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  • ब्रोकरेज ने जताया 64 रुपये के टारगेट का भरोसा; क्या अब मल्टीबैगर रिटर्न के लिए तैयार हैं निवेशक?

    ब्रोकरेज ने जताया 64 रुपये के टारगेट का भरोसा; क्या अब मल्टीबैगर रिटर्न के लिए तैयार हैं निवेशक?


    नई दिल्ली।विंड एनर्जी सेक्टर की प्रमुख कंपनी सुजलॉन एनर्जी के शेयरों में हाल के दिनों में तेज रफ्तार देखने को मिली है। लगातार खरीदारी के चलते स्टॉक में मजबूत तेजी बनी हुई है और निवेशकों का रुझान इस ओर बढ़ा है। पिछले कुछ कारोबारी सत्रों में शेयर में लगभग 20 प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई है, जबकि एक महीने के भीतर इसमें करीब 28 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली है।

    हाल के कारोबारी सत्र में शेयर लगभग 53 रुपये के स्तर पर बंद हुआ, जिससे बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह आगे चलकर 64 रुपये के स्तर को पार कर सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी में आई यह तेजी केवल अल्पकालिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे सेक्टर की मजबूत संभावनाएं भी अहम भूमिका निभा रही हैं।

    ब्रोकरेज हाउस जेएम फाइनेंशियल ने सुजलॉन एनर्जी पर अपनी BUY रेटिंग को बरकरार रखते हुए अगले 12 महीनों के लिए 64 रुपये का टारगेट प्राइस तय किया है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा स्तर से शेयर में लगभग 30 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़त की संभावना बनी हुई है। इसके पीछे मुख्य कारण भारत में तेजी से बढ़ती बिजली की मांग और नवीकरणीय ऊर्जा पर सरकार का बढ़ता फोकस माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों के अनुसार विंड एनर्जी सेक्टर आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, खासकर तब जब सोलर और गैस आधारित ऊर्जा उत्पादन दिन के कुछ समय तक सीमित रहता है। शाम और रात के समय बिजली की मांग को पूरा करने में विंड एनर्जी एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रही है, जिससे इस सेक्टर की कंपनियों को फायदा मिल सकता है।

    सरकारी स्तर पर भी विंड एनर्जी क्षमता बढ़ाने पर लगातार काम किया जा रहा है। आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर नए प्रोजेक्ट्स शुरू होने की संभावना है, जिससे इस क्षेत्र में निवेश और विस्तार दोनों को बढ़ावा मिलेगा। इससे कंपनियों की ऑर्डर बुक मजबूत होने और उत्पादन क्षमता में सुधार की उम्मीद है।

    कंपनी के प्रदर्शन में हाल के समय में सुधार देखने को मिला है। प्रोजेक्ट्स के निष्पादन और डिलीवरी में तेजी आई है, जिससे पहले की तुलना में कामकाज अधिक सुचारू हुआ है। इससे कंपनी के कैश फ्लो में सुधार और नए ऑर्डर्स मिलने की संभावना भी बढ़ी है।

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि सुजलॉन के शेयर की दिशा आगे चलकर पूरी तरह से रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की मांग, सरकारी नीतियों और वैश्विक ऊर्जा परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि सेक्टर में मौजूदा रफ्तार बनी रहती है, तो शेयर में आगे और मजबूती देखने को मिल सकती है।

  • रिश्तों पर भारी पड़ा पैसा: बड़वानी के पिछोड़ी में बेटे ने पिता के सिर में मारी गोली

    रिश्तों पर भारी पड़ा पैसा: बड़वानी के पिछोड़ी में बेटे ने पिता के सिर में मारी गोली

    बड़वानी । मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले से एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है जिसने पिता-पुत्र के पवित्र रिश्ते को लहूलुहान कर दिया है। जिला मुख्यालय के समीपस्थ ग्राम पिछोड़ी में एक कलयुगी बेटे ने महज चंद रुपयों के लालच और विवाद में अपने ही पिता के सिर में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। जिस पिता ने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगा दी उसी बेटे ने आवेश में आकर पिता की जीवनलीला समाप्त कर दी। सोमवार 20 अप्रैल की दोपहर हुई इस घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत और मातम का माहौल है।

    मिली जानकारी के अनुसार पुलिस को सोमवार दोपहर फोन के जरिए सूचना मिली थी कि ग्राम पिछोड़ी में एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस की टीम तत्काल घटनास्थल पर पहुंची। पुलिस ने मौके का बारीकी से निरीक्षण किया और शव का पंचनामा तैयार कर मामले की जांच शुरू की। इस दौरान पुलिस को जो सच्चाई पता चली उसने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। इस जघन्य हत्याकांड की चश्मदीद गवाह कोई और नहीं बल्कि मृतक की पत्नी और आरोपी की मां गौरी बाई हैं।

    गौरी बाई ने रोते हुए पुलिस को बताया कि उनके 32 वर्षीय बेटे चंदन बडोले ने अपने 58 वर्षीय पिता जगन बडोले की हत्या की है। मां के अनुसार पिता और पुत्र के बीच पिछले कुछ समय से रुपयों के लेनदेन को लेकर तनाव चल रहा था। सोमवार को भी इसी बात को लेकर विवाद शुरू हुआ। देखते ही देखते बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच मारपीट होने लगी। इसी बीच गुस्से में आपा खो चुके चंदन ने पास रखी पिस्तौल निकाली और सीधे अपने पिता के सिर पर गोली दाग दी। गोली लगते ही जगन बडोले लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

    शहर कोतवाली थाना प्रभारी बलजीत सिंह बिसेन ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि शुरुआती जांच और मृतक की पत्नी के बयानों से यह स्पष्ट है कि विवाद की मुख्य वजह पैसा थी। मृतक जगन बडोले ने पहले भी अपने बेटे चंदन को वेल्डिंग की दुकान चलाने और अन्य जरूरतों के लिए दो लाख रुपये दिए थे। बावजूद इसके चंदन की मांगें कम नहीं हो रही थीं। वह लगातार और पैसों के लिए अपने पिता पर दबाव बना रहा था। सोमवार को जब पिता ने और पैसे देने से मना किया तो आरोपी ने इस खौफनाक वारदात को अंजाम दे दिया।

    पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा जहाँ की प्रारंभिक रिपोर्ट में भी सिर पर गंभीर चोट और गोली लगने के कारण मौत होने की पुष्टि हुई है। थाना प्रभारी बिसेन ने बताया कि आरोपी चंदन बडोले वारदात को अंजाम देने के बाद से ही फरार है। पुलिस की अलग-अलग टीमें उसकी गिरफ्तारी के लिए संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और जल्द ही आरोपी को सलाखों के पीछे भेजने का दावा किया है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब रिश्तों के बीच लालच की दीवार खड़ी होती है तो वहां केवल खून और पछतावा ही शेष बचता है।

  • एक मशहूर अभिनेत्री जिसने परिवार को दी प्राथमिकता, और बॉलीवुड को 'करिश्मा-करीना' के रूप में दी सबसे बड़ी विरासत!

    एक मशहूर अभिनेत्री जिसने परिवार को दी प्राथमिकता, और बॉलीवुड को 'करिश्मा-करीना' के रूप में दी सबसे बड़ी विरासत!


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसी अभिनेत्रियां रहीं जिन्होंने कम समय में ही अपनी मजबूत पहचान बना ली थी। इन्हीं में से एक नाम बबीता का है, जिन्होंने अपने अभिनय और स्क्रीन प्रेजेंस से दर्शकों के बीच खास जगह बनाई। 20 अप्रैल 1947 को कराची में जन्मी बबीता का बचपन फिल्मी माहौल में ही बीता, क्योंकि उनके परिवार का संबंध पहले से ही सिनेमा जगत से था। इसी कारण बहुत कम उम्र में उन्होंने फिल्मों की दुनिया में कदम रख दिया और शुरुआती दौर से ही अपनी प्रतिभा का परिचय देने लगीं।

    बबीता ने अपने करियर में उस दौर के बड़े सितारों के साथ काम किया और कई चर्चित फिल्मों का हिस्सा बनीं। उन्होंने राजेश खन्ना, जितेंद्र और शशि कपूर जैसे सुपरस्टार्स के साथ स्क्रीन साझा की और अपनी भूमिकाओं से दर्शकों का ध्यान खींचा। उनके किरदारों में रोमांस, पारिवारिक भावनाएं और हल्की कॉमेडी का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता था, जिससे वे उस समय की लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। उनकी अभिनय शैली सहज और प्रभावशाली मानी जाती थी, जिसने उन्हें इंडस्ट्री में एक अलग पहचान दी।

    फिल्मी करियर के दौरान बबीता ने कई सफल फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे अपनी जगह मजबूत की। हालांकि उनका यह सफर अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन इस दौरान उन्होंने अपनी छाप छोड़ दी। करियर के चरम पर पहुंचने के बाद उनकी निजी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया, जिसने उनके पेशेवर जीवन को पूरी तरह बदल दिया।

    उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब उनकी मुलाकात रणधीर कपूर से हुई। दोनों ने एक साथ काम किया और यहीं से उनके रिश्ते की शुरुआत हुई। बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। शादी के बाद बबीता ने फिल्मों से दूरी बनाने का फैसला किया और अपने परिवार को प्राथमिकता दी। उस समय पारिवारिक परंपराओं और व्यक्तिगत निर्णयों के चलते उन्होंने अभिनय की दुनिया को छोड़ दिया।

    शादी के बाद उनका जीवन पूरी तरह परिवार केंद्रित हो गया। समय के साथ कपूर परिवार को आर्थिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, क्योंकि रणधीर कपूर का करियर अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका। ऐसे समय में बबीता ने परिवार को संभालने और घर की जिम्मेदारियों को मजबूती से निभाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद परिवार को स्थिर बनाए रखा।

    बबीता की सबसे बड़ी भूमिका उनकी बेटियों करिश्मा कपूर और करीना कपूर खान के जीवन में देखी जाती है। दोनों बेटियां आगे चलकर हिंदी सिनेमा की बड़ी और सफल अभिनेत्रियां बनीं। उनकी परवरिश और मार्गदर्शन में बबीता का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्होंने अपनी बेटियों को सही दिशा दी और उन्हें आत्मनिर्भर और सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

    बबीता की कहानी इस बात का उदाहरण है कि फिल्मी दुनिया की चमक के पीछे कई बार व्यक्तिगत फैसले और त्याग भी छिपे होते हैं। उन्होंने अपने करियर को छोड़कर परिवार को प्राथमिकता दी और अपनी बेटियों के भविष्य को संवारने में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया।

  • स्थिर खेल और सटीक रणनीति ने बनाया दर्शकों का चहेता, जीत के साथ रचा इतिहास!

    स्थिर खेल और सटीक रणनीति ने बनाया दर्शकों का चहेता, जीत के साथ रचा इतिहास!


    नई दिल्ली। टेलीविजन रियलिटी शो बिग बॉस मराठी सीजन 6 का ग्रैंड फिनाले बेहद रोमांचक माहौल में संपन्न हुआ, जहां तन्वी कोलते ने इस सीजन की विजेता बनकर खिताब अपने नाम कर लिया। करीब 100 दिनों तक चले इस शो में प्रतियोगियों के बीच लगातार टकराव, रणनीति, भावनात्मक उतार चढ़ाव और प्रतिस्पर्धा का दौर देखने को मिला, लेकिन अंत में तन्वी ने अपनी स्थिरता और समझदारी से सबको पीछे छोड़ दिया।

    फिनाले की रात माहौल पूरी तरह उत्साह से भरा हुआ था जब अंतिम परिणाम की घोषणा की गई। जैसे ही विजेता के रूप में तन्वी कोलते का नाम सामने आया, मंच पर मौजूद दर्शकों और प्रतिभागियों में उत्साह की लहर दौड़ गई। शो के दौरान होस्ट की भूमिका निभा रहे रितेश देशमुख ने उनके हाथ को ऊपर उठाकर विजेता घोषित किया, जिसके बाद पूरा सेट तालियों से गूंज उठा।

    इस सीजन में कई मजबूत प्रतिभागियों ने अपनी जगह बनाई थी। फाइनल राउंड में तन्वी कोलते के साथ राकेश बापट, अनुश्री माने, दीपाली सैयद और विशाल कोटियन जैसे नाम शामिल थे। जैसे जैसे शो आगे बढ़ा, मुकाबला और भी कड़ा होता गया और अंतिम चरण में तीन प्रमुख प्रतियोगियों के बीच खिताब की दौड़ बेहद दिलचस्प हो गई। अंततः तन्वी ने निर्णायक बढ़त हासिल करते हुए जीत दर्ज की।

    तन्वी कोलते की जीत को केवल किस्मत नहीं बल्कि एक मजबूत रणनीतिक खेल का परिणाम माना जा रहा है। पूरे सीजन में उन्होंने संतुलित व्यवहार बनाए रखा और टास्क में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। चाहे शारीरिक चुनौतियां हों या मानसिक दबाव, उन्होंने हर परिस्थिति में खुद को स्थिर रखते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की। उनका यही संतुलन उन्हें अन्य प्रतियोगियों से अलग बनाता रहा।

    शो के दौरान राकेश बापट ने रनर अप की स्थिति हासिल की, जबकि विशाल कोटियन तीसरे स्थान पर रहे। विशाल को पूरे सीजन में उनकी रणनीतिक सोच और गेम प्लान के कारण मजबूत प्रतियोगी माना गया। अन्य प्रतिभागियों ने भी अपने प्रदर्शन से शो को रोचक बनाए रखा और दर्शकों का मनोरंजन किया।

    इस पूरे सीजन में दर्शकों को कई तरह के रंग देखने को मिले, जिसमें दोस्ती, प्रतिस्पर्धा, टकराव और भावनात्मक पल शामिल थे। हर कंटेस्टेंट ने अपने तरीके से गेम को आगे बढ़ाया, लेकिन अंत में तन्वी कोलते की निरंतरता और समझदारी उन्हें विजेता बनाने में सबसे बड़ा कारण साबित हुई।

  • सरकार का 'फ्लेक्स फ्यूल' पर बड़ा दांव, एथेनॉल के दम पर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की तैयारी!

    सरकार का 'फ्लेक्स फ्यूल' पर बड़ा दांव, एथेनॉल के दम पर ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की तैयारी!


    नई दिल्ली। वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी दिखाई है। सरकार का उद्देश्य परिवहन क्षेत्र में एथेनॉल के उपयोग को बढ़ाना और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है। यह कदम देश की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से सुरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नीति स्तर पर इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श की तैयारी की जा रही है, जिसमें तेल कंपनियों, ऑटोमोबाइल क्षेत्र और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर एक स्पष्ट रणनीति तैयार की जाएगी। इस प्रक्रिया में ऐसे उपायों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जो मौजूदा ईंधन नीतियों को आगे बढ़ाते हुए एथेनॉल मिश्रण के स्तर को बढ़ा सकें और फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के उपयोग को आसान बना सकें।

    वर्तमान में देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम लागू है। अब सरकार ऐसे वाहनों को बढ़ावा देने पर विचार कर रही है जो उच्च स्तर के एथेनॉल मिश्रण, यहां तक कि 85 प्रतिशत तक, पर भी आसानी से चल सकें। इससे न केवल वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग बढ़ेगा, बल्कि कृषि क्षेत्र को भी लाभ मिलने की संभावना है, क्योंकि एथेनॉल उत्पादन में कृषि आधारित कच्चे माल का उपयोग किया जाता है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को अपनाना ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही, सरकार एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्यों को पहले तय समय से पहले हासिल करने की दिशा में भी काम कर रही है, जिससे इस क्षेत्र में तेजी लाई जा सके।

    एथेनॉल उत्पादन को बढ़ाने के लिए भी कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें कच्चे माल के दायरे का विस्तार, उत्पादन के लिए कृषि क्लस्टर विकसित करना और अतिरिक्त खाद्यान्न का उपयोग शामिल है। चावल और चीनी जैसे संसाधनों का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन के लिए निर्धारित किया गया है, जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सके। इसके अलावा, एथेनॉल की खरीद के लिए तय मूल्य और कर में रियायत जैसे कदम भी इस क्षेत्र को प्रोत्साहित कर रहे हैं।

    यह पहल न केवल पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भी लाभकारी मानी जा रही है। फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के माध्यम से भारत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जो भविष्य में परिवहन क्षेत्र में बड़े बदलाव का संकेत देता है।

  • सेंसेक्स और निफ्टी में 'वेट एंड वॉच' की स्थिति: विदेशी तनाव के चलते सुरक्षित निवेश की तलाश में निवेशक, छोटे शेयरों में गिरावट ने बिगाड़ा बाजार का मूड!

    सेंसेक्स और निफ्टी में 'वेट एंड वॉच' की स्थिति: विदेशी तनाव के चलते सुरक्षित निवेश की तलाश में निवेशक, छोटे शेयरों में गिरावट ने बिगाड़ा बाजार का मूड!


    नई दिल्ली। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार वैश्विक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सीमित दायरे में उतार चढ़ाव के बाद लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ। दिनभर निवेशकों के बीच सतर्कता का माहौल बना रहा, जिससे बाजार में कोई स्पष्ट दिशा देखने को नहीं मिली। शुरुआती सत्र में हल्की तेजी के बाद बाजार ने अपने ऊपरी स्तरों से फिसलते हुए अंत में मामूली बढ़त दर्ज की।

    कारोबार के अंत में सेंसेक्स करीब 26 अंकों की बढ़त के साथ 78,520 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी भी हल्की बढ़त के साथ 24,364 के आसपास पहुंच गया। दिन की शुरुआत सकारात्मक रही थी और दोनों सूचकांकों ने शुरुआती कारोबार में ऊंचे स्तरों को छुआ, लेकिन बाद में मुनाफावसूली और वैश्विक संकेतों की कमजोरी के कारण बाजार पर दबाव बन गया।

    दिन के दौरान बाजार ने सीमित दायरे में कारोबार किया। निवेशक बड़े फैसले लेने से बचते नजर आए और ज्यादातर समय सतर्क रुख अपनाए रखा। वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा संभावित संघर्षविराम को लेकर बनी अनिश्चितता ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया। इसी कारण बाजार अपने उच्चतम स्तर को बनाए रखने में सफल नहीं हो सका।

    वृहद बाजार में भी कमजोरी देखने को मिली। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव बनाए हुए हैं। यह रुझान आमतौर पर तब देखने को मिलता है जब बाजार में अनिश्चितता अधिक होती है और निवेशक जोखिम कम करने की कोशिश करते हैं।

    सेक्टर स्तर पर बाजार का रुख मिला जुला रहा। कुछ क्षेत्रों में खरीदारी देखने को मिली जबकि कई सेक्टरों में बिकवाली का दबाव बना रहा। ऑटो और बैंकिंग से जुड़े शेयरों में हल्की मजबूती रही, जबकि आईटी, मेटल और एफएमसीजी क्षेत्रों में कमजोरी दर्ज की गई। इस मिश्रित प्रदर्शन ने भी बाजार को किसी एक दिशा में आगे बढ़ने से रोके रखा।

    पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रमों ने वैश्विक निवेश माहौल को प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ी अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ऐसी परिस्थितियों में बाजार आमतौर पर सतर्क रुख अपनाता है और उतार चढ़ाव सीमित दायरे में रहता है।

    आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और वैश्विक आर्थिक संकेतों पर निर्भर करेगी। निवेशक फिलहाल सतर्क बने हुए हैं और किसी बड़े संकेत का इंतजार कर रहे हैं जो बाजार को स्पष्ट दिशा दे सके।

  • सीमित संसाधनों के बावजूद सार्वजनिक निवेश को प्राथमिकता देने की तैयारी, क्या सफल होगा यह बड़ा दांव?

    सीमित संसाधनों के बावजूद सार्वजनिक निवेश को प्राथमिकता देने की तैयारी, क्या सफल होगा यह बड़ा दांव?


    नई दिल्ली।देश के विभिन्न राज्यों के लिए वित्त वर्ष 2027 में आर्थिक रणनीति का केंद्र सार्वजनिक निवेश बना रहेगा। अनुमान है कि राज्य सरकारें बुनियादी ढांचे के विकास और दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती को ध्यान में रखते हुए पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता देती रहेंगी। हालांकि, इस खर्च की वृद्धि दर अपेक्षाकृत सीमित रह सकती है और इसके 8 से 10 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना जताई जा रही है। यह स्थिति दर्शाती है कि राज्यों को विकास और वित्तीय संतुलन के बीच सावधानीपूर्वक तालमेल बनाना होगा।

    आर्थिक आकलनों के अनुसार, राज्यों का पूंजीगत व्यय सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 2.3 से 2.4 प्रतिशत के दायरे में रह सकता है। यह संकेत देता है कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं जैसे सड़क, परिवहन, ऊर्जा और शहरी विकास में निवेश जारी रहेगा। इस तरह के निवेश से रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है, जो दीर्घकाल में राज्यों की अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान कर सकता है।

    दूसरी ओर, राज्यों के सामने राजस्व व्यय को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है। जनकल्याणकारी योजनाओं पर बढ़ता खर्च और ऊर्जा तथा कमोडिटी की ऊंची लागत से वित्तीय दबाव बढ़ने की संभावना है। इसके चलते राज्यों के कुल खर्च में वृद्धि हो सकती है, जिससे उनके बजट संतुलन पर असर पड़ सकता है। साथ ही, राजस्व प्राप्तियों की वृद्धि दर भी सीमित रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2026 में लगभग 6.2 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2027 में करीब 7.9 प्रतिशत तक रह सकती है। यह वृद्धि दर नाममात्र के आर्थिक विस्तार की तुलना में कम मानी जा रही है।

    राज्यों की आय पर केंद्र से मिलने वाले संसाधनों की गति में संभावित कमी का भी प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक परिस्थितियों और बढ़ती सब्सिडी आवश्यकताओं के कारण केंद्र सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ने की आशंका है, जिससे राज्यों को मिलने वाले हस्तांतरणों की वृद्धि धीमी हो सकती है। इस स्थिति में राज्यों को अपने संसाधनों का अधिक कुशल प्रबंधन करना होगा ताकि विकास परियोजनाओं को जारी रखा जा सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने के बावजूद इसकी वृद्धि दर धीमी पड़ सकती है, जिसका असर राजकोषीय घाटे और ऋण स्तर पर दिखाई दे सकता है। अनुमान है कि राजस्व घाटा धीरे-धीरे बढ़कर वित्त वर्ष 2027 तक सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 1.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह स्थिति राज्यों के लिए वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की आवश्यकता को और महत्वपूर्ण बना देती है, ताकि वे अपने विकास लक्ष्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

    उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे प्रमुख राज्यों ने पहले भी सीमित राजस्व वृद्धि के बावजूद पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता दी है। यह रुझान बताता है कि राज्यों का ध्यान दीर्घकालिक आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है। आने वाले समय में भी यह रणनीति आर्थिक स्थिरता और विकास को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?

    नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?


    नई दिल्ली। उद्यमिता और टेलीविजन जगत की जानी मानी हस्ती नमिता थापर हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने एक वीडियो को लेकर विवादों में आ गई हैं। नमाज के स्वास्थ्य लाभों पर जानकारी साझा करने के बाद उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संवाद की मर्यादा और जिम्मेदारी को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

    मार्च के अंतिम सप्ताह में साझा किए गए एक वीडियो में नमिता थापर ने नमाज को एक शारीरिक गतिविधि के रूप में समझाते हुए उसके संभावित स्वास्थ्य लाभों पर चर्चा की थी। उन्होंने इसे एक नियमित व्यायाम की तरह बताया जो शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। उनका कहना था कि यह जानकारी पूरी तरह स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई थी और इसका किसी भी धार्मिक भावना से कोई नकारात्मक संबंध नहीं था।

    हालांकि इस वीडियो के बाद उन्हें लगातार कई हफ्तों तक आलोचना और अपमानजनक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि इस दौरान न केवल उन्हें बल्कि उनकी मां को भी निशाना बनाया गया और सोशल मीडिया पर असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जताई और इस तरह के व्यवहार को गलत ठहराया।

    उन्होंने यह भी कहा कि वे पहले भी कई सांस्कृतिक और पारंपरिक विषयों पर स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करती रही हैं, जिनमें योग और सूर्य नमस्कार जैसे विषय शामिल हैं। ऐसे विषयों पर कभी इस प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिससे उन्होंने यह सवाल उठाया कि अलग अलग परिस्थितियों में लोगों की प्रतिक्रिया इतनी भिन्न क्यों हो जाती है।

    नमिता थापर ने इस पूरे मामले को महिलाओं के प्रति ऑनलाइन व्यवहार से भी जोड़ा और कहा कि समाज में महिलाओं के सम्मान की बात तो की जाती है, लेकिन वास्तविकता में कई बार उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे व्यक्त करने का तरीका सभ्य और मर्यादित होना चाहिए।

    अपने बयान में उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया और कहा कि वे अपने विश्वासों पर गर्व करती हैं। साथ ही उन्होंने यह दोहराया कि उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करना था, न कि किसी धर्म या समुदाय को लेकर कोई टिप्पणी करना।

    यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर बढ़ती असहिष्णुता और संवाद के स्तर को लेकर गंभीर चिंताओं को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ जिम्मेदारी और सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है, ताकि स्वस्थ और संतुलित संवाद संभव हो सके।

  • पूजा घर में शंख रखने के सही नियम, वरना फायदे की जगह हो सकता है नुकसान

    पूजा घर में शंख रखने के सही नियम, वरना फायदे की जगह हो सकता है नुकसान


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में शंख को अत्यंत पवित्र और शुभ प्रतीक माना गया है। पूजा-पाठ, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों में शंख का उपयोग सदियों से किया जाता रहा है। इसे केवल एक धार्मिक वस्तु ही नहीं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी माना जाता है, जिसकी ध्वनि वातावरण को शुद्ध करने और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सक्षम बताई जाती है।

    हालांकि शंख को घर के मंदिर में रखना जितना शुभ माना गया है, उतना ही जरूरी है इसके नियमों का पालन करना। वास्तु और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शंख रखने की सही दिशा और विधि का विशेष महत्व है। यदि इन नियमों की अनदेखी की जाए तो इसके विपरीत प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं।

    शंख को घर के मंदिर में हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में रखना सबसे शुभ माना जाता है। इस दिशा को सबसे पवित्र माना गया है क्योंकि यहां देवी-देवताओं का वास होता है और भगवान विष्णु की कृपा भी इसी दिशा से जुड़ी मानी जाती है। इस स्थान पर शंख रखने से घर में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।

    वहीं वास्तु शास्त्र के अनुसार शंख को कभी भी दक्षिण दिशा में नहीं रखना चाहिए। माना जाता है कि इस दिशा में शंख रखने से घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है, जिससे परिवार की प्रगति और समृद्धि पर असर पड़ सकता है। इसलिए शंख की सही दिशा का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।

    इसके अलावा शंख की स्वच्छता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अक्सर लोग शंख को मंदिर में रखकर उसकी सफाई पर ध्यान नहीं देते, जबकि शास्त्रों में इसे अत्यंत आवश्यक बताया गया है। शंख को नियमित रूप से साफ करना चाहिए और सप्ताह में कम से कम एक बार गंगाजल से इसे शुद्ध करना शुभ माना जाता है। यदि गंगाजल उपलब्ध न हो तो साफ पानी का उपयोग भी किया जा सकता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शंख की ध्वनि से वातावरण की नकारात्मकता समाप्त होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। जब भी शंख बजाया जाता है तो उसकी तरंगें घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ाती हैं।

    नियमित रूप से शंख का उपयोग करने से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और घर में सुख, समृद्धि तथा खुशहाली आती है। यही कारण है कि शंख को केवल पूजा सामग्री नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत माना गया है, जिसका सही उपयोग जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

  • एक तरफ 'रामायणम्' की सादगी, दूसरी तरफ रकुल प्रीत की फिल्म का विवाद; क्या आधुनिक सिनेमा में रिश्तों की मर्यादा भूल रहे हैं मेकर्स?

    एक तरफ 'रामायणम्' की सादगी, दूसरी तरफ रकुल प्रीत की फिल्म का विवाद; क्या आधुनिक सिनेमा में रिश्तों की मर्यादा भूल रहे हैं मेकर्स?


    नई दिल्ली। फिल्म जगत में इन दिनों जहां बड़े बजट की फिल्म रामायणम् को लेकर उत्साह बना हुआ है, वहीं अभिनेत्री रकुल प्रीत सिंह की दूसरी फिल्म पति पत्नी और वो 2 अपने टीजर रिलीज के बाद विवादों में घिर गई है। 20 अप्रैल को सामने आए इस टीजर ने दर्शकों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं। खासतौर पर फिल्म की कहानी और उसके प्रस्तुतिकरण को लेकर एक वर्ग ने आपत्ति जताई है, जिससे यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है।

    टीजर में एक ऐसे वैवाहिक जीवन को दिखाया गया है, जिसमें मुख्य किरदार अपने रिश्ते से इतर अन्य संबंधों में उलझा हुआ नजर आता है। कहानी में आयुष्मान खुराना के साथ सारा अली खान, वामिका गब्बी और रकुल प्रीत सिंह की मौजूदगी एक जटिल रोमांटिक स्थिति को दर्शाती है। इसे हल्के-फुल्के और हास्यपूर्ण अंदाज में पेश किया गया है, लेकिन यही बात कुछ दर्शकों को असहज कर रही है। उनका मानना है कि विवाह और विश्वास जैसे विषयों को इस तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

    दर्शकों के एक हिस्से ने यह सवाल उठाया है कि क्या मनोरंजन के नाम पर गंभीर सामाजिक मुद्दों को सामान्य बनाना सही है। उनका कहना है कि फिल्म में बेवफाई और धोखे जैसे संवेदनशील विषयों को कॉमेडी के रूप में दिखाया गया है, जिससे समाज में गलत संदेश जा सकता है। इस तरह के कंटेंट को लेकर यह चिंता भी जताई जा रही है कि यह रिश्तों की वास्तविक जटिलताओं को हल्के रूप में पेश करता है और दर्शकों की सोच को प्रभावित कर सकता है।

    इसके साथ ही जेंडर स्टीरियोटाइप्स को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि पुरुष किरदार के व्यवहार को हास्य के रूप में स्वीकार्य दिखाया गया है, जबकि इसी तरह की कहानी अगर महिला दृष्टिकोण से दिखाई जाती, तो उसकी प्रतिक्रिया अलग होती। इस मुद्दे ने फिल्म के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को और मजबूत किया है और दर्शकों के बीच विचारों का विभाजन स्पष्ट रूप से सामने आया है।

    दिलचस्प रूप से यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब रकुल प्रीत सिंह की आगामी फिल्म रामायणम् भी चर्चा में बनी हुई है। इस फिल्म में उनकी संभावित भूमिका को लेकर दर्शकों में उत्सुकता है, जो एक पौराणिक और गंभीर विषय से जुड़ी है। ऐसे में उनकी दूसरी फिल्म को लेकर उठ रहे सवाल उनके करियर के विभिन्न पहलुओं को एक साथ चर्चा में ला रहे हैं।

    फिल्मों के जरिए समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर बहस कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार यह मुद्दा फिर से प्रमुखता से उभरकर सामने आया है। पति पत्नी और वो 2 का टीजर इस बहस को एक बार फिर जीवित कर रहा है, जहां मनोरंजन और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।