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  • जेल पहुंचने के 48 घंटे बाद बंदी ने तोड़ा दम, शरीर पर मिले चोट के निशान; पुलिस पर गंभीर आरोप

    जेल पहुंचने के 48 घंटे बाद बंदी ने तोड़ा दम, शरीर पर मिले चोट के निशान; पुलिस पर गंभीर आरोप


    भोपाल । भोपाल सेंट्रल जेल में बंद 35 वर्षीय बंदी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। मृतक की पहचान नीरज धाकड़ पुत्र केसर सिंह धाकड़ निवासी देवरी गांव तहसील गौहरगंज जिला रायसेन के रूप में हुई है। नीरज को सूखी सेवनिया पुलिस ने 7 अगस्त को सीमेंट चोरी के मामले में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उसे मेडिकल परीक्षण कराया गया और नियमानुसार कार्रवाई करते हुए भोपाल सेंट्रल जेल भेज दिया गया। जेल पहुंचने के महज दो दिन बाद उसकी तबीयत बिगड़ी और उपचार के दौरान रविवार सुबह हमीदिया अस्पताल में उसकी मौत हो गई। घटना के बाद मृतक के परिजन ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजन का दावा है कि गिरफ्तारी के दौरान नीरज के साथ मारपीट की गई थी और उसके शरीर पर चोटों के निशान थे। उनका आरोप है कि पुलिस की कथित मारपीट के बाद उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई और समय पर उचित इलाज नहीं मिलने के कारण उसकी जान चली गई। हालांकि जेल प्रशासन ने इन आरोपों से अलग जानकारी दी है।

    सूखी सेवनिया थाने के प्रभारी अरुण शर्मा के अनुसार नीरज को सीमेंट चोरी के मामले में 7 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तारी के बाद आरोपी का नियमानुसार मेडिकल परीक्षण कराया गया था और इसके बाद उसे भोपाल सेंट्रल जेल भेज दिया गया। दूसरी ओर नीरज की पत्नी पूजा ने आरोप लगाया है कि पति के शरीर पर चोट के निशान थे। उनका कहना है कि गिरफ्तारी के बाद से ही नीरज की तबीयत खराब थी और जेल पहुंचने के बाद उसकी हालत और बिगड़ गई। परिजन ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

    वहीं भोपाल सेंट्रल जेल के सुपरिंटेंडेंट मानवेंद्र सिंह परिहार ने बताया कि नीरज को सीने में दर्द और घबराहट की शिकायत हुई थी। उसकी स्थिति को देखते हुए जेल प्रशासन ने उसे तत्काल उपचार के लिए हमीदिया अस्पताल भेजा था। अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में उसका इलाज चल रहा था लेकिन रविवार सुबह उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। जेल प्रशासन का कहना है कि बंदी को उसकी तबीयत बिगड़ने के बाद समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई थी।

    बंदी की मौत के बाद मामले में न्यायिक जांच शुरू कर दी गई है। जांच के दौरान नीरज की गिरफ्तारी से लेकर थाने में रखे जाने की अवधि मेडिकल परीक्षण जेल में दाखिले और अस्पताल में उपचार तक की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल की जाएगी। इसके साथ ही परिजन की ओर से पुलिस पर लगाए गए मारपीट के आरोपों की भी जांच होगी। पुलिस ने फिलहाल मर्ग कायम किया है। नीरज की मौत की वास्तविक वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट और न्यायिक जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। ऐसे में अब जांच रिपोर्ट इस पूरे मामले में अहम साबित होगी और यह साफ हो सकेगा कि बंदी की मौत किन परिस्थितियों में हुई।

  • भारत बांग्लादेश क्रिकेट मैच, BCCI टीम इंडिया, बांग्लादेश क्रिकेट टीम, ढाका क्रिकेट स्टेडियम, भारत बांग्लादेश सीरीज

    भारत बांग्लादेश क्रिकेट मैच, BCCI टीम इंडिया, बांग्लादेश क्रिकेट टीम, ढाका क्रिकेट स्टेडियम, भारत बांग्लादेश सीरीज

    नई दिल्ली ।भारत और बांग्लादेश के बीच सितंबर 2026 में प्रस्तावित वनडे और टी20 सीरीज को लेकर अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है। भारतीय क्रिकेट टीम इस दौरे पर जाएगी या नहीं, इसका अंतिम फैसला फिलहाल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हाथ में नहीं है। बांग्लादेश में मौजूदा परिस्थितियों और खिलाड़ियों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को देखते हुए बीसीसीआई ने इस मामले में भारत सरकार की मंजूरी को जरूरी बताया है।

    प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार भारतीय टीम को बांग्लादेश दौरे पर तीन वनडे और तीन टी20 मुकाबले खेलने हैं। बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड इस सीरीज को आयोजित करने को लेकर लगातार प्रयास कर रहा है और उसने भारतीय बोर्ड के सामने दौरे को लेकर अपनी तैयारी भी जाहिर की है। दोनों देशों के क्रिकेट बोर्ड के बीच इस विषय पर बातचीत जारी है, लेकिन भारतीय टीम की यात्रा को लेकर अभी अंतिम सहमति नहीं बनी है।

    बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, बोर्ड सुरक्षा से जुड़े किसी भी मामले में अपने स्तर पर अंतिम फैसला नहीं लेना चाहता। ऐसे में भारत सरकार के संबंधित विभागों से बातचीत की जाएगी और सरकारी मंजूरी मिलने के बाद ही दौरे पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया जाएगा। खिलाड़ियों और सपोर्ट स्टाफ की सुरक्षा को बोर्ड की प्राथमिकता माना जा रहा है।

    बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने 29 अगस्त से 15 सितंबर के बीच प्रस्तावित व्हाइट बॉल सीरीज के लिए समय भी निर्धारित रखा है। इस अवधि में तीन वनडे और तीन टी20 मैच कराने की योजना है। हालांकि, भारतीय टीम के दौरे की पुष्टि सरकार की सुरक्षा समीक्षा और मंजूरी पर निर्भर करेगी। अगर अनुमति मिलती है तो निर्धारित अवधि में सीरीज आयोजित की जा सकती है।

    इस पूरे मामले में भारत के विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सुरक्षा परिस्थितियों का आकलन करने के बाद सरकार की ओर से बीसीसीआई को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जा सकते हैं। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भारतीय खिलाड़ी बांग्लादेश की राजधानी ढाका जाएंगे या दौरा आगे के लिए टाल दिया जाएगा।

    इस सीरीज का इतिहास भी मौजूदा स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। भारत और बांग्लादेश के बीच यह दौरा मूल रूप से 2024 में प्रस्तावित था। उस समय बांग्लादेश में सरकार विरोधी प्रदर्शनों और बाद में हुए राजनीतिक बदलाव के कारण दोनों देशों के बीच परिस्थितियां बदल गई थीं। इसी पृष्ठभूमि में प्रस्तावित क्रिकेट दौरे को आगे के लिए स्थगित कर दिया गया था।

    अब 2026 में इस सीरीज को दोबारा आयोजित करने की योजना सामने आई है। हालांकि, पहले की परिस्थितियों और वर्तमान सुरक्षा स्थिति को देखते हुए भारतीय पक्ष किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करना चाहता। क्रिकेट बोर्ड के लिए खिलाड़ियों की सुरक्षा से समझौता नहीं करना प्राथमिकता है।

    अगर भारत सरकार दौरे को मंजूरी देती है तो अगस्त के अंत और सितंबर के दौरान दोनों टीमों के बीच सीमित ओवरों की सीरीज देखने को मिल सकती है। दूसरी ओर, सुरक्षा कारणों से अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड का प्रस्तावित कार्यक्रम प्रभावित होगा।

    फिलहाल दोनों क्रिकेट बोर्ड के बीच संपर्क बना हुआ है और अंतिम निर्णय के लिए सरकारी स्तर पर सुरक्षा आकलन का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार के रुख के बाद ही भारत-बांग्लादेश सीरीज के आयोजन और भारतीय टीम के दौरे को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचीं ममता, विरोध के बीच बीजेपी पर लगाए गंभीर आरोप

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल के हलीसहर में रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विरोध का सामना करना पड़ा। वह कथित पुलिस हिरासत में जान गंवाने वाले तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंची थीं। इसी दौरान स्थानीय लोगों के एक समूह ने उनके काफिले को रोक दिया। विरोध के दौरान उनकी कार पर कीचड़ लगाने, जूते-चप्पल फेंकने और पत्थरबाजी किए जाने के आरोप सामने आए हैं।

    घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों ने ममता बनर्जी के खिलाफ नारेबाजी भी की। उनके खिलाफ ‘चोर-चोर’ जैसे नारे लगाए जाने की बात सामने आई है। जब तक उनका वाहन मौके पर रुका रहा, विरोध प्रदर्शन जारी रहा। इस घटनाक्रम के बाद इलाके में राजनीतिक तनाव की स्थिति बन गई।

    ममता बनर्जी ने घटना के लिए भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन स्थानीय ग्रामीणों की ओर से नहीं किया गया, बल्कि बाहर से लोगों को लाकर विरोध कराया गया। उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों ने उनकी कार पर बड़े पत्थर और ईंटें फेंकीं तथा अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

    ममता ने कहा कि वह उस परिवार से मिलने गई थीं, जिसके सदस्य की पुलिस हिरासत में मौत हुई है। उनका आरोप है कि परिवार के सदस्यों को भी डराने और धमकाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि परिवार से मिलने का उन्होंने वादा किया था और उसी के तहत वह वहां पहुंची थीं।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी में उनकी गाड़ी पर पत्थर फेंके गए। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक रही और पुलिस के सामने ही प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया। ममता ने दावा किया कि इस घटना में बाहरी लोगों की भूमिका थी।

    उन्होंने पुलिस प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए। ममता के मुताबिक पुलिस अपनी कथित विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे लोगों का सहारा ले रही है। उन्होंने राज्य में हिरासत में होने वाली मौतों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो रही है।

    ममता ने दावा किया कि उन्होंने मृतक कार्यकर्ता के परिवार से मिलने का आश्वासन पहले ही दिया था। उनके अनुसार उन्होंने परिवार की महिला सदस्य से एक दिन पहले दो बार फोन पर बातचीत भी की थी। उन्होंने यह भी कहा कि एक विधायक के माध्यम से परिवार को घर से बाहर नहीं निकलने की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई थी।

    उन्होंने कहा कि घटना के संबंध में मामला दर्ज कराया जाएगा। ममता ने पुलिस के प्रति व्यक्तिगत नाराजगी से इनकार करते हुए आरोप लगाया कि राजनीतिक स्तर पर तनाव को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने राज्य के गृह विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग हालात को बिगाड़ने में भूमिका निभा रहे हैं।

    दूसरी ओर, स्थानीय लोगों की ओर से ममता बनर्जी के दौरे को लेकर अलग प्रतिक्रिया सामने आई। कुछ लोगों का आरोप है कि वह शांत इलाके में राजनीतिक गतिविधि के लिए पहुंची थीं, जिससे वहां तनाव बढ़ गया। स्थानीय स्तर पर ममता के दौरे और विरोध को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

    घटना के बाद हलीसहर में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। एक ओर ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी समर्थित विरोध और बाहरी लोगों की कार्रवाई बताया है, जबकि दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर उनके दौरे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल पत्थरबाजी और विरोध की घटना के बाद इलाके की स्थिति पर प्रशासन की नजर बनी हुई है।

  • तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद

    तुर्किए बोला, पाकिस्तान-सऊदी के साथ मक्का रक्षा समझौता ईरान के खिलाफ नहीं, जानें क्या है मकसद


    नई दिल्ली । 
    पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। ईरान की ओर से इस समझौते पर आपत्ति जताए जाने के बाद तुर्किए ने अब अपना रुख स्पष्ट किया है। तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने कहा कि यह समझौता किसी भी तरह से ईरान के खिलाफ नहीं है।

    हकान फिदान ने शनिवार, 8 अगस्त 2026 को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच हाल में हुआ मक्का रक्षा समझौता पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी देश पर हमला करना या किसी राष्ट्र को समाप्त करना नहीं है।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने इस मामले में सऊदी अरब की स्थिति को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि रियाद ने ईरान के खिलाफ किसी तरह के हमले या उसे तबाह करने की रणनीति नहीं बनाई है। सऊदी अरब का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में जारी हिंसा को रोकना और महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास स्थिरता कायम करना है।

    हकान फिदान के मुताबिक, सऊदी अरब पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुका है कि ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से मौजूदा समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। रियाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी विवाद को बातचीत तथा समझौते के जरिए सुलझाने का समर्थन किया है।

    उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की नीति क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने के बजाय उसे कम करने की दिशा में है। इसी संदर्भ में मक्का में हुई हालिया बैठक को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा और मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा हुई थी।

    तुर्किए के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मक्का में हुई बैठक के दौरान क्राउन प्रिंस ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। उनका कहना था कि सऊदी अरब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को समाधान के तौर पर नहीं देखता।

    फिदान ने यह भी कहा कि यही संदेश बाद में मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत के दौरान भी पहुंचाया गया। इससे संकेत मिलता है कि रियाद मौजूदा तनाव के बीच सैन्य विकल्प के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दे रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते को लेकर ईरान की चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब पश्चिम एशिया में पहले से ही कई स्तरों पर तनाव बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच मतभेदों के चलते क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है।

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की हिंसा या अस्थिरता का असर कच्चे तेल और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। ऐसे में सऊदी अरब की ओर से क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर दिए जाने को व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    तुर्किए की ओर से मक्का रक्षा समझौते को रक्षात्मक बताने का उद्देश्य इस समझौते को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को स्पष्ट करना है। हकान फिदान के बयान के अनुसार, समझौते का घोषित उद्देश्य किसी विशेष देश के खिलाफ सैन्य अभियान चलाना नहीं, बल्कि संबंधित देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना है।

    मौजूदा परिस्थितियों में तुर्किए का यह स्पष्टीकरण ईरान के साथ बढ़ते तनाव को सीमित रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। क्षेत्रीय देशों के लिए अब चुनौती सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक संवाद के बीच संतुलन बनाए रखने की है।

  • इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक वरिष्ठ कमांडर कारी सईद अब्दुल अजीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि वह नमाज पढ़ने के लिए कुबा मस्जिद पहुंचा था, जहां मस्जिद के गेट के पास अचानक गिर पड़ा। उसकी मौत के वास्तविक कारण की आधिकारिक तौर पर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

    कारी सईद अब्दुल अजीज को लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख सदस्यों में शामिल बताया जाता था। उसके जिम्मे जम्मू-कश्मीर में मुठभेड़ के दौरान मारे गए आतंकवादियों के परिवारों की सहायता से जुड़ा काम था। संगठन के भीतर उसकी भूमिका को देखते हुए उसकी अचानक हुई मौत को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, मस्जिद पहुंचने से पहले कारी सईद ने एक अनजान रेस्टोरेंट में खाना खाया था। इसके बाद वह नमाज के लिए कुबा मस्जिद गया। वहां पहुंचने के बाद वह अचानक गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई। हालांकि, इस घटनाक्रम और उसकी मौत के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।

    कारी सईद की मौत ऐसे समय हुई है जब पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कई सदस्यों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत को लेकर चर्चा बनी हुई है। संगठन से जुड़े रिजवान हनीफ ने हाल में एक वीडियो में दावा किया था कि पिछले तीन से चार वर्षों के दौरान लश्कर के करीब 30 से अधिक सदस्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मारे गए हैं।

    रिजवान के अनुसार, पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद जैसे इलाकों में संगठन के कई सदस्यों की हत्या हुई। उसने इन घटनाओं के पीछे अज्ञात लोगों के होने की बात कही थी। लश्कर से जुड़े किसी सदस्य की ओर से संगठन के इतने लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार किए जाने को भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े कुछ आतंकवादियों की संदिग्ध मौत के मामलों में अज्ञात हमलावरों का जिक्र सामने आता रहा है। हालांकि, इन घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं और उनके उद्देश्यों क्या हैं, इसे लेकर सार्वजनिक स्तर पर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। ऐसे मामलों में ठोस निष्कर्ष के लिए जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी होती है।

    लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। संगठन लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों और भारत विरोधी हिंसा से जुड़ा रहा है। ऐसे में उसके किसी वरिष्ठ कमांडर की पाकिस्तान में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम के लिहाज से भी ध्यान आकर्षित करती है।

    फिलहाल कारी सईद अब्दुल अजीज की मौत की सटीक वजह स्पष्ट नहीं है। उसके द्वारा मौत से पहले किए गए संपर्कों, रेस्टोरेंट में खाने और मस्जिद पहुंचने के बीच की घटनाओं की जानकारी सामने आने के बाद ही मामले की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। साथ ही, संगठन के अन्य सदस्यों की संदिग्ध मौतों से इस घटना का कोई संबंध है या नहीं, यह भी जांच का विषय बना हुआ है।

  • ग्रेट निकोबार परियोजना पर फिर उठे सवाल, जयराम रमेश ने NGT से मांगी सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

    ग्रेट निकोबार परियोजना पर फिर उठे सवाल, जयराम रमेश ने NGT से मांगी सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी से उस उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है, जिसे परियोजना को मिली पर्यावरण संबंधी मंजूरियों की समीक्षा के लिए गठित किया गया था। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं और यह स्पष्ट हो सकेगा कि इसमें कोई गंभीर खामी रही है या नहीं।

    जयराम रमेश ने कहा कि एनजीटी को अपनी स्वतंत्र भूमिका और कानूनी अधिकारों को प्रभावी ढंग से निभाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि अलग-अलग न्यायाधिकरण, विशेष रूप से एनजीटी, अपनी संस्थागत विश्वसनीयता और अधिकार को फिर से मजबूत करेंगे तथा कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का पूरी तरह पालन करेंगे।

    उन्होंने न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा प्रस्तावित है। यह विधेयक पिछले वर्षों में गठित 16 अर्द्ध-न्यायिक अधिकरणों के लिए नई व्यवस्था तय करने से जुड़ा है। इनमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी शामिल है, जिसका गठन अक्टूबर 2010 में संसद के एक कानून के तहत किया गया था।

    रमेश ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक का संबंध 19 नवंबर 2025 के उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले से भी है। इस फैसले में न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख प्रावधानों को रद्द किया गया था। साथ ही न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की दिशा में निर्देश दिए गए थे।

    कांग्रेस नेता ने न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता से जुड़े पुराने विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह 2021 के कानून को चुनौती देने वाले लोगों में शामिल थे। इससे पहले उन्होंने वित्त अधिनियम, 2017 के उन प्रावधानों को भी चुनौती दी थी, जिनके माध्यम से न्यायाधिकरणों की व्यवस्था में बदलाव किए गए थे।

    रमेश ने आरोप लगाया कि कुछ संशोधनों को धन विधेयक का हिस्सा बनाकर संसद के दोनों सदनों, खासकर राज्यसभा में विस्तृत विधायी समीक्षा से बचने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरणों की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है और अब इस व्यवस्था में जरूरी सुधारों को लागू करने की आवश्यकता सामने आई है।

    ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को उन्होंने इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, समिति ने अपनी रिपोर्ट 8 जुलाई 2025 को एनजीटी के समक्ष सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की थी। उन्होंने मांग की कि इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों की समीक्षा के दौरान समिति ने किन तथ्यों और निष्कर्षों को सामने रखा था।

    जयराम रमेश ने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक करना एनजीटी की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण संकेत होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि न्यायाधिकरण पर्यावरणीय मामलों में अपने कानूनी दायित्वों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से काम करेंगे।

    न्यायाधिकरण सुधार विधेयक में अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता तथा नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के साथ स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है। इसमें राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की रूपरेखा भी शामिल है। ऐसे में ग्रेट निकोबार परियोजना की समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग ने पर्यावरणीय मंजूरियों के साथ न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के मुद्दे को भी प्रमुखता से सामने ला दिया है।

  • मेटा को केंद्र की दो टूक, भारत में ग्लोबल पॉलिसी नहीं बल्कि स्थानीय कानूनों के मुताबिक करना होगा मॉडरेशन

    मेटा को केंद्र की दो टूक, भारत में ग्लोबल पॉलिसी नहीं बल्कि स्थानीय कानूनों के मुताबिक करना होगा मॉडरेशन


    नई दिल्ली । 
    भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालन और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर केंद्र सरकार ने मेटा के सामने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म केवल अपनी वैश्विक नीतियों के आधार पर काम नहीं कर सकते। उन्हें भारतीय कानूनों और देश की भाषाई तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने कंटेंट मॉडरेशन तंत्र को लागू करना होगा।

    मेटा और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बीच इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। इन चर्चाओं के बाद सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कंपनी के पूरे एल्गोरिदम को बदलने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है। सरकार का जोर इस बात पर है कि प्लेटफॉर्म की नीतियां और मॉडरेशन व्यवस्था भारत में लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो तथा स्थानीय परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व दिया जाए।

    सरकार विशेष रूप से भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों को लेकर चिंतित है। अधिकारियों के अनुसार, विदेशों में बैठे मॉडरेशन दल कई बार भारत की अलग-अलग भाषाओं, सामाजिक संदर्भों और स्थानीय संवेदनशीलताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाते। ऐसे में कंटेंट की सही पहचान और उचित कार्रवाई के लिए स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञता और इनपुट बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई है।

    बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट यानी सीएसएएम को लेकर सरकार ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। इस तरह के कंटेंट के मामले में किसी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं करने की बात कही गई है। सरकार चाहती है कि मेटा अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसे कंटेंट की पहचान, रोकथाम और कार्रवाई के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था विकसित करे और संदिग्ध सामग्री के दोबारा सामने आने की संभावना को भी कम करे।

    डीपफेक के मुद्दे पर भी सरकार और मेटा के बीच चर्चा हुई है। खासतौर पर मशहूर हस्तियों से जुड़े सिंथेटिक कंटेंट को लेकर सरकार ने मानवीय समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया है। अधिकारियों का मानना है कि केवल स्वचालित तकनीक के आधार पर किसी सामग्री को हटाने से गलत निर्णय की संभावना बनी रह सकती है। इसलिए संवेदनशील मामलों में ह्यूमन इन द लूप व्यवस्था के जरिए अंतिम समीक्षा की जरूरत बताई गई है।

    सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि एक बार किसी हानिकारक या सिंथेटिक कंटेंट की पहचान होने के बाद उसे दोबारा यूजर्स तक पहुंचने और रिकमेंड होने से रोकने के लिए मेटा की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। रिकमेंडेशन सिस्टम और वायरल कंटेंट को लेकर भी कंपनी से सवाल किए गए हैं।

    बैठकों में यह मुद्दा भी सामने आया कि कई बार यूजर्स को उनकी सामान्य पसंद से अलग सामग्री क्यों दिखाई जाती है और क्या रिकमेंडेशन सिस्टम सिंथेटिक या हानिकारक कंटेंट को अनावश्यक रूप से आगे बढ़ा रहा है। सरकार का जोर इस बात पर है कि पहचाने जा चुके नुकसानदायक कंटेंट की पहुंच को एल्गोरिदम के जरिए दोबारा बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

    इसके साथ ही मेटा के इंटरमीडियरी स्टेटस और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा से जुड़े अनुपालन की भी समीक्षा की जा रही है। सरकार यह देख रही है कि प्लेटफॉर्म की कंटेंट रिकमेंडेशन में भूमिका उसके कानूनी दायित्वों को किस तरह प्रभावित करती है।

    फिलहाल सरकार और मेटा के बीच तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी है और अगले दौर की बैठक होने की उम्मीद है। केंद्र का स्पष्ट संदेश यह है कि उद्देश्य मेटा के एल्गोरिदम को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसके प्लेटफॉर्म, कंटेंट नीति और मॉडरेशन व्यवस्था भारतीय कानूनों के साथ देश की भाषाई और सांस्कृतिक जरूरतों के अनुरूप काम करें।

  • फुकेट-दिल्ली फ्लाइट के कैप्टन के डोप टेस्ट ने बढ़ाई चिंता, 300 फीट नीचे आने के बाद जांच में नया मोड़

    फुकेट-दिल्ली फ्लाइट के कैप्टन के डोप टेस्ट ने बढ़ाई चिंता, 300 फीट नीचे आने के बाद जांच में नया मोड़


    नई दिल्ली । 
    फुकेट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक फ्लाइट में हुई तेज टर्बुलेंस की घटना की जांच के बीच मामले में नया पहलू सामने आया है। 4 अगस्त को हुई इस घटना के बाद विमान के कैप्टन का साइकोएक्टिव पदार्थों के सेवन को लेकर पोस्ट-फ्लाइट स्क्रीनिंग टेस्ट किया गया था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक टेस्ट में कैप्टन के पॉजिटिव पाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि एयरलाइन ने इस नतीजे की पुष्टि या खंडन नहीं किया है।

    एयर इंडिया के मुताबिक संबंधित फ्लाइट के क्रू सदस्यों का तय नियमों के तहत फ्लाइट के बाद स्क्रीनिंग टेस्ट किया गया था। एयरलाइन का कहना है कि इन टेस्ट के नतीजे उसके साथ साझा नहीं किए गए हैं। इसलिए कंपनी फिलहाल किसी निष्कर्ष पर टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं है। एयरलाइन ने यह भी कहा है कि जरूरत पड़ने पर वह संबंधित अधिकारियों की जांच में पूरा सहयोग जारी रखेगी।

    यह वही एयरबस A320 विमान था, जिसमें कुल 145 लोग सवार थे। यात्रा के दौरान ओडिशा के पास विमान को तेज एयर टर्बुलेंस का सामना करना पड़ा। झटकों के दौरान विमान अचानक करीब 300 फीट नीचे की ओर चला गया। घटना के बाद यात्रियों में अफरा-तफरी की स्थिति बनी और कई लोगों को चोटें आईं।

    दिल्ली पहुंचने के बाद 13 यात्रियों और चार क्रू सदस्यों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। घटना के बाद विमान की उड़ान, टर्बुलेंस की प्रकृति और क्रू द्वारा स्थिति को संभालने के तरीके समेत कई पहलुओं पर सवाल उठे। अब कैप्टन के कथित पॉजिटिव डोप टेस्ट ने जांच के दायरे में एक और महत्वपूर्ण पहलू जोड़ दिया है।

    नागरिक उड्डयन महानिदेशालय इस पूरे मामले की जांच कर रहा है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि टर्बुलेंस किस वजह से हुआ और क्या मौसम संबंधी परिस्थितियां इसकी वजह थीं। इसके अलावा विमान पर टर्बुलेंस के संभावित तकनीकी प्रभाव की भी जांच की जा रही है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि झटकों के कारण किसी हाइड्रोलिक सिस्टम पर असर पड़ा था या नहीं।

    जांच का एक अहम हिस्सा यह भी है कि टर्बुलेंस के बाद विमान को दिल्ली तक ले जाना उचित निर्णय था या उसे किसी नजदीकी हवाई अड्डे पर उतारा जाना चाहिए था। वाराणसी और लखनऊ जैसे वैकल्पिक हवाई अड्डों पर विमान को डायवर्ट किए जाने की संभावना पर भी जांच में विचार किया जा रहा है।

    नियमों के तहत जांच पूरी होने तक संबंधित फ्लाइट क्रू को उड़ान ड्यूटी से हटाया जाता है। इस मामले में भी पायलट फिलहाल उड़ान नहीं भर रहे हैं। साइकोएक्टिव पदार्थों से जुड़े डोप टेस्ट के नियमों के अनुसार पहली बार पॉजिटिव पाए जाने वाले क्रू सदस्य को नशामुक्ति और पुनर्वास प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इसके बाद निगेटिव टेस्ट रिपोर्ट मिलने पर ही सक्रिय ड्यूटी पर लौटने की अनुमति मिल सकती है।

    अगर उड़ान ड्यूटी पर लौटने के बाद वही व्यक्ति दूसरी बार ऐसे पदार्थों के लिए पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसके लाइसेंस को तीन साल के लिए निलंबित किया जा सकता है। तीसरी बार पॉजिटिव पाए जाने की स्थिति में फ्लाइंग लाइसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान है।

    अंतरराष्ट्रीय विमानन मानकों के अनुसार किसी भी लाइसेंसधारी पायलट को ऐसे साइकोएक्टिव पदार्थों के प्रभाव में उड़ान संचालन नहीं करना चाहिए, जिनसे सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ विमान उड़ाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। अब इस मामले में टर्बुलेंस की वजह, विमान की तकनीकी स्थिति और कैप्टन के कथित डोप टेस्ट समेत सभी पहलुओं की जांच के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

  • आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…

    आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति एक बार फिर आभार जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट में प्रधानमंत्री को दो बार धन्यवाद कहा। उनके इस पोस्ट का संबंध वैश्विक इस्माइली समुदाय के आध्यात्मिक प्रमुख मौलाना हजार इमाम शाह रहीम अल-हुसैनी आगा खान की आगामी भारत यात्रा से है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में बताया कि भारत सरकार के निमंत्रण पर आगा खान 9 से 15 सितंबर 2026 तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। उन्होंने इस निमंत्रण को भारत और वैश्विक इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया।

    शहजाद पूनावाला का संबंध शिया इस्माइली समुदाय से बताया जाता है। इस समुदाय के आध्यात्मिक नेतृत्व का संबंध आगा खान की इमामत से है। ऐसे में आगा खान की भारत यात्रा को लेकर पूनावाला की प्रतिक्रिया व्यक्तिगत और सामुदायिक संदर्भ से भी जुड़ी हुई है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि भारत सरकार की ओर से दिया गया निमंत्रण वैश्विक इस्माइली समुदाय द्वारा सराहा गया है। उन्होंने इसे भारत और इस्माइली इमामत के बीच मित्रता, पारस्परिक सम्मान तथा साझा मूल्यों पर आधारित लंबे संबंधों का संकेत बताया।

    उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस्माइली समुदाय ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण विकास, संस्कृति और परोपकार के क्षेत्र में भारत तथा दुनिया के कई हिस्सों में योगदान दिया है। उनके अनुसार, आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क के माध्यम से भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, विरासत संरक्षण, ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण से जुड़े कई कार्य किए गए हैं।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि इन पहलों का लाभ विभिन्न वर्गों के लोगों तक पहुंचा है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर इस समुदाय की ओर से बहुलवाद, जीवन की गुणवत्ता और सतत विकास को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों का भी उल्लेख किया।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों को भी रेखांकित किया। पूनावाला के मुताबिक, दोनों के बीच संबंध पारस्परिक सम्मान, विकास के साझा दृष्टिकोण और निरंतर सहयोग पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि समुदाय आगा खान की यात्रा और भारत में अपनी जमात से उनकी मुलाकात को लेकर उत्साहित है।

    पूनावाला ने अपने संदेश के अंत में प्रधानमंत्री मोदी को एक बार फिर धन्यवाद दिया। उन्होंने भारत सरकार की ओर से दिए गए निमंत्रण को गर्मजोशी और उदारता से भरा कदम बताया। इसी वजह से उनका यह पोस्ट राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना, क्योंकि वह हाल ही में बीजेपी से अलग हुए हैं।

    हालांकि पार्टी छोड़ने के बाद भी पूनावाला की ओर से प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक टिप्पणियां सामने आती रही हैं। इस बार उनका संदेश किसी राजनीतिक मुद्दे के बजाय आगा खान की प्रस्तावित आधिकारिक यात्रा और भारत-इस्माइली समुदाय के संबंधों पर केंद्रित रहा।

    आगा खान की सितंबर में प्रस्तावित यात्रा के दौरान भारत और इस्माइली इमामत के बीच लंबे समय से चले आ रहे संपर्क, सामुदायिक संबंधों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग से जुड़े पहलुओं पर ध्यान रहने की संभावना है। पूनावाला का बयान इसी व्यापक संदर्भ में प्रधानमंत्री के प्रति उनके आभार को सामने रखता है।

  • वित्त वर्ष 2031 तक 63 लाख यूनिट पहुंच सकता है भारतीय कार बाजार: आरसी भार्गव

    वित्त वर्ष 2031 तक 63 लाख यूनिट पहुंच सकता है भारतीय कार बाजार: आरसी भार्गव

    नई दिल्ली ।भारतीय कार उद्योग आने वाले वर्षों में विस्तार की मजबूत संभावनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन आरसी भार्गव ने रविवार, 9 अगस्त 2026 को कहा कि वित्त वर्ष 2030-31 तक देश का कार बाजार बढ़कर 61 से 63 लाख यूनिट तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में छोटी कारों की बाजार हिस्सेदारी में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

    आरसी भार्गव के अनुसार, भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की भविष्य की वृद्धि का आकलन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हालिया जीएसटी सुधारों से केवल वाहन उद्योग को ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के कई अन्य क्षेत्रों को भी गति मिली है। कंपनी अगले पांच वर्षों के दौरान कार बाजार की संभावित वृद्धि का अधिक सटीक अनुमान तैयार करने की प्रक्रिया में है।

    मारुति सुजुकी इंडिया की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक एकीकृत रिपोर्ट में कंपनी के कारोबार और भविष्य की रणनीति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, छोटी कारों के बाजार में सुधार, एसयूवी पोर्टफोलियो की मजबूती, अलग-अलग पावरट्रेन विकल्प, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और निर्यात में बेहतर प्रदर्शन ने कंपनी की वृद्धि को समर्थन दिया है।

    वित्त वर्ष 2025-26 में मारुति सुजुकी ने 24.22 लाख वाहनों की रिकॉर्ड वार्षिक बिक्री दर्ज की। यह कंपनी की अब तक की सबसे अधिक सालाना बिक्री है। इसी अवधि में कंपनी ने 4.47 लाख वाहनों का निर्यात किया, जो उसके निर्यात कारोबार का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।

    कंपनी लगातार तीसरे वर्ष 20 लाख से अधिक वाहनों की बिक्री करने में सफल रही है। आरसी भार्गव ने बिक्री के अगले दस लाख यूनिट के माइलस्टोन को लेकर भी सकारात्मक रुख जताया। उन्होंने कहा कि कंपनी इस उपलब्धि को पहले की अपेक्षा जल्दी हासिल करने को लेकर आशावादी है।

    मारुति सुजुकी इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ हिसाशी ताकेउची ने बताया कि कंपनी ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजनाओं को तेज किया है। वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान कंपनी ने 5 लाख यूनिट की अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग क्षमता जोड़ी है। इसका उद्देश्य बदलती मांग और ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप उत्पादन को मजबूत करना है।

    ताकेउची ने कहा कि भारतीय ग्राहकों की पसंद और अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी अपने एसयूवी पोर्टफोलियो को और मजबूत करने की तैयारी कर रही है। मारुति सुजुकी अगले पांच से छह वर्षों में सात नई एसयूवी लॉन्च करने की योजना पर काम कर रही है।

    भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग में घरेलू मांग के साथ निर्यात, तकनीकी विकास और उत्पादन क्षमता का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। मारुति सुजुकी ने विनिर्माण, निर्यात, तकनीकी विकास, रोजगार सृजन, कौशल विकास और टिकाऊ मोबिलिटी के माध्यम से देश की आर्थिक विकास यात्रा में योगदान देने की प्रतिबद्धता जताई है।

    कंपनी के अनुसार, भारत के 2047 तक विकसित देश बनने के लक्ष्य में ऑटोमोबाइल उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऐसे में कार बाजार का संभावित विस्तार केवल बिक्री के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्पादन, रोजगार, निर्यात और तकनीकी क्षमताओं को भी प्रभावित कर सकता है।