने वाले यात्रियों की कड़ी निगरानी कर रहा है। अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर शाम छह बजे से सुबह 10 बजे के बीच युगांडा, कांगो और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों की गहन जांच की जा रही है।

  • पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम का असर…. अब दवाओं से लेकर खाने-पीने तक, हर चीज होगी महंगी!

    पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम का असर…. अब दवाओं से लेकर खाने-पीने तक, हर चीज होगी महंगी!


    नई दिल्ली।
    पेट्रोल-डीजल की कीमतों (Petrol-Diesel Price) में दनादन बढ़ोतरी (Hike) हो रही है. महज 10 दिन में ही तेल कंपनियों (Oil Companies) ने चार बार इनमें बढ़ोतरी की है और इस दौरान फ्यूल प्राइस 7 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा बढ़ चुका है. लगातार पेट्रोल-डीजल (Petrol-Diesel Price) महंगा होने से देश में महंगाई का बड़ा खतरा खड़ा हो रहा है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसका असर जल्द ही उन जगहों पर दिखना शुरू हो सकता है, जहां देश के आम लोगों को सबसे ज्यादा तकलीफ होगी. इसकी वजह है ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो जाएगा और ऐसा होने से खाने-पीने की चीजों से लेकर किराने का सामान, दवाएं, ट्रैवलिंग समेत रोजमर्रा की जरूरत के सामानों के दाम बढ़ सकते हैं।


    10 दिन 4 बार महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल

    देश में तेल कंपनियों ने 15 मई को चार साल बाद पहली बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का ऐलान किया था और इनकी कीमत में 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया था. इसके बाद 19 मई को फिर फ्यूल बम फूटा और ईंधन की कीमत में 87 पैसे प्रति लीटर का इजाफा किया गया. बात यहीं नहीं रुकी और 23 मई को 97 पैसे प्रति लीटर दाम बढ़ाए गए.

    इसके बाद 25 मई को तेल कंपनियों ने चौथी बढ़ोतरी करते हुए पेट्रोल 2.61 रुपये प्रति लीटर, जबकि डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर महंगा कर दिया. इसके बाद दिल्ली में पेट्रोल 100 रुपये के पार निकल गया और 1 लीटर के लिए 102.12 रुपये खर्च करने पड़ेंगे, जबकि डीजल बढ़कर 95.20 रुपये प्रति लीटर हो गया है।


    ट्रांसपोर्टेशन लागत के साथ बढ़ेगी महंगाई

    पेट्रोल-डीजल का महंगा होना, महंगाई के जोखिम को बढ़ाने वाला साबित होता है. इसका उदाहरण बीते 15 मई को ही मिल गया, जबकि Petrol-Diesel-CNG Hike की खबर के बाद अचानक अमूल और मदर डेयरी जैसी कंपनियों ने अपने पैकेज्ड दूध को महंगा कर दिया. यही नहीं मुंबई में ब्रेड महंगी हो गई और टैक्सी यूनियनों ने यात्री किराए में बढ़ोतरी की मांग शुरू कर दी.

    देश में पेट्रोल-डीजल बम फूटने के बाद परिवहन उद्योग ने भी अब औपचारिक रूप से ईंधन की बढ़ती लागत को दूसरे व्यवसायों पर डालना शुरू कर दिया है, जो इस बात का संकेत है कि महंगे डीजल का प्रभाव पेट्रोल पंपों पर ही नहीं, बल्कि तमाम दूसरी चीजों से होते हुए इकोनॉमी तक असर डालेगा. ऑल इंडिया ट्रांसपोर्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन (AITWU) ने चेतावनी दी है कि डीजल की बढ़ती कीमतों (Diesel Price Hike) के कारण देश भर में ट्रांसपोर्टेशन संचालन प्रभावित होता जा रहा है.

    रिपोर्ट की मानें, तो एसोसिएशन ने बीते 20 मई से राष्ट्रव्यापी फ्यूल एडजस्टमेंट फैक्टर (FAF) लागू किया है, जिससे ट्रांसपोर्टरों को डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी पर माल ढुलाई दरों को बढ़ाने की अनुमति होगी.


    आम ग्राहकों पर होगा सीधा असर

    Petrol-Diesel महंगा होने और ट्रांसपोर्टरों को माल ढुलाई रेट्स बढ़ाने की अनुमति से FMCG कंपनियों, मैन्युफैक्चरर्स, रिटेल विक्रेताओं, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और फूड सप्लायर्स के लिए लॉजिस्टिक्स लागत में सीधी बढ़ोतरी हो सकती है और इसकी भरपाई के लिए कंपनियां बोझ आखिर में सीधे ग्राहकों पर ही डालेंगी, यानी उनके लिए तमाम सामान महंगे हो जाएंगे.


    FAF से कैसे महंगी होगी माल ढुलाई

    AITWU के मुताबिक, सिर्फ डीजल ही ट्रक के परिचालन लागत का लगभग 65% हिस्सा है. इसी को लेकर एसोसिएशन के फैसले पर नजर डालें, तो साफ किया गया था कि 15 मई के प्राइस हाइक से ऊपर डीजल की कीमतों में हर 1 रुपये की वृद्धि के लिए माल ढुलाई रेट ऑटोमैटिक 0.65% बढ़ जाएगा. यानी अगर डीजल की कीमत 10 रुपये बढ़ती है, तो माल ढुलाई की लागत 6.5 फीसदी बढ़ जाएगी. बता दें कि अब तक डीजल 7 रुपये से ज्यादा महंगा हो चुका है. संगठन ने ये भी साफ किया कि इसका उद्देश्य डीजल की बढ़ती लागत की भरपाई करना है।


    क्या कुछ महंगा होने वाला है!

    Diesel Price Hike के चलते माल ढुलाई की लागत बढ़ने से ग्राहकों द्वारा यूज की जाने वाली रोजमर्रा की चीजों के दाम पर सबसे ज्यादा और पहले असर दिखेगा. इनमें सब्जियां, फल, दूध, डेयरी प्रोडक्ट्स, दवाएं, एफएमसीजी वस्तुओं शामिल हैं. इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से निर्माण सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक्स और ई-कॉमर्स डिलीवरी भी लागत की भरपाई ग्राहकों की जेब से करेंगी. क्योंकि ये सभी सामान, दुकानों और गोदामों तक पहुंचने से पहले ट्रकों के माध्यम से ले जाए जाते हैं।


    पहले रुपया अब पेट्रोल-डीजल ने रुलाया

    पहले से ही देश में डॉलर के मुकाबले लगातार टूटते जा रहे भारतीय रुपये ने महंगाई के जोखिम को बढ़ा दिया था, क्योंकि विदेशों से आयात किए जाने वाले सामनों का पेमेंट डॉलर में ही किया जाता है और रुपया कमजोर होने से ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. वहीं अब पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ने से महंगाई का खतरा और भी बढ़ गया है।

    साफ तौर पर कहें, ये मामला सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का तगड़ा बम फूटने के संकेत हैं, जिसकी शुरुआत दूध समेत कई चीजों से पहले ही हो चुकी है।

  • किसानों के लिए राहत की खबर: उर्वरकों की कमी का संकट टला, सरकार ने जारी किए बड़े आंकड़े

    किसानों के लिए राहत की खबर: उर्वरकों की कमी का संकट टला, सरकार ने जारी किए बड़े आंकड़े

    नई दिल्ली। खरीफ सीजन से पहले किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। देशभर में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर चल रही आशंकाओं के बीच केंद्र सरकार ने साफ किया है कि देश में खाद की कोई कमी नहीं है और आपूर्ति पूरी तरह स्थिर बनी हुई है। सरकार का कहना है कि मौजूदा समय में उर्वरकों का भंडार सामान्य जरूरत से काफी अधिक है, जिससे आने वाले महीनों में किसानों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार देश में इस वर्ष उर्वरकों की कुल आवश्यकता लगभग 390 लाख मीट्रिक टन से अधिक रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले मौजूदा समय में 200 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है। यह मात्रा सामान्य मानकों से काफी ज्यादा मानी जा रही है। इससे संकेत मिलते हैं कि खेती के महत्वपूर्ण सीजन में मांग बढ़ने के बावजूद सप्लाई चेन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ेगा।

    अधिकारियों ने बताया कि वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बावजूद भारत ने घरेलू उत्पादन और आयात दोनों मोर्चों पर मजबूत स्थिति बनाए रखी है। हाल के समय में कई देशों में आपूर्ति संबंधी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन भारत ने पहले से रणनीतिक तैयारी करके संभावित संकट को काफी हद तक नियंत्रित रखा। इसी का परिणाम है कि उर्वरकों की उपलब्धता लगातार बनी हुई है।

    देश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य मिश्रित उर्वरकों का उत्पादन भी संतोषजनक स्तर पर रहा है। साथ ही आयात के जरिए भी आपूर्ति को मजबूत किया गया है। सरकार ने आगामी खरीफ सीजन को ध्यान में रखते हुए बड़ी मात्रा में आवश्यक उर्वरकों का स्टॉक पहले ही सुरक्षित कर लिया है। इससे किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने में आसानी होगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खेती के मौसम में उर्वरकों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक होती है। यदि समय पर खाद नहीं मिले तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में पर्याप्त स्टॉक का होना कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    सरकार का यह भी कहना है कि उर्वरक उत्पादन में उपयोग होने वाले कच्चे माल की उपलब्धता की लगातार समीक्षा की जा रही है। इससे भविष्य में किसी तरह की आपूर्ति बाधा से बचा जा सकेगा। आने वाले महीनों में मांग बढ़ने की संभावना के बीच प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां भी तेज कर दी गई हैं। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि देश में खाद संकट जैसी स्थिति बनने की आशंका बेहद कम है और किसानों को इस बार पर्याप्त आपूर्ति मिलने की उम्मीद है।

  • महंगे बिजली बिल से मिलेगी लंबी राहत: PM सूर्य घर योजना के जरिए फ्री बिजली और सब्सिडी का बड़ा लाभ

    महंगे बिजली बिल से मिलेगी लंबी राहत: PM सूर्य घर योजना के जरिए फ्री बिजली और सब्सिडी का बड़ा लाभ


    नई दिल्ली। देशभर में लगातार बढ़ती गर्मी के बीच बिजली की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। एयर कंडीशनर, कूलर, पंखे और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अधिक इस्तेमाल के कारण लोगों के बिजली बिल में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। ऐसे समय में सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना लाखों परिवारों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आ रही है। PM सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के जरिए लोग न केवल बिजली बिल के भारी बोझ से राहत पा रहे हैं, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक बचत का लाभ भी हासिल कर रहे हैं।

    यह योजना खासतौर पर उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो हर महीने बढ़ते बिजली बिल से परेशान रहते हैं। योजना के तहत घरों की छत पर सोलर पैनल लगाने की सुविधा दी जा रही है, जिससे उपभोक्ता अपनी जरूरत की बिजली खुद तैयार कर सकते हैं। इस पहल का उद्देश्य सिर्फ बिजली उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। सौर ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल को भविष्य की जरूरत मानते हुए इसे बड़े स्तर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है।

    सरकार की इस योजना की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जा रही है कि लाभार्थियों को हर महीने निर्धारित मात्रा में बिजली का लाभ मिलता है। इसके अलावा सोलर पैनल लगवाने में आने वाले खर्च को कम करने के लिए सब्सिडी की सुविधा भी दी जा रही है। इससे मध्यम वर्गीय और आम परिवारों के लिए योजना का लाभ उठाना अधिक आसान हो गया है। माना जा रहा है कि एक बार सोलर सिस्टम लगने के बाद लंबे समय तक बिजली बिल की चिंता काफी हद तक कम हो सकती है।

    योजना की शुरुआत के बाद देशभर में लोगों का अच्छा रुझान देखने को मिला है। बड़ी संख्या में परिवार इस पहल से जुड़ चुके हैं और अपने घरों की छतों पर सोलर पैनल स्थापित करा चुके हैं। इसका फायदा सिर्फ आर्थिक बचत तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में यह योजना अहम भूमिका निभा रही है।

    इस योजना की प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने के लिए आवेदन से लेकर सब्सिडी प्राप्त करने तक की पूरी व्यवस्था ऑनलाइन रखी गई है। इच्छुक लोग निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन कर योजना का लाभ ले सकते हैं। आने वाले वर्षों में इस योजना के विस्तार के साथ देश में सौर ऊर्जा उपयोग का दायरा और तेजी से बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार की यह पहल केवल बिजली बिल कम करने की योजना नहीं बल्कि भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक दीर्घकालिक समाधान के रूप में भी देखी जा रही है।

  • विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों पर एक कानून: असम UCC बिल ने कानूनी ढांचे में किए बड़े बदलाव

    विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों पर एक कानून: असम UCC बिल ने कानूनी ढांचे में किए बड़े बदलाव


    नई दिल्ली। असम में पेश किए गए यूनिफॉर्म सिविल कोड से जुड़े नए विधेयक ने सामाजिक और कानूनी व्यवस्था को लेकर एक नई बहस शुरू कर दी है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य राज्य में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। सरकार का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था से विभिन्न समुदायों के बीच कानूनी समानता स्थापित होगी और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में एकरूपता लाई जा सकेगी।

    इस प्रस्तावित कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का प्रावधान किया गया है। नए नियमों के अनुसार विवाह के बाद निर्धारित समय सीमा के भीतर संबंधित अधिकारियों के सामने आवश्यक दस्तावेज जमा करना अनिवार्य होगा। इसी प्रकार तलाक की प्रक्रिया को भी एक समान कानूनी ढांचे में शामिल करने का प्रयास किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों के बीच मौजूद अंतर को कम करना माना जा रहा है।

    प्रस्तावित कानून में एक विवाह व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है और विवाह की न्यूनतम आयु को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान तय किए गए हैं। हालांकि सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न समुदायों के पारंपरिक विवाह समारोहों को बनाए रखने की बात भी कही गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि समानता के साथ सांस्कृतिक विविधता को संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है।

    उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में भी नए प्रस्ताव को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें पुरुष और महिला दोनों के अधिकारों को समान रूप से महत्व देने की बात कही गई है। परिवार के सदस्यों को उत्तराधिकार के मामलों में समान श्रेणी में रखने का विचार लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही वसीयत से संबंधित कानूनी अधिकारों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया गया है।

    इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण पहलू लिव-इन संबंधों से जुड़ा है। प्रस्तावित नियमों के अनुसार ऐसे संबंधों को भी एक कानूनी ढांचे के भीतर लाने की कोशिश की गई है। इसके तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर पंजीकरण की व्यवस्था प्रस्तावित है। साथ ही ऐसे संबंधों से जुड़े बच्चों और साथी के अधिकारों को लेकर भी प्रावधान जोड़े गए हैं ताकि सामाजिक और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    प्रस्तावित कानून में नियमों के उल्लंघन पर कड़े दंड का भी प्रावधान किया गया है। कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी करने या गलत जानकारी देने जैसी स्थितियों पर कार्रवाई की व्यवस्था बनाई गई है। फिलहाल इस विधेयक को लेकर अलग-अलग वर्गों में चर्चा जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे समानता और कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी, जबकि कुछ लोग इसे सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

  • एक ही घर में मौत का तांडव: गुस्से में अंधे शख्स ने उजाड़ दिया अपना परिवार, मासूम जिंदगी भी झूल रही मौत से जंग में

    एक ही घर में मौत का तांडव: गुस्से में अंधे शख्स ने उजाड़ दिया अपना परिवार, मासूम जिंदगी भी झूल रही मौत से जंग में


    नई दिल्ली । झारखंड के लोहरदगा जिले से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है, जिसने हर किसी को हैरान और स्तब्ध कर दिया। एक ही परिवार के भीतर शुरू हुआ मामूली विवाद देखते ही देखते ऐसे खूनी अंजाम तक पहुंच गया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। रिश्तों की डोर जहां विश्वास और अपनापन लेकर चलती है, वहीं इस घटना ने उन रिश्तों को खून से रंग दिया। परिवार के भीतर उपजे तनाव ने ऐसा भयावह रूप लिया कि एक शख्स ने गुस्से और सनक में अपने ही घर को तबाही के अंधेरे में धकेल दिया।

    बताया जा रहा है कि सोमवार सुबह घर के अंदर किसी बात को लेकर कहासुनी शुरू हुई थी। शुरुआती बहस धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया। इसी दौरान आरोपी ने अपना आपा खो दिया और घर में मौजूद अपने पिता तथा पत्नी पर धारदार हथियार से हमला कर दिया। हमला इतना अचानक और खतरनाक था कि दोनों को संभलने तक का मौका नहीं मिल पाया। गंभीर चोटों के कारण दोनों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। परिवार के लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले घर का माहौल चीख-पुकार और अफरा-तफरी में बदल चुका था।

    इस पूरी घटना का सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि घर में मौजूद तीन साल की मासूम बच्ची भी इस हिंसा की चपेट में आ गई। वह भी हमले में गंभीर रूप से घायल हो गई। मासूम की हालत को देखते हुए उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टर लगातार उसकी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। बच्ची की हालत गंभीर बताई जा रही है और वह जिंदगी की जंग लड़ रही है। इस घटना के बाद पूरे इलाके में गहरा सदमा और भय का माहौल है। गांव के लोगों को विश्वास नहीं हो रहा कि एक व्यक्ति अपने ही परिवार के साथ इतनी क्रूरता कर सकता है।

    घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और हालात को नियंत्रण में लिया। शुरुआती जांच में मामला पारिवारिक विवाद से जुड़ा माना जा रहा है। घटना के बाद आरोपी ने खुद को घर के भीतर बंद कर लिया था, लेकिन काफी प्रयासों के बाद उसे हिरासत में ले लिया गया। जांच के दौरान घटना में इस्तेमाल किए गए हथियार को भी बरामद कर लिया गया है और मामले की गहराई से जांच जारी है।

    इस भयावह वारदात ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पारिवारिक तनाव और बढ़ता मानसिक दबाव किस तरह लोगों को हिंसा की उस सीमा तक पहुंचा देता है, जहां रिश्ते, संवेदनाएं और इंसानियत सब कुछ खत्म हो जाता है। एक पल का गुस्सा कई जिंदगियों को हमेशा के लिए तबाह कर गया और एक मासूम बच्ची के हिस्से ऐसी दर्दनाक यादें छोड़ गया, जिन्हें शायद समय भी कभी मिटा नहीं पाएगा।

  • फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें

    फाल्टा उपचुनाव में TMC को करारी शिकस्त, हार के बाद भड़का सियासी तूफान; पार्टी के भीतर ‘गद्दारी’ के आरोपों ने बढ़ाई ममता खेमे की मुश्किलें


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में फाल्टा विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत ने जहां विपक्षी खेमे को उत्साहित किया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए यह परिणाम कई सवाल छोड़ गया है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी और आरोपों का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस अप्रत्याशित परिणाम के लिए अपने ही उम्मीदवार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    Mamata Banerjee के करीबी माने जाने वाले सांसद Sougata Roy ने चुनाव परिणाम के बाद तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को मिली हार केवल चुनावी रणनीति की कमी का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे आंतरिक परिस्थितियों ने भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी उम्मीदवार जहांगीर खान के फैसलों ने संगठन को नुकसान पहुंचाया और अंतिम समय में पैदा हुई परिस्थितियों के कारण पार्टी प्रभावी ढंग से चुनावी रणनीति नहीं बना सकी।

    फाल्टा सीट पर चुनावी मुकाबला कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा था। चुनाव प्रचार के दौरान विभिन्न दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी और इस सीट को प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन परिणाम सामने आने के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार देबांगशु पांडा ने भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी। उनकी जीत केवल एक सीट का परिणाम नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य के राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। चुनावी आंकड़ों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया क्योंकि पार्टी उम्मीदवार अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सके। यह स्थिति पार्टी के लिए और भी असहज इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा देखने को मिला कि संगठन को इतना कमजोर चुनावी परिणाम झेलना पड़ा। इस नतीजे ने पार्टी नेतृत्व के सामने संगठनात्मक मजबूती और आंतरिक एकजुटता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उपचुनाव अक्सर बड़े चुनावों की दिशा तय करने वाले संकेत देते हैं। ऐसे में फाल्टा का परिणाम आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर डाल सकता है। भाजपा इस जीत को अपने बढ़ते जनाधार के संकेत के रूप में देख रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपनी रणनीति और संगठन दोनों को लेकर गंभीर समीक्षा की चुनौती खड़ी हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चुनावी झटका राज्य की राजनीति में किस तरह के नए समीकरण पैदा करता है।

  • तमिलनाडु में तेज हुई सियासी हलचल: AIADMK में टूट के संकेत, तीन विधायकों के इस्तीफे से बदले राजनीतिक समीकरण

    तमिलनाडु में तेज हुई सियासी हलचल: AIADMK में टूट के संकेत, तीन विधायकों के इस्तीफे से बदले राजनीतिक समीकरण

    नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति में सोमवार को उस समय बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला जब विधानसभा चुनाव परिणाम आने के महज 21 दिनों के भीतर AIADMK के तीन विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। खास बात यह रही कि इस्तीफा देने के तुरंत बाद तीनों नेताओं ने TVK का दामन थाम लिया। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नए समीकरणों और संभावित बदलावों को लेकर चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है।

    बताया जा रहा है कि इस्तीफा देने वाले तीनों विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले नेता माने जाते हैं और पार्टी के भीतर एक खास गुट से जुड़े हुए थे। उनके अचानक लिए गए फैसले ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। चुनाव के इतने कम समय बाद पार्टी छोड़ना केवल सामान्य राजनीतिक घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संगठन के भीतर चल रहे असंतोष और आंतरिक खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, तीनों विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा सौंपने के बाद नई राजनीतिक दिशा चुनने का फैसला लिया। इसके तुरंत बाद वे TVK नेतृत्व के संपर्क में आए और पार्टी में शामिल हो गए। इस घटनाक्रम ने राज्य की सत्तारूढ़ और विपक्षी राजनीति दोनों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि आने वाले समय में कुछ और नेता भी इसी राह पर चल सकते हैं।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम AIADMK के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी के भीतर विभिन्न विचारधाराओं और नेतृत्व को लेकर मतभेदों की चर्चा पहले से चल रही थी। ऐसे में तीन विधायकों का पार्टी छोड़ना संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े करता दिखाई दे रहा है। इससे पार्टी के अंदर मौजूद गुटबाजी की चर्चाओं को भी और बल मिला है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति में नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावनाओं को बढ़ा दिया है। चुनाव परिणामों के बाद राज्य की राजनीतिक तस्वीर लगातार बदलती दिखाई दे रही है और दलों के बीच समर्थन तथा रणनीति को लेकर नए समीकरण उभरते नजर आ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बदलाव का असर राज्य की राजनीति पर कितना व्यापक पड़ता है और क्या यह राजनीतिक फेरबदल किसी बड़े बदलाव की शुरुआत साबित होता है।