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  • नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी पर सियासत तेज, हिमंत सरमा ने राहुल गांधी पर साधा निशाना

    नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी पर सियासत तेज, हिमंत सरमा ने राहुल गांधी पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान की गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मामले को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने राहुल गांधी के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें कांग्रेस नेता ने प्रत्याशी की गिरफ्तारी को लोकतंत्र की हत्या बताया था।

    हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी का बचाव करते हुए कहा कि पुलिस ने अपना कर्तव्य निभाया है। उन्होंने दावा किया कि मिलन प्रधान के खिलाफ करीब 19 साल पुराने मामले लंबित थे और इन्हीं मामलों में पुलिस ने कार्रवाई की है।

    असम के मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी की आलोचना करते हुए उनके बयानों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने जिस व्यक्ति को चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया है, उसके खिलाफ पुराने आपराधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्ष 2007 में मिलन प्रधान के खिलाफ हत्या से जुड़े दो या तीन मामले दर्ज किए गए थे।

    हिमंत सरमा ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी वारंट लंबित हैं, तो पुलिस के लिए कार्रवाई करना उसके कर्तव्य का हिस्सा है। उन्होंने इसी आधार पर नंदीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी की गिरफ्तारी को उचित ठहराया।

    राहुल गांधी पर टिप्पणी करते हुए हिमंत सरमा ने बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने राहुल गांधी को पागल व्यक्ति बताया और उनके अलग-अलग सार्वजनिक रूपों का जिक्र करते हुए तंज कसा। उन्होंने कहा कि कभी राहुल गांधी दाढ़ी के साथ दिखाई देते हैं, कभी बिना दाढ़ी के और कभी विदेश में तो कभी भारत में नजर आते हैं।

    इस पूरे विवाद की शुरुआत मिलन प्रधान की गिरफ्तारी के बाद हुई। राहुल गांधी ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़कर देखा था। इसके बाद हिमंत सरमा ने राहुल गांधी के बयान का जवाब देते हुए गिरफ्तारी के पीछे लंबित मामलों और पुलिस की कार्रवाई का उल्लेख किया।

    पश्चिम बंगाल पुलिस के अनुसार, मिलन प्रधान को चार लंबित मामलों में जारी गिरफ्तारी वारंट के आधार पर गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक ये वारंट गैर-जमानती मामलों में कथित संलिप्तता से जुड़े हैं। इन मामलों का संबंध वर्ष 2007 में नंदीग्राम में हुए भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान दर्ज घटनाओं से बताया गया है।

    पुलिस के अनुसार, लंबित मामलों में दंगा, हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों से जुड़े प्रकरण शामिल हैं। गिरफ्तारी को लेकर राजनीतिक विवाद के बीच पुलिस ने इन्हीं लंबित मामलों और वारंट को कार्रवाई का आधार बताया है।

    नंदीग्राम उपचुनाव के मद्देनजर मिलन प्रधान की गिरफ्तारी ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। एक ओर कांग्रेस की तरफ से गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर हिमंत सरमा ने पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया है। फिलहाल विवाद का केंद्र प्रत्याशी की गिरफ्तारी, पुराने मामलों में जारी वारंट और इस कार्रवाई को लेकर सामने आए राजनीतिक बयानों पर बना हुआ है।

  • UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    UPI के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली संसदीय रिपोर्ट पर कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी फिर चर्चा में

    नई दिल्ली ।UPI यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट भुगतान पर लागू होने वाले 0.4 प्रतिशत MDR को ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए इसका विरोध किया है। इसी बीच संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 12 अगस्त को पेश रिपोर्ट चर्चा में आ गई है। इस रिपोर्ट में UPI के लिए टिकाऊ और स्तर आधारित राजस्व व्यवस्था की जरूरत बताई गई थी।

    समिति में कांग्रेस के पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल थे। रिपोर्ट को भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनाया था। प्रकाशित कार्यवाही में रिपोर्ट को लेकर किसी तरह की असहमति दर्ज नहीं की गई थी। समिति ने UPI के लिए टियर आधारित MDR या राजस्व व्यवस्था को जल्द अधिसूचित कर लागू करने की जरूरत बताई थी।

    रिपोर्ट में UPI इकोसिस्टम की वित्तीय स्थिरता का मुद्दा उठाया गया था। समिति के अनुसार, डिजिटल भुगतान का विस्तार होने के साथ उसके बुनियादी ढांचे, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी व्यवस्था पर खर्च भी बढ़ता है। ऐसे में केवल सरकारी प्रोत्साहन राशि के सहारे लंबे समय तक UPI व्यवस्था को संचालित करना वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसी वजह से एक व्यवहारिक और टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत बताई गई थी।

    समिति ने 2026-27 के बजट में UPI और RuPay पर जीरो-MDR नीति से जुड़ी लागत की भरपाई के लिए 2,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का भी उल्लेख किया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि UPI पर लेनदेन की संख्या लगातार बढ़ रही है और बड़ी संख्या में नए उपयोगकर्ता डिजिटल भुगतान व्यवस्था से जुड़ रहे हैं। इसके बावजूद मौजूदा सरकारी प्रोत्साहन राशि उद्योग की वास्तविक लागत का सीमित हिस्सा ही पूरा करती है।

    वर्तमान विवाद प्रस्तावित 0.4 प्रतिशत MDR को लेकर है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा UPI मर्चेंट लेनदेन पर लागू होनी है। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान पर कोई MDR नहीं लगेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P UPI लेनदेन भी पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। छोटे कारोबारियों के लिए जीरो-MDR व्यवस्था के तहत आने वाले लेनदेन पर भी शुल्क नहीं लगेगा।

    MDR को लेकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि इसे सरकार की ओर से लगाया गया टैक्स नहीं माना गया है। यह भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के बीच निर्धारित ढांचे के तहत लागू होने वाला शुल्क है। इससे प्राप्त राशि बैंकों और भुगतान सेवा से जुड़े अन्य हिस्सेदारों के बीच वितरित की जाएगी।

    राहुल गांधी ने नए MDR ढांचे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इसे ‘मोदी टैक्स’ बताते हुए व्यवस्था वापस लेने की मांग की। उन्होंने सरकार पर बाहरी दबाव में निर्णय लेने का आरोप भी लगाया। दूसरी ओर, सरकार की ओर से कहा गया है कि MDR को टैक्स के रूप में देखना सही नहीं है और नई व्यवस्था UPI भुगतान इकोसिस्टम की वित्तीय जरूरतों से जुड़ी है।

    ऐसे में वर्तमान राजनीतिक बहस में एक तरफ प्रस्तावित MDR का विरोध है, जबकि दूसरी तरफ UPI के लिए टिकाऊ राजस्व व्यवस्था की जरूरत से जुड़ा तर्क है। वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट में इसी तरह के राजस्व मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। UPI शुल्क व्यवस्था में बदलाव के बाद डिजिटल भुगतान की लागत, कारोबारियों पर प्रभाव और भुगतान व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता को लेकर चर्चा जारी है।

  • यूपी में सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे पर पेच, दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर नहीं बन रही सहमति

    यूपी में सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे पर पेच, दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर नहीं बन रही सहमति


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत तेज हो गई है, लेकिन दोनों दलों के बीच सीटों की संख्या को लेकर अभी सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर दावा कर रही है, जबकि सपा का जोर सीटों की संख्या के बजाय उम्मीदवार की मजबूती और संबंधित सीट पर जीत की संभावनाओं पर है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक सपा करीब 60 से 70 सीटों के विकल्प पर विचार कर रही है, जबकि कांग्रेस करीब 105 सीटों की मांग कर रही है।

    2017 के फॉर्मूले को आधार बना रही कांग्रेस

    कांग्रेस की दलील है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के तहत उसने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसी आधार पर पार्टी इस बार भी 100 से अधिक सीटों की हिस्सेदारी चाह रही है। कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी जुलाई में गठबंधन में ‘बराबरी और सम्मान’ की बात कही थी।

    हालांकि, 2017 के मुकाबले मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। 2022 में सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। यही वजह है कि सीटों के बंटवारे में पिछली बार के आंकड़े के बजाय मौजूदा संगठन और उम्मीदवारों की स्थिति को भी महत्व दिया जा रहा है।

    सपा का फोकस ‘कितनी सीटें’ नहीं, ‘कौन जीत सकता है’

    अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि गठबंधन में मुद्दा सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता है। सपा के भीतर सीटवार राजनीतिक स्थिति और संभावित उम्मीदवारों के आधार पर हिस्सेदारी तय करने की बात कही जा रही है।

    ताजा रिपोर्टों के मुताबिक कांग्रेस से उन सीटों पर संभावित उम्मीदवारों की जानकारी भी मांगी जा रही है, जिन पर वह दावा कर रही है। इसके बाद स्थानीय राजनीतिक समीकरण, संगठन की स्थिति और उम्मीदवार की जीत की संभावनाओं को ध्यान में रखकर सीटों पर फैसला किए जाने की बात सामने आई है।

    रायबरेली-अमेठी समेत कई सीटों पर खींचतान

    सीटों की कुल संख्या के अलावा कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों को लेकर भी दोनों दलों के बीच मतभेद की खबरें हैं। रिपोर्टों में रायबरेली और अमेठी का नाम प्रमुखता से सामने आया है। अंतिम फॉर्मूला तय होने से पहले सीटवार दावों पर बातचीत जारी है।

    कांग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की छह सीटें जीती थीं, जबकि सपा ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी। दोनों दलों ने मिलकर राज्य की 80 लोकसभा सीटों में 43 सीटें जीती थीं।

    2022 में अलग-अलग लड़े थे दोनों दल

    2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। सपा ने 111 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। सपा के साथ तब राष्ट्रीय लोक दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे दल भी गठबंधन में थे। बाद में दोनों दल सपा से अलग हो गए।

    अब 2027 के चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस फिर साथ आने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के सामने सीटों की संख्या के साथ-साथ यह सवाल भी है कि किन क्षेत्रों में किस पार्टी का संगठन और उम्मीदवार गठबंधन के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

    राजभर-निषाद को लेकर भी सपा ने रुख स्पष्ट किया

    इसी बीच सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को लेकर भी राजनीतिक अटकलें चलती रही हैं। दोनों नेता उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं और उनके दल एनडीए का हिस्सा हैं।

    आपकी मूल कॉपी में सपा के एक रणनीतिकार के हवाले से दावा किया गया है कि पार्टी ने पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को सुभासपा या निषाद पार्टी से गठजोड़ का प्रस्ताव लाने पर संगठनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती, इसलिए इसे सपा सूत्र/रणनीतिकार के दावे के रूप में ही प्रकाशित करना सुरक्षित होगा।

    फिलहाल सपा-कांग्रेस के बीच बातचीत का अंतिम नतीजा सामने नहीं आया है। सीटों की संख्या के साथ-साथ विधानसभा क्षेत्रवार दावों और संभावित उम्मीदवारों पर सहमति बनने के बाद ही गठबंधन का वास्तविक फॉर्मूला स्पष्ट होगा।

  • UPI चार्ज को लेकर राहुल गांधी का केंद्र पर हमला, प्रधानमंत्री मोदी से शुल्क वापस लेने की मांग

    UPI चार्ज को लेकर राहुल गांधी का केंद्र पर हमला, प्रधानमंत्री मोदी से शुल्क वापस लेने की मांग


    नई दिल्ली ।
    2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट UPI भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR की नई व्यवस्था को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए व्यवस्था को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने अपने बयान में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भी उल्लेख किया।

    राहुल गांधी ने बुधवार को सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया। इसमें उन्होंने UPI पर लागू होने वाली नई शुल्क व्यवस्था को लेकर सरकार की आलोचना की। उन्होंने इंदिरा गांधी के एक पुराने कथन का जिक्र करते हुए कहा कि उनका झुकाव न बाईं ओर था और न दाईं ओर, बल्कि उनकी सोच सीधी थी।

    इसके बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने अमेरिका के सामने झुकने का रास्ता अपनाया है। उन्होंने UPI पर शुल्क व्यवस्था को लेकर सरकार से अपना फैसला वापस लेने की अपील की। राहुल गांधी ने कहा कि सरकार को इस मामले में हिम्मत दिखाते हुए UPI शुल्क व्यवस्था को वापस लेना चाहिए।

    इस मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से भी सरकार पर सवाल उठाए गए हैं। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट UPI भुगतान पर लागू होने वाली MDR व्यवस्था को लेकर भुगतान कंपनियों के संभावित लाभ का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि PhonePe और Google Pay का डिजिटल भुगतान बाजार में बड़ा हिस्सा है और MDR से इनके राजस्व तथा मूल्यांकन पर असर पड़ सकता है।

    हालांकि, सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि MDR को टैक्स नहीं माना जा सकता। नई व्यवस्था के तहत UPI से व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी P2P भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतान पर भी MDR नहीं लगेगा। छोटे व्यापारियों के लिए भी शून्य MDR की व्यवस्था जारी रहेगी। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत मर्चेंट UPI लेनदेन नई व्यवस्था से प्रभावित नहीं होंगे।

    नई व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगी। 2,000 रुपये से अधिक के पात्र व्यक्ति-से-व्यापारी यानी P2M लेनदेन पर सामान्य MDR दर 0.4 प्रतिशत निर्धारित की गई है। कुछ विशेष क्षेत्रों में अलग शुल्क व्यवस्था रखी गई है। उच्च मूल्य वाले पात्र लेनदेन में MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेनदेन निर्धारित की गई है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि MDR का भुगतानकर्ता ढांचे में इस्तेमाल होने वाला शुल्क है और इसे सरकार द्वारा टैक्स के रूप में वसूल नहीं किया जाएगा। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच पैसे भेजने वाले UPI लेनदेन पर राशि की कोई सीमा लागू नहीं होगी और ऐसे भुगतान मुफ्त रहेंगे।

    छोटे व्यापारियों को भी नई व्यवस्था में राहत दी गई है। UPI QR के माध्यम से हर महीने एक लाख रुपये तक प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों के लेनदेन पर शून्य MDR का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त भुगतान लागत का असर सीमित रखना है।

    नई व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस ऐसे समय में सामने आई है, जब UPI देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। विपक्ष इसे लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि व्यवस्था का उद्देश्य UPI के संचालन और विस्तार को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है। इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं और नई MDR व्यवस्था के लागू होने के बाद इसके प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

  • ममता बनर्जी ने कांग्रेस से मांगी चुनावी मदद, नंदीग्राम छोड़ने की पेशकश के बावजूद दोनों सीटों पर गठबंधन से इनकार

    ममता बनर्जी ने कांग्रेस से मांगी चुनावी मदद, नंदीग्राम छोड़ने की पेशकश के बावजूद दोनों सीटों पर गठबंधन से इनकार

    नई दिल्ली । ममता बनर्जी के सामने पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा उपचुनावों को लेकर चुनौती बढ़ती दिखाई दे रही है। खबरों के अनुसार, उन्होंने नंदीग्राम और रेजीनगर सीट पर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की कोशिश की थी। इसके तहत नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने और रेजीनगर में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, टीएमसी या कांग्रेस की ओर से इस बातचीत को लेकर अब तक आधिकारिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार शाम ममता बनर्जी ने कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल से बातचीत की थी। बताया गया है कि बातचीत के दौरान उन्होंने उपचुनाव में साथ आने का प्रस्ताव रखा। ममता बनर्जी की ओर से नंदीग्राम में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने और रेजीनगर सीट पर टीएमसी उम्मीदवार के लिए कांग्रेस का समर्थन मांगे जाने की बात कही गई है। इसके साथ ही नंदीग्राम से टीएमसी उम्मीदवार का नाम वापस लेने की पेशकश किए जाने का भी दावा किया गया है।

    हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। सामने आई जानकारी के मुताबिक, पार्टी ने टीएमसी के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। कांग्रेस की ओर से कथित तौर पर कहा गया है कि यदि टीएमसी गठबंधन चाहती है तो उसे नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर कांग्रेस का समर्थन करना होगा। टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कथित अत्याचारों को भी इस फैसले की वजह बताया गया है।

    ममता बनर्जी की ओर से कांग्रेस से संपर्क किए जाने की खबर ऐसे समय आई है, जब दोनों दल उपचुनाव में अलग-अलग मैदान में उतर रहे हैं। कांग्रेस ने नंदीग्राम से मिलन प्रधान और रेजीनगर से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल कफी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, टीएमसी ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को टिकट दिया है।

    नंदीग्राम सीट ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में वह इसी सीट से चुनाव हार गई थीं। आगामी उपचुनाव को लेकर ऐसी अटकलें भी थीं कि ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से मैदान में उतर सकती हैं, लेकिन टीएमसी ने यहां संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं और उनके नाम को वर्ष 2014 के शिक्षक भर्ती घोटाले से जोड़कर चर्चा की जा रही है।

    इस बीच टीएमसी के भीतर बगावत का असर भी दोनों सीटों पर दिखाई दे रहा है। ऋताब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले बागी गुट ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। नंदीग्राम से मोहम्मद एतेशामुल हक और रेजीनगर से सफीउज्जमां शेख को उम्मीदवार बनाया गया है। यह गुट टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होगा, जबकि 9 अक्टूबर को मतगणना होगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के कारण उपचुनाव की स्थिति बनी है। इसी बीच टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी निर्वाचन आयोग में मामला चल रहा है। बताया जा रहा है कि आयोग 17 सितंबर से पहले इस पर फैसला ले सकता है।

    विधानसभा चुनाव में अविभाजित टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं। बाद में 60 से अधिक विधायकों के ऋताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चले जाने का दावा किया गया। ऐसे में उपचुनाव से पहले कांग्रेस से गठबंधन की कथित कोशिश और बागी गुट की सक्रियता ने ममता बनर्जी के सामने राजनीतिक चुनौती को और बढ़ा दिया है।

  • भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    नई दिल्ली ।कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के पूर्व विधायक और प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष एनएल नरेंद्र बाबू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्हें कांग्रेस की सदस्यता दिलाई गई। इस मौके पर कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने उन्हें कांग्रेस का गमछा पहनाकर पार्टी में स्वागत किया।

    नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। कार्यक्रम में मंत्री रामलिंगारेड्डी, एचएम रेवन्ना, पूर्व मंत्री रानी सतीश, रमेश बाबू, हनुमंतरायप्पा और पूर्व मेयर रमेश समेत कई नेताओं की मौजूदगी रही।

    नरेंद्र बाबू ने कांग्रेस में शामिल होने से कुछ दिन पहले ही भाजपा से अलग होने का अपना फैसला सार्वजनिक किया था। शुक्रवार को उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी के प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष पद से भी त्यागपत्र दे दिया था।

    भाजपा छोड़ने की घोषणा करते समय नरेंद्र बाबू ने पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा था कि उन्होंने करीब 10 साल तक भाजपा के लिए काम किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित जिम्मेदारी और सम्मान नहीं मिला।

    नरेंद्र बाबू कर्नाटक के तिगाला समुदाय के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। भाजपा से अलग होने के दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि वह अवसर देखकर पार्टी बदलने वाली राजनीति में विश्वास नहीं रखते। उनके मुताबिक, पार्टी के लिए लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्हें जिस तरह की जिम्मेदारी और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला।

    उन्होंने भाजपा नेतृत्व पर राजाजीनगर और महालक्ष्मी लेआउट में भी अनदेखी का आरोप लगाया था। नरेंद्र बाबू का कहना था कि उन्हें लंबे समय तक इंतजार कराया गया। साथ ही इन क्षेत्रों में उन्हें और उनके साथ काम करने वाले लोगों को नजरअंदाज किया गया।

    भाजपा से इस्तीफा देने के बाद नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई थी। अब भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्होंने औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में पार्टी में उनका स्वागत किया गया।

    नरेंद्र बाबू का भाजपा छोड़ना ऐसे समय हुआ है जब कर्नाटक की राजनीति में दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक गतिविधियां लगातार बनी हुई हैं। हालांकि, उनके पार्टी बदलने के पीछे उन्होंने मुख्य रूप से भाजपा में पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सम्मान और जिम्मेदारी नहीं मिलने की बात कही है।

    कांग्रेस में शामिल होने के दौरान मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी रही। इस कार्यक्रम के साथ नरेंद्र बाबू का भाजपा से कांग्रेस तक का राजनीतिक सफर औपचारिक रूप से बदल गया है। उन्होंने भाजपा में करीब एक दशक तक काम करने के बाद अब कांग्रेस का रुख किया है।

  • मायावती का सपा-कांग्रेस पर तीखा हमला, बोलीं- नीला रंग पहनने से नहीं बदलेगी जातिवादी सोच

    मायावती का सपा-कांग्रेस पर तीखा हमला, बोलीं- नीला रंग पहनने से नहीं बदलेगी जातिवादी सोच

    लखनऊ। बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि बीएसपी के नीले रंग को अपनाने और मंचों व कपड़ों में इसका इस्तेमाल करने से विपक्षी दलों की सोच नहीं बदल जाएगी। बहुजन समाज के हित की बात करने से पहले इन दलों को अपना दिल और दिमाग साफ करना चाहिए। मायावती ने सपा के पीडीए और कांग्रेस की राजनीति पर भी सवाल उठाए।

    मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि सपा, कांग्रेस और अन्य विरोधी दल बीएसपी के नीले रंग को अपनाकर उसे कपड़ों और मंचों पर इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इससे गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और अन्य उपेक्षित वर्गों के प्रति उनकी वर्षों पुरानी सोच नहीं बदल सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि इन दलों की सोच जातिवादी, संकीर्ण, सामंती और पूंजीवादी रही है।

    उन्होंने कहा कि केवल नीला रंग अपनाने से कोई दिल से अंबेडकरवादी नहीं बन सकता। बहुजन समाज के वास्तविक हित और कल्याण के लिए पहले इन दलों को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। मायावती ने आरोप लगाया कि ये दल इन वर्गों के मुद्दों पर “गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं” और कहते कुछ हैं, जबकि करते उसके विपरीत हैं।

    पीडीए को लेकर सपा पर निशाना
    मायावती ने सपा के पीडीए को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के मुद्दे पर सपा की सोच, चाल, चरित्र और चेहरा अलग-अलग रहा है। उन्होंने दावा किया कि बहुजन समाज के हितों की वास्तविक लड़ाई केवल बीएसपी ही लड़ती रही है।

    उन्होंने बीएसपी से निष्कासित नेताओं को लेकर भी विरोधी दलों पर हमला बोला। मायावती ने कहा कि अनुशासनहीनता समेत विभिन्न कारणों से पार्टी से निकाले गए कई लोग बाद में दूसरी पार्टियों में चले गए और कुछ ने छोटे संगठन या राजनीतिक दल भी बना लिए। उनके मुताबिक, ऐसे लोग व्यक्तिगत स्वार्थ और अवसरवाद की राजनीति करते हैं और बहुजन समाज के सामूहिक हित के लिए काम नहीं कर सकते।

    कांग्रेस को बताया ‘डूबता जहाज’
    मायावती ने कांग्रेस पर भी तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जिन लोगों को बीएसपी से निकाले जाने के बाद अपने साथ लेने की बात कर रही है, वह खुद “डूबते जहाज” जैसी स्थिति में है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी पार्टी में शामिल होकर कोई अपना राजनीतिक भविष्य अंधकार में क्यों डालेगा।

    मायावती ने अपने बयान में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवनकाल में बहुजन समाज के लोगों को कांग्रेस से सावधान रहने की चेतावनी दी थी।

    अशोक सिद्धार्थ के इस्तीफे पर भी बोला हमला
    मायावती ने बीएसपी से जुड़े रहे और आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि पार्टी की ओर से राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दिए जाने के बाद अशोक सिद्धार्थ ने तत्काल घोषणा नहीं की। मायावती के मुताबिक, उन्होंने पूरी रात इसे रोकने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए और अगले दिन सुबह करीब 6:30 बजे मजबूरी में अपने राजनीतिक संन्यास की घोषणा की।

    मायावती ने कहा कि सही समय आने पर पार्टी के लोगों को इस मामले में और भी जानकारी दी जाएगी। उन्होंने बीएसपी कार्यकर्ताओं से मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को समझने और पार्टी व आंदोलन के हित में सतर्क रहने की अपील की।

  • कांग्रेस ने मधु गौड़ याश्की को दी बड़ी जिम्मेदारी, ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कांग्रेस का चेयरपर्सन नियुक्त किया

    कांग्रेस ने मधु गौड़ याश्की को दी बड़ी जिम्मेदारी, ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कांग्रेस का चेयरपर्सन नियुक्त किया

    हैदराबाद: ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) ने मधु गौड़ याश्की को ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कांग्रेस का चेयरपर्सन नियुक्त किया है। AICC के महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने बुधवार को एक प्रेस बयान में कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने याश्की को ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कांग्रेस का चेयरपर्सन नियुक्त किया है।

    बयान में कहा गया है कि पार्टी निवर्तमान चेयरपर्सन प्रवीण चक्रवर्ती के योगदान की सराहना करती है। तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी के एक प्रमुख नेता, मधु गौड़ याश्की के पास दशकों का अनुभव है और वे पार्टी आलाकमान के साथ करीबी तालमेल के लिए जाने जाते हैं। उच्च शिक्षित मधु गौड़ याश्की पिछड़े वर्गों के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और अपने सभ्य और सौम्य व्यवहार के लिए भी जाने जाते हैं। अलग तेलंगाना राज्य के प्रबल समर्थक, वे पहली बार 2004 में निज़ामाबाद से लोकसभा के लिए चुने गए थे, जिसमें उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी के सैयद यूसुफ अली को 1.37 लाख से अधिक वोटों से हराया था। उन्होंने 2009 में तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के बिगाला गणेश गुप्ता को 60,000 से अधिक वोटों से हराकर अपनी लोकसभा सीट बरकरार रखी।

    याश्की ने कांग्रेस संसदीय दल के डिप्टी चीफ व्हिप के रूप में भी काम किया। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनावों में, वे पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता से हार गए, जिन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। याश्की ने 2019 में फिर से चुनाव लड़ा लेकिन काफी पीछे रहते हुए तीसरे स्थान पर रहे। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के धर्मपुरी अरविंद ने यह सीट जीती और TRS की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी के. कविता को हराया।

    2023 में, याश्की को तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (TPCC) की अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने 2023 के चुनावों में तेलंगाना विधानसभा के लिए असफल चुनाव लड़ा। पार्टी ने याश्की को हैदराबाद के निर्वाचन क्षेत्रों में से एक, LB नगर से मैदान में उतारा था। हालांकि, वे भारत राष्ट्र समिति (BRS) और BJP उम्मीदवारों के बाद तीसरे स्थान पर रहे। तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (TPCC) के तत्कालीन अध्यक्ष ए. रेवंत रेड्डी के मुख्यमंत्री बनने के बाद, उन्हें 2024 में राज्य कांग्रेस प्रमुख के पद के लिए प्रमुख दावेदारों में से एक माना जा रहा था। हालांकि, पार्टी ने महेश कुमार गौड़ को TPCC प्रमुख चुना।

  • वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद

    वंदे मातरम पर कांग्रेस-एनसी आमने-सामने, अब्दुल्ला परिवार के पूरे गीत के सम्मान में खड़े होने पर बढ़ा विवाद


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में वंदे मातरम के पूरे संस्करण के गायन को लेकर कांग्रेस और उसकी गठबंधन सहयोगी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला सम्मान में खड़े रहे। इसके बाद कांग्रेस ने पूरे गीत के गायन पर आपत्ति जताते हुए एनसी से अपने रुख का समर्थन करने की अपील की। एनसी ने जवाब में कहा कि गठबंधन में होने का मतलब यह नहीं है कि कोई सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें थोपे।

    कांग्रेस महासचिव एवं संगठन प्रभारी केसी वेणुगोपाल ने वंदे मातरम के पूरे संस्करण को लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में 1937 में तय किए गए स्वरूप के अनुरूप गीत के शुरुआती दो अंतरे ही गाएगी। कांग्रेस का कहना है कि यह निर्णय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी एवं समन्वयवादी भावना को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    श्रीनगर के फिल्म महोत्सव से शुरू हुआ विवाद

    विवाद की शुरुआत श्रीनगर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के कार्यक्रम से हुई। कार्यक्रम में वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया। मंच पर मौजूद उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इस दौरान सम्मान में खड़े रहे। कार्यक्रम का वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस की ओर से इस पर प्रतिक्रिया दी गई।

    वेणुगोपाल ने कहा कि कांग्रेस ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि गठबंधन के सहयोगी दलों को भी कांग्रेस के इस फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सरोजिनी नायडू सहित स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के विचारों का भी उल्लेख किया।

    एनसी ने कहा- सहयोगी अपनी शर्तें नहीं थोप सकता

    कांग्रेस की अपील पर नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी नेता बशीर अहमद ने कहा कि गठबंधन में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि एक सहयोगी दल दूसरे दल को यह बताए कि कोई गीत कितने हिस्से में गाया जाए। उन्होंने कहा कि केसी वेणुगोपाल को सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन वह अपनी राय किसी दूसरे दल पर थोप नहीं सकते।

    एनसी नेता ने कहा कि उनकी पार्टी भी लोगों पर किसी तरह की शर्त थोपने के खिलाफ है। इस बयान के बाद कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच मतभेद सार्वजनिक हो गए हैं।

    कांग्रेस ने आरएसएस पर भी साधा निशाना

    एनसी की प्रतिक्रिया के बाद कांग्रेस नेता कपिल सिंह ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें कांग्रेस के फैसले का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें नागपुर यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दबाव में नहीं आना चाहिए।

    भाजपा ने कांग्रेस को घेरा

    विवाद में भाजपा भी कूद पड़ी। भाजपा सांसद एवं प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पूरे वंदे मातरम के गायन को लेकर उसकी आपत्ति से उसकी राजनीतिक सोच स्पष्ट होती है। उन्होंने कांग्रेस को 21वीं सदी की नई मुस्लिम लीग तक करार दिया और आरोप लगाया कि पार्टी अलगाववादी तथा कट्टरपंथी ताकतों के सामने झुक रही है।

    भाजपा नेता आरएस पठानिया ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि घाटी में अलगाववादी ताकतों ने भी राष्ट्रगीत को लेकर ऐसी आपत्ति नहीं जताई थी।

    1937 के फैसले का हवाला दे रही कांग्रेस

    कांग्रेस ने पिछले महीने अपनी कार्यसमिति की बैठक में 1937 के प्रस्ताव के अनुरूप पार्टी के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल दो अंतरे गाने का निर्णय लिया था। पार्टी का कहना है कि यह फैसला स्वतंत्रता आंदोलन के समय बनी व्यापक सहमति और देश की बहुलतावादी सोच को ध्यान में रखकर लिया गया है।

    वहीं भाजपा लंबे समय से कांग्रेस पर वंदे मातरम का पूरा सम्मान नहीं करने का आरोप लगाती रही है।

    गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

    वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच वैचारिक मतभेद का मुद्दा बन गया है। दोनों दल इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रगीत को लेकर उनके रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। कांग्रेस अपने ऐतिहासिक और राजनीतिक निर्णय पर कायम है, जबकि एनसी का कहना है कि कोई भी सहयोगी दल दूसरे पर अपनी शर्तें नहीं थोप सकता।

    ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या इसका असर कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच गठबंधन की राजनीति पर भी पड़ता है।

  • शहजाद पूनावाला BJP छोड़ कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच पवन खेड़ा संग वायरल तस्वीर पर खुद दी सफाई, बताया क्या है पूरा मामला

    शहजाद पूनावाला BJP छोड़ कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच पवन खेड़ा संग वायरल तस्वीर पर खुद दी सफाई, बताया क्या है पूरा मामला

    नई दिल्ली । शहजाद पूनावाला फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर हैं, लेकिन कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के साथ सामने आई उनकी तस्वीरों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर यह अटकलें लगने लगीं कि क्या पूनावाला भारतीय जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस में वापसी करने वाले हैं। हालांकि, पूनावाला ने खुद इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए कांग्रेस में शामिल होने की खबरों को खारिज कर दिया है।

    वायरल तस्वीर में शहजाद पूनावाला और पवन खेड़ा साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं और दोनों एक-दूसरे से हाथ मिला रहे हैं। तस्वीर सामने आने के बाद इसे लेकर तरह-तरह के दावे किए जाने लगे। इन चर्चाओं के बीच पूनावाला ने सोशल मीडिया पर तस्वीर के पीछे की पूरी कहानी बताई और कहा कि इसे गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है।

    पूनावाला के मुताबिक, वह एक कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, जो पायल मेहता के पिता की याद में आयोजित किया गया था। उनके अनुसार, कार्यक्रम में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े कई नेता भी मौजूद थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात कई नेताओं से हुई और पवन खेड़ा भी वहां पहुंचे।

    उन्होंने बताया कि वह अपने करीबी मित्र और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से बातचीत कर रहे थे। बातचीत के दौरान पत्रकार रिजिजू से उनकी स्विमिंग से जुड़ी तस्वीरों को लेकर सवाल कर रहे थे। इसी बीच पवन खेड़ा का जिक्र हुआ और संयोग से खेड़ा वहां से गुजरते हुए सामने आ गए। पूनावाला ने उन्हें बातचीत में शामिल किया और राज्यसभा के लिए चुने जाने पर बधाई दी। इसी दौरान दोनों की तस्वीर सामने आई।

    पूनावाला ने कांग्रेस में शामिल होने की अटकलों को स्पष्ट रूप से खारिज किया। उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस में शामिल नहीं हो रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी से उन्हें कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस कार्यक्रम में वह मौजूद थे, वह एक शोकसभा थी और ऐसी जगह पर राजनीतिक दल बदलने जैसी बातचीत करना उचित नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि पूनावाला पहले कांग्रेस से जुड़े रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2017 में कांग्रेस से दूरी बनाई थी और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए थे। बीजेपी में रहते हुए वह पार्टी के प्रमुख प्रवक्ताओं में शामिल रहे और कांग्रेस तथा उसके नेतृत्व पर लगातार मुखर होकर हमला करते रहे।

    कांग्रेस में वापसी के सवाल पर पूनावाला पहले भी अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। अगस्त में एक बातचीत के दौरान उनसे कांग्रेस में शामिल होने को लेकर सवाल पूछा गया था। इसके जवाब में उन्होंने शर्त रखते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि यदि राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा को हटा दिया जाए तथा नेहरू के कार्यों के लिए माफी मांगी जाए, तभी वह कांग्रेस में शामिल होंगे।

    ऐसे में पवन खेड़ा के साथ उनकी तस्वीर सामने आने के बाद शुरू हुई राजनीतिक अटकलों को पूनावाला की सफाई ने फिलहाल विराम दे दिया है। तस्वीर को लेकर उठे सवालों के जवाब में उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों नेताओं की मुलाकात एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई थी और इसे राजनीतिक दल बदलने से जोड़ना सही नहीं है। फिलहाल उनके बयान से यह साफ है कि वायरल तस्वीर के आधार पर कांग्रेस में उनकी वापसी की चर्चा को उन्होंने सिरे से खारिज किया है।