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  • 17 साल तक अधर में अटकी रही फिल्म, धर्मेंद्र से शुरू हुआ सफर बॉबी देओल तक पहुंचा, रिलीज के बाद बनी यादगार हिट

    17 साल तक अधर में अटकी रही फिल्म, धर्मेंद्र से शुरू हुआ सफर बॉबी देओल तक पहुंचा, रिलीज के बाद बनी यादगार हिट

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी फिल्में रही हैं जिनकी कहानी केवल पर्दे तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके निर्माण का सफर भी उतना ही दिलचस्प रहा। वर्ष 2000 में रिलीज हुई फिल्म ‘बिच्छू’ भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म की मूल योजना लगभग 17 वर्ष पहले बनाई गई थी, लेकिन परिस्थितियों के चलते इसका निर्माण बीच में ही रुक गया। बाद में नई टीम और नई स्टारकास्ट के साथ इसे दोबारा शुरू किया गया और रिलीज के बाद फिल्म ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।

    फिल्म की शुरुआती योजना वर्ष 1983 में तैयार की गई थी। उस समय अभिनेता धर्मेंद्र इस परियोजना से मुख्य अभिनेता के रूप में जुड़े थे और निर्माण की जिम्मेदारी भी उनके पास थी। मुख्य अभिनेत्री के लिए शबाना आज़मी का चयन किया गया था। शुरुआती चरण में फिल्म की शूटिंग भी शुरू हो चुकी थी और पहला शेड्यूल पूरा होने की चर्चा रही। उस दौर में फिल्म को बड़े स्तर पर तैयार करने की योजना थी और इसे एक अलग शैली की एक्शन-ड्रामा फिल्म के रूप में देखा जा रहा था।

    निर्माण के दौरान परिस्थितियां लगातार बदलती रहीं। निर्देशन से जुड़े बदलाव, निर्माण संबंधी कठिनाइयों और अन्य कारणों के चलते परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। समय के साथ फिल्म पूरी तरह रुक गई और लंबे समय तक इस पर कोई काम नहीं हुआ। कई वर्षों तक यह परियोजना फिल्म उद्योग में अधूरी योजनाओं के उदाहरण के रूप में याद की जाती रही।

    करीब 17 वर्ष बाद इसी कहानी को नए रूप में दोबारा जीवित किया गया। इस बार मुख्य भूमिका में बॉबी देओल को चुना गया, जबकि रानी मुखर्जी फिल्म की नायिका बनीं। दिलचस्प बात यह रही कि जिस किरदार को कभी धर्मेंद्र निभाने वाले थे, वही भूमिका बाद में उनके बेटे बॉबी देओल के हिस्से आई। इस संयोग ने फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता भी बढ़ा दी और इसे देओल परिवार के लिए एक खास परियोजना माना गया।

    रिलीज के बाद फिल्म को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। शुरुआती दौर में इसका प्रदर्शन संतोषजनक रहा और समय के साथ इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। टेलीविजन प्रसारण और बाद के वर्षों में भी फिल्म को अच्छी पहचान मिली। आज इसे बॉबी देओल के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है और उनके अभिनय की भी सराहना की जाती है।

    फिल्म में बॉबी देओल और रानी मुखर्जी के अलावा आशिष विद्यार्थी, फरीदा जलाल, सचिन खेडेकर और मलाइका अरोड़ा सहित कई कलाकारों ने अहम भूमिकाएं निभाईं। सभी कलाकारों के अभिनय और फिल्म की तेज रफ्तार कहानी ने इसे दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक्शन और भावनात्मक दृश्यों के संतुलन ने भी फिल्म को अलग पहचान दिलाई।

    सिनेमा जगत में अक्सर ऐसी परियोजनाएं समय और परिस्थितियों के कारण अधूरी रह जाती हैं, लेकिन कुछ कहानियां वर्षों बाद भी अपनी मंजिल तक पहुंचती हैं। ‘बिच्छू’ इसका प्रमुख उदाहरण मानी जाती है। लगभग दो दशक तक रुकी रहने के बावजूद जब यह फिल्म नए कलाकारों के साथ बड़े पर्दे पर आई तो दर्शकों ने इसे स्वीकार किया। यही कारण है कि आज भी इस फिल्म का नाम उन चुनिंदा फिल्मों में लिया जाता है, जिन्होंने लंबे इंतजार के बाद सफलता हासिल कर यह साबित किया कि अच्छी कहानी को समय की सीमाएं रोक नहीं सकतीं।

  • 'आवारापन 2' का पहला गीत 'Ve Junoon' रिलीज, इमरान हाशमी के 'शिवम पंडित' की भावनात्मक वापसी ने बढ़ाई फैंस की उत्सुकता

    'आवारापन 2' का पहला गीत 'Ve Junoon' रिलीज, इमरान हाशमी के 'शिवम पंडित' की भावनात्मक वापसी ने बढ़ाई फैंस की उत्सुकता

    नई दिल्ली । अभिनेता इमरान हाशमी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘आवारापन 2’ का पहला गीत ‘Ve Junoon’ रिलीज कर दिया गया है। फिल्म के टीजर को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद अब इसके पहले गाने ने भी दर्शकों के बीच उत्सुकता बढ़ा दी है। भावनात्मक संगीत, संवेदनशील बोल और फिल्म की कहानी से जुड़ा वातावरण इस गीत को फिल्म के प्रचार अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा है। सोशल मीडिया पर भी गाने को लेकर दर्शकों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं।

    ‘आवारापन 2’ को इमरान हाशमी की चर्चित फिल्मों में से एक ‘आवारापन’ की अगली कड़ी माना जा रहा है। पहली फिल्म में उनके निभाए ‘शिवम पंडित’ के किरदार को दर्शकों ने काफी पसंद किया था। अब नए अध्याय में इसी किरदार की वापसी को लेकर लंबे समय से चर्चा चल रही थी। फिल्म के टीजर ने पहले ही दर्शकों के बीच उत्साह पैदा कर दिया था और अब पहला गीत रिलीज होने के बाद फिल्म को लेकर दिलचस्पी और बढ़ गई है।

    ‘Ve Junoon’ एक भावनात्मक गीत के रूप में सामने आया है, जिसमें मुख्य किरदार के भीतर चल रहे संघर्ष, प्रेम, बिछड़ने के दर्द और भावनात्मक द्वंद्व को संगीत और शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। गीत का फिल्मांकन भी उसी भावनात्मक माहौल को आगे बढ़ाता है, जो पहली फिल्म की पहचान रहा था। यही कारण है कि पुराने दर्शकों के साथ-साथ नई पीढ़ी के दर्शक भी इस गीत को सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

    गीत का संगीत संगीतकार मिथून ने तैयार किया है, जबकि इसके बोल सईद कादरी ने लिखे हैं। अपनी संवेदनशील धुनों और भावपूर्ण रचनाओं के लिए पहचाने जाने वाले मिथून ने इस गीत में भी वही भावनात्मक शैली बनाए रखने का प्रयास किया है। वहीं गायक सुबोध शर्मा ने अपनी आवाज के माध्यम से गीत की भावनात्मक गहराई को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है।

    फिल्म निर्माण से जुड़े बैनरों ने गीत की रिलीज के साथ फिल्म के प्रचार अभियान को भी नई गति दी है। इससे पहले जारी टीजर को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यापक प्रतिक्रिया मिली थी और उसने दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर उत्सुकता पैदा की थी। अब पहला गीत रिलीज होने के बाद फिल्म के अगले प्रचार चरण को भी गति मिलने की उम्मीद की जा रही है।

    फिल्म की कहानी को लेकर निर्माता अभी अधिक जानकारी साझा नहीं कर रहे हैं, लेकिन टीजर और पहले गीत से यह संकेत मिलता है कि कहानी भावनात्मक संघर्ष, रिश्तों और व्यक्तिगत द्वंद्व के इर्द-गिर्द आगे बढ़ेगी। पहली फिल्म की तरह इस बार भी संगीत को फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में से एक माना जा रहा है।

    इमरान हाशमी लंबे समय से रोमांटिक और भावनात्मक किरदारों के लिए जाने जाते रहे हैं। ‘आवारापन’ में निभाए गए उनके किरदार ने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई थी। ऐसे में ‘आवारापन 2’ से उनकी वापसी को लेकर उनके प्रशंसकों की अपेक्षाएं काफी बढ़ी हुई हैं। फिल्म का पहला गीत भी उसी भावनात्मक जुड़ाव को दोबारा स्थापित करने की कोशिश करता दिखाई देता है।

    मनोरंजन जगत के जानकारों का मानना है कि यदि फिल्म की कहानी और संगीत दर्शकों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं, तो ‘आवारापन 2’ वर्ष की चर्चित फिल्मों में शामिल हो सकती है। फिलहाल ‘Ve Junoon’ के रिलीज होने के बाद फिल्म को लेकर सकारात्मक माहौल बनता दिखाई दे रहा है और अब दर्शकों की नजर इसके अगले गीतों, ट्रेलर और आधिकारिक रिलीज का इंतजार कर रही है।

  • 90 के दशक की सुपरहिट जोड़ी अब नए अंदाज में करेगी वापसी, 'King 100' में तब्बू के विलेन अवतार से नागार्जुन की होगी सीधी टक्कर

    90 के दशक की सुपरहिट जोड़ी अब नए अंदाज में करेगी वापसी, 'King 100' में तब्बू के विलेन अवतार से नागार्जुन की होगी सीधी टक्कर

    नई दिल्ली । दक्षिण भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता नागार्जुन अक्किनेनी और अभिनेत्री तब्बू की लोकप्रिय जोड़ी एक बार फिर बड़े पर्दे पर साथ दिखाई देने वाली है। करीब 28 वर्ष बाद दोनों कलाकार फिल्म ‘King 100’ में साथ काम कर रहे हैं। हालांकि इस बार दर्शकों को उनकी पारंपरिक रोमांटिक केमिस्ट्री नहीं, बल्कि पूरी तरह अलग कहानी और टकराव देखने को मिलेगा। फिल्म में तब्बू एक प्रभावशाली नकारात्मक किरदार निभा रही हैं, जबकि नागार्जुन मुख्य भूमिका में नजर आएंगे।

    ‘King 100’ नागार्जुन के फिल्मी करियर की 100वीं फिल्म है, इसलिए इसे उनके लिए बेहद खास प्रोजेक्ट माना जा रहा है। फिल्म को लेकर पहले से ही दर्शकों के बीच उत्सुकता बनी हुई थी, लेकिन तब्बू की एंट्री और उनके विलेन वाले किरदार की जानकारी सामने आने के बाद इस परियोजना को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। लंबे अंतराल के बाद दोनों कलाकारों का एक साथ आना दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन गया है।

    अपने अभिनय करियर में तब्बू ने कई गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन पूरी तरह नकारात्मक किरदार में उन्हें बहुत कम देखा गया है। इस फिल्म में उनका किरदार कहानी का प्रमुख विरोधी होगा। बताया जा रहा है कि उनका चरित्र मजबूत, प्रभावशाली और कथानक का अहम हिस्सा होगा। इससे पहले भी उन्होंने कुछ फिल्मों में ग्रे शेड वाले किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है, लेकिन इस बार उनका किरदार पूरी तरह अलग अंदाज में दर्शकों के सामने आएगा।

    नागार्जुन और तब्बू ने 1990 के दशक में कई फिल्मों में साथ काम किया था। उनकी जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया था और दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री लंबे समय तक चर्चा में रही। अब वर्षों बाद दोनों कलाकार एक नई कहानी और नए किरदारों के साथ वापसी कर रहे हैं। यही कारण है कि फिल्म को लेकर सिनेमा प्रेमियों और दोनों सितारों के प्रशंसकों में खास उत्साह देखा जा रहा है।

    फिल्म की शूटिंग भी लगातार आगे बढ़ रही है। हाल ही में पहले शेड्यूल का काम पूरा हुआ है। तब्बू ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए शूटिंग पूरी होने की खुशी जाहिर की थी। इसके बाद फिल्म की टीम दूसरे शेड्यूल की तैयारियों में जुट गई है। निर्माण से जुड़े लोग फिल्म को निर्धारित समय के भीतर पूरा करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

    मनोरंजन जगत के जानकारों का मानना है कि ‘King 100’ केवल नागार्जुन के करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव नहीं होगी, बल्कि तब्बू के लिए भी एक अलग तरह का अभिनय प्रस्तुत करने का अवसर बनेगी। दर्शकों को इस फिल्म में एक्शन, ड्रामा और मजबूत किरदारों का संतुलन देखने को मिल सकता है। यदि कहानी और प्रस्तुति उम्मीदों पर खरी उतरती है तो यह फिल्म दोनों कलाकारों की यादगार फिल्मों में शामिल हो सकती है।

    फिल्म के वर्ष 2027 की शुरुआत में सिनेमाघरों में रिलीज होने की संभावना जताई जा रही है। आधिकारिक रिलीज की घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। फिलहाल फिल्म की स्टार कास्ट, कहानी और तब्बू के नए अवतार को लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता लगातार बढ़ रही है। लंबे समय बाद नागार्जुन और तब्बू को एक साथ देखने का अवसर दर्शकों के लिए इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण माना जा रहा है।

  • आर्थिक तंगी में फिल्मों से टीवी का रुख करने वाली नवनीत निशान की बदली किस्मत, ‘तारा’ ने दिलाई घर-घर पहचान और ‘टीवी की श्रीदेवी’ का खिताब

    आर्थिक तंगी में फिल्मों से टीवी का रुख करने वाली नवनीत निशान की बदली किस्मत, ‘तारा’ ने दिलाई घर-घर पहचान और ‘टीवी की श्रीदेवी’ का खिताब

    नई दिल्ली । अभिनेत्री नवनीत निशान ने अपने अभिनय करियर के शुरुआती संघर्ष और टेलीविजन से मिली सफलता को याद करते हुए बताया कि आर्थिक तंगी के दौर में लिया गया एक फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। उन्होंने कहा कि फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जो बाद में लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘तारा’ ने दिलाई। इसी शो ने उन्हें घर-घर तक पहुंचाया और दर्शकों के बीच एक अलग पहचान स्थापित की।

    नवनीत निशान ने बताया कि जब उन्हें ‘तारा’ का प्रस्ताव मिला, तब वह पहले से कई फिल्मों में काम कर चुकी थीं। उस समय फिल्म उद्योग में यह धारणा प्रचलित थी कि जो कलाकार टेलीविजन की ओर रुख करता है, उसके लिए फिल्मों के अवसर सीमित हो जाते हैं। इसी कारण वह शुरुआत में इस प्रस्ताव को लेकर असमंजस में थीं। हालांकि आर्थिक परिस्थितियों ने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने धारावाहिक स्वीकार कर लिया।

    उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में उन्हें यह जानकारी दी गई थी कि वह किसी दूसरे किरदार को निभाएंगी। बाद में जब धारावाहिक का प्रचार सामने आया, तब उन्हें पता चला कि वह मुख्य भूमिका में हैं और पूरा शो उनके किरदार के इर्द-गिर्द बनाया गया है। उनके अनुसार उस समय उन्हें लगा कि उन्हें पूरी जानकारी पहले नहीं दी गई थी। हालांकि बाद में यही भूमिका उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गई और दर्शकों ने उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया।

    अभिनेत्री ने बताया कि धारावाहिक के निर्देशक ने शुरुआत में ही कहा था कि कुछ समय बाद पूरा देश उन्हें पहचानने लगेगा। उस समय उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें व्यापक लोकप्रियता नहीं मिली थी। लेकिन शो के प्रसारण के कुछ ही महीनों में हालात पूरी तरह बदल गए। उन्होंने कहा कि लोग उन्हें उनके वास्तविक नाम से कम और ‘तारा’ के नाम से अधिक पहचानने लगे थे। यह लोकप्रियता उनके लिए अप्रत्याशित थी और इसी ने उनके करियर को नई दिशा दी।

    नवनीत निशान ने कहा कि उस दौर में उनके किरदार का आधुनिक व्यक्तित्व और छोटा हेयरस्टाइल दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। उन्होंने बताया कि लोग उनके लुक की नकल करने लगे थे और उन्हें ‘टीवी की श्रीदेवी’ तथा 90 के दशक की आधुनिक महिला जैसे विशेषण मिलने लगे। उनके अनुसार यह केवल एक धारावाहिक नहीं था, बल्कि उस समय बदलती सामाजिक सोच और महिलाओं की नई पहचान का भी प्रतीक बन गया था।

    उन्होंने 90 के दशक के टेलीविजन उद्योग की कार्यशैली को याद करते हुए कहा कि उस समय आज जैसी तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। कलाकार बिना मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के एक-दूसरे के साथ अधिक समय बिताते थे। शूटिंग के दौरान सभी कलाकार एक ही कमरे में बैठते, बातचीत करते, एक-दूसरे की मदद करते और पूरे परिवार की तरह काम करते थे। उन्होंने कहा कि वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं भी नहीं होती थीं और कलाकार अपने कपड़े स्वयं लेकर आते थे, जिससे टीम के बीच आत्मीयता और सहयोग का माहौल बना रहता था।

    नवनीत निशान का मानना है कि उस दौर के धारावाहिक आज भी दर्शकों की यादों में इसलिए जीवित हैं क्योंकि उनमें कहानी, किरदार और भावनात्मक जुड़ाव को विशेष महत्व दिया जाता था। उन्होंने कहा कि समय बदलने के साथ मनोरंजन के कई नए माध्यम सामने आए हैं, लेकिन ‘तारा’ जैसा प्रभाव आज भी लोगों की स्मृतियों में कायम है। उनके अनुसार एक कलाकार के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यही होती है कि वर्षों बाद भी दर्शक उसके निभाए गए किरदार को याद रखें।

  • 44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    नई दिल्ली । वरिष्ठ अभिनेता अनु कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ के माध्यम से एक बार फिर ऐसे किरदार में दिखाई देंगे, जो मनोरंजन के साथ जीवन का सार्थक संदेश भी प्रस्तुत करता है। इस फिल्म में वह एक अनुभवी भौतिकी शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं, जो विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराता है, लेकिन निजी जीवन में वास्तु सिद्धांतों पर गहरा विश्वास रखता है। कहानी इसी विश्वास और वास्तविक जीवन के बीच पैदा होने वाली परिस्थितियों को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करती है।

    अनु कपूर का कहना है कि फिल्म की कहानी पढ़ते ही उन्हें महसूस हुआ कि यह आम लोगों की सोच और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार कई लोग जीवन की समस्याओं का समाधान बाहरी परिस्थितियों, दिशाओं या मान्यताओं में खोजते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन व्यक्ति के विचार, निर्णय और कर्म से आता है। यही संदेश फिल्म को अलग पहचान देता है और इसी कारण उन्होंने इस परियोजना का हिस्सा बनने का निर्णय लिया।

    उन्होंने बताया कि उनका किरदार विज्ञान का शिक्षक होने के बावजूद वास्तु में विश्वास रखता है। यह विरोधाभास ही कहानी को रोचक बनाता है। फिल्म किसी की आस्था का उपहास नहीं उड़ाती, बल्कि यह दिखाने का प्रयास करती है कि विश्वास अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन सफलता और संतुलित जीवन का आधार ईमानदार प्रयास, सकारात्मक सोच और सही निर्णय ही होते हैं।

    लगभग चार दशक से अधिक लंबे अभिनय करियर में अनु कपूर ने अनेक यादगार फिल्मों में विविध भूमिकाएं निभाई हैं। उनका मानना है कि दर्शकों तक वही कहानियां सबसे अधिक पहुंचती हैं जिनमें मनोरंजन के साथ विचार करने की प्रेरणा भी हो। उनके अनुसार ‘उत्तर का पुत्तर’ भी हास्य के माध्यम से एक गंभीर सामाजिक संदेश देने का प्रयास करती है, जिससे हर वर्ग का दर्शक स्वयं को जोड़ सकेगा।

    फिल्म का बड़ा हिस्सा दिल्ली के प्रमुख स्थलों पर फिल्माया गया है। शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को कहानी के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ा गया है। करोल बाग, कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, कुतुब मीनार और अन्य प्रसिद्ध स्थानों की झलक फिल्म को वास्तविक वातावरण प्रदान करती है। निर्माताओं का मानना है कि दिल्ली की जीवंत ऊर्जा और स्थानीय परिवेश कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।

    अनु कपूर के लिए दिल्ली केवल एक शहर नहीं बल्कि उनके अभिनय जीवन की महत्वपूर्ण शुरुआत का केंद्र भी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बिताए गए वर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वहीं से उन्हें अभिनय की बारीकियां, अनुशासन और जीवन को गहराई से समझने की सीख मिली। मंडी हाउस, बंगाली मार्केट और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी अनेक यादें आज भी उनके मन में ताजा हैं और हर बार दिल्ली लौटने पर वे फिर जीवंत हो उठती हैं।

    उन्होंने कहा कि रंगमंच के दिनों में लोगों के व्यवहार, भावनाओं और समाज को करीब से देखने का अवसर मिला, जिसने उनके अभिनय को नई दिशा दी। यही अनुभव आज भी हर नए किरदार को निभाने में उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनते हैं। उनका मानना है कि एक कलाकार के लिए निरंतर सीखना और स्वयं को नए विषयों के अनुरूप ढालना सबसे महत्वपूर्ण होता है।

    फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। निर्माताओं को उम्मीद है कि पारिवारिक मनोरंजन, हल्के हास्य और सकारात्मक संदेश का यह मिश्रण दर्शकों को पसंद आएगा। साथ ही दिल्ली की खूबसूरत लोकेशन और अनु कपूर का अनुभवी अभिनय फिल्म को एक अलग पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • सुप्रीम लीडर की विदाई या नई रणनीति का ऐलान? खामेनेई के अंतिम संस्कार के जरिए ईरान ने दुनिया के सामने रखा अपना राजनीतिक संदेश

    सुप्रीम लीडर की विदाई या नई रणनीति का ऐलान? खामेनेई के अंतिम संस्कार के जरिए ईरान ने दुनिया के सामने रखा अपना राजनीतिक संदेश

    नई दिल्ली । ईरान में पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देने वाले आयोजन के रूप में देखा जा रहा है। पूरे देश में लाखों लोगों की मौजूदगी और धार्मिक परंपराओं के बीच आयोजित कार्यक्रम ने यह संकेत देने का प्रयास किया कि सत्ता संरचना, वैचारिक निरंतरता और राष्ट्रीय एकजुटता पहले की तरह कायम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आयोजन के माध्यम से देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई महत्वपूर्ण संदेश दिए गए हैं।

    विदेश नीति और पश्चिम एशिया मामलों के जानकारों का कहना है कि शिया परंपरा में धार्मिक नेतृत्व और राजनीतिक व्यवस्था को अलग-अलग नहीं देखा जाता। इसी कारण सुप्रीम लीडर का पद केवल संवैधानिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे धार्मिक मार्गदर्शन का भी केंद्र माना जाता है। ऐसे में अंतिम संस्कार जैसे अवसर केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहते, बल्कि शासन व्यवस्था की निरंतरता और वैचारिक प्रतिबद्धता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी बन जाते हैं।

    अंतिम यात्रा के लिए चुने गए मार्ग को भी प्रतीकात्मक महत्व दिया जा रहा है। यात्रा की शुरुआत ईरान के महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्रों से जुड़ी परंपरा के अनुरूप हुई और इसे शिया आस्था से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों की विरासत से जोड़ा गया। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के प्रतीकों के माध्यम से ईरान ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि उसकी धार्मिक और राजनीतिक पहचान अब भी मजबूत और संगठित है। साथ ही यह आयोजन इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि सर्वोच्च नेतृत्व की संस्था अपनी वैचारिक और संस्थागत शक्ति बनाए हुए है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, उत्तराधिकार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच नए नेतृत्व की भूमिका पर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। सुरक्षा कारणों से संभावित नए सुप्रीम लीडर सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहे, जबकि उनकी ओर से लिखित संदेश जारी किए गए। इसे सुरक्षा व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कदम यह दिखाने के लिए भी उठाए जाते हैं कि नेतृत्व परिवर्तन नियंत्रित और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ रहा है।

    अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने देश के भीतर भावनात्मक माहौल को भी उजागर किया। कई स्थानों पर लोगों ने राष्ट्रीय एकता और नेतृत्व के समर्थन में नारे लगाए। साथ ही पश्चिम एशिया में ईरान के सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संकेत भी दिया कि क्षेत्रीय स्तर पर उसके पुराने संबंध और रणनीतिक साझेदारियां अब भी सक्रिय हैं। इसे ईरान की क्षेत्रीय नीति और उसके सहयोगी नेटवर्क के सार्वजनिक प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।

    हालांकि आयोजन के दौरान कुछ स्थानों पर अमेरिका और इजरायल के विरोध में नारे और पोस्टर भी दिखाई दिए। ये दृश्य उस जनभावना को दर्शाते हैं जो हालिया क्षेत्रीय तनाव और संघर्षों के बाद देश के एक वर्ग में देखने को मिल रही है। हालांकि भविष्य की नीतियों और किसी भी संभावित कदम को लेकर आधिकारिक स्तर पर कोई नई घोषणा नहीं की गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतिम संस्कार केवल एक शीर्ष नेता की विदाई नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक दिशा, धार्मिक पहचान और सत्ता की निरंतरता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था। आने वाले समय में दुनिया की नजर इस बात पर रहेगी कि नए नेतृत्व के तहत ईरान अपनी घरेलू और विदेश नीति को किस दिशा में आगे बढ़ाता है तथा पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में उसकी भूमिका किस प्रकार विकसित होती है।

  • दमिश्क में राष्ट्रपति मैक्रों के दौरे के दौरान दो धमाकों से मची अफरातफरी, सुरक्षा घेरे के बीच सीरिया में फिर उठे सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल

    दमिश्क में राष्ट्रपति मैक्रों के दौरे के दौरान दो धमाकों से मची अफरातफरी, सुरक्षा घेरे के बीच सीरिया में फिर उठे सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा के दौरान राजधानी दमिश्क में हुए दो विस्फोटों ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। ये विस्फोट उस इलाके में हुए जहां राष्ट्रपति मैक्रों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी। घटना ऐसे समय हुई जब उनका आधिकारिक कार्यक्रम जारी था और वे विभिन्न बैठकों में हिस्सा ले रहे थे। विस्फोटों के बावजूद उनका निर्धारित दौरा जारी रहा तथा उन्होंने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शारा से तय कार्यक्रम के अनुसार मुलाकात भी की।

    जानकारी के अनुसार विस्फोट दमिश्क के व्यस्त प्रशासनिक क्षेत्र में हुए, जहां कई सरकारी कार्यालय, राष्ट्रीय संग्रहालय और प्रमुख होटल स्थित हैं। पहला विस्फोट उस समय हुआ जब राष्ट्रपति मैक्रों का काफिला एक आधिकारिक बैठक के लिए राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ रहा था। इसके कुछ समय बाद उसी इलाके में दूसरा विस्फोट हुआ। घटनास्थल पर मौजूद लोगों में अफरातफरी फैल गई और सुरक्षा एजेंसियों ने तत्काल पूरे क्षेत्र को घेर लिया।

    प्रारंभिक जानकारी के अनुसार इस घटना में कई लोग घायल हुए हैं, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल बताए गए हैं। दूसरे विस्फोट के समय एक एंबुलेंस के आसपास बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे, जिससे घायलों की संख्या बढ़ गई। राहत एवं बचाव दल ने तत्काल मौके पर पहुंचकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया और पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई।

    घटना के बाद भी राष्ट्रपति मैक्रों के आधिकारिक कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया। उन्होंने सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शारा के साथ निर्धारित बैठक की, जिसमें दोनों देशों के संबंधों और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई। इस मुलाकात को विशेष महत्व इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद मैक्रों सीरिया का दौरा करने वाले पहले यूरोपीय नेता हैं। उनकी यात्रा को दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राष्ट्रपति या उनके दल ने विस्फोटों की आवाज नहीं सुनी। प्रारंभिक आकलन के अनुसार उनका काफिला घटनास्थल से आगे निकल चुका था और विस्फोट उसके बाद हुए। दूसरी ओर सीरियाई प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम की जांच शुरू कर दी है। सुरक्षा एजेंसियां घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने के साथ-साथ विस्फोटों के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में जुटी हैं।

    सीरिया के आंतरिक सुरक्षा विभाग ने इलाके को पूरी तरह सील कर दिया है और जांच एजेंसियां विभिन्न पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। प्रशासन का कहना है कि घटना की विस्तृत जांच के बाद ही विस्फोटों के कारणों और जिम्मेदार तत्वों के बारे में आधिकारिक जानकारी दी जाएगी। फिलहाल किसी संगठन ने इस घटना की जिम्मेदारी नहीं ली है।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सीरिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। लंबे समय से संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रहे देश में विदेशी नेताओं की यात्राओं के दौरान सुरक्षा व्यवस्था हमेशा चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में मैक्रों की यात्रा के दौरान हुए ये विस्फोट सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर परीक्षा साबित हुए हैं। हालांकि फ्रांसीसी और सीरियाई अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कूटनीतिक कार्यक्रम पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार जारी रहेंगे और दोनों देशों के बीच वार्ता पर इस घटना का तत्काल कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

  • सीरिया दौरे के बीच राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के बाहर धमाके, दमिश्क में सुरक्षा पर उठे सवाल, शांति और पुनर्निर्माण एजेंडे पर बना तनाव

    सीरिया दौरे के बीच राष्ट्रपति मैक्रों के होटल के बाहर धमाके, दमिश्क में सुरक्षा पर उठे सवाल, शांति और पुनर्निर्माण एजेंडे पर बना तनाव

    नई दिल्ली । फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सीरिया यात्रा उस समय अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई जब दमिश्क में उनके ठहरने वाले होटल के निकट सिलसिलेवार विस्फोट हुए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार घटना में कई लोग घायल हुए, जबकि फ्रांसीसी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति मैक्रों सुरक्षित हैं और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल-शरा के साथ उनकी बैठक जारी रही। इस घटना ने राजधानी दमिश्क की सुरक्षा व्यवस्था और सीरिया में स्थिरता स्थापित करने की कोशिशों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मैक्रों वर्ष 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद सीरिया का दौरा करने वाले पहले प्रमुख पश्चिमी नेता माने जा रहे हैं। उनकी यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब सीरिया लंबे गृहयुद्ध के बाद आर्थिक पुनर्निर्माण, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। फ्रांसीसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पहुंचे मैक्रों की यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना और पुनर्निर्माण परियोजनाओं में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा करना बताया गया।

    द्विपक्षीय वार्ता के दौरान निवेश, आर्थिक सहयोग और पुनर्निर्माण से जुड़े कई विषयों पर बातचीत हुई। युद्ध से प्रभावित सीरिया अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को लेकर कई समझौतों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ता है तो इससे सीरिया के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।

    मैक्रों ने पिछले कुछ समय में यूरोपीय देशों के बीच सीरिया पर लगाए गए कई प्रतिबंधों में राहत देने की वकालत की है। उनका मानना है कि आर्थिक पुनर्निर्माण और मानवीय सहायता को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। इसी दृष्टिकोण के साथ उनकी यह यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों से भी जुड़ी मानी जा रही है।

    वर्तमान सीरियाई नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे देश में स्थिर प्रशासन स्थापित करना और विभिन्न समुदायों का विश्वास जीतना है। लंबे समय तक चले संघर्ष के बाद देश के कई हिस्सों में अभी भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं। राजधानी दमिश्क अपेक्षाकृत शांत मानी जाती रही है, लेकिन हालिया विस्फोटों ने यह संकेत दिया है कि सुरक्षा व्यवस्था अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी है। ऐसे घटनाक्रम सरकार के लिए आंतरिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय भरोसे, दोनों स्तरों पर चुनौती बन सकते हैं।

    सीरिया पिछले डेढ़ दशक से संघर्ष, आर्थिक संकट और बड़े पैमाने पर मानवीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। युद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए, बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और देश का बुनियादी ढांचा गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। अस्पताल, सड़कें, स्कूल और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं लंबे संघर्ष की वजह से भारी नुकसान झेल चुकी हैं। ऐसे में पुनर्निर्माण और विदेशी निवेश सीरिया की प्राथमिक आवश्यकताओं में शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मैक्रों की यह यात्रा केवल फ्रांस और सीरिया के संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण संकेत है। हालांकि दमिश्क में हुए विस्फोटों ने इस यात्रा पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं की छाया डाल दी है, फिर भी दोनों देशों ने संवाद और सहयोग की प्रक्रिया जारी रखने का संकेत दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह कूटनीतिक पहल सीरिया के पुनर्निर्माण, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को किस दिशा में आगे बढ़ाती है।

  • नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नेशनल ग्रिड फेल होते ही ठहर गया पूरा देश, क्यूबा के ब्लैकआउट ने बताया बिजली संकट कैसे संचार, पानी, अस्पताल और अर्थव्यवस्था पर डालता है असर

    नई दिल्ली । क्यूबा में एक बार फिर देशव्यापी बिजली संकट ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर दिया है। राष्ट्रीय बिजली ग्रिड ठप होने के बाद देश के अधिकांश हिस्सों में बिजली आपूर्ति रुक गई, जिससे संचार, परिवहन, जलापूर्ति, स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ा। लगभग 96 लाख की आबादी वाले इस द्वीपीय देश में यह वर्ष के भीतर तीसरी बड़ी बिजली आपूर्ति बाधित होने की घटना मानी जा रही है। इस घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी देश की ऊर्जा व्यवस्था बाधित होने पर आधुनिक जीवन का लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।

    बिजली बंद होते ही सबसे पहले संचार सेवाओं पर असर दिखाई देता है। मोबाइल टावर और इंटरनेट नेटवर्क सीमित समय तक बैटरी या जनरेटर के सहारे चलते हैं, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर उनकी क्षमता समाप्त हो जाती है। इसके बाद मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट सेवाएं बाधित होने लगती हैं, जिससे लोगों के बीच संपर्क टूट जाता है। डिजिटल संचार पर निर्भर सरकारी और निजी सेवाओं के संचालन में भी कठिनाइयां बढ़ जाती हैं।

    बिजली संकट का दूसरा बड़ा प्रभाव परिवहन व्यवस्था पर पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल बंद होने से प्रमुख शहरों में यातायात अव्यवस्थित हो जाता है। बिजली आधारित रेल सेवाएं, मेट्रो और अन्य सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होते हैं, जिससे यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। जिन क्षेत्रों में ईंधन की उपलब्धता पहले से सीमित हो, वहां परिवहन व्यवस्था और अधिक प्रभावित हो सकती है तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी बाधित होने लगती है।

    राष्ट्रीय स्तर पर बिजली आपूर्ति रुकने का सीधा असर वित्तीय लेनदेन पर भी पड़ता है। एटीएम, डिजिटल भुगतान प्रणाली, कार्ड स्वाइप मशीनें और ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने से बाजार की गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। जिन लोगों के पास नकद राशि उपलब्ध नहीं होती, उन्हें दैनिक जरूरत की वस्तुएं खरीदने में भी कठिनाई होती है। इससे स्थानीय व्यापार और खुदरा बाजारों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

    जलापूर्ति व्यवस्था भी बिजली पर निर्भर होने के कारण गंभीर रूप से प्रभावित होती है। नगरों और महानगरों में पानी की आपूर्ति करने वाले पंप बंद हो जाते हैं, जिससे ऊंची इमारतों और आवासीय परिसरों में पानी का दबाव समाप्त हो जाता है। कुछ ही समय में पीने और घरेलू उपयोग के पानी की कमी महसूस होने लगती है। लंबे समय तक संकट बने रहने पर स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है।

    स्वास्थ्य सेवाओं पर भी ऐसे संकट का गहरा प्रभाव पड़ता है। अस्पतालों में सीमित अवधि तक जनरेटर की सुविधा उपलब्ध रहती है, लेकिन लंबे समय तक बिजली नहीं रहने पर दवाओं और टीकों के कोल्ड स्टोरेज, चिकित्सा उपकरणों तथा नियमित उपचार सेवाओं पर असर पड़ सकता है। कई स्थानों पर गैर-आपातकालीन चिकित्सा प्रक्रियाओं को टालना पड़ सकता है, जिससे मरीजों की परेशानियां बढ़ जाती हैं।

    क्यूबा में बिजली संकट के पीछे पुराने बिजली संयंत्रों, ईंधन आपूर्ति की चुनौतियों और ऊर्जा अवसंरचना पर बढ़ते दबाव को प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। लंबे समय से चल रही ऊर्जा संबंधी समस्याओं ने देश की बिजली व्यवस्था को कमजोर किया है। ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश के लिए मजबूत ऊर्जा अवसंरचना केवल विकास का आधार ही नहीं, बल्कि सामान्य जनजीवन, आर्थिक गतिविधियों और आवश्यक सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है।

  • 'बाबरी पर आंसू बहाने वालों को अयोध्या पर बोलने का अधिकार नहीं', प्रतापगढ़ में विपक्ष पर योगी का तीखा हमला, आस्था और वक्फ को लेकर साधा निशाना

    'बाबरी पर आंसू बहाने वालों को अयोध्या पर बोलने का अधिकार नहीं', प्रतापगढ़ में विपक्ष पर योगी का तीखा हमला, आस्था और वक्फ को लेकर साधा निशाना

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में आयोजित एक जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए अयोध्या, राम मंदिर और वक्फ कानून जैसे मुद्दों पर विपक्ष के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो राजनीतिक दल पहले भगवान श्रीराम के अस्तित्व और अयोध्या से जुड़े मुद्दों पर अलग रुख अपनाते रहे, वे अब हिंदुओं की आस्था का हवाला देकर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनता ऐसे दोहरे रवैये को भलीभांति समझती है और समय आने पर उसका जवाब भी देती है।

    उन्होंने राम मंदिर से जुड़े दान विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विषय को विपक्ष ने वास्तविक तथ्यों से अधिक राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया। मुख्यमंत्री के अनुसार अयोध्या का वर्तमान स्वरूप धार्मिक, सांस्कृतिक और आधारभूत विकास का प्रतीक बन चुका है। उन्होंने कहा कि शहर में आधुनिक सुविधाओं, बेहतर संपर्क व्यवस्था और तीर्थ विकास के लिए व्यापक स्तर पर कार्य हुआ है, जिससे देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को लाभ मिल रहा है।

    मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की राजनीति पर निशाना साधते हुए कहा कि इन दलों के पास जनता के सामने रखने के लिए विकास का कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं बचा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष समाज को जातीय आधार पर विभाजित करने और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक रूप देने की कोशिश करता रहा है। उनके अनुसार लोकतांत्रिक राजनीति का आधार विकास, सुशासन और जनहित होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन पैदा करना।

    अयोध्या और राम मंदिर के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने कहा कि जो लोग पहले इन विषयों पर अलग दृष्टिकोण रखते थे, वे अब स्वयं को आस्था का समर्थक बताने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त करने का अधिकार है, लेकिन राजनीतिक दलों को अपने पुराने रुख और वर्तमान बयानों के बीच की विसंगतियों का भी जवाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनता इतिहास और वर्तमान दोनों को याद रखती है।

    अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने वक्फ कानून का भी उल्लेख किया और कहा कि सरकार का उद्देश्य सभी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन को सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि किसी भी विषय पर सुधारात्मक कदम उठाए जाने पर विपक्ष अनावश्यक विरोध करता है, जबकि सुधारों का उद्देश्य आम लोगों के हितों की रक्षा करना होता है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि राज्य सरकार विकास, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को समान प्राथमिकता दे रही है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे राजनीतिक बयानों के बजाय सरकार के कार्यों और विकास योजनाओं के आधार पर निर्णय लें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उत्तर प्रदेश में विकास, निवेश, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में चल रहे प्रयास आने वाले समय में राज्य की प्रगति को नई गति देंगे और जनता का विश्वास इसी प्रकार बना रहेगा।