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  • 13 जून 2026 का राशिफल: ग्रहों के महासंयोग से कई राशियों की चमकेगी किस्मत, कुछ को रहना होगा सतर्क

    13 जून 2026 का राशिफल: ग्रहों के महासंयोग से कई राशियों की चमकेगी किस्मत, कुछ को रहना होगा सतर्क


    नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार 13 जून 2026 का दिन ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। द्वितीय ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि का संयोग बन रहा है, वहीं पूरे दिन कृतिका नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। चंद्रमा सुबह 09:25 तक वृषभ राशि में रहकर बाद में मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। ग्रहों की इस स्थिति से वाशि योग, सुनफा योग, शंख योग, सुकर्मा योग और सर्वाअमृत योग जैसे शक्तिशाली संयोग बन रहे हैं, जो कई राशियों के लिए लाभकारी साबित होंगे।

    मेष से कन्या तक का प्रभाव
    मेष राशि के जातकों के लिए यह दिन नई शुरुआत और आर्थिक लाभ का संकेत दे रहा है। व्यापार में विस्तार और करियर में सहयोग मिलने की संभावना है। वृषभ राशि वालों का आत्मविश्वास बढ़ेगा और नए आय स्रोत बन सकते हैं। मिथुन राशि के लिए दिन कुछ उतार-चढ़ाव भरा रहेगा, खर्च और तनाव बढ़ सकता है। कर्क राशि वालों को कार्यस्थल पर बड़ी जिम्मेदारी और सफलता मिलने के योग हैं। सिंह राशि के लिए नौकरी और व्यापार में बड़ी उपलब्धि के संकेत मिल रहे हैं। कन्या राशि के जातकों को करियर में तरक्की और प्रेम जीवन में सकारात्मकता मिलेगी।

    तुला से वृश्चिक तक का हाल
    तुला राशि के लिए यह दिन चुनौतीपूर्ण रह सकता है, खासकर करियर और खर्च को लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता है। वृश्चिक राशि वालों के लिए यह समय बेहद शुभ है, पार्टनरशिप और बिजनेस में बड़ा लाभ मिलने की संभावना है।

    धनु से मीन तक की स्थिति
    धनु राशि के लिए दिन सामान्य रहेगा लेकिन भावनात्मक संतुलन बनाए रखना जरूरी है। मकर राशि के जातकों को कार्यस्थल पर नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं लेकिन पारिवारिक तनाव भी संभव है। कुंभ राशि के लिए यह दिन कुछ कठिनाइयों भरा रहेगा, निवेश और विवादों से बचना चाहिए। मीन राशि के जातकों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ संकेत दे रहा है, करियर और व्यापार में बड़ी सफलता और लाभ मिलने की संभावना है।

    कुल मिलाकर 13 जून 2026 का दिन ग्रहों के विशेष योगों से प्रभावित रहेगा। जहां कुछ राशियों के लिए यह दिन भाग्यवृद्धि और आर्थिक उन्नति लेकर आएगा, वहीं कुछ राशियों को सावधानी और संयम से काम लेना होगा।

  • वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    वैश्विक राहत संकेतों से भारतीय बाजार में रिकॉर्ड तेजी, बैंकिंग और रियल्टी शेयरों ने बढ़ाई निवेशकों की दौलत

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने के संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार ने सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में शानदार प्रदर्शन किया। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया, जिसके चलते घरेलू बाजार में चौतरफा खरीदारी देखने को मिली। इस तेजी के परिणामस्वरूप निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में करीब 10 लाख करोड़ रुपये का इजाफा दर्ज किया गया।

    कारोबार समाप्त होने पर प्रमुख सूचकांक मजबूत बढ़त के साथ बंद हुए। निवेशकों की सकारात्मक धारणा और वैश्विक संकेतों के समर्थन से बाजार ने पूरे सत्र के दौरान मजबूती बनाए रखी। बड़ी कंपनियों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी उल्लेखनीय खरीदारी देखने को मिली, जिससे बाजार की व्यापक भागीदारी स्पष्ट हुई।

    बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर लगभग 462 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि निवेशकों ने वैश्विक परिस्थितियों में सुधार की उम्मीदों को सकारात्मक रूप से लिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को सबसे अधिक राहत इस बात से मिली कि पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम होने की संभावना दिखाई दी।

    कारोबारी सत्र के दौरान बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के शेयरों में मजबूत खरीदारी दर्ज की गई। निजी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के शेयरों ने बाजार को ऊपर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों में दो से तीन प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई, जिससे प्रमुख सूचकांकों को मजबूती मिली।

    मिडकैप और स्मॉलकैप वर्ग के शेयरों में भी निवेशकों का उत्साह देखने को मिला। आमतौर पर जोखिम वाले माने जाने वाले इन शेयरों में खरीदारी यह संकेत देती है कि बाजार सहभागियों का भरोसा केवल चुनिंदा बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक स्तर पर सकारात्मक धारणा बनी रही। इससे बाजार की मजबूती और अधिक व्यापक दिखाई दी।

    विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की खबरें रहीं। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था। यदि किसी समझौते की दिशा में ठोस प्रगति होती है तो इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और निवेश माहौल पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    इसी उम्मीद का असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, जिसे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए सकारात्मक माना जाता है। कम तेल कीमतें महंगाई के दबाव को घटाने, चालू खाते के संतुलन को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने में सहायक हो सकती हैं। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में नरमी को शेयर बाजार ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया।

    हालांकि बाजार विशेषज्ञ निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह भी दे रहे हैं। उनका कहना है कि वैश्विक घटनाक्रमों में किसी भी प्रकार का बदलाव बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकता है। फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों का भरोसा मजबूत दिखाई दे रहा है और घरेलू आर्थिक संकेतक भी बाजार को समर्थन प्रदान कर रहे हैं।

    दिनभर की तेज बढ़त ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम होने की संभावना भारतीय बाजार के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं, तो आने वाले कारोबारी सत्रों में भी सकारात्मक रुख देखने को मिल सकता है।

  • मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    नई दिल्ली । देश में खुदरा महंगाई दर ने मई 2026 में एक बार फिर बढ़ोतरी का संकेत दिया है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर मई में 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य वस्तुओं की कीमतों में दबाव बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है।

    मई के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई का असर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.53 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि का दबाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।

    खाद्य महंगाई भी मई में बढ़ी है। अप्रैल में जहां खाद्य महंगाई दर 4.20 प्रतिशत थी, वहीं मई में यह बढ़कर 4.78 प्रतिशत तक पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 4.85 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.66 प्रतिशत दर्ज की गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है, इसलिए इस श्रेणी के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

    हालांकि कुछ प्रमुख वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली। सालाना आधार पर आलू की कीमतों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मटर, जीरा तथा मोटर वाहन श्रेणी की कुछ वस्तुओं के दाम भी कम हुए हैं। वाहन बाजार में मोटर कार, जीप, मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत प्रदान की है।

    इसके विपरीत कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। चांदी के आभूषणों की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। इसके अलावा टमाटर, सोना-हीरा-प्लेटिनम आभूषण, अदरक और किशमिश जैसी वस्तुओं के दाम भी उल्लेखनीय रूप से बढ़े हैं। खाद्य और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में यह वृद्धि महंगाई के समग्र स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रही।

    राज्यों के स्तर पर देखें तो अधिक आबादी वाले राज्यों में तेलंगाना सबसे अधिक खुदरा महंगाई वाला राज्य रहा। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा का स्थान रहा। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में महंगाई का दबाव अधिक दर्ज किया गया, जिससे स्थानीय उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा कई बाहरी और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा रही हैं। यदि ऊर्जा लागत में और वृद्धि होती है तो परिवहन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ी लागतें भी बढ़ सकती हैं।

    इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आगामी वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान को ऊपर संशोधित किया है। कमजोर मानसून की आशंका, अल-नीनो का संभावित प्रभाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को प्रमुख जोखिम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना रहा तो महंगाई दर आने वाले महीनों में आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

  • जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    जलवायु संकट और बढ़ती कृषि चुनौतियों के बीच भारत का संदेश, छोटे किसानों को मजबूत किए बिना सुरक्षित नहीं होगा खाद्य भविष्य

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और कृषि क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत ने ब्रिक्स देशों से छोटे और सीमांत किसानों को सशक्त बनाने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करने का आह्वान किया है। भारत का मानना है कि दुनिया की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और टिकाऊ कृषि विकास सुनिश्चित करने के लिए किसानों को आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत रूप से सक्षम बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

    इंदौर में आयोजित ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सदस्य देशों के बीच गहरा सहयोग वैश्विक कृषि व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि यदि ब्रिक्स देश अपनी सामूहिक क्षमता, अनुभव और संसाधनों का प्रभावी उपयोग करें तो कृषि क्षेत्र में सकारात्मक और दूरगामी बदलाव संभव हैं।

    उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही है और वैश्विक कृषि बाजारों में अस्थिरता किसानों के लिए नई कठिनाइयां पैदा कर रही है। इन परिस्थितियों में छोटे किसानों की सुरक्षा और समृद्धि को प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।

    कृषि मंत्री ने कहा कि दुनिया के अधिकांश देशों में छोटे और सीमांत किसान खाद्य उत्पादन की रीढ़ हैं। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, बेहतर बाजार और नवाचार आधारित कृषि प्रणालियों तक पहुंच मिलती है तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक मजबूत और स्थिर बनेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों का सशक्तिकरण ही खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव है।

    भारत की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए चौहान ने कहा कि पिछले एक दशक में देश के कृषि क्षेत्र ने लगातार उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। उन्होंने बताया कि कृषि क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर लगभग 4.5 प्रतिशत रही है, जो इस क्षेत्र की मजबूती और क्षमता को दर्शाती है। खाद्यान्न उत्पादन में निरंतर वृद्धि ने देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।

    उन्होंने जानकारी दी कि भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 376 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। वहीं गेहूं उत्पादन करीब 118 मिलियन टन के स्तर पर पहुंच गया है। बागवानी क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है और इसका उत्पादन 378 मिलियन टन से अधिक हो चुका है। इसके अलावा मत्स्य उत्पादन 19 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया है, जो कृषि से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक विकास का संकेत है।

    सम्मेलन के दौरान मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कृषि नीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता है और कृषि क्षेत्र में साझा प्रगति का समर्थन करता है।

    चौहान ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम संचालित कर रहा है, जिसके माध्यम से करोड़ों लोगों को खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि देश की लगभग 43 प्रतिशत कार्यशक्ति कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।

    उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य पर जोर दिया कि भारत के लगभग 87 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। ऐसे में उनकी आय, उत्पादकता और संसाधनों तक पहुंच बढ़ाना केवल राष्ट्रीय नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का मानना है कि ब्रिक्स देशों का साझा सहयोग कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बना सकता है।

  • आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    आईडीएफसी बैंक फंड दुरुपयोग मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रकरणों में 9 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल

    नई दिल्ली । हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड के फंड के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने जांच को आगे बढ़ाते हुए नौ आरोपियों के खिलाफ विशेष अदालतों में चार्जशीट दाखिल कर दी है। एजेंसी के अनुसार इन मामलों में सरकारी अधिकारियों, बैंक कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों की कथित मिलीभगत के जरिए सरकारी धन के अनुचित उपयोग और वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम दिया गया।

    सीबीआई द्वारा दाखिल आरोपपत्रों के अनुसार हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में अवैध बैंकिंग लेन-देन के कारण लगभग 504 करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ। वहीं चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में करीब 153 करोड़ रुपये की धनराशि प्रभावित होने का दावा किया गया है। दोनों मामलों को मिलाकर कथित अनियमितताओं का आंकड़ा 650 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचता है।

    जांच एजेंसी ने कहा है कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसके साथ ही भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं को भी आरोपपत्र में शामिल किया गया है। एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों की भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया गया है और आगे की जांच भी जारी रहेगी।

    हरियाणा सरकार से जुड़े मामले में दाखिल चार्जशीट पंचकूला स्थित विशेष सीबीआई अदालत में प्रस्तुत की गई है। इस मामले में दो निजी व्यक्तियों को कथित रूप से अपराध से अर्जित धन का लाभार्थी बताते हुए आरोपी बनाया गया है। यह इस प्रकरण में दाखिल दूसरी चार्जशीट है। इससे पहले एजेंसी 15 अन्य आरोपियों के खिलाफ भी आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है, जिनमें सरकारी कर्मचारी, बैंक अधिकारी, निजी कंपनियां और अन्य व्यक्ति शामिल थे।

    दूसरी ओर चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड से जुड़े मामले में पहली बार आरोपपत्र दाखिल किया गया है। चंडीगढ़ स्थित विशेष अदालत में प्रस्तुत इस चार्जशीट में सात आरोपियों को नामजद किया गया है। इनमें पांच बैंक अधिकारी, स्मार्ट सिटी परियोजना से जुड़ा एक अधिकारी तथा एक निजी व्यक्ति शामिल हैं। एजेंसी का आरोप है कि वित्तीय लेन-देन की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी धन को अनुचित तरीके से स्थानांतरित किया गया।

    सीबीआई के अनुसार इन मामलों की जांच विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त शिकायतों और प्राथमिक जांच रिपोर्टों के आधार पर शुरू की गई थी। हरियाणा के कई सरकारी विभागों से जुड़े मामलों की जांच राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र से सीबीआई को सौंपी गई थी। वहीं चंडीगढ़ में आर्थिक अपराध से जुड़े मामलों की जांच भी बाद में केंद्रीय एजेंसी के हवाले की गई।

    जांच के दौरान एजेंसी ने हाल ही में चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया था। इन छापों के दौरान कुछ सरकारी अधिकारियों के आवासों, निजी कंपनियों और संबंधित व्यक्तियों के परिसरों की जांच की गई। एजेंसी का उद्देश्य वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड और कथित तौर पर अपराध से अर्जित धन के प्रवाह की जानकारी जुटाना था।

    सीबीआई का दावा है कि जांच में ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि कुछ सरकारी अधिकारियों और बैंक कर्मचारियों ने आपसी समन्वय के साथ खातों के संचालन, धन हस्तांतरण और रकम को विभिन्न माध्यमों से आगे भेजने में भूमिका निभाई। एजेंसी अब वित्तीय लेन-देन की पूरी श्रृंखला को खंगाल रही है ताकि कथित अनियमितताओं के सभी पहलुओं को सामने लाया जा सके।

    जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भविष्य में अतिरिक्त आरोपपत्र भी दाखिल किए जा सकते हैं। मामले की सुनवाई विशेष अदालतों में आगे बढ़ेगी, जहां प्रस्तुत साक्ष्यों और आरोपों की न्यायिक जांच की जाएगी।

  • झाबुआ कलेक्टर बने डॉक्टर, मरीजों का किया इलाज; PHC निरीक्षण में खुद संभाली ओपीडी

    झाबुआ कलेक्टर बने डॉक्टर, मरीजों का किया इलाज; PHC निरीक्षण में खुद संभाली ओपीडी


    मध्य प्रदेश। झाबुआ में एक अनोखा दृश्य देखने को मिला, जब नए कलेक्टर और एमबीबीएस डॉक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट ने पिटोल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों की लंबी कतार देखकर कलेक्टर ने खुद डॉक्टर की जिम्मेदारी संभाल ली।

    कलेक्टर ने ओपीडी में बैठकर लगभग 12 से 15 मरीजों का इलाज किया और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना। उन्होंने न केवल मरीजों की जांच की, बल्कि गर्भवती महिलाओं से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य, पोषण और नियमित जांच की जानकारी भी ली।

    उन्होंने गर्भवती महिलाओं को आवश्यक सावधानियों, समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह के महत्व के बारे में जागरूक किया। साथ ही हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान कर समय पर उपचार सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया।

    निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने स्वास्थ्य विभाग के ऑनलाइन रिकॉर्ड और एएनसी (एंटीनेटल केयर) पोर्टल की भी जांच की। रिकॉर्ड में गड़बड़ी पाए जाने पर उन्होंने कर्मचारियों को तुरंत डेटा अपडेट करने के निर्देश दिए और लापरवाही पर नाराजगी जताई।

    इसके अलावा उन्होंने अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं की भी समीक्षा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मरीजों को इलाज के लिए परेशान करना किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    निरीक्षण के अंत में कलेक्टर डॉ. भरसट ने पिटोल में निर्माणाधीन नए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की बिल्डिंग का भी जायजा लिया। उन्होंने निर्माण कार्य की प्रगति की समीक्षा की और अधिकारियों को शेष कार्य जल्द पूरा करने के निर्देश दिए, ताकि जल्द से जल्द नए अस्पताल को शुरू किया जा सके।

    इस पहल से स्थानीय लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलने की उम्मीद जगी है और क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    तेल कंपनियों को रोजाना 500 करोड़ रुपये की चोट, सरकार ने डीजल बिक्री पर लगाई बड़ी रोक, 90 दिन के लिए नए नियम लागू

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता और बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने डीजल वितरण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए रिटेल आउटलेट्स से बल्क डीजल बिक्री पर रोक लगाने का फैसला किया है। सरकार का मानना है कि इस कदम से सरकारी तेल कंपनियों को राहत मिलेगी, जो वर्तमान परिस्थितियों में प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी का सामना कर रही हैं।

    नए प्रावधानों के तहत देशभर के पेट्रोल पंपों पर डीजल की बिक्री को लेकर सख्त नियम लागू किए गए हैं। अब डीजल केवल वाहनों के ईंधन टैंक या अधिकृत और स्वीकृत कंटेनरों में ही दिया जा सकेगा। साथ ही प्रति वाहन या ग्राहक प्रतिदिन अधिकतम 200 लीटर डीजल खरीदने की सीमा तय की गई है। सरकार ने यह व्यवस्था प्रारंभिक रूप से 90 दिनों के लिए लागू की है।

    सरकार का कहना है कि हाल के महीनों में डीजल की रिटेल कीमत और बल्क आपूर्ति कीमत के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला। इसका लाभ उठाते हुए कई औद्योगिक, व्यावसायिक और संस्थागत उपभोक्ता निर्धारित चैनलों की बजाय सामान्य पेट्रोल पंपों से डीजल खरीदने लगे थे। इससे सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ गया था।

    ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतों के बावजूद घरेलू स्तर पर उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखा गया। यही कारण रहा कि रिटेल स्तर पर मिलने वाला डीजल बल्क आपूर्ति के मुकाबले काफी सस्ता पड़ रहा था। इस मूल्य अंतर ने बड़े उपभोक्ताओं को रिटेल आउटलेट्स की ओर आकर्षित किया, जिससे सामान्य उपभोक्ताओं के लिए उपलब्धता प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कई जिलों में डीजल की मांग में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है। बड़ी मात्रा में डीजल खरीदकर उसके पुनर्विक्रय और अनधिकृत उपयोग की शिकायतें भी सामने आईं। कुछ मामलों में जेरी कैन और अन्य कंटेनरों के माध्यम से बड़ी मात्रा में डीजल खरीदे जाने की जानकारी मिली, जिसके बाद सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए यह कदम उठाया।

    नए नियमों के तहत औद्योगिक, संस्थागत और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को अब निर्धारित उपभोक्ता पंपों से ही डीजल प्राप्त करना होगा। रिटेल आउटलेट्स से खरीदे गए डीजल के पुनर्विक्रय पर भी स्पष्ट रूप से रोक लगा दी गई है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सब्सिडी या राहत आधारित मूल्य व्यवस्था का लाभ केवल वास्तविक उपभोक्ताओं तक पहुंचे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से सरकारी तेल कंपनियों के वित्तीय दबाव में कुछ कमी आ सकती है। साथ ही डीजल की उपलब्धता को लेकर पैदा हो रही असंतुलित स्थिति भी नियंत्रित होगी। हालांकि उद्योग जगत के कुछ वर्गों को नई व्यवस्था के अनुसार अपनी खरीद प्रणाली में बदलाव करना पड़ सकता है।

    सरकार ने राज्य प्रशासन, तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप संचालकों को नियमों के प्रभावी पालन के निर्देश दिए हैं। कालाबाजारी, अनधिकृत भंडारण और ईंधन के गलत उपयोग पर निगरानी बढ़ाने के लिए भी संबंधित एजेंसियों को सक्रिय किया गया है। आने वाले महीनों में इस व्यवस्था के प्रभाव का आकलन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

  • राज्यसभा नामांकन विवाद पर भाजपा का कांग्रेस पर हमला, ‘नारी सम्मान’ पर उठाए सवाल

    राज्यसभा नामांकन विवाद पर भाजपा का कांग्रेस पर हमला, ‘नारी सम्मान’ पर उठाए सवाल


    मध्य प्रदेश। मध्यप्रदेश के मंदसौर में राज्यसभा नामांकन विवाद को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए उसके ‘नारी सम्मान’ के दावे को केवल नारा बताया और उस पर दोहरे चरित्र का आरोप लगाया।

    जिला भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में भाजपा जिलाध्यक्ष राजेश दीक्षित और जिला पंचायत अध्यक्ष दुर्गा पाटीदार ने कांग्रेस पर कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि कांग्रेस महिला सम्मान की बात तो करती है, लेकिन उसके व्यवहार में यह दिखाई नहीं देता।

    भाजपा नेताओं ने कहा कि राज्यसभा नामांकन विवाद के बाद कांग्रेस द्वारा मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने को महिला सम्मान का मुद्दा बनाया जा रहा है, जबकि वास्तविक मामला नामांकन पत्र में तथ्यों को छिपाने का है।

    प्रेस वार्ता में यह भी आरोप लगाया गया कि कांग्रेस नेतृत्व ने एक महिला कार्यकर्ता से जुड़े मामले में गंभीर शिकायतों को अनदेखा किया। भाजपा ने दावा किया कि संबंधित प्रकरण में कांग्रेस नेता कुंभम शिवकुमार रेड्डी पर गंभीर आरोप लगे थे और उस समय तत्कालीन तेलंगाना प्रभारी के रूप में मीनाक्षी नटराजन की भूमिका पर भी सवाल उठे थे।

    भाजपा का कहना है कि नामांकन पत्र में न्यायिक कार्यवाही और संबंधित तथ्यों का उल्लेख नहीं किया गया, जो कि नामांकन निरस्त होने का प्रमुख कारण बना। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि कांग्रेस ने आरोपी नेता को संरक्षण दिया और पीड़ित महिला की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया।

    भाजपा नेताओं ने कांग्रेस से कई सवाल पूछते हुए कहा कि यदि न्यायिक कार्यवाही की जानकारी थी तो उसे शपथ पत्र में क्यों नहीं बताया गया और महिला शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

    प्रेस वार्ता में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का भी उल्लेख किया गया, जिसमें मीनाक्षी नटराजन की याचिका को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप की सीमाओं का हवाला देते हुए कहा था कि ऐसे मामलों में चुनाव परिणाम के बाद ही कानूनी चुनौती दी जा सकती है।

    भाजपा नेताओं ने कहा कि कांग्रेस को महिला सम्मान के मुद्दे पर बयानबाजी करने से पहले अपने संगठनात्मक व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में महिलाओं से जुड़े मामलों में कई बार शिकायतों को अनदेखा किया जाता है।

    अंत में भाजपा ने कहा कि यह मामला केवल एक चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि कांग्रेस की जवाबदेही और महिला सम्मान के प्रति उसके वास्तविक दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

  • मंडी शुल्क वृद्धि पर बवाल: कांग्रेस का विरोध तेज, सरकार से फैसला वापस लेने की मांग

    मंडी शुल्क वृद्धि पर बवाल: कांग्रेस का विरोध तेज, सरकार से फैसला वापस लेने की मांग


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश में कृषि उपज मंडियों में मंडी शुल्क को 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.50 प्रतिशत किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। इस फैसले को लेकर मंदसौर जिले के पिपलियामंडी में कांग्रेस नेताओं, किसानों और व्यापारियों ने मिलकर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा और इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।

    यह ज्ञापन ब्लॉक कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा और जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष रामचंद्र करुण के नेतृत्व में मंडी सचिव जगदीशचंद्र भाभड़ को सौंपा गया। इस दौरान बड़ी संख्या में किसान और व्यापारी भी मौजूद रहे।

     किसानों पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
    पूर्व ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष अनिल शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा मंडी शुल्क में 0.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी किसानों और व्यापारियों दोनों के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने कहा कि किसान पहले ही अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में यह अतिरिक्त शुल्क उन पर और आर्थिक दबाव बढ़ाएगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि देश के कई कृषि उत्पादक राज्यों में मंडी शुल्क 1 प्रतिशत या उससे भी कम है। ऐसे में मध्य प्रदेश में बढ़ा हुआ शुल्क व्यापारियों को अन्य राज्यों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में पीछे कर सकता है।

     किसानों और व्यापारियों में नाराजगी
    किसान बंशीलाल पाटीदार ने इस फैसले को किसान विरोधी बताया। उन्होंने कहा कि खेती पहले से ही घाटे का सौदा बनती जा रही है और इन परिस्थितियों में शुल्क वृद्धि किसानों की समस्याओं को और बढ़ाएगी। जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष रामचंद्र करुण ने भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह निर्णय किसान और व्यापारी वर्ग के हितों के खिलाफ है। उन्होंने इसे “शोषणकारी” कदम बताया और तत्काल वापस लेने की मांग की।

    आंदोलन की चेतावनी
    कांग्रेस नेता बाबूखा मेवाती ने मंडी शुल्क वृद्धि को अन्यायपूर्ण बताते हुए चेतावनी दी कि यदि सरकार ने यह निर्णय वापस नहीं लिया तो कांग्रेस आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी।

     व्यापक समर्थन
    इस मौके पर कई स्थानीय नेता, किसान और व्यापारी उपस्थित रहे, जिन्होंने एक स्वर में मंडी शुल्क वृद्धि का विरोध किया और सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की।

    किसानों और व्यापारियों का कहना है कि यदि यह बढ़ोतरी लागू रहती है तो इसका सीधा असर उनकी आमदनी और व्यापार पर पड़ेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

  • फाइलों में अटके 8 मेगा प्रोजेक्ट्स, 33 मौतें और 1800 करोड़ का अतिरिक्त बोझ: मध्य प्रदेश में अफसरशाही पर उठे गंभीर सवाल

    फाइलों में अटके 8 मेगा प्रोजेक्ट्स, 33 मौतें और 1800 करोड़ का अतिरिक्त बोझ: मध्य प्रदेश में अफसरशाही पर उठे गंभीर सवाल


    मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश के चार प्रमुख शहरों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में चल रहे जल आपूर्ति और सीवरेज से जुड़े 8 बड़े प्रोजेक्ट्स प्रशासनिक सुस्ती और अफसरशाही की देरी के चलते अधर में लटके हुए हैं। केंद्र सरकार की अमृत 2.0 योजना के तहत शुरू हुए ये प्रोजेक्ट्स करीब साढ़े चार साल बाद भी पूरे नहीं हो सके हैं।

    देरी का सीधा असर न केवल विकास कार्यों पर पड़ा है, बल्कि इसका भारी वित्तीय बोझ भी सरकार पर पड़ा है। अब तक इन परियोजनाओं की लागत में करीब 1800 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस लापरवाही की कीमत आम लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है।

    इंदौर की त्रासदी: 33 मौतों ने खोली लापरवाही की पोल
    प्रशासनिक ढिलाई का सबसे दर्दनाक उदाहरण इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सामने आया, जहां दूषित पानी पीने से जनवरी-फरवरी 2026 के बीच 33 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए। बताया जाता है कि क्षेत्र में 30 साल पुरानी नर्मदा पाइपलाइन को बदलने की मांग लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन संबंधित फाइलें महीनों तक अफसरों के पास अटकी रहीं।

    करीब 550 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के टेंडर जारी करने में भी आठ महीने की देरी हुई। जब तक काम शुरू हुआ, तब तक स्थिति बिगड़ चुकी थी और लोगों की जान जा चुकी थी।

    उज्जैन में प्रोजेक्ट ठप, फर्जी बैंक गारंटी का मामला
    उज्जैन में जल आपूर्ति और सीवरेज प्रोजेक्ट भी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। यहां एक कंपनी की बैंक गारंटी जांच में फर्जी पाई गई, जिसके बाद उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। इससे परियोजना पूरी तरह ठप हो गई और हजारों कनेक्शन व सीवरेज लाइन का काम अटक गया।

     डिजाइन और डीपीआर की खामियां बनी बड़ी वजह
    सूत्रों के अनुसार कई प्रोजेक्ट्स की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) समय पर तैयार नहीं हो सकी। डिजाइन और ड्रॉइंग में खामियों के चलते टेंडर और काम दोनों में देरी हुई। अब सरकार ने ऐसे सलाहकारों और ठेकेदारों की समीक्षा कर ब्लैकलिस्ट करने की तैयारी शुरू कर दी है।

     बढ़ता वित्तीय बोझ: हर शहर पर करोड़ों का अतिरिक्त दबाव
    देरी के कारण चारों शहरों में परियोजनाओं का बजट लगातार बढ़ रहा है-
    * इंदौर: ₹800 करोड़ से बढ़कर ₹1073 करोड़
    * भोपाल: ₹735 करोड़ में केवल 6% खर्च
    * ग्वालियर: ₹932 करोड़ की परियोजना में वित्तीय अंतर
    * जबलपुर: बढ़ी हुई लागत का बोझ नगर निगम पर

     समाधान की कोशिश: ग्रीन बॉन्ड का सहारा
    नगर निगम अब वित्तीय संकट से निपटने के लिए ग्रीन बॉन्ड और अन्य नगर निगम बॉन्ड जारी करने की योजना बना रहे हैं। इनका उपयोग जल, पर्यावरण और सीवरेज परियोजनाओं में किया जाएगा।

     प्रशासनिक सख्ती की तैयारी
    मुख्य सचिव स्तर पर हुई नाराजगी के बाद अब लापरवाह अफसरों और सलाहकारों पर कार्रवाई की तैयारी है। 13 जून को भोपाल में होने वाली बड़ी समीक्षा बैठक में सभी परियोजनाओं की प्रगति का आकलन किया जाएगा और जिम्मेदारी तय की जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर निगरानी और निर्णय लिए जाते, तो न केवल वित्तीय नुकसान रोका जा सकता था, बल्कि कई जिंदगियां भी बचाई जा सकती थीं।