Category: Religious Astrology

  • दाह संस्कार के बाद अस्थियां कब और कैसे चुनें देरी हो जाए तो क्या करना चाहिए गंगा में विसर्जन से जुड़ी मान्यताएं जानिए

    दाह संस्कार के बाद अस्थियां कब और कैसे चुनें देरी हो जाए तो क्या करना चाहिए गंगा में विसर्जन से जुड़ी मान्यताएं जानिए


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद किए जाने वाले अंतिम संस्कार को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक परंपराओं में इसे जीवन के 16 संस्कारों में अंतिम संस्कार बताया गया है। किसी व्यक्ति के दाह संस्कार के बाद अस्थियों को एकत्र करना और फिर उनका विधि विधान से विसर्जन करना भी अंतिम संस्कार की महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि तथा समय को लेकर कुछ अंतर जरूर देखने को मिलता है लेकिन धार्मिक मान्यताओं में अस्थि संचयन को मृतक के प्रति श्रद्धा और सम्मान से जोड़ा गया है

    अक्सर यह सवाल सामने आता है कि दाह संस्कार के बाद तीसरे या चौथे दिन ही अस्थियां क्यों चुनी जाती हैं। गरुड़ पुराण और हिंदू धार्मिक परंपराओं में इसके लिए अलग अलग मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। कई परंपराओं में दाह संस्कार के दूसरे या तीसरे दिन अस्थियां एकत्र करने की बात कही गई है जबकि कुछ स्थानों पर मुखाग्नि देने वाले व्यक्ति से जुड़ी रस्म के अनुसार चौथे दिन अस्थि संचयन किया जाता है। इसे मृतक के प्रति परिवार का अंतिम कर्तव्य माना जाता है

    पुराने समय में श्मशान घाट अपेक्षाकृत शांत और कम भीड़ वाले होते थे। ऐसे में परिवार के लोग निर्धारित समय के अनुसार वहां जाकर अस्थियां एकत्र कर लेते थे। आज बड़े शहरों में स्थिति काफी बदल चुकी है। श्मशान घाटों पर लगातार अंतिम संस्कार होने के कारण राख और अस्थियों को लंबे समय तक उसी स्थान पर छोड़ना व्यावहारिक नहीं होता। इनके बिखरने या किसी दूसरी चिता की राख के साथ मिल जाने की आशंका भी रहती है। इसलिए कई परिवार वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जल्द ही अस्थियां एकत्र कर लेते हैं

    अस्थियां चुनने के दौरान भी धार्मिक रीति का पालन किया जाता है। परिवार के सदस्य श्मशान स्थल पर जाकर प्रार्थना करते हैं और सावधानी से अस्थियों को एकत्र करते हैं। कई हिंदू परंपराओं में अस्थियों को दूध और पवित्र जल से स्नान कराने के बाद चंदन तथा फूल अर्पित करने की मान्यता है। इसके बाद अस्थियों को किसी पवित्र नदी में ले जाकर विधि विधान के साथ विसर्जित किया जाता है

    कई बार किसी कारण से परिवार निर्धारित तीसरे या चौथे दिन अस्थि विसर्जन नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घबराने की जरूरत नहीं मानी जाती। अस्थियों को सम्मानपूर्वक साफ और सुरक्षित स्थान पर रखा जा सकता है और बाद में परिवार की सुविधा तथा परंपरा के अनुसार किसी शुभ अवसर पर उनका विसर्जन किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अपने परिवार के कुल पुरोहित या स्थानीय धार्मिक परंपरा के जानकार से सलाह लेना उचित माना जाता है क्योंकि अलग अलग क्षेत्रों में विधियां अलग हो सकती हैं

    हिंदू धर्म में गंगा नदी को विशेष रूप से पवित्र माना गया है। इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग हरिद्वार और वाराणसी जैसे तीर्थ स्थानों पर जाकर अस्थि विसर्जन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि गंगा में अस्थियों का विसर्जन करने से मृतक को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। हालांकि इन मान्यताओं का संबंध धार्मिक आस्था से है और इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए

    वर्तमान समय में धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है। अस्थि विसर्जन करते समय प्लास्टिक कपड़े या ऐसी अन्य सामग्री नदी में नहीं डालनी चाहिए जो जल को प्रदूषित करे। श्रद्धा और धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए नदियों की स्वच्छता बनाए रखना भी समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है

  • डोल ग्यारस पर जरूर करें ये काम 22 सितंबर को भगवान विष्णु की पूजा से जुड़ी मान्यताएं जानिए व्रत और पूजन की पूरी विधि

    डोल ग्यारस पर जरूर करें ये काम 22 सितंबर को भगवान विष्णु की पूजा से जुड़ी मान्यताएं जानिए व्रत और पूजन की पूरी विधि

    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी के साथ डोल ग्यारस और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष डोल ग्यारस 22 सितंबर 2026 मंगलवार को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात करीब 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9 बजकर 43 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 22 सितंबर को व्रत रखा जा रहा है और व्रत का पारण 23 सितंबर को किया जाएगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चातुर्मास के दौरान अपनी करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित कई क्षेत्रों में इसे डोल ग्यारस के नाम से विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाया जाता है और कई जगह भगवान की सजी हुई पालकी निकाली जाती है। इसके बाद भगवान को जल विहार कराया जाता है।

    डोल ग्यारस के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद भगवान विष्णु का ध्यान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद पूजा स्थल की साफ सफाई करके भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। श्रद्धालु भगवान को पीले फूल तुलसी दल चंदन अक्षत फल और मिठाई अर्पित कर सकते हैं। घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती की जाती है। पूजा के दौरान ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने की भी परंपरा है।

    इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास करते हैं। कुछ लोग फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग केवल जल ग्रहण करके व्रत रखते हैं। हालांकि निर्जल व्रत हर व्यक्ति के लिए उचित नहीं होता इसलिए अपनी सेहत और क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी है। व्रत के दौरान सात्विक आहार लेने और धार्मिक गतिविधियों में मन लगाने की परंपरा है।

    डोल ग्यारस से जुड़ी सबसे खास परंपराओं में भगवान की डोल यात्रा और जल विहार शामिल है। कई स्थानों पर मंदिरों से भगवान की प्रतिमा को पालकी में विराजमान करके शोभायात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु भजन कीर्तन करते हुए भगवान के साथ जलाशय या नदी के किनारे पहुंचते हैं। वहां विधि विधान से भगवान का जल विहार कराया जाता है। यही वजह है कि इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है।

    डोल ग्यारस के दिन तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु इस दिन दान पुण्य भी करते हैं और जरूरतमंदों को भोजन या अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तुएं देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से मन को शांति मिलती है और भक्त आध्यात्मिक रूप से स्वयं को भगवान के करीब महसूस करता है।

    डोल ग्यारस केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में लोक आस्था और सामाजिक उत्सव का भी हिस्सा है। मंदिरों में विशेष सजावट होती है और भगवान की डोल यात्रा देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति के साथ संयम सात्विकता और सेवा की भावना को महत्व दिया जाता है।

  • गणपति उत्सव में इस बार प्रसाद में लाएं स्वाद का नया ट्विस्ट, मोदक-मिठाई के साथ ट्राई करें ये 5 खास नमकीन विकल्प

    गणपति उत्सव में इस बार प्रसाद में लाएं स्वाद का नया ट्विस्ट, मोदक-मिठाई के साथ ट्राई करें ये 5 खास नमकीन विकल्प

    नई दिल्ली । गणपति उत्सव में बप्पा के भोग और प्रसाद की अपनी खास परंपरा होती है। मोदक और मिठाइयां आमतौर पर प्रसाद का प्रमुख हिस्सा रहती हैं, लेकिन अगर इस बार कुछ अलग और स्वादिष्ट परोसने की इच्छा है तो नमकीन विकल्प भी आजमाए जा सकते हैं। खास बात यह है कि ऐसे कई व्यंजन कम मात्रा में आसानी से तैयार किए जा सकते हैं और बच्चों से लेकर बड़ों तक इन्हें पसंद किया जा सकता है।

    नारियल और धनिया वाले चने प्रसाद के लिए एक आसान और पौष्टिक विकल्प हो सकते हैं। इसके लिए उबले हुए काले या सफेद चनों में ताजा नारियल और हरा धनिया मिलाया जा सकता है। हल्का जीरा या राई का तड़का इसका स्वाद बढ़ा देता है। इसे कम समय में तैयार करके बड़ी संख्या में लोगों को परोसा जा सकता है।

    अगर प्रसाद में कुछ ऐसा शामिल करना चाहते हैं जिसे आसानी से हाथ में लेकर खाया जा सके, तो मिनी समोसे अच्छा विकल्प हो सकते हैं। छोटे आकार के इन समोसों में आलू और मटर की हल्की मसालेदार फिलिंग रखी जा सकती है। पूजा के बाद इन्हें छोटे पोर्शन में प्रसाद के तौर पर परोसा जा सकता है।

    मीठे प्रसाद से अलग इस बार नींबू चावल भी तैयार किए जा सकते हैं। नींबू के स्वाद के साथ करी पत्ता और मूंगफली का हल्का तड़का इसे खास बनाता है। यह व्यंजन ज्यादा मात्रा में तैयार करना भी आसान है, इसलिए गणपति उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के लिए इसे बनाया जा सकता है।

    मिनी ढोकला भी प्रसाद की थाली में स्वाद और हल्केपन का अच्छा मेल दे सकता है। सॉफ्ट ढोकले को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर परोसा जा सकता है। ऊपर से हरा धनिया या नारियल डालने से इसका स्वाद और प्रस्तुति दोनों बेहतर हो सकते हैं। बच्चों के लिए भी यह एक आसान विकल्प हो सकता है।

    अगर कम मेहनत में कुछ अलग तैयार करना चाहते हैं, तो मसाला नमकीन कप भी बनाया जा सकता है। छोटे कप में सेव, भुना चना, मूंगफली और पोहा मिलाकर क्रंची स्नैक तैयार किया जा सकता है। इसे छोटे हिस्सों में परोसना आसान होता है और उत्सव के माहौल में यह अलग तरह का स्नैक विकल्प बन सकता है।

    गणपति उत्सव में प्रसाद का मतलब केवल मिठाई तक सीमित नहीं है। हालांकि प्रसाद तैयार करते समय परिवार की परंपराओं और पूजा से जुड़े नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। इनके अनुरूप छोटे पोर्शन में नमकीन और हल्के व्यंजन शामिल किए जा सकते हैं। इससे प्रसाद की थाली में स्वाद के साथ नया बदलाव भी देखने को मिलेगा और बप्पा के भोग के बाद परिवार व मेहमानों को कुछ अलग परोसने का अवसर मिलेगा।

  • मंगलवार व्रत के ये नियम बदल सकते हैं आपकी पूजा का तरीका जानिए हनुमान जी को प्रसन्न करने की संपूर्ण विधि

    मंगलवार व्रत के ये नियम बदल सकते हैं आपकी पूजा का तरीका जानिए हनुमान जी को प्रसन्न करने की संपूर्ण विधि

    नई दिल्ली। मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ बजरंगबली की पूजा करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। मंगलवार का व्रत विशेष रूप से साहस शक्ति आत्मविश्वास और संकटों से मुक्ति की कामना के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि हनुमान जी अपने भक्तों के कष्ट दूर करने वाले देवता हैं और मंगलवार के दिन उनकी पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखते हैं और हनुमान मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करते हैं।

    मंगलवार का व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर पूजा स्थल की सफाई करनी चाहिए। पूजा के दौरान भगवान हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार हनुमान जी को सिंदूर चमेली का तेल लाल फूल और गुड़ चने का भोग अर्पित कर सकते हैं। इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करना शुभ माना जाता है। कुछ श्रद्धालु सुंदरकांड या बजरंग बाण का पाठ भी करते हैं।

    पूजा के दौरान हनुमान जी के मंत्र का जाप भी किया जा सकता है। हनुमान जी के सरल मंत्र का श्रद्धा के साथ जाप करने से मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मंगलवार के दिन भगवान राम का स्मरण करना भी विशेष फलदायी माना जाता है क्योंकि हनुमान जी भगवान राम के परम भक्त हैं। इसलिए हनुमान पूजा के साथ राम नाम का जाप करने की भी परंपरा है।

    मंगलवार के व्रत में भोजन को लेकर अलग अलग परंपराएं प्रचलित हैं। कुछ लोग पूरे दिन निराहार रहते हैं जबकि कुछ श्रद्धालु फलाहार करते हैं। कई परिवारों में शाम के समय पूजा करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। फल दूध साबूदाना या अन्य सात्विक खाद्य पदार्थों का सेवन अपनी पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार किया जा सकता है। व्रत के दौरान संयम और सात्विक आचरण को विशेष महत्व दिया जाता है।

    मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में जाकर दर्शन करना भी शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में सेवा और दान को भी पुण्यकारी बताया गया है। इस दिन क्रोध और विवाद से बचने तथा मन को शांत रखने का प्रयास करना चाहिए।

    मंगलवार का व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं माना जाता बल्कि यह आत्मसंयम और श्रद्धा से जुड़ी परंपरा भी है। हालांकि व्रत के नियम अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकते हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को लंबे समय तक उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। श्रद्धा के साथ भगवान का स्मरण और अपनी क्षमता के अनुसार पूजा करना ही इस व्रत की मुख्य भावना मानी जाती है।

  • Aaj Ka Rashifal 22 September: आज ग्रहों की चाल बदलेगी 12 राशियों का हाल जानिए नौकरी पैसा प्रेम और सेहत का भविष्यफल

    Aaj Ka Rashifal 22 September: आज ग्रहों की चाल बदलेगी 12 राशियों का हाल जानिए नौकरी पैसा प्रेम और सेहत का भविष्यफल


    नई दिल्ली। 22 सितंबर 2026 मंगलवार का दिन ज्योतिष की दृष्टि से कई राशियों के लिए महत्वपूर्ण रहने वाला है। ग्रहों की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के कामकाज धन परिवार प्रेम और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर देखने को मिल सकता है। किसी राशि के जातकों को कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारी मिल सकती है तो कुछ लोगों को आर्थिक मामलों में सावधानी बरतने की जरूरत होगी। वहीं विद्यार्थियों के लिए भी दिन मेहनत और एकाग्रता बढ़ाने वाला रह सकता है। आइए जानते हैं मेष से मीन राशि तक सभी जातकों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन।

    मेष राशि वालों के लिए मंगलवार का दिन मेहनत के साथ आगे बढ़ने का संकेत दे रहा है। कार्यक्षेत्र में किसी महत्वपूर्ण काम की जिम्मेदारी मिल सकती है। धन से जुड़े मामलों में जल्दबाजी से बचें। परिवार में किसी सदस्य से सहयोग मिलेगा। विद्यार्थियों को पढ़ाई पर ध्यान देने से लाभ हो सकता है।

    वृषभ राशि के जातकों को आज अपनी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नौकरी करने वालों को अधिकारियों का सहयोग मिल सकता है। कारोबार में कोई नया अवसर सामने आ सकता है। खर्च बढ़ने की संभावना है इसलिए बजट बनाकर चलना बेहतर रहेगा। परिवार के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिल सकता है।

    मिथुन राशि वालों के लिए दिन सामान्य से बेहतर रह सकता है। लंबे समय से अटका कोई काम आगे बढ़ सकता है। दोस्तों या सहकर्मियों से महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है। आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत हैं। प्रेम जीवन में बातचीत से गलतफहमियां दूर हो सकती हैं।

    कर्क राशि के जातकों को आज भावनाओं पर नियंत्रण रखने की जरूरत होगी। काम का दबाव थोड़ा अधिक रह सकता है। किसी वरिष्ठ व्यक्ति की सलाह आपके लिए उपयोगी साबित हो सकती है। निवेश से जुड़े फैसले सोच समझकर लें। परिवार में किसी सदस्य की उपलब्धि से खुशी मिल सकती है।

    सिंह राशि वालों के लिए आज का दिन आत्मविश्वास बढ़ाने वाला हो सकता है। कार्यक्षेत्र में आपके काम की सराहना हो सकती है। नई जिम्मेदारी मिलने की संभावना है। कारोबारियों को लाभ का अवसर मिल सकता है। प्रेम संबंधों में मधुरता बनी रहेगी और परिवार का सहयोग मिलेगा।

    कन्या राशि के जातकों को आज योजनाबद्ध तरीके से काम करना चाहिए। नौकरी में बदलाव को लेकर विचार कर रहे हैं तो जल्दबाजी से बचें। धन की स्थिति सामान्य रहेगी। किसी पुराने मित्र से मुलाकात हो सकती है। स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न करें और आराम के लिए समय निकालें।

    तुला राशि वालों के लिए आज का दिन रिश्तों और काम के बीच संतुलन बनाने वाला रहेगा। कार्यक्षेत्र में नए संपर्क लाभदायक हो सकते हैं। आर्थिक मामलों में कोई अच्छी खबर मिल सकती है। परिवार में चल रही समस्या बातचीत से हल हो सकती है। विद्यार्थियों के लिए मेहनत का दिन है।

    वृश्चिक राशि के जातकों को आज अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना चाहिए। काम में छोटी गलती परेशानी पैदा कर सकती है इसलिए सावधानी जरूरी है। धन उधार देने से बचें। परिवार के किसी सदस्य से मतभेद हो सकते हैं लेकिन शांत रहकर बात करने से स्थिति संभल सकती है।

    धनु राशि वालों के लिए आज का दिन उत्साह से भरा रह सकता है। नौकरी और कारोबार में आगे बढ़ने के अवसर मिल सकते हैं। यात्रा से जुड़ी योजना बन सकती है। आर्थिक लाभ के संकेत हैं। प्रेम संबंधों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    मकर राशि के जातकों को आज मेहनत का परिणाम मिल सकता है। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं। रुका हुआ धन वापस मिलने की संभावना है। घर परिवार में वातावरण अच्छा रहेगा। किसी महत्वपूर्ण फैसले में अनुभवी व्यक्ति की सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है।

    कुंभ राशि वालों के लिए दिन नई संभावनाएं लेकर आ सकता है। नौकरी में नई भूमिका या अवसर मिल सकता है। कारोबार में संपर्क बढ़ेंगे। आर्थिक मामलों में स्थिति मजबूत हो सकती है। प्रेम जीवन में विश्वास बढ़ेगा। अपनी सेहत और दिनचर्या पर ध्यान देना जरूरी होगा।

    मीन राशि के जातकों के लिए मंगलवार का दिन मिलाजुला रह सकता है। काम पूरा करने में थोड़ी अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ सकती है। खर्च पर नियंत्रण रखना जरूरी होगा। परिवार का सहयोग मिलेगा। आध्यात्मिक गतिविधियों में मन लग सकता है। किसी पुराने परिचित से बातचीत मन को प्रसन्न कर सकती है।

    ज्योतिषीय राशिफल सामान्य मान्यताओं और ग्रहों की स्थिति पर आधारित होता है। इसे निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं बल्कि दैनिक ज्योतिषीय संकेतों के रूप में देखना चाहिए। व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार परिणाम अलग हो सकते हैं।

  • Hanuman Puja: हनुमान जी को प्रिय हैं ये चीजें मंगलवार को पूजा में जरूर करें शामिल जानिए धार्मिक मान्यताएं

    Hanuman Puja: हनुमान जी को प्रिय हैं ये चीजें मंगलवार को पूजा में जरूर करें शामिल जानिए धार्मिक मान्यताएं

    नई दिल्ली। भगवान हनुमान को संकटमोचन और भक्तों के कष्ट हरने वाला देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बजरंगबली अपने भक्तों की सच्ची श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होते हैं। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान भक्त उन्हें उनकी प्रिय मानी जाने वाली वस्तुएं अर्पित करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा के साथ हनुमान जी को सिंदूर चमेली का तेल लाल फूल और गुड़ चने का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। हालांकि अलग अलग क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा की विधि और चढ़ावे में अंतर देखने को मिलता है।

    हनुमान जी की पूजा में सिंदूर का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक कथाओं में सिंदूर से जुड़ी हनुमान जी की एक प्रसिद्ध कथा भी मिलती है। इसी वजह से भक्त बजरंगबली को सिंदूर अर्पित करते हैं। कई मंदिरों में हनुमान जी की प्रतिमा पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार पूजा के दौरान भक्त श्रद्धा के साथ सिंदूर अर्पित कर सकते हैं।

    हनुमान जी को गुड़ और चने का भोग लगाने की भी परंपरा है। मंगलवार के दिन भक्त गुड़ चना खरीदकर मंदिर में अर्पित करते हैं और बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसे बजरंगबली के प्रिय भोगों में शामिल माना जाता है। इसके अलावा केले और अन्य फल भी भगवान को भोग के रूप में अर्पित किए जा सकते हैं। भोग लगाते समय मन में श्रद्धा और भगवान के प्रति समर्पण की भावना रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    पूजा में लाल फूल चढ़ाने की भी परंपरा है। लाल रंग को हनुमान जी से जोड़कर देखा जाता है इसलिए भक्त उन्हें लाल फूल अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान लाल वस्त्र अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है। भक्त अपनी श्रद्धा और स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा सामग्री का चयन कर सकते हैं।

    हनुमान जी की पूजा में चमेली के तेल का भी इस्तेमाल किया जाता है। कई श्रद्धालु चमेली का तेल और सिंदूर लेकर मंदिर जाते हैं। मान्यता के अनुसार इसे हनुमान जी को अर्पित करना शुभ माना जाता है। हालांकि मंदिर में किसी वस्तु को चढ़ाने से पहले वहां की पूजा व्यवस्था और नियमों का ध्यान रखना चाहिए।

    हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए केवल भोग या पूजा सामग्री ही महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान चालीसा का पाठ भगवान की आराधना का प्रमुख माध्यम है। मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने के साथ भगवान राम के नाम का स्मरण भी किया जाता है। हनुमान जी को भगवान राम का परम भक्त माना जाता है इसलिए उनकी पूजा में राम नाम का जाप विशेष महत्व रखता है।

    हनुमान जी की पूजा करते समय भक्तों को सात्विक और संयमित आचरण रखने की परंपरा है। क्रोध विवाद और गलत आचरण से दूर रहने का प्रयास किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि भगवान को दिखावे से अधिक सच्ची श्रद्धा और भक्ति प्रिय होती है। इसलिए पूजा में महंगी सामग्री की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार सरल तरीके से भगवान का स्मरण करना भी पर्याप्त माना जाता है।

  • सोमवार व्रत रखने से पहले जान लें ये जरूरी बातें खानपान से लेकर पूजा तक इन नियमों का रखें ध्यान

    सोमवार व्रत रखने से पहले जान लें ये जरूरी बातें खानपान से लेकर पूजा तक इन नियमों का रखें ध्यान


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार के दिन व्रत रखने और भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को शिव कृपा प्राप्त होती है। कई लोग मनोकामना पूर्ति सुख शांति और परिवार की समृद्धि की कामना से सोमवार का व्रत रखते हैं। कुछ भक्त लगातार कई सोमवार तक व्रत करते हैं तो कुछ लोग अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार एक या अधिक सोमवार को उपवास रखते हैं। व्रत के दौरान केवल भोजन का त्याग ही नहीं बल्कि मन वचन और कर्म में संयम रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    सोमवार व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र पहनने चाहिए। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा के स्थान को साफ करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की तस्वीर या प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर पूजा शुरू की जा सकती है। शिवलिंग पर जल चढ़ाना सोमवार की पूजा का प्रमुख हिस्सा माना जाता है। श्रद्धा के अनुसार दूध और गंगाजल से अभिषेक भी किया जाता है। इसके बाद बेलपत्र फूल और फल अर्पित किए जा सकते हैं।

    सोमवार व्रत में बेलपत्र का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करने से भक्त की श्रद्धा प्रकट होती है। बेलपत्र चढ़ाते समय उसे साफ करके अर्पित करना चाहिए। पूजा के दौरान भगवान शिव के मंत्रों का जाप किया जा सकता है। नमः शिवाय का जाप भगवान शिव की आराधना में प्रमुख माना जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी श्रद्धा के साथ किया जाता है।

    व्रत के दौरान खानपान के नियम व्यक्ति की परंपरा और व्रत के प्रकार पर निर्भर करते हैं। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं जबकि कई लोग फलाहार करते हैं। फल दूध दही मखाने और व्रत में मान्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता है। सेंधा नमक का इस्तेमाल भी कई व्रत परंपराओं में किया जाता है। सामान्य नमक और अनाज का सेवन कई लोग व्रत के दौरान नहीं करते हैं। हालांकि स्वास्थ्य समस्या वाले लोगों को कठोर उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

    सोमवार व्रत में सात्विक आचरण को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन क्रोध झूठ अपशब्द और किसी के प्रति गलत भावना रखने से बचना चाहिए। जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना और अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी धार्मिक परंपरा में शुभ माना जाता है। व्रत के दौरान भगवान शिव का ध्यान और पूजा करते हुए मन को शांत रखने का प्रयास करना चाहिए।

    शाम के समय भगवान शिव की पूजा और आरती की जा सकती है। व्रत खोलने का समय भी अलग अलग परंपराओं में अलग हो सकता है। कुछ लोग शाम की पूजा के बाद फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग अगले दिन व्रत का पारण करते हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और धार्मिक मान्यता के अनुसार नियमों का पालन करना उचित माना जाता है। सोमवार व्रत का उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं बल्कि श्रद्धा संयम और सकारात्मक आचरण के साथ भगवान शिव का स्मरण करना भी माना जाता है।

  • भगवान विष्णु की करवट बदलने से जुड़ी है राजा बलि की कहानी! जानिए परिवर्तिनी एकादशी का वामन अवतार से क्या है संबंध

    भगवान विष्णु की करवट बदलने से जुड़ी है राजा बलि की कहानी! जानिए परिवर्तिनी एकादशी का वामन अवतार से क्या है संबंध

    नई दिल्ली। परिवर्तिनी एकादशी हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखने वाली एकादशी मानी जाती है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के दिन अपनी करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी और पार्श्व एकादशी के नाम से जाना जाता है। साल 2026 में परिवर्तिनी एकादशी 21 सितंबर को मनाई जा रही है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा और व्रत करने की परंपरा है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवशयनी एकादशी के दिन योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चातुर्मास की अवधि शुरू होती है। इस दौरान भगवान विष्णु पाताल लोक में विश्राम करते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इन दोनों महत्वपूर्ण एकादशियों के बीच भाद्रपद शुक्ल एकादशी आती है जिसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।

    धार्मिक मान्यता है कि चार महीने की योगनिद्रा के बीच भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट बदलते हैं। इसे भगवान के विश्राम के दौरान होने वाला परिवर्तन माना जाता है। इसी कारण इस एकादशी का नाम परिवर्तिनी पड़ा। इसे पार्श्व एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने और व्रत रखने से भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

    परिवर्तिनी एकादशी का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी बताया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इसी अवसर पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। राजा बलि ने वामन भगवान की मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान वामन ने विराट रूप धारण किया और दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग लोक को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर भगवान के सामने कर दिया।

    राजा बलि की भक्ति और समर्पण से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। इसके बाद उन्होंने राजा बलि को पाताल लोक का राजा बना दिया। साथ ही मान्यता के अनुसार भगवान ने बलि को यह वरदान दिया कि वह हर वर्ष चार महीने के लिए पाताल लोक में उनके यहां निवास करेंगे। इसी कथा को चातुर्मास की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

    इस तरह परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु की योगनिद्रा के बीच होने वाले करवट परिवर्तन के साथ साथ उनके वामन अवतार और राजा बलि की भक्ति से भी जुड़ी हुई है। इस दिन भक्त भगवान विष्णु और उनके वामन स्वरूप की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस एकादशी को आत्मसंयम भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का पर्व माना गया है।

  • सोमवार व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां जानिए पूजा का सही तरीका और व्रत से जुड़े जरूरी नियम

    सोमवार व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां जानिए पूजा का सही तरीका और व्रत से जुड़े जरूरी नियम


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा और व्रत करने से भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। कई लोग सुख शांति समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना से सोमवार का व्रत रखते हैं। कुछ भक्त लगातार कई सोमवार तक व्रत करते हैं जबकि कुछ विशेष संकल्प के साथ सोमवार व्रत का पालन करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियम के साथ किया गया व्रत भक्त के मन में सकारात्मकता और भक्ति की भावना को मजबूत करता है।

    सोमवार व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जा सकता है। पूजा के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। इसके बाद शिवलिंग का जल से अभिषेक किया जाता है। धार्मिक परंपरा में भगवान शिव को जल और दूध अर्पित करने का विधान बताया गया है। इसके साथ बेलपत्र धतूरा फूल और फल अर्पित किए जा सकते हैं।

    पूजा के दौरान भगवान शिव का ध्यान करते हुए महामृत्युंजय मंत्र या पंचाक्षरी मंत्र का जाप किया जा सकता है। पंचाक्षरी मंत्र नमः शिवाय को भगवान शिव की आराधना में विशेष महत्व दिया जाता है। इसके बाद भगवान शिव की आरती करें और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करें। पूजा के दौरान मन को शांत रखना और श्रद्धा भाव बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    सोमवार व्रत में खानपान को लेकर भी अलग अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग पूरे दिन निर्जल व्रत रखते हैं जबकि कुछ लोग फलाहार करते हैं। फलाहार में फल दूध दही मखाने और व्रत में खाए जाने वाले अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखते हुए ही उपवास करना चाहिए। किसी बीमारी या विशेष स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में कठोर उपवास करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना उचित रहता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत के दिन सात्विक विचार और आचरण रखने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस दिन क्रोध झूठ और किसी के प्रति बुरा व्यवहार करने से बचना चाहिए। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी पुण्यकारी माना जाता है। शाम के समय भगवान शिव की दोबारा पूजा करके आरती की जा सकती है।

    व्रत का पारण अपनी परंपरा और संकल्प के अनुसार किया जाता है। कुछ लोग शाम की पूजा के बाद फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग अगले दिन व्रत खोलते हैं। अलग अलग क्षेत्रों और परिवारों में सोमवार व्रत के नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत का पालन करना उचित माना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्रत केवल भोजन से जुड़ा नियम नहीं बल्कि श्रद्धा संयम और अच्छे आचरण का संकल्प भी माना जाता है।

  • 23 सितंबर को अस्त होंगे शुक्र, 37 दिन बाद उदय, 4 राशियों के लिए अक्टूबर तक धन-लाभ के योग

    23 सितंबर को अस्त होंगे शुक्र, 37 दिन बाद उदय, 4 राशियों के लिए अक्टूबर तक धन-लाभ के योग


    नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को धन-संपत्ति, भौतिक सुख-सुविधा, प्रेम, सौंदर्य और आकर्षण से जुड़ा ग्रह माना जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार आने वाले दिनों में शुक्र की स्थिति में दो बड़े बदलाव होने वाले हैं। द्रिक पंचांग के अनुसार 23 सितंबर को शुक्र अस्त हो जाएंगे और करीब 37 दिनों तक इसी अवस्था में रहेंगे। इसके बाद 30 अक्टूबर को शुक्र उदित होंगे। खास बात यह है कि इसी अवधि में 3 अक्टूबर को शुक्र वक्री भी हो जाएंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के मुताबिक शुक्र की इन बदलती स्थितियों का सभी 12 राशियों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है। इनमें वृषभ, मिथुन, तुला और मकर राशि के जातकों के लिए आर्थिक और करियर से जुड़े मामलों में लाभ के योग बताए गए हैं।

    वृषभ : अटका पैसा वापस मिलने के योग

    वृषभ राशि के स्वामी शुक्र ही हैं। ऐसे में शुक्र की स्थिति में होने वाला यह बदलाव ज्योतिषीय दृष्टि से इस राशि के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मान्यता के अनुसार इस दौरान भौतिक सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी हो सकती है और मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रह सकती है।

    लंबे समय से अटका या फंसा हुआ पैसा वापस मिलने के योग बन सकते हैं। नया कारोबार शुरू करने की योजना बना रहे लोगों को लाभ मिल सकता है। प्रॉपर्टी या वाहन खरीदने की इच्छा भी पूरी होने के संकेत हैं। कार्यक्षेत्र में मेहनत की सराहना मिलने और आर्थिक स्थिति बेहतर होने की संभावना जताई गई है।

    मिथुन : आय के नए रास्ते खुल सकते हैं

    मिथुन राशि के स्वामी बुध हैं और ज्योतिष में बुध-शुक्र के बीच मित्रवत संबंध माने जाते हैं। इसी आधार पर शुक्र की यह स्थिति मिथुन राशि के लिए लाभकारी बताई जा रही है।

    ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस अवधि में आय के नए और स्थायी स्रोत बन सकते हैं। नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन या वेतन वृद्धि से जुड़ी अच्छी खबर मिल सकती है। कारोबार में किए गए पुराने निवेश से उम्मीद से बेहतर रिटर्न मिलने के योग हैं। निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हो सकती है, जिसका फायदा व्यावसायिक सौदों में मिलने की संभावना है।

    तुला : प्रतिष्ठा के साथ आर्थिक लाभ

    तुला भी शुक्र की स्वराशि है। इसलिए शुक्र की स्थिति में बदलाव का असर इस राशि के जातकों के व्यक्तित्व और आर्थिक मामलों पर पड़ने की बात कही गई है।

    मान्यता के अनुसार इस दौरान मान-सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ सकती है। मीडिया, फैशन, आर्ट्स, डिजाइनिंग या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को पहचान मिलने के साथ आर्थिक लाभ हो सकता है। पैतृक संपत्ति से जुड़ा कोई पुराना विवाद सुलझने पर आर्थिक राहत मिलने के भी योग बताए गए हैं।

    मकर : नौकरी और कारोबार में मिल सकता है फायदा

    मकर राशि के स्वामी शनि हैं और ज्योतिषीय मान्यता में शनि और शुक्र को मित्र ग्रह माना जाता है। इसी वजह से शुक्र का यह परिवर्तन मकर राशि के करियर के लिए महत्वपूर्ण बताया जा रहा है।

    नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को किसी बड़ी कंपनी से अच्छा ऑफर मिल सकता है। कार्यस्थल पर वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलने की संभावना है। व्यापार से जुड़ी यात्राएं लाभदायक हो सकती हैं। परिवार में सुख-शांति का माहौल रहने के साथ संचित धन में बढ़ोतरी के भी योग बताए गए हैं।

    शुक्र को मजबूत करने के लिए ज्योतिषीय उपाय

    ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शुक्र से जुड़े शुभ प्रभावों के लिए शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा करना लाभकारी माना जाता है। उन्हें सफेद मिष्ठान, खीर या मखाने का भोग लगाया जा सकता है।

    शुक्रवार के दिन जरूरतमंद व्यक्ति को चावल, दूध, चीनी, मिश्री या सफेद वस्त्र का दान भी शुभ माना गया है। इसके अलावा रोजाना, विशेषकर शुक्रवार को स्फटिक की माला से 108 बार शुक्र ग्रह के बीज मंत्र का जाप करने की सलाह दी जाती है।

    ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति के प्रभाव को व्यक्ति की जन्मकुंडली के आधार पर अलग-अलग माना जाता है, इसलिए यहां बताए गए परिणाम सामान्य ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।