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  • महिला टी20 एशिया कप का भव्य आगाज आज दुबई में…. Ind vs Pak मैच 5 सितंबर को

    महिला टी20 एशिया कप का भव्य आगाज आज दुबई में…. Ind vs Pak मैच 5 सितंबर को


    दुबई।
    महिला टी20 एशिया कप 2026 (Women’s T20 Asia Cup 2026) का आगाज आज से यूएई (UAE) के दुबई (Dubai) में होने जा रहा है। इस बार टूर्नामेंट (Tournament) में आठ टीमें हिस्सा ले रही हैं। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश के अलावा इंडोनेशिया, हांगकांग चीन, थाईलैंड और मेजबान यूएई भी खिताब के लिए मैदान में पूरी ताकत झोंकेंगे। टूर्नामेंट का फाइनल 13 सितंबर को खेला जाएगा। भारत को प्रतियोगिता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है, जबकि मौजूदा चैंपियन श्रीलंका की टीम भी शानदार फॉर्म के साथ टूर्नामेंट में पहुंची है। पाकिस्तान और बांग्लादेश उलटफेर करने की क्षमता रखते हैं।


    28 अगस्त से 13 सितंबर तक चलेगा टूर्नामेंट

    महिला टी20 एशिया कप में कुल 15 मुकाबले खेले जाएंगे। इनमें 12 लीग मैच, दो सेमीफाइनल और एक फाइनल शामिल है। ग्रुप चरण के मुकाबले 28 अगस्त से आठ सितंबर तक होंगे और इस दौरान हर दिन एक मैच खेला जाएगा। इसके बाद पहला सेमीफाइनल 10 सितंबर और दूसरा सेमीफाइनल 11 सितंबर को होगा। खिताबी मुकाबला 13 सितंबर को खेला जाएगा। टूर्नामेंट के सभी मुकाबले दुबई में आयोजित किए जाएंगे।


    भारत-पाकिस्तान एक ही ग्रुप में

    आठ टीमों को दो ग्रुप में बांटा गया है।
    ग्रुप ए: भारत, पाकिस्तान, हांगकांग चीन और थाईलैंड
    ग्रुप बी: बांग्लादेश, श्रीलंका, यूएई और इंडोनेशिया

    ग्रुप चरण में प्रत्येक टीम अपने ग्रुप की बाकी तीन टीमों से एक-एक मुकाबला खेलेगी। दोनों ग्रुप की शीर्ष दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचेंगी। यह दूसरी बार है जब महिला एशिया कप के टी20 प्रारूप में आठ टीमें हिस्सा ले रही हैं। 2022 में टूर्नामेंट में सात टीमें थीं, जबकि 2024 में एक और टीम के जुड़ने के बाद संख्या आठ हुई थी।


    चार एसोसिएट टीमों ने ऐसे बनाई जगह

    इंडोनेशिया, हांगकांग चीन, थाईलैंड और यूएई ने 2026 महिला प्रीमियर कप के जरिए एशिया कप में जगह बनाई है। 18 टीमों वाले प्रीमियर कप में इन चारों टीमों ने अपने-अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और फिर क्वार्टर फाइनल जीतकर एशिया कप के लिए क्वालिफाई किया। इंडोनेशिया के लिए यह महिला एशिया कप में पहली उपस्थिति होगी। वहीं हांगकांग की टीम 2012 के बाद पहली बार इस टूर्नामेंट में वापसी कर रही है।


    भारत का दबदबा, श्रीलंका मौजूदा चैंपियन

    महिला टी20 एशिया कप में भारत का अब तक दबदबा रहा है। टी20 प्रारूप में खेले गए पांच संस्करणों में भारत ने तीन बार खिताब जीता है। हालांकि, दो मौकों पर उसे फाइनल में हार का सामना करना पड़ा। 2018 में बांग्लादेश ने भारत को हराकर खिताब जीता था, जबकि 2024 में श्रीलंका ने भारत को मात देकर पहली बार ट्रॉफी अपने नाम की थी। अब भारत की नजरें खिताब वापस हासिल करने पर होंगी।


    पांच सितंबर को भारत-पाकिस्तान महामुकाबला

    टूर्नामेंट के सबसे बहुप्रतीक्षित मुकाबलों में भारत और पाकिस्तान की भिड़ंत शामिल है। दोनों टीमें पांच सितंबर को आमने-सामने होंगी। टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का पाकिस्तान पर दबदबा रहा है। दोनों के बीच खेले गए 17 मुकाबलों में भारत ने 14 में जीत दर्ज की है। हालांकि, टी20 क्रिकेट में एक खराब दिन भी समीकरण बदल सकता है।

    भारतीय कप्तान हरमनप्रीत कौर ने भी टूर्नामेंट से पहले साफ किया कि उनकी टीम किसी एक प्रतिद्वंद्वी पर विशेष ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि टीम का लक्ष्य किसी विशेष टीम को लेकर सोचने के बजाय अच्छा क्रिकेट खेलना है। हरमनप्रीत के मुताबिक पिछले दो-तीन वर्षों में एशियाई टीमों के स्तर में काफी सुधार हुआ है और इस वजह से प्रतियोगिता चुनौतीपूर्ण रहने वाली है।


    श्रीलंका और बांग्लादेश की टक्कर भी अहम

    छह सितंबर को मौजूदा चैंपियन श्रीलंका और बांग्लादेश के बीच मुकाबला होगा। इस मैच पर भी नजरें रहेंगी। टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में श्रीलंका का बांग्लादेश के खिलाफ रिकॉर्ड मजबूत है। दोनों टीमों के बीच 16 मुकाबलों में श्रीलंका ने 13 मैच जीते हैं। श्रीलंका इस साल शानदार फॉर्म में है। उसने 13 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10 जीत हासिल की हैं। टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज 2-1 से जीती, बांग्लादेश को 3-0 से हराया और पाकिस्तान के खिलाफ भी 2-1 से सीरीज अपने नाम की।


    भारत पसंदीदा, लेकिन हालिया फॉर्म चिंता का विषय

    भारत को टूर्नामेंट का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, हालांकि उसकी हालिया टी20 फॉर्म बहुत प्रभावशाली नहीं रही है। भारत ने इस साल खेले 16 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में नौ मैच गंवाए हैं। इसके बावजूद टीम की गहराई और बड़े टूर्नामेंटों का अनुभव उसे बाकी टीमों से आगे रखता है। भारतीय टीम की नजरें खास तौर पर हालिया निराशाजनक टी20 विश्व कप अभियान से सबक लेकर बेहतर प्रदर्शन करने पर होंगी। हरमनप्रीत ने कहा कि पिछली प्रतियोगिताओं में मिले अनुभव टीम के लिए उपयोगी साबित होंगे और खिलाड़ी यहां अपना सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खेलने की कोशिश करेंगे।


    बांग्लादेश के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी

    बांग्लादेश ने इस साल टी20 क्रिकेट में मिश्रित प्रदर्शन किया है। टीम ने टी20 विश्व कप क्वालिफायर में अपने सभी सात मुकाबले जीते थे, लेकिन उसके बाद खेले गए 12 मैचों में उसे आठ में हार मिली। ऐसे में बांग्लादेश के लिए ग्रुप बी में श्रीलंका के साथ मुकाबला बड़ी चुनौती होगा। टीम को सेमीफाइनल में जगह बनाने के लिए निरंतर प्रदर्शन करना होगा।


    क्या भारत ट्रॉफी वापस हासिल करेगा?

    महिला टी20 एशिया कप 2026 में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत 2024 में गंवाया खिताब वापस हासिल कर पाएगा। कागज पर भारत सबसे मजबूत टीमों में है, लेकिन इस साल उसकी टी20 फॉर्म चिंता पैदा करती है। दूसरी ओर श्रीलंका मौजूदा चैंपियन होने के साथ इस साल बेहतर फॉर्म में है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के पास भी बड़े मुकाबलों में उलटफेर करने की क्षमता है, जबकि चार एसोसिएट टीमों के प्रदर्शन पर भी नजर रहेगी। टूर्नामेंट का प्रारूप ऐसा है कि ग्रुप चरण में एक भी चूक भारी पड़ सकती है। इसलिए 28 अगस्त से शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में सिर्फ बड़े नाम ही नहीं, बल्कि युवा और उभरती हुई प्रतिभाएं भी खिताब की दौड़ का रुख तय कर सकती हैं।

  • ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को रियल लाइफ में हुआ प्यार, किसी ने की शादी तो किसी का रिश्ता रह गया अधूरा

    ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को रियल लाइफ में हुआ प्यार, किसी ने की शादी तो किसी का रिश्ता रह गया अधूरा


    नई दिल्ली। टीवी की दुनिया में कलाकार कई बार ऐसे किरदार निभाते हैं, जिनमें वे एक-दूसरे के भाई-बहन नजर आते हैं। लेकिन शूटिंग के दौरान बढ़ी दोस्ती कभी-कभी असल जिंदगी में प्यार में बदल जाती है। टीवी इंडस्ट्री में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां पर्दे पर भाई-बहन बने कलाकारों ने एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी बनाया। हालांकि, इनमें से कुछ रिश्ते शादी तक पहुंचे, तो कुछ समय के साथ टूट भी गए।

    रोहन मेहरा और कांची सिंह: ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में नक्श का किरदार निभाने वाले रोहन मेहरा अपनी ऑनस्क्रीन बहन कांची सिंह के साथ रिलेशनशिप में थे। शो से बाहर आने के कुछ महीने बाद दोनों का रिश्ता खत्म हो गया।

    अविनाश और शाल्मली: ‘इस प्यार को क्या नाम दूं 2’ में अविनाश और शाल्मली ने भाई-भाभी का किरदार निभाया था। साथ काम करते हुए दोनों की दोस्ती बढ़ी और बाद में उन्होंने शादी कर ली। हालांकि, शादी के करीब तीन साल बाद दोनों का तलाक हो गया।

    नीरज और चारू: ‘मेरे अंगने में’ फेम नीरज और चारू ने शो में भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। काम के दौरान दोनों एक-दूसरे के करीब आए और उनका रिश्ता सगाई तक पहुंच गया। हालांकि, बाद में दोनों अलग हो गए।

    मजहर और मौली: ‘कहीं किसी रोज’ में मजहर और मौली ने भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। अलग-अलग धर्म से होने के बावजूद दोनों ने शादी करने का फैसला किया और अपने रिश्ते को शादी में बदल दिया।

    किरण करमरकर और रिंकू धवन: ‘कहानी घर घर की’ में किरण करमरकर ने ओम अग्रवाल और रिंकू धवन ने उनकी बहन छाया का किरदार निभाया था। शो के दौरान ही दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने शादी कर ली। हालांकि, कुछ साल बाद दोनों का तलाक हो गया।

    अभिषेक और अदिति: ‘ये है मोहब्बतें’ में अभिषेक और अदिति की ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को दर्शकों ने पसंद किया। इसी दौरान दोनों के रियल लाइफ में डेटिंग करने की खबरें सामने आईं। हालांकि, बाद में दोनों का ब्रेकअप हो गया।

    अमन वर्मा और वंदना लालवानी: अमन वर्मा और वंदना लालवानी ने ‘शपथ’ में भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। पर्दे पर भाई-बहन का किरदार निभाने वाली यह जोड़ी बाद में रियल लाइफ कपल बनी और दोनों ने 2016 में शादी कर ली।

    मयंक और रिया शर्मा: ‘तू सूरज मैं सांझ पिया जी’ में मयंक और रिया शर्मा ने भाई-बहन का किरदार निभाया था। शो के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने और एक-दूसरे को पसंद करने की खबरें सामने आई थीं।

    टीवी की दुनिया में ऐसे रिश्ते यह दिखाते हैं कि कैमरे के सामने निभाया गया किरदार और कलाकारों की निजी जिंदगी कई बार बिल्कुल अलग कहानी लिखती है। कुछ कलाकारों का ऑनस्क्रीन रिश्ता रियल लाइफ में प्यार में बदलकर शादी तक पहुंचा, जबकि कुछ रिश्ते समय के साथ खत्म हो गए।

  • तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"

    तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"


    नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। हादसे में जान-माल के नुकसान के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। यह आपदा उस समय आई, जब नेपाल और तिब्बत के रास्ते कैलास मानसरोवर की तीर्थयात्रा चल रही थी। हादसे में प्रभावित भारतीयों में बड़ी संख्या श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की बताई जा रही है।

    इस घटना के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तीर्थ में या तीर्थयात्रा के दौरान हो जाए तो हिंदू धर्मग्रंथ इसे किस दृष्टि से देखते हैं? क्या पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है? शास्त्रों और पुराणों में कई तीर्थों में देहत्याग की महिमा बताई गई है, लेकिन इसके साथ कर्म और अंतिम समय के विचारों को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    तीर्थ का अर्थ ही है भवसागर से पार जाने का माध्यम

    भारतीय परंपरा में तीर्थ केवल कोई धार्मिक स्थान नहीं है। ‘तीर्थ’ का अर्थ उस स्थान या माध्यम से जुड़ा है, जिसके सहारे मनुष्य संसार के बंधनों से पार जाने का प्रयास करता है। इसी कारण नदियों के तट, पर्वत, देवस्थल और प्राचीन धार्मिक नगर तीर्थ माने गए हैं।

    तीर्थयात्रा में स्नान, दर्शन, दान, तप, जप और आत्मशुद्धि जैसी साधनाएं शामिल होती हैं। इसलिए इसे केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं, बल्कि धार्मिक संकल्प और साधना के रूप में देखा गया है।

    गीता में अंतिम समय के विचारों को सबसे अधिक महत्व

    तीर्थ में मृत्यु की मान्यता को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ महत्वपूर्ण है। आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय में मनुष्य की मानसिक अवस्था और उसके विचारों का महत्व बताते हैं।

    श्रीकृष्ण कहते हैं—

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

    अर्थात जो व्यक्ति अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

    अगले श्लोक में इसी सिद्धांत को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

    अर्थात मनुष्य अंतिम समय में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से केवल मृत्यु का स्थान ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस समय व्यक्ति का चित्त किस अवस्था में था, इसे भी अहम माना गया है।

    काशी में मृत्यु को लेकर सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता

    तीर्थ में देहत्याग की चर्चा हो तो काशी का उल्लेख सबसे पहले आता है। काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में इसकी विशेष महिमा बताई गई है।

    धार्मिक मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले व्यक्ति को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण सदियों से लोग जीवन के अंतिम चरण में काशी जाकर रहने की इच्छा रखते रहे हैं।

    हालांकि इतिहास में ‘करवत काशी’ जैसी कठोर परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यताओं में मोक्ष की कामना से लोग काशी में जानबूझकर प्राण त्यागने तक के प्रयास करते थे। मीरा के पदों और कबीर की रचनाओं में भी ‘करवत कासी’ का संदर्भ मिलता है।

    केदार की यात्रा और कैलास पहुंचने की कथा

    स्कंदपुराण में तीर्थयात्रा से जुड़ी वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ की कथा भी मिलती है। दोनों हिमालय में केदार की यात्रा पर जाते हैं। यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पर हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है।

    पुराण की कथा के अनुसार, तीर्थयात्रा के दौरान देह त्यागने और अंतिम समय में चित्त की शुद्ध अवस्था के कारण शिवगण उन्हें दिव्य विमान से कैलास ले जाते हैं। इस कथा में तीर्थयात्री की मृत्यु को शिवलोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है।

    गरुड़ पुराण में पवित्र भूमि पर मृत्यु का उल्लेख

    गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 14 में मृत्यु के बाद धर्मराज की सभा तक पहुंचने वाले पुण्यात्माओं का वर्णन मिलता है। इसमें काशी में मृत्यु, धर्म की रक्षा करते हुए प्राण त्यागने और योग करते हुए शरीर छोड़ने वालों के साथ पवित्र जल में दुर्घटनावश डूबने या पवित्र तीर्थ और पुण्यभूमि में मृत्यु होने का भी उल्लेख किया गया है।

    इसमें ऐसे पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज की सभा की ओर जाने वाले उत्तरी मार्ग का वर्णन मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपरा में पुण्यभूमि पर मृत्यु को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है।

    पांडवों की कथा बताती है कि केवल स्थान ही सब कुछ नहीं

    महाभारत में पांडवों की अंतिम यात्रा का प्रसंग भी इस विषय को अलग दृष्टि से समझाता है। यात्रा के दौरान द्रौपदी और चारों भाई एक-एक करके गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन में मौजूद अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं।

    इस प्रसंग से यह विचार सामने आता है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में स्थान के साथ कर्म और चित्त की भी भूमिका है। यानी किसी पवित्र स्थान पर मृत्यु को महत्व दिया गया है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसकी मानसिक अवस्था को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया।

    प्रयाग और अयोध्या की भी अलग धार्मिक मान्यताएं

    पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उसके आसपास के तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है। इसमें गंगा और यमुना के तट पर स्थित तीर्थों में देह त्यागने की धार्मिक महत्ता बताई गई है। यहां तक कहा गया है कि इन पवित्र तीर्थों में मृत्यु पाने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता।

    इसी तरह स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को ‘स्वर्गद्वार’ का मार्ग बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

    क्या तीर्थ में मृत्यु से निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है?

    शास्त्रीय मान्यताओं को समग्र रूप से देखें तो इसका उत्तर इतना सीधा नहीं है कि तीर्थ में मृत्यु होते ही हर व्यक्ति को निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है। अलग-अलग पुराणों में कुछ तीर्थों की मृत्यु-महिमा जरूर बताई गई है, लेकिन गीता जैसे ग्रंथ अंतिम समय के भाव, स्मरण और चित्त की अवस्था को भी निर्णायक महत्व देते हैं।

    यही कारण है कि तीर्थयात्रा को केवल पर्यटन नहीं माना गया। इसमें संयम, उपवास, स्नान, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्तियों से दूरी जैसी साधनाएं जुड़ी हैं।

    इस दृष्टि से तीर्थयात्रा धार्मिक संकल्प के साथ शुरू होने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। मान्यता है कि पुण्यभूमि का वातावरण मनुष्य के चित्त को ईश्वर और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाता है। इसलिए तीर्थ में मृत्यु को विशेष पुण्य से जोड़कर देखा गया है, लेकिन उसके साथ व्यक्ति के कर्म और अंतिम मानसिक भाव को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

  • नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट

    नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में बनी एक विशाल बैरियर लेक (प्राकृतिक झील) को लेकर वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने अगले 72 घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए इलाके में निगरानी और फ्लड सिमुलेशन शुरू कर दिया है। आशंका जताई जा रही है कि यदि झील को रोक रहा प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बह सकता है।

    यह झील छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो नदियों के संगम पर बनी है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार यह क्षेत्र भारतीय सीमा से लगभग 120 से 140 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग से इसकी दूरी करीब 18 किलोमीटर बताई जा रही है। भौगोलिक रूप से भारत से दूरी अधिक नहीं होने के बावजूद चिंता का कारण इसका नदी तंत्र से जुड़ाव है, क्योंकि यहां का पानी आगे चलकर नेपाल होते हुए गंडक नदी के जरिए भारत तक पहुंचता है।

    झील में करोड़ों लीटर पानी जमा
    चीन की ओर से जारी चेतावनी के मुताबिक बैरियर लेक का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के अनुमान के अनुसार झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी पहले ही जमा हो चुका है, जबकि लगभग 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी और जमा होने की संभावना जताई गई है। यानी कुल मिलाकर 50 लाख क्यूबिक मीटर तक पानी प्राकृतिक बांध के पीछे इकट्ठा हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पानी का दबाव बढ़ने से प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो यह ग्लेशियल या भूस्खलन से बनी झील के अचानक फटने (लेक आउटबर्स्ट फ्लड) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी घटनाओं में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है और अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ तथा भारी मात्रा में मलबा भी बहाकर ले जाता है।

    अगले 72 घंटे क्यों अहम
    खतरे को देखते हुए चीन ने रियल-टाइम मॉनिटरिंग और फ्लड मॉडलिंग शुरू की है। वैज्ञानिक यह आकलन कर रहे हैं कि यदि प्राकृतिक बांध में दरार बढ़ती है या वह टूटता है तो पानी की दिशा, मात्रा और गति क्या होगी। 27 अगस्त को जारी चेतावनी के बाद से पूरे क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि झील का पानी धीरे-धीरे बाहर निकलेगा या अचानक बांध टूटने जैसी स्थिति बनेगी। यदि जल निकासी नियंत्रित रहती है तो निचले इलाकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सकता है, लेकिन अचानक बांध टूटने की स्थिति में बाढ़ की लहर बेहद कम समय में नीचे पहुंच सकती है।

    बिहार और उत्तर प्रदेश पर क्यों नजर
    छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो का पानी आगे नेपाल की नदियों में मिलकर भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी तंत्र का हिस्सा बनता है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी नदी में समाहित होती है, जिसे भारत में गंडक नदी के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि ऊपरी क्षेत्र में किसी भी असामान्य जलप्रवाह का असर बिहार और उत्तर प्रदेश के गंडक बेसिन वाले इलाकों पर पड़ सकता है।

    हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल भारत में बड़ी बाढ़ की कोई निश्चित आशंका नहीं है, लेकिन नदी तंत्र के आपसी जुड़ाव को देखते हुए निगरानी और सतर्कता बेहद जरूरी है।

    नेपाल में पहले ही मची है तबाही
    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में हाल की बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में सड़कें, पुल और मकान प्रभावित हुए हैं। कई क्षेत्रों में नदी के साथ बहकर आए मलबे ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है और अनेक लोगों के लापता होने की भी खबरें हैं।

    ऐसे में अब प्रशासन की नजर केवल बैरियर लेक पर नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र पर है। आने वाले 72 घंटे यह तय करेंगे कि झील स्थिर रहती है या फिर उसके जलस्तर में बढ़ोतरी नई चुनौती खड़ी करती है।

  • MP के 7 जिलों में आज भारी बारिश का अलर्ट, अब तक 26.5 इंच बरसा पानी, 37 जिले अब भी बारिश में पिछड़े

    MP के 7 जिलों में आज भारी बारिश का अलर्ट, अब तक 26.5 इंच बरसा पानी, 37 जिले अब भी बारिश में पिछड़े


    भोपाल। मध्य प्रदेश में मानसून का दौर जारी है। शुक्रवार को जबलपुर और सागर संभाग के 7 जिलों—टीकमगढ़, छतरपुर, कटनी, सीधी, अनूपपुर, सिवनी और बालाघाट में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग के मुताबिक इन जिलों में अगले 24 घंटे के दौरान ढाई से 4 इंच तक बारिश हो सकती है। भोपाल में हल्की बारिश का दौर जारी रहने की संभावना है।

    इसके अलावा प्रदेश के अधिकांश जिलों में कहीं तेज तो कहीं हल्की बारिश होने के आसार हैं। इनमें भोपाल, रायसेन, सीहोर, राजगढ़, विदिशा, इंदौर, धार, आलीराजपुर, बुरहानपुर, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, झाबुआ, उज्जैन, नीमच, आगर-मालवा, मंदसौर, शाजापुर, देवास, रतलाम, नर्मदापुरम, बैतूल, हरदा, ग्वालियर, गुना, शिवपुरी, दतिया, अशोकनगर, मुरैना, भिंड, श्योपुर, जबलपुर, छिंदवाड़ा, नरसिंहपुर, मंडला, डिंडौरी, पांढुर्णा, रीवा, सतना, सिंगरौली, मऊगंज, मैहर, शहडोल, उमरिया, सागर, पन्ना, दमोह और निवाड़ी शामिल हैं।

    28 से 30 अगस्त तक गरज-चमक के आसार

    IMD भोपाल के अनुसार, 28 से 30 अगस्त तक प्रदेश में गरज-चमक के साथ बारिश की गतिविधियां जारी रह सकती हैं। हालांकि, इस दौरान कुछ चुनिंदा जिलों में ही तेज बारिश होगी। 29 अगस्त को शहडोल, अनूपपुर, सिवनी और बालाघाट, जबकि 31 अगस्त को मऊगंज, सीधी और सिंगरौली में भारी बारिश का अलर्ट है।

    मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक के मुताबिक, सिस्टम के कमजोर होने से प्रदेश में तेज बारिश का दौर कुछ समय के लिए थम सकता है और कई इलाकों में बारिश की गतिविधियां सीमित रहने की संभावना है।

    अब तक 26.5 इंच बारिश, कोटे की 71%

    मौसम केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में अब तक 674.6 मिमी यानी 26.5 इंच बारिश हो चुकी है। सामान्य तौर पर इस अवधि तक 742.3 मिमी यानी 29.2 इंच बारिश होनी चाहिए थी। इस तरह प्रदेश में सामान्य से 2.7 इंच यानी करीब 9% कम बारिश हुई है। पूर्वी मध्य प्रदेश में सामान्य से 6% और पश्चिमी हिस्से में 12% कम बारिश दर्ज की गई है।

    37 जिलों में कम बारिश

    प्रदेश के पूर्वी हिस्से के जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग में बारिश 19% तक कम हुई है। बालाघाट, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, जबलपुर, कटनी, मैहर, मंडला, मऊगंज, नरसिंहपुर, निवाड़ी, पांढुर्णा, पन्ना, रीवा, सागर, सिवनी, टीकमगढ़ और डिंडौरी समेत कई जिलों में सामान्य से 1 से 49% तक कम बारिश हुई है।

    पश्चिमी हिस्से के आलीराजपुर, अशोकनगर, बैतूल, दतिया, देवास, धार, हरदा, इंदौर, झाबुआ, मुरैना, मंदसौर, नर्मदापुरम, नीमच, बड़वानी, रायसेन, रतलाम, सीहोर, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, उज्जैन और विदिशा में सामान्य से 4 से 50% तक कम पानी गिरा है।

    18 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश

    अब तक अनूपपुर, डिंडौरी, निवाड़ी, सतना, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, उमरिया, आगर-मालवा, भिंड, भोपाल, बुरहानपुर, दतिया, गुना, ग्वालियर, खंडवा, खरगोन, राजगढ़ और शिवपुरी में औसत से ज्यादा बारिश दर्ज की गई है।

  • कल का राशिफल: 28 अगस्त को ग्रहों की बदलेगी चाल 3 राशियों को मिलेगा धन लाभ नौकरी और कारोबार में बनेंगे नए अवसर

    कल का राशिफल: 28 अगस्त को ग्रहों की बदलेगी चाल 3 राशियों को मिलेगा धन लाभ नौकरी और कारोबार में बनेंगे नए अवसर


    नई दिल्ली। कल यानी 28 अगस्त का दिन ज्योतिषीय दृष्टि से कई राशियों के लिए महत्वपूर्ण रहने वाला है। ग्रहों की चाल और उनकी स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में अलग अलग रूपों में दिखाई दे सकता है। किसी राशि के जातकों को लंबे समय से अटके काम में सफलता मिलने के संकेत हैं तो किसी के लिए आर्थिक मामलों में राहत के योग बन सकते हैं। नौकरी करने वाले लोगों को कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारी या महत्वपूर्ण अवसर मिल सकता है जबकि व्यापार से जुड़े जातकों के लिए भी दिन लाभकारी साबित हो सकता है। हालांकि हर राशि के लिए दिन का प्रभाव अलग रहेगा इसलिए जरूरी है कि किसी भी बड़े फैसले में जल्दबाजी से बचें और परिस्थितियों को समझकर आगे बढ़ें।

    मेष राशि वालों के लिए कल का दिन आत्मविश्वास बढ़ाने वाला रह सकता है। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत और सक्रियता का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलने से कोई महत्वपूर्ण काम आगे बढ़ सकता है। आर्थिक स्थिति सामान्य से बेहतर रहने की संभावना है लेकिन अनावश्यक खर्च पर नियंत्रण रखना जरूरी होगा। परिवार में किसी सदस्य की उपलब्धि से खुशी का माहौल बन सकता है।

    वृषभ राशि के जातकों को कल अपने काम पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी। कारोबार में नए संपर्क भविष्य में फायदा पहुंचा सकते हैं। किसी पुराने निवेश से लाभ मिलने की संभावना बन सकती है। नौकरी में जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं लेकिन इसके साथ आपकी स्थिति भी मजबूत होगी। रिश्तों के मामले में बातचीत के जरिए गलतफहमी दूर करने की कोशिश करें।

    मिथुन राशि के लिए कल का दिन नई योजनाओं को आगे बढ़ाने का हो सकता है। नौकरी बदलने या किसी नए प्रोजेक्ट से जुड़ने की सोच रहे हैं तो सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ेगी। धन से जुड़े मामलों में सावधानी बरतें और बिना पूरी जानकारी के निवेश करने से बचें।

    कर्क राशि वालों के लिए परिवार और निजी जीवन महत्वपूर्ण रहेगा। घर के किसी सदस्य के साथ चल रही परेशानी बातचीत से सुलझ सकती है। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारी बढ़ सकती है और इसका भविष्य में फायदा मिलने की संभावना है। आर्थिक रूप से दिन संतुलित रहेगा लेकिन अचानक कोई खर्च सामने आ सकता है।

    सिंह राशि के जातकों के लिए कल आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का दिन रह सकता है। किसी महत्वपूर्ण काम में आपकी राय को प्राथमिकता मिल सकती है। कारोबारियों को नई डील या ग्राहक से लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि सफलता के साथ अहंकार से बचना जरूरी होगा। प्रेम संबंधों में साथी के साथ समय बिताने का अवसर मिल सकता है।

    कन्या राशि वालों को कल योजनाबद्ध तरीके से काम करने का लाभ मिलेगा। नौकरी में रुका हुआ काम पूरा हो सकता है और वरिष्ठ अधिकारी आपके प्रदर्शन से प्रभावित हो सकते हैं। धन के मामले में स्थिति मजबूत हो सकती है। स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न करें और काम के बीच पर्याप्त आराम लें।

    तुला राशि के लिए कल का दिन रिश्तों और करियर दोनों के लिहाज से अहम रह सकता है। साझेदारी के काम में फायदा मिल सकता है लेकिन किसी भी समझौते को ध्यान से पढ़कर ही आगे बढ़ें। प्रेम जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है। खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।

    वृश्चिक राशि वालों को कल किसी पुराने प्रयास का परिणाम मिल सकता है। आर्थिक लाभ के अवसर बनेंगे लेकिन जोखिम भरे फैसलों से बचना बेहतर रहेगा। कार्यक्षेत्र में विरोध करने वालों से दूरी बनाए रखें और अपनी रणनीति पर ध्यान दें। परिवार में किसी शुभ समाचार से मन प्रसन्न हो सकता है।

    धनु राशि के जातकों के लिए कल भाग्य का साथ मिलने के संकेत हैं। नौकरी कारोबार या शिक्षा से जुड़े मामलों में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। यात्रा का योग भी बन सकता है। किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह भविष्य के लिए उपयोगी साबित होगी। निवेश से जुड़े फैसलों में सोच समझकर कदम उठाएं।

    मकर राशि वालों को मेहनत का फल मिलने की संभावना है। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारी और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। आर्थिक मामलों में पुराने विवाद या अटकी रकम को लेकर राहत मिल सकती है। परिवार के साथ समय बिताने से मानसिक तनाव कम होगा।

    कुंभ राशि के लिए कल का दिन नए विचार और नई शुरुआत लेकर आ सकता है। नौकरी में बदलाव या नई जिम्मेदारी का अवसर मिल सकता है। कारोबार में तकनीक और नए संपर्कों का लाभ होगा। हालांकि जल्दबाजी में कोई बड़ा वित्तीय फैसला लेने से बचें।

    मीन राशि वालों के लिए कल का दिन मिलाजुला रह सकता है। आर्थिक स्थिति में सुधार के अवसर मिलेंगे लेकिन खर्च भी बढ़ सकता है। प्रेम और पारिवारिक संबंधों में भावनात्मक संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। किसी पुराने मित्र से मुलाकात या बातचीत मन को प्रसन्न कर सकती है।

    कुल मिलाकर 28 अगस्त का दिन कई राशियों के लिए अवसरों से भरा रह सकता है। ज्योतिषीय संकेतों के अनुसार मेहनत सही दिशा में हो तो सफलता की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। हालांकि राशिफल सामान्य ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है और इसे निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं लेना चाहिए। अपने निर्णय परिस्थितियों और व्यक्तिगत विवेक के आधार पर लेना बेहतर रहेगा।

  • हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    अल्मोड़ा। उत्तराखंड के चौखुटिया क्षेत्र की तड़ागताल झील से मिले प्राचीन जीवाश्मों ने इस इलाके के भूगर्भीय इतिहास को लेकर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के सर्वे के दौरान यहां स्ट्रोमैटोलाइट्स के अवशेष मिले हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, ये अवशेष करीब 100 से 150 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं।

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को शुरुआती सूक्ष्मजीवन के महत्वपूर्ण प्रमाणों में गिना जाता है। ऐसे में इनका तड़ागताल क्षेत्र में मिलना इस बात का संकेत देता है कि यहां आज से अरबों वर्ष पहले सूक्ष्मजीवों का अस्तित्व रहा होगा।

    झील के विकास के लिए हो रहा था सर्वे

    तड़ागताल झील को पर्यटन और जलस्रोत के रूप में विकसित करने की संभावनाओं को लेकर लगातार सर्वे किए जा रहे हैं। इसी भूगर्भीय अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को झील के आसपास स्ट्रोमैटोलाइट्स की चट्टानें मिलीं।

    वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलौत के मुताबिक, इन अवशेषों के अध्ययन से उनकी उम्र लगभग 100 से 150 करोड़ वर्ष आंकी गई है। उन्होंने बताया कि स्ट्रोमैटोलाइट्स सूक्ष्मजीवों से जुड़े जीवाश्म हैं और इनका मिलना इस क्षेत्र में प्राचीन सूक्ष्मजीवन की मौजूदगी का संकेत देता है।

    क्या होते हैं स्ट्रोमैटोलाइट्स?

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रमाणों में माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती दौर में समुद्रों में साइनोबैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये सूक्ष्मजीव चिपचिपी परतें बनाते थे। लंबे भूगर्भीय समय में इन परतों के जमा होने से परतदार चट्टानों जैसी संरचनाएं बन गईं, जिन्हें स्ट्रोमैटोलाइट्स कहा जाता है।

    तड़ागताल में इन संरचनाओं का मिलना इसलिए अहम है क्योंकि इनकी उम्र हिमालय के निर्माण से बहुत पहले की बताई जा रही है।

    हिमालय से पहले कैसा था यह इलाका?

    भूवैज्ञानिक इतिहास के मुताबिक हिमालय का निर्माण करीब 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर के बाद हुआ। इस टक्कर ने धरती की परतों में बड़े बदलाव किए और हिमालयी पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ।

    हिमालय के निर्माण से पहले इस क्षेत्र में टेथिस सागर मौजूद था। टेथिस सागर के बनने की प्रक्रिया लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई मानी जाती है। लेकिन तड़ागताल से मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स की अनुमानित उम्र इससे भी कहीं ज्यादा पुरानी है। यानी इन चट्टानों में दर्ज जीवन उस दौर का हो सकता है जब टेथिस सागर भी अस्तित्व में नहीं आया था।

    कुमाऊं की बड़ी झीलों में शामिल है तड़ागताल

    तड़ागताल कुमाऊं क्षेत्र की प्रमुख और बड़ी झीलों में गिनी जाती है। मानसून के दौरान यह पानी से भर जाती है, जबकि सर्दियों में इसका पानी प्राकृतिक रूप से बाहर निकल जाता है। झील के तल में बने पांच प्राकृतिक छिद्रों से पानी रिसकर बाहर निकलता है। पानी निकलने के बाद स्थानीय ग्रामीण झील के तल में गेहूं की खेती भी करते हैं।

    चारों ओर पहाड़ियों से घिरी तड़ागताल प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जानी जाती है। स्थानीय लोग और ताल झील समिति लंबे समय से इसे व्यवस्थित झील और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं।

    हिमालय के इतिहास के लिए क्यों अहम है खोज?

    तड़ागताल में मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स सिर्फ प्राचीन जीवन की कहानी नहीं बताते, बल्कि इस इलाके के भूगर्भीय अतीत की एक नई कड़ी भी सामने रखते हैं। अगर इन अवशेषों की उम्र और भूगर्भीय संदर्भ आगे के वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पुष्ट होते हैं, तो यह खोज हिमालयी क्षेत्र के निर्माण से पहले यहां मौजूद परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

  • रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां

    रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां


    उज्जैन।
    रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में शामिल है, जिनका अर्थ केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है। सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। समय के साथ राखी की परंपरा ने भी अलग-अलग रूप लिए और इसका अर्थ पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और भाईचारे तक पहुंचा।

    रक्षाबंधन का मतलब क्या है?

    ‘रक्षाबंधन’ शब्द संस्कृत के ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ से मिलकर बना है, जिसका सामान्य अर्थ रक्षा का बंधन माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं, तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं और उसके सुख-स्वास्थ्य की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।

    हालांकि आज यह परंपरा सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। कई जगह चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्र और सामाजिक रूप से जुड़े लोग भी एक-दूसरे को राखी बांधते हैं।

    कृष्ण और द्रौपदी की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग शामिल है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर खून निकल आया। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।

    मान्यता है कि कृष्ण ने इस स्नेह और अपनत्व को याद रखा। इसी प्रसंग को बाद में रक्षा के भाव से जोड़कर देखा गया और इसे राखी की परंपरा से संबंधित लोकप्रिय कथाओं में जगह मिली।

    राजा बलि और माता लक्ष्मी का प्रसंग

    रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि की है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके राज्य की रक्षा के लिए वहां रहने लगे थे।

    माता लक्ष्मी विष्णु से अलग नहीं रहना चाहती थीं। कथा के अनुसार उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद बलि ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस कहानी को श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    यमराज और यमुना की कहानी

    एक अन्य लोकप्रिय कथा मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना की थी।

    इसी प्रसंग के आधार पर रक्षाबंधन को भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।

    इंद्र की कलाई पर शुचि ने बांधा रक्षा सूत्र

    रक्षा सूत्र की शक्ति से जुड़ी एक और पौराणिक कथा देवताओं और असुरों के युद्ध की है। कहा जाता है कि युद्ध में इंद्र कमजोर पड़ रहे थे। तब उनकी पत्नी शुचि ने गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

    इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, शक्ति और आत्मविश्वास के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

    सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु की कहानी कितनी प्रसिद्ध है?

    राखी से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा सिकंदर और भारतीय शासक राजा पुरु से संबंधित है। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था। बाद में सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ और प्रचलित कथा के अनुसार पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

    हालांकि इस प्रसंग को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना की बजाय लोकप्रिय कथा के रूप में देखना अधिक उचित माना जाता है।


    रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहानियों में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं का प्रसंग भी है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी।

    कहा जाता है कि हुमायूं ने इस रिश्ते का सम्मान किया और रानी की सहायता के लिए आगे बढ़ा। हालांकि इस कहानी के ऐतिहासिक प्रमाणों और घटनाक्रम को लेकर भी इतिहासकारों में बहस है।

    जब राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

    रक्षाबंधन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बंगाल विभाजन के विरोध से जुड़ा है। 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।

    टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता का संदेश देने की अपील की। इस तरह राखी का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी बनी।

    रक्षाबंधन पर कैसे होती है पूजा और रस्म?

    रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली तैयार करती हैं। इसमें आमतौर पर राखी, कुमकुम, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। भाई को तिलक लगाने और आरती करने के बाद उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है। इसके बाद मिठाई खिलाई जाती है और भाई बहन को उपहार देता है।

    आजकल राखियों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है। पारंपरिक धागे वाली राखियों के साथ चांदी, सोने, रुद्राक्ष, मोती और कई तरह की डिजाइन वाली राखियां बाजार में उपलब्ध होती हैं।

    देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग परंपराएं

    श्रावण पूर्णिमा का महत्व भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में दिखाई देता है।

    • नारली पूर्णिमा: महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है।
    • अवनि अवित्तम: दक्षिण भारत में कई ब्राह्मण समुदायों में इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा है। इसे उपाकर्म भी कहा जाता है।
    • कजरी पूर्णिमा: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में कजरी गीत, पूजा और अच्छी फसल की कामना से जुड़ी परंपराएं हैं।
    • झूलन पूर्णिमा: पश्चिम बंगाल और ओडिशा में राधा-कृष्ण को झूले पर विराजमान कर इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

    समय के साथ बदल गया राखी का अर्थ

    रक्षाबंधन की सबसे खास बात यह है कि इसका मूल भाव रिश्ते में सुरक्षा और विश्वास है, लेकिन समय के साथ इसकी व्याख्या बदलती रही है। कभी यह भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रहा, तो कभी सामाजिक एकता और भाईचारे का माध्यम बना।

    आज राखी को केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा के वादे के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे के साथ खड़े रहने और रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। यही बदलता अर्थ रक्षाबंधन को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखता है।

  • भोपाल में एलएपीपी के नए विस्तार का उद्घाटन, बना दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण संयंत्र

    भोपाल में एलएपीपी के नए विस्तार का उद्घाटन, बना दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण संयंत्र

    भोपाल। केबल एवं कनेक्टिविटी समाधान के क्षेत्र में कार्यरत वैश्विक कंपनी एलएपीपी ने मध्य प्रदेश की राजधानी
    भोपाल स्थित अपने विनिर्माण संयंत्र के विस्तारित परिसर का उद्घाटन किया। विस्तार के बाद भोपाल संयंत्र कंपनी के विश्वभर में संचालित सभी विनिर्माण संयंत्रों में सबसे बड़ा बन गया है। नई सुविधा में पावर लो-वोल्टेज केबल के निर्माण की व्यवस्था की गई है।

    कंपनी के अनुसार, नई इकाई में तैयार होने वाली लो-वोल्टेज केबल का उपयोग कारखानों, व्यावसायिक भवनों, परिवहन प्रणालियों, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, उपयोगिता परियोजनाओं सहित विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में किया जाता है। इस सुविधा का निर्माण वर्ष 2025 में शुरू किया गया था और अब यह पूरी तरह परिचालन में आ गई है।

    कंपनी ने यह विस्तार ऐसे समय में किया है, जब देश में बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ ही पावर लो-वोल्टेज केबल की मांग में भी वृद्धि हो रही है। अनुमान के मुताबिक भारत में वर्तमान और आगामी वित्त वर्ष के दौरान बुनियादी ढांचा क्षेत्र में करीब 24 लाख करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है। वहीं, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में प्रत्येक वर्ष लगभग 50 से 55 गीगावाट की वृद्धि होने की संभावना है।

    भारत कंपनी के लिए महत्वपूर्ण बाजार

    एलएपीपी समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथियास लैप ने कहा कि भोपाल में किया गया निवेश ग्राहकों को बेहतर और तेज सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ‘भारत में भारत के लिए’ रणनीति के तहत देश में ही उच्च गुणवत्ता वाले कनेक्टिविटी समाधान तैयार किए जा रहे हैं। भारत एलएपीपी के लिए एशिया का महत्वपूर्ण बाजार है, जबकि मध्य प्रदेश कंपनी के लिए एक अहम विनिर्माण केंद्र बन चुका है।

    एलएपीपी ने वर्ष 2012 में भोपाल में अपना विनिर्माण संयंत्र शुरू किया था। शुरुआती दौर में यहां एकल-कोर केबल का उत्पादन किया जाता था। समय के साथ कंपनी ने संयंत्र में बहु-कोर केबल, सौर केबल, कंपाउंडिंग और ई-बीम तकनीक जैसी नई क्षमताएं जोड़ीं।

    200 से अधिक लोगों को रोजगार

    वर्तमान में भोपाल संयंत्र में 200 से अधिक लोग कार्यरत हैं। कंपनी के विश्वभर के संयंत्रों में सबसे बड़ा होने के साथ ही यह केंद्र कई आधुनिक तकनीकों के उपयोग के लिए भी महत्वपूर्ण है। यहां उन्नत पॉलिमर सामग्री का निर्माण भी कंपनी स्वयं करती है। इससे केबल की गुणवत्ता और प्रदर्शन पर बेहतर नियंत्रण संभव होता है।

    ई-बीम तकनीक के उपयोग से केबल को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाने के साथ उनकी ताप सहने की क्षमता भी बढ़ाई जाती है। कंपनी के मुताबिक भोपाल संयंत्र का विस्तार एलएपीपी इंडिया के 30वें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर हुआ है।

    जर्मनी के बाद भारत सबसे बड़ा बाजार

    एलएपीपी के लिए जर्मनी के बाद भारत सबसे बड़ा बाजार है और कंपनी इसे प्रमुख विकास बाजार के रूप में देखती है। कंपनी के शीर्ष प्रबंधन का भारत से पुराना जुड़ाव भी रहा है। समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथियास लैप ने बचपन में अपने परिवार के साथ भारत की यात्राएं की थीं। वहीं, कंपनी के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी एंड्रियास लैप वर्ष 2000 से जर्मनी के दो राज्यों में भारत के मानद वाणिज्यदूत के रूप में भी सेवाएं दे रहे हैं।

  • बाजार की तेजी पर फिर लगा ब्रेक सेंसेक्स 76,934 के करीब निफ्टी 0.48 प्रतिशत नीचे निवेशकों की नजर अब ग्लोबल संकेतों पर

    बाजार की तेजी पर फिर लगा ब्रेक सेंसेक्स 76,934 के करीब निफ्टी 0.48 प्रतिशत नीचे निवेशकों की नजर अब ग्लोबल संकेतों पर


    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को लगातार दूसरे कारोबारी दिन गिरावट देखने को मिली और कारोबार खत्म होने तक सेंसेक्स तथा निफ्टी दोनों लाल निशान में बंद हुए। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच वैश्विक बाजारों से मिले-जुले संकेतों ने निवेशकों के सेंटीमेंट पर असर डाला। इसके अलावा मेटल पीएसयू बैंक और सीमेंट कंपनियों के शेयरों में बिकवाली का दबाव भी बाजार की कमजोरी की बड़ी वजह बना। कारोबार के अंत में 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 539.35 अंक यानी 0.70 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,933.59 पर बंद हुआ। वहीं एनएसई निफ्टी 50 में 116.90 अंक यानी 0.48 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई और यह 24,090.85 के स्तर पर बंद हुआ।

    व्यापक बाजार की बात करें तो यहां भी कारोबारी धारणा पूरी तरह मजबूत नहीं रही। निफ्टी मिडकैप 100 में 0.10 प्रतिशत जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 0.13 प्रतिशत की गिरावट रही। हालांकि बड़ी कंपनियों के मुकाबले व्यापक बाजार में गिरावट अपेक्षाकृत सीमित रही। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों का एक वर्ग अभी भी घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े चुनिंदा शेयरों में खरीदारी के अवसर तलाश रहा है।

    सेक्टरवार कारोबार में सीमेंट कंपनियों के शेयर सबसे ज्यादा दबाव में रहे। निफ्टी सीमेंट इंडेक्स 1.33 प्रतिशत टूट गया। इसके बाद निफ्टी पीएसयू बैंक में 0.94 प्रतिशत निफ्टी मेटल में 0.86 प्रतिशत और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 0.51 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। मीडिया सेक्टर में भी कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर निफ्टी फार्मा हेल्थकेयर कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और प्राइवेट बैंक इंडेक्स ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया और बाजार की गिरावट के बीच कुछ सहारा दिया।

    निफ्टी 50 के शेयरों में अदाणी एंटरप्राइजेज कोटक महिंद्रा बैंक अदाणी पोर्ट्स सिप्ला और बीईएल प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में शामिल रहे। इसके विपरीत हिंडाल्को एचडीएफसी बैंक महिंद्रा एंड महिंद्रा श्रीराम फाइनेंस ग्रासिम इंडस्ट्रीज एचसीएल टेक भारती एयरटेल और रिलायंस जैसे शेयरों में दबाव देखने को मिला। इन शेयरों में बिकवाली ने प्रमुख सूचकांकों की गिरावट को और बढ़ाया।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक एक्सपायरी से जुड़ी उठापटक और मिडिल ईस्ट में किसी बड़ी कूटनीतिक सफलता का अभाव फिलहाल बाजार को एक सीमित दायरे में रख रहा है। हालांकि कंपनियों की कमाई के अनुमानों में ऊर्जा की ऊंची कीमतों के असर को काफी हद तक शामिल किया जा चुका है। हाल में कच्चे तेल की कीमतों और लॉन्ग टर्म बॉन्ड यील्ड में आई नरमी से महंगाई के मोर्चे पर कुछ राहत की उम्मीद भी बनी हुई है। अगर ऊर्जा कीमतों में स्थिरता आती है तो इसका असर कंपनियों की लागत और भविष्य की कमाई पर सकारात्मक पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश और कंपनियों की कमाई में बनी मजबूती भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत हैं। खासकर मिडकैप कंपनियों के कई सेक्टर वैश्विक अनिश्चितताओं से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं और घरेलू मांग का फायदा उठा रहे हैं। यही वजह है कि बाजार में व्यापक गिरावट के बावजूद चुनिंदा मिडकैप शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है।

    अब बाजार की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नए चेयरमैन केविन वॉर्श के जैक्सन होल सम्मेलन में होने वाले भाषण पर भी रहेगी। निवेशक उनके भाषण से महंगाई ब्याज दरों और मौद्रिक नीति के भविष्य को लेकर संकेत तलाशेंगे। इन संकेतों का असर वैश्विक जोखिम धारणा और उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह पर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले कारोबारी सत्रों में घरेलू संकेतों के साथ वैश्विक घटनाक्रम भी दलाल स्ट्रीट की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।