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  • शिवपुरी में रिश्वतखोर पटवारी गिरफ्तार, 2000 रुपये लेते लोकायुक्त ने रंगे हाथों दबोचा

    शिवपुरी में रिश्वतखोर पटवारी गिरफ्तार, 2000 रुपये लेते लोकायुक्त ने रंगे हाथों दबोचा

    शिवपुरी । मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले से भ्रष्टाचार का एक मामला सामने आया है जहां लोकायुक्त पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एक पटवारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। यह घटना पोहरी अनुविभाग की है जहां पदस्थ पटवारी देवेंद्र जैन पर रिश्वत मांगने का आरोप था।

    जानकारी के अनुसार आरोपी पटवारी ने फरियादी भान सिंह धाकड़ से भूमि के नक्शे को दुरुस्त करने के एवज में दो हजार रुपये की मांग की थी। फरियादी ने इस मामले की शिकायत लोकायुक्त पुलिस ग्वालियर में दर्ज कराई जिसके बाद टीम ने पूरे मामले की जांच कर कार्रवाई की योजना बनाई।

    निर्धारित योजना के तहत लोकायुक्त टीम ने जाल बिछाया और जैसे ही पटवारी ने रिश्वत की राशि ली उसे मौके पर ही पकड़ लिया गया। इस कार्रवाई के दौरान आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने के बाद उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

    इस घटना ने एक बार फिर सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया है जहां छोटे से छोटे काम के लिए भी आम नागरिकों से पैसे मांगे जाते हैं। हालांकि लोकायुक्त की इस कार्रवाई को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है जो यह संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी है।

    फिलहाल आरोपी पटवारी से पूछताछ की जा रही है और मामले की आगे की जांच जारी है। अधिकारियों का कहना है कि यदि जांच में और तथ्य सामने आते हैं तो उसके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।

    यह कार्रवाई आम लोगों के लिए भी एक संदेश है कि यदि उनसे किसी भी प्रकार की रिश्वत मांगी जाती है तो वे बिना डर के इसकी शिकायत करें ताकि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सके।

  • हॉकी स्टार गुरजंत सिंह ने लिया संन्यास, दो बार ओलंपिक में भारत को दिलाया कांस्य

    हॉकी स्टार गुरजंत सिंह ने लिया संन्यास, दो बार ओलंपिक में भारत को दिलाया कांस्य


    नई दिल्ली। भारतीय पुरुष हॉकी टीम के फॉरवर्ड Gurjant Singh ने शुक्रवार को नई दिल्ली में आयोजित हॉकी इंडिया पुरस्कार समारोह में अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास लेने की घोषणा की। 31 वर्षीय गुरजंत ने भारतीय टीम के लिए 130 मैच खेले और 33 गोल किए, जिससे उन्हें टीम का एक अहम खिलाड़ी माना जाता रहा।

    बचपन से हॉकी तक का सफर

    26 जनवरी 1995 को अमृतसर के खैलारा में जन्मे गुरजंत सिंह को बचपन से ही हॉकी का गहरा लगाव था। लखनऊ में 2016 के जूनियर विश्व कप में उन्होंने फाइनल में गोल कर भारत की जीत में अहम भूमिका निभाई। 2017 में सीनियर टीम में शामिल होने के बाद उन्होंने लगातार देश का नाम रोशन किया।

    ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां

    गुरजंत सिंह दो बार ओलंपिक पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहे:

    Tokyo 2020 Olympics – कांस्य पदक
    Paris 2024 Olympics – कांस्य पदक

    इसके अलावा उन्होंने भारत को 2022 हांगझोऊ एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक, 2017 एशिया कप में स्वर्ण और कई एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी खिताब दिलाने में भी मदद की। 2021 में उन्हें उनके योगदान के लिए अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया।

    संन्यास के बाद भावनाएं

    गुरजंत ने कहा, “आज मैं गर्व और गहरी भावनाओं के साथ संन्यास की घोषणा करता हूं। भारतीय हॉकी के ऐतिहासिक पुनरुद्धार का हिस्सा बनकर और दो ओलंपिक पदक हासिल करके मुझे बेहद संतुष्टि महसूस हो रही है। ट्रॉफियों से बढ़कर, सबसे बड़ी याद अपने साथियों के साथ बिताया गया समय है।”

    उन्होंने हॉकी इंडिया को भी धन्यवाद दिया और कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच से खुश और गर्वित होकर विदा ले रहे हैं।

    हॉकी इंडिया की प्रतिक्रिया
    दिलिप टिर्की, अध्यक्ष: “गुरजंत सिंह लगभग एक दशक से भारत की हॉकी कहानी का अहम हिस्सा रहे। उनकी रफ्तार और गोल करने की क्षमता उन्हें विरोधियों के लिए हमेशा खतरनाक बनाती रही।”
    भोला नाथ सिंह, महासचिव: “पंजाब के खेतों से दो ओलंपिक पोडियम तक का उनका सफर हर युवा खिलाड़ी के लिए प्रेरणा है। उनका समर्पण और योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।”

  • वैश्विक तनावों के बीच लाल निशान में बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स और निफ्टी 2% लुढ़के

    वैश्विक तनावों के बीच लाल निशान में बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स और निफ्टी 2% लुढ़के


    नई दिल्ली। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और अमेरिकी-ईरान युद्ध में बढ़ते तनाव के बीच भारतीय शेयर बाजार हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन लाल निशान में बंद हुआ। प्रमुख बेंचमार्क सूचकांक बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी50 दोनों में 2 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।

    सेंसेक्स और निफ्टी की स्थिति
    सेंसेक्स: दिन के अंत में 1,690.23 अंक यानी 2.25% की गिरावट के साथ 73,583.22 पर बंद हुआ।
    निफ्टी50: 486.85 अंक यानी 2.09% की गिरावट के साथ 22,819.60 पर बंद हुआ।

    दिनभर के कारोबार में सेंसेक्स ने 74,883.79 पर खुलकर 1,736 अंक यानी 2.30% से अधिक गिरकर 73,534.41 के निचले स्तर को छुआ। वहीं निफ्टी50 23,173.55 से शुरू होकर 501 अंक यानी 2.15% गिरकर 22,804.55 तक पहुंच गया।

    व्यापक बाजार और सेक्टर प्रदर्शन
    निफ्टी मिडकैप: 2.23% की गिरावट
    निफ्टी स्मॉलकैप: 1.74% की गिरावट

    सबसे अधिक प्रभावित सेक्टर:

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSU) – 3.86% गिरावट
    निफ्टी रियल्टी – 3.17%
    निफ्टी ऑटो – 2.82%
    निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज – 2.69%
    निफ्टी प्राइवेट बैंक – 2.01%

    सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला सेक्टर:

    निफ्टी आईटी – केवल 0.44% की गिरावट
    शेयरों का दिनभर का प्रदर्शन

    सकारात्मक प्रदर्शन: केवल 6 कंपनियों में तेजी

    ओएनजीसी: +4.03%
    विप्रो: +1.22%
    भारती एयरटेल: +0.82%
    टीसीएस: +0.42%
    कोल इंडिया: +0.32%
    पावरग्रिड: +0.24%

    सबसे अधिक नुकसान:

    श्रीराम फाइनेंस: -5.54%
    टीएमपीवी: -4.92%
    रिलायंस: -4.61%
    इंडिगो: -4.48%
    बजाज फाइनेंस: -4.11%
    कुल बाजार पूंजीकरण और निवेशकों को नुकसान

    दिन के कारोबार में निवेशकों को लगभग 9 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 431 लाख करोड़ रुपए से घटकर 422 लाख करोड़ रुपए रह गया।

  • प्रिया राजवंश: सिर्फ 7 फिल्मों में रातोंरात सुपरस्टार, चेतन आनंद संग लिव-इन रिलेशनशिप और रहस्यमयी मौत

    प्रिया राजवंश: सिर्फ 7 फिल्मों में रातोंरात सुपरस्टार, चेतन आनंद संग लिव-इन रिलेशनशिप और रहस्यमयी मौत

    नई दिल्ली:    हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो काम बेहद कम करने के बावजूद अपने अभिनय और व्यक्तित्व से हमेशा के लिए दर्शकों के दिलों में जगह बना लेते हैं. ऐसे ही कलाकार थीं दिवंगत अभिनेत्री प्रिया राजवंश जिन्होंने अपने करियर में केवल सात फिल्में कीं, लेकिन हर फिल्म में अपने किरदार की सादगी, गंभीरता और प्रभाव से एक अमिट छाप छोड़ी. 27 मार्च 2000 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका अभिनय और जीवन आज भी फिल्मों के चाहने वालों के बीच जीवित है.

    प्रिया राजवंश का असली नाम वीरा सुंदर सिंह था. उनका जन्म 30 दिसंबर 1936 को शिमला में हुआ था. उनके पिता सरकारी अधिकारी थे और परिवार का फिल्मों से कोई संबंध नहीं था. प्रिया ने अपनी पढ़ाई शिमला में पूरी की और इसके बाद अभिनय की ट्रेनिंग लेने के लिए लंदन चली गईं. लंदन में एक फोटोग्राफर ने उनकी कुछ तस्वीरें खींचीं और इन्हीं तस्वीरों ने उनकी किस्मत बदल दी. मशहूर निर्देशक चेतन आनंद ने उनकी तस्वीरें देखकर उन्हें अपनी फिल्म ‘हकीकत’ में काम करने का मौका दिया. यह फिल्म रिलीज होते ही हिट साबित हुई और प्रिया रातों-रात स्टार बन गईं.

    प्रिया ने अपने करियर में केवल सात फिल्में कीं, लेकिन हर फिल्म में उनका किरदार दर्शकों के दिल में घर कर गया. उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं ‘हीर रांझा’, ‘हंसते जख्म’, ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘कुदरत’ और ‘हाथों की लकीरें’. इन फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग रोल निभाए और हर किरदार में अपने अभिनय का पूरा जादू दिखाया. यही वजह थी कि उनके कम फिल्मों के बावजूद उनका नाम भारतीय सिनेमा में अमर हो गया.

    प्रिया के करियर का एक अनोखा पहलू यह भी रहा कि उन्होंने ज्यादातर फिल्में चेतन आनंद के निर्देशन में कीं. इस दौरान उनके और चेतन आनंद के बीच करीबी बढ़ी और यह रिश्ता धीरे-धीरे प्यार में बदल गया. दोनों ने कभी शादी नहीं की, लेकिन लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे. हालांकि, इस रिश्ते का असर उनके करियर पर पड़ा क्योंकि उन्होंने अन्य फिल्ममेकरों के साथ काम नहीं किया और उनके फिल्मी सफर को सीमित कर दिया.

    1997 में चेतन आनंद के निधन के बाद प्रिया पूरी तरह अकेली पड़ गईं और उन्होंने खुद को एक्टिंग की दुनिया से अलग कर लिया. लेकिन 27 मार्च 2000 को प्रिया राजवंश अपने ही घर में मृत पाई गईं. जांच में यह सामने आया कि उनकी हत्या की गई थी. पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार भी किया, लेकिन सबूतों की कमी के कारण मामला कभी साबित नहीं हो सका. इस तरह उनकी मौत आज भी बॉलीवुड के इतिहास में एक रहस्यमयी और दुखद घटना के रूप में दर्ज है.

    प्रिया राजवंश की जिंदगी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी. उनके अभिनय, उनके रिश्ते और उनका व्यक्तित्व आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है. उनकी फिल्मों की सादगी और उनकी अदाकारी ने उन्हें केवल एक अभिनेत्री ही नहीं बल्कि हिंदी सिनेमा की यादगार हस्ती बना दिया. भले ही उन्होंने कम फिल्में की हों, लेकिन प्रिया राजवंश का नाम और उनका योगदान हमेशा भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमिट रहेगा.

  • साइना नेहवाल की सफलता की कहानी: ओलंपिक मेडल से चमकाया भारत का नाम

    साइना नेहवाल की सफलता की कहानी: ओलंपिक मेडल से चमकाया भारत का नाम


    नई दिल्ली। भारत की बैडमिंटन दुनिया में एक ऐसा नाम है, जिसने न सिर्फ अपने खेल से इतिहास रचा बल्कि लाखों बेटियों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा भी दी—Saina Nehwal। साइना ने अपने करियर में वह मुकाम हासिल किया, जो किसी भी खिलाड़ी का सपना होता है। वह ओलंपिक में भारत के लिए बैडमिंटन में पदक जीतने वाली पहली खिलाड़ी बनीं और देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया।

    बचपन से ही खेल के प्रति जुनून

    हरियाणा के हिसार में जन्मीं साइना नेहवाल का बचपन साधारण रहा, लेकिन उनके सपने बड़े थे। महज 8 साल की उम्र में उनका परिवार हैदराबाद आ गया, जहां से उनके बैडमिंटन करियर की असली शुरुआत हुई। उनकी मां उषा रानी नेहवाल खुद एक राज्य स्तर की खिलाड़ी थीं, जिनसे साइना को प्रेरणा मिली। मां का अधूरा सपना पूरा करने की चाह ने साइना को इस खेल में पूरी तरह समर्पित कर दिया।

    बीजिंग ओलंपिक से मिला आत्मविश्वास

    साल 2008 में Beijing Olympics 2008 साइना के करियर का अहम मोड़ साबित हुआ। वह क्वार्टर फाइनल तक पहुंचीं, जो उस समय भारतीय बैडमिंटन के लिए बड़ी उपलब्धि थी। इस प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी दिया। इसके बाद उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय खिताब अपने नाम किए, जिनमें हांगकांग ओपन, सिंगापुर ओपन और इंडोनेशिया ओपन शामिल हैं।

    लंदन ओलंपिक में रचा इतिहास

    साल 2012 में London Olympics 2012 में साइना नेहवाल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल जीता। वह भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं, जिन्होंने ओलंपिक में पदक हासिल किया। इस ऐतिहासिक जीत ने उन्हें देशभर में स्टार बना दिया और भारतीय बैडमिंटन को नई पहचान दिलाई।

    वर्ल्ड नंबर-1 बनने का गौरव

    28 मार्च 2015 को साइना ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की, जब वह बैडमिंटन विश्व रैंकिंग में नंबर-1 स्थान पर पहुंचीं। इस मुकाम तक पहुंचने वाली वह भारत की पहली महिला बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। यह उपलब्धि उनके संघर्ष, मेहनत और निरंतर प्रदर्शन का नतीजा थी।

    पुरस्कार और सम्मान

    साइना नेहवाल को उनके शानदार योगदान के लिए कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 2009 में अर्जुन अवॉर्ड, 2010 में राजीव गांधी खेल रत्न (अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न), 2010 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से नवाजा गया। ये सम्मान उनके उत्कृष्ट खेल करियर और देश के प्रति योगदान को दर्शाते हैं।

    नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

    साइना नेहवाल सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया कि कड़ी मेहनत, समर्पण और आत्मविश्वास के दम पर किसी भी मुकाम को हासिल किया जा सकता है। आज भारत में बैडमिंटन की लोकप्रियता जिस ऊंचाई पर है, उसमें साइना का योगदान बेहद महत्वपूर्ण है।

  • युद्ध के माहौल में बड़ा फैसला अमेरिकी करेंसी पर ट्रंप के हस्ताक्षर से बदलेगा इतिहास

    युद्ध के माहौल में बड़ा फैसला अमेरिकी करेंसी पर ट्रंप के हस्ताक्षर से बदलेगा इतिहास


    नई दिल्ली । अमेरिका एक बार फिर इतिहास रचने की तैयारी में है और इस बार बदलाव सीधे उसकी करेंसी यानी डॉलर से जुड़ा हुआ है। करीब 165 साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए अब पहली बार ऐसा होने जा रहा है जब किसी मौजूदा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर अमेरिकी नोटों पर दिखाई देंगे। यह ऐतिहासिक कदम डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में उठाया गया है और इसे अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के जश्न से भी जोड़ा जा रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने इस बात की पुष्टि की है कि जल्द ही छपने वाले डॉलर नोटों पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर शामिल किए जाएंगे। उनके साथ ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के साइन भी होंगे। अब तक अमेरिकी करेंसी पर परंपरागत रूप से ट्रेजरी सचिव और ट्रेजरर के हस्ताक्षर ही होते रहे हैं लेकिन इस फैसले के बाद यह व्यवस्था बदलती नजर आएगी।

    इस पूरे घटनाक्रम को और भी खास बनाता है इसका समय। यह फैसला ऐसे दौर में लिया गया है जब अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना कर रहा है खासकर Iran के साथ चल रहे टकराव के बीच। ऐसे में यह कदम सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व भी रखता है। अमेरिकी ट्रेजररब्रैंडन बीच ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह राष्ट्रपति के नेतृत्व और देश के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। उनके अनुसार यह बदलाव आने वाले वर्षों तक अमेरिकी करेंसी की पहचान का हिस्सा रहेगा।

    जानकारी के मुताबिक सबसे पहले 100 डॉलर के नोट पर ट्रंप और बेसेंट के हस्ताक्षर जून महीने से छपने शुरू होंगे। इसके बाद धीरे धीरे अन्य मूल्य के नोटों पर भी यह बदलाव लागू किया जाएगा। फिलहाल अमेरिकी ब्यूरो ऑफ एनग्रैविंग एंड प्रिंटिंग पुराने नोटों की छपाई जारी रखे हुए है जिन पर जेनेट येलेन और लिन मालेरबा के हस्ताक्षर मौजूद हैं। हालांकि ट्रेजरी विभाग ने यह साफ कर दिया है कि नोट के डिजाइन में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यानी डॉलर की मौजूदा पहचान वैसी ही बनी रहेगी केवल हस्ताक्षरों में यह नया परिवर्तन जोड़ा जाएगा।

    गौरतलब है कि इससे पहले ट्रंप के नाम पर एक डॉलर का सिक्का जारी करने की कोशिश भी की गई थी लेकिन अमेरिकी कानूनों के तहत किसी जीवित व्यक्ति की तस्वीर को सिक्कों पर छापने की अनुमति नहीं है जिसके चलते वह प्रयास सफल नहीं हो पाया। कुल मिलाकर यह फैसला अमेरिका के आर्थिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। यह न सिर्फ परंपरा में बदलाव का संकेत है बल्कि यह भी दर्शाता है कि आने वाले समय में करेंसी सिर्फ लेनदेन का माध्यम नहीं बल्कि राजनीतिक और राष्ट्रीय पहचान का भी मजबूत प्रतीक बनती जा रही है।

  • ‘हम आपके हैं कौन’ की पूजा: रेणुका शहाणे का फिल्मी करियर, निर्देशन और निजी जिंदगी का अनोखा संगम

    ‘हम आपके हैं कौन’ की पूजा: रेणुका शहाणे का फिल्मी करियर, निर्देशन और निजी जिंदगी का अनोखा संगम


    नई दिल्ली:  फिल्मों में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए दर्शकों के दिल में बस जाते हैं। रेणुका शहाणे उन्हीं कलाकारों में से हैं, जिनकी पहचान ‘हम आपके हैं कौन’ में निभाए गए पूजा के किरदार से जुड़ी है। इस फिल्म ने उनकी किस्मत बदल दी और उन्हें बॉलीवुड में स्थायी पहचान दिलाई।

    शुरूआत और टीवी करियर

    27 मार्च 1965 को मुंबई में जन्मीं रेणुका शहाणे एक मराठी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पिता भारतीय नौसेना में अधिकारी थे और मां शांता गोखले थिएटर व फिल्मों से जुड़ी थीं। बचपन में माता-पिता का अलग होना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया।

    रेणुका ने अपने करियर की शुरुआत मराठी फिल्म ‘हाच सुनबाईचा भाऊ’ से की। इसके बाद उन्होंने टीवी की दुनिया में कदम रखा और दूरदर्शन के लोकप्रिय शो ‘सुरभि’ में काम किया। उस समय टीवी पर कम चैनल थे, इसलिए उनका चेहरा घर-घर में पहचान में आ गया।

    ‘हम आपके हैं कौन’ ने बदली तकदीर

    साल 1994 में उन्हें सूरज बड़जत्या की फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ में पूजा का किरदार मिला। सलमान खान और माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिका में थे। पूजा की सादगी और आदर्श बहू की छवि ने दर्शकों का दिल जीत लिया। फिल्म में उनके किरदार की मौत का सीन इतना भावुक था कि आज भी लोग उसे याद करते हैं।

    इस फिल्म के बाद रेणुका के पास कई फिल्म और टीवी ऑफर्स आने लगे। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ मराठी और अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। मराठी फिल्म ‘अबोली’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार (मराठी) मिला।

    निर्देशन में कदम

    फिल्मों के अलावा रेणुका ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया और ‘त्रिभंगा’ जैसी फिल्म बनाई, जिसमें परिवार और रिश्तों की जटिलताओं को खूबसूरती से दिखाया गया।

    निजी जिंदगी और प्यार

    रेणुका ने 25 मई 2001 को अभिनेता आशुतोष राणा से शादी की। दोनों की मुलाकात डायरेक्टर हंसल मेहता की एक फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थी। शादी के बाद उन्हें दो बेटे, शौर्यमन और सत्येंद्र, हुए। रेणुका शहाणे की कहानी फिल्मों की सफलता, यादगार किरदारों, निर्देशन और निजी जिंदगी की अनोखी यात्रा का मिश्रण है। उन्होंने अपनी प्रतिभा और सादगी से दर्शकों के दिल में स्थायी जगह बनाई।

  • पर्दे के पीछे का जादू ऐसे बनते हैं बॉलीवुड के ग्रैंड सेट और इन फिल्मों ने खर्च में रच दिया इतिहास

    पर्दे के पीछे का जादू ऐसे बनते हैं बॉलीवुड के ग्रैंड सेट और इन फिल्मों ने खर्च में रच दिया इतिहास


    नई दिल्ली । फिल्मों में दिखने वाली भव्यता सिर्फ कलाकारों या लोकेशन की देन नहीं होती बल्कि उसके पीछे एक पूरी टीम की महीनों की मेहनत छिपी होती है। जब भी आप किसी ऐतिहासिक या भव्य फिल्म को देखते हैं तो उसके सेट आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं। लेकिन यह जादू अचानक नहीं बनता बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित और बेहद तकनीकी प्रक्रिया होती है।

    फिल्म का सेट तैयार करने की जिम्मेदारी प्रोडक्शन डिजाइनर और आर्ट डायरेक्टर की होती है। ये लोग निर्देशक के विजन को समझकर पहले ब्लूप्रिंट तैयार करते हैं। इसमें हर छोटी बड़ी डिटेल शामिल होती है जैसे महल का आकार दरवाजों की डिजाइन रंगों का संयोजन और यहां तक कि दीवारों की बनावट तक। इसके बाद लकड़ी फाइबर प्लास्टर और अन्य विशेष सामग्री की मदद से सेट को धीरे धीरे खड़ा किया जाता है। कई बार सेट इतने वास्तविक बनाए जाते हैं कि दर्शक उन्हें असली लोकेशन समझ बैठते हैं।

    भारतीय सिनेमा में भव्य सेट्स की बात हो और संजय लीला भंसाली का नाम न आए ऐसा हो ही नहीं सकता। उनकी फिल्मों की पहचान ही उनके शानदार और महंगे सेट होते हैं जो कहानी को एक अलग ही स्तर पर ले जाते हैं। अगर बॉलीवुड के सबसे महंगे सेट्स की बात करें तो बाजीराव मस्तानी इस लिस्ट में सबसे ऊपर नजर आती है। इस फिल्म में रणवीर सिंह दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा हैं। मुख्य भूमिकाओं में थे और इसके सेट को तैयार करने में लगभग 145 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। यह सेट अपनी भव्यता और डिटेलिंग के लिए आज भी याद किया जाता है।

    वहीं देवदास भी अपने समय की सबसे आलीशान फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में शाहरुख खान ऐश्वर्या राय बच्चन और माधुरी दीक्षित नजर आए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म के सेट पर करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हुए थे जिसमें से 12 करोड़ सिर्फ चंद्रमुखी के कोठे के निर्माण में लगे थे।प्रेम रतन धन पायो भी शाही ठाठ बात के लिए जानी जाती है। सलमान खान और सोनम कपूर स्टारर है फिल्म के सेट को बनाने में लगभग 13 से 15 करोड़ रुपये खर्च हुए थे जिससे फिल्म को एक रॉयल लुक दिया जा सका।

    इसी तरह जोधा अकबर जिसमें ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन नजर आई थीं उसके सेट पर करीब 12 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। फिल्म के महलों और दरबारों की भव्यता ने दर्शकों को जोड़ा कर दिया था। कलंक भी अपने विशाल सेट्स के लिए चर्चा में रही। वरुण धवन आलिया भट्ट और आदित्य रॉय कपूर स्टार इस फिल्म के सेट को तैयार करने में करीब 15 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।

    इन फिल्मों के सेट सिर्फ खर्च के आंकड़े नहीं हैं बल्कि यह दर्शाते हैं कि सिनेमा एक विजुअल आर्ट है जहां हर फ्रेम को खास बनाने के लिए बारीकी से काम किया जाता है। यही वजह है कि जब दर्शक इन फिल्मों को देखते हैं तो उन्हें सिर्फ कहानी ही नहीं बल्कि एक भव्य अनुभव भी मिलता है जो लंबे समय तक याद रहता है।

  • मुनमुन सेन: सैफ अली खान की पूर्व प्रेमिका, 20 भाषाओं में 60 फिल्में और रॉयल बैकग्राउंड वाली एक्ट्रेस

    मुनमुन सेन: सैफ अली खान की पूर्व प्रेमिका, 20 भाषाओं में 60 फिल्में और रॉयल बैकग्राउंड वाली एक्ट्रेस


    नई दिल्ली : हिंदी और क्षेत्रीय सिनेमा में कई अभिनेत्रियां रही हैं, जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई लेकिन समय के साथ लाइमलाइट से दूर होती चली गईं। ऐसी ही एक नाम है मुनमुन सेन, जिनकी जिंदगी फिल्मों, रिश्तों और शाही बैकग्राउंड का दिलचस्प संगम रही है।

    मुनमुन सेन ने 20 से ज्यादा भाषाओं में करीब 60 फिल्मों और 40 टीवी सीरियल्स में अपनी एक्टिंग का जलवा दिखाया। उनका नाम एक समय सैफ अली खान के साथ भी जुड़ा था, जिसने उन्हें सुर्खियों में ला दिया।

    फिल्मी करियर और विरासत

    मुनमुन सेन, दिग्गज अभिनेत्री सुचित्रा सेन की बेटी हैं और खुद भी इंडस्ट्री में बड़ा नाम रही हैं। उन्होंने हिंदी के अलावा बंगाली, तमिल, तेलुगु समेत कई भाषाओं में काम किया। अपने करियर में उन्हें नंदी स्टेट अवॉर्ड, कालकेंद्र स्क्रीन अवॉर्ड और भारत निर्माण अवॉर्ड जैसे सम्मान भी मिले।

    उनकी निजी जिंदगी भी किसी शाही कहानी से कम नहीं रही। उनकी सास इला देवी कूचबिहार की राजकुमारी थीं और रिश्तेदार गायत्री देवी जयपुर की महारानी रहीं। यह शाही बैकग्राउंड उनके व्यक्तित्व को और खास बनाता है।

    रिश्ते और निजी जिंदगी

    90 के दशक में मुनमुन सेन का नाम सैफ अली खान के साथ जुड़ा, जिससे वो मीडिया की सुर्खियों में आईं। इसके अलावा उनका नाम प्रोड्यूसर रोमू सिप्पी और अभिनेता विक्टर बनर्जी के साथ भी जोड़ा गया। 1978 में उन्होंने भरत देव वर्मा से शादी की, जो त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी दो बेटियां, रायमा सेन और रिया सेन, आज इंडस्ट्री में जाना-पहचाना चेहरा हैं।

    फिल्मों से दूरी और अब की जिंदगी

    एक समय इंडस्ट्री में सक्रिय रहने वाली मुनमुन सेन अब कम ही फिल्मों में नजर आती हैं। वह कभी-कभी इवेंट्स, पेज-3 पार्टियों और सोशल अपीयरेंस में दिखाई देती हैं। इसके अलावा उन्हें पेंटिंग और एंटीक चीजों को कलेक्ट करने का शौक है।

    उन्होंने जादवपुर यूनिवर्सिटी से कंपेरेटिव लिटरेचर में मास्टर्स किया और अब एक बंगाली कुकबुक पर भी काम कर रही हैं। भले ही वह पर्दे से दूर हों, लेकिन उनका नाम आज भी फिल्म इंडस्ट्री में खास पहचान रखता है। मुनमुन सेन की कहानी फिल्मी करियर, प्यार और शाही विरासत का ऐसा संगम है, जो उन्हें एक अद्वितीय स्थान देती है।

  • जब शूटिंग बनी हकीकत 1988 की इस फिल्म में सचमुच चाकू लगने पर भी एक्टिंग करते रहे नाना पाटेकर

    जब शूटिंग बनी हकीकत 1988 की इस फिल्म में सचमुच चाकू लगने पर भी एक्टिंग करते रहे नाना पाटेकर


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि समय के साथ एक मिसाल बन जाती हैं। साल 1988 में रिलीज हुई सलाम बॉम्बे! ऐसी ही एक कल्ट क्लासिक फिल्म है जिसने न सिर्फ दर्शकों का दिल जीता बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। बेहद कम बजट में बनी इस फिल्म ने अपनी सशक्त कहानी और दमदार अभिनय के दम पर तीन राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए और ऑस्कर तक का सफर तय किया।

    इस फिल्म का निर्देशन मीरा नायर ने किया था और इसमें नाना पाटेकर रघुबीर यादव और बाल कलाकार शफीक सैयद जैसे कलाकार नजर आए थे। फिल्म का रनटाइम करीब 1 घंटा 35 मिनट था लेकिन इसकी कहानी और प्रभाव लंबे समय तक दर्शकों के दिलो दिमाग में बना रहा।

    इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो आज भी लोगों को हैरान कर देता है। दरअसल फिल्म के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग के दौरान एक खतरनाक हादसा हो गया था। सीन के मुताबिक शफीक सैयद का किरदार कृष्णा नाना पाटेकर के किरदार पर चाकू से हमला करता है। इस सीन को फिल्माने के लिए पूरी तैयारी की गई थी और सुरक्षा के तौर पर नाना पाटेकर के पेट पर टायर बांधा गया था ताकि चाकू उन्हें नुकसान न पहुंचा सके।

    लेकिन शूटिंग के दौरान एक छोटी सी चूक भारी पड़ गई। जब शफीक सैयद ने सीन के अनुसार चाकू मारा तो वह टायर को पार करते हुए सच में नाना पाटेकर के पेट में जा लगा। इससे उनके पेट से खून बहने लगा लेकिन हैरानी की बात यह रही कि नाना पाटेकर ने सीन को बीच में नहीं रोका और अभिनय जारी रखा। सेट पर मौजूद लोगों को लगा कि यह सब उनकी शानदार एक्टिंग का हिस्सा है और वे उनकी तारीफ करने लगे।

    कुछ देर बाद जब स्थिति स्पष्ट हुई तब सभी को एहसास हुआ कि यह कोई अभिनय नहीं बल्कि असली हादसा था। इसके बाद तुरंत उनका इलाज कराया गया। यह घटना नाना पाटेकर की प्रोफेशनलिज्म और अपने काम के प्रति समर्पण को दर्शाती है। फिल्म की बात करें तो करीब 20 लाख के बजट में बनी इस फिल्म ने लगभग 45 लाख की कमाई की थी और बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हुई थी। आज भी इसकी IMDb रेटिंग 7.9 के आसपास बनी हुई है जो इसकी गुणवत्ता को दर्शाती है।

    पुरस्कारों की बात करें तो सलाम बॉम्बे! ने 1989 में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। शफीक सैयद को बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला जबकि मीरा नायर को बेस्ट रीजनल फिल्म के लिए सम्मानित किया गया। इसके अलावा फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।इस फिल्म ने एक और बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। मदर इंडिया के बाद यह दूसरी भारतीय फिल्म बनी जिसे ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट किया गया।

    कुल मिलाकर सलाम बॉम्बे सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा अध्याय है जिसमें संघर्ष, यथार्थ और सिनेमा की ताकत का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। आज भी यह फिल्म और इससे जुड़ी कहानियां लोगों को उतना ही प्रभावित करती हैं जितना इसके रिलीज के समय करती थीं।