Category: Religious Astrology

  • होली पर चंद्र ग्रहण का साया: 3 मार्च को खग्रास चंद्र ग्रहण, सूतक के कारण 2 मार्च की मध्य रात्रि से पहले होगा होलिका दहन

    होली पर चंद्र ग्रहण का साया: 3 मार्च को खग्रास चंद्र ग्रहण, सूतक के कारण 2 मार्च की मध्य रात्रि से पहले होगा होलिका दहन


     नई दिल्ली । वर्ष 2026 का पहला चंद्र ग्रहण रंगों के पर्व धुलेंडी के दिन यानी 3 मार्च को लगने जा रहा है। यह एक खग्रास चंद्र ग्रहण होगा, जो उज्जैन सहित पूरे देश में ग्रस्तोदय रूप चंद्रमा के उदय होते समय ग्रहण लगा होना में दिखाई देगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो ग्रहण दृश्य होता है, उसका सूतक और प्रभाव दोनों मान्य होते हैं। इस विशेष स्थिति के कारण इस बार होली और धुलेंडी के त्यौहार पर ग्रहों का बड़ा प्रभाव देखने को मिलेगा।

    2 मार्च को समय से पहले होगा होलिका दहन ज्योतिषीय गणनाओं और महाकालेश्वर विद्वत परिषद के अनुसार, 3 मार्च की सुबह से ही ग्रहण का सूतक वेधकाल प्रभावी हो जाएगा। सूतक काल में मांगलिक कार्य और अग्नि प्रज्वलन वर्जित माना जाता है। इसी कारण होलिका दहन 2 मार्च को मध्य रात्रि 12 बजे से पहले करना अनिवार्य होगा। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि सूतक लगने के बाद होलिका दहन करना शास्त्र सम्मत नहीं होगा, इसलिए श्रद्धालु समय का विशेष ध्यान रखें। सिंह राशि और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में ग्रहण श्री महाकाल विद्वत परिषद उज्जैन के प्रमुख आचार्य पं. आशीष अग्निहोत्री ने बताया कि यह ग्रहण सिंह राशि और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में घटित होगा। सूतक काल का प्रारंभ 3 मार्च 2026, सुबह 6 बजकर 20 मिनट से। प्रभाव सूतक काल शुरू होते ही मंदिरों के पट बंद हो जाएंगे और मूर्ति स्पर्श निषेध रहेगा। इस दौरान भोजन, शयन और मनोरंजन जैसे कार्यों को वर्जित माना गया है।

    धुलेंडी पर सूतक का साया 3 मार्च को धुलेंडी रंग खेलने वाला दिन है। चूंकि सुबह से ही सूतक लग जाएगा, इसलिए धार्मिक दृष्टि से पूजा-पाठ और शुद्धता का विशेष महत्व रहेगा। ग्रहण की समाप्ति के बाद ही स्नान, दान और शुद्धि की जाएगी। इसके उपरांत ही लोग विधिवत पूजा और अन्य उत्सव मना सकेंगे।2026 खगोलीय घटनाओं का वर्ष आचार्य पं. आशीष अग्निहोत्री के अनुसार, वर्ष 2026 खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से विलक्षण रहेगा। इस पूरे वर्ष में कुल चार ग्रहण लगेंगे, जिनमें दो सूर्य ग्रहण और दो चंद्र ग्रहण शामिल होंगे। 3 मार्च को होने वाला खग्रास चंद्र ग्रहण इस श्रृंखला की पहली प्रमुख घटना है, जिसका व्यापक प्रभाव सभी राशियों पर भी देखने को मिलेगा।

  • माणिक्य भस्म: चेहरे पर निखार और हृदय स्वास्थ्य के लिए औषधि, जानें सेवन की सावधानियां

    माणिक्य भस्म: चेहरे पर निखार और हृदय स्वास्थ्य के लिए औषधि, जानें सेवन की सावधानियां

    नई दिल्ली।  प्राचीन आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों के साथ-साथ रत्नों का भी इस्तेमाल होता आया है। हिमालय की पहाड़ियों पर मिलने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों की तरह ही, रत्नों में भी संजीवनी शक्ति होती है। खासतौर पर माणिक्य भस्म का आयुर्वेद में लंबा इतिहास है, जो स्वास्थ्य सुधारने के साथ चेहरे के निखार और मानसिक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

    हृदय, पाचन और श्वसन के लिए फायदेमंद

    माणिक्य भस्म का प्रयोग हृदय संबंधी विकार, अल्पशुक्राणुता, पाचन दोष, सांस संबंधी रोग और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। आयुर्वेद में इसे वात और कफ दोष को संतुलित करने वाला माना गया है। जब शरीर में इन दोषों की अधिकता होती है, तो सर्दी, जुकाम, बुखार, पेट में अल्सर और गर्मी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। माणिक्य भस्म का सेवन इन सभी समस्याओं को कम करने में मदद करता है।

    त्वचा और चेहरे की सुंदरता में लाभकारी

    माणिक्य भस्म चेहरे की चमक वापस लाने में भी सहायक है। इसका सेवन और लेपन चेहरे के ओज को बढ़ाता है, त्वचा की खुजली, जलन, एलर्जी जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है। समय से पहले झुर्रियों या बुजुर्ग दिखने की समस्या में यह संजीवनी साबित हो सकता है।

    माणिक्य भस्म का निर्माण और सेवन

    भस्म बनाने में शुद्ध माणिक्य, पारा, ऑर्पिमेंट और आर्सेनिक सल्फाइड का इस्तेमाल होता है। सामग्री को कई बार शोधन करके सुरक्षित बनाया जाता है। इसे चिकित्सक की सलाह और वजन के अनुसार ही लेना चाहिए। पीलिया, काला बुखार, बार-बार पेशाब आना या अन्य मूत्र संबंधी बीमारियों में माणिक्य भस्म औषधि की तरह काम करता है और कई दिनों में लाभ दिखाता है।

    संजीवनी गुणों की भरमार

    माणिक्य भस्म का नियमित और चिकित्सकीय सेवन रक्त शुद्ध करता है, पेट संबंधी विकार ठीक करता है, ऊर्जा और मानसिक क्षमता बढ़ाता है। आयुर्वेद में इसे संजीवनी के रूप में माना गया है, जो शरीर और मन दोनों को संतुलित रखता है।

  • बसंत पंचमी से होली का उत्सव: ऋतु और धर्म का अद्भुत संगम.

    बसंत पंचमी से होली का उत्सव: ऋतु और धर्म का अद्भुत संगम.


    नई दिल्ली। मकर संक्रांति के बाद जैसे-जैसे बसंत पंचमी का पर्व करीब आता है देशभर में उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बसंत पंचमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिस दिन विद्या कला और संगीत की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। लेकिन इसके साथ ही एक और रंगीन पर्व होली की तैयारी भी शुरू हो जाती है। सवाल यह है कि जब होली फाल्गुन मास में मनाई जाती है तो बसंत पंचमी पर इसकी तैयारी क्यों शुरू हो जाती है? इसका उत्तर ऋतु और धार्मिक विश्वासों में छिपा है।

    बसंत पंचमी का आगमन बसंत ऋतु के साथ होता है। बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। इस समय प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है। पेड़ों पर फूल खिलते हैं सरसों के खेत पीले रंग से लहलहा उठते हैं और वातावरण में नई ऊर्जा का संचार होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को प्रकृति का उत्सव और नई खुशियों का प्रतीक माना जाता है। इस दिन न केवल देवी सरस्वती की पूजा होती है बल्कि यह समय प्रकृति की सौंदर्य और रंगों का जश्न मनाने का भी है।

    धार्मिक दृष्टि से भी बसंत पंचमी और होली का संबंध गहरा है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार बसंत ऋतु का आगमन ही होली के उत्सव का संकेत देता है। उत्तर भारत के विशेषकर ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही फाग गीत गाए जाने लगते हैं और होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह उत्सव लगभग 40 दिनों तक चलता है जिसमें हर दिन मंदिरों और घरों में रंगों और गुलाल के साथ भगवान की पूजा की जाती है। बसंत पंचमी से होली तक का यह समय प्रकृति के 12 रंगों और नई ऊर्जा का उत्सव माना जाता है।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार बसंत पंचमी और होली के बीच का यह समय प्रेम उल्लास और आनंद का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि में रंग भरने और प्रेम बनाए रखने के लिए कामदेव और रति ने भगवान शिव की तपस्या को भंग किया था। इसी घटना के बाद से बसंत पंचमी से लेकर होली तक का समय प्रेम और उत्साह के लिए पवित्र माना गया। इस अवधि में प्रकृति प्रेम और उल्लास सभी मिलकर मनुष्य और समाज में एक नई ऊर्जा का संचार करते हैं।

    इस प्रकार बसंत पंचमी न केवल ज्ञान और विद्या का पर्व है बल्कि यह होली के रंगीन उत्सव की शुरुआत का संकेत भी देता है। ऋतु और धर्म का यह अद्भुत संगम समाज में उत्साह प्रेम और रंगों का संदेश फैलाता है।

  • वास्तु टिप्स : घर के मंदिर में भूलकर भी न रखें ये 4 प्रकार की मूर्तियां, वरना रुक सकती है तरक्की और बढ़ सकता है गृह-क्लेश

    वास्तु टिप्स : घर के मंदिर में भूलकर भी न रखें ये 4 प्रकार की मूर्तियां, वरना रुक सकती है तरक्की और बढ़ सकता है गृह-क्लेश


    नई दिल्ली । घर के मंदिर के लिए वास्तु टिप्स । हिंदू धर्म में घर का मंदिर सबसे पवित्र, शांत और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यहीं से पूरे घर में शुभ ऊर्जा का संचार होता है और परिवार पर देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है। लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार, यदि अनजाने में पूजा स्थल पर कुछ गलत प्रकार की मूर्तियां या तस्वीरें रख दी जाएं, तो यही मंदिर वास्तु दोष का कारण भी बन सकता है। ऐसे दोष न केवल आर्थिक परेशानियां बढ़ाते हैं, बल्कि पारिवारिक कलह, मानसिक तनाव और निर्णय क्षमता में कमी का कारण भी बन सकते हैं।

    ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, घर के मंदिर में कुछ विशेष प्रकार की मूर्तियां रखना अशुभ माना गया है। सबसे पहले बात करते हैं खंडित या टूटी हुई मूर्तियों की। यदि किसी मूर्ति का हाथ, पैर, मुख या अन्य कोई हिस्सा टूटा हुआ है, या उस पर से रंग उतर चुका है, तो ऐसी मूर्ति की पूजा नहीं करनी चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि खंडित प्रतिमाओं से सकारात्मक फल नहीं मिलता, बल्कि घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। ऐसी मूर्तियों को सम्मानपूर्वक किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए या पीपल के वृक्ष के नीचे रख देना उचित माना गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात भगवान के रौद्र या उग्र स्वरूप से जुड़ी है। घर के मंदिर में हमेशा देवी-देवताओं के शांत, सौम्य और आशीर्वाद देने वाले स्वरूप की ही मूर्तियां या तस्वीरें रखनी चाहिए। भगवान शिव का तांडव स्वरूप, कालभैरव या अत्यधिक क्रोधित मुद्रा वाली प्रतिमाएं घर में मानसिक अशांति, भय और तनाव का कारण बन सकती हैं। वास्तु के अनुसार, सौम्य स्वरूप की प्रतिमाएं घर में शांति, प्रेम और सामंजस्य बनाए रखती हैं।

    तीसरा वास्तु दोष तब उत्पन्न होता है जब एक ही देवता की एक से अधिक मूर्तियां या तस्वीरें एक ही स्थान पर रख दी जाती हैं। वास्तु शास्त्र कहता है कि एक ही भगवान की दो या उससे अधिक प्रतिमाएं रखने से ऊर्जा का टकराव होता है। इसका प्रभाव घर के मुखिया और परिवार के सदस्यों की मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है और अनावश्यक तनाव बढ़ सकता है। चौथी महत्वपूर्ण गलती मूर्तियों को आमने-सामने रखना है। कई बार जगह की कमी या सजावट के कारण लोग देवी-देवताओं की मूर्तियों को एक-दूसरे के सामने रख देते हैं। वास्तु जानकारों के अनुसार, ऐसा करने से घर के सदस्यों के बीच मतभेद, विवाद और कलह की स्थिति बन सकती है। मूर्तियों की स्थापना इस प्रकार होनी चाहिए कि सभी एक ही दिशा में शांत भाव से विराजमान हों।

    इसके साथ ही मंदिर की नियमित साफ-सफाई और देखभाल भी उतनी ही जरूरी है। मूर्तियों पर धूल जमना, पुराने सूखे फूल, मुरझाई माला या जले हुए दीपक का अवशेष रखना वास्तु दोष को बढ़ाता है। यदि घर में लड्डू गोपाल विराजमान हैं, तो उनकी नियमित सेवा, भोग और श्रृंगार करना विशेष रूप से आवश्यक माना गया है। कुल मिलाकर, घर का मंदिर केवल सजावट का स्थान नहीं, बल्कि श्रद्धा और ऊर्जा का केंद्र होता है। किसी भी शुभ तिथि या शनिवार के दिन अपने मंदिर का निरीक्षण कर वास्तु के अनुसार आवश्यक सुधार करें, ताकि आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता के मार्ग सदैव खुले रहें।

  • मौनी अमावस्या 2026: 18 जनवरी को रवि मौनी अमावस्या, जानिए स्नान का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

    मौनी अमावस्या 2026: 18 जनवरी को रवि मौनी अमावस्या, जानिए स्नान का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली । मौनी अमावस्या 2026। सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, लेकिन माघ मास में पड़ने वाली अमावस्या को सभी अमावस्याओं में सर्वाधिक पुण्यदायी कहा गया है। इसे माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन स्नान, दान, पूजा, पितृ तर्पण और मौन व्रत करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्म व्यक्ति के मन को शुद्ध करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि लाते हैं।

    इस वर्ष मौनी अमावस्या पर एक विशेष और दुर्लभ संयोग बन रहा है। अमावस्या तिथि 18 जनवरी को मध्य रात्रि 12:03 बजे से प्रारंभ होकर 19 जनवरी को मध्य रात्रि 1:21 बजे तक रहेगी। चूंकि यह अमावस्या रविवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे “रवि मौनी अमावस्या” कहा जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रवि मौनी अमावस्या का संयोग अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का नाश होता है और सौभाग्य में वृद्धि होती है।

    मौनी अमावस्या का विशेष संबंध पवित्र स्नान से है। माघ मास में गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, शिप्रा जैसी नदियों में स्नान का अत्यधिक महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया स्नान हजारों यज्ञों के बराबर फल देता है। वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या के दिन स्नान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:27 बजे से 6:21 बजे तक सबसे उत्तम माना गया है। जो लोग किसी कारणवश नदी स्नान नहीं कर सकते, वे घर पर ही स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

    मौनी अमावस्या पितृ तर्पण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण दिन मानी जाती है। इस दिन पूर्वजों की शांति के लिए जल अर्पण, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया तर्पण पितृ दोष को शांत करता है और परिवार में सुख-शांति लाता है। स्नान और तर्पण के बाद सूर्य देव की पूजा का भी विशेष महत्व है। तांबे के लोटे में जल भरकर सूर्य को अर्घ्य देना, उसमें लाल फूल और अक्षत अर्पित करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से स्वास्थ्य लाभ होता है, आत्मबल बढ़ता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। कई श्रद्धालु पूरे दिन मौन रखते हैं या बहुत कम बोलते हैं। मान्यता है कि मौन रहने से मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और आत्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। इस दिन जप, ध्यान और साधना करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति होती है। कुल मिलाकर, मौनी अमावस्या 2026 न केवल स्नान और दान का पर्व है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक जागरण का भी महत्वपूर्ण अवसर है।

  • 17 जनवरी 2026 का पंचांग: माघ कृष्ण चतुर्दशी आज, शनिवार को शनि देव की पूजा का विशेष महत्व

    17 जनवरी 2026 का पंचांग: माघ कृष्ण चतुर्दशी आज, शनिवार को शनि देव की पूजा का विशेष महत्व


    नई दिल्ली । 17 January 2026 Panchang। आज 17 जनवरी 2026, शनिवार का दिन है और माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि देव को समर्पित माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से शनि देव की पूजा करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव में कमी आती है तथा जीवन में स्थिरता और शांति का वास होता है। आज के दिन पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि पर मूल नक्षत्र और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र में यह संयोग विशेष माना जाता है।
    मूल नक्षत्र को जहां एक ओर उग्र और तीव्र स्वभाव का माना जाता है, वहीं पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र विजय और सफलता का प्रतीक है। ऐसे में आज का दिन कुछ कार्यों के लिए अनुकूल तो कुछ के लिए सावधानी बरतने वाला माना गया है। धार्मिक दृष्टि से माघ माह को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस महीने में स्नान, दान और जप-तप का विशेष महत्व होता है। चतुर्दशी तिथि पर शिव आराधना का भी विशेष फल प्राप्त होता है। आज शनिवार होने के कारण शिव और शनि दोनों की पूजा करने से विशेष लाभ मिल सकता है। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काले तिल, सरसों का तेल, काले वस्त्र और उड़द दाल का दान करना शुभ माना जाता है।

    आज के शुभ मुहूर्त

    आज के दिन कुछ विशेष समय ऐसे हैं, जिन्हें शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना गया है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:15 बजे से 12:58 बजे तक रहेगा। यह समय लगभग सभी प्रकार के शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है। वहीं अमृत काल सुबह 5:05 बजे से 6:49 बजे तक रहेगा, जो पूजा-पाठ और ध्यान के लिए श्रेष्ठ है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:37 बजे से 6:25 बजे तक रहेगा, इस समय साधना और आत्मिक चिंतन से विशेष फल प्राप्त होता है।

    आज के अशुभ काल
    आज के दिन कुछ समय ऐसे भी हैं, जिनमें शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। राहु काल सुबह 9:55 बजे से 11:16 बजे तक रहेगा। यम गण्ड दोपहर 1:57 बजे से 3:18 बजे तक रहेगा, जबकि कुलिक काल सुबह 7:14 बजे से 8:35 बजे तक माना जाएगा। इसके अलावा दुर्मुहूर्त सुबह 8:40 बजे से 9:23 बजे तक रहेगा। वर्ज्यम काल दो समय में रहेगा—सुबह 6:25 बजे से 8:11 बजे तक और शाम 6:36 बजे से 8:20 बजे तक।

    सूर्य और चंद्रमा की स्थिति
    आज सूर्य का उदय सुबह 7:14 बजे और सूर्यास्त शाम 5:59 बजे होगा। चंद्रमा का उदय सुबह 6:02 बजे और चंद्रास्त शाम 4:41 बजे होगा। कुल मिलाकर 17 जनवरी 2026 का दिन धार्मिक कार्यों, शनि पूजा, दान-पुण्य और आत्मिक साधना के लिए उपयुक्त है। शुभ मुहूर्त का ध्यान रखते हुए कार्य करने से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

  • मौनी अमावस्या पर माघ मेले का तीसरा शाही स्नान, संगम में उमड़ेगा आस्था का सैलाब

    मौनी अमावस्या पर माघ मेले का तीसरा शाही स्नान, संगम में उमड़ेगा आस्था का सैलाब


    नई दिल्ली/ प्रयागराज। माघ मेले का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण शाही स्नान मौनी अमावस्या के अवसर पर 18 जनवरी को संगम तट पर संपन्न होगा। इस पावन अवसर पर देशभर से लाखों श्रद्धालुओं साधु-संतों और कल्पवासियों के प्रयागराज पहुंचने की संभावना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन संगम में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी कारण इस स्नान पर्व को माघ मेले का सबसे पवित्र और प्रभावशाली स्नान माना जाता है।

    मौनी अमावस्या का धार्मिक महत्व
    हिंदू पंचांग के अनुसार मौनी अमावस्या माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आती है। वर्ष 2026 में यह तिथि 18 जनवरी की रात 12:03 बजे से 19 जनवरी की रात 1:21 बजे तक रहेगी। हालांकि धार्मिक परंपराओं के अनुसार पर्व 18 जनवरी को ही मनाया जाएगा। इस दिन मौन व्रत रखने गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने तथा दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है।

    शुभ मुहूर्त और विशेष योग
    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मौनी अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 5:27 से 6:21 बजे तक संगम स्नान को अमृत स्नान माना गया है। इस दिन पंचग्रही योग पूरे समय प्रभावी रहेगा जबकि सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 10:14 बजे से अगले दिन तक रहेगा। वृंदावन के ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स के अनुसार इन शुभ योगों में किया गया स्नान जप और दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है।

    अखाड़ों का शाही स्नान
    परंपरा के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन सबसे पहले अखाड़ों के साधु-संत नागा साधु और ऋषि-मुनि गाजे-बाजे और शाही ठाठ-बाट के साथ संगम में डुबकी लगाएंगे। इसके बाद कल्पवासी और आम श्रद्धालु संगम स्नान करेंगे। मान्यता है कि अखाड़ों के स्नान के बाद संगम जल में विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

    प्रशासन की कड़ी तैयारियां
    श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मेला प्रशासन और जिला प्रशासन ने सुरक्षा यातायात और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर व्यापक इंतजाम किए हैं। संगम क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल ड्रोन निगरानी मेडिकल कैंप अस्थायी पुल स्वच्छता कर्मी और दिशा-सूचक बोर्ड लगाए गए हैं। प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे निर्धारित घाटों पर ही स्नान करें भीड़ प्रबंधन के नियमों का पालन करें और अफवाहों से बचें।

    महाशिवरात्रि तक चलेगा माघ मेला
    माघ मेला महाशिवरात्रि के दिन संपन्न होगा। धार्मिक मान्यता है कि माघ माह में सभी देवी-देवता संगम तट पर वास करते हैं। ऐसे में मौनी अमावस्या का शाही स्नान पूरे माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी स्नान पर्व माना जाता है। आस्था श्रद्धा और अध्यात्म का यह महासंगम एक बार फिर संगम नगरी को दिव्य स्वरूप प्रदान करेगा।

  • भोलेनाथ पूजा : समस्याओं के अनुसार कौन सा फूल चढ़ाएं और क्या लाभ होगा

    भोलेनाथ पूजा : समस्याओं के अनुसार कौन सा फूल चढ़ाएं और क्या लाभ होगा

    नई दिल्ली। शिव पुराण में भगवान शंकर की पूजा में फूल और पत्ते दोनों चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है.भोलेबाबा के भक्त उन्हें प्रसन्न करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो अपने भक्तों की पूजा से बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं. तो आइए जानते हैं शिव को कौन से फूल प्रिय हैं और उनका धार्मिक महत्व क्या है.

    महादेव को सभी देवताओं ने भी अपना देव माना है और महादेव काल के देवता भी हैं,उनकी पूजा करने से सभी ग्रहों के साथ साथ बीमारी परेशानी के अलावा, चोट, एक्सीडेंट, मृत्यु आदि का भय भी इंसान के मन से दूर हो जाता है. आज हम आपको इस लेख के माध्यम से बताने जा रहे हैं कि भोलेनाथ पर किस फूल को चढ़ाने से क्या फल की प्राप्ति होती है. आइए विस्तार से जानते हैं.

    गुड़हल : गुड़हल के फूल को आप सबने देखा होगा, लाल रंग के गुड़हल के फूल को अड़हल का फूल भी कहते हैं. गुड़हल का फूल भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, इसे आप भगवान शिव को अर्पित कर सकते हैं. मान्यता है कि भगवान शिव औऱ माता पार्वती को गुड़हल के फूल अर्पित करने से भक्त को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
    परिजात : परिजात हिंदु देवी देवताओं का पसंदीदा फूल है. यह फूल भगवान श्री राम जी को अत्यंत प्रिय है, लेकिन आप यह फूल भगवान शिव को अर्पित कर सकते हैं क्योंकि भगवान शिव सुंदर और महक वाले फूलों के बेहद शौकीन हैं. मान्यता है कि परिजात का फूल भगवान शिव को चढ़ाने से स्वास्थ्य लाभ होता मिलता है और व्यक्ति एक सुखी जीवन व्यतीत करता है.

    कमल का फूल : कमल का फूल माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है, यह फूल मां वैभव लक्ष्मी को अवश्य चढ़ाया जाता है. लेकिन इस फूल के शौकीन भगवान शिव भी हैं. कमल का फूल भगवान शिव को अर्पित करने से भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इसलिए भगवान शिव को कमल का फूल अवश्य चढ़ाएं.

    गुलाब का फूल : गुलाब का फूल सभी देवी देवताओं समेत भगवान शिव को भी अत्यंत प्रिय है. मान्यता है कि भगवान शिव को गुलाब का फूल अर्पित करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. तथा व्यक्ति को अच्छी सेहत, लंबी आयु और खुशहाल जीवन के वरदान की प्राप्ति होती है.
    चमेली का फूल : भगवान शिव को चमेली का फूल बेहद प्रिय है. वेदों में किए गए जिक्र के अनुसार भगवान शिव को चमेली का फूल अर्पित करने से मनुष्य के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वाहन सुख की प्राप्ति होती है. साथ ही घर में कभी अनाज की कमी नहीं होती. आपके घर परिवार में अनाज का ढेर लगा रहता है.
    कुंडली में खराब हैं ये ग्रह, तो खराब हो सकती है आपकी आंखें, होंगे इससे जुड़े रोग, जानें ज्योतिष उपाय
    धतूरे का फल और फूल : धतूरा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. भगवान शिव की पूजा धतूरे के फल और फूल के बिना अधूरी मानी जाती है. जी हां भगवान शिव को धतूरे का फल औऱ फूल अवश्य चढ़ाएं. मान्यता है कि भगवान शिव को धतूरे का फल औऱ फूल चढ़ाने से महादेव जल्दी प्रसन्न होते हैं तथा भक्तों पर वह सदैव अपनी कृपा बनाए रखते हैं. वहीं वेदों में भी धतूरे के फल औऱ फूल की व्याख्या की गई है, कहा जाता है कि जो भी दंपत्ति भगवान शिव को धतूरे का फल औऱ फूल अर्पित करता है सकी संतान प्राप्ति की मनोकामना जल्द पूर्ण होती है.
  • 17 जनवरी से मकर में चतुर्ग्रही योग: मेष, वृषभ, कन्या और मकर राशियों के लिए करियर और धन में वृद्धि के संकेत

    17 जनवरी से मकर में चतुर्ग्रही योग: मेष, वृषभ, कन्या और मकर राशियों के लिए करियर और धन में वृद्धि के संकेत

    नई दिल्ली। जनवरी 2026 के मध्य से एक विशेष ज्योतिषीय संयोग बनने जा रहा है। 17 जनवरी 2026 से मकर राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र की युति से चतुर्ग्रही योग का निर्माण होगा। यह योग 3 फरवरी 2026 तक प्रभावी रहेगा और चार राशियों-मेष, वृषभ, कन्या और मकर-के लिए विशेष लाभकारी माना जा रहा है।

    चतुर्ग्रही योग कैसे बन रहा है
    ज्योतिषाचारियों के अनुसार, 14 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के बाद ग्रहों की स्थिति क्रमशः मजबूत हुई। 16 जनवरी को मंगल का मकर में गोचर हुआ और 17 जनवरी सुबह 10:27 बजे बुध भी मकर राशि में प्रवेश करेगा। पहले से मकर में स्थित शुक्र के साथ चार ग्रहों की युति से चतुर्ग्रही योग बनेगा। यह योग प्रशासन, प्रबंधन, करियर और वित्तीय मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाला माना जा रहा है।

    किन राशियों को मिलेगा लाभ
    मेष: करियर में नई जिम्मेदारियां और अवसर सामने आएंगे। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति या नई भूमिका मिल सकती है, जबकि व्यवसायी विस्तार के संकेत देख सकते हैं।

    वृषभ: भाग्य का साथ मिलेगा। धन लाभ, विदेश यात्रा और धार्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ने की संभावना है।

    कन्या: कार्यक्षेत्र में स्थिरता और सफलता के संकेत। रुके हुए काम पूरे होंगे और शिक्षा व प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।

    मकर: यह योग मकर राशि वालों के लिए सबसे प्रभावशाली रहेगा। पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत मिल रहे हैं।

    क्यों खास है यह योग
    मकर राशि को कर्म और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। चार प्रमुख ग्रहों की एक साथ उपस्थिति निर्णय क्षमता, नेतृत्व और व्यावहारिक सोच को मजबूत करती है। इस अवधि में करियर और वित्तीय फैसलों के लिए योग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों की सलाह

    ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि यह योग अवसर देगा, लेकिन परिणाम व्यक्ति के कर्म और निर्णयों पर निर्भर होंगे। संतुलित सोच, योजनाबद्ध कार्य और अहंकार से दूरी लाभ को और बढ़ा सकती है।

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    आज आपके जीवन में क्या-क्या परिवर्तन हो सकता है, पढ़े शनिवार का राशिफल

    मेष राशि :- स्त्री-संतान पक्ष का सहयोग मिलेगा। अपने काम में सुविधा मिल जाने से प्रगति होगी। समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा। यात्रा का दूरगामी परिणाम मिल जाएगा। स्वास्थ्य
    उत्तम रहेगा। सुविधा और समन्वय बना रहने से कामकाज में प्रगति बनेगी। सफलता मिलेगी। शुभांक-5-7-9



    वृष राशि :- विद्यार्थियों को लाभ। दाम्पत्य जीवन सुखद रहेगा। यात्रा प्रवास का सार्थक परिणाम मिलेगा। अपने काम में सुविधा मिल जाने से प्रगति होगी। समाज में मान-सम्मान बढ़ेेगा। नवीन जिम्मेदारी बढऩे के आसार रहेंगे। परिवारजनों का सहयोग बना रहेगा। मेहमानों का आगमन होगा। शुभांक-1-3-5


    मिथुन राशि :- पूर्व नियोजित कार्यक्रम सरलता से संपन्न हो जाएंगे। ले देकर की जा रही काम की कोशिश ठीक नहीं। मेल-मिलाप से काम बनाने की कोशिश लाभ देगी। ले देकर की जा रही काम की कोशिश ठीक नहीं। धीरे-धीरे लाभ का मार्ग प्रशस्त होगा उचित समय का इन्तजार करें। शुभांक-3-5-6

    कर्क राशि :- आय के अच्छे योग बनेंगे। संतान की उन्नति के योग हैं। मेल-मिलाप से काम बनाने की कोशिश लाभ देगी। पुराने मित्र से मिलन होगा। स्वविवेक से कार्य करें। भाई-बहनों का प्रेम बढ़ेगा। आत्मविश्वास बढ़ेगा। अर्थपक्ष मजबूत रहेगा। कार्य सफल होंगे। दैनिक सुख-सुविधा में वृद्घि होगी। शुभांक-2-5-7

    सिंह राशि :- व्यर्थ प्रपंच में समय नहीं गंवाकर अपने काम पर ध्यान दीजिए। परिवारजन का सहयोग व समन्वय काम को बनाना आसान करेगा। अपना काम दूसरों के सहयोग से पूरा होगा। कारोबारी काम में नवीन तालमेल और समन्वय बन जाएगा। सही समय का इंतजार करें। शुभांक-2-4-6

    कन्या राशि :- मेहमानों का आगमन होगा। राजकीय कार्यों से लाभ। पैतृक सम्पत्ति से लाभ। पुरानी गलती का पश्चाताप होगा। जीवन साथी अथवा यार-दोस्तों के साथ साझे में किए जा रहे काम में लाभ मिल जाएगा। महत्वपूर्ण कार्य को समय पर बना लें तो अच्छा ही होगा। शुभ कार्यों में व्यय होगा। शुभांक-1-3-5

    तुला राशि :- लाभ में आशातीत वृद्घि तय है मगर नकारात्मक रुख न अपनाएं। आशा और उत्साह के कारण सक्रियता बढ़ेगी। स्वास्थ्य मध्यम रहेगा। समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा। आय-व्यय की स्थिति समान रहेगी। व्यापार व व्यवसाय में ध्यान देने से सफलता मिलेगी। विशिष्ट जनों से मेल-मुलाकात होगी। शुभांक-4-6-8

    वृश्चिक राशि :- जीवनसाथी का परामर्श लाभदायक रहेगा। व्यापार व नौकरी में स्थिति अच्छी रहेगी। पर-प्रपंच में ना पड़कर अपने काम पर ध्यान दीजिए। शुभ कार्यों का लाभदायक परिणाम होगा। कामकाज की अधिकता रहेगी। व्यवसायिक अभ्युदय भी होगा। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। अर्थपक्ष मजबूत रहेगा। शुभ समाचारों मिलेगें। शुभांक-3-5-6

    धनु राशि :- प्रियजनों से समागम का अवसर मिलेगा। अवरुद्घ कार्य संपन्न हो जाएंगे। कामकाज की व्यस्तता से सुख-आराम प्रभावित होगा। श्रेष्ठजनों की सहानुभूतियां होगी। आत्मीय श्रेष्ठता बनेगी। यात्रा प्रवास का सार्थक परिणाम मिलेगा। बुजुर्गों का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। आत्मचिन्तन करें। शुभांक-4-6-8

    मकर राशि :- कारोबारी यात्रा को फिलहाल टालें। आय-व्यय की स्थिति समान रहेगी। अपने हितैषी समझे जाने वाले ही पीठ पीछे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे। होश में रहकर कार्य करें। कामकाज सीमित तौर पर ही बन पाएंगे। समय पर देनदार भी पैसे लौटाने में आनाकानी करेंगे। मनोरथ सिद्घि का योग है। शुभांक-4-6-8

    कुंभ राशि :- राजकीय कार्यों से लाभ। पैतृक सम्पत्ति से लाभ। कारोबारी यात्रा को फिलहाल टालें। शैक्षणिक कार्य आसानी से पूरे होते रहेंगे। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापार व व्यवसाय में ध्यान देने से सफलता मिलेगी। श्रम साध्य कार्यों में सफल होंगे। कुछ महत्वपूर्ण कार्य बनाने के लिए भाग-दौड़ रहेगी। शुभांक-2-4-5

    मीन राशि :- व्यापार में स्थिति नरम रहेगी। शत्रुभय, चिंता, संतान को कष्ट, अपव्यय के कारण बनेंगे। भ्रातृपक्ष में विरोध होने की संभावना है। आय-व्यय समान रहेगा। स्वास्थ्य का पाया भी कमजोर बना रहेगा। कामकाज सीमित तौर पर ही बन पाएंगे। अभी सिर्फ आश्वासनों से संतोष करना बड़ेगा। शुभांक-1-3-5