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  • मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने उज्जैन में वाल्मीकि धाम आश्रम में किया छड़ी-पूजन

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने उज्जैन में वाल्मीकि धाम आश्रम में किया छड़ी-पूजन


    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शनिवार सुबह उज्जैन स्थित श्री वाल्मीकि धाम सिद्धपीठ (आश्रम) पहुंचे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने आश्रम में अनंत श्री विभूषित 1008 स्वामी सोहनदास जी की समाधि और प्रतिमा पर पुष्पांजलि के साथ दर्शन-पूजन कर प्रदेश की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने वाल्मीकि धाम आए जाहरवीर गोगादेव के निशान ध्वज का भी विधि-विधान से छड़ी-पूजन किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने राज्यसभा सदस्य एवं बालयोगी संत उमेशनाथ महाराज से भेंट कर उनका शुभाशीष भी प्राप्त किया। विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा, संजय अग्रवाल, उज्जैन विकास प्राधिकरण उपाध्यक्ष मुकेश यादव सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण भी उपस्थित थे।

    मीडिया प्रतिनिधियों से की चर्चा
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने श्री वाल्मीकि धाम सिद्धपीठ आश्रम में दर्शन-पूजन के बाद कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। वर्तमान समय में यह जरूरी है कि हम साधु-संतों के आशीर्वाद से अपने अतीत के गौरव को पुनः स्थापित करें। उन्होंने कहा कि राज्यसभा सदस्य महंत उमेश नाथ महाराज ने अनेक वर्षों से उज्जैन के वाल्मीकि धाम आश्रम को चैतन्य बनाया है। वाल्मीकि जी के आदर्श और कार्यों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए बाबा जाहरवीर गोगा महाराज ने अपना सर्वस्व नौछावर कर दिया।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि यह हम सबके लिए सौभाग्य का विषय है कि बाबा महाकाल की नगरी में बाबा गोगा महाराज के ध्वज चिह्न निकलेंगे। इससे सामाजिक समरसता और एकात्मता का अद्भुत संदेश देशभर में पहुंचेगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सभी प्रदेशवासियों को भुजरिया पर्व, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और गोगा नवमी की भी शुभकामनाएं दीं।

  • 'टॉक्सिक' में यश-कियारा के इंटीमेट सीन चर्चा में, कैसे शूट किए जाते हैं ऐसे दृश्य

    'टॉक्सिक' में यश-कियारा के इंटीमेट सीन चर्चा में, कैसे शूट किए जाते हैं ऐसे दृश्य


    मुंबई।
    दक्षिण भारतीय अभिनेता यश की फिल्म ‘टॉक्सिक’ रिलीज के बाद दर्शकों और समीक्षकों के बीच चर्चा में है। फिल्म को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाओं के बीच यश और कियारा आडवाणी के इंटीमेट सीन सोशल मीडिया पर खास चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन दृश्यों को लेकर कियारा को ट्रोलिंग का भी सामना करना पड़ा है।

    इंटीमेट दृश्यों को लेकर अक्सर दर्शकों के मन में सवाल रहता है कि फिल्मों में ऐसे सीन किस तरह फिल्माए जाते हैं और कैमरे पर दिखाई देने वाला दृश्य वास्तविक होता है या तकनीक और शूटिंग के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है।

    पहले से तय होती है पूरी शूटिंग

    फिल्मों में इंटीमेट सीन की शूटिंग आमतौर पर पहले से तय योजना के अनुसार की जाती है। निर्देशक और कलाकार पहले यह तय करते हैं कि दृश्य में किस तरह की गतिविधि होगी, कलाकारों के बीच कितना संपर्क होगा और कैमरे का एंगल क्या रखा जाएगा।

    दृश्य को प्रभावी बनाने के लिए चेहरे, हाथ और कंधे जैसे हिस्सों के अलग-अलग क्लोज-अप भी शूट किए जा सकते हैं। बाद में एडिटिंग के जरिए इन्हें जोड़कर अंतिम दृश्य तैयार किया जाता है।

    जरूरत पड़ने पर बॉडी डबल का इस्तेमाल

    कुछ परिस्थितियों में कलाकारों की जगह बॉडी डबल का इस्तेमाल भी किया जाता है। शूटिंग के दौरान कलाकारों की निजता और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। कई बार त्वचा के रंग जैसे दिखने वाले कवर या परिधान का इस्तेमाल भी किया जाता है, ताकि अनावश्यक एक्सपोजर से बचा जा सके।

    इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर की भूमिका

    फिल्म इंडस्ट्री में अब इंटीमेट दृश्यों की शूटिंग के दौरान इंटीमेसी कोऑर्डिनेटर की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। कलाकारों की सहमति और सहजता को ध्यान में रखते हुए दृश्य की कोरियोग्राफी तैयार की जाती है। शूटिंग से पहले कलाकारों को बताया जाता है कि सीन किस तरह फिल्माया जाएगा और उनकी सहमति के आधार पर इसे शूट किया जाता है।

    यश ने इंटीमेट सीन को लेकर क्या कहा था?

    यश ने ‘आप की अदालत’ कार्यक्रम में इंटीमेट दृश्यों को लेकर अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि कभी-कभी किसी फिल्म के लिए कलाकार को अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना पड़ता है। उनके मुताबिक फिल्म की कहानी के लिए ये दृश्य जरूरी थे और उनके लिए भी इन्हें करना आसान नहीं था।

    जब यश से उनकी पत्नी की प्रतिक्रिया के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी जानती हैं कि वह एक अभिनेता हैं और अपना काम कर रहे हैं। यश ने यह भी कहा था कि उनकी पत्नी को उन पर भरोसा है।

    फिल्म ‘टॉक्सिक’ में यश और कियारा आडवाणी की जोड़ी के इन दृश्यों को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा हो रही है। हालांकि, किसी भी फिल्म में ऐसे दृश्यों को अंतिम रूप देने में अभिनय के साथ-साथ कैमरा एंगल, कोरियोग्राफी, एडिटिंग और कलाकारों की सहमति जैसे कई पहलुओं की भूमिका होती है।

  • हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने के साथ ग्लेशियल झीलों का विस्तार और उनसे जुड़े संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ रही है। वर्ष 2026 में सामने आए उपग्रह आधारित अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में ग्लेशियर झीलों के कुल क्षेत्रफल में वर्ष 2016-17 के बाद से 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलें ऐसी पाई गई हैं, जिनके आकार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इनमें 130 झीलें भारत में स्थित हैं।

    अध्ययन के अनुसार भारत में विस्तार वाली इन झीलों में 65 सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियल झीलों का विस्तार इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि कुछ झीलें बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित होती हैं। ऐसे बांध टूटने की स्थिति में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आने से बाढ़ और तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।

    उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियर झीलें

    नए उपग्रह अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। वर्ष 2016-17 के मुकाबले इनके कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि सामने आई है।

    अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों के विस्तार को विशेष रूप से उल्लेखनीय पाया गया है। इस क्षेत्र में अकेले झीलों का क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।

    ग्लेशियल झीलें आम तौर पर ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने से बनती हैं। इनमें से कई झीलें प्राकृतिक रूप से बर्फ, चट्टान या मलबे से बने बांधों से घिरी होती हैं।

    इसरो के पुराने आंकड़े भी दे रहे चेतावनी

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित पुराने अध्ययन में भी भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार की तस्वीर सामने आ चुकी है।

    इसरो ने 1984 से अब तक के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया था। इनमें से 676 झीलों के आकार में 1984 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

    इन 676 झीलों में 130 भारत में स्थित थीं। अध्ययन के अनुसार इनमें से 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो चुका था। यह बदलाव हिमालयी क्षेत्र में जलवायु और ग्लेशियरों में हो रहे परिवर्तन से जुड़े संभावित जोखिम की ओर संकेत करता है।

    26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों पर नजर

    इसरो मानसून के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार निगरानी कर रहा है। इसके तहत एनएचपीसी की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियल झीलों की निगरानी की जा रही है।

    उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से झीलों के आकार, जलस्तर और आसपास के भूगर्भीय बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलती है। इससे संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

    ग्लेशियर झीलों के साथ भूस्खलन का खतरा भी

    हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार के साथ भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा हुआ है। भारी बारिश, चट्टानों का खिसकना और पहाड़ी ढलानों में होने वाले बदलाव कई बार ग्लेशियल झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

    इसरो के उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार हिमालयी पर्वत श्रृंखला में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

    ग्लेशियर झीलों का बढ़ता विस्तार, प्राकृतिक बांधों की अस्थिरता और भूस्खलन का मेल हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ-साथ जलविद्युत परियोजनाओं और निचले इलाकों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, समय पर चेतावनी और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी को और मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • भारत की 7 ऐसी जगहें जहां जहां आज भी आम पर्यटक नहीं कर सकते मनमानी

    भारत की 7 ऐसी जगहें जहां जहां आज भी आम पर्यटक नहीं कर सकते मनमानी


    नई दिल्ली।
    भारत में घूमने के लिए एक से बढ़कर एक पर्यटन स्थल हैं, लेकिन कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां आम पर्यटक अपनी मर्जी से प्रवेश नहीं कर सकते। कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है तो कहीं दुर्लभ आदिवासी समुदायों और पर्यावरण की सुरक्षा के कारण आवाजाही सीमित है। कुछ स्थानों पर विशेष अनुमति के बाद ही पहुंच संभव है, जबकि कुछ इलाकों में आम लोगों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है।

    आइए जानते हैं देश की ऐसी ही सात जगहों के बारे में, जहां घूमने के लिए सामान्य पर्यटन स्थलों जैसी आजादी नहीं है।

    1. बैरन आइलैंड, अंडमान और निकोबार

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का बैरन आइलैंड भारत के एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी के लिए जाना जाता है। यहां पर्यटक नाव से ज्वालामुखी और द्वीप का नजारा देख सकते हैं, लेकिन आम तौर पर द्वीप पर उतरने की अनुमति नहीं है।

    गृह मंत्रालय ने भी बैरन आइलैंड को प्रतिबंधित पर्यटन स्थलों की सूची में रखा है। इसलिए यहां घूमने का अनुभव समुद्र से ज्वालामुखी को देखने तक सीमित रहता है।

    2. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई

    मुंबई के ट्रॉम्बे में स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) देश की प्रमुख परमाणु अनुसंधान संस्थाओं में शामिल है। यह सामान्य पर्यटन स्थल नहीं है और यहां सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी है।

    केंद्र के आधिकारिक दस्तावेजों में परिसर में प्रवेश के लिए अधिकृत कर्मियों और कर्मचारियों के लिए पास तथा अनुमति संबंधी प्रक्रियाओं का उल्लेख है। ऐसे में कोई आम पर्यटक बिना अनुमति परिसर में प्रवेश कर यहां घूम नहीं सकता।

    3. नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड, अंडमान और निकोबार

    नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड दुनिया के सबसे अलग-थलग रहने वाले स्वदेशी समुदायों में से एक, सेंटिनलीज जनजाति, का घर है। इस समुदाय की सुरक्षा और बाहरी संपर्क से होने वाले संभावित नुकसान को देखते हुए द्वीप और उसके आसपास के क्षेत्र को जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।

    द्वीप के साथ उच्च ज्वार रेखा से पांच किलोमीटर तक का समुद्री क्षेत्र भी आरक्षित क्षेत्र में शामिल है। गैर-आदिवासियों का यहां प्रवेश प्रतिबंधित है। इसका एक बड़ा कारण बाहरी बीमारियों से समुदाय की रक्षा करना भी है, क्योंकि लंबे समय तक अलग-थलग रहने के कारण उनमें कई बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम हो सकती है।

    4. सियाचिन ग्लेशियर, लद्दाख

    सियाचिन को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में गिना जाता है। सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील होने के कारण यहां आम लोगों की आवाजाही सामान्य पर्यटन स्थलों जैसी नहीं है।

    हालांकि पूरे सियाचिन ग्लेशियर को नागरिकों के लिए पूरी तरह बंद मानना सही नहीं होगा। 2021 में सियाचिन बेस कैंप को घरेलू पर्यटकों के लिए खोला गया था। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पर्यटक सैन्य क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कहीं भी जा सकते हैं। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रवेश और आवाजाही सुरक्षा नियमों तथा प्रशासनिक अनुमति के अधीन रहती है।

    5. निकोबार के जनजातीय आरक्षित क्षेत्र

    निकोबार द्वीप समूह के कई हिस्से स्वदेशी समुदायों और संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों के कारण विशेष सुरक्षा के दायरे में हैं। यहां सामान्य पर्यटक की तरह घूमना संभव नहीं है।

    निकोबार की यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए संबंधित सरकारी अनुमति या जनजातीय पास की आवश्यकता होती है। विदेशी नागरिकों के लिए भी निकोबार द्वीप समूह की यात्रा पर विशेष प्रतिबंध हैं। इन नियमों का उद्देश्य शोम्पेन समेत संवेदनशील आदिवासी समुदायों को बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना है।

    6. इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र, कलपक्कम

    तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक एवं अनुसंधान संस्थान है।

    परमाणु अनुसंधान से जुड़े इस परिसर में सुरक्षा और प्रवेश के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं लागू हैं। इसलिए यह आम जनता के लिए खुले पर्यटन स्थल की श्रेणी में नहीं आता। परिसर में प्रवेश के लिए अधिकृत अनुमति जरूरी होती है।

    7. नंदा देवी आंतरिक अभयारण्य, उत्तराखंड

    उत्तराखंड का नंदा देवी क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है।

    नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के कुछ हिस्सों में निर्धारित मार्गों से पहुंच संभव है, लेकिन आंतरिक अभयारण्य में आम पर्यटकों को स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति नहीं है। संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए यहां मानव गतिविधियों और पर्यटकों की आवाजाही पर कड़े नियम लागू हैं। कुछ क्षेत्रों में प्रवेश के लिए निर्धारित परमिट की आवश्यकता होती है।

    सुरक्षा से लेकर पर्यावरण तक, अलग-अलग हैं वजहें

    भारत की इन जगहों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे कारण अलग-अलग हैं। परमाणु अनुसंधान केंद्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख वजह है, जबकि नॉर्थ सेंटिनल और निकोबार के कुछ इलाकों में आदिवासी समुदायों की सुरक्षा प्राथमिकता है। वहीं नंदा देवी जैसे क्षेत्रों में नाजुक हिमालयी पर्यावरण की रक्षा महत्वपूर्ण है।

    इसलिए इन स्थानों को लेकर पर्यटकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश करने की कोशिश न करें और संबंधित प्रशासन के मौजूदा नियमों का पालन करें।

  • जैवलिन से होगा दुश्मन का सफाया; जमीनी जंग में भारत की बढ़ेगी ताकत

    जैवलिन से होगा दुश्मन का सफाया; जमीनी जंग में भारत की बढ़ेगी ताकत


    नई दिल्ली।
    भारत अपनी जमीनी युद्ध क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम खरीदने जा रहा है। इसके लिए करीब 45.7 मिलियन डॉलर खर्च किए जाएंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश से लगी लंबी सीमाओं को देखते हुए एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

    सेवानिवृत्त विंग कमांडर प्रफुल बख्शी ने जैवलिन मिसाइल की क्षमताओं की जानकारी देते हुए कहा कि भारत की सीमाओं पर टैंक युद्ध की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के अलावा खेमकरण जैसी लड़ाइयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जमीनी संघर्ष में दुश्मन के टैंकों को रोकना बेहद महत्वपूर्ण होता है।


    4.5 किलोमीटर तक मारक क्षमता

    प्रफुल बख्शी के अनुसार, जैवलिन एक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता करीब 4.5 किलोमीटर है। दुश्मन का टैंक सामने से बढ़ रहा हो तो इसे दागकर उसे निशाना बनाया जा सकता है।

    इस मिसाइल की खासियत इसका हाई-अटैक मोड है। इसके तहत मिसाइल लक्ष्य के ऊपर तक जाती है और फिर ऊपर से नीचे की ओर हमला करती है। विशेषज्ञ के मुताबिक यह क्षमता टैंक के अपेक्षाकृत कमजोर ऊपरी हिस्से को निशाना बनाने में उपयोगी होती है। उन्होंने कहा कि इस तकनीक का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में इमारतों जैसे अन्य लक्ष्यों के खिलाफ भी किया जा सकता है।


    भारत के पास पहले से कई स्वदेशी विकल्प

    सेवानिवृत्त विंग कमांडर ने बताया कि भारत के पास पहले से ही कई एंटी-टैंक और सटीक मार करने वाले हथियार मौजूद हैं। इनमें नाग मिसाइल शामिल है, जिसकी रेंज करीब चार किलोमीटर तक बताई गई है। इसके दो संस्करण हैं और इसे चलते हुए वाहन से भी दागा जा सकता है।

    इसी तरह SANT मिसाइल एयर-लॉन्च प्रणाली है, जिसकी क्षमता करीब 20 किलोमीटर तक के लक्ष्यों को निशाना बनाने की बताई गई है। इसके अलावा अमोगा प्रणाली के दो संस्करण और टैंक की गन से दागी जाने वाली सैमो मिसाइल भी भारतीय हथियार प्रणालियों में शामिल हैं।


    टैंक युद्ध में क्यों महत्वपूर्ण है जैवलिन?

    दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में टैंक युद्ध की भूमिका देखने को मिली है। यूक्रेन और इराक के युद्धों से लेकर भारत-पाकिस्तान के 1965 और 1971 के युद्धों तक बख्तरबंद वाहनों का इस्तेमाल हुआ है।

    प्रफुल बख्शी के अनुसार, टैंक का मुकाबला टैंक गन के अलावा एंटी-टैंक हथियारों से भी किया जा सकता है। ऐसे में लंबी दूरी से दुश्मन के टैंक को निशाना बनाने वाली गाइडेड मिसाइलें जमीनी लड़ाई में सैनिकों को महत्वपूर्ण बढ़त दे सकती हैं।

    नेपाल की बाढ़ पर भी उठाए सवाल

    नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ और बड़े पैमाने पर हुई तबाही को लेकर भी प्रफुल बख्शी ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चीन के तिब्बती क्षेत्र में भूकंप के बाद बांध टूटने या पानी छोड़े जाने की स्थिति की पूरी जांच की जानी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि अगर पानी छोड़ा गया था तो क्या नेपाल को पहले चेतावनी दी जा सकती थी और चेतावनी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या थी।

    30 मिनट में 30 मीटर पानी भरने पर बचाव मुश्किल

    प्रफुल बख्शी ने कहा कि यदि किसी इलाके में महज 30 मिनट के भीतर करीब 30 मीटर पानी भर जाए तो लोगों और राहत टीमों के पास प्रतिक्रिया देने के लिए बेहद कम समय बचता है। ऐसे हालात में केवल मौके पर पहुंचकर बचाव करना पर्याप्त नहीं होता।

    उन्होंने कहा कि ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए पहले से तैयारी जरूरी है। सीमावर्ती और संवेदनशील गांवों में स्थानीय प्रशासन तथा ग्राम प्रधानों के माध्यम से लोगों को संभावित खतरे और सुरक्षित स्थानों की जानकारी पहले से दी जानी चाहिए। इससे अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदा में जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • युगांडा के राजा ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकिदी चतुर्थ का 34 वर्ष की उम्र में निधन

    युगांडा के राजा ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकिदी चतुर्थ का 34 वर्ष की उम्र में निधन


    कंपाला।
    युगांडा के पारंपरिक राज्य टूरो के राजा ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकिदी चतुर्थ का 34 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह 1995 में महज तीन वर्ष की उम्र में राजगद्दी पर बैठे थे और उस समय दुनिया के सबसे कम उम्र के शासक बने थे। उनके निधन की घोषणा टूरो के प्रधानमंत्री केल्विन आर्मस्ट्रांग वोमीरे अकीकी ने की।

    प्रधानमंत्री ने गुरुवार देर रात सोशल मीडिया मंच एक्स पर राजा के निधन की जानकारी देते हुए इसे अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि राजा का निधन स्थानीय समयानुसार गुरुवार रात करीब 10 बजे हुआ। हालांकि, उनकी मृत्यु के कारण का खुलासा नहीं किया गया है।

    पिता की मौत के बाद तीन साल की उम्र में संभाली गद्दी

    ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकिदी चतुर्थ को 12 सितंबर 1995 को टूरो का राजा बनाया गया था। उनके पिता रुकिराबासाइजा पैट्रिक डेविड मैथ्यू कबोयो ओलिमी तृतीय के निधन के बाद उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया।

    महज तीन साल की उम्र में राजा बनने के कारण उनका नाम दुनिया के सबसे कम उम्र के शासकों में दर्ज हुआ। इतने कम उम्र में राजगद्दी संभालने के बावजूद उन्होंने आगे चलकर टूरो के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    युगांडा गणतंत्र, फिर भी मौजूद हैं पारंपरिक राजा

    युगांडा एक गणतांत्रिक देश है, जहां राष्ट्रपति का चुनाव होता है और राजनीतिक सत्ता निर्वाचित सरकार के पास रहती है। इसके बावजूद देश में कई पारंपरिक राजशाहियां आज भी मौजूद हैं।

    ये राजशाहियां औपनिवेशिक काल से पहले अस्तित्व में रहे पारंपरिक राज्यों की निरंतरता हैं। आधुनिक युगांडा में इन राजाओं के पास औपचारिक राजनीतिक अधिकार सीमित हैं, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर उनका प्रभाव काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    राजा ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकिदी चतुर्थ पश्चिमी युगांडा में स्थित टूरो राज्य के प्रमुख थे। टूरो क्षेत्र डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की सीमा के नजदीक है।

    अमेरिका में चल रहा था इलाज

    राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी की सरकार में मंत्री बालम बारुगहारा ने राजा के निधन की आधिकारिक घोषणा से कुछ समय पहले बताया था कि उनका अमेरिका में इलाज चल रहा था। हालांकि, प्रधानमंत्री ने उनके निधन की वजह नहीं बताई।

    प्रधानमंत्री अकीकी ने कहा कि राजा अविवाहित थे, लेकिन उन्होंने एक उत्तराधिकारी छोड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजगद्दी की निरंतरता सुनिश्चित है।

    युगांडा में शोक की लहर

    राजा के निधन की खबर सामने आने के बाद युगांडा में शोक की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक उनके निधन की व्यापक चर्चा हुई।

    युगांडा के चर्चित पॉप स्टार और बाद में राजनेता बने विपक्षी नेता बॉबी वाइन ने भी सोशल मीडिया पर शोक जताया। उन्होंने राजा की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

    युवावस्था को बताया था ताकत

    इसी वर्ष अप्रैल में राजा के जन्मदिन के अवसर पर टूरो के प्रधानमंत्री ने उनके नेतृत्व की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा था कि राजा अपनी जनता की वास्तविकताओं से दूर नहीं हैं और इसी पीढ़ी का हिस्सा हैं।

    प्रधानमंत्री ने उनके युवा होने को कमजोरी के बजाय ताकत बताया था। उनके अनुसार, राजा की युवावस्था टूरो के लिए ऊर्जा, नया दृष्टिकोण और भविष्य की नई कल्पना लेकर आई थी।

    राजा ओयो के निधन के बाद अब टूरो की पारंपरिक राजशाही में उत्तराधिकार की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। हालांकि उनकी राजनीतिक भूमिका प्रतीकात्मक रही, लेकिन टूरो के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में उनका स्थान महत्वपूर्ण था।

  • बदलते मौसम में बार-बार बीमार पड़ रहे हैं तो न करें इग्नोर… भारी पड़ सकती है ये गलतियां

    बदलते मौसम में बार-बार बीमार पड़ रहे हैं तो न करें इग्नोर… भारी पड़ सकती है ये गलतियां


    नई दिल्ली।
    क्या हर बार मौसम बदलते (Weather Changes) ही आप भी बीमार (Sick) हो जाते हैं? पहले गला खराब, दो दिन बाद सर्दी-जुकाम (Cold and cough) और फिर बुखार। बीमारी ठीक हुई तो कुछ दिन बाद दोबारा वही परेशानी। अगर आपके साथ ऐसा बार-बार हो रहा है तो इसे सिर्फ बदलते मौसम का असर मानकर इग्नोर करने की गलती न करें।

    जब बात बार-बार होने वाली बीमारियों की आती है तो हम अक्सर मान लेते हैं कि ये इम्युनिटी (Immunity) कमजोर होने की वजह से हो रहा है। ये सच भी है लेकिन हर बार बीमार पड़ने की वजह कमजोर इम्युनिटी ही हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है।

    हमारी रोज की कुछ आदतें भी बीमारी का रास्ता खोल सकती हैं। मसलन रात में देर तक जागना, अच्छी नींद न लेना, खाना समय पर न खाना, डाइट में जरूरी पोषक तत्वों की कमी शरीर के सामान्य स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। ये सभी आपके बार-बार बीमार होने के पीछे के साइलेंट कारण हो सकते हैं।

    डॉक्टर कहते हैं, जिस तरह से दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई राज्यों में स्वाइन फ्लू का दौर चल रहा है, ऐसे में लोगों को बुखार, सर्दी-जुकाम होना सामान्य है। पर अगर आप हर एक-दो महीने में इन समस्याओं का शिकार हो रहे हैं, तो थोड़ा सावधान हो जाने की जरूरत है। एक बार मुड़कर अपनी आदतों की तरफ भी देखिए, कहीं गलती यहां तो नहीं हो रही है?


    कहीं आपकी नींद तो खराब नहीं रहती?

    अगर आप लगातार कम सो रहे हैं तो सबसे पहले इसी आदत को सुधारने की जरूरत है। नींद सिर्फ थकान दूर नहीं करती है, ये शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रक्रिया में भी भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों के अनुसार अच्छी और पर्याप्त नींद शरीर को स्वस्थ रखने और बीमारियों से बचाव में मदद करती है।

    रोज देर रात तक मोबाइल चलाना या ऑफिस का काम करना और अलग-अलग समय पर सोना आपकी नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए रोज लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें। वयस्कों के लिए आम तौर पर कम से कम 8-9 घंटे की नींद की सलाह दी जाती है।


    डाइट में जरूरी पोषक तत्व हैं या नहीं?

    शरीर को स्वस्थ रखने के लिए डाइट का संतुलित होना जरूरी है। फल-सब्जियां, साबुत अनाज और पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन-फाइबर जैसे पोषक तत्वों को अपने आहार का हिस्सा जरूर बनाएं। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने के लिए पोषण से भरपूर संतुलित भोजन बहुत जरूरी है। अगर आपकी डाइट ज्यादातर पैकेज्ड फूड, तला-भुना खाना या बहुत ज्यादा मीठे पेय पर निर्भर है तो इसमें बदलाव जरूरी है। घर का बना खाना और रोजाना मौसमी फल खाना आपको कई बीमारियों से बचाए रखने में मदद कर सकता है।


    हाथों की साफ-सफाई का रखते हैं ध्यान?

    ऑफिस (Office), स्कूल, भीड़भाड़ वाली जगहों या घर में किसी बीमार व्यक्ति (Sick person) के संपर्क में रहने पर भी संक्रमण (Infection) का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बार-बार बीमार पड़ने का कारण हमेशा शरीर की कमजोरी नहीं होती। आप कितनी बार संक्रमण के संपर्क में आते हैं, यह भी मायने रखता है।

    हाथों (Hand hygiene) को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना संक्रमण फैलने से रोकने के सबसे आसान तरीकों में से एक है। हाथ धोने से कई तरह के वायरस और बैक्टीरिया का संक्रमण कम किया जा सकता है।


    क्या कहते हैं डॉक्टर?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर आपको बार-बार संक्रमण हो रहा है या मौसम बदलते ही बीमार हो जाते हैं तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कुछ स्वास्थ्य स्थितियां संक्रमण के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। हाई ब्लड शुगर के शिकार लोगों में शरीर की संक्रमण से लड़ने की क्षमता को प्रभावित हो जाती है, ये आपमें बीमारियों का खतरा बढ़ा देती है।

    डायबिटीज के शुरुआती स्थिति में अक्सर कोई खास लक्षण नहीं होते हैं इसलिए इसका देर से पता चल पाता है। इसलिए समय रहते जांच से शरीर की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। समय पर डॉक्टरी सलाह आपमें बीमारी का कारण पता लगाने और बार-बार होने वाली समस्याओं को रोकने में मददगार हो सकती है।

  • ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों से बचना है तो डाइट में इन चीजों को करें शामिल

    ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों से बचना है तो डाइट में इन चीजों को करें शामिल


    नई दिल्ली।
    हाई ब्लड प्रेशर (High blood pressure) और दिल की बीमारियां (Heart diseases) अब बहुत आम हो गई हैं। कम उम्र वाले भी इनका शिकार हो रहे हैं। हम अक्सर ब्लड प्रेशर (Blood Pressure) और दिल की सेहत की बात करते समय सबसे ज्यादा ध्यान नमक-तेल के कम सेवन, वजन कंट्रोल करने और एक्सरसाइज पर देते हैं। ये निश्चित ही दिल की सेहत के लिए जरूरी है, पर क्या आप जानते हैं कि एक मिनरल यानी खनिज तत्व ऐसा है जिस ब्लड प्रेशर और हार्ट की सेहत का सबसे अच्छा दोस्त कहा जाता है?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, पोटैशियम हमारे हेल्थ के लिए बहुत जरूरी मिनरल है। शरीर को इसकी जरूरत सिर्फ मांसपेशियों के कामकाज के लिए नहीं होती, बल्कि यह ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने और हृदय सहित पूरे कार्डियोवस्कुलर सिस्टम के सामान्य कामकाज में भूमिका निभाता है।

    पोटैशियम शरीर में सोडियम के स्तर को कंट्रोल रखने में भी मदद करता है जिससे बीपी अचानक बढ़ने का जोखिम कम होता है और हृदय स्वस्थ बना रहता है।


    शरीर के लिए जरूरी है पोटैशियम

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के विशेषज्ञ कहते हैं, सभी वयस्कों के लिए रोजाना कम से कम 3400 मिलीग्राम पोटैशियम लेना जरूरी माना जाता है। पोटैशियम शरीर से सोडियम को पेशाब के जरिए बाहर निकालने में मदद करता है। इसके अलावा यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों के तनाव को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है। यही कारण है कि हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने वाली डैश डाइट में फल-सब्जियां, दालें, साबुत अनाज के साथ पोटैशियम वाले खाद्य पदार्थों को भी शामिल किया जाता है।


    पोटैशियम शरीर में करता क्या है?

    पोटैशियम शरीर के लिए जरूरी इलेक्ट्रोलाइट और मिनरल है। यह कोशिकाओं, मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज में भूमिका निभाता है। खासतौर पर हृदय सहित अन्य मांसपेशियों के सामान्य काम के लिए शरीर में पोटैशियम का संतुलन जरूरी होता है। पोटैशियम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह अतिरिक्त सोडियम को पेशाब के जरिए बाहर निकालने में मदद करता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, भोजन में पर्याप्त मात्रा में पोटैशियम वाली चीजें शामिल करने से ब्लड प्रेशर तथा हृदय रोग, स्ट्रोक और कोरोनरी हार्ट डिजीज के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।


    क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

    अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार पोटैशियम रक्त वाहिकाओं की दीवारों के तनाव को कम करने में भी मदद करता है, जिससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने में सहायता मिल सकती है। पोटैशियम की जरूरत उम्र के अनुसार अलग हो सकती है। अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अनुसार वयस्क पुरुषों के लिए पर्याप्त सेवन 3,400 मिलीग्राम और महिलाओं के लिए 2,600 मिलीग्राम प्रतिदिन है।

    पोटैशियम का सबसे अच्छा तरीका भोजन से इसे लेना है। केला इसका सबसे अच्छा स्रोत है। इसके अलावा बीन्स- मटर, नट्स, पालक-पत्तागोभी जैसे खाद्य पदार्थ भी पोटैशियम के स्रोत हैं।
    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, भोजन से पोटैशियम की जरूरत पूरी करें। कुछ लोगों को डॉक्टर पोटैशियम सप्लीमेंट्स दे सकते हैं, हालांकि बिना डॉक्टरी सलाह के इसे लेना नुकसानदायक हो सकता है।

  • बरसात में डेंगू का खतरा बढ़ा, प्लेटलेट्स ही नहीं, ये संकेत भी बताते हैं बीमारी हो रही गंभीर

    बरसात में डेंगू का खतरा बढ़ा, प्लेटलेट्स ही नहीं, ये संकेत भी बताते हैं बीमारी हो रही गंभीर


    नई दिल्ली।
    बरसात (Rain) के दिनों में मच्छरों (Mosquitoes) के कारण होने वाली डेंगू (Dengue) जैसी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते दिनों हुई बारिश और जगह-जगह जल जमाव के कारण राजधानी दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में डेंगू के मामले बढ़ने लगे हैं।

    दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में इस साल अब तक डेंगू के 272 मामले सामने आए हैं। इसके अलावा मलेरिया के 95 और चिकनगुनिया के 21 मामले दर्ज हो चुके हैं। इतना ही नहीं पिछले एक सप्ताह में डेंगू के 26, मलेरिया के 15 और चिकनगुनिया के दो नए मामले सामने आए हैं।

    राजधानी दिल्ली पहले से ही स्वाइन फ्लू का प्रकोप झेल रही है ऐसे में डेंगू के मामलों ने डबल अटैक कर दिया है। एडीज एजिप्टी मच्छरों के कारण होने वाली ये बीमारी कुछ लोगों में गंभीर और जानलेवा भी हो सकती है। इन्हीं खतरों को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को मच्छरों से बचाव को लेकर अलर्ट रहने की सलाह दे रहे हैं।


    गंभीर हो सकती है डेंगू की बीमारी

    डेंगू का नाम आते ही सबसे पहले दिमाग में प्लेटलेट्स काउंट घूमने लगता है। डेंगू के टेस्ट में इसका कम होना चिंता बढ़ाने लगता है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि डेंगू की गंभीरता सिर्फ प्लेटलेट्स काउंट से तय नहीं होती।

    कई बार मरीज की हालत बिगड़ने लगती है। शरीर प्लेटलेट्स की रिपोर्ट से पहले ही खतरे के संकेत देता है। डॉक्टर कहते हैं, अगर आपको तेज बुखार के साथ लगातार पेट में तेज दर्द, उल्टी, नाक या मसूड़ों से खून आने, बहुत ज्यादा सुस्ती जैसी परेशानी हो रही है तो इसे बिल्कुल इग्नोर न करें। ये भी इशारा करते हैं कि बीमारी गंभीर रूप ले सकती है।


    डेंगू में पेट की दिक्कतों पर भी दें ध्यान

    बुखार के साथ या बुखार कम होने के बाद भी अगर अचानक तेज पेट दर्द शुरू हो जाए तो इसे बिल्कुल हल्के में न लें। पेट में दर्द गंभीर डेंगू का संकेत हो सकता है। डेंगू के मरीजों को उल्टी होने की भी दिक्कत रहती है। बार-बार उल्टी होने की स्थिति में अगर मरीज पानी और दूसरे तरल पदार्थ ठीक से नहीं ले रहा है तो इससे शरीर में डिहाइड्रेशन की दिक्कत बढ़ सकती है।


    नाक या मसूड़ों से खून आना

    नाक या मसूड़ों से खून आना डेंगू का गंभीर संकेत हो सकता है। कुछ लोगों में उल्टी या मल में भी खून दिखाई दे सकता है। डॉक्टर कहते हैं, गंभीर स्थिति में डेंगू अत्यधिक रक्तस्राव का कारण बनता है। इसलिए डेंगू के मरीज में किसी भी तरह का असामान्य रक्तस्राव दिखाई दे तो इसे सिर्फ प्लेटलेट्स कम होने का सामान्य असर मानकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षणों में तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।


    थकान-कमजोरी की दिक्कत

    गंभीर डेंगू में शरीर से तरल पदार्थ निकलने के कारण खून का संचार प्रभावित हो सकता है। इससे लो ब्लड प्रेशर और शॉक जैसी समस्याओं का भी जोखिम हो सकता है। इस स्थिति में मरीज को अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी, चक्कर, बेहोशी जैसा महसूस होती है। लगातार बढ़ती कमजोरी को सिर्फ बुखार के बाद की थकान मानना सही नहीं है। अगर डेंगू के मरीज की अचानक सांस फूलने लगे या सांस लेने में दिक्कत हो तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।


    क्या कहते हैं डॉक्टर?

    डॉक्टर कहते हैं, डेंगू को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि बुखार उतर जाने पर अक्सर लोग मान लेते हैं कि बीमारी ठीक हो गई। हालांकि कई बार डेंगू के गंभीर संकेत अक्सर बुखार कम होने के 24 से 48 घंटे बाद दिखाई दे सकते हैं। इसलिए बुखार उतरने के बाद भी मरीज की सेहत पर लगातार ध्यान देते रहें। पेट में तेज दर्द, लगातार उल्टी, खून आने, बहुत ज्यादा सुस्ती, बेचैनी या सांस लेने में परेशानी जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डेंगू में प्लेटलेट्स की जांच महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल प्लेटलेट्स काउंट से ही बीमारी की गंभीरता तय नहीं की जा सकती।

  • Prayagraj : स्वामी नारायण मंदिर का 3 मंजिला हिस्सा भरभराकर गड्ढे में गिरा…

    Prayagraj : स्वामी नारायण मंदिर का 3 मंजिला हिस्सा भरभराकर गड्ढे में गिरा…


    प्रयागराज।
    संगम नगरी प्रयागराज (Confluence City Prayagraj) में शुक्रवार देर रात बारिश के दौरान बड़ा हादसा हो गया. यहां स्वामी नारायण मंदिर (Swaminarayan Temple) का तीन मंजिला हिस्सा भरभराकर गड्ढे में जा गिरा. तेज आवाज के साथ हुए हादसे से आस-पास के लोग दहशत में आ गए.‌ ऐसा लगा जैसे कोई आस-पास बड़ा विस्फोट हुआ है, लेकिन जब लोग अपने घरों से बाहर निकले तो देखा कि स्वामी नारायण मंदिर का एक हिस्सा धराशाई हो चुका है।

    दरअसल, मंदिर के पीछे निर्माण कार्य चल रहा है. बताया जा रहा है कि इसी निर्माण कार्य के चलते बगल में गड्ढा खोदा. बारिश के चलते गड्ढे में पानी भर जाता था. पिछले तीन-चार महीने से निर्माण कार्य चल रहा था, लेकिन इन दिनों बारिश के चलते निर्माण कार्य बंद था. आशंका जताई जा रही है कि गड्ढे की वजह से मंदिर में बने कमरे की नींव कमजोर हो गई थी. इससे देर रात उसी गड्ढे में मंदिर का तीन मंजिला हिस्सा भरभरा कर गिर गया. हालांकि गनीमत यह रही कि उसे वक्त वहां पर कोई मौजूद नहीं था, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई है।

    मंदिर के सुरक्षा गार्ड सूबेदार सिंह ने बताया कि यहां पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आकर रुकते थे. खास तौर पर दक्षिण भारतीय श्रद्धालु यहां पर आकर ठहरते हैं. मंदिर का जो हिस्सा गिरा है वह धर्मशाला के रूप में प्रयोग किया जाता था. स्वामी नारायण मंदिर केपी कम्युनिटी सेंटर के सामने जार्ज टाउन थाना क्षेत्र में स्थित है।

    वहीं पुलिस और प्रशासन भी इस मामले में जांच पड़ताल में जुट गया है. हादसे में कोई जनहानि न होने से प्रशासन ने भी राहत की सांस ली है. हादसे के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्रशासन बड़ी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।