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  • World Updates: पेरू में 5.8 तीव्रता का भूकंप, 27 घायल; कैलिफोर्निया में जंगल की आग और सूडान-लेबनान में हिंसा से बढ़ी चिंता

    World Updates: पेरू में 5.8 तीव्रता का भूकंप, 27 घायल; कैलिफोर्निया में जंगल की आग और सूडान-लेबनान में हिंसा से बढ़ी चिंता



    नई दिल्ली। दुनियाभर में प्राकृतिक आपदाओं और हिंसक संघर्षों ने चिंता बढ़ा दी है। पेरू में भूकंप, अमेरिका के कैलिफोर्निया में जंगल की आग, सूडान में ड्रोन हमला और दक्षिणी लेबनान पर इजरायली हवाई हमलों जैसी घटनाओं ने कई देशों को प्रभावित किया है। प्रशासनिक एजेंसियां राहत और बचाव कार्यों में जुटी हुई हैं, जबकि हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।

    पेरू के दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में मंगलवार देर रात 5.8 तीव्रता का भूकंप आया, जिससे कई इमारतों को नुकसान पहुंचा और 27 लोग घायल हो गए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार भूकंप का केंद्र इका क्षेत्र के पाम्पा डी टेट शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर था और इसकी गहराई 56.5 किलोमीटर दर्ज की गई। भूकंप के बाद प्रभावित इलाकों में अफरा-तफरी मच गई। कई इमारतों में दरारें आ गईं और कुछ ढांचे आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। राहत की बात यह रही कि अब तक किसी के मारे जाने की खबर सामने नहीं आई है। पेरू के रक्षा मंत्री अमादेव फ्लोर्स ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और सैन लुइस गोंजागा यूनिवर्सिटी समेत अन्य क्षतिग्रस्त भवनों का निरीक्षण किया। प्रशासन राहत, मरम्मत और बचाव कार्यों में जुटा हुआ है। पेरू प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में स्थित है, जहां ज्वालामुखियों और फॉल्ट लाइनों की वजह से अक्सर भूकंप आते रहते हैं।

    उधर अमेरिका के दक्षिणी कैलिफोर्निया में जंगल की आग ने भारी तबाही मचाई है। तेज हवाओं की वजह से लगी आग तेजी से फैलती चली गई, जिसके बाद 17 हजार से अधिक लोगों को अपने घर छोड़ने के आदेश दिए गए। यह आग लॉस एंजिल्स से लगभग 48 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम स्थित सिमी वैली के पहाड़ी इलाकों में शुरू हुई। वेंटुरा काउंटी अग्निशमन विभाग के अनुसार आग ने पांच वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को जलाकर राख कर दिया और कम से कम एक घर पूरी तरह नष्ट हो गया। दमकल विभाग के प्रवक्ता एंड्रयू डाउड ने बताया कि शुरुआत में 48 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार की हवाओं ने आग को और भड़काया, लेकिन रात में हवा धीमी पड़ने से राहत कार्यों में मदद मिली। प्रशासन ने कई इलाकों में अभी भी निकासी आदेश जारी रखे हैं।

    इसी बीच दमकलकर्मी दक्षिणी कैलिफोर्निया तट के पास स्थित सांता रोजा द्वीप पर लगी भीषण आग से भी जूझ रहे हैं। यहां करीब 59 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आग फैल चुकी है। आग में एक केबिन और उपकरण शेड जलकर नष्ट हो गए हैं, जबकि राष्ट्रीय उद्यान सेवा के 11 कर्मचारियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है।

    अफ्रीकी देश सूडान में भी हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। पश्चिमी कोरडोफान प्रांत के घुबायश कस्बे में मंगलवार को एक व्यस्त बाजार पर ड्रोन हमला किया गया, जिसमें 28 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। स्थानीय मानवाधिकार संगठन ‘इमरजेंसी लॉयर्स’ ने दावा किया कि हमला सूडानी सेना की ओर से किया गया। संगठन के मुताबिक हमला उस समय हुआ जब बाजार में बड़ी संख्या में नागरिक मौजूद थे। हालांकि सूडानी सेना ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने नागरिकों को निशाना नहीं बनाया। सेना के अधिकारियों के अनुसार ड्रोन हमले में रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ) के लड़ाकू वाहनों को निशाना बनाया गया था। सूडान में अप्रैल 2023 से सेना और आरएसएफ के बीच भीषण संघर्ष जारी है, जिसने देश को गृहयुद्ध जैसी स्थिति में धकेल दिया है।

    वहीं दक्षिणी लेबनान पर इजरायल के हवाई हमलों में कम से कम 19 लोगों की मौत हो गई। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार मृतकों में चार महिलाएं और तीन बच्चे भी शामिल हैं। यह हमला इजरायल और हिजबुल्ला के बीच जारी तनाव के बीच हुआ है। अमेरिका की मध्यस्थता से युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच लगभग रोज हमले जारी हैं। लगातार हो रहे हमलों ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है।

    अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में भी एक दर्दनाक हादसा सामने आया। मिडटाउन मैनहट्टन में एक महिला खुले गड्ढे में गिर गई, जिससे उसकी मौत हो गई। पुलिस के अनुसार 56 वर्षीय महिला अपनी कार पार्क करने के बाद बाहर निकल रही थी, तभी वह सड़क पर मरम्मत के लिए बनाए गए खुले गड्ढे में गिर गई। बाद में दमकलकर्मियों ने उसे बाहर निकाला, लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बिजली कंपनी कॉन एडिसन ने बताया कि शुरुआती जांच में पता चला है कि महिला के गिरने से कुछ मिनट पहले एक भारी ट्रक गुजरने के कारण गड्ढे का ढक्कन हट गया था।

    दुनियाभर में एक साथ सामने आई इन घटनाओं ने सुरक्षा, प्राकृतिक आपदाओं और युद्ध जैसे मुद्दों को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। कई देशों में प्रशासन राहत एवं बचाव कार्यों में जुटा है, जबकि प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित रखने के प्रयास लगातार जारी हैं।

  • गुना PWD ऑफिस पर कुर्की की कार्रवाई: कर्मचारी का बकाया न चुकाने पर एक्शन

    गुना PWD ऑफिस पर कुर्की की कार्रवाई: कर्मचारी का बकाया न चुकाने पर एक्शन


    मध्य प्रदेश । गुना में लोक निर्माण विभाग (PWD) की लापरवाही एक बार फिर अदालत की सख्ती का कारण बनी। सेवानिवृत्त कर्मचारी के करीब 36 लाख रुपए के एरियर और वेतन भुगतान न किए जाने पर बुधवार को जिला न्यायालय के आदेश पर पीडब्ल्यूडी कार्यालय में दोबारा कुर्की की कार्रवाई की गई। इससे पहले फरवरी 2026 में भी कोर्ट की टीम विभागीय संपत्तियों की कुर्की कर चुकी थी, लेकिन विभाग ने दो महीने में भुगतान करने का लिखित आश्वासन देकर समय ले लिया था। तय अवधि बीत जाने के बावजूद भुगतान नहीं होने पर अदालत को फिर हस्तक्षेप करना पड़ा।

    मामला पीडब्ल्यूडी के सेवानिवृत्त कर्मचारी कौशल किशोर राठौर से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि विभाग ने लंबे समय तक उन्हें उनके पद के अनुरूप वेतन नहीं दिया। न्याय पाने के लिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां हर स्तर पर फैसला कर्मचारी के पक्ष में आया। अदालतों ने विभाग को बकाया वेतन और एरियर का भुगतान करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।

    विभाग ने वर्ष 2013 तक के एरियर का भुगतान तो कर दिया, लेकिन 2014 से लेकर रिटायरमेंट तक की लगभग 36 लाख रुपए की राशि रोक ली गई। लगातार आदेशों और नोटिसों के बावजूद जब भुगतान नहीं हुआ, तो कौशल किशोर राठौर ने अवमानना और इजरा याचिका दायर की। इसके बाद न्यायालय ने विभाग के खिलाफ वसूली और कुर्की की कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए।

    फरियादी कौशल किशोर राठौर ने बताया कि फरवरी में हुई पहली कुर्की के दौरान विभागीय अधिकारियों ने अदालत में लिखित में यह भरोसा दिया था कि दो महीने के भीतर पूरी राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसी कारण कोर्ट की टीम को दोबारा पीडब्ल्यूडी कार्यालय पहुंचकर कुर्की की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।

    बुधवार को न्यायालय की टीम ने विभागीय संपत्तियों का आकलन किया और आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई पूरी की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 31 दिसंबर 2026 तक कुर्की के माध्यम से पूरी राशि वसूलकर कर्मचारी को भुगतान सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं।

    कानूनी जानकारों का कहना है कि यह मामला सरकारी विभागों द्वारा अदालत के आदेशों की अनदेखी का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। यदि विभाग ने अब भी भुगतान नहीं किया, तो आने वाले समय में विभाग की अन्य संपत्तियों पर भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

    इस कार्रवाई के बाद विभागीय हलकों में भी हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि अदालत अब इस मामले में किसी भी प्रकार की ढिलाई के मूड में नहीं है और आदेशों की अवहेलना पर आगे और कठोर कदम उठाए जा सकते हैं।

  • सड़क पर नमाज पर रोक के बाद सियासत गरमाई, पूर्व डीजीपी बृजलाल ने योगी फैसले का किया समर्थन

    सड़क पर नमाज पर रोक के बाद सियासत गरमाई, पूर्व डीजीपी बृजलाल ने योगी फैसले का किया समर्थन


    नई दिल्ली ।  उत्तर प्रदेश में सड़क पर नमाज पढ़ने को लेकर लगाए गए प्रतिबंध के बाद राज्य की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है, जहां इस निर्णय पर समर्थन और विरोध दोनों ही स्वर तेज हो गए हैं। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक और वर्तमान राज्यसभा सांसद बृजलाल ने इस फैसले का समर्थन करते हुए इसे कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की ऐसी गतिविधि, जिससे यातायात या आम जनजीवन प्रभावित होता है, उसे नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि समाज में शांति और अनुशासन बना रहे।

    बृजलाल ने अपने बयान में यह भी कहा कि समय के साथ सरकारों की प्राथमिकताएं और प्रशासनिक दृष्टिकोण बदलते रहे हैं, और पहले के दौर में कई बार सरकारी और आधिकारिक परिसरों में धार्मिक आयोजनों को लेकर अलग तरह की परंपराएं देखने को मिलती थीं। उनके अनुसार, विभिन्न राजनीतिक कालखंडों में धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर सरकारी स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए गए, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक संतुलन पर भी असर पड़ता रहा है।

    इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति में धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को लेकर बहस को जन्म दे दिया है। वर्तमान सरकार का कहना है कि सार्वजनिक सड़कों पर किसी भी प्रकार की भीड़ या आयोजन, चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित हो, यदि यातायात या सामान्य व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो उसे अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, धार्मिक गतिविधियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था और निर्धारित स्थानों पर आयोजन की अनुमति देने की बात भी कही गई है, जिससे धार्मिक स्वतंत्रता और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में धार्मिक संवेदनशीलता और सार्वजनिक नीति के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण विभिन्न राजनीतिक दल इस विषय पर अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहे हैं। एक ओर सरकार इसे व्यवस्था सुधार और कानून पालन का हिस्सा बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी और कुछ सामाजिक संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं।

    इस बीच बृजलाल के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है, क्योंकि उन्होंने न केवल वर्तमान नीति का समर्थन किया है, बल्कि पिछले प्रशासनिक और राजनीतिक दौरों की तुलना करते हुए यह संकेत देने की कोशिश की है कि समय के साथ शासन शैली में बड़ा बदलाव आया है। उनके अनुसार, प्रशासन का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार के सामाजिक तनाव को रोकना और सभी समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।

    फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है और आने वाले समय में यह बहस और अधिक गहराने की संभावना है, क्योंकि धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को लेकर नीति निर्धारण हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है।

  • ई-फार्मेसी के विरोध में सड़कों पर उतरे केमिस्ट, पीएम के नाम सौंपा ज्ञापन

    ई-फार्मेसी के विरोध में सड़कों पर उतरे केमिस्ट, पीएम के नाम सौंपा ज्ञापन


    मध्य प्रदेश । शिवपुरी में बुधवार को ऑनलाइन दवाओं की बिक्री के विरोध में केमिस्टों की देशव्यापी हड़ताल का बड़ा असर देखने को मिला। ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के आह्वान पर जिलेभर के करीब 350 मेडिकल स्टोर पूरे दिन बंद रहे। इनमें शहर के लगभग 150 मेडिकल प्रतिष्ठान भी शामिल थे। केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन ने इस दौरान विरोध प्रदर्शन करते हुए कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री Narendra Modi के नाम ज्ञापन सौंपा और ऑनलाइन दवा बिक्री पर रोक लगाने की मांग की।

    केमिस्टों ने ज्ञापन में आरोप लगाया कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स बिना वैध चिकित्सकीय पर्चे के दवाओं की होम डिलीवरी कर रहे हैं, जो नियमों के खिलाफ है। साथ ही भारी डिस्काउंट देकर छोटे मेडिकल व्यापारियों के कारोबार को प्रभावित किया जा रहा है। एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से नियम GSR 817(E) और GSR 220(E) को तत्काल वापस लेने की मांग उठाई है।

    एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. चन्द्र प्रकाश गोयल और सचिव गोपाल दास अग्रवाल ने कहा कि दवाएं कोई सामान्य उपभोक्ता वस्तु नहीं हैं, बल्कि सीधे जन स्वास्थ्य से जुड़ी होती हैं। उनका कहना है कि अनियंत्रित ऑनलाइन बिक्री मरीजों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि बार-बार शिकायतों के बावजूद सरकार इस मुद्दे पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही है।

    केमिस्टों ने यह भी कहा कि कोविड महामारी के दौरान स्थानीय मेडिकल स्टोरों ने फ्रंटलाइन हेल्थ सपोर्ट की भूमिका निभाई थी और लोगों तक दवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इसके बावजूद आज छोटे दवा व्यापारियों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

    हालांकि जिलेभर में मेडिकल स्टोर बंद रहने के बावजूद मरीजों को ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। हड़ताल को ध्यान में रखते हुए एसोसिएशन ने पहले से ही आवश्यक और आपातकालीन दवाओं की व्यवस्था कर दी थी। इसके अलावा प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र और अस्पताल परिसरों में संचालित मेडिकल स्टोर सामान्य रूप से खुले रहे, जहां जरूरतमंद मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराई गईं।

    दवा व्यापारियों का कहना है कि यदि सरकार ने ऑनलाइन दवा बिक्री को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में आंदोलन और तेज किया जाएगा। उनका मानना है कि बिना निगरानी के ऑनलाइन दवा वितरण से न केवल छोटे व्यापारियों को नुकसान हो रहा है, बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।

  • रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा प्रदर्शन करते हुए बेलारूस के साथ संयुक्त परमाणु सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। तीन दिन तक चलने वाले इस महाअभ्यास में रूस ने 65 हजार सैनिकों, 140 लड़ाकू विमानों, 200 मिसाइल लॉन्चरों, 73 युद्धपोतों और 13 पनडुब्बियों को उतारा है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार इस अभ्यास में करीब 7800 प्रकार के हथियार और सैन्य उपकरण शामिल किए गए हैं। यह सैन्य अभ्यास 19 मई से शुरू होकर 21 मई तक चलेगा और इसे यूक्रेन तथा नाटो देशों के लिए एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।

    रूस ने यह अभ्यास ऐसे समय पर शुरू किया है जब यूक्रेन लगातार रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन हमले तेज कर रहा है। यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे होने वाले हैं और इस दौरान कई बार रूस अपने परमाणु हथियारों और मिसाइलों का प्रदर्शन कर चुका है। इस बार रूस ने परमाणु हमला करने में सक्षम मिसाइल प्रणालियों को भी अभ्यास में शामिल किया है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो जारी किया जिसमें सैनिक मोबाइल इस्कंदर-एम मिसाइल सिस्टम को लॉन्च साइट तक ले जाते नजर आए। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी मारक क्षमता करीब 500 किलोमीटर बताई जाती है।

    रूसी सेना बेलारूस में तैनात टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन के इस्तेमाल का अभ्यास भी कर रही है। हाल ही में रूस ने बेलारूस में ओरेशनिक मिसाइल प्रणाली भी तैनात की है, जो परमाणु हमला करने में सक्षम मानी जाती है। बेलारूस की सीमा कई नाटो देशों से लगती है, इसलिए इस तैनाती को यूरोप के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। रूस का कहना है कि नाटो देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और यूक्रेन को मिल रहे पश्चिमी समर्थन से उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

    यह अभ्यास ऐसे समय पर हो रहा है जब रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin चीन के दौरे पर हैं। इस दौरान रूस और चीन के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। माना जा रहा है कि रूस वैश्विक स्तर पर यह संदेश देना चाहता है कि वह पश्चिमी दबाव के बावजूद पीछे हटने वाला नहीं है।

    रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते के समाप्त होने के बाद यह पहला बड़ा परमाणु अभ्यास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है। नाटो देशों ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यूरोप में सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    उधर यूक्रेन ने रूस और बेलारूस के इस संयुक्त अभ्यास की कड़ी आलोचना की है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बेलारूस में परमाणु हथियारों की तैनाती और संयुक्त अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। यूक्रेन ने आरोप लगाया कि रूस और बेलारूस परमाणु अप्रसार संधि का उल्लंघन कर रहे हैं। यूक्रेन ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के कदम पूरे यूरोप को अस्थिर कर सकते हैं।

    रूस और नाटो देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस परमाणु अभ्यास ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि यूक्रेन युद्ध जल्द नहीं रुका तो आने वाले समय में यूरोप में सैन्य टकराव का खतरा और गहरा सकता है।

  • कलयुगी मां की क्रूरता: बच्चों को बस में छोड़ा, जेब में लिखी चिट्ठी और प्रेमी संग हो गई फरार

    कलयुगी मां की क्रूरता: बच्चों को बस में छोड़ा, जेब में लिखी चिट्ठी और प्रेमी संग हो गई फरार

    नई दिल्ली ।  महाराष्ट्र के बीड जिले से सामने आया यह मामला मानवता को झकझोर देने वाला है, जहां एक महिला अपने प्रेमी के साथ भागते समय अपने ही दो मासूम बच्चों को बस में लावारिस छोड़कर फरार हो गई। यह घटना समाज और परिवारिक जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

    जानकारी के अनुसार, महिला ने बच्चों को पंढरपुर से संभाजीनगर जा रही बस में अकेला छोड़ दिया। जाने से पहले उसने बेहद हैरान करने वाला कदम उठाते हुए दोनों बच्चों की जेब में एक चिट्ठी रख दी, जिसमें लिखा था कि उनके माता-पिता नहीं हैं और उन्हें यवतमाल पहुंचा दिया जाए। इस चिट्ठी में बच्चों के नाना का मोबाइल नंबर भी दर्ज था, ताकि किसी तरह संपर्क किया जा सके।

    बस में सफर के दौरान जब बच्चे अकेले रोते हुए दिखाई दिए, तो कंडक्टर को उन पर शक हुआ। जांच करने पर जब उसने उनकी जेब में पड़ी चिट्ठी पढ़ी, तो पूरा मामला सामने आ गया। इसके बाद तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने नंबर के आधार पर बच्चों के नाना से संपर्क किया और उन्हें बुलाया गया।

    हालांकि, स्थिति तब और चौंकाने वाली हो गई जब बच्चों के नाना ने भी मासूमों को अपनाने से इनकार कर दिया। बताया गया है कि उन्होंने बच्चों की देखभाल करने के बजाय अपनी बेटी द्वारा घर से ले जाई गई स्कूटी और नकदी के बारे में सवाल किए। इससे बच्चों का भविष्य और अधिक अनिश्चित हो गया।

    बाद में प्रशासन और पुलिस की मदद से दोनों मासूमों को सुरक्षित रूप से बाल कल्याण समिति की निगरानी में बीड के एक अनाथालय में भेज दिया गया, जहां उनकी देखभाल की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करना अब प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

    यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब जन्म देने वाले माता-पिता और नजदीकी रिश्तेदार भी बच्चों को अपनाने से पीछे हट जाएं, तो समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव और सामाजिक दबाव जैसे पहलुओं की भी गहन जांच जरूरी है।

    फिलहाल दोनों बच्चे सुरक्षित हैं, लेकिन उनका भविष्य अभी भी अनिश्चितता के घेरे में है। यह मामला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि बच्चों की देखभाल केवल कानूनी नहीं बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

  • मंदिर विवाद को लेकर बढ़ा तनाव: हमलावरों पर कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन

    मंदिर विवाद को लेकर बढ़ा तनाव: हमलावरों पर कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन


    मध्य प्रदेश। शिवपुरी जिले के करेरा स्थित बगीचा सरकार हनुमान मंदिर में पूजा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बड़ा रूप लेता जा रहा है। बुधवार को राष्ट्रीय गुर्जर स्वाभिमान संघर्ष समिति, संत समाज और सकल समाज के लोगों ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर प्रदर्शन किया और दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी कि यदि 10 दिनों के भीतर निष्पक्ष जांच और गिरफ्तारी नहीं हुई, तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

    समाज के लोगों का कहना है कि 9 मई को मंदिर परिसर में हुई मारपीट और हमले की घटना में दोनों पक्ष शामिल थे, लेकिन पुलिस ने केवल एक पक्ष पर एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई की। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दूसरे पक्ष के खिलाफ अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे समाज में नाराजगी बढ़ रही है।

    राष्ट्रीय गुर्जर स्वाभिमान संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह गुर्जर ने कहा कि मंदिर में घुसकर हमला करने वालों पर कार्रवाई होना चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय पीड़ित पक्ष को ही आरोपी बना दिया गया। उन्होंने पुलिस प्रशासन से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और सभी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की।

    प्रदर्शन के दौरान समाज के लोगों ने आरोप लगाया कि राजेश दुबे उर्फ भोला पंडित करीब 200 लोगों के साथ दोबारा मंदिर पहुंचा और वहां भय और तनाव का माहौल बनाने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि ऐसे लोगों को मंदिर परिसर के आसपास आने से रोका जाए। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि राजेश दुबे के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

    समिति के अनुसार, 9 मई की रात करीब 10:30 बजे राजेश dubey अपने 20 से 25 साथियों के साथ बगीचा सरकार मंदिर पहुंचा था। आरोप है कि वहां मौजूद महंत और श्रद्धालुओं के साथ मारपीट की गई। हालांकि घटना के दौरान दोनों पक्षों के बीच झड़प हुई थी, लेकिन पुलिस कार्रवाई केवल एक तरफ केंद्रित रही।

    प्रदर्शनकारियों ने सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए दावा किया कि वीडियो में दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमला करते दिखाई दे रहे हैं। समाज के लोगों ने कहा कि फुटेज में सुधीर दुबे, प्रिंस दुबे, अंशुमान और धर्मेंद्र सहित कई लोगों की पहचान स्पष्ट रूप से हो रही है। इसके बावजूद पुलिस ने निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की।

    गुर्जर समाज और संत समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि प्रशासन ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाले दिनों में आंदोलन और उग्र हो सकता है। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को 10 दिनों का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि निष्पक्ष जांच, आरोपियों की गिरफ्तारी और दोनों पक्षों पर समान कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, अन्यथा जिलेभर में आंदोलन किया जाएगा।

  • मंदसौर में सोसायटी पंजीयन निरस्तीकरण की तैयारी, प्रशासन ने जारी किया नोटिस

    मंदसौर में सोसायटी पंजीयन निरस्तीकरण की तैयारी, प्रशासन ने जारी किया नोटिस


    मध्य प्रदेश । मंदसौर में सहकारिता विभाग ने वर्षों से बंद पड़ी और निष्क्रिय सहकारी संस्थाओं के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया है। आयुक्त सहकारिता एवं पंजीयक सहकारी संस्थाएं भोपाल के निर्देश पर जिले में ऐसी दर्जनों सोसायटियों के पंजीयन निरस्त करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, जो लंबे समय से काम नहीं कर रही थीं या परिसमापन की स्थिति में थीं। इस कार्रवाई को जिले में सहकारिता व्यवस्था को व्यवस्थित करने की दिशा में अब तक की सबसे बड़ी प्रशासनिक पहल माना जा रहा है।

    सहकारिता उप आयुक्त परमानंद गोडरिया ने बताया कि वर्षों से निष्क्रिय पड़ी संस्थाओं के कारण विभागीय रिकॉर्ड प्रबंधन और सहकारिता तंत्र दोनों प्रभावित हो रहे थे। ऐसे में अब इन संस्थाओं को सहकारिता पटल से हटाने की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर शुरू की गई है। विभाग ने मई 2026 के भीतर पूरी कार्रवाई समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है।

    कार्रवाई की जद में जिले की कई दुग्ध उत्पादक, साख, बीज और ग्रामीण विकास से जुड़ी सहकारी संस्थाएं शामिल हैं। इनमें पीर गुराडिया, लखमाखेड़ी, फतेहपुर, टिडवास, आंत्रीखुर्द, कांचरिया चन्द्रावत, बोतलगंज, हरमाला, कचनारा, नारायणगढ़, मुवाला, भोलिया, बेलारा, उदपुरा, लामगरा, अर्निया गौड़, कवला, गांगसी, ओसरना, कुण्डला खुर्द, निपानिया, धामनिया झाली, गोपालपुरा, गरोठ, लसुडिया, श्रीनगर, पिपलखुटा, मगराना और डोराना जैसी कई सहकारी समितियां शामिल हैं। इनके अलावा सार्थक साख मंदसौर, ग्रामीण विकास साख संस्था बरखेड़ा देव डूंगरी, कंचन साख मंदसौर, प्रबल निधि साख संस्था, सांवलिया बीज धमनार, जय बालाजी बीज राणाखेड़ा और शिवकृपा बीज मकड़ावन जैसी संस्थाओं पर भी पंजीयन निरस्तीकरण की कार्रवाई प्रस्तावित है।

    विभाग की ओर से सभी संबंधित संस्था संचालकों, सदस्यों और पदाधिकारियों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। यदि किसी संस्था को कार्रवाई पर आपत्ति है या वह अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहती है, तो उन्हें एक सप्ताह के भीतर उपायुक्त सहकारिता कार्यालय, मित्र वत्सला रामटेकरी, मंदसौर में उपस्थित होकर आवेदन देना होगा। तय समय सीमा के बाद विभाग आगे की कानूनी कार्रवाई करेगा।

    सहकारिता विभाग का कहना है कि कई संस्थाएं वर्षों से केवल कागजों में चल रही थीं, जबकि उनका कोई वास्तविक संचालन नहीं हो रहा था। इससे न केवल सरकारी रिकॉर्ड प्रभावित हो रहे थे, बल्कि सहकारिता व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी असर पड़ रहा था। विभाग अब सक्रिय और निष्क्रिय संस्थाओं के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित कर व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है।

    प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले समय में अन्य निष्क्रिय संस्थाओं की भी समीक्षा की जाएगी। यदि कोई संस्था लंबे समय तक कार्य नहीं करती पाई गई, तो उसके खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की जाएगी। विभाग का मानना है कि इस अभियान से सहकारिता क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी और सक्रिय संस्थाओं को बेहतर अवसर मिल सकेंगे।

  • पश्चिमी मीडिया भारत को अब भी ‘सपेरों का देश’ क्यों दिखाता है? जानिए विवादों की पूरी कहानी

    पश्चिमी मीडिया भारत को अब भी ‘सपेरों का देश’ क्यों दिखाता है? जानिए विवादों की पूरी कहानी



    नई दिल्ली। नॉर्वे के अखबार Aftenposten में प्रधानमंत्री Narendra Modi को ‘सपेरे’ के रूप में दिखाने वाले कार्टून ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर पश्चिमी मीडिया भारत को पुराने रूढ़िवादी नजरिए से क्यों देखता है। भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, IT और स्टार्टअप सेक्टर में अग्रणी है, फिर भी कई पश्चिमी कार्टून और मीडिया चित्रण भारत को गरीबी, अंधविश्वास, भीड़भाड़ और सांप-सपेरों की छवि तक सीमित कर देते हैं।


    औपनिवेशिक सोच की विरासत
    विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी जड़ें औपनिवेशिक दौर में हैं। 19वीं और 20वीं सदी में ब्रिटिश मीडिया और पत्रिकाएं भारत को पिछड़ा, रहस्यमयी और असभ्य दिखाकर अपने शासन को “सभ्यता मिशन” साबित करने की कोशिश करती थीं। उस समय भारतीयों को अक्सर सपेरों, फकीरों या अंधविश्वासी लोगों के रूप में दिखाया जाता था। यही छवि लंबे समय तक पश्चिमी समाज की सामूहिक सोच का हिस्सा बनी रही।

    आर्थिक प्रगति के बावजूद पुरानी छवि
    भारत आज दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। भारतीय मूल के कई लोग वैश्विक कंपनियों के CEO हैं और IT सेक्टर में भारत की मजबूत पहचान है। इसके बावजूद पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग अब भी भारत को विरोधाभासों वाले देश के रूप में पेश करता है—जहां तकनीकी विकास के साथ गरीबी और अव्यवस्था भी दिखाई जाती है। आलोचकों का कहना है कि कई बार व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर नस्लीय रूढ़ियों को दोहराया जाता है।

    हाल के विवादित कार्टून
    2024 में अमेरिका के एक वेब कॉमिक ने बाल्टीमोर पुल हादसे के बाद भारतीय क्रू को नस्लवादी तरीके से चित्रित किया।

    2023 में जर्मन पत्रिका Der Spiegel ने भारत और चीन की तुलना वाले कार्टून में भारतीय ट्रेन को भीड़भाड़ और अव्यवस्थित रूप में दिखाया।

    2022 में स्पेनिश अखबार La Vanguardia ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर रिपोर्ट में सपेरे का चित्र इस्तेमाल किया।

    2014 में The New York Times को भारत विरोधी माने गए कार्टून पर माफी मांगनी पड़ी थी।

    क्या यह सिर्फ व्यंग्य है या नस्लवाद?
    पश्चिमी देशों में राजनीतिक कार्टूनों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा माना जाता है। लेकिन जब किसी देश या समुदाय को बार-बार एक ही रूढ़ छवि में दिखाया जाए, तो इसे सांस्कृतिक पूर्वाग्रह और नस्लवादी सोच भी माना जाता है। भारतीय आलोचकों का कहना है कि यदि इसी तरह के चित्रण किसी पश्चिमी समुदाय के लिए किए जाते, तो उन्हें तुरंत नस्लवादी माना जाता।

    बदलती वैश्विक ताकत से असहजता?
    कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत के तेजी से उभरने से पश्चिमी देशों के एक वर्ग में असहजता भी दिखाई देती है। भारत अब वैश्विक राजनीति, तकनीक, अंतरिक्ष और अर्थव्यवस्था में प्रभाव बढ़ा रहा है। ऐसे में पुराने प्रतीकों के जरिए भारत को “एक्सोटिक” या “पिछड़ा” दिखाने की कोशिश कहीं न कहीं मानसिक श्रेष्ठता बनाए रखने का तरीका भी मानी जाती है।

    भारत की वास्तविक तस्वीर आज बेहद विविध और आधुनिक है। यहां अंतरिक्ष मिशन भी हैं, डिजिटल क्रांति भी और दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी भी। लेकिन पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा अब भी पुराने औपनिवेशिक नजरिए से बाहर नहीं निकल पाया है। यही वजह है कि समय-समय पर ऐसे कार्टून और टिप्पणियां विवाद का कारण बनती रहती हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: कैंपस में आवारा कुत्तों की अनुमति जिम्मेदारी और शर्तों के साथ ही संभव


    नई दिल्ली ।  देश में आवारा कुत्तों को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए शैक्षणिक संस्थानों में उनकी उपस्थिति पर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में कॉलेज कैंपसों में आवारा कुत्तों को रखने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन यह सुविधा बिना जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही के नहीं दी जाएगी। इस फैसले को लेकर शिक्षा और पशु कल्याण से जुड़े वर्गों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक परिसर में यदि छात्र संगठन या पशु कल्याण से जुड़े समूह आवारा कुत्तों को रखने या उनकी देखभाल करने की इच्छा रखते हैं, तो उन्हें पहले संस्थान के प्रमुख के समक्ष लिखित रूप में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। इस शर्त का पालन अनिवार्य होगा और इसके बिना किसी भी प्रकार की अनुमति मान्य नहीं मानी जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि यदि परिसर में किसी भी प्रकार की कुत्तों से जुड़ी घटना होती है, चाहे वह काटने की हो या किसी अन्य प्रकार की क्षति की, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित समूहों पर होगी।

    अदालत ने अपने विचार में यह भी स्पष्ट किया कि पशु कल्याण के प्रयासों को मानव सुरक्षा के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। शिक्षा संस्थानों का प्राथमिक उद्देश्य सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है, जहां छात्र बिना किसी खतरे के अध्ययन कर सकें। इसलिए किसी भी नीति या व्यवस्था में मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अनिवार्य है।

    इस निर्णय में यह भी कहा गया कि यदि परिसर में आवारा कुत्तों को भोजन देने या उनकी देखभाल की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह नियंत्रित और जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। बिना निगरानी या अनियंत्रित तरीके से ऐसी गतिविधियाँ स्वीकार नहीं की जाएंगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सार्वजनिक स्थानों पर जानवरों के प्रबंधन को लेकर नियमों का पालन बेहद जरूरी है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटनाओं को रोका जा सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह रुख भी दोहराया कि देशभर में कुत्ता काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के साथ हुई घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। इसी कारण शैक्षणिक परिसरों में किसी भी नीति को लागू करते समय सुरक्षा मानकों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।

    इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी अब पूरी तरह अनियंत्रित नहीं हो सकती। यदि कोई समूह या संगठन इस दिशा में काम करना चाहता है, तो उसे न केवल प्रशासनिक अनुमति लेनी होगी, बल्कि सभी कानूनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा।

    कुल मिलाकर, यह निर्णय पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें स्पष्ट संदेश दिया गया है कि संवेदनशील मुद्दों पर भावनाओं के साथ-साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।