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  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • अमेरिका की 100% टैरिफ धमकी के बीच भारत के लिए 15 देशों में खुल सकता है 19 लाख करोड़ रुपये का नया बाजार

    अमेरिका की 100% टैरिफ धमकी के बीच भारत के लिए 15 देशों में खुल सकता है 19 लाख करोड़ रुपये का नया बाजार

    नई दिल्ली । अमेरिका की ओर से भारत समेत कुछ देशों के खिलाफ 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकी के बीच भारतीय निर्यात को लेकर चिंता बढ़ी है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने के लिए भारत के पास कई वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक करीब 15 देशों के बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा अवसर बन सकते हैं, जहां लगभग 200 अरब डॉलर यानी करीब 19 लाख करोड़ रुपये के कारोबार की संभावनाएं मौजूद हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र अमेरिकी शुल्क नीति और भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने से जुड़ा विवाद है। अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी के बाद भारतीय निर्यातकों के सामने अमेरिकी बाजार को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। ऐसे में भारत के लिए दूसरे देशों में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है।

    जानकारों के अनुसार भारत अमेरिका को बड़े पैमाने पर वस्तुओं का निर्यात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका को भारत का मर्चेंडाइज निर्यात करीब 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा लगभग 86.5 अरब डॉलर था। इससे स्पष्ट है कि अमेरिकी बाजार भारतीय निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था की निर्भरता केवल इसी बाजार पर नहीं है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नीदरलैंड्स, फ्रांस, ब्रिटेन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल और लैटिन अमेरिकी देशों समेत कई बाजारों में भारतीय उत्पादों के लिए संभावनाएं हैं। इन बाजारों में निर्यात को बढ़ावा देकर भारतीय कंपनियां किसी एक देश में शुल्क बढ़ने से होने वाले जोखिम को कम कर सकती हैं।

    आंकड़ों और विशेषज्ञ आकलन के अनुसार अमेरिका के बाहर मौजूद इन बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है। जहां अमेरिकी बाजार में भारत का निर्यात करीब 10 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, वहीं कई वैकल्पिक बाजारों में निर्यात वृद्धि दर 20 से 25 प्रतिशत तक बताई गई है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए बाजारों के विस्तार की गुंजाइश दिखाई देती है।

    भारत के श्रम-केंद्रित और प्रतिस्पर्धी लागत वाले उत्पादों को भी इस बदलाव में फायदा मिल सकता है। कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, दवाइयां, ऑटो कंपोनेंट्स और दूसरे विनिर्मित सामानों के लिए वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करने की कोशिश लंबे समय में निर्यात को अधिक विविध बना सकती है।

    हालांकि, अमेरिकी बाजार में किसी बड़े शुल्क का असर पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध काफी व्यापक हैं। ऐसे में 100 प्रतिशत तक टैरिफ लागू होने की स्थिति में भारतीय निर्यातकों के लिए कीमतों और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

    दूसरी ओर, विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भारी टैरिफ का असर अमेरिका पर भी पड़ सकता है। भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ने से अमेरिकी बाजार में उनकी कीमत बढ़ सकती है, जिसका बोझ अंततः वहां के उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे उत्पादों में, जिनकी आपूर्ति भारत से प्रतिस्पर्धी लागत पर होती है, वैकल्पिक स्रोत तलाशना अमेरिकी कारोबार के लिए भी आसान नहीं होगा।

    भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में व्यापारिक तनाव को बढ़ाने के बजाय दोनों देशों के आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर समाधान तलाशने की जरूरत बताई जा रही है। फिलहाल भारत के लिए अमेरिकी बाजार के साथ संबंध बनाए रखते हुए यूरोप, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका में निर्यात का दायरा बढ़ाना रणनीतिक विकल्प बन सकता है।

  • रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    नई दिल्ली । रूस और भारत के बीच व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने के लिए एक नए जमीनी परिवहन मार्ग की संभावना पर चर्चा शुरू हुई है। रूस ने भारत तक पहुंचने वाले संभावित वैकल्पिक रास्तों पर विचार करने की बात कही है। प्रस्तावित मार्ग रूस से शुरू होकर तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। हालांकि, अभी यह केवल प्रारंभिक प्रस्ताव है और किसी औपचारिक रेल परियोजना को मंजूरी नहीं मिली है।

    यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। भारत और रूस के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार वर्तमान में समुद्री मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में व्यवधान आने पर वैकल्पिक जमीनी नेटवर्क दोनों देशों के बीच माल ढुलाई के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।

    रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने भारत तक पहुंचने वाले हर संभावित मार्ग पर विचार करने की जरूरत बताई है। उन्होंने बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्ताव का उद्देश्य केवल रेल संपर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस और भारत के बीच व्यापार को अधिक सुरक्षित और विविध परिवहन नेटवर्क उपलब्ध कराने से भी जुड़ा है।

    भारत के लिए ऐसा मार्ग ऊर्जा और व्यापार दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा या शिपिंग लागत में वृद्धि की स्थिति में जमीनी परिवहन अतिरिक्त विकल्प दे सकता है। रूस से भारत आने वाले कच्चे तेल, उर्वरक और अन्य महत्वपूर्ण सामानों की आपूर्ति के लिए भी वैकल्पिक परिवहन नेटवर्क उपयोगी हो सकता है।

    दूसरी ओर, भारत से रूस को भेजे जाने वाले कृषि उत्पाद, दवाएं और मशीनरी जैसे सामानों के लिए भी जमीनी संपर्क समय और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बढ़ने के साथ परिवहन के नए विकल्पों की जरूरत भी बढ़ी है। ऐसे में प्रस्तावित मार्ग को व्यापक यूरेशियाई व्यापार नेटवर्क के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे के जरिए रूस और मध्य एशिया तक संपर्क बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की भारत की नीति भी इस प्रस्ताव से जुड़ सकती है। हालांकि, प्रस्तावित नए मार्ग में कई जटिल चुनौतियां मौजूद हैं।

    सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान से जुड़ी है। प्रस्तावित मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरता है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच जमीनी व्यापार लंबे समय से गंभीर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। भारत के माल को पाकिस्तान से होकर गुजरने की अनुमति और ट्रांजिट अधिकार देना इस योजना के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रश्न होगा।

    अफगानिस्तान की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी इस मार्ग के संचालन में बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा अलग-अलग देशों में रेल गेज, सीमा शुल्क व्यवस्था, सीमा पार प्रक्रियाएं और नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

    फिलहाल रूस का यह प्रस्ताव शुरुआती विचार के स्तर पर है। इसे वास्तविक रेल परियोजना में बदलने के लिए भारत समेत संबंधित देशों के बीच राजनीतिक सहमति, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी समन्वय और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा। यदि भविष्य में इन बाधाओं का समाधान होता है, तो यह मार्ग भारत और रूस के बीच व्यापार के लिए समुद्री परिवहन के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है।

  • नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत

    नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत


    नई दिल्ली । 
    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की अपनी पुरानी नीति में बड़ा बदलाव किया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार उन्होंने किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात की। सोमवार को उन्होंने भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से अलग बैठक की। इस दौरान दोनों के बीच भारत और नेपाल के संबंधों, विकास सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    मुलाकात के दौरान नवीन श्रीवास्तव ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी। उन्होंने भारत की ओर से नेपाल के साथ बेहतर संबंधों और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही। बालेन शाह ने भी दोनों देशों के बीच पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

    नेपाल और भारत के बीच व्यापार, ऊर्जा, सड़क और विकास परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारतीय राजदूत के साथ बालेन शाह की पहली व्यक्तिगत बैठक को दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    बालेन शाह इससे पहले विदेशी अधिकारियों और राजदूतों से अकेले मुलाकात करने से परहेज करते रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ वन-टू-वन बैठक नहीं करने की नीति अपनाई थी। विदेशी राजदूतों के साथ भी वह सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते थे।

    इसी नीति के तहत भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की मई में नेपाल यात्रा के दौरान भी बालेन शाह ने उनसे अलग मुलाकात नहीं की थी। इसके अलावा अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित कुछ व्यक्तिगत बैठकों को भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इसके बजाय उन्होंने काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।

    बालेन शाह की इस नीति के पीछे उनका यह तर्क बताया जाता रहा है कि बड़े और प्रभावशाली देशों के प्रतिनिधि नेपाल की सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं। सामूहिक बैठकों के जरिए वह सभी देशों के साथ समान व्यवहार और नेपाल की संप्रभुता का संदेश देना चाहते थे।

    हालांकि, सरकार गठन के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखाई देने लगा। सलाहकारों की ओर से घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों के साथ सीधे संवाद बढ़ाने की सलाह के बाद शाह ने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं। अब विदेशी राजदूतों के साथ सीधी मुलाकात भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारतीय राजदूत से मुलाकात के बाद बालेन शाह चीनी राजदूत झांग माओमिंग से भी अलग बैठक करने वाले हैं। भारत और चीन दोनों नेपाल के प्रमुख पड़ोसी और महत्वपूर्ण साझेदार हैं। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ व्यक्तिगत संवाद का कार्यक्रम नेपाल की संतुलित विदेश नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नेपाल में लंबे समय से प्रधानमंत्री और बड़े देशों के राजदूतों के बीच सीधे संवाद की परंपरा रही है। कई बार ऐसी बैठकें प्रधानमंत्री के निजी आवास पर भी होती रही हैं। इन बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी नहीं होती थी और कुछ मुलाकातों का औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था।

    बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस व्यवस्था में बदलाव आया था, लेकिन अब उनकी नीति फिर बदलती नजर आ रही है। भारत और चीन के राजदूतों के साथ सीधे संवाद से यह संकेत मिलता है कि नेपाल सरकार महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मामलों पर सामूहिक बैठकों के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संपर्क को भी जगह दे रही है।

  • मोहम्मद शमी की टीम इंडिया में वापसी पर जहीर खान ने दिया बड़ा संकेत, 2027 वर्ल्ड कप को लेकर चयनकर्ताओं को समझाया नजरिया

    मोहम्मद शमी की टीम इंडिया में वापसी पर जहीर खान ने दिया बड़ा संकेत, 2027 वर्ल्ड कप को लेकर चयनकर्ताओं को समझाया नजरिया

    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट टीम के अनुभवी तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी को राष्ट्रीय टीम की योजनाओं से बाहर रखे जाने को लेकर चर्चा लगातार बनी हुई है। घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन करने के बावजूद टीम में जगह नहीं मिलने के बीच पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज जहीर खान ने शमी के समर्थन में अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि भारत को 2027 वनडे वर्ल्ड कप की तैयारियों में शमी जैसे अनुभवी गेंदबाज के अनुभव का इस्तेमाल करना चाहिए।

    जहीर खान का मानना है कि शमी को बाहरी चर्चाओं और टीम में चयन से जुड़ी परिस्थितियों पर अधिक ध्यान देने के बजाय अपने प्रदर्शन पर फोकस बनाए रखना चाहिए। उनके अनुसार, किसी खिलाड़ी के नियंत्रण में सबसे महत्वपूर्ण चीज उसका प्रदर्शन होता है। इसलिए शमी को लगातार मैच खेलकर विकेट हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए।

    जहीर ने कहा कि अगर शमी नियमित रूप से क्रिकेट खेल रहे हैं और अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, तो वह 2027 वनडे वर्ल्ड कप के लिए उपलब्ध विकल्प हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि घरेलू क्रिकेट में मजबूत प्रदर्शन करने वाले अनुभवी खिलाड़ी को राष्ट्रीय टीम की भविष्य की योजनाओं में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    मोहम्मद शमी भारतीय क्रिकेट में लंबे समय से अपनी तेज गेंदबाजी और नई गेंद से विकेट लेने की क्षमता के लिए पहचाने जाते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनके अनुभव को देखते हुए आगामी बड़े टूर्नामेंट के लिए उनकी संभावित भूमिका को लेकर चर्चा स्वाभाविक है। जहीर खान के बयान ने इसी बहस को और प्रमुखता दी है।

    जहीर के मुताबिक, यदि कोई अनुभवी खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, तो चयनकर्ताओं को उसके प्रदर्शन पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि टीम प्रबंधन को भविष्य की योजनाएं बनाते समय ऐसे खिलाड़ियों के अनुभव को ध्यान में रखना उपयोगी हो सकता है।

    2027 का वनडे वर्ल्ड कप दक्षिण अफ्रीका में आयोजित होना है। इस टूर्नामेंट को ध्यान में रखते हुए भारतीय टीम के पास अपनी गेंदबाजी इकाई तैयार करने के लिए पर्याप्त समय है। ऐसे में चयनकर्ताओं के सामने अनुभवी खिलाड़ियों और युवा प्रतिभाओं के बीच सही संतुलन बनाने की चुनौती भी रहेगी।

    जहीर ने शमी को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें उन चीजों पर ध्यान देना चाहिए जो उनके नियंत्रण में हैं। चयन को लेकर होने वाली चर्चा खिलाड़ी के हाथ में नहीं होती, लेकिन मैदान पर प्रदर्शन और फिटनेस बनाए रखना उसके नियंत्रण में रहता है। लगातार अच्छा प्रदर्शन करने से राष्ट्रीय टीम में वापसी की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

    शमी के लिए घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय चयन के दौरान मौजूदा फॉर्म और फिटनेस जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है। जहीर की राय में यदि शमी प्रतिस्पर्धी क्रिकेट खेल रहे हैं और विकेट हासिल कर रहे हैं, तो उनकी उपलब्धता को भारतीय टीम की योजनाओं में गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

    पूर्व तेज गेंदबाज की इस टिप्पणी से 2027 वनडे वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम की संभावित गेंदबाजी रणनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है। भारत के सामने आने वाले वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबले और आईसीसी प्रतियोगिताएं होंगी, जिनमें अनुभवी खिलाड़ियों की भूमिका और युवा गेंदबाजों को तैयार करने के बीच संतुलन अहम होगा।

    फिलहाल अंतिम फैसला चयनकर्ताओं और टीम प्रबंधन को करना है। शमी की वापसी उनकी फिटनेस, प्रदर्शन और टीम की जरूरतों समेत कई पहलुओं पर निर्भर करेगी। हालांकि जहीर खान की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय क्रिकेट के अनुभवी खिलाड़ियों में से एक को 2027 वर्ल्ड कप की योजनाओं में शामिल किए जाने की संभावना पर चर्चा जारी है।

  • आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…

    आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति एक बार फिर आभार जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट में प्रधानमंत्री को दो बार धन्यवाद कहा। उनके इस पोस्ट का संबंध वैश्विक इस्माइली समुदाय के आध्यात्मिक प्रमुख मौलाना हजार इमाम शाह रहीम अल-हुसैनी आगा खान की आगामी भारत यात्रा से है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में बताया कि भारत सरकार के निमंत्रण पर आगा खान 9 से 15 सितंबर 2026 तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। उन्होंने इस निमंत्रण को भारत और वैश्विक इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया।

    शहजाद पूनावाला का संबंध शिया इस्माइली समुदाय से बताया जाता है। इस समुदाय के आध्यात्मिक नेतृत्व का संबंध आगा खान की इमामत से है। ऐसे में आगा खान की भारत यात्रा को लेकर पूनावाला की प्रतिक्रिया व्यक्तिगत और सामुदायिक संदर्भ से भी जुड़ी हुई है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि भारत सरकार की ओर से दिया गया निमंत्रण वैश्विक इस्माइली समुदाय द्वारा सराहा गया है। उन्होंने इसे भारत और इस्माइली इमामत के बीच मित्रता, पारस्परिक सम्मान तथा साझा मूल्यों पर आधारित लंबे संबंधों का संकेत बताया।

    उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस्माइली समुदाय ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण विकास, संस्कृति और परोपकार के क्षेत्र में भारत तथा दुनिया के कई हिस्सों में योगदान दिया है। उनके अनुसार, आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क के माध्यम से भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, विरासत संरक्षण, ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण से जुड़े कई कार्य किए गए हैं।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि इन पहलों का लाभ विभिन्न वर्गों के लोगों तक पहुंचा है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर इस समुदाय की ओर से बहुलवाद, जीवन की गुणवत्ता और सतत विकास को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों का भी उल्लेख किया।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों को भी रेखांकित किया। पूनावाला के मुताबिक, दोनों के बीच संबंध पारस्परिक सम्मान, विकास के साझा दृष्टिकोण और निरंतर सहयोग पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि समुदाय आगा खान की यात्रा और भारत में अपनी जमात से उनकी मुलाकात को लेकर उत्साहित है।

    पूनावाला ने अपने संदेश के अंत में प्रधानमंत्री मोदी को एक बार फिर धन्यवाद दिया। उन्होंने भारत सरकार की ओर से दिए गए निमंत्रण को गर्मजोशी और उदारता से भरा कदम बताया। इसी वजह से उनका यह पोस्ट राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना, क्योंकि वह हाल ही में बीजेपी से अलग हुए हैं।

    हालांकि पार्टी छोड़ने के बाद भी पूनावाला की ओर से प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक टिप्पणियां सामने आती रही हैं। इस बार उनका संदेश किसी राजनीतिक मुद्दे के बजाय आगा खान की प्रस्तावित आधिकारिक यात्रा और भारत-इस्माइली समुदाय के संबंधों पर केंद्रित रहा।

    आगा खान की सितंबर में प्रस्तावित यात्रा के दौरान भारत और इस्माइली इमामत के बीच लंबे समय से चले आ रहे संपर्क, सामुदायिक संबंधों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग से जुड़े पहलुओं पर ध्यान रहने की संभावना है। पूनावाला का बयान इसी व्यापक संदर्भ में प्रधानमंत्री के प्रति उनके आभार को सामने रखता है।

  • वित्त वर्ष 2031 तक 63 लाख यूनिट पहुंच सकता है भारतीय कार बाजार: आरसी भार्गव

    वित्त वर्ष 2031 तक 63 लाख यूनिट पहुंच सकता है भारतीय कार बाजार: आरसी भार्गव

    नई दिल्ली ।भारतीय कार उद्योग आने वाले वर्षों में विस्तार की मजबूत संभावनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन आरसी भार्गव ने रविवार, 9 अगस्त 2026 को कहा कि वित्त वर्ष 2030-31 तक देश का कार बाजार बढ़कर 61 से 63 लाख यूनिट तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में छोटी कारों की बाजार हिस्सेदारी में भी सुधार देखने को मिल सकता है।

    आरसी भार्गव के अनुसार, भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार की भविष्य की वृद्धि का आकलन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हालिया जीएसटी सुधारों से केवल वाहन उद्योग को ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के कई अन्य क्षेत्रों को भी गति मिली है। कंपनी अगले पांच वर्षों के दौरान कार बाजार की संभावित वृद्धि का अधिक सटीक अनुमान तैयार करने की प्रक्रिया में है।

    मारुति सुजुकी इंडिया की वित्त वर्ष 2025-26 की वार्षिक एकीकृत रिपोर्ट में कंपनी के कारोबार और भविष्य की रणनीति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, छोटी कारों के बाजार में सुधार, एसयूवी पोर्टफोलियो की मजबूती, अलग-अलग पावरट्रेन विकल्प, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और निर्यात में बेहतर प्रदर्शन ने कंपनी की वृद्धि को समर्थन दिया है।

    वित्त वर्ष 2025-26 में मारुति सुजुकी ने 24.22 लाख वाहनों की रिकॉर्ड वार्षिक बिक्री दर्ज की। यह कंपनी की अब तक की सबसे अधिक सालाना बिक्री है। इसी अवधि में कंपनी ने 4.47 लाख वाहनों का निर्यात किया, जो उसके निर्यात कारोबार का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।

    कंपनी लगातार तीसरे वर्ष 20 लाख से अधिक वाहनों की बिक्री करने में सफल रही है। आरसी भार्गव ने बिक्री के अगले दस लाख यूनिट के माइलस्टोन को लेकर भी सकारात्मक रुख जताया। उन्होंने कहा कि कंपनी इस उपलब्धि को पहले की अपेक्षा जल्दी हासिल करने को लेकर आशावादी है।

    मारुति सुजुकी इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ हिसाशी ताकेउची ने बताया कि कंपनी ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजनाओं को तेज किया है। वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान कंपनी ने 5 लाख यूनिट की अतिरिक्त मैन्युफैक्चरिंग क्षमता जोड़ी है। इसका उद्देश्य बदलती मांग और ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप उत्पादन को मजबूत करना है।

    ताकेउची ने कहा कि भारतीय ग्राहकों की पसंद और अपेक्षाएं तेजी से बदल रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कंपनी अपने एसयूवी पोर्टफोलियो को और मजबूत करने की तैयारी कर रही है। मारुति सुजुकी अगले पांच से छह वर्षों में सात नई एसयूवी लॉन्च करने की योजना पर काम कर रही है।

    भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग में घरेलू मांग के साथ निर्यात, तकनीकी विकास और उत्पादन क्षमता का महत्व भी लगातार बढ़ रहा है। मारुति सुजुकी ने विनिर्माण, निर्यात, तकनीकी विकास, रोजगार सृजन, कौशल विकास और टिकाऊ मोबिलिटी के माध्यम से देश की आर्थिक विकास यात्रा में योगदान देने की प्रतिबद्धता जताई है।

    कंपनी के अनुसार, भारत के 2047 तक विकसित देश बनने के लक्ष्य में ऑटोमोबाइल उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऐसे में कार बाजार का संभावित विस्तार केवल बिक्री के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्पादन, रोजगार, निर्यात और तकनीकी क्षमताओं को भी प्रभावित कर सकता है।

  • अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के प्रावधान वाले विधेयक को सीनेट की मंजूरी मिलने के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति से जुड़े कई फैसलों पर अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव बढ़ गया है।

    केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने देश को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने और ट्रंप के दबाव में काम करने की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप की बातों को सही या गलत की परवाह किए बिना मानते हैं और अमेरिका की ओर से भारत के खिलाफ फैसले लिए जा रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम के इस विधेयक को सीनेट में 86 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 11 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों को आर्थिक रूप से प्रभावित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों से आने वाले सामान पर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है।

    भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आने वाले प्रमुख देश हैं। इसके अलावा रूस से ऊर्जा आयात करने वाले अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि सीनेट से पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को आगे की विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके प्रावधानों के लागू होने की स्थिति अलग प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

    अमेरिका की ओर से इस कदम के पीछे रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यापार पर दबाव बनाने की रणनीति बताई गई है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूस के तेल और गैस की खरीद से मिलने वाली आय उसकी युद्ध क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। ऐसे में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर आर्थिक दबाव डालकर मॉस्को की आय को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

    विधेयक में रूस से जुड़े प्रतिबंधों के अलावा ईरान पर लागू प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का भी प्रावधान शामिल है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

    भारत में इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठा रहा है। केजरीवाल ने भी इसी राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और रूस से भारत के ऊर्जा आयात को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि अमेरिकी विधेयक आगे की प्रक्रिया में किस रूप में आगे बढ़ता है और भारत समेत प्रभावित देशों के लिए संभावित टैरिफ व्यवस्था को लेकर अमेरिका क्या कदम उठाता है।

  • अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव का असर अब भारत और चीन समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है।

    सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से जुड़े आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से सबसे अधिक तेल और गैस खरीदने वाले पांच देशों को निशाने पर लिया जा सकता है। इनमें भारत और चीन के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि इन देशों पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है।

    दरअसल, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल भारत पर इस प्रस्ताव के तहत कोई नया 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है।

    इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू इसकी अधिकतम टैरिफ सीमा है। पिछले वर्ष पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस पहल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था।

    बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस के पांच सबसे बड़े तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प रखा गया। इससे यह साफ होता है कि प्रस्तावित कानून में अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन हर देश पर अनिवार्य रूप से इतनी ही दर लागू करना जरूरी नहीं होगा।

    कानून बनने की स्थिति में ट्रंप को टैरिफ की दर तय करने में महत्वपूर्ण अधिकार मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक परिस्थितियों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को ध्यान में रखते हुए वह शुल्क में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का निर्णय कर सकते हैं।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि रूस से कच्चे तेल की खरीद पिछले कुछ वर्षों में उसकी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अमेरिकी शुल्क नीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

    प्रस्ताव में रूस के अलावा ईरान को लेकर भी सख्ती का प्रावधान है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    अब सबकी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है, जिसका नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होना है। वहां विधेयक पर चर्चा और मतदान के बाद इसकी आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सीनेट की मंजूरी अंतिम टैरिफ फैसला नहीं है। आने वाले चरणों में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा कि भारत पर वास्तविक शुल्क कितना पड़ सकता है और इसका द्विपक्षीय व्यापार पर कितना असर होगा।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच सीमा मामलों को लेकर बातचीत का एक और महत्वपूर्ण दौर हुआ, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की मौजूदा स्थिति, लंबित सीमा मुद्दों, सीमा प्रबंधन और दोनों देशों के बीच नदी सहयोग से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। बातचीत के दौरान भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों को सामान्य दिशा में आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही भारत ने चीन की अपस्ट्रीम नदी परियोजनाओं से जुड़ी गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और निचले बहाव वाले देशों के हितों का ध्यान रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारत की ओर से सीमा पार नदियों से जुड़े सहयोग को दोबारा सक्रिय करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। भारत ने 2006 में स्थापित एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांस-बॉर्डर रिवर्स की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की जरूरत बताई। इस तंत्र के माध्यम से दोनों देशों के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों से जुड़े तकनीकी और जल संसाधन संबंधी विषयों पर बातचीत होती रही है। भारत ने अपस्ट्रीम परियोजनाओं से संबंधित तकनीकी सूचनाओं को साझा करने को भी महत्वपूर्ण बताया है, ताकि नदियों के प्रवाह और संभावित प्रभावों को लेकर बेहतर समन्वय कायम किया जा सके।

    यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन की ओर से बड़े बांध और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि ऊपरी बहाव में बनने वाली बड़ी जल परियोजनाओं का असर निचले बहाव वाले देशों के हितों पर नहीं पड़ना चाहिए। भारत ने चीन के समक्ष अपनी चिंताओं को रखते हुए कहा है कि अपस्ट्रीम गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता और समय पर जानकारी साझा करना जरूरी है।

    हाइड्रोलॉजिकल डेटा यानी नदियों के जल प्रवाह और जल स्तर से संबंधित आंकड़ों को साझा करना भी दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत का मानना है कि नियमित और विश्वसनीय आंकड़ों की उपलब्धता से बाढ़ जैसी परिस्थितियों से निपटने, जल संसाधन प्रबंधन बेहतर करने और सीमा पार नदियों से जुड़े संभावित जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से भारत ने सीमा पार नदी सहयोग को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    भारत-चीन सीमा मामलों पर बातचीत के लिए गठित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी WMCC की 36वीं बैठक में इन मुद्दों के साथ LAC से जुड़े लंबित विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने गलतफहमी और तनाव की स्थिति से बचने के लिए उपलब्ध कूटनीतिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई। सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों में सुधार के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

    बैठक में सीमा निर्धारण और बॉर्डर मैनेजमेंट से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पिछले वर्ष हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की 24वीं वार्ता के परिणामों को आगे बढ़ाने पर दोनों पक्षों ने विचार किया। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा निर्धारण से जुड़े कुछ मुद्दों पर शुरुआती प्रगति की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए WMCC के तहत विशेषज्ञ समूह गठित करने की दिशा में भी काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में LAC पर शांति बनाए रखने के साथ नदी जल और सीमा पार सहयोग जैसे विषयों पर नियमित संवाद दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। ताजा बातचीत से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष विवादित मुद्दों के साथ-साथ व्यावहारिक सहयोग के क्षेत्रों में भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में सीमा वार्ता और नदी सहयोग से जुड़े तंत्र की अगली बैठकों से यह स्पष्ट होगा कि इन मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कितना आगे बढ़ा जा सकता है।