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  • वजन घटाने के चक्कर में इंटरमिटेंट फास्टिंग से सावधान! जानें इसके खतरनाक असर

    वजन घटाने के चक्कर में इंटरमिटेंट फास्टिंग से सावधान! जानें इसके खतरनाक असर


    नई दिल्ली । आजकल तेजी से वजन कम करने और फिट दिखने के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग का चलन बहुत बढ़ गया है। इसमें लोग 14 से 16 घंटे तक भूखे रहते हैं और केवल एक सीमित समय में भोजन करते हैं। सोशल मीडिया और फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स इसे ‘जादुई वजन घटाने का तरीका’ बता रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसे गलत तरीके से अपनाने पर शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    महिलाओं के हॉर्मोन्स पर असर
    महिलाओं का हॉर्मोनल सिस्टम पुरुषों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होता है। लंबे समय तक भूखा रहने से शरीर तनाव की स्थिति में चला जाता है और कोर्टिसोल स्ट्रेस हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इसका सीधा असर पीरियड्स, थायरॉयड फंक्शन और फर्टिलिटी पर पड़ सकता है। कई शोध बताते हैं कि अनियमित उपवास से प्रजनन क्षमता से जुड़े हॉर्मोन्स का संतुलन बिगड़ सकता है।

    पाचन और ब्लड शुगर पर असर

    पाचन तंत्र को समय पर ईंधन की जरूरत होती है। भोजन में देरी से वात दोष बढ़ जाता है, जिससे गैस, सिरदर्द, चक्कर और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बार-बार शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव होने से बेहोशी, चक्कर और घबराहट की शिकायत भी हो सकती है।

    मांसपेशियों में कमजोरी

    इंटरमिटेंट फास्टिंग का एक बड़ा नुकसान मसल लॉस है। जब शरीर को समय पर कैलोरी नहीं मिलती तो यह ऊर्जा के लिए मांसपेशियों को गलाने लगता है। परिणामस्वरूप वजन तो कम दिखता है लेकिन शरीर अंदर से कमजोर और खोखला हो जाता है। 6-8 घंटे की ईटिंग विंडो में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन जैसे जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा लेना मुश्किल हो जाता है।

    कौन रहें सावधान

    डायबिटीज, लो ब्लड प्रेशर, गर्भवती महिलाएं और ईटिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे लोग इंटरमिटेंट फास्टिंग से बचें। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वजन घटाने के लिए क्रैश डाइट के बजाय संतुलित आहार, पोषक तत्वों से भरपूर भोजन और नियमित व्यायाम को अपनाएं। किसी भी ट्रेंड या डाइट को अपनाने से पहले हेल्थ रिपोर्ट और डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है।

  • दही: ब्लड प्रेशर कम करने और इम्यूनिटी बढ़ाने वाला सुपरफूड, जानें 12 हेल्थ बेनिफिट्स और सावधानियां

    दही: ब्लड प्रेशर कम करने और इम्यूनिटी बढ़ाने वाला सुपरफूड, जानें 12 हेल्थ बेनिफिट्स और सावधानियां


    नई दिल्ली । दही सेहत का खजाना है। इसमें प्रोटीन गुड फैट शुगर और प्रोबायोटिक्स की भरपूर मात्रा होती है जो न सिर्फ स्वादिष्ट है बल्कि गट हेल्थ इम्यूनिटी और मेटाबॉलिज्म को भी रीसेट करता है। इतना ही नहीं यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मददगार है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित स्टडी बताती है कि नियमित दही खाने से हाई ब्लड प्रेशर का रिस्क 16–20% तक कम हो सकता है। हफ्ते में पांच या उससे अधिक बार संतुलित डाइट के साथ दही खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है।

    डॉ. संचयन रॉय सीनियर कंसल्टेंट इंटरनल मेडिसिन अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल दिल्ली के अनुसार दही में मौजूद जिंक सेलेनियम और विटामिन D संक्रमण पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इससे इम्यूनिटी मजबूत होती है और शरीर में इंफ्लेमेशन कम होता है। नियमित सेवन से सर्दी-जुकाम से लेकर गंभीर बीमारियों का रिस्क घटता है।

    हार्ट हेल्थ के लिए भी दही बेहद फायदेमंद है। इसमें पोटेशियम और मैग्नीशियम मौजूद हैं जो शरीर से एक्स्ट्रा सोडियम को बाहर निकालकर ब्लड प्रेशर को संतुलित रखते हैं। प्रोबायोटिक्स बैड कोलेस्ट्रॉल LDLको कम करने और इंफ्लेमेशन घटाने में मदद करते हैं। इन गुणों के कारण दही हार्ट डिजीज का रिस्क कम कर सकता है।

    ब्लड प्रेशर कंट्रोल में दही कैसे मदद करता है? इसमें मौजूद बायोएक्टिव पेप्टाइड्स ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाले एंजाइम्स की एक्टिविटी को कम करते हैं और ब्लड वेसल्स को रिलैक्स करते हैं। इससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है और दबाव संतुलित रहता है। विशेष रूप से मिड एज महिलाओं और अधिक BMI वाले लोगों के लिए दही ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।

    दही के नियमित सेवन से पाचन तंत्र भी मजबूत होता है। प्रोबायोटिक्स गट माइक्रोबायोम का संतुलन बनाए रखते हैं बैड बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकते हैं और IBS कब्ज या ब्लोटिंग जैसी समस्याओं में राहत देते हैं। स्वस्थ गट माइक्रोबायोम मूड और ब्रेन फंक्शनिंग को भी प्रभावित करता है।

    दही खाने का सही समय दोपहर का माना जाता है क्योंकि इस समय पाचन क्षमता सबसे मजबूत होती है। खाली पेट दही खाने से पेट में एसिड बढ़ सकता है इसलिए इसे हमेशा मेन कोर्स के साथ साइड डिश के रूप में लें। मीठा या फ्लेवर्ड दही एक्स्ट्रा शुगर और प्रिजर्वेटिव्स के कारण नुकसानदेह हो सकता है।

    साथ ही दही स्किन और बालों के लिए भी लाभकारी है। इसमें मौजूद लैक्टिक एसिड और प्रोटीन स्किन की रंगत सुधारते हैं मॉइश्चर बनाए रखते हैं और बालों की जड़ें मजबूत करते हैं।हालांकि कुछ लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए। आर्थराइटिस अस्थमा किडनी डिजीज लैक्टोज इनटॉलेरेंस या गंभीर एसिडिटी वाले लोगों को दही सेवन डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए।

    दही खाने से ब्लड प्रेशर कम होता है इम्यूनिटी मजबूत होती है और यह शरीर को कई तरह की लाइफस्टाइल डिजीज से बचाने में मदद करता है। इसे अपनी डाइट में शामिल करना एक छोटी लेकिन असरदार हेल्थ हैबिट है।

  • रोज सुबह पीएं मेथी का पानी: कोलेस्ट्रॉल घटाए, वजन नियंत्रित करे और मेटाबॉलिज्म बढ़ाए

    रोज सुबह पीएं मेथी का पानी: कोलेस्ट्रॉल घटाए, वजन नियंत्रित करे और मेटाबॉलिज्म बढ़ाए


    नई दिल्ली । आयुर्वेद में मेथी को औषधीय गुणों से भरपूर माना गया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और गलत खान-पान के कारण कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है। जब खून में कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल से ज्यादा हो जाता है तो यह नसों में जमा होकर ब्लॉकेज और दिल पर अतिरिक्त दबाव का कारण बनता है।

    यूपी के अलीगढ़ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पीयूष माहेश्वरी के अनुसार मेथी के दानों में फाइबर और स्टेरोइडल सैपोनिन्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। सुबह खाली पेट मेथी का पानी पीने से खून में मौजूद बैड कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे कम होता है। यह नसों की दीवारों पर जमा फैट को पिघलाकर शरीर से बाहर निकालता है जिससे ब्लड फ्लो बेहतर होता है और दिल पर पड़ने वाला दबाव कम होता है।

    इसका सेवन आसान है। रात को एक गिलास पानी में एक चम्मच मेथी दाना भिगो दें। सुबह दाने चबाकर खाएं और पानी पी लें। इस सरल उपाय से नसों में जमा कोलेस्ट्रॉल कम होने लगता है और दिल की सेहत बेहतर रहती है।

    डॉ. माहेश्वरी बताते हैं कि डायबिटीज के मरीजों के लिए मेथी का पानी वरदान है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर ब्लड में शुगर के अवशोषण की गति धीमी करता है और इंसुलिन के उत्पादन में मदद करता है। नियमित सेवन से फास्टिंग शुगर लेवल नियंत्रित रहता है और मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है।

    पाचन के लिए भी मेथी का पानी लाभकारी है। यह गैस एसिडिटी और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देता है आंतों को साफ़ करता है और शरीर से टॉक्सिन्स निकालता है। मेटाबॉलिज्म को तेज करके यह अतिरिक्त चर्बी को बर्न करने में मदद करता है। पेट लंबे समय तक भरा महसूस होने से ओवरईटिंग और अनावश्यक कैलोरी का सेवन भी कम होता है।

    मेथी की तासीर गर्म होती है जो वात दोष को संतुलित करती है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो जोड़ों और हड्डियों की सूजन कम करने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में इसे हार्ट डायबिटीज पाचन और वजन कंट्रोल के लिए शक्तिशाली औषधि माना गया है।

    रोज सुबह खाली पेट मेथी का पानी पीने से नसों में जमा गंदे कोलेस्ट्रॉल कम होता है ब्लड फ्लो बेहतर होता है मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है वजन नियंत्रित रहता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह दिल पाचन और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए एक सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक उपाय है।

  • स्ट्रोक के लक्षणों को न करें नजरअंदाज,बचाव फॉर्मूला से बनाएं समय पर पहचान

    स्ट्रोक के लक्षणों को न करें नजरअंदाज,बचाव फॉर्मूला से बनाएं समय पर पहचान


    नई दिल्ली। स्ट्रोक या ब्रेन अटैक एक गंभीर और जानलेवा स्थिति है। यह तब होता है जब मस्तिष्क तक खून पहुंचने में रुकावट आ जाती है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। स्ट्रोक के मामले में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। जितनी जल्दी पहचान और इलाज होता है, उतनी बेहतर रिकवरी की संभावना बनती है।

    नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) स्ट्रोक के लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह देता है। समय पर पहचान और त्वरित कार्रवाई से जान बचाई जा सकती है। NHM ने स्ट्रोक की पहचान और बचाव के लिए आसान और कारगर फॉर्मूला पेश किया है जिसेबचाव कहा जाता है।

    स्ट्रोक में देरी का मतलब मस्तिष्क में स्थायी नुकसान है। समय पर अस्पताल पहुंचने से क्लॉट-बस्टिंग दवाएं और अन्य इलाज उपलब्ध हो सकते हैं जो रिकवरी में मदद करते हैं। स्ट्रोक से बचाव के लिए ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें, धूम्रपान और शराब से बचें, नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार अपनाएं।

    ‘बचाव’ फॉर्मूला स्ट्रोक के मुख्य लक्षणों को याद रखने का आसान तरीका है। इसमें शामिल हैं:

    ब – बाजू (बाहों में कमजोरी): व्यक्ति से दोनों बाहें ऊपर उठाने को कहें। यदि एक बाजू नीचे गिर जाए या कमजोर लगे, तो यह स्ट्रोक का संकेत हो सकता है।

    च – चेहरा (चेहरा असमान): मुस्कुराने के लिए कहें। चेहरे का एक हिस्सा लटकना या असमान दिखना स्ट्रोक की संभावना दर्शाता है।

    आ – आवाज (बोलने में कठिनाई): व्यक्ति से कोई सरल वाक्य बोलने को कहें। आवाज अस्पष्ट, तुतलाती या बोलने में कठिनाई होना गंभीर संकेत है।

    व – वक्त (समय): यदि ऊपर के कोई भी लक्षण दिखाई दें, तुरंत समय बर्बाद न करें। 108 पर कॉल करें, एम्बुलेंस बुलाएं और नजदीकी अस्पताल पहुंचें, जहां सीटी स्कैन उपलब्ध हो।

    हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, स्ट्रोक के ये लक्षण अचानक प्रकट होते हैं और अक्सर शरीर के एक तरफ प्रभाव डालते हैं। अन्य संकेतों में अचानक संतुलन बिगड़ना, आंखों में धुंधलापन या गंभीर सिरदर्द शामिल हो सकते हैं।

    स्ट्रोक कोसाइलेंट किलर भी कहा जाता है क्योंकि यह कभी-कभी बिना चेतावनी के आता है। लेकिनबचाव फॉर्मूला से 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में जल्दी पहचान संभव है। समय पर कार्रवाई से गंभीर जटिलताओं और स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है।

    इसलिए किसी भी संदिग्ध लक्षण को हल्के में न लें। शरीर की भाषा समझें,बचाव फॉर्मूला याद रखें और तुरंत चिकित्सकीय मदद लें। हर मिनट मायने रखता है और जीवन बच सकता है।

  • मौसमी थकान का सच: सर्दियों से वसंत में बदलाव पर शरीर क्यों महसूस करता है कमजोरी

    मौसमी थकान का सच: सर्दियों से वसंत में बदलाव पर शरीर क्यों महसूस करता है कमजोरी


    नई दिल्ली। जैसे ही सर्दियों का मौसम धीरे-धीरे खत्म होता है और वसंत की हल्की गर्मी शुरू होती है, कई लोग सामान्य से अधिक थकान महसूस करने लगते हैं। सुबह और रात में हल्की ठंड होती है और दिन में धूप निकलने से गर्मी लगती है। ऐसे में शरीर में सुस्ती, आलस और ऊर्जा की कमी महसूस होना आम बात हो गई है। इस स्थिति को सीजनल फटीग या मौसमी थकान कहते हैं।

    सीजनल फटीग तब होती है जब मौसम बदलता है और शरीर को नए तापमान और रोशनी के अनुसार एडजस्ट होना मुश्किल लगता है। सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं, जिससे प्राकृतिक प्रकाश कम मिलता है। इससे शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का संतुलन प्रभावित होता है, जो नींद, ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। जैसे ही वसंत आता है, दिन लंबे और उजाले बढ़ते हैं। शरीर को इस बदलाव के अनुसार अपनी दिनचर्या और ऊर्जा स्तर एडजस्ट करने में समय लगता है, और इसी दौरान अधिक थकान, सुस्ती और मानसिक कमजोरी महसूस हो सकती है।

    सीजनल फटीग से ग्रस्त व्यक्ति को कई बार पर्याप्त नींद के बावजूद थकान बनी रहती है। दिनचर्या प्रभावित हो सकती है और काम या पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो सकता है। व्यक्ति को मानसिक थकान, सुस्ती, आलस्य, एकाग्रता में कमी और कभी-कभी नींद न आने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

    इसका मुख्य कारण मौसम में बदलाव के कारण शरीर की ऊर्जा और हार्मोनल प्रतिक्रिया है। सर्दियों में ठंड के कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है, और वसंत में अचानक गर्मी और रोशनी बढ़ने पर शरीर को फिर से ऊर्जा स्तर संतुलित करने में समय लगता है। इसके अलावा विटामिन डी की कमी भी थकान में योगदान कर सकती है क्योंकि सर्दियों में धूप कम मिलती है।

    सीजनल फटीग से बचने के लिए कुछ उपाय बेहद मददगार साबित होते हैं। रोजाना हल्की एक्सरसाइज या योग करने से शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता है। पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना और प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताना भी मदद करता है। नींद पूरी करना, स्ट्रेस कम करना और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    यदि थकान लंबे समय तक बनी रहे, मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो, नींद न आए या सामान्य गतिविधियों में कठिनाई हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। कभी-कभी ये लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत भी हो सकते हैं।

    इस प्रकार सर्दियों से वसंत के मौसम में शरीर का एडजस्ट होना और ऊर्जा स्तर में बदलाव सामान्य है, लेकिन समझदारी और सावधानी से आप सीजनल फटीग को कम कर सकते हैं और स्वस्थ दिनचर्या बनाए रख सकते हैं।

  • आचार्य बालकृष्ण के हेल्थ टिप्स: रोजाना पपीता खाने से घटे कोलेस्ट्रॉल और दिल स्वस्थ

    आचार्य बालकृष्ण के हेल्थ टिप्स: रोजाना पपीता खाने से घटे कोलेस्ट्रॉल और दिल स्वस्थ


    नई दिल्ली । आचार्य बालकृष्ण ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कोलेस्ट्रॉल कम करने और दिल को स्वस्थ रखने का आसान उपाय बताया है। उनका सुझाव है कि प्रतिदिन पपीता खाने से शरीर में जमा बुरा कोलेस्ट्रॉल LDL नियंत्रित होता है और ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है।

    पपीता क्यों खाएं?

    पपीता एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिनों का प्राकृतिक स्रोत है। इसमें विटामिन C फाइबर और कई पोषक तत्व होते हैं। आचार्य बालकृष्ण के अनुसार नियमित रूप से पपीता खाने से कोलेस्ट्रॉल स्तर नियंत्रित रहता है और दिल से जुड़े रोगों का खतरा भी कम होता है। पपीता आयुर्वेद में पाचन सुधारने वाला फल माना जाता है। यह शरीर में जमा गंदा कोलेस्ट्रॉल बाहर निकालने में मदद करता है और कब्ज एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देता है। इसके अलावा पपीते में मौजूद फाइबर गुड कोलेस्ट्रॉल HDL बढ़ाने में मदद करता है और ब्लड सर्कुलेशन को सुधारता है।

    प्रतिदिन कितना पपीता खाएं?

    आचार्य बालकृष्ण के अनुसार: रोजाना 1 कटोरी पपीता सुबह या शाम खाया जा सकता है। इसे बिना नमक के खाना चाहिए। सर्दी-जुकाम में पपीते पर थोड़ा काली मिर्च पाउडर छिड़ककर खाया जा सकता है। पपीता तले-भुने भोजन के साथ न मिलाएं।

    आसान और किफायती उपाय

    पपीता घर में आसानी से उपलब्ध होता है और इसका सेवन सरल प्राकृतिक और किफायती तरीका है कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने का। यह न केवल दिल की सेहत के लिए फायदेमंद है बल्कि पाचन तंत्र और कब्ज जैसी सामान्य समस्याओं में भी राहत देता है।

  • पालक खाने से पथरी और जोड़ों में दर्द? इन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी..

    पालक खाने से पथरी और जोड़ों में दर्द? इन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी..


    नई दिल्ली ।पालक को अक्सर सुपरफूड कहा जाता है क्योंकि यह रक्त बढ़ाने, हड्डियों को मजबूत करने और पेट की सेहत सुधारने में मदद करता है। लेकिन हर किसी के लिए यह सुरक्षित नहीं है। कुछ लोगों के लिए पालक का सेवन परेशानी का कारण बन सकता है।

    आयुर्वेद में पालक के गुण और शरीर के दोषों वात, पित्त, कफ पर इसके प्रभाव को ध्यान में रखा जाता है। जहां यह रक्तवर्धक और पोषण से भरपूर है, वहीं इसके अत्यधिक सेवन से पथरी का खतरा बढ़ सकता है। खासकर उन लोगों को, जिन्हें पहले से यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन UTI या किडनी की समस्याएं हैं, पालक से बचना चाहिए। यह मूत्र मार्ग में रुकावट पैदा कर सकता है और आगे जाकर पथरी का कारण बन सकता है।

    यदि आपकी पाचन शक्ति कमजोर है, तो पालक से परहेज करना बेहतर है। पाचन अग्नि मंद होने पर पालक पेट में सही तरीके से पचता नहीं और टॉक्सिन पैदा कर सकता है। इससे पेट भारी, गैस या खराब बैक्टीरिया का विकास हो सकता है।

    इसके अलावा, शरीर में वात और कफ की अधिकता वाले लोग भी पालक का सेवन सीमित करें। पालक की भारी प्रकृति कफ को बढ़ाकर श्वसन समस्याएं और वात को बढ़ाकर जोड़ों में जकड़न या गैस की समस्या पैदा कर सकती है।

    पालक फायदेमंद होने के बावजूद कुछ परिस्थितियों में नुकसानदेह भी हो सकता है। खासकर यूटीआई, पथरी, कमजोर पाचन शक्ति और वात-कफ अधिक होने वाले लोगों को पालक का सेवन सीमित करना चाहिए। संतुलित मात्रा और सही तैयारी के साथ पालक का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, लेकिन साव

  • यूरिक एसिड बढ़ा है? इन 9 संकेतों से पहचानें और बिना दवा भी करें कंट्रोल

    यूरिक एसिड बढ़ा है? इन 9 संकेतों से पहचानें और बिना दवा भी करें कंट्रोल


    नई दिल्ली । अगर अचानक जोड़ों में दर्द, सूजन या पैरों के अंगूठे में जलन महसूस हो तो इसे नजरअंदाज न करें। इसके पीछे हाई यूरिक एसिड (Uric Acid) की संभावना हो सकती है। शरीर भोजन के पाचन और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं के दौरान यूरिक एसिड बनाता है। आमतौर पर किडनी इसे पेशाब के जरिए बाहर निकाल देती है। लेकिन अगर इस प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाए तो यूरिक एसिड शरीर में जमा होने लगता है और गाउट यानी गठिया जैसी परेशानी पैदा कर सकता है।

    लक्षण

    यूरिक एसिड बढ़ने के सबसे सामान्य लक्षण जोड़ों में तेज दर्द, सूजन और जकड़न हैं। खासकर पैरों के अंगूठे, घुटने और टखने प्रभावित होते हैं। दर्द अक्सर अचानक शुरू होता है और रात में बढ़ सकता है। कुछ मामलों में किडनी पर असर पड़ सकता है, जिससे पेशाब में जलन या किडनी स्टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

    कॉम्प्लिकेशन्स

    यूरिक एसिड लंबे समय तक हाई रहने पर जोड़ों में यूरिक एसिड के क्रिस्टल जम सकते हैं, जिससे परमानेंट डैमेज हो सकता है। गाउट के कारण जोड़ों में लगातार सूजन और तेज दर्द रहता है। इसके अलावा किडनी स्टोन का खतरा भी बढ़ जाता है।

    नॉर्मल लेवल

    एक स्वस्थ वयस्क में यूरिक एसिड का सामान्य स्तर पुरुषों में 3.4–7.0 mg/dL और महिलाओं में 2.4–6.0 mg/dL होता है। इसके ऊपर जाने पर जोड़ों और किडनी को असर पड़ सकता है।

    टेस्ट

    यूरिक एसिड लेवल जानने के लिए सीरम यूरिक एसिड ब्लड टेस्ट या यूरिन यूरिक एसिड टेस्ट करवाया जा सकता है। ये टेस्ट सुरक्षित और आसान होते हैं।

    इलाज और कंट्रोल

    हल्का बढ़ा यूरिक एसिड लाइफस्टाइल सुधार से कंट्रोल किया जा सकता है। पर्याप्त पानी पीना, वजन नियंत्रित रखना और हेल्दी डाइट अपनाना मददगार है। अगर गाउट अटैक हो रहे हैं, तो डॉक्टर दवा देते हैं।

    डाइट और खान-पान

    लो-प्यूरिन और फाइबर से भरपूर फूड जैसे हरी सब्जियां, मौसमी फल, होल ग्रेन्स और लो-फैट डेयरी प्रोडक्ट्स फायदेमंद हैं। विटामिन-C वाले फल जैसे संतरा, नींबू और आंवला यूरिक एसिड को किडनी से बाहर निकलने में मदद करते हैं। इसके विपरीत रेड मीट, ऑर्गन मीट, सी-फूड, शराब, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स और बहुत मीठे जूस से परहेज करें।

    डॉक्टर से कंसल्ट कब करें: बार-बार गाउट अटैक लंबे समय तक दर्द बना रहना चलने-फिरने में दिक्कत पेशाब में जलन या खून आना बहुत कम पेशाब किडनी स्टोन की समस्या समय रहते लक्षण पहचानकर सही इलाज और संतुलित जीवनशैली अपनाने से यूरिक एसिड को नियंत्रित किया जा सकता है।

  • नियमित जांच से कैंसर पर शुरुआती दौर में लगाया जा सकता है ब्रेक..

    नियमित जांच से कैंसर पर शुरुआती दौर में लगाया जा सकता है ब्रेक..


    नई दिल्ली। कैंसर आज भी दुनिया की सबसे गंभीर और जानलेवा बीमारियों में शामिल है। हालांकि मेडिकल साइंस में लगातार प्रगति हो रही है, लेकिन समय पर पहचान न होने के कारण यह बीमारी लाखों लोगों की जान ले लेती है। भारत में कैंसर के अधिकांश मामलों का पता तीसरे या चौथे स्टेज में चलता है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही समय पर जरूरी हेल्थ चेकअप कराए जाएं, तो कैंसर को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सकता है।

    GLOBOCAN 2022 के आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 14.1 लाख नए कैंसर मामले सामने आए, जबकि लगभग 9.2 लाख लोगों की मौत इस बीमारी के कारण हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह लेट डायग्नोसिस है। शुरुआती स्टेज में कैंसर अक्सर बिना लक्षणों के बढ़ता रहता है, इसलिए नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।

    लेट डायग्नोसिस क्यों है खतरनाक
    जब कैंसर तीसरे या चौथे स्टेज में पहुंच जाता है, तब यह शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका होता है। इस स्थिति में इलाज न केवल महंगा होता है बल्कि सफल होने की संभावना भी कम हो जाती है। यही कारण है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान को कैंसर से लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार मानते हैं।

    एक्सपर्ट द्वारा बताए गए 6 जरूरी हेल्थ चेकअप
    ब्लड टेस्ट
    सामान्य ब्लड जांच से शरीर में असामान्य बदलाव, संक्रमण या ट्यूमर मार्कर के संकेत मिल सकते हैं। यह शुरुआती चेतावनी का काम करता है।

    मैमोग्राफी
    महिलाओं के लिए ब्रेस्ट कैंसर की पहचान में यह जांच बेहद जरूरी मानी जाती है। 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को नियमित मैमोग्राफी की सलाह दी जाती है।

    पैप स्मीयर टेस्ट
    यह सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती पहचान में सहायक होता है। समय पर जांच से इस कैंसर को पूरी तरह रोका जा सकता है।

    अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन
    पेट, लिवर, किडनी और अन्य अंगों में होने वाले ट्यूमर की पहचान के लिए यह जांच महत्वपूर्ण होती है।

    कोलोनोस्कोपी
    यह जांच आंतों और कोलन कैंसर का शुरुआती स्टेज में पता लगाने में मदद करती है, खासकर 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए।

    ओरल स्क्रीनिंग
    तंबाकू, गुटखा या धूम्रपान करने वालों के लिए मुंह और गले की नियमित जांच बेहद जरूरी होती है, जिससे ओरल कैंसर की समय रहते पहचान हो सके।विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का डर पालने की बजाय जागरूकता और नियमित जांच को जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। संतुलित आहार, व्यायाम और समय-समय पर मेडिकल चेकअप से कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।समय रहते पहचान न केवल इलाज को आसान बनाती है बल्कि जीवन को भी बचा सकती है।

  • फरवरी की 'सर्द-गर्म' से रहें सावधान: 15 सालों में सबसे गर्म शुरुआत, बीमारियों से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी टिप्स

    फरवरी की 'सर्द-गर्म' से रहें सावधान: 15 सालों में सबसे गर्म शुरुआत, बीमारियों से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी टिप्स


    नई दिल्ली। फरवरी का महीना आते ही प्रकृति करवट बदलने लगती है। इस साल मौसम का मिजाज कुछ ज्यादा ही हैरान करने वाला है; जहाँ जनवरी पिछले छह सालों में सबसे गर्म रहा, वहीं फरवरी की शुरुआत ने भी पिछले 15 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। दिन में चुभती धूप और शाम होते ही सर्द हवाओं का यह ‘डबल अटैक’ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) पर सीधा हमला करता है। ऐसे में थोड़ी सी भी लापरवाही आपको अस्पताल पहुँचा सकती है।

    धूप से आकर तुरंत न चलाएं पंखा दोपहर के वक्त बाहर से आने पर अक्सर शरीर का तापमान बढ़ जाता है और हम तुरंत पंखा चला लेते हैं या एसी की तलाश करते हैं। डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि ऐसा करना ‘सर्द-गर्म’ का मुख्य कारण बनता है। जब आप बाहर से आएं, तो कम से कम 10-15 मिनट शांति से बैठें ताकि शरीर का तापमान प्राकृतिक रूप से सामान्य हो जाए। इसी तरह, तेज धूप से लौटकर तुरंत ठंडा पानी पीना गले के संक्रमण और तेज बुखार को न्योता देना है।

    साफ-सफाई: फ्लू से बचने का सबसे बड़ा हथियार बदलते मौसम में वायरस और बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, संक्रमण से बचने के लिए हाथों की स्वच्छता (Hand Hygiene) सबसे महत्वपूर्ण है। अपनी हथेलियों, उंगलियों और नाखूनों को नियमित रूप से साबुन से धोएं। खांसते या छींकते समय रुमाल का प्रयोग करें और हाथों से बार-बार नाक या आंखों को छूने से बचें।

    सेहत बनाए रखने के अचूक उपाय: इस संक्रमण काल में खुद को सुरक्षित रखने के लिए अपनी दिनचर्या में ये छोटे बदलाव जरूर करें:
    बाहर के खुले या जंक फूड से परहेज करें और घर का बना ताजा भोजन ही लें।
    रात को सोने से पहले एक गिलास हल्दी वाला दूध पिएं, यह प्राकृतिक एंटीबायोटिक का काम करता है।कफ या गले में खराश महसूस होने पर केवल गुनगुना पानी ही पिएं।

     सुबह और शाम की ठंड को हल्के में न लें; पूरी बाजू के कपड़े पहनें। पैरों में संक्रमण से बचने के लिए अब बंद जूतों की जगह खुली चप्पलों का चुनाव किया जा सकता है।

    डॉक्टर की सलाह कब लें? बदलते मौसम में बच्चे और बुजुर्ग सबसे जल्दी संक्रमण की चपेट में आते हैं। यदि आपको या परिवार में किसी को भी दो दिन से अधिक समय तक बुखार, लगातार कफ या शरीर में अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, तो इसे ‘मौसमी असर’ मानकर नजरअंदाज न करें। तुरंत अपने नजदीकी डॉक्टर से परामर्श लें ताकि समय रहते सही उपचार शुरू हो सके।

    फरवरी में दिन की गर्मी और रात की ठंड के कारण ‘सर्द-गर्म’ की समस्या बढ़ रही है। 15 साल की सबसे गर्म शुरुआत के बीच सर्दी-जुकाम और फ्लू का खतरा है। बचाव के लिए धूप से आकर तुरंत ठंडा पानी न पिएं, स्वच्छता का ध्यान रखें और इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए हल्दी वाले दूध का सेवन करें।