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  • सिंधिया परिवार के महासमझौते पर संकट, धोखाधड़ी के आरोपों के बीच आज तय होगी संपत्ति विवाद की अगली राह

    सिंधिया परिवार के महासमझौते पर संकट, धोखाधड़ी के आरोपों के बीच आज तय होगी संपत्ति विवाद की अगली राह


    ग्वालियर । ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार की करीब 41 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति के बंटवारे से जुड़े बहुचर्चित विवाद में बुधवार 14 अक्टूबर को अहम कानूनी मोड़ आ सकता है। लंबे समय से चल रहे इस मामले में परिवार के सदस्यों के बीच आपसी सहमति से तैयार किया गया समझौता प्रस्ताव एक बार फिर कानूनी अड़चनों में उलझ गया है। अतिरिक्त सत्र न्यायालय में बुधवार को अंतरिम आवेदन और आपत्ति आवेदन पर बहस होनी है। इस सुनवाई के बाद अदालत तय कर सकती है कि मामले को आगे किस प्रक्रिया के तहत बढ़ाया जाएगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुनवाई अंतरिम आवेदनों तक सीमित रहेगी या फिर प्रतिमा देवी की आपत्ति स्वीकार कर साक्ष्यों के आधार पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी।

    इस संपत्ति विवाद में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआ वसुंधरा राजे यशोधरा राजे तथा उषा राजे के बीच पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। लंबे विवाद के बाद दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से एक राजीनामा तैयार कर अदालत में पेश किया था। माना जा रहा था कि इस समझौते से वर्षों पुराने विवाद को खत्म करने का रास्ता साफ हो जाएगा। हालांकि दिवंगत पद्मावती राजे की बेटी प्रतिमा देवी राना की आपत्ति ने पूरे मामले को फिर से जटिल बना दिया है।

    प्रतिमा देवी ने अदालत में आरोप लगाया है कि उनसे धोखाधड़ी करके समझौता प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कराए गए। उनकी आपत्ति में ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित वसुंधरा राजे यशोधरा राजे और उषा राजे पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। प्रतिमा देवी का कहना है कि समझौते की प्रक्रिया में उनके साथ उचित व्यवहार नहीं हुआ। उन्होंने अदालत से मामले में दोबारा पक्षकार के रूप में शामिल होने और संपत्ति में अपने अधिकारों पर विचार करने की मांग की है।
    दूसरी ओर वसुंधरा राजे यशोधरा राजे और उषा राजे की ओर से अदालत में इन आरोपों का जवाब दिया गया है।

    उनके पक्ष का कहना है कि समझौते पर हस्ताक्षर आपसी सहमति से किए गए थे। हस्ताक्षर के बाद परिवार के सदस्य वहां रुके थे और साथ में पारिवारिक भोजन भी हुआ था। इसके बाद तस्वीरें भी ली गई थीं। ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से भी कहा गया है कि समझौते पर हस्ताक्षर सहमति से हुए थे और प्रक्रिया में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं की गई।

    मामले की जटिलता की एक बड़ी वजह यह भी है कि मूल मुकदमे में पद्मावती राजे की बेटियों कनिका देवी सिंह और प्रतिमा देवी राना को पक्षकार बनाया गया था। हालांकि पूर्व में अदालत की कार्यवाही के दौरान उपस्थित नहीं होने के कारण उन्हें एकपक्षीय घोषित कर दिया गया था। अब प्रतिमा देवी ने दोबारा प्रक्रिया में शामिल होने की मांग करते हुए मौजूदा समझौते पर सवाल उठाए हैं। चूंकि पद्मावती राजे भी संपत्ति में हिस्सेदार थीं इसलिए उनकी बेटियों के अधिकारों का सवाल समझौते की कानूनी वैधता के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गया है।

    सिंधिया राजघराने की देशभर में फैली अचल संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा यह विवाद अब निर्णायक प्रक्रिया की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस मामले में 78 साल पुराना विलय पत्र भी महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है। बुधवार की सुनवाई में अदालत का रुख तय करेगा कि समझौते को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया जारी रहेगी या आपत्तियों और साक्ष्यों पर विस्तृत सुनवाई की जरूरत होगी। हालांकि अंतिम फैसला अदालत की कार्यवाही और उपलब्ध दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही सामने आएगा।

  • ग्वालियर में 35 वर्षीय किसान की कुल्हाड़ी से हत्या, शव के पास मिला डॉट पेन, 3.32 लाख के हिसाब वाली पर्ची की जांच में जुटी पुलिस

    ग्वालियर में 35 वर्षीय किसान की कुल्हाड़ी से हत्या, शव के पास मिला डॉट पेन, 3.32 लाख के हिसाब वाली पर्ची की जांच में जुटी पुलिस


    ग्वालियर । मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक किसान की कुल्हाड़ी से हमला कर हत्या किए जाने का मामला सामने आया है। झांसी रोड थाना क्षेत्र के केदारपुर छोटी मढ़ैया में 35 वर्षीय किसान पुरुषोत्तम गुर्जर का शव बुधवार सुबह एक पड़ोसी के खेत में मिला। किसान के गले और सिर पर धारदार हथियार से गंभीर चोटों के निशान पाए गए हैं। घटनास्थल के पास एक डॉट पेन मिला है जबकि मृतक की जेब से 3.32 लाख रुपये के लेनदेन का हिसाब लिखी पर्ची बरामद हुई है। किसान का मोबाइल फोन भी मौके से गायब बताया जा रहा है। पुलिस इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए हत्या की जांच कर रही है।

    परिजनों के मुताबिक मंगलवार को पुरुषोत्तम की पत्नी एक रिश्तेदार के यहां शोक कार्यक्रम में शामिल होने गई थी। घर पर पुरुषोत्तम अपने दो बेटों और दो बेटियों के साथ था। मंगलवार देर रात उसके मोबाइल पर किसी का फोन आया। फोन पर बातचीत करने के बाद वह घर से बाहर निकल गया। इसके बाद वह वापस नहीं लौटा। परिवार के लोगों को उस समय अंदाजा नहीं था कि पुरुषोत्तम के साथ कोई अनहोनी हो सकती है। बुधवार सुबह जब उसका शव घर से करीब 300 मीटर दूर पड़ोसी के खेत में मिला तो इलाके में हड़कंप मच गया।

    घटना की सूचना मिलने पर झांसी रोड थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस के साथ फोरेंसिक टीम ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और जरूरी साक्ष्य जुटाए। शुरुआती जांच में सामने आया कि पुरुषोत्तम के गले पर कुल्हाड़ी के पांच और सिर पर एक गहरा घाव था। इन चोटों से आशंका जताई जा रही है कि उस पर धारदार हथियार से हमला किया गया। हालांकि हमले में कितने लोग शामिल थे और वारदात किस परिस्थिति में हुई इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

    पुलिस को मृतक की जेब से एक पर्ची मिली है जिस पर 1.32 लाख रुपये और 2 लाख रुपये के लेनदेन का हिसाब लिखा होने की जानकारी सामने आई है। दोनों रकम का कुल योग 3.32 लाख रुपये है। जांच अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि यह हिसाब किस व्यक्ति या कारोबार से जुड़ा था। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस लेनदेन का हत्या से कोई संबंध है या यह किसी अन्य मामले से जुड़ा दस्तावेज है। फिलहाल केवल पर्ची मिलने के आधार पर हत्या की वजह तय नहीं की गई है।

    घटनास्थल के पास डॉट पेन मिलने और पुरुषोत्तम का मोबाइल गायब होने से भी जांच के कई पहलू सामने आए हैं। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि पेन मृतक का था या किसी अन्य व्यक्ति का। वहीं मंगलवार देर रात आए फोन की जानकारी जुटाना भी अहम माना जा रहा है। मृतक के मोबाइल की उपलब्ध जानकारी और आखिरी बातचीत से घटना से पहले की परिस्थितियों को समझने में मदद मिल सकती है।

    मृतक के ससुर पूरन सिंह गुर्जर ने बताया कि पुरुषोत्तम का गांव या बाहर किसी से विवाद होने की जानकारी परिवार को नहीं थी। उन्होंने जमीन या संपत्ति को लेकर किसी झगड़े से भी इनकार किया। परिजनों का कहना है कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि हत्या किसने और क्यों की। उन्होंने पुलिस से आरोपियों की जल्द पहचान कर कार्रवाई करने की मांग की है।

    झांसी रोड थाने के सब इंस्पेक्टर आशीष शर्मा के मुताबिक पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। लेनदेन की पर्ची गायब मोबाइल फोन देर रात आया कॉल और घटनास्थल से मिले साक्ष्य जांच के अहम बिंदु हैं। पुलिस सभी संभावित पहलुओं की पड़ताल कर रही है। फिलहाल हत्या के पीछे की वजह और आरोपियों की पहचान स्पष्ट नहीं हुई है।

  • हेड कॉन्स्टेबल के ठिकानों पर सुबह 6 बजे लोकायुक्त का छापा, बंगले से लेकर जमीन और फर्मों तक जांच, करोड़ों के लेन-देन का पता चला

    हेड कॉन्स्टेबल के ठिकानों पर सुबह 6 बजे लोकायुक्त का छापा, बंगले से लेकर जमीन और फर्मों तक जांच, करोड़ों के लेन-देन का पता चला


    इंदौर । मध्य प्रदेश में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लोकायुक्त पुलिस ने इंदौर के पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में पदस्थ हेड कॉन्स्टेबल फिरोज खान के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। लोकायुक्त इंदौर और उज्जैन की संयुक्त टीम ने बुधवार सुबह करीब 6 बजे इंदौर और देवास में एक साथ 15 ठिकानों पर सर्चिंग शुरू की। शुरुआती जांच में हेड कॉन्स्टेबल के पास करीब 6.26 करोड़ रुपये की अनुपातहीन संपत्ति होने का अनुमान सामने आया है। लोकायुक्त के अनुसार यह संपत्ति उनकी आंकी गई आय से करीब 223 प्रतिशत अधिक है। फिलहाल टीम बैंक खातों निवेश संपत्तियों और कारोबार से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है।

    फिरोज खान वर्तमान में पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में ड्राइवर के पद पर पदस्थ हैं। इससे पहले वह देवास के औद्योगिक थाने और बागली में भी सेवाएं दे चुके हैं। उनकी करीब 20 साल की सरकारी सेवा बताई जा रही है। लोकायुक्त के मुताबिक वेतन के रूप में उनकी आय करीब 75 लाख रुपये आंकी गई है। अन्य स्रोतों से होने वाली आय को जोड़कर कुल आय लगभग 1.93 करोड़ रुपये मानी गई है। इसके मुकाबले शुरुआती जांच में 6.26 करोड़ रुपये की संपत्ति का अनुमान सामने आने के बाद मामले की विस्तृत पड़ताल की जा रही है।

    शिकायत में आरोप लगाया गया था कि फिरोज खान पुलिस विभाग में अपनी पदस्थापना का प्रभाव दिखाकर देवास क्षेत्र में विवादित जमीनों और प्लॉटों के मामलों में हस्तक्षेप करते थे। उन पर दूसरे लोगों के माध्यम से जमीनों का लेन-देन करने संपत्तियों में निवेश करने और परिवार के सदस्यों के अलावा एक परिचित महिला के नाम पर भी संपत्तियां खरीदने के आरोप हैं। शिकायत में कई वाहन रखने और लकड़ी के कारोबार से जुड़े होने की बात भी कही गई थी। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने और संबंधित साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगी।
    शिकायत में आरोप लगाया गया था कि फिरोज खान पुलिस विभाग में अपनी पदस्थापना का प्रभाव दिखाकर देवास क्षेत्र में विवादित जमीनों और प्लॉटों के मामलों में हस्तक्षेप करते थे। उन पर दूसरे लोगों के माध्यम से जमीनों का लेन-देन करने संपत्तियों में निवेश करने और परिवार के सदस्यों के अलावा एक परिचित महिला के नाम पर भी संपत्तियां खरीदने के आरोप हैं। शिकायत में कई वाहन रखने और लकड़ी के कारोबार से जुड़े होने की बात भी कही गई थी। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने और संबंधित साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट होगी।

    प्रारंभिक जांच में फिरोज खान की मां और पत्नी के नाम पर साहिल ट्रेडिंग नाम की फर्म होने की जानकारी सामने आई है। लोकायुक्त के अनुसार इस फर्म के खाते में करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ है। वहीं उनकी परिचित रोशनी वर्मा द्वारा रोशनी सेल्स एंड सर्विस नाम से फर्म संचालित किए जाने की जानकारी भी मिली है। जमीनों की खरीद में कथित भूमिका सामने आने के बाद रोशनी वर्मा को भी मामले में आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा रॉयल ग्रीन रियल एस्टेट नाम की फर्म के माध्यम से रियल एस्टेट में निवेश किए जाने की जानकारी की भी जांच की जा रही है।

    जांच में इंदौर जिले की सांवेर तहसील के ग्राम गुरान में करीब 21.75 बीघा कृषि भूमि से जुड़े सौदे का मामला भी सामने आया है। इस जमीन को लेकर शिकायतकर्ता के बेटे और उसके पिता के बीच विवाद बताया गया है। आरोप है कि इस विवाद का फायदा उठाकर फिरोज खान ने अपनी परिचित रोशनी वर्मा के नाम पर शिकायतकर्ता के पिता से कृषि भूमि का रजिस्टर्ड एग्रीमेंट करवाया। लोकायुक्त की टीम इस सौदे से संबंधित दस्तावेजों और भूमिका की पड़ताल कर रही है।

    कार्रवाई के दौरान देवास में 11 और इंदौर में चार ठिकानों की तलाशी ली जा रही है। इनमें मकान फ्लैट कृषि भूमि प्लॉट और व्यावसायिक संपत्तियां शामिल हैं। देवास के आदर्श नगर सहित कई कॉलोनियों में संपत्तियों की जांच की जा रही है। इंदौर के बाणगंगा क्षेत्र में रोशनी वर्मा के निवास के अलावा स्कीम नंबर 94 के मनोरमा अपार्टमेंट और श्रीनगर कॉलोनी के श्रीदेवी अपार्टमेंट स्थित फ्लैट भी जांच के दायरे में हैं। स्कीम नंबर 94 स्थित बड़े बंगले के निचले हिस्से को किराए पर दिए जाने और उससे आय मिलने की जानकारी भी जांच में शामिल है। वीआईपी नंबर 9000 वाली स्कॉर्पियो की भी पड़ताल की जा रही है।

    लोकायुक्त की टीम बैंक खातों फर्मों के वित्तीय लेन-देन निवेश और संपत्तियों के दस्तावेजों की जांच कर रही है। अधिकारियों के अनुसार तलाशी पूरी होने के बाद बरामद दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मामला जांच के अधीन है और शुरुआती आंकड़ों के आधार पर संपत्ति तथा आय के स्रोतों का मिलान किया जा रहा है।

  • शिवपुरी में दर्दनाक हादसा, खेत के तालाब में डूबा 14 वर्षीय देव, लापता होने की सूचना पर तलाश में जुटी पुलिस को मिला शव

    शिवपुरी में दर्दनाक हादसा, खेत के तालाब में डूबा 14 वर्षीय देव, लापता होने की सूचना पर तलाश में जुटी पुलिस को मिला शव


    शिवपुरी । मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक दर्दनाक हादसे में 14 वर्षीय बालक की तालाब में डूबने से मौत हो गई। घटना सिरसौद थाना क्षेत्र के सिरसौद गांव की है जहां बालक गांव के एक खेत में बने तालाब में नहाने के लिए गया था। नहाते समय वह तालाब के गहरे हिस्से में चला गया और पानी में डूब गया। काफी देर तक बालक के घर नहीं लौटने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। जब उसका कोई पता नहीं चला तो परिवार के लोग सिरसौद थाने पहुंचे और पुलिस को उसके लापता होने की सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने तलाश शुरू की और तालाब के पास से बालक का शव बरामद हुआ।
    जानकारी के अनुसार मृतक की पहचान देव नामदेव के रूप में हुई है। वह सिरसौद गांव निवासी प्रकाश नामदेव का बेटा था। मंगलवार को देव गांव के ही एक खेत में बने तालाब में नहाने पहुंचा था। बताया गया है कि नहाते समय वह धीरे-धीरे तालाब के गहरे हिस्से में चला गया। पानी की गहराई का अंदाजा नहीं लग पाने के कारण वह डूब गया। इस दौरान आसपास मौजूद लोगों को घटना की जानकारी नहीं मिल सकी और बालक की जान चली गई।
    दूसरी ओर जब देव काफी देर तक घर नहीं पहुंचा तो परिजन चिंतित हो गए। उन्होंने पहले आसपास के इलाकों और परिचितों के यहां उसकी तलाश की। लेकिन बालक का कहीं पता नहीं चलने पर परिवार के लोग सिरसौद पुलिस थाने पहुंचे। वहां उन्होंने देव के लापता होने की जानकारी पुलिस को दी। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए बालक की तलाश शुरू कर दी। पुलिसकर्मियों ने गांव में पूछताछ की और संभावित स्थानों पर खोजबीन की।
    तलाश के दौरान पुलिस खेत में बने तालाब के पास पहुंची। वहां किनारे पर देव के कपड़े मिले। कपड़े मिलने के बाद पुलिस को तालाब में उसके डूबने की आशंका हुई। इसके बाद पानी में तलाश की गई तो बालक का शव तालाब में उतराता हुआ मिला। पुलिस ने शव को बाहर निकलवाया और आवश्यक कानूनी कार्रवाई शुरू की। घटना की जानकारी मिलने के बाद परिजन भी मौके पर पहुंचे। बालक का शव देखकर परिवार में चीख-पुकार मच गई और गांव में शोक का माहौल बन गया।
    पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। घटना के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। कम उम्र में देव की मौत से परिजन सदमे में हैं। गांव के लोग भी इस हादसे से दुखी हैं।
    तालाब और अन्य जलस्रोतों में नहाने के दौरान सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। खासकर खेतों में बने तालाबों में पानी की वास्तविक गहराई का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे स्थानों पर नहाने से डूबने का खतरा बढ़ जाता है। शिवपुरी की यह घटना एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति बन गई है और ग्रामीण इलाकों में जलस्रोतों के आसपास सुरक्षा को लेकर सतर्कता की जरूरत भी सामने लाती है।
  • शिवपुरी के जंगलों में मां बलारी का रहस्यमयी दरबार, सुबह बालिका तो दोपहर में युवा रूप की मान्यता, नवरात्र में बढ़ी भक्तों की भीड़

    शिवपुरी के जंगलों में मां बलारी का रहस्यमयी दरबार, सुबह बालिका तो दोपहर में युवा रूप की मान्यता, नवरात्र में बढ़ी भक्तों की भीड़


    शिवपुरी । मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित माधव टाइगर रिजर्व अपनी प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। इसी रिजर्व की पूर्वी रेंज के घने जंगलों और खूबसूरत वादियों के बीच सदियों पुराना मां बलारी माता मंदिर स्थित है। यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ अपनी अनूठी लोक मान्यताओं के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की आवाजाही बढ़ गई है। दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु जंगल के रास्ते सफर कर मां के दरबार में पहुंच रहे हैं और पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
    मां बलारी मंदिर की सबसे खास मान्यता देवी के बदलते स्वरूप से जुड़ी हुई है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार मां का मुखमंडल 24 घंटे के भीतर तीन बार आंशिक रूप से बदलता है। कहा जाता है कि सुबह देवी बाल रूप में दर्शन देती हैं जबकि दोपहर में उनका स्वरूप युवा दिखाई देता है। वहीं रात के समय वृद्ध स्वरूप की मान्यता है। इसी अनूठी मान्यता के चलते मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा और आकर्षण बना हुआ है। नवरात्र के पावन अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त यहां पहुंचकर माता के दर्शन करने को उत्सुक हैं।
    मंदिर तक पहुंचने का रास्ता भी श्रद्धालुओं के लिए एक अलग अनुभव लेकर आता है। शिवपुरी शहर से मंदिर की दूरी करीब 25 किलोमीटर बताई गई है। यहां पहुंचने के लिए यात्रियों को कुछ दूरी कच्चे रास्ते पर तय करनी पड़ती है। इसके बाद करीब 7.4 किलोमीटर का मार्ग माधव टाइगर रिजर्व के जंगल से होकर गुजरता है। घने पेड़ों और प्राकृतिक हरियाली के बीच से गुजरने वाला यह रास्ता जहां प्रकृति के करीब होने का अनुभव देता है वहीं वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण सावधानी बरतना भी जरूरी है।
    नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा और वन क्षेत्र की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने विशेष व्यवस्था की है। दी गई जानकारी के अनुसार इस अवधि में भक्तों को अपने वाहनों से मंदिर तक जाने की अनुमति दी गई है। हालांकि जंगल में प्रवेश के लिए चेकपोस्ट पर वाहनों की एंट्री अनिवार्य रखी गई है। इससे वन क्षेत्र में आने-जाने वाले वाहनों पर नजर रखी जा सके और श्रद्धालुओं की आवाजाही व्यवस्थित बनी रहे।
    जंगल के रास्ते पर सुरक्षा नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। वन विभाग ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे रास्ते में अनावश्यक रूप से न रुकें और समूह में आगे बढ़ें। इसके साथ ही डीजे बजाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। जंगल में तेज आवाज और लापरवाही वन्यजीवों के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। ऐसे में श्रद्धालुओं से धार्मिक यात्रा के दौरान शांति और अनुशासन बनाए रखने की अपेक्षा की जा रही है।
    मां बलारी मंदिर धार्मिक आस्था और प्राकृतिक वातावरण का अनूठा संगम है। एक ओर यहां देवी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ पहुंच रही है तो दूसरी ओर माधव टाइगर रिजर्व की हरियाली इस स्थान को विशेष बनाती है। नवरात्र में मंदिर आने वाले भक्तों के लिए जरूरी है कि वे आस्था के साथ वन विभाग के नियमों का भी पालन करें। इससे धार्मिक परंपरा के साथ जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
  • नीति टेलर का चौंकाने वाला खुलासा, फिल्म के बदले डायरेक्टर ने की गलत मांग, मां को फोन कर बयां किया दर्द

    नीति टेलर का चौंकाने वाला खुलासा, फिल्म के बदले डायरेक्टर ने की गलत मांग, मां को फोन कर बयां किया दर्द


    नई दिल्ली । टीवी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाली एक्ट्रेस नीति टेलर ने अपने करियर से जुड़े एक परेशान करने वाले अनुभव का खुलासा किया है। अभिनेत्री ने बताया कि तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के दौरान उन्हें कास्टिंग काउच जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। उनके मुताबिक एक फिल्म के डायरेक्टर ने अगली फिल्म में काम देने के बदले उनसे अपने साथ सोने की मांग की थी। इस बात को सुनकर नीति हैरान रह गईं और उन्हें समझ नहीं आया कि उस समय किस तरह प्रतिक्रिया दें। आखिरकार उन्होंने फोन काट दिया और डायरेक्टर का नंबर ब्लॉक कर दिया। इस घटना ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाने का फैसला कर लिया।
    नीति टेलर ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि जिस डायरेक्टर के साथ उन्होंने पहले काम किया था उसी ने उन्हें अपनी अगली फिल्म के लिए फोन किया। बातचीत के दौरान डायरेक्टर ने कथित तौर पर उनसे कहा कि इस बार फिल्म में काम करने के लिए उन्हें उसके साथ सोना होगा। नीति के लिए यह बात बेहद चौंकाने वाली थी। उन्होंने बताया कि ऐसी स्थिति में इंसान अचानक सन्न रह जाता है और उसे समझ नहीं आता कि क्या जवाब दिया जाए। उन्होंने बिना किसी बहस के फोन काट दिया और उस व्यक्ति का नंबर ब्लॉक कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी मां को फोन किया और उन्हें इस घटना के बारे में बताया।
    अभिनेत्री के अनुसार इस अनुभव ने उनके मन पर गहरा असर डाला। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से कुछ ऐसी बातें नजर आई थीं जिनसे उन्हें संदेह हुआ था कि संबंधित डायरेक्टर दूसरी अभिनेत्रियों के साथ भी इस तरह का व्यवहार करने की कोशिश करता था। हालांकि उन्हें यह समझ नहीं आया कि वह उनके साथ ऐसी मांग करने की स्थिति तक कब पहुंच गया। नीति ने बताया कि उस समय वह इतनी हैरान और परेशान थीं कि उन्होंने इस घटना के बारे में किसी और को बताना भी उचित नहीं समझा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने संबंधित डायरेक्टर का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।
    इस घटना के बाद नीति ने फिल्मों में काम नहीं करने का फैसला लिया। उनके खुलासे से यह बात सामने आती है कि मनोरंजन जगत में काम करने के अवसर तलाश रहे कलाकारों के लिए अनुचित मांगों का सामना करना कितना मुश्किल हो सकता है। किसी कलाकार के लिए फिल्म में भूमिका पाने की उम्मीद के बीच इस तरह की स्थिति मानसिक तनाव और असुरक्षा पैदा कर सकती है। नीति के मुताबिक उस अनुभव ने उनके फिल्मी करियर को लेकर सोच बदल दी और उन्होंने टेलीविजन के काम पर अधिक ध्यान दिया।
    नीति टेलर ने वर्ष 2012 में तेलुगू फिल्म मेम वयसुकू वाचम से फिल्मों में कदम रखा था। इस फिल्म का निर्देशन त्रिनाध राव नक्किना ने किया था और इसमें तनिष उनके साथ नजर आए थे। फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर अच्छा रिस्पॉन्स मिला था। इसके बाद वर्ष 2014 में वह लव डॉट कॉम में दिखाई दीं। इस फिल्म का निर्देशन राजा वन्नेम रेड्डी ने किया था। हालांकि फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं मिली।
    नीति ने कम उम्र में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। उन्होंने टीवी शो प्यार का बंधन में काम किया और बाद में कैसी ये यारियां से काफी लोकप्रियता हासिल की। इसके अलावा वह बड़े अच्छे लगते हैं 2 और झलक दिखला जा जैसे कार्यक्रमों का हिस्सा भी रहीं। हाल के वर्षों में भी वह मनोरंजन जगत में सक्रिय रही हैं। उनका यह खुलासा एक बार फिर फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों की सुरक्षा और कार्यस्थल पर सम्मानजनक व्यवहार की जरूरत को चर्चा में ले आया है।
  • रातोंरात मिली शोहरत ने रजनीकांत को पहुंचाया अस्पताल, फिर फिल्मों से बनाई दूरी, शादी कर बदली जिंदगी

    रातोंरात मिली शोहरत ने रजनीकांत को पहुंचाया अस्पताल, फिर फिल्मों से बनाई दूरी, शादी कर बदली जिंदगी


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा में सुपरस्टार का दर्जा हासिल करने वाले रजनीकांत की जिंदगी जितनी शानदार दिखाई देती है उसके पीछे संघर्ष और दबाव की एक लंबी कहानी भी है। आज करोड़ों प्रशंसकों के दिलों पर राज करने वाले रजनीकांत ने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1975 में फिल्म अपूर्व रागंगल से की थी। उनका फिल्मी दुनिया से कोई पारिवारिक जुड़ाव नहीं था। उन्होंने अपनी मेहनत और अभिनय के दम पर पहचान बनाई और देखते ही देखते इंडस्ट्री के बड़े सितारों में शामिल हो गए। हालांकि तेजी से मिली सफलता और स्टारडम को संभालना उनके लिए आसान नहीं रहा। एक समय ऐसा भी आया जब काम के अत्यधिक दबाव ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया।
    करियर के शुरुआती दौर में रजनीकांत ने सफलता हासिल करने के लिए दिन-रात मेहनत की। उस समय वह एक साल में 10 से 15 फिल्मों तक में काम कर रहे थे। लगातार शूटिंग और व्यस्त कार्यक्रम के बीच उन्हें आराम करने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था। वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे और इसके लिए लगातार काम कर रहे थे। लेकिन इतनी कम उम्र में मिली शोहरत और बड़ी जिम्मेदारियों का दबाव धीरे-धीरे बढ़ता गया। एक ओर उनका करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था तो दूसरी ओर उनके लिए इस नई जिंदगी के साथ तालमेल बैठाना मुश्किल होता जा रहा था।
    रजनीकांत ने खुद एक इंटरव्यू में इस दौर के बारे में खुलकर बात की थी। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1988 में इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह स्टारडम का दबाव झेल नहीं पाए थे। उन्होंने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा था कि कुछ साल पहले तक वह बस कंडक्टर के तौर पर 320 रुपये कमाते थे और फिर अचानक एक फिल्म के लिए उन्हें पांच लाख रुपये मिलने लगे। कम समय में जिंदगी में आया यह बड़ा बदलाव उनके लिए आसान नहीं था। पैसा शोहरत और लगातार काम के दबाव ने उन्हें मानसिक रूप से बेहद परेशान कर दिया था।
    रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1981 में मानसिक दबाव के कारण उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह घटना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इस अनुभव ने उन्हें अपनी व्यस्त दिनचर्या और काम करने के तरीके पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया। उन्होंने महसूस किया कि सफलता हासिल करने के साथ-साथ अपनी सेहत और निजी जिंदगी पर ध्यान देना भी जरूरी है।
    अस्पताल में भर्ती होने के बाद रजनीकांत ने अपने काम करने के तरीके में बदलाव करना शुरू किया। उन्होंने पहले की तुलना में कम फिल्में करनी शुरू कर दीं ताकि काम का दबाव कम हो सके। इसके साथ ही उनकी निजी जिंदगी में भी बड़ा बदलाव आया। कुछ समय बाद उन्होंने लता रंगाचारी से शादी कर घर बसाया। दोनों की पहली मुलाकात एक इंटरव्यू के दौरान हुई थी। लता अपनी कॉलेज मैगजीन के लिए रजनीकांत का इंटरव्यू लेने पहुंची थीं। यह मुलाकात आगे चलकर रिश्ते में बदल गई।
    फिल्मों की संख्या कम करने के बावजूद रजनीकांत की लोकप्रियता पर कोई खास असर नहीं पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1980 के आसपास वह एक फिल्म के लिए करीब 25 लाख रुपये तक फीस लेने लगे थे। यह उस समय के लिहाज से बड़ी रकम थी। उनकी कहानी बताती है कि तेजी से मिलने वाली सफलता के साथ जिम्मेदारियां और दबाव भी बढ़ सकते हैं। रजनीकांत ने अपने अनुभव से काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने की जरूरत को समझा और अपनी जिंदगी की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किए।
  • एक साल जेल में रहने के बाद अमृतप्रभा महंत को मिली राहत, जुबीन गर्ग मौत मामले में जमानत पर रिहा होने वाली पहली आरोपी

    एक साल जेल में रहने के बाद अमृतप्रभा महंत को मिली राहत, जुबीन गर्ग मौत मामले में जमानत पर रिहा होने वाली पहली आरोपी


    नई दिल्ली । असम के मशहूर गायक जुबीन गर्ग की मौत के मामले में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। इस मामले में आरोपी सिंगर अमृतप्रभा महंत को जेल से रिहा कर दिया गया है। मंगलवार को आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद वह हाफलोंग सब-जेल से बाहर आईं। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी और अदालत के आदेश के चार दिन बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी। इस घटनाक्रम को जुबीन गर्ग की मौत से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ माना जा रहा है।
    अमृतप्रभा महंत पिछले करीब एक साल से जेल में बंद थीं। गुवाहाटी हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद उनकी रिहाई का रास्ता साफ हुआ। अदालत ने उन्हें बॉन्ड पर रिहा करने का आदेश दिया था। इसके बाद जेल प्रशासन ने निर्धारित प्रक्रिया पूरी की और उन्हें रिहा कर दिया। इस मामले में मुख्य केस में जमानत पाने वाली अमृतप्रभा पहली आरोपी बताई जा रही हैं। उनकी रिहाई के बाद अब मामले की जांच और आगे की कानूनी कार्यवाही पर भी लोगों की नजर रहेगी।
    जुबीन गर्ग असम के लोकप्रिय गायकों में शामिल थे और उनकी मौत की खबर ने संगीत जगत के साथ-साथ उनके प्रशंसकों को भी झकझोर दिया था। उनकी मौत से जुड़े मामले में जांच और कानूनी प्रक्रिया लगातार चर्चा में रही है। इस प्रकरण में अमृतप्रभा महंत का नाम आरोपी के रूप में सामने आया था और इसके बाद उन्हें जेल में रहना पड़ा। अब हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद वह जेल से बाहर आ गई हैं। हालांकि जमानत पर रिहाई का अर्थ मामले से पूरी तरह बरी होना नहीं है। उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया अपने निर्धारित तरीके से आगे बढ़ सकती है।
    अदालत से जमानत मिलने के बाद आरोपी को तय शर्तों का पालन करना होता है। बॉन्ड पर रिहाई भी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए अमृतप्रभा महंत की रिहाई को मामले में अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अदालत में आगे होने वाली सुनवाई और जांच से जुड़े तथ्यों के आधार पर ही प्रकरण की दिशा स्पष्ट होगी। फिलहाल इस मामले में उनकी जेल से रिहाई सबसे प्रमुख घटनाक्रम बनकर सामने आई है।
    जुबीन गर्ग की मौत के मामले में उनके प्रशंसक और असम के लोग लंबे समय से जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर नजर बनाए हुए हैं। अमृतप्रभा महंत को मिली जमानत ने इस मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। आने वाले समय में अदालत की कार्यवाही और जांच से जुड़े अपडेट अहम रहेंगे।
  • गुटखा और तंबाकू बेचने वालों के लिए बड़ी खबर, उत्तराखंड में 13 अक्टूबर से एक साल तक लागू रहेगा प्रतिबंध

    गुटखा और तंबाकू बेचने वालों के लिए बड़ी खबर, उत्तराखंड में 13 अक्टूबर से एक साल तक लागू रहेगा प्रतिबंध


    नई दिल्ली । उत्तराखंड में गुटखा पान मसाला और तंबाकू से जुड़े उत्पादों को लेकर राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सरकार ने राज्य में तंबाकू और निकोटिन युक्त गुटखा पान मसाला तथा अन्य खाद्य पदार्थों के निर्माण भंडारण वितरण और बिक्री पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश 13 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो गया है और अगले एक साल तक लागू रहेगा। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य लोगों को तंबाकू और निकोटिन के हानिकारक प्रभावों से बचाना तथा खाद्य पदार्थों में प्रतिबंधित तत्वों के इस्तेमाल पर रोक लगाना है। इस आदेश के बाद राज्य में इन उत्पादों के कारोबार से जुड़े लोगों और उपभोक्ताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है।
    खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन उत्तराखंड के आयुक्त विनय शंकर पांडेय ने मंगलवार को इस संबंध में आदेश जारी किया। सरकार ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 की धारा 26 के साथ धारा 92 और धारा 30 की उपधारा 2 के तहत प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह कदम उठाया है। आदेश के मुताबिक राज्य में किसी भी नाम से बिकने वाले ऐसे खाद्य उत्पादों पर प्रतिबंध रहेगा जिनमें तंबाकू या निकोटिन का इस्तेमाल किया गया हो। इसमें इनके उत्पादन से लेकर भंडारण वितरण और बिक्री तक की गतिविधियां शामिल हैं। यह पाबंदी पूरे उत्तराखंड में लागू होगी।
    सरकार के इस फैसले के पीछे खाद्य सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना भी एक अहम वजह है। खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम 2011 के विनियम 2.3.4 के तहत किसी भी खाद्य पदार्थ में संघटक के रूप में तंबाकू और निकोटिन के इस्तेमाल पर रोक है। इसके बावजूद गुटखा और पान मसाला जैसे उत्पादों में इन पदार्थों के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने एक साल के लिए प्रतिबंध लागू करने का निर्णय लिया है। तंबाकू और निकोटिन का सेवन मुंह और गले के कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है। ऐसे में इनके इस्तेमाल को नियंत्रित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
    उत्तराखंड में इस तरह की पाबंदी पहली बार नहीं लगाई गई है। इससे पहले वर्ष 2013 में भी राज्य सरकार ने गुटखा और इससे जुड़े उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद 2015 और 2019 में भी आदेश जारी कर पाबंदियों को आगे बढ़ाया गया। इसके बावजूद बाजार में ऐसे उत्पादों की उपलब्धता और इस्तेमाल को लेकर सवाल उठते रहे। अब सरकार ने एक बार फिर एक साल की अवधि के लिए प्रतिबंध लागू किया है। इस बार आदेश में निर्माण और बिक्री के साथ भंडारण तथा वितरण को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। इससे प्रतिबंध के दायरे को व्यापक बनाने की कोशिश की गई है।
    इस फैसले का प्रभाव दुकानदारों वितरकों और इन उत्पादों से जुड़े कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। प्रतिबंध के दौरान संबंधित उत्पादों का कारोबार करने वालों को सरकारी आदेश का पालन करना होगा। वहीं उपभोक्ताओं के लिए भी यह जरूरी होगा कि वे प्रतिबंधित खाद्य उत्पादों की खरीद और बिक्री से बचें। हालांकि किसी भी प्रतिबंध की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी पर निर्भर करती है। पहले भी पाबंदियां लागू होने के बावजूद उत्पादों के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस बार नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए किस तरह की निगरानी व्यवस्था अपनाता है।
    उत्तराखंड सरकार का यह कदम तंबाकू और निकोटिन से जुड़े खाद्य उत्पादों के खिलाफ नियंत्रण को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया फैसला है। एक साल तक लागू रहने वाली इस पाबंदी का उद्देश्य लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करना और खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। अब इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री और वितरण पर कितनी सख्ती से निगरानी रखी जाती है और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
  • संविधान में सेकुलर व्यवस्था और धार्मिक आजादी, फिर हिजाब पहनने पर स्कूलों में रोक क्यों, अजरबैजान में उठे बड़े सवाल

    संविधान में सेकुलर व्यवस्था और धार्मिक आजादी, फिर हिजाब पहनने पर स्कूलों में रोक क्यों, अजरबैजान में उठे बड़े सवाल


    नई दिल्ली । करीब 96 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान में स्कूलों के ड्रेस कोड को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकार के नए नियम लागू होने के बाद हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। इसके विरोध में छात्राओं ने प्रदर्शन किए और कई जगहों पर दूसरी छात्राओं ने भी उनका समर्थन करते हुए कक्षाओं का बहिष्कार किया। मामला अब केवल स्कूल यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं रहा बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता शिक्षा के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की सीमाओं पर बहस शुरू हो गई है। इस घटनाक्रम ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है कि मुस्लिम बहुल देश में धार्मिक पहनावे को लेकर सरकार और विद्यार्थियों के बीच टकराव क्यों पैदा हुआनई दिल्ली ।
    अजरबैजान की आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लाम को मानता है और देश में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं। इसके बावजूद वहां की संवैधानिक व्यवस्था धर्म और राज्य को अलग रखने के सिद्धांत पर आधारित है। संविधान के अनुच्छेद 7 में देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बताया गया है जबकि अनुच्छेद 18 धर्म को राज्य से अलग रखने और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष बनाने की बात करता है। दूसरी ओर संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। इसी वजह से स्कूलों में हिजाब को लेकर उठे सवाल ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि शिक्षा व्यवस्था में समान नियम लागू करने और व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
    विवाद की प्रमुख वजह 21 सितंबर को अजरबैजान की कैबिनेट की ओर से पारित प्रस्ताव को माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए निर्धारित वर्दी के नियमों को लागू करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप एक समान ड्रेस कोड बनाए रखना बताया गया। आदेश में हिजाब पर सीधे प्रतिबंध लगाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग अतिरिक्त कपड़ों को लेकर नियम सख्त किए गए। कई स्कूलों में इन नियमों की व्याख्या इस तरह की गई कि हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि अजरबैजान में आम नागरिकों के हिजाब पहनने पर देशव्यापी प्रतिबंध की बात नहीं कही गई है। विवाद मुख्य रूप से स्कूलों की वर्दी और उसके क्रियान्वयन को लेकर है।
    मामला केवल छात्राओं तक सीमित नहीं रहा। 6 अक्टूबर को शिक्षकों के लिए भी अलग ड्रेस कोड से जुड़े नियम स्वीकृत किए गए। इसके बाद हिजाब पहनने वाली महिला शिक्षकों पर भी सिर ढकने वाला कपड़ा हटाने का दबाव बनाए जाने की खबरें सामने आईं। शिक्षिका जहरा हसनोवा ने कहा कि हिजाब पहनना उनका व्यक्तिगत चुनाव है और इसे जबरन हटाने का दबाव उनके लिए भावनात्मक विषय है। कुछ स्कूलों में छात्राओं को प्रवेश से रोके जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए। इन घटनाओं के बाद छात्राओं और उनके समर्थकों ने विरोध दर्ज कराया। बाकू और मसल्ली जिले में कुछ विद्यार्थियों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और सड़क पर पढ़ाई करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि धार्मिक पहनावा शिक्षा हासिल करने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
    विरोध के बीच प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाया। अजरबैजान के गृह मंत्रालय ने 12 अक्टूबर को बताया कि स्कूल यूनिफॉर्म से जुड़े नियमों को लागू करने के दौरान 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया। अधिकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों ने शिक्षा कर्मचारियों के साथ टकराव किया और स्कूलों तथा यातायात के सामान्य संचालन में बाधा पहुंचाई। वहीं विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कक्षाओं से बाहर रखना उनके शिक्षा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है। ऐसे में विवाद के दोनों पक्षों को समझना जरूरी है। एक ओर सरकार समान ड्रेस कोड और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की व्यवस्था बनाए रखने की बात करती है तो दूसरी ओर छात्राएं अपने धार्मिक विश्वास के अनुरूप कपड़े पहनने की स्वतंत्रता की मांग कर रही हैं।
    अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब को लेकर विवाद पहली बार नहीं उठा है। दिसंबर 2010 में भी स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों के आधार पर हिजाब पर रोक लगाने की कोशिश के बाद विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय भी धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के बीच टकराव सामने आया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या होना चाहिए और स्कूलों में उसकी व्याख्या किस तरह की जाए। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार नियमों को किस तरह लागू करती है और क्या ऐसा रास्ता निकलता है जिसमें शिक्षा व्यवस्था के अनुशासन के साथ छात्राओं के संवैधानिक अधिकारों का भी सम्मान हो सके।