क्लींजिंग है सबसे पहला और जरूरी कदम
क्रीम नहीं जेल और वॉटर बेस्ड प्रोडक्ट्स चुनें
एंटीऑक्सिडेंट सीरम से बढ़ाएं नैचुरल ग्लो
हाइड्रेशन है सबसे बड़ी कुंजी
हफ्ते में दो बार करें एक्सफोलिएशन
सनस्क्रीन कभी न भूलें
हल्का मेकअप और सही टोनर का इस्तेमाल

क्लींजिंग है सबसे पहला और जरूरी कदम
क्रीम नहीं जेल और वॉटर बेस्ड प्रोडक्ट्स चुनें
हाइड्रेशन है सबसे बड़ी कुंजी
सनस्क्रीन कभी न भूलें

खामनेई की मौत के बाद ईरान में 40 दिन का राजकीय शोक और सात दिन की छुट्टी घोषित की गई। ईरानी इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा कि देश ने एक महान नेता खो दिया है। वहीं, ईरानी सेना ने खतरनाक अभियान की चेतावनी दी और अमेरिकी ठिकानों पर हमले की योजना बनाई।
अमेरिका-इजराइल ने किया आक्रमण
इजराइल और अमेरिका ने संयुक्त हमले में ईरान पर 24 घंटे में 1,200 से अधिक बम गिराए। इस हमले में सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत हुई। उनके ऑफिस कॉम्प्लेक्स पर 30 मिसाइलों से हमला हुआ। हमले में उनके परिवार के सदस्य और 40 कमांडर्स भी मारे गए। इजराइल के पीएम नेतन्याहू और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने खामनेई की मौत की पुष्टि की।
इस हमले में 200 से अधिक लोग मारे गए और 740 से ज्यादा घायल हुए। एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 148 छात्राओं की मौत हो गई।
ईरान का जवाबी हमला
ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का जवाब देते हुए 9 देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमला किया। इसमें इजराइल पर करीब 400 मिसाइलें दागी गईं। इसके अलावा कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, सऊदी अरब, UAE में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। दुबई में पाम होटल एंड रिसॉर्ट और बुर्ज खलीफा के पास ड्रोन हमला हुआ।
पृष्ठभूमि और विवाद
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच विवाद के मुख्य कारण हैं: न्यूक्लियर प्रोग्राम पर शक, बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास, क्षेत्रीय अस्थिरता और मिडिल ईस्ट में राजनीतिक दखल। अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इसके जवाब में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज करने और कठोर बयान देने जैसे कदम उठाए।
अयातुल्ला अली खामनेई का जीवन
खामनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को मशहद में हुआ। उन्होंने 1963 में शाह के खिलाफ भाषण दिया और गिरफ्तार हुए। 1979 की इस्लामी क्रांति में वे प्रमुख आंदोलनकारी बने। 1981 में उन पर बम हमले हुए, उसी वर्ष वे ईरान के राष्ट्रपति बने। 1989 में खोमैनी की मौत के बाद उन्हें सुप्रीम लीडर बनाया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक कट्टर शासन का आरोप लगाते हैं।

जानकारी के अनुसार, ट्रक चालक और तस्कर वन विभाग की टीम को देखकर ट्रक की रफ्तार बढ़ाकर भागने लगे। वन विभाग की टीम ने उनका पीछा किया और ट्रक को रोकने के लिए लकड़ी से उस पर पथराव करना पड़ा। इस घबराहट में तस्कर ट्रक को बीच रास्ते में छोड़कर अंधेरे में भाग निकले।
वन विभाग ने ट्रक को जौरा वन क्षेत्र कार्यालय में जब्त कर आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए पुलिस को सौंप दिया है। यह क्षेत्र लंबे समय से खैर की लकड़ी की तस्करी के लिए जाना जाता है और वन विभाग ने इससे पहले भी कई बार तस्करों के खिलाफ कार्रवाई की है।
जौरा रेंजर आर. प्रजापति ने बताया कि पहाड़गढ़ के जंगलों में खैर की लकड़ी की भारी तस्करी हो रही है और अपराधी अक्सर वन विभाग की नाक के नीचे भी अवैध कार्य करते हैं। उन्होंने कहा, “हमारी टीम ने ट्रक को रोकने के लिए रात्रि में कार्रवाई की, ट्रक तस्करों को छोड़कर भागना पड़ा। ट्रक जब्त कर लिया गया है और कार्रवाई जारी है।”
वन विभाग की इस कार्रवाई ने यह संदेश दिया है कि जंगलों में अवैध लकड़ी तस्करी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और आने वाले समय में भी टीम सतर्क रहेगी।

प्रताड़ना की इंतहा:
लॉज के कमरा नंबर 107 में खौफनाक अंत
बीते 28 जनवरी को कैलाश बिना किसी को बताए घर से निकले और माखननगर स्थित ‘राधे-राधे लॉज’ पहुँच गए। अगले दिन जब उन्होंने दरवाजा नहीं खोला, तो होटल प्रबंधन की सूचना पर पुलिस पहुँची। कमरे के अंदर का दृश्य विचलित करने वाला था; बिस्तर पर कैलाश का निर्जीव शरीर पड़ा था और पास ही सल्फास की खाली डिब्बी मिली। उनके पास से बरामद एक भावुक सुसाइड नोट ने उन चेहरों को बेनकाब कर दिया, जो उनकी मौत की पटकथा लिख रहे थे।
पुलिस की कार्रवाई: 30 दिन बाद कसा शिकंजा
थाना प्रभारी उषा मरावी के नेतृत्व में पुलिस ने एक महीने तक सुसाइड नोट की हैंडराइटिंग और गवाहों के बयानों का बारीकी से मिलान किया।शनिवार रात पुलिस ने तीनों आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है।
आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए विशेष टीमें गठित की गई हैं। पुलिस अब यह भी जांच रही है कि इन सूदखोरों ने और कितने व्यापारियों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है।यह घटना एक कड़वा सबक है कि अवैध ब्याजखोरी का धंधा केवल पैसा नहीं, बल्कि इंसान का मानसिक सुकून और अंततः उसकी सांसें भी छीन लेता है। 30 दिन बाद हुई यह कानूनी कार्रवाई पीड़ित परिवार के लिए इंसाफ की पहली किरण है।

बैतूल से उज्जैन: मौत का लंबा सफर
निखिल मूल रूप से बैतूल जिले के सारणी का रहने वाला था। वह घर का इकलौता बेटा था, जिसके पिता की मौत पहले ही एक हादसे में हो चुकी थी।
फरवरी से लापता: निखिल फरवरी में काम का बहाना बनाकर घर से निकला था। उसने परिवार के सभी सदस्यों को ब्लॉक कर दिया था ताकि कोई उसकी लोकेशन न जान सके।
350 KM की यात्रा: अपनी प्रेमिका से मिलने की जिद में वह स्कूटी चलाकर करीब 350 किलोमीटर दूर उज्जैन पहुँचा। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों से दोनों के बीच बातचीत बंद थी, जिससे निखिल गहरे तनाव में था।
वारदात: पलक झपकते ही खत्म हो गई जिंदगी
शनिवार शाम जब निखिल अपनी प्रेमिका के रिश्तेदार के घर पहुँचा, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि उसके पास हथियार है। घर के अंदर जाते ही उसने अचानक अपनी छाती पर बंदूक तानी और ट्रिगर दबा दिया। गोली चलने की गूँज सुनते ही इलाके में हड़कंप मच गया। मौके पर पहुँची पुलिस को युवक का शव और उसके आखिरी इंस्टाग्राम पोस्ट मिले, जो उसने सुसाइड से ठीक पहले अपलोड किए थे।
तबाही के पीछे का सच: इकलौता बेटा और बेबस माँ
निखिल की मौत ने उसके परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया है। घर की आर्थिक स्थिति पहले ही ठीक नहीं थी; दादी की पेंशन और परिजनों की मेहनत से घर चलता था। इकलौते बेटे की इस सनक भरी मौत ने उसकी माँ को पूरी तरह तोड़ दिया है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि युवक के पास अवैध हथियार कहाँ से आया और क्या उसे उकसाने में किसी और की भी भूमिका थी।
पुलिस की जांच और CCTV
नीलगंगा थाना पुलिस ने घटनास्थल के पास लगे CCTV फुटेज कब्जे में लिए हैं, जिसमें निखिल की आखिरी गतिविधियां दिखाई दे रही हैं। पुलिस उसके मोबाइल फोन और सोशल मीडिया अकाउंट्स को खंगाल रही है ताकि इस आत्मघाती कदम के पीछे की कड़ियों को जोड़ा जा सके।
यह घटना याद दिलाती है कि रिश्तों का टूटना दुखद हो सकता है, लेकिन अपनी जान लेना समाधान नहीं; निखिल ने 350 KM का सफर अपनी मोहब्बत पाने के लिए तय किया था, पर अंत में उसने अपने परिवार को कभी न खत्म होने वाला दर्द दे दिया।

सबसे पहले आते हैं नरगिस दत्त और राजकुमार पर फिल्माए गए गीत ‘होली आई रे’ की। 1950 में रिलीज हुए इस गाने को शकील बदायूनी ने लिखा था। यह गाना बॉलीवुड के इतिहास में होली के सबसे बेहतरीन और कालजयी गीतों में से एक माना जाता है। आज भी जब यह गाना बजता है, त्योहार की खुशियाँ दोगुनी हो जाती हैं।
1975 की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘शोले’ का गाना ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ भी हर होली पर सुना और गाया जाता है। हेमा मालिनी और धर्मेंद्र पर फिल्माया गया यह गाना आनंद बक्शी के लिखे शब्दों और मस्त धुन के कारण हमेशा लोकप्रिय रहा। यह गाना इस त्योहार की मस्ती और उमंग का सबसे बेहतरीन प्रतीक बन चुका है।
बॉलीवुड की क्लासिक फिल्मों में ‘सिलसिला’ का गाना ‘रंग बरसे’ कभी पीछे नहीं रहता। अमिताभ बच्चन और रेखा पर फिल्माया गया यह गीत त्रिकोणीय प्रेम कहानी की पृष्ठभूमि में बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने के बोल हरिवंश राय बच्चन ने लिखे थे और आज भी यह गाना होली पार्टीज़ और उत्सवों में सबका फेवरेट बना हुआ है।
1990 के दशक की यादों में बसे जूही चावला और शाहरुख खान के फिल्म ‘डर’ का गाना ‘अंग से अंग लगाना’ भी होली की धूम में अपना खास स्थान रखता है। इस गीत को आनंद बक्शी ने लिखा और विनोद राठौड़, अल्का याग्निक और सुदेश भोसले ने अपनी आवाज दी। शाहरुख का नेगेटिव रोल और जूही के साथ उनकी केमिस्ट्री इसे आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाती है।
और अंत में, अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया गाना ‘होली खेले रघुबीरा’ हमेशा होली के रंगों में चार चाँद लगा देता है। इसकी धुन और गीतकार की कला इसे हर होली पार्टी में बजाने योग्य बनाती है।
ये पांच गाने सिर्फ संगीत का आनंद नहीं देते, बल्कि हर बार होली का जश्न और उत्साह दोगुना कर देते हैं। चाहे यह पुरानी फिल्में हों या आधुनिक पार्टीज़, इन गानों की धुन और बोल हर उम्र के लोगों के लिए होली के त्योहार को और रंगीन बना देते हैं। इस होली, इन गानों को सुनकर आप भी अपने घर और दोस्तों के साथ त्योहार का मजा दोगुना कर सकते हैं।
