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  • FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में जेपीसी की मुहर, विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और NGO को निशाना बनाने का लगाया आरोप

    FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में जेपीसी की मुहर, विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और NGO को निशाना बनाने का लगाया आरोप

    नई दिल्ली ।मानसून सत्र के दौरान विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम से जुड़े संशोधन विधेयक को लेकर संसद में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए हैं। लोकसभा ने विदेशी योगदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजने का प्रस्ताव ध्वनिमत से मंजूर कर लिया। प्रस्ताव गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में पेश किया।

    प्रस्तावित संयुक्त संसदीय समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे। समिति को विधेयक के प्रावधानों की विस्तार से जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही उसे शीतकालीन सत्र 2026 के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपनी होगी।

    सरकार की ओर से विधेयक को जेपीसी में भेजे जाने के बाद अब इसके प्रावधानों पर विस्तृत विचार की प्रक्रिया शुरू होगी। समिति विभिन्न पक्षों से जुड़े मुद्दों और विधेयक के संभावित प्रभावों का अध्ययन कर सकती है। इसके बाद उसकी रिपोर्ट के आधार पर विधेयक को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया तय होगी।

    वहीं विपक्ष ने इस विधेयक की जरूरत और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलावों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदायों और गैर सरकारी संगठनों पर दबाव बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। विपक्ष ने सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग भी उठाई।

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि FCRA विधेयक लाने का उद्देश्य अल्पसंख्यकों को दबाना और सरकार के राजनीतिक हितों को साधना है। उन्होंने विधेयक की जरूरत और इसके पीछे बताई जा रही वजहों पर सवाल खड़े किए।

    समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने विधेयक को जेपीसी में भेजे जाने को सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि समिति के स्तर पर उन प्रावधानों पर चर्चा हो सकती है जिनका असर संस्थाओं और उनके जमीनी कामकाज पर पड़ सकता है। उन्होंने गैर सरकारी संगठनों के कामकाज और उनके सामने आने वाली चुनौतियों का मुद्दा भी उठाया।

    विपक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले NGO को कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जब वे सरकार की नीतियों के अनुरूप काम नहीं करते। विपक्ष का दावा है कि ऐसे संगठनों के लिए नियमों में बदलाव का प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इस बीच कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और विदेश नीति को लेकर सरकार पर अलग मुद्दे पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि व्यापार समझौतों में देश और किसानों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो रही है और कुछ बड़े कारोबारी हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

    FCRA विधेयक को जेपीसी के पास भेजे जाने से अब इसके प्रावधानों की संसदीय जांच का रास्ता खुल गया है। समिति की रिपोर्ट आगामी शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक अपेक्षित है। इसके बाद विधेयक के भविष्य और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले अगले कदम पर नजर रहेगी। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के तर्क और विपक्ष की आपत्तियों के बीच समिति की समीक्षा अहम भूमिका निभाएगी।

  • गाजा में युद्धविराम की अमेरिकी पहल को झटका, नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ अभियान रोकने से इनकार किया

    गाजा में युद्धविराम की अमेरिकी पहल को झटका, नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ अभियान रोकने से इनकार किया

    नई दिल्ली ।गाजा में जारी संघर्ष को खत्म करने और स्थायी शांति की दिशा में अमेरिका की कोशिशों को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख से नया झटका लग सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रस्तावित गाजा फेस-2 योजना को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आने की बात कही जा रही है। नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिया है कि हमास के पूरी तरह निरस्त्रीकरण तक इजरायली सैन्य कार्रवाई समाप्त नहीं होगी।

    अमेरिका की पहल के तहत गाजा में युद्ध को रोकने, इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी और हमास के हथियार छोड़ने जैसे मुद्दों पर जोर दिया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप की प्रस्तावित 15 सूत्रीय योजना का उद्देश्य संघर्ष को एक नए चरण में ले जाना और गाजा में सुरक्षा तथा प्रशासन से जुड़ी व्यवस्था तैयार करना है।

    योजना में हमास के हथियारों को धीरे-धीरे गाजा के लिए प्रस्तावित नए प्रशासनिक ढांचे को सौंपने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इजरायली सेना को कुछ निर्धारित क्षेत्रों से पीछे हटाने की बात भी शामिल है। इस व्यवस्था में एक तथाकथित येलो लाइन का जिक्र किया गया है, जिसके आसपास सैन्य स्थिति में बदलाव प्रस्तावित है।

    अमेरिकी योजना के तहत इजरायल की सैन्य कार्रवाई को उन लोगों तक सीमित करने की बात भी सामने आई है, जिन्हें तत्काल सुरक्षा खतरा माना जाए। इसका उद्देश्य व्यापक सैन्य अभियान को कम करना और गाजा में सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ना बताया जा रहा है।

    हालांकि, नेतन्याहू का रुख इन प्रस्तावों से अलग दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा है कि जब तक हमास अपने हथियार पूरी तरह नहीं छोड़ता, तब तक इजरायली सेना गाजा से पीछे नहीं हटेगी। इस रुख का सीधा अर्थ यह है कि इजरायल हमास के सैन्य ढांचे और हथियारों को पूरी तरह समाप्त करने को अपनी कार्रवाई रोकने की प्रमुख शर्त मान रहा है।

    नेतन्याहू की स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब गाजा में युद्धविराम और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत जारी है। अमेरिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इजरायल की सुरक्षा संबंधी शर्तें और हमास के हथियारों का मुद्दा किसी भी समझौते के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं।

    इजरायल का कहना है कि हमास के पास हथियार और सैन्य क्षमता रहने की स्थिति में भविष्य में फिर से हमले का खतरा बना रहेगा। इसी कारण इजरायली नेतृत्व किसी ऐसे समझौते को स्वीकार करने से बच रहा है, जिसमें सैन्य वापसी तो हो लेकिन हमास की हथियारबंद क्षमता पूरी तरह समाप्त न हो।

    दूसरी ओर, गाजा में लंबे समय से जारी सैन्य संघर्ष ने मानवीय संकट को गंभीर बनाया है। युद्धविराम की किसी भी पहल में नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता की पहुंच और भविष्य के प्रशासन का सवाल भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका की योजना को लागू कराने के लिए इजरायल और अन्य संबंधित पक्षों के बीच सहमति जरूरी होगी।

    फिलहाल गाजा फेस-2 योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अमेरिका युद्धविराम और सैन्य वापसी की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, जबकि नेतन्याहू हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण को प्राथमिक शर्त मान रहे हैं। दोनों पक्षों के रुख में यह अंतर आने वाले दिनों में बातचीत की दिशा और गाजा में सैन्य गतिविधियों पर असर डाल सकता है।

  • महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    महंगाई में मामूली बढ़ोतरी के बीच खाद्य कीमतों का दबाव कायम, तेलंगाना सबसे महंगा राज्य, मध्य प्रदेश भी ऊंचे स्तर पर

    नई दिल्ली । भारत में खुदरा महंगाई दर जुलाई 2026 में मामूली बढ़ोतरी के साथ 4.45 प्रतिशत पर पहुंच गई। जून में यह दर 4.38 प्रतिशत थी। बुधवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, महंगाई में बढ़ोतरी के बावजूद कुछ जरूरी सब्जियों की कीमतों में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है। वहीं सोना, चांदी, अदरक और लहसुन जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि ने घरेलू बजट पर दबाव बनाए रखा।

    जुलाई में ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई 4.84 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.96 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे साफ है कि महंगाई का असर ग्रामीण उपभोक्ताओं पर अपेक्षाकृत अधिक रहा। खाद्य महंगाई दर भी जुलाई में 5.52 प्रतिशत रही। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 5.79 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 5.05 प्रतिशत दर्ज की गई।

    खाद्य वस्तुओं में कुछ उत्पादों की कीमतों में उपभोक्ताओं को राहत मिली। जुलाई में आलू के दाम सालाना आधार पर 16.56 प्रतिशत घटे। इसी तरह भिंडी की कीमत में 5.52 प्रतिशत, मटर में 5.27 प्रतिशत और टमाटर में 4.59 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे सब्जियों की कुछ श्रेणियों में कीमतों का दबाव कम हुआ है।

    हालांकि दूसरी ओर कई वस्तुओं ने महंगाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। जुलाई में चांदी की ज्वेलरी की कीमतों में सालाना आधार पर 109.84 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज हुई। अदरक की कीमत 83.62 प्रतिशत और लहसुन की कीमत 35.36 प्रतिशत बढ़ी। सोना, हीरा और प्लैटीनम ज्वेलरी की कीमतों में भी 32.98 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। प्याज की कीमत में 22.54 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    अन्य क्षेत्रों में फूड एंड बेवरेज श्रेणी की महंगाई 5.24 प्रतिशत रही। पान, तंबाकू और संबंधित उत्पादों में 4.79 प्रतिशत, परिवहन में 4.43 प्रतिशत, कपड़े और जूते में 3.38 प्रतिशत तथा शैक्षणिक सेवाओं में 3.64 प्रतिशत महंगाई दर्ज हुई। स्वास्थ्य क्षेत्र में महंगाई अपेक्षाकृत कम 1.34 प्रतिशत रही।

    राज्यों के स्तर पर तेलंगाना में जुलाई के दौरान सबसे अधिक 6.32 प्रतिशत खुदरा महंगाई दर्ज की गई। आंध्र प्रदेश में यह 5.72 प्रतिशत, तमिलनाडु में 5.44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.91 प्रतिशत और कर्नाटक में 4.89 प्रतिशत रही। इससे अलग-अलग राज्यों में कीमतों के दबाव में अंतर भी सामने आया।

    महंगाई के मौजूदा रुझान पर भारतीय रिजर्व बैंक की नजर बनी हुई है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 5 प्रतिशत रखा है। आरबीआई ने यह भी संकेत दिया है कि वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के कारण निकट अवधि में महंगाई के दबाव में वृद्धि हो सकती है।

    जून में महंगाई दर बढ़ने के बाद जुलाई के आंकड़े भी यह संकेत देते हैं कि कीमतों का दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि सब्जियों जैसी कुछ जरूरी वस्तुओं में गिरावट से आम उपभोक्ताओं को राहत मिली है, लेकिन खाद्य पदार्थों, कीमती धातुओं और कुछ मसालों की तेजी चिंता का विषय बनी हुई है। आने वाले महीनों में मानसून, खाद्य आपूर्ति, वैश्विक बाजार और ऊर्जा कीमतें महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    नई दिल्ली । भारत-पाकिस्तान सीमा पर सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। खुफिया इनपुट के हवाले से सामने आई जानकारी में दावा किया गया है कि नियंत्रण रेखा के पार 500 से अधिक आतंकियों के भारत में घुसपैठ के मौके का इंतजार करने की आशंका है। इस बीच पाकिस्तान की रणनीति में भी बदलाव की बात सामने आई है, जिसके तहत लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ाने की कोशिश किए जाने का दावा किया गया है।

    रिपोर्टों के अनुसार, इन संगठनों की गतिविधियों पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की निगरानी और नियंत्रण पहले की तुलना में अधिक बढ़ा है। पहले अलग-अलग आतंकी संगठनों के अपने कमांड ढांचे और नेतृत्व के माध्यम से गतिविधियां संचालित होने की बात कही जाती थी। अब इनके बीच तालमेल को एक केंद्रीय व्यवस्था के तहत मजबूत किए जाने का दावा किया जा रहा है।

    खुफिया अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से आतंकी नेटवर्क को लेकर पुनर्गठन किया गया है। इसका कथित उद्देश्य अलग-अलग संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और उनकी गतिविधियों पर केंद्रीय स्तर से निगरानी बढ़ाना है। हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से नहीं हुई है।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता नियंत्रण रेखा के पार मौजूद संभावित आतंकियों की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट में 500 से अधिक आतंकियों के घुसपैठ के अवसर की प्रतीक्षा करने की आशंका जताई गई है। ऐसे इनपुट के बाद सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ना स्वाभाविक है।

    बताया गया है कि हाल के महीनों में लश्कर-ए-तैयबा की गतिविधियों में तेजी देखी गई है, जबकि जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन की गतिविधियों में अपेक्षाकृत कमी का आकलन किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां इसे पाकिस्तान की बदली हुई रणनीति के संदर्भ में देख रही हैं।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब जम्मू-कश्मीर में स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने पर अधिक जोर दे रहा है। स्थानीय युवाओं को प्रभावित करने और आतंकी नेटवर्क से जोड़ने की कोशिशों की आशंका सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे प्रयासों का उद्देश्य सीमा पार से होने वाली गतिविधियों के साथ स्थानीय नेटवर्क को जोड़ना बताया जा रहा है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अलग-अलग आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ता है तो सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती का स्वरूप बदल सकता है। इसी वजह से सीमा सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और आतंकवाद के लिए होने वाली भर्ती को रोकना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशों को लेकर सतर्क रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के बीच इस तरह के इनपुट को और गंभीरता से देखा जा रहा है। हालांकि किसी भी खुफिया आकलन को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी होती है।

    फिलहाल 500 से अधिक आतंकियों की संभावित मौजूदगी और आतंकी संगठनों पर आईएसआई के बढ़ते नियंत्रण से जुड़े दावे सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय हैं। आने वाले दिनों में सीमा पर गतिविधियों, घुसपैठ के प्रयासों और जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।

  • ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी

    ब्रिक्स देशों के फास्ट पेमेंट सिस्टम और सीबीडीसी को जोड़ने पर चर्चा, सीमा पार भुगतान सस्ता और तेज बनाने की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार भुगतान को अधिक तेज, सस्ता और सुविधाजनक बनाने के लिए फास्ट पेमेंट सिस्टम और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी सीबीडीसी को आपस में जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि इस दिशा में अभी कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सितंबर 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है।

    संजय मल्होत्रा ने कहा कि सीमा पार भुगतान ब्रिक्स देशों की साझा प्राथमिकताओं में शामिल है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में लागत, समय और तकनीकी प्रक्रियाओं को कम करने की पर्याप्त गुंजाइश है। इसी उद्देश्य से अलग-अलग देशों के तेज भुगतान नेटवर्क को जोड़ने और डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

    सीबीडीसी किसी देश के केंद्रीय बैंक की ओर से जारी डिजिटल मुद्रा होती है। भारत में डिजिटल रुपया इसी दिशा में विकसित की गई व्यवस्था है। यदि अलग-अलग देशों की ऐसी डिजिटल मुद्राओं और तेज भुगतान प्रणालियों के बीच तकनीकी कनेक्टिविटी विकसित होती है, तो भविष्य में सीमा पार लेनदेन को कम समय में पूरा करने की संभावना बढ़ सकती है।

    आरबीआई गवर्नर के अनुसार, अभी यह प्रक्रिया शुरुआती चर्चा के चरण में है और किसी अंतिम व्यवस्था या समयसीमा की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि, ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान ढांचे को बेहतर बनाने की कोशिश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान प्रणालियों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

    भारत इस पूरी रणनीति में रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रहा है। आरबीआई ने कई देशों के साथ स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार व्यवस्था विकसित की है। इंडोनेशिया, मालदीव, मॉरीशस और संयुक्त अरब अमीरात के साथ द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए गवर्नर ने कहा कि ऐसे लेनदेन का दायरा बढ़ाने के लिए और प्रयास किए जाने चाहिए।

    स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से कारोबार के लिए किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे कुछ मामलों में लेनदेन की लागत घटाने और भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए यह रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ाने और वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है।

    संजय मल्होत्रा ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल पर भी जोर दिया। उन्होंने बैंकों से एआई को केवल जोखिम के तौर पर देखने के बजाय तकनीकी अवसर के रूप में अपनाने की अपील की। बैंकों को अपने एआई मॉडल की सूची तैयार करने और बोर्ड स्तर पर एआई गवर्नेंस से जुड़ी नीतियां लागू करने की सलाह दी गई है।

    वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने पश्चिम एशिया के तनाव और अन्य भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को निकट अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संभावित जोखिम बताया। ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति के स्रोतों में विविधता, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और मुक्त व्यापार समझौतों जैसे कदमों को आर्थिक मजबूती के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।

    आरबीआई गवर्नर ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली की स्थिति को भी मजबूत बताया। उनके मुताबिक बैंकों के पास बेहतर पूंजी आधार, कम गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां और स्वस्थ लाभप्रदता है। ऐसे में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बैंकिंग क्षेत्र अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

    ब्रिक्स के बीच भुगतान प्रणालियों और सीबीडीसी की संभावित कनेक्टिविटी आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को बदलने वाली पहल बन सकती है। हालांकि अभी यह चर्चा के स्तर पर है, लेकिन इसके आगे बढ़ने पर व्यापार, पर्यटन और अन्य सीमा पार लेनदेन में भुगतान की लागत और समय कम करने के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • तेज डिलीवरी के पीछे की चुनौतियां उजागर, डार्क स्टोर की स्वच्छता और गिग वर्कर्स की सुरक्षा पर बढ़ी सरकारी सख्ती

    तेज डिलीवरी के पीछे की चुनौतियां उजागर, डार्क स्टोर की स्वच्छता और गिग वर्कर्स की सुरक्षा पर बढ़ी सरकारी सख्ती


    नई दिल्ली । शहरी जीवन में क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने खरीदारी का तरीका तेजी से बदल दिया है। दूध, सब्जियां, ब्रेड, स्नैक्स और रोजमर्रा की जरूरत का सामान अब कुछ ही मिनटों में घर तक पहुंचने लगा है। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसी सेवाओं ने तेज डिलीवरी को अपनी पहचान बनाया, लेकिन इस मॉडल की चुनौतियां भी अब सामने आ रही हैं।

    सबसे बड़ा सवाल डिलीवरी की रफ्तार को लेकर है। जनवरी 2026 में केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने प्रमुख क्विक कॉमर्स कंपनियों के साथ चर्चा कर 10 मिनट की डिलीवरी के प्रचार से पीछे हटने को कहा था। इसके पीछे डिलीवरी पार्टनर्स पर पड़ने वाले समय के दबाव और उनकी सड़क सुरक्षा को लेकर चिंता प्रमुख थी। इसके बाद कंपनियों ने अपने प्रचार और ब्रांडिंग से 10 मिनट में डिलीवरी के दावे हटाने शुरू किए।

    इस कदम ने यह सवाल खड़ा किया कि ग्राहक को सामान जल्दी उपलब्ध कराने की होड़ का वास्तविक दबाव किस पर पड़ता है। डिलीवरी पार्टनर को ऑर्डर स्वीकार करने, डार्क स्टोर तक पहुंचने, सामान लेने और ट्रैफिक के बीच ग्राहक तक पहुंचने के लिए सीमित समय में कई काम करने होते हैं। ऐसे माहौल में जल्दबाजी सड़क सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।

    क्विक कॉमर्स की दूसरी बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा और डार्क स्टोर की स्वच्छता से जुड़ी है। डार्क स्टोर ऐसे केंद्र होते हैं जहां ग्राहकों के लिए सामान रखा, संभाला और पैक किया जाता है। ग्राहक इन जगहों पर सीधे खरीदारी नहीं करते, लेकिन उनके घर पहुंचने वाले खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता काफी हद तक इन्हीं केंद्रों की व्यवस्था पर निर्भर करती है।

    हाल में मुंबई के मलाड वेस्ट स्थित Blinkit से जुड़े एक डार्क स्टोर पर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कार्रवाई की। निरीक्षण के दौरान परिसर में स्वच्छता से जुड़ी गंभीर कमियां और कॉकरोच की मौजूदगी सामने आने के बाद खाद्य लाइसेंस निलंबित किया गया। यह कार्रवाई इस बात को रेखांकित करती है कि तेज डिलीवरी के साथ भंडारण और साफ सफाई के मानकों का पालन भी जरूरी है।

    इसी तरह बेंगलुरु के होस्कोटे क्षेत्र में Zepto से जुड़े एक वेयरहाउस पर भी खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने कार्रवाई की। निरीक्षण में खाद्य पदार्थों की स्टोरेज और हैंडलिंग, लेबलिंग तथा स्वच्छता से संबंधित कई कमियां पाई गईं। इसके बाद संबंधित वेयरहाउस को सील किया गया। इन घटनाओं ने क्विक कॉमर्स कंपनियों की सप्लाई चेन और डार्क स्टोर संचालन पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत को सामने रखा है।

    क्विक कॉमर्स मॉडल में सुविधा और गति दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन खाद्य पदार्थों के मामले में केवल कम डिलीवरी समय पर्याप्त नहीं है। दूध, फल, सब्जियां, ब्रेड और पैकेज्ड फूड जैसे उत्पादों की सही स्थिति बनाए रखने के लिए उचित तापमान, साफ-सफाई, स्टोरेज और हैंडलिंग जरूरी है। यदि इन मानकों में कमी रहती है तो कुछ मिनट की बचत ग्राहक के लिए वास्तविक लाभ नहीं रह जाती।

    इसके साथ ही गिग वर्कर्स के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा भी चर्चा के केंद्र में हैं। सरकार की ओर से क्विक कॉमर्स और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स को ई-श्रम व्यवस्था से जोड़ने तथा सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र का भविष्य केवल तेज डिलीवरी पर नहीं, बल्कि सुरक्षित कामकाज और बेहतर नियमन पर भी निर्भर करेगा।

    क्विक कॉमर्स उद्योग के लिए अब चुनौती यह है कि वह सुविधा और गति के साथ सुरक्षा, स्वच्छता और श्रमिक हितों के बीच संतुलन बनाए। ग्राहक के लिए कुछ मिनट कम महत्वपूर्ण हैं, यदि उसके बदले डिलीवरी पार्टनर की सुरक्षा या खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता से समझौता करना पड़े। आने वाले समय में इस क्षेत्र की विश्वसनीयता इसी संतुलन से तय होगी।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    नई दिल्ली ।हाई कोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ गठित जांच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश कर दी। समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध पाया है। रिपोर्ट में अघोषित नकदी, साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही तथा जांच के दौरान दिए गए टालमटोल वाले और असंतोषजनक जवाब से जुड़े आरोप शामिल हैं।

    जांच समिति ने मामले से संबंधित कार्यवाही का रिकॉर्ड, जरूरी दस्तावेज और उपलब्ध साक्ष्य सक्षम प्राधिकारी को भी सौंप दिए हैं। अब समिति की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों के आधार पर कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। इस घटनाक्रम के बाद पूर्व जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच का औपचारिक चरण पूरा हो गया है।

    पहले आरोप के तहत नई दिल्ली स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट के आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने के मामले की जांच की गई। समिति के अनुसार, वहां 500 रुपये के नोटों के रूप में रखी गई नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सका।

    समिति ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अघोषित नकदी से संबंधित आरोप को सिद्ध माना। जांच में नकदी के संबंध में स्पष्ट और संतोषजनक जवाब का अभाव महत्वपूर्ण आधारों में शामिल रहा। इस निष्कर्ष के साथ समिति ने पहले आरोप को अपनी अंतिम रिपोर्ट में प्रमाणित माना है।

    दूसरा आरोप मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण में कथित लापरवाही से संबंधित था। समिति ने पाया कि संबंधित स्टोररूम की स्थिति को कानूनी सीलिंग और निरीक्षण से पहले बदले जाने की बात सामने आई। इसके अलावा बाद में कुछ करेंसी नोटों के गायब या अनुपलब्ध होने को लेकर भी स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं मिल सका।

    समिति ने इस स्थिति को साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और विफलता के रूप में देखा। हालांकि, रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही का यह मतलब नहीं है कि जज ने स्वयं किसी नोट को हटाया था। आरोप का आधार साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित रखने में हुई विफलता से जुड़ा रहा।

    तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और जांच के दौरान उनके रुख से संबंधित था। समिति ने विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके जवाब को संतोषजनक नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार, उनके जवाब में अपेक्षित स्पष्टता का अभाव था और उनका रुख टालमटोल वाला पाया गया।

    समिति ने स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस आरोप को भी सिद्ध माना। उसके अनुसार, मामले में जज से संस्थागत जिम्मेदारी के अनुरूप स्पष्ट और संतोषजनक जवाब की अपेक्षा थी, लेकिन प्रस्तुत स्पष्टीकरण उस कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

    तीनों आरोपों के सिद्ध पाए जाने के बाद समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट संबंधित प्रक्रिया के लिए सक्षम प्राधिकारी को सौंप दी है। अब रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कानूनी तथा संस्थागत कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में अंतिम कदम संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होंगे।

  • कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी

    कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी


    नई दिल्ली ।कर्नाटक सरकार ने राज्य में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू या निकोटिन युक्त प्रतिबंधित उत्पादों के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए एक साल के लिए रोक लगा दी है। सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने इस संबंध में 10 अगस्त 2026 को अधिसूचना जारी की। अधिसूचना जारी होने के साथ ही पूरे राज्य में यह प्रतिबंध प्रभावी हो गया है और अगले एक साल तक लागू रहेगा।

    नए आदेश के तहत तंबाकू और या निकोटिन वाले गुटखा, पान मसाला तथा अन्य प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर रोक रहेगी। इसका मतलब है कि ऐसे उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार ने इस फैसले को सार्वजनिक स्वास्थ्य से जोड़ते हुए राज्य में तंबाकू की लत को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    कर्नाटक सरकार ने प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए विशेष निरीक्षण और प्रवर्तन अभियान भी शुरू किया है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के नेतृत्व में गठित टीमें अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिबंधित तंबाकू और निकोटिन उत्पादों की उपलब्धता तथा बिक्री पर नजर रखेंगी। दुकानों और अन्य स्थानों पर जांच के दौरान यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

    सरकार की अधिसूचना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(a) और खाद्य सुरक्षा और मानक नियमों के तहत निर्धारित प्रावधानों के आधार पर जारी की गई है। संबंधित विभाग को खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को देखते हुए ऐसे उत्पादों की बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त है।

    राज्य सरकार के इस फैसले का एक प्रमुख उद्देश्य तंबाकू और निकोटिन की लत को नियंत्रित करना है। गुटखा और तंबाकू उत्पादों का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। सरकार का मानना है कि इन उत्पादों की उपलब्धता सीमित करने से इनके इस्तेमाल को रोकने और लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।

    प्रतिबंध के साथ ही प्रशासन ने आम लोगों से भी सहयोग की अपील की है। विभाग ने कहा है कि यदि किसी स्थान पर प्रतिबंधित तंबाकू या निकोटिन उत्पादों के निर्माण, भंडारण, बिक्री या वितरण की जानकारी मिलती है तो इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जानी चाहिए। इससे प्रवर्तन अभियान को प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    कर्नाटक में लागू यह पाबंदी ऐसे समय में आई है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्तर पर तंबाकू सेवन को नियंत्रित करना सरकारों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। अब खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की निगरानी और जांच अभियान यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में दोबारा उपलब्ध न हों।

    सरकार ने इस फैसले को स्वस्थ और नशा-मुक्त कर्नाटक की दिशा में उठाया गया कदम बताया है। आने वाले महीनों में प्रतिबंध के पालन को लेकर बाजारों, दुकानों और आपूर्ति से जुड़े स्थानों पर निरीक्षण जारी रहने की संभावना है। एक साल की अवधि में प्रशासन की कार्रवाई और आम लोगों की भागीदारी इस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण होगी।

  • संसद में नीट मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने, रिजिजू ने तत्काल बहस की पेशकश की, हंगामे से सदन स्थगित

    संसद में नीट मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने, रिजिजू ने तत्काल बहस की पेशकश की, हंगामे से सदन स्थगित

    नई दिल्ली ।संसद के मॉनसून सत्र में बुधवार को नीट के मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध खत्म करने की कोशिश हुई, लेकिन सदन में जारी हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से अपनी सीटों पर लौटने और शांतिपूर्वक चर्चा में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि सरकार नीट के मुद्दे पर बहस के लिए तैयार है।

    रिजिजू ने सदन में कहा कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही है और गृहमंत्री अमित शाह विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने विपक्षी सांसदों से सदन के वेल से हटने का आग्रह किया और कहा कि यदि सदस्य अपनी सीटों पर लौट आते हैं तो चर्चा तत्काल शुरू की जा सकती है।

    संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि मॉनसून सत्र के अब केवल दो दिन शेष हैं और इन दिनों का उपयोग संसदीय कामकाज के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने विपक्ष के विरोध के तरीके पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अनुशासन के साथ सदन में मुद्दे उठाए जाने चाहिए। सरकार की ओर से चर्चा की तैयारी होने के बावजूद हंगामा जारी रहने से कार्यवाही प्रभावित हुई।

    इस दौरान विपक्षी सांसदों ने सदन के वेल में पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया। सांसदों की ओर से नीट सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और सरकार से जवाब की मांग की जा रही थी। विरोध के कारण सदन का सामान्य कामकाज आगे नहीं बढ़ सका। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी जारी रहा।

    पीठासीन अधिकारी जगदंबिका पाल ने विपक्षी सांसदों से सदन का वेल खाली करने और अपनी सीटों पर लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है और गृहमंत्री अमित शाह जवाब देने को तैयार हैं। ऐसे में विपक्ष को सदन की कार्यवाही सामान्य बनाने में सहयोग करना चाहिए।

    जगदंबिका पाल ने यह भी कहा कि लगातार सदन बाधित करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आने वाली पीढ़ी को गलत संदेश जा सकता है। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि वह चर्चा में शामिल हो और संबंधित मुद्दों को सदन के भीतर उठाए, ताकि सरकार की ओर से उनका जवाब दिया जा सके।

    सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस के लिए संसदीय प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। रिजिजू ने विपक्ष को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि सरकार नीट के विषय पर चर्चा के लिए तैयार है और संबंधित सवालों पर जवाब देने की प्रक्रिया सदन में आगे बढ़ाई जा सकती है।

    इस बीच भाजपा सांसद नितिन नबीन ने विपक्ष के लगातार व्यवधान पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बच रहा है और संसद की कार्यवाही रोक रहा है। उनके मुताबिक सरकार की ओर से चर्चा के लिए बार-बार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन विपक्ष का विरोध जारी है।

    हालांकि, सदन में हंगामा कम नहीं हुआ और अंततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई। अब सदन की अगली बैठक 13 अगस्त 2026 को सुबह 11 बजे होगी। मॉनसून सत्र के अंतिम दिनों में नीट के मुद्दे पर चर्चा और सरकार के जवाब को लेकर दोनों पक्षों के रुख पर नजर रहेगी। गतिरोध समाप्त करने के लिए सदन में संवाद और चर्चा की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।