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  • मतदान में बढ़ती भागीदारी को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया..

    मतदान में बढ़ती भागीदारी को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया..


    नई दिल्ली। कोलकाता में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में दर्ज हुए रिकॉर्ड मतदान ने लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर देशभर में चर्चा को जन्म दिया है। इस चरण में मतदान प्रतिशत 92 प्रतिशत के करीब पहुंच गया, जिसे अब तक के चुनावी इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं की भागीदारी ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर सकारात्मक माहौल बनाया है और विभिन्न स्तरों पर इसे लोकतंत्र की मजबूती से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इस उच्च मतदान प्रतिशत पर सर्वोच्च न्यायालय की ओर से भी संतोष व्यक्त किया गया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब नागरिक बड़ी संख्या में मतदान करते हैं तो यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होता है। उन्होंने कहा कि वोट डालने की प्रक्रिया केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है और जब लोग इसे गंभीरता से लेते हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होती है।

    न्यायालय की पीठ के अन्य सदस्यों ने भी चुनावी माहौल पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पहले चरण के दौरान किसी बड़े स्तर की हिंसक घटना की जानकारी नहीं मिली, जो चुनाव प्रक्रिया के लिए एक सकारात्मक संकेत है। शांतिपूर्ण मतदान यह दर्शाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों का भरोसा बना हुआ है और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी ढंग से कार्य कर रही है।

    सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ही उसकी वास्तविक शक्ति होती है। जब मतदाता बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचते हैं, तो यह न केवल राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करता है बल्कि सामाजिक स्थिरता को भी बढ़ावा देता है।

    इस दौरान सॉलिसिटर जनरल ने भी मतदान प्रतिशत को ऐतिहासिक बताया और कहा कि यह जनता के लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में सुरक्षा बलों की भूमिका महत्वपूर्ण रही और अधिकांश स्थानों पर मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। कुछ स्थानों पर मामूली घटनाओं को छोड़कर पूरा चरण व्यवस्थित तरीके से संपन्न हुआ।

    आंकड़ों के अनुसार इस चरण में कुल मतदान लगभग 91.78 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो वर्ष 2011 के 84.72 प्रतिशत के पिछले रिकॉर्ड से अधिक है। यह वृद्धि इस बात का संकेत मानी जा रही है कि मतदाताओं में जागरूकता बढ़ी है और वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।

    महिला मतदाताओं की भागीदारी इस चरण में विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज किया गया, जो सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी में बढ़ते संतुलन को दर्शाता है। यह रुझान पिछले कुछ वर्षों से लगातार देखा जा रहा है और इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    समग्र रूप से देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में हुए इस उच्च मतदान ने यह स्पष्ट किया है कि मतदाता अपनी भूमिका को लेकर अधिक सजग हो रहे हैं और लोकतंत्र में अपनी सक्रिय भागीदारी को गंभीरता से ले रहे हैं। शांतिपूर्ण वातावरण में इतनी बड़ी संख्या में मतदान का होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति जनता के विश्वास को और मजबूत करता है।

  • इलाज पर विवाद: Gwalior में बच्चे की मौत के बाद परिजनों का हंगामा, डॉक्टरों ने झाड़-फूंक का लगाया आरोप

    इलाज पर विवाद: Gwalior में बच्चे की मौत के बाद परिजनों का हंगामा, डॉक्टरों ने झाड़-फूंक का लगाया आरोप


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के Gwalior में 9 महीने के मासूम की मौत के बाद शुक्रवार सुबह माहौल तनावपूर्ण हो गया। निजी नर्सिंग होम में इलाज के दौरान बच्चे की मौत से गुस्साए परिजनों ने अस्पताल के बाहर चक्का जाम कर दिया और डॉक्टर पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए। वहीं अस्पताल प्रबंधन ने मामले को लेकर अलग दावा करते हुए पुलिस को सीसीटीवी फुटेज सौंपा है।
    22 अप्रैल को भर्ती, देर रात हुई मौत
    मृतक बच्चे की पहचान तनुज कुशवाहा के रूप में हुई है। परिजनों के मुताबिक, बच्चे को उल्टी और सांस लेने में दिक्कत (पसली चलना) की शिकायत थी। 22 अप्रैल को उसे जनकगंज क्षेत्र स्थित एक निजी बाल चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान गुरुवार देर रात उसकी मौत हो गई, जिसके बाद परिवार में कोहराम मच गया।
    परिजनों का आरोप गलत इलाज से गई जान
    परिवार का आरोप है कि डॉक्टर Dr Sneha Gadkar ने उनकी अनुमति के बिना बच्चे को सांस की नली (वेंटिलेशन) पर डाल दिया और कई इंजेक्शन दिए। उनका कहना है कि बच्चे को मामूली तकलीफ थी, लेकिन गलत इलाज के चलते उसकी हालत बिगड़ी और मौत हो गई।मृतक की मां ने यह भी आरोप लगाया कि डॉक्टर ने मामले को दबाने के लिए ₹50 हजार की पेशकश की, जिससे आक्रोश और बढ़ गया।
    डॉक्टर का दावा परिजनों ने करवाई झाड़-फूंक
    वहीं अस्पताल प्रबंधन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चौंकाने वाला दावा किया है। डॉक्टर ने पुलिस को सीसीटीवी वीडियो सौंपा है, जिसमें कथित तौर पर परिजन बच्चे का झाड़-फूंक कराते नजर आ रहे हैं। डॉक्टर का कहना है कि बच्चा गंभीर हालत में वेंटिलेटर पर था, लेकिन परिजनों ने उसे हटाकर झाड़-फूंक करवाई, जिससे उसकी स्थिति और बिगड़ गई।
    अस्पताल के बाहर प्रदर्शन, सड़क जाम
    घटना के बाद गुस्साए परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल के बाहर धरना देकर चक्का जाम कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने डॉक्टर के खिलाफ सख्त कार्रवाई और न्याय की मांग की। मौके पर भारी भीड़ जुट गई, जिससे यातायात भी प्रभावित हुआ।
    पुलिस पहुंची, जांच शुरू-पोस्टमार्टम से खुलेगा राज
    सूचना मिलते ही पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया। Manish Yadav ने बताया कि मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि बच्चे के शव का पैनल पोस्टमार्टम कराया जाएगा, ताकि मौत के सही कारणों का पता चल सके। इसके साथ ही अस्पताल से इलाज से जुड़े दस्तावेज और सीसीटीवी फुटेज भी जब्त कर लिए गए हैं।
    दोनों पक्षों के दावों से उलझा मामला
    एक तरफ परिजन इलाज में लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी ओर अस्पताल प्रबंधन झाड़-फूंक को जिम्मेदार ठहरा रहा है। ऐसे में पूरा मामला जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।
  • खेतों में धुआं और खतरा एमपी बना पराली जलाने का हॉटस्पॉट आंकड़ों ने खोली सच्चाई

    खेतों में धुआं और खतरा एमपी बना पराली जलाने का हॉटस्पॉट आंकड़ों ने खोली सच्चाई

    भोपाल । मध्यप्रदेश में गेहूं की पराली जलाने के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है और ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य इस मामले में देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि फसल अवशेष जलाने की समस्या प्रदेश में गंभीर रूप लेती जा रही है।

    1 से 21 अप्रैल के बीच देश के पांच राज्यों में कुल 29167 मामलों में से लगभग 69 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले मध्यप्रदेश की है। इस अवधि में राज्य में 20164 घटनाएं दर्ज की गईं जो देश में सबसे ज्यादा हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि खेतों में पराली जलाने की प्रवृत्ति किस तेजी से बढ़ रही है और इसका असर पर्यावरण पर कितना व्यापक हो सकता है।

    जिला स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का संसदीय क्षेत्र विदिशा इस मामले में सबसे आगे है जहां 2086 घटनाएं सामने आई हैं। इसके बाद उज्जैन में 2053 और रायसेन में 1982 मामले दर्ज किए गए हैं। होशंगाबाद में 1705 और सिवनी में 1369 घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ा कम बताया जा रहा है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल भी रिकॉर्ड स्तर पर मामले दर्ज हो सकते हैं।

    यदि अन्य राज्यों से तुलना करें तो मध्यप्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है जहां इसी अवधि में 8889 मामले सामने आए हैं। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में यह संख्या काफी कम है जिससे यह स्पष्ट होता है कि मध्यप्रदेश में यह समस्या अधिक गंभीर हो चुकी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने के पीछे किसानों की मजबूरी भी एक बड़ा कारण है। गंजबासौदा स्थित कृषि महाविद्यालय के प्रोफेसर आशीष श्रीवास्तव बताते हैं कि गेहूं की कटाई के तुरंत बाद किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई करना चाहते हैं और उनके पास समय बहुत कम होता है। ऐसे में पराली को हटाने के लिए वे सबसे आसान और सस्ता तरीका यानी जलाने का विकल्प चुनते हैं।

    हालांकि इसके कई वैकल्पिक उपाय भी मौजूद हैं जिनका उपयोग करके इस समस्या को कम किया जा सकता है। किसान सुपरसीडर रोटावेटर मल्चर और रीपर जैसे कृषि यंत्रों का उपयोग कर सकते हैं जिससे पराली को मिट्टी में मिलाया जा सके। इसके अलावा भूसे का उपयोग पशु चारे के रूप में भी किया जा सकता है। पूसा डीकंपोजर का छिड़काव कर पराली को प्राकृतिक खाद में बदला जा सकता है जिससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है।

    सरकार द्वारा पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया गया है और ऐसा करते पाए जाने पर किसानों पर जुर्माने का प्रावधान भी है जो 2500 से 15000 रुपए तक हो सकता है। बार बार उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है।

    इसके बावजूद बढ़ते मामलों ने यह संकेत दिया है कि केवल नियम बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा बल्कि किसानों को जागरूक करने और उन्हें वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे। अन्यथा यह समस्या पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

  • Ujjain में पति-पत्नी ने फांसी लगाई, पुलिस ने दरवाजा तोड़कर उतारा; व्हाट्सएप स्टेटस में 12 लोगों के नाम

    Ujjain में पति-पत्नी ने फांसी लगाई, पुलिस ने दरवाजा तोड़कर उतारा; व्हाट्सएप स्टेटस में 12 लोगों के नाम


    नई दिल्ली । व्हाट्सएप स्टेटस बना ‘अलर्ट’, पुलिस ने बचाईं दो जानें: उज्जैन में पति-पत्नी ने फांसी की कोशिश की
    मध्य प्रदेश के Ujjain जिले में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जहां पारिवारिक विवाद से परेशान पति-पत्नी ने आत्महत्या का प्रयास किया। हालांकि, समय रहते पुलिस की सतर्कता और तेजी से कार्रवाई ने दोनों की जान बचा ली।
    स्टेटस में लिखा दर्द, 12 लोगों का किया जिक्र
    जानकारी के मुताबिक, घट्टिया थाना क्षेत्र के नजरपुर गांव में रहने वाले दंपती लंबे समय से पारिवारिक तनाव से जूझ रहे थे। मानसिक दबाव इतना बढ़ गया कि उन्होंने आत्मघाती कदम उठाने का फैसला कर लिया। आत्महत्या से पहले युवक ने WhatsApp पर स्टेटस लगाकर अपनी परेशानी जाहिर की, जिसमें मां-बाप समेत 12 लोगों के नाम का जिक्र किया गया था। यही स्टेटस पुलिस के लिए अलर्ट साबित हुआ और वक्त रहते पूरी घटना की जानकारी मिल गई।
    स्टेटस देखते ही हरकत में आई पुलिस टीम
    थाना प्रभारी Karan Khowal को जैसे ही स्टेटस की सूचना मिली, उन्होंने तुरंत पुलिस टीम को मौके पर रवाना किया। जब पुलिस दंपती के घर पहुंची, तो दरवाजा अंदर से बंद था। खिड़की से झांककर देखा गया कि दोनों फंदे पर लटके हुए थे। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पुलिस ने बिना देर किए कार्रवाई शुरू की।
    दरवाजा तोड़कर उतारा फंदे से, अस्पताल में भर्ती
    थाना प्रभारी ने बाहर से बातचीत कर दंपती का ध्यान भटकाया और इसी दौरान टीम ने दरवाजा तोड़कर अंदर प्रवेश किया। पुलिसकर्मियों ने तुरंत दोनों को फंदे से नीचे उतारा। उस वक्त उनकी सांसें चल रही थीं। इसके बाद उन्हें तुरंत शासकीय अस्पताल घट्टिया ले जाया गया, जहां इलाज के बाद दोनों की हालत स्थिर बताई गई और अब वे खतरे से बाहर हैं।
    पारिवारिक विवाद बना वजह, पिता से था टकराव
    होश में आने के बाद दंपती ने पुलिस को बताया कि वे लंबे समय से पारिवारिक विवाद और पिता की प्रताड़ना से परेशान थे। जांच में सामने आया कि युवक की दूसरी शादी को लेकर उसके पिता नाराज थे और उसे घर से बेदखल कर दिया था।
    अपने अधिकार को लेकर कई बार बातचीत के बावजूद विवाद सुलझ नहीं पाया, जिससे युवक मानसिक तनाव में रहने लगा।
    परिवारिक स्थिति भी जटिल पुलिस के अनुसार, युवक की पहली पत्नी से दो बच्चे हैं, जबकि दूसरी पत्नी (रीना) से उसकी कोई संतान नहीं है। इस पारिवारिक जटिलता ने तनाव को और बढ़ा दिया था।
    पुलिस की सूझबूझ से टली बड़ी घटना
    पूरे घटनाक्रम में Karan Khowal सहित पुलिस टीम की तत्परता सराहनीय रही। उपनिरीक्षक अलकेश डांगे और प्रधान आरक्षक राजेंद्र राठौर ने भी बचाव अभियान में अहम भूमिका निभाई।पुलिस ने दंपती को समझाइश देते हुए निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया है और पारिवारिक विवाद के हर पहलू की जांच की जा रही है।

  • कृषि उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि और तकनीक आधारित बदलाव पर चर्चा, लखनऊ सम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी ने बताया कृषि क्षेत्र का बदलता स्वरूप

    कृषि उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि और तकनीक आधारित बदलाव पर चर्चा, लखनऊ सम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी ने बताया कृषि क्षेत्र का बदलता स्वरूप


    नई दिल्ली।लखनऊ में आयोजित क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन (उत्तर क्षेत्र) के उद्घाटन अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की कृषि व्यवस्था में आए महत्वपूर्ण बदलावों और उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राज्य कृषि उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है और यह परिवर्तन वैज्ञानिक तकनीकों, एग्रो क्लाइमेटिक जोन आधारित रणनीति तथा केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। मुख्यमंत्री ने कहा कि लैब टू लैंड की अवधारणा अब केवल एक नीति नहीं रह गई है, बल्कि यह किसानों के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाला वास्तविक परिवर्तन बन चुकी है।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि कृषि विकास दर में लगातार वृद्धि, प्रति हेक्टेयर उत्पादन में रिकॉर्ड सुधार, बहुफसली खेती का विस्तार और वैल्यू एडिशन पर बढ़ता ध्यान इस परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों का सशक्तीकरण, अंतरराष्ट्रीय कृषि संस्थानों की स्थापना और प्रगतिशील किसानों की भागीदारी ने इस बदलाव को मजबूती प्रदान की है। उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश आज देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की क्षमता रखता है और यह केवल योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से संभव हुआ है।

    अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि नीतियों को अलग अलग एग्रो क्लाइमेटिक जोन के अनुसार तैयार करना आवश्यक है क्योंकि हर क्षेत्र की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां अलग होती हैं। उन्होंने कहा कि जब इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक गोष्ठियां और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो किसानों तक तकनीक तेजी से पहुंचती है और उत्पादन में सुधार होता है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में आयोजित कृषि अभियानों के दौरान किसानों और वैज्ञानिकों के बीच बेहतर संवाद स्थापित हुआ है, जिससे नई तकनीकों को अपनाने की प्रक्रिया तेज हुई है।

    मुख्यमंत्री ने वर्ष 2017 की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कृषि विज्ञान केंद्र सीमित और लगभग निष्क्रिय स्थिति में थे, लेकिन आज सभी केंद्र सक्रिय होकर नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। केंद्र सरकार के सहयोग से नए केंद्रों की स्थापना और पुराने केंद्रों के सशक्तीकरण के बाद अब वैज्ञानिक सीधे किसानों के खेतों में जाकर तकनीक का प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे अनुसंधान और व्यावहारिक खेती के बीच की दूरी काफी कम हो गई है।

    उन्होंने कहा कि इन प्रयासों का परिणाम यह है कि उत्तर प्रदेश की कृषि विकास दर लगभग आठ प्रतिशत से बढ़कर अठारह प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे मूल्य संवर्धन और उद्योग से जोड़ना आवश्यक है ताकि किसानों की आय में स्थायी वृद्धि हो सके।

    मुख्यमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय कृषि संस्थानों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि इनके माध्यम से नई किस्मों का विकास और तकनीकी नवाचार तेजी से हो रहा है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में उपयुक्त फसलों का चयन आसान हुआ है और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने बताया कि कई क्षेत्रों में धान का उत्पादन पहले की तुलना में लगभग दोगुना हो गया है और कुछ स्थानों पर यह सौ कुंतल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया है।

    उन्होंने प्राकृतिक खेती, रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग और गुणवत्तापूर्ण बीज की समय पर उपलब्धता पर विशेष जोर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों को जानकारी, संसाधन और बाजार उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने यह भी बताया कि अब किसान तीन फसल तक उत्पादन कर रहे हैं और उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।

    मुख्यमंत्री ने प्रगतिशील किसानों का उदाहरण देते हुए कहा कि अनुभव और आधुनिक तकनीक के संयोजन से कम लागत में अधिक उत्पादन संभव है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश कृषि क्षेत्र में मजबूत आधार के साथ आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसके परिणाम और अधिक प्रभावी रूप में दिखाई देंगे।

  • अब आसमान से ओरछा के दर्शन हेली सेवा से साढ़े चार घंटे में भोपाल से यात्रा पूरी

    अब आसमान से ओरछा के दर्शन हेली सेवा से साढ़े चार घंटे में भोपाल से यात्रा पूरी


    भोपाल । मध्यप्रदेश में पर्यटन को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है जहां अब ओरछा और चंदेरी जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों तक पहुंचना पहले से कहीं ज्यादा आसान और रोमांचक हो गया है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव द्वारा शुरू की गई हेली पर्यटन सेवा के जरिए अब भोपाल से ओरछा की यात्रा महज कुछ घंटों में पूरी की जा सकती है। इस नई सुविधा के शुरू होने से श्रद्धालुओं और पर्यटकों में खासा उत्साह देखा जा रहा है।

    इस सेवा के तहत हेलिकॉप्टर रोजाना सुबह 9.30 बजे भोपाल से उड़ान भरता है और सीधे ओरछा पहुंचता है जहां पर्यटक भगवान रामराजा के दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद दोपहर करीब 2 बजे हेलिकॉप्टर वापस भोपाल लौट आता है। इस तरह यात्री केवल साढ़े चार घंटे में अपनी यात्रा पूरी कर सकते हैं जो पहले सड़क मार्ग से काफी लंबी और समय लेने वाली होती थी।

    इस हवाई सेवा की खास बात यह है कि इसमें केवल यात्रा ही नहीं बल्कि अनुभव को भी खास बनाया गया है। पर्यटक 3000 फीट की ऊंचाई से ओरछा और चंदेरी के ऐतिहासिक नजारे देख सकते हैं वहीं 500 फीट की ऊंचाई पर जॉय राइड का भी आनंद ले सकते हैं। यह अनुभव पर्यटकों को एक अलग ही रोमांच का एहसास कराता है जहां वे इन शहरों की खूबसूरती को आसमान से निहार सकते हैं।

    ओरछा को बुंदेलखंड की अयोध्या कहा जाता है और यहां स्थित रामराजा मंदिर की विशेष मान्यता है। यहां भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है और उन्हें प्रतिदिन गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया जाता है। यह अनोखी परंपरा देश भर में अपनी अलग पहचान रखती है। दीपावली के अवसर पर यहां का नजारा और भी भव्य हो जाता है जब पूरा दरबार रोशनी और फूलों से सजा होता है और आसपास के क्षेत्रों से लोग विशेष आयोजनों में शामिल होने आते हैं।

    वहीं चंदेरी अपनी ऐतिहासिक विरासत और चंदेरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के किले और प्राचीन इमारतें इतिहास की गवाही देती हैं। साथ ही यह शहर फिल्म शूटिंग के लिए भी पसंदीदा स्थान बनता जा रहा है जहां कई चर्चित फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

    इस सेवा के तहत भोपाल से ओरछा का किराया 6500 रुपए और चंदेरी का किराया 5500 रुपए तय किया गया है। इसके अलावा 14500 रुपए के विशेष पैकेज में टैक्सी वीआईपी दर्शन और अन्य सुविधाएं भी शामिल हैं जिससे पर्यटकों को पूरी यात्रा का एक समग्र अनुभव मिल सके। जॉय राइड का शुल्क 3500 रुपए रखा गया है।

    यह हेली सेवा सप्ताह में पांच दिन संचालित होगी और पीपीपी मॉडल पर चलाई जा रही है जिसमें सुरक्षा और सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया है। आधुनिक छह सीटर हेलिकॉप्टर के माध्यम से यात्रियों को आरामदायक यात्रा का अनुभव मिलेगा।

    सरकार का मानना है कि इस पहल से न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक स्थलों की पहचान भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगी। यह सेवा राज्य के पर्यटन को नई दिशा देने के साथ साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगी।

  • धर्मेंद्र के भाई वीरेंद्र सिंह की मौत का वो अनसुलझा रहस्य..

    धर्मेंद्र के भाई वीरेंद्र सिंह की मौत का वो अनसुलझा रहस्य..


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के ‘ही-मैन’ कहे जाने वाले धर्मेंद्र के परिवार का फिल्म जगत में गहरा प्रभाव रहा है, लेकिन उनके एक भाई की कहानी जितनी गौरवशाली थी, उसका अंत उतना ही दर्दनाक रहा। धर्मेंद्र के चचेरे भाई वीरेंद्र सिंह देओल, जिन्हें इंडस्ट्री में सुभाष ढडवाल के नाम से भी जाना जाता था, 80 के दशक में पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े सुपरस्टार थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उस दौर में पंजाबी सिनेमा का मतलब ही वीरेंद्र सिंह हुआ करता था। वीरेंद्र और धर्मेंद्र साथ ही पले-बढ़े थे और जहां एक ओर धर्मेंद्र मुंबई में अपनी धाक जमा रहे थे, वहीं वीरेंद्र ने पंजाब में अपनी एक ऐसी पहचान बना ली थी जिसे आज भी लोग याद करते हैं।

    वीरेंद्र सिंह ने साल 1975 में अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘तेरी मेरी एक जिन्दड़ी’ जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बनाई और देखते ही देखते ‘बंटवारा’, ‘लम्भरदारनी’ और ‘बलबीरो भाभी’ जैसी एक के बाद एक ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं। वे केवल एक शानदार अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल निर्देशक और निर्माता भी थे। अपने 12 साल के छोटे से करियर में उन्होंने लगभग 25 फिल्में बनाईं और खास बात यह थी कि उनकी लगभग हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई। पंजाबी सिनेमा के साथ-साथ उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी हाथ आजमाया और वहां भी उन्हें सफलता मिली।

    उनकी सफलता और बढ़ते कदम तब थम गए जब दिसंबर 1988 में लुधियाना के पास एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उनकी सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय वे अपनी नई फिल्म ‘जट्ट ते जमीन’ के एक सीन की शूटिंग कर रहे थे। महज 40 साल की उम्र में वीरेंद्र सिंह की इस आकस्मिक मौत ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया था। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उनकी हत्या का कातिल आज तक नहीं पकड़ा गया। सालों बीत जाने के बाद भी यह मामला एक अनसुलझी गुत्थी बना हुआ है।

    उनकी मौत के पीछे की वजहों को लेकर आज भी कई तरह की चर्चाएं होती हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि उनकी बढ़ती लोकप्रियता ही उनकी दुश्मन बन गई और ईर्ष्या के चलते उन्हें रास्ते से हटा दिया गया। वहीं, कुछ लोग इसे उस दौर के उग्रवाद से जोड़कर देखते हैं। वजह जो भी रही हो, लेकिन उस एक दिन ने भारतीय सिनेमा से एक ऐसा सितारा छीन लिया, जो अगर आज जीवित होता तो शायद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े दिग्गजों को टक्कर दे रहा होता। वीरेंद्र सिंह की कमी को आज भी उनके प्रशंसकों और परिवार द्वारा महसूस किया जाता है, और उनकी फिल्में उनके महान कलाकार होने की गवाही देती हैं।

  • मासूमों पर मंडराया खतरा फेल हुई बच्चों की दवा पर स्वास्थ्य विभाग का बड़ा एक्शन

    मासूमों पर मंडराया खतरा फेल हुई बच्चों की दवा पर स्वास्थ्य विभाग का बड़ा एक्शन


    जबलपुर । मध्यप्रदेश के जबलपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां बच्चों को दी जाने वाली एक दवा जांच में मानकों पर खरी नहीं उतरी है। इस खुलासे के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल सख्त कदम उठाते हुए संबंधित सिरप के उपयोग और वितरण पर रोक लगा दी है। यह मामला बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण पूरे स्वास्थ्य तंत्र में हलचल मच गई है और अभिभावकों के बीच भी चिंता का माहौल बन गया है।

    जानकारी के अनुसार पैरासिटामॉल पीडियाट्रिक ओरल सस्पेंशन आईपी 125mg 5ml नाम की सिरप जांच के दौरान फेल पाई गई है। यह दवा बच्चों को बुखार और दर्द में दी जाती है और सरकारी अस्पतालों में भी इसकी सप्लाई की गई थी। जैसे ही जांच रिपोर्ट में गड़बड़ी सामने आई स्वास्थ्य विभाग ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सभी अस्पतालों और चिकित्सा अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए।

    मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी नवीन कोठारी ने सभी संबंधित संस्थानों को पत्र लिखकर इस विशेष बैच की दवा के उपयोग और वितरण को पूरी तरह से बंद करने के आदेश दिए हैं। साथ ही अस्पतालों और क्लिनिक को अपने स्टॉक की जांच करने और संदिग्ध बैच को अलग रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि किसी भी तरह से यह दवा मरीजों तक न पहुंचे।

    इस दवा का निर्माण इंदौर स्थित मेसर्स जेनिथ ड्रग्स लिमिटेड द्वारा किया गया है। बताया जा रहा है कि दवा का सैंपल कुछ समय पहले जांच के लिए भोपाल भेजा गया था जहां परीक्षण के दौरान यह मानकों पर खरी नहीं उतरी। रिपोर्ट सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने बिना देरी किए इसे प्रतिबंधित कर दिया।

    सीएमएचओ नवीन कोठारी ने इस पूरे मामले पर जानकारी देते हुए बताया कि राज्य में दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित जांच की प्रक्रिया अपनाई जाती है। स्टोर में रखी दवाओं का समय समय पर परीक्षण किया जाता है और एनएबीएल रिपोर्ट आने के बाद ही उन्हें उपयोग में लाया जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित सिरप में क्लंपिंग की समस्या पाई गई है जिससे उसमें क्रिस्टलाइजेशन हो रहा था और यह निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी।

    हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह दवा पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन तय गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरने के कारण इसे उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। फिलहाल यह दवा बाजार में उपलब्ध नहीं है और केवल सरकारी स्टॉक में ही थी जिससे स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

    स्वास्थ्य विभाग ने अभिभावकों से भी अपील की है कि वे अपने बच्चों को यह विशेष सिरप न दें और यदि उनके पास इस बैच की दवा है तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें। यह घटना एक बार फिर यह संकेत देती है कि दवाओं की गुणवत्ता को लेकर सतर्कता कितनी जरूरी है खासकर जब मामला बच्चों की सेहत से जुड़ा हो।

    इस कार्रवाई से साफ है कि स्वास्थ्य विभाग किसी भी तरह की लापरवाही को लेकर गंभीर है और मरीजों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। अब आगे इस मामले में विस्तृत जांच के बाद और भी कदम उठाए जा सकते हैं।

  • 16 साल की लड़ाई के बाद न्याय: National Investigation Agency केस में आरोपी बने राजेंद्र चौधरी बरी, पहली बार में पास की थी PSC परीक्षा

    16 साल की लड़ाई के बाद न्याय: National Investigation Agency केस में आरोपी बने राजेंद्र चौधरी बरी, पहली बार में पास की थी PSC परीक्षा


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के Depalpur निवासी राजेंद्र चौधरी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, लेकिन यह हकीकत है-दर्द, संघर्ष और आखिरकार न्याय की जीत की कहानी। 16 साल तक आतंकवाद के गंभीर मामलों में आरोपी रहे राजेंद्र को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया। बुधवार को आए फैसले के बाद उन्होंने कहा, “मेरा सपना अधिकारी बनकर समाज सेवा करना था, लेकिन मुझे आरोपी बना दिया गया।”
    पहले ही प्रयास में PSC क्लियर, फिर बदली जिंदगी की दिशा
    राजेंद्र चौधरी ने बीकॉम की पढ़ाई के बाद MPPSC की प्रारंभिक परीक्षा पहले ही प्रयास में पास कर ली थी। वे प्रशासनिक सेवा में जाकर समाज के लिए काम करना चाहते थे। लेकिन दिसंबर 2012 की एक रात ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया।
    रामायण पाठ के दौरान गिरफ्तारी, NIA ने घेरा
    राजेंद्र के मुताबिक, 15 दिसंबर 2012 को वे गांव में रामायण का पाठ कर रहे थे, तभी National Investigation Agency (NIA) की टीम ने उन्हें चारों तरफ से घेरकर गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर हरियाणा ले जाया गया और पंचकूला की विशेष अदालत में पेश किया गया। उन पर Mecca Masjid Blast, Samjhauta Express Blast और मालेगांव ब्लास्ट जैसे मामलों में शामिल होने के आरोप लगाए गए।
    कस्टडी में टॉर्चर के आरोप, ‘अंधेरी कोठरी में रखा गया’
    राजेंद्र ने दावा किया कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें कस्टडी में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्हें अंधेरी कोठरी में अकेले रखा जाता था, घंटों तक एक ही स्थिति में बैठने या खड़े रहने को मजबूर किया जाता था।
    उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें सोने नहीं दिया जाता था, मारपीट की जाती थी और कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया जाता था। यहां तक कि बिजली के झटके देने जैसी यातनाएं भी दी गईं।
    फरारी, जेल और अदालत-संघर्ष के 16 साल
    राजेंद्र के परिचितों के अनुसार, गिरफ्तारी से पहले वे करीब दो साल जम्मू-कश्मीर में फरारी काट चुके थे। इससे पहले उज्जैन के एक हत्याकांड में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था, जिसमें वे 2014 में बरी हो गए थे। इन वर्षों में उन्हें अलग-अलग जेलों में रखा गया और कई मामलों में सुनवाई चली। इस दौरान उनका करियर, सामाजिक जीवन और परिवार सब प्रभावित हुआ।
    अदालत से बरी, न्याय व्यवस्था पर जताया भरोसा
    हाल ही में अदालत ने उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया। फैसले के बाद राजेंद्र ने कहा, “हमें शुरू से ही भारतीय न्याय व्यवस्था पर भरोसा था। आज उसी विश्वास की जीत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि इतने सालों का नुकसान कोई वापस नहीं कर सकता, लेकिन न्याय मिलने से सुकून जरूर मिला है।
    अब आगे क्या? राजनीति में एंट्री के संकेत
    राजेंद्र चौधरी से जब पूछा गया कि क्या वे अब राजनीति में कदम रखेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह फैसला समाज और उनके समर्थकों की राय पर निर्भर करेगा। फिलहाल उन्हें किसी राजनीतिक दल से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है, लेकिन वे भविष्य के लिए विकल्प खुले रखे हुए हैं।
    सवालों के घेरे में जांच एजेंसियां
    यह मामला एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। 16 साल तक गंभीर आरोपों में फंसे रहने के बाद बरी होना इस बात की ओर इशारा करता है कि जांच और साक्ष्यों की प्रक्रिया में कहीं न कहीं खामियां रही होंगी।

  • 2021 के आंकड़ों और इस बार के उच्च मतदान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में संभावित बदलाव की अटकलें बढ़ाईं

    2021 के आंकड़ों और इस बार के उच्च मतदान ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में संभावित बदलाव की अटकलें बढ़ाईं


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए पहले चरण के मतदान के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। 16 जिलों की 152 विधानसभा सीटों पर हुए मतदान में रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया, जिसने राजनीतिक दलों के भीतर उम्मीदों और विश्लेषणों को नया आयाम दे दिया है। सभी प्रमुख दल अपने अपने पक्ष में जनसमर्थन का दावा कर रहे हैं, जबकि राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे बदलते जनमत के संकेत के रूप में देख रहे हैं।

    2021 के विधानसभा चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो इन 152 सीटों पर मुकाबला मुख्य रूप से दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच केंद्रित रहा था। उस समय सत्तारूढ़ दल को स्पष्ट बढ़त मिली थी और उन्होंने इन सीटों में से बड़ी संख्या में जीत हासिल की थी, जबकि विपक्षी दल ने भी कई क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन किया था। चुनावी परिणामों में क्षेत्रीय विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी, जहां कुछ जिलों में एक दल का दबदबा था, वहीं अन्य क्षेत्रों में मुकाबला अपेक्षाकृत संतुलित रहा था।

    उत्तरी बंगाल के कई जिलों में विपक्षी दल का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा था, जबकि दक्षिणी बंगाल के कई हिस्सों में सत्तारूढ़ दल ने मजबूत पकड़ बनाई थी। कुछ जिलों में मुकाबला बेहद करीबी था, जहां जीत का अंतर काफी कम रहा, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और भी रोचक हो गई थी। यह स्थिति राज्य की विविध राजनीतिक संरचना को दर्शाती है, जहां क्षेत्रीय मुद्दे और स्थानीय समीकरण चुनाव परिणामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    इस बार के चुनावी चरण में सबसे उल्लेखनीय पहलू मतदान प्रतिशत में वृद्धि है। पहले चरण में दर्ज हुआ उच्च मतदान प्रतिशत राज्य के चुनावी इतिहास में एक महत्वपूर्ण आंकड़ा माना जा रहा है। इससे पहले के चुनावों की तुलना में इस बार अधिक मतदाताओं की भागीदारी ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है। आम तौर पर उच्च मतदान को मतदाताओं की सक्रियता और कभी कभी सत्ता विरोधी रुझान के संकेत के रूप में देखा जाता है, हालांकि यह निष्कर्ष हर स्थिति में समान नहीं होता।

    पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहां मतदान प्रतिशत में वृद्धि के बाद सत्ता परिवर्तन देखने को मिला है। इसी कारण वर्तमान स्थिति को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग अलग अनुमान लगाए जा रहे हैं। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि केवल मतदान प्रतिशत के आधार पर चुनाव परिणामों का आकलन करना पूरी तस्वीर को स्पष्ट नहीं करता।

    इस समय राज्य में सभी प्रमुख दल अपने अपने जनसमर्थन को मजबूत बताते हुए भविष्य को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं। जमीनी स्तर पर मतदाताओं की भागीदारी और क्षेत्रीय समीकरण यह तय करेंगे कि आने वाले परिणाम किस दिशा में जाते हैं। 152 सीटों का यह समूह राज्य की राजनीतिक दिशा को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह पूरे चुनावी रुझान का संकेत देने वाला एक बड़ा हिस्सा माना जाता है।