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  • गांधीनगर निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस ने 44 प्रत्याशियों को सुरक्षित स्थान पर भेजा, बीजेपी ने उठाए सवाल

    गांधीनगर निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस ने 44 प्रत्याशियों को सुरक्षित स्थान पर भेजा, बीजेपी ने उठाए सवाल


    नई दिल्ली। गांधीनगर नगर निगम चुनाव में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद कांग्रेस ने अपने सभी 44 प्रत्याशियों को एक अज्ञात सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है। पार्टी ने यह कदम संभावित पोचिंग और राजनीतिक दबाव से प्रत्याशियों को बचाने के लिए उठाया है। कांग्रेस के अनुसार, सभी उम्मीदवार 29 सितंबर तक पार्टी की निगरानी में रहेंगे, क्योंकि इसी दिन नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख है। गुजरात की राजधानी में निकाय चुनाव का प्रचार तेज होने के बीच कांग्रेस के इस कदम से चुनावी गतिविधियों में नया राजनीतिक विवाद सामने आया है।

    कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से उसके प्रत्याशियों और उनके परिजनों को फोन कर नामांकन वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि प्रत्याशियों को डराने-धमकाने और उन पर अनुचित दबाव डालने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के मुताबिक, संभावित राजनीतिक दबाव और प्रत्याशियों को अपने पक्ष में करने की कोशिशों से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखना जरूरी समझा गया। इसी वजह से नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी 44 प्रत्याशियों को गुप्त स्थान पर भेजा गया है।

    दूसरी ओर, बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। बीजेपी ने कांग्रेस के इस कदम पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर पार्टी को अपने ही प्रत्याशियों पर भरोसा है, तो उन्हें इस तरह सुरक्षित स्थान पर रखने की जरूरत क्यों पड़ी। बीजेपी ने कांग्रेस के दावों को स्वीकार नहीं किया और प्रत्याशियों को छिपाकर रखने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। इस बीच बीजेपी के सभी 44 प्रत्याशियों ने अपनी चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाते हुए जनसेवा का संकल्प लिया। विधानसभा परिसर के पास डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा के सामने आयोजित कार्यक्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और हर्ष संघवी भी मौजूद रहे। बीजेपी प्रत्याशियों ने शहर के समग्र विकास और जनहित में काम करने का वादा किया।

    गांधीनगर नगर निगम चुनाव में कुल 11 वार्डों की 44 सीटों पर मुकाबला होना है। बीजेपी और कांग्रेस की ओर से दाखिल किए गए सभी नामांकन वैध पाए गए हैं, जबकि आम आदमी पार्टी का एक पर्चा रद्द हुआ है। 29 सितंबर को नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी। इसके बाद 11 अक्टूबर को मतदान कराया जाएगा और 13 अक्टूबर को मतगणना होगी।

  • ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए उपचुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मालदा के महीष बाथानी क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 100 से अधिक नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें 13 पंचायत सदस्य, एक पंचायत समिति सदस्य, पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष, ब्लॉक उपाध्यक्ष और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल बताए गए हैं।

    यह दल-बदल ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। महीष बाथानी क्षेत्र में रविवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में तृणमूल समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थामा। इस दौरान कांग्रेस के जिला और प्रदेश स्तर के नेता तथा एक पूर्व विधायक भी मौजूद रहे।

    महीष बाथानी क्षेत्र को पहले कांग्रेस का मजबूत इलाका माना जाता था। हालांकि, ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव के बढ़ने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव मजबूत हुआ। अब बड़ी संख्या में तृणमूल नेताओं और कार्यकर्ताओं के कांग्रेस में जाने से क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले शराफत अली ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा के खिलाफ लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ आना जरूरी है। उन्होंने क्षेत्रीय दल के तौर पर तृणमूल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने की बात कही।

    पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर उपचुनाव होना है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के बाद खाली हुई है। दूसरी ओर रेजीनगर सीट आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर के नौदा सीट बरकरार रखने के कारण खाली हुई। रेजीनगर से उनके बेटे चुनाव मैदान में हैं।

    ममता बनर्जी के गुट ने रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, नंदीग्राम को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं। ममता बनर्जी के गुट की ओर से यह सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई थी, जबकि रेजीनगर में समर्थन मांगे जाने का भी जिक्र हुआ। कांग्रेस ने दोनों सीटों पर समर्थन देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।

    नंदीग्राम सीट पर ममता गुट के उम्मीदवार के तौर पर नामित संचिता प्रधान डे ने नाम वापस ले लिया है। इसके चलते इस सीट पर ममता गुट के पास फिलहाल कोई उम्मीदवार नहीं है।

    इसी बीच तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी मामला चल रहा है। चुनाव आयोग ने तृणमूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को फ्रीज किया हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेने के लिए समयसीमा तय की है।

    अदालत ने संबंधित पक्षों को हलफनामे और अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने के भीतर नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर फैसला लेने को कहा गया है। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से समय लगने की दलील दी गई, जिस पर अदालत ने निर्धारित अवधि में फैसला लेने को कहा। अदालत ने इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद लेने का सुझाव भी दिया है।

  • चुनाव आयोग विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल

    चुनाव आयोग विवाद पर भाजपा का पलटवार, संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी ने आयोग का बचाव किया है। भाजपा सांसद संबित पात्रा ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग विषयों पर होने वाली चर्चा और असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

    विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों के बीच पिछले करीब 10 महीनों में 14 मौकों पर आधिकारिक आपत्तियों और पत्राचार की बात सामने आई है। इन मामलों में SIR, नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-6, मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में नाम हटाने से संबंधित विषय शामिल बताए गए हैं। आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

    संबित पात्रा ने कहा कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच संवाद और अलग-अलग विचार सामने आना अपने आप में किसी संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है। उनके मुताबिक, किसी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले चर्चा, विचार-विमर्श और असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक प्रक्रिया है। भाजपा ने विपक्ष के उस तर्क को भी खारिज किया जिसमें आयोग के भीतर मतभेदों को उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल के तौर पर पेश किया जा रहा है।

    भाजपा नेता ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावी राजनीति में अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद विपक्षी दल लगातार संवैधानिक संस्थाओं को विवाद में खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव हारने के बाद संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाना कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक शैली रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप मतदाताओं के जनादेश पर भी सवाल खड़ा करते हैं।

    विवाद के बीच पश्चिम बंगाल की विधानसभा सीटों के आंकड़ों का भी भाजपा ने उल्लेख किया। संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष भाजपा पर मतदाता सूची में नाम हटाकर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगाता है, लेकिन जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे अधिक मतदाता नाम हटाए जाने की बात सामने आई, उनमें 13 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा छह सीटों पर विजयी रही। इन 20 सीटों में एक सीट कांग्रेस के खाते में भी गई।

    भाजपा ने इन आंकड़ों के जरिए विपक्ष के उन आरोपों पर सवाल उठाया जिनमें मतदाता सूची में बदलाव को सीधे भाजपा के चुनावी लाभ से जोड़ने की बात कही जा रही है। पार्टी का तर्क है कि यदि मतदाता नाम हटाए जाने की प्रक्रिया से भाजपा को सीधा लाभ हुआ होता, तो सबसे अधिक नाम हटने वाली सभी सीटों पर चुनावी परिणाम एक ही दिशा में नहीं होते।

    दूसरी ओर, विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता, मतदाता सूची में बदलाव और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आयोग के भीतर आयुक्तों के बीच हुई आपत्तियों और संवाद को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज है। आयोग की ओर से अपने फैसलों को सामूहिक मंजूरी से लिया गया बताया गया है।

    फिलहाल SIR, मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव आयोग के भीतर हुई चर्चाओं को लेकर राजनीतिक टकराव जारी है। भाजपा इन घटनाओं को संस्थागत संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष इन्हीं घटनाक्रमों के आधार पर आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।

  • मंत्री विश्वास सारंग का राहुल गांधी पर हमला, सोनिया गांधी के वोट को लेकर उठाए सवाल

    मंत्री विश्वास सारंग का राहुल गांधी पर हमला, सोनिया गांधी के वोट को लेकर उठाए सवाल


    मध्य प्रदेश:
    सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कांग्रेस के शासनकाल में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने सोनिया गांधी से जुड़े मतदाता सूची के मामले का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए।

    सारंग ने कहा कि कांग्रेस के समय लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का किस तरह मजाक बनाया जाता था, इसका उदाहरण सोनिया गांधी से जुड़ा मामला है। उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि उस दौर में लोकतंत्र की व्यवस्था को लेकर कई ऐसे सवाल सामने आए, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए।

    मंत्री ने सोनिया गांधी के मतदाता सूची में नाम और उनके मतदान को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में मतदान के अधिकार से संबंधित स्पष्ट प्रावधान हैं और केवल पात्र नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर उन्होंने पूछा कि सोनिया गांधी किस हैसियत से वोट दे रही थीं।

    विश्वास सारंग ने राहुल गांधी के संविधान के पालन से जुड़े बयानों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी बार-बार संविधान की बात करते हैं, लेकिन मतदान के अधिकार से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

    उन्होंने कांग्रेस पर देश में लंबे समय से कथित वोट चोरी करने का आरोप लगाया। सारंग ने कहा कि यदि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज है, जो भारत का नागरिक नहीं है और उसने मतदान भी किया है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।

    मंत्री ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची और मतदान व्यवस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता तथा नियमों का पालन जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए।

    सारंग ने अपने बयान में कांग्रेस के पुराने राजनीतिक इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सत्ता में आने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह से उनके अनुसार पीछे के दरवाजे से सत्ता हासिल की गई थी, उसी राजनीतिक सोच के प्रभाव आज भी कांग्रेस में दिखाई देते हैं।

    उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा संविधान और लोकतंत्र को लेकर उठाए जा रहे मुद्दों पर भी सवाल खड़े किए। सारंग का कहना था कि कांग्रेस को पहले अपने शासनकाल और उससे जुड़े विवादों पर जवाब देना चाहिए, उसके बाद लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाने चाहिए।

    मंत्री ने कहा कि देश की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची का विशेष महत्व है। किसी योग्य नागरिक का नाम छूटना या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल होना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है। इसलिए ऐसे मामलों की जांच और तथ्यों की स्पष्टता जरूरी है।

    सोनिया गांधी के मतदाता सूची से जुड़े मामले का उल्लेख करते हुए सारंग ने कांग्रेस पर राजनीतिक हमला तेज किया। उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस के लोकतंत्र तथा संविधान से जुड़े दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी को अपने अतीत और वर्तमान में उठ रहे सवालों का भी सामना करना चाहिए।

    विश्वास सारंग के बयान के बाद मतदाता सूची, मतदान के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दे एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। उनके आरोपों के केंद्र में कांग्रेस का शासनकाल, सोनिया गांधी से जुड़ा मतदाता सूची का मुद्दा और राहुल गांधी के संविधान संबंधी बयान रहे।

  • ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    नई दिल्ली ।मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर कथित मतभेद सामने आने के बाद कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों को पर्याप्त जानकारी दिए बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।

    सिंघवी ने आरोप लगाया कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर देश को भ्रमित करने का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने दिल्ली और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग भी उठाई।

    कांग्रेस नेता ने Form 6 में किए गए बदलाव का मुद्दा भी उठाया। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामने आई जानकारी के अनुसार, इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

    इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों पर अपनी चिंताएं सामने रखीं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मामलों को लेकर 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील और चुनावी डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल थे।

    मतदाता सूची से संबंधित डिजिटल व्यवस्था और अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में यह चिंता सामने आई कि मतदाता डेटा और उससे जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विकेंद्रीकृत है।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों ने भी विवाद को और बढ़ाया है। वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने से संबंधित मामलों में अपील की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे मामलों की संख्या 38 लाख से अधिक बताई गई है।

    सिंघवी ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। उनके मुताबिक, महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका और सहमति का महत्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

    दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से एक व्यक्ति के नियंत्रण में संस्था के काम करने के आरोपों को खारिज किया गया है। आयोग के पक्ष के अनुसार, महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं और SIR से संबंधित निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार किए गए हैं।

    इस पूरे विवाद का केंद्र मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था बनी हुई है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि आयोग की ओर से निर्णय प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया गया है।

  • राजस्थान निकाय चुनावों में कांग्रेस की करारी हार…. 7 में से एक पर निर्दलीय और 6 पर BJP का कब्जा

    राजस्थान निकाय चुनावों में कांग्रेस की करारी हार…. 7 में से एक पर निर्दलीय और 6 पर BJP का कब्जा


    जयपुर।
    राजस्थान (Rajasthan) में हाल ही में हुए चुनावों (Elections) में बीजेपी (BJP) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 7 में से 6 निकायों में अपना कब्जा जमा लिया है. वहीं, एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार (Independent candidate) ने बाजी मारी है. इस तरह इन चुनावों में कांग्रेस (Congress) को करारी हार का सामना करना पड़ा है।

    निकायों से सामने आए चुनावी नतीजों के मुताबिक, उदयपुर में बीजेपी के दिनेश भट्ट को डिप्टी मेयर चुना गया है. इसके अलावा अजमेर में बीजेपी के हेमंत सांखला, अलवर में बीजेपी के अजय पुनिया और बीकानेर में बीजेपी के पंकज गहलोत को जीत मिली है।

    भीलवाड़ा में बीजेपी के राधेश्याम सोमानी, भरतपुर में बीजेपी की अंबिका सैनी और पाली में निर्दलीय प्रत्याशी महबूब टी को डिप्टी मेयर और उपाध्यक्ष पद की कुर्सी मिली है।

    अजमेर और पाली में मुकाबला इतना कड़ा था कि हार-जीत का फैसला पर्ची यानी लॉटरी सिस्टम से करना पड़ा. अजमेर में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही उम्मीदवारों को बराबर यानी 40-40 वोट मिले थे. वहीं इसके उलट, भीलवाड़ा में बीजेपी के राधेश्याम सोमानी ने निर्विरोध जीत हासिल की।


    बीकानेर में कांग्रेस के बहुमत को लगा झटका

    चुनावों के बीच सबसे बड़ा उलटफेर बीकानेर नगर निगम में देखने को मिला. यहां कांग्रेस पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत था, इसके बावजूद उसे हार का सामना करना पड़ा. कांग्रेस पार्षदों की ओर से की गई क्रॉस वोटिंग के कारण बीजेपी के पंकज गहलोत डिप्टी मेयर बने. खास बात ये है कि इसके ठीक एक दिन पहले ही चुनाव में कांग्रेस ने बीकानेर में अपना मेयर बनाया था, लेकिन उपमहापौर चुनाव में बाजी पलट गई।

    इसके अलावा, बारां नगर परिषद के उपसभापति चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) को बड़ी जीत मिली. बारां में ‘आप’ के तेजस सुमन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 50 वोटों में से 31 वोट हासिल किए और कांग्रेस उम्मीदवार नवीन को 19 वोटों से हरा दिया. जोधपुर की मथानिया नगर पालिका में उपाध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस के जितेंद्र देवड़ा ने 18 वोट पाकर जीत दर्ज की। इस दौरान कांग्रेस नेत्री दिव्या मदेरणा भी खासी चर्चा में रहीं, जो सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सिर पर हेलमेट पहनकर मतदान केंद्र पहुंची थीं।


    जीत की खुशी में दंडवत होकर मंदिर पहुंचे महेंद्र समरिया

    राजस्थान के इन चुनावों में हंगामे और रोमांच की कोई कमी नहीं थी. कोटा की रामगंज मंडी नगर पालिका में उपाध्यक्ष पद पर बीजेपी के महेंद्र समरिया निर्विरोध चुने गए, जिसके बाद वो अपनी जीत की खुशी में दंडवत करते हुए करीब 500 मीटर दूर गोवर्धन नाथ मंदिर पहुंच गए।

    वहीं, सवाई माधोपुर नगर परिषद में उपसभापति पद के नामांकन के दौरान बीजेपी चुनाव प्रभारी मदन प्रजापत और पुलिस के बीच तीखी नोकझोक और धक्का-मुक्की देखने को मिली. सीकर में एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई, जहां पूर्व सभापति और कांग्रेस पार्षद ने बीजेपी प्रत्याशी रेखा विचारणीय के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।

    बीकानेर में वोटिंग के दौरान विधायक जेठालाल विकास की गाड़ी रोके जाने पर हल्का विवाद हुआ, जिसे बाद में महापौर प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह ने बीच-बचाव कर शांत कराया. उदयपुर की फतेह नगर पालिका में बीजेपी के बागी पार्षद राजेश चपलोद को अध्यक्ष चुनाव के दौरान एससी-एसटी एक्ट के मामले में पुलिस कस्टडी में वोट डालने लाया गया।


    बीजेपी का जलवा

    भरतपुर संभाग के 32 निकायों में से 22 स्थानों पर बीजेपी समर्थित उम्मीदवार निर्वाचित हुए, जबकि कांग्रेस को 7 और निर्दलीयों को 3 सीटों पर संतोष करना पड़ा. भरतपुर नगर निगम में महापौर अनुराधा सिंह की जीत के बाद उपमहापौर पद पर अंबिका सैनी ने जीत दर्ज की. डीग जिले के सभी छह निकायों में पूरी तरह बीजेपी का दबदबा देखने को मिला, जहां डीग नगर परिषद में तो बीजेपी प्रत्याशी को शून्य वोट मिलने की भी चर्चा रही।

    दूसरी ओर, करौली जिले के 6 निकायों में समीकरण थोड़े अलग रहे, जहां बीजेपी को 1, कांग्रेस को 2 और निर्दलीयों को 3 पदों पर सफलता मिली. धौलपुर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी का रहा, जबकि सवाई माधोपुर के 6 निकायों में उपाध्यक्ष पद पर बीजेपी ने 4 और कांग्रेस ने 2 सीटों पर जीत दर्ज की।

  • भाजपा में जाने की तैयारी कर चुके थे राहुल बोंडरे, फिर राहुल गांधी के एक फोन से बदल गया पूरा राजनीतिक घटनाक्रम

    भाजपा में जाने की तैयारी कर चुके थे राहुल बोंडरे, फिर राहुल गांधी के एक फोन से बदल गया पूरा राजनीतिक घटनाक्रम

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में कांग्रेस के पूर्व विधायक राहुल बोंडरे के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की चर्चाओं के बीच राजनीतिक घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया। बोंडरे के भाजपा में जाने की तैयारी की खबरों के बाद कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने उनसे फोन पर बातचीत की। इसके बाद बोंडरे के अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की बात सामने आई है।

    राहुल बोंडरे बुलढाना जिले के चिखली विधानसभा क्षेत्र से पूर्व विधायक रह चुके हैं। पिछले कुछ समय से उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें चल रही थीं। बताया गया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण के दौरान भाजपा में जाने का फैसला सार्वजनिक भी किया था।

    इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल और पार्टी के अन्य नेताओं का धन्यवाद भी किया था। बोंडरे इससे पहले भी दो बार भाजपा में जाने के संकेत दे चुके थे। इसलिए उनके संभावित दल-बदल को महाराष्ट्र कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा था।

    इसी बीच राहुल गांधी का बोंडरे से फोन पर संपर्क हुआ। बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने उनकी पार्टी के लिए भूमिका और योगदान की सराहना की तथा उनसे कांग्रेस में बने रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि पार्टी को बोंडरे की जरूरत है और उन्हें अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।

    बातचीत के बाद बोंडरे ने राहुल गांधी के फोन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने उनकी सुध ली। उन्होंने यह भी कहा कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, वह कांग्रेस के लिए काम करते रहेंगे। इस घटनाक्रम के बाद उनके भाजपा में शामिल होने की योजना फिलहाल बदलती हुई दिखाई दी।

    राहुल गांधी और राहुल बोंडरे के बीच बातचीत का एक वीडियो भी सामने आया है। हालांकि, इस वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। वीडियो में दोनों नेताओं के बीच बातचीत होती दिखाई देती है और बोंडरे कांग्रेस में बने रहने की बात कहते नजर आते हैं।

    बोंडरे के भाजपा में शामिल होने की संभावित तारीख को लेकर भी चर्चा सामने आई थी। चिखली से भाजपा विधायक श्वेता महाले ने उनके भाजपा में शामिल होने की बात कही थी। यह भी बताया गया था कि 22 सितंबर को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की मौजूदगी में उन्हें पार्टी में शामिल कराया जा सकता है। हालांकि, बाद के घटनाक्रम में बोंडरे के रुख में बदलाव की बात सामने आई।

    बोंडरे ने 2024 का विधानसभा चुनाव चिखली सीट से लड़ा था। इस चुनाव में उनका मुकाबला श्वेता महाले से हुआ था। वह करीब 3,702 मतों के अंतर से चुनाव हार गए थे। इसके बाद भी दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मुकाबला क्षेत्र में चर्चा का विषय रहा है।

    महाराष्ट्र में हाल के दिनों में नेताओं के संभावित दल-बदल को लेकर लगातार राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं। सितंबर की शुरुआत में शिवसेना के कुछ विधायकों के दूसरे गुट के संपर्क में होने के दावे भी सामने आए थे।

    शिवसेना विधायक मुर्जी पटेल ने दावा किया था कि उद्धव ठाकरे गुट के 14 विधायक एकनाथ शिंदे गुट के संपर्क में हैं और आने वाले दिनों में उनके शामिल होने की संभावना है। उन्होंने इसे संभावित ‘ऑपरेशन टाइगर’ से जोड़कर भी बताया था।

    हालांकि, इन दावों पर संबंधित विधायकों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी और उनके नाम भी सार्वजनिक नहीं किए गए थे। इससे पहले उद्धव ठाकरे गुट के पांच सांसदों के दूसरे गुट में शामिल होने की बात सामने आ चुकी थी। ऐसे राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच राहुल बोंडरे का मामला महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का नया विषय बन गया है।

  • हामिद अंसारी के नेहरू वाले बयान पर BJP का कांग्रेस पर हमला, सुधांशु त्रिवेदी ने लगाए वैचारिक बदलाव के आरोप

    हामिद अंसारी के नेहरू वाले बयान पर BJP का कांग्रेस पर हमला, सुधांशु त्रिवेदी ने लगाए वैचारिक बदलाव के आरोप

    नई दिल्ली । पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के जवाहरलाल नेहरू से जुड़े एक पुराने कथन के संदर्भ के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने 21 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस में अंसारी के बयान को कांग्रेस की मौजूदा वैचारिक दिशा से जोड़ते हुए कई सवाल उठाए।

    विवाद की शुरुआत अंसारी के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने संविधान विशेषज्ञ और लेखक ए.जी. नूरानी की 2019 में प्रकाशित पुस्तक ‘द आरएसएस: ए मेनेस टू इंडिया’ का हवाला दिया। अंसारी ने पुस्तक में दर्ज एक संदर्भ के आधार पर नेहरू के विचारों का उल्लेख किया था। यह संदर्भ तत्कालीन विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया द्वारा दर्ज किए गए एक आधिकारिक रिकॉर्ड से जुड़ा बताया गया है।

    अंसारी के अनुसार, उस रिकॉर्ड में नेहरू के हवाले से कहा गया था कि भारत के लिए बड़ा खतरा कम्युनिज्म नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता है। अंसारी ने यह बात नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़े व्यापक संदर्भ में रखी थी।

    अंसारी के बयान के बाद भाजपा की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि अंसारी ने जिस पुस्तक और नेहरू के कथन का हवाला दिया, उससे कांग्रेस की मौजूदा विचारधारा पर सवाल उठते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आज की कांग्रेस अति-वामपंथ की दिशा में आगे बढ़ गई है।

    त्रिवेदी ने अपने बयान में कांग्रेस को ‘मुस्लिम लीग माओइस्ट कांग्रेस’ कहा। उन्होंने यह भी कहा कि अंसारी के संदर्भ से यह बात सामने आती है कि नेहरू के दौर में कम्युनिज्म को भी एक खतरे के रूप में देखा जाता था। इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक दिशा को लेकर सवाल खड़े किए।

    भाजपा नेता ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के राजनीतिक विमर्श को भी इस बहस से जोड़ते हुए निशाना साधा। उनका कहना था कि राहुल गांधी की ओर से व्यक्त किए जाने वाले विचारों को नेहरू के राजनीतिक संदर्भ से जोड़कर देखा जाना चाहिए। यह टिप्पणी भाजपा और कांग्रेस के बीच जारी वैचारिक बहस का हिस्सा बन गई है।

    त्रिवेदी ने केरल में कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के राजनीतिक गठबंधन का भी उल्लेख किया। उन्होंने मुस्लिम लीग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मोहम्मद इस्माइल से जुड़े राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए कांग्रेस के मौजूदा गठबंधन पर सवाल उठाए।

    उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि आज की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को जिन्ना की मुस्लिम लीग से अलग पहचान के रूप में देखा जाता है, तो कांग्रेस को भी उसके ऐतिहासिक राजनीतिक संदर्भ से अलग करके देखने पर सवाल उठ सकते हैं।

    इस पूरे विवाद का केंद्र नेहरू से जुड़ा वह ऐतिहासिक कथन है, जिसे हामिद अंसारी ने ए.जी. नूरानी की पुस्तक के हवाले से सामने रखा। भाजपा ने इसे कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर हमला करने के आधार के रूप में इस्तेमाल किया है। वहीं, इस बहस में नेहरू के कथन के ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।

    नेहरू के पुराने कथन से शुरू हुई यह राजनीतिक बहस अब कांग्रेस की वर्तमान विचारधारा, नागरिक राष्ट्रवाद, हिंदू दक्षिणपंथी राजनीति और कांग्रेस के राजनीतिक गठबंधनों तक पहुंच गई है। हामिद अंसारी की टिप्पणी और सुधांशु त्रिवेदी की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को मौजूदा राजनीतिक विमर्श में चर्चा का विषय बना दिया है।

  • राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम में मोदी की मिमिक्री पर विवाद, बीजेपी ने बुजुर्ग महिला और मां के अपमान का लगाया आरोप

    राहुल गांधी के इंदौर कार्यक्रम में मोदी की मिमिक्री पर विवाद, बीजेपी ने बुजुर्ग महिला और मां के अपमान का लगाया आरोप

     
    मध्य प्रदेश : के इंदौर में आयोजित राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कार्यक्रम में स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री मोदी की आवाज और बोलने के अंदाज की नकल की। इसी दौरान एक बुजुर्ग महिला से जुड़े प्रसंग का मजाक बनाए जाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा है।

    कार्यक्रम के दौरान की गई मिमिक्री का वीडियो सामने आने के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे राजनीतिक मर्यादा और संवेदनशीलता से जोड़ते हुए सवाल उठाए। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पार्टी कॉमेडियंस और जोकर्स की पार्टी बन गई है। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस की आलोचना की।

    शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने भी राहुल गांधी और कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों के साथ संवाद के लिए आयोजित कार्यक्रम का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी की दिवंगत मां के अपमान और मजाक के लिए किया गया। जोशी ने इसे मानवीय संवेदना और राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा गंभीर मामला बताया।

    बीजेपी की ओर से यह भी कहा गया कि मां को राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। पार्टी नेताओं ने राहुल गांधी की मौजूदगी में हुए इस मंचीय कार्यक्रम को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री से जुड़े निजी और पारिवारिक संदर्भों को मजाक का हिस्सा बनाया गया।

    वहीं कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने बीजेपी के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के मंच पर प्रधानमंत्री मोदी की मां से संबंधित कोई बात नहीं हुई। उनका कहना था कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की मां का उल्लेख नहीं किया और लगाए जा रहे आरोपों में तथ्य नहीं हैं। तिवारी ने आरोप लगाने से पहले पूरे मामले को सही तरीके से देखने की बात कही।

    विवाद के बीच राहुल गांधी ने इंदौर कार्यक्रम में उठाए गए छात्रों के मुद्दों को भी सामने रखा। उन्होंने बताया कि एक छात्रा ने उनसे सवाल किया कि सरकार के पास दिया जलाने के लिए पैसा है, लेकिन छात्राओं के लिए हॉस्टल बनाने के लिए क्यों नहीं है। राहुल गांधी ने कहा कि गांवों से शहरों में पढ़ाई के लिए आने वाली छात्राओं को हॉस्टल नहीं मिलने पर पीजी में रहना पड़ता है।

    उन्होंने कहा कि किराए और सुरक्षित आवास का खर्च अधिक होने के कारण कई छात्राओं के लिए पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो जाता है। कार्यक्रम में छात्रों ने शिक्षा, भर्ती, परीक्षा, आरक्षण, हॉस्टल और रोजगार से जुड़े सवाल उठाए।

    ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का यह पांचवां संस्करण था। इससे पहले कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इंदौर में एक छात्रा ने सरकारी परीक्षाएं पास करने के बावजूद ओबीसी आरक्षण से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के कारण नियुक्ति रुकने का मुद्दा उठाया। वहीं एक छात्र ने MPPSC में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाने पर कार्रवाई होने की बात कही। इस बीच मोदी की मिमिक्री को लेकर शुरू हुआ विवाद कार्यक्रम के अन्य छात्र मुद्दों पर भारी पड़ता दिखाई दिया।

  • इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम पर सियासी घमासान, मंच पर बुलाए गए छात्रों की पृष्ठभूमि पर भाजपा ने उठाए सवाल

    मध्य प्रदेश: के इंदौर में शनिवार को आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान कुछ छात्रों को मंच पर बुलाकर उनकी समस्याएं और रोजगार से जुड़े मुद्दे सामने रखने का अवसर दिया गया। अब मंच पर पहुंचे कुछ युवाओं की कथित राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर सवाल उठाए हैं।

    भाजपा का आरोप है कि कार्यक्रम में सामान्य छात्रों के रूप में जिन युवाओं को मंच पर संवाद के लिए बुलाया गया, उनमें कुछ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी या कार्यकर्ता रहे हैं। भाजपा नेताओं ने सोशल मीडिया पर कुछ पुराने दस्तावेजों और तस्वीरों का हवाला देते हुए दावा किया कि मंच पर मौजूद युवाओं की राजनीतिक संबद्धता पहले से सामने रही है। पार्टी ने इसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता से जोड़ते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है।

    कार्यक्रम में तीन नाम विशेष रूप से चर्चा में आए हैं। इनमें तनय शर्मा, राधा मालवीय और रणजीत किसानवंशी शामिल हैं। भाजपा की ओर से दावा किया गया है कि तनय शर्मा कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के प्रवक्ता हैं। पार्टी नेताओं ने उनके राजनीतिक पद से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक करते हुए सवाल उठाया कि यदि वे कांग्रेस की छात्र राजनीति से जुड़े हैं तो उन्हें सामान्य परीक्षार्थी के तौर पर मंच पर क्यों बुलाया गया।

    इसी तरह भाजपा ने राधा मालवीय को लेकर भी दावा किया है कि वह निर्वाचित जिला पंचायत सदस्य होने के साथ युवा कांग्रेस की प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। भाजपा नेताओं ने उनकी राजनीतिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मंच पर संवाद को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

    तीसरे नाम के तौर पर रणजीत किसानवंशी का उल्लेख किया गया है। भाजपा ने उन्हें कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता बताया है। इसके समर्थन में पार्टी नेताओं ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी के साथ उनकी पुरानी तस्वीरों का हवाला दिया है। भाजपा का कहना है कि इन तस्वीरों और राजनीतिक गतिविधियों से उनकी कांग्रेस से संबद्धता का संकेत मिलता है।

    भाजपा नेताओं ने पूरे मामले को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला किया। उनका आरोप है कि युवाओं की समस्याओं पर सीधे संवाद के लिए आयोजित कार्यक्रम में पार्टी से जुड़े लोगों को छात्रों के रूप में मंच पर प्रस्तुत किया गया और उनसे पहले से तय तरीके से बातचीत कराई गई।

    भाजपा प्रवक्ताओं ने आरोपों के आधार पर कार्यक्रम की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि मंच पर मौजूद लोगों की राजनीतिक पहचान पहले से कांग्रेस से जुड़ी थी, तो कार्यक्रम में उन्हें सामान्य छात्रों के रूप में प्रस्तुत करने का उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।

    हालांकि, इन आरोपों पर खबर लिखे जाने तक कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया था। ऐसे में मंच पर आए तीनों युवाओं की भूमिका और कार्यक्रम में उनके चयन को लेकर लगाए गए राजनीतिक दावों पर कांग्रेस का पक्ष सामने आना बाकी है। विवाद के बाद इंदौर के इस आयोजन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।