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  • भारत-ईयू एफटीए से व्यापार और निवेश को नई गति मिलने की उम्मीद, यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ सहयोग को उत्साहित

    भारत-ईयू एफटीए से व्यापार और निवेश को नई गति मिलने की उम्मीद, यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ सहयोग को उत्साहित

    नई दिल्ली ।भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता दोनों पक्षों के कारोबार और निवेश के लिए नए अवसर खोल सकता है। फिनलैंड दूतावास के ट्रेड काउंसलर एंटी हेरलेवी ने कहा कि यूरोपीय कंपनियां भारतीय उद्योगों के साथ अधिक गहराई से सहयोग करने को लेकर उत्साहित हैं और समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ी व्यावहारिक प्रक्रियाएं जल्द पूरी होने की उम्मीद कर रही हैं।

    हेरलेवी के मुताबिक भारत और यूरोप के कारोबारी संबंधों के लिए मौजूदा वर्ष महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार एफटीए पर हस्ताक्षर होने के बाद दोनों क्षेत्रों की कंपनियों के बीच व्यापार विस्तार, निवेश और व्यावसायिक साझेदारी की संभावनाएं बढ़ी हैं। यूरोपीय कारोबारी भारतीय बाजार और यहां के उद्योगों के साथ अधिक नजदीकी से काम करने में रुचि दिखा रहे हैं।

    मुक्त व्यापार समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच कारोबार को आसान बनाना और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करना है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ने की संभावना है। साथ ही भारत और यूरोप के बीच निवेश तथा आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा सहयोग भी मजबूत हो सकता है।

    हेरलेवी ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के संदर्भ में भी भारत और यूरोप के बीच बढ़ते सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। बदलते वैश्विक कारोबारी वातावरण में कंपनियां अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक विविध और टिकाऊ बनाने पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे में भारत और यूरोपीय देशों के बीच औद्योगिक सहयोग दोनों पक्षों के लिए उपयोगी हो सकता है।

    फिनलैंड के ट्रेड काउंसलर ने भारत के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में फिनलैंड के अनुभव को भी महत्वपूर्ण बताया। चक्रीय अर्थव्यवस्था में संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल, उत्पादों का लंबे समय तक उपयोग और कचरे को कम करने पर जोर दिया जाता है। इस मॉडल में इस्तेमाल हो चुकी सामग्री को दोबारा उत्पादन प्रक्रिया में शामिल करने की कोशिश की जाती है।

    उनके अनुसार फिनलैंड और अन्य यूरोपीय देशों ने संसाधनों के पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों के विकास में लंबे समय तक काम किया है। भारत और फिनलैंड की कंपनियों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ने से संसाधनों की खपत कम करने और उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।

    चक्रीय अर्थव्यवस्था का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। संसाधनों का कम इस्तेमाल करने से कंपनियों की लागत घट सकती है और उत्पादन प्रक्रिया में ऊर्जा तथा पानी की खपत भी कम की जा सकती है। साथ ही नई कच्ची सामग्री पर निर्भरता कम होने से उत्पादन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव को घटाने में मदद मिल सकती है।

    हेरलेवी ने इस बदलाव की शुरुआत उत्पाद के डिजाइन चरण से करने पर जोर दिया। उनके अनुसार कंपनियों को ऐसे उत्पाद तैयार करने चाहिए जिनमें कम सामग्री की जरूरत हो, जिनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सके और जिन्हें इस्तेमाल के बाद आसानी से पुनर्चक्रित किया जा सके।

    उन्होंने कहा कि बेहतर योजना और शुरुआती स्तर पर सही उत्पाद डिजाइन चक्रीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बन सकता है। इस दृष्टिकोण से कंपनियां उत्पादन के साथ-साथ उत्पाद के पूरे जीवनचक्र को ध्यान में रखकर काम कर सकती हैं।

    भारत-ईयू एफटीए और टिकाऊ उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से आने वाले समय में दोनों पक्षों के कारोबारी संबंधों को व्यापक आधार मिलने की संभावना है। व्यापार, निवेश, तकनीक और पर्यावरण अनुकूल उत्पादन में साझेदारी बढ़ने से भारतीय और यूरोपीय कंपनियों के लिए नए कारोबारी रास्ते खुल सकते हैं।

  • भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे

    भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देश, भारत (India) और चीन (China), कभी एशियाई सदी (Asian Century) के दो इंजन माने जाते थे. उन्होंने अपनी आर्थिक यात्रा का आधुनिक दौर लगभग एक जैसी आय के स्तर से शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनके रास्ते अलग-अलग हो गए. भारत की आर्थिक वृद्धि दर (India Economic Growth rate) इस समय चीन से तेज नजर आ रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की GDP विकास दर का अनुमान 7.7% लगाया गया था, जबकि चीन के लिए यह लगभग 5% था. हालांकि, यह अंतर सिर्फ एक साल का नहीं है. 2015 के बाद से दोनों देशों की ग्रोथ रफ्तार में लगातार बदलाव देखने को मिला है और 2021 से भारत सालाना आर्थिक वृद्धि के मामले में चीन से आगे रहा है।

    1980 में चीन की GDP ग्रोथ करीब 7.9% थी, जबकि भारत 6.7% की दर से बढ़ रहा था. इसके बाद 1980, 1990 और 2000 के दशकों में चीन ने भारत से काफी तेज आर्थिक विस्तार किया. हालांकि, 2010 के दशक में दोनों देशों की ग्रोथ के बीच का अंतर कम होने लगा. वर्ल्ड बैंक के 2025 के आंकड़ों में भारत की ग्रोथ 7.6% और चीन की करीब 5% रही. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के जुलाई 2026 अपडेट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.7% रहने का अनुमान लगाया गया है।


    कभी बराबर थी दोनों देशों की जीडीपी

    दोनों देशों की आर्थिक यात्रा की शुरुआत पूरी तरह अलग नहीं थी. 1987 में भारत और चीन की नॉमिनल GDP लगभग बराबर थी. PPP यानी Purchasing Power Parity के आधार पर भी 1990 में चीन भारत से बहुत आगे नहीं था. उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत चीन से आगे था. हालांकि, इसके बाद चीन ने बेहद तेज गति से आर्थिक विस्तार किया. 1961 से 2024 के बीच चीन 22 बार 10% से ज्यादा सालाना GDP ग्रोथ दर्ज कर चुका है, जबकि भारत इस अवधि में कभी भी 10% की सालाना वृद्धि दर तक नहीं पहुंचा।

    आर्थिक आकार में चीन अभी बहुत आगे
    तेज ग्रोथ के बावजूद भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के आकार में बड़ा अंतर है. 2025 में चीन की नॉमिनल GDP करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर रही, जबकि भारत की GDP करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर थी. PPP के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था करीब 41 ट्रिलियन डॉलर और भारत की लगभग 17.7 ट्रिलियन डॉलर रही. प्रति व्यक्ति GDP में भी दोनों देशों के बीच बड़ा अंतर है. नॉमिनल आधार पर चीन की प्रति व्यक्ति GDP करीब 13,806 डॉलर थी, जबकि भारत में यह लगभग 2,818 डॉलर रही।


    चीन का मॉडल और भारत की ताकत

    चीन ने दशकों तक इंडस्ट्री, एक्सपोर्ट और बड़े पैमाने पर निवेश के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया. दूसरी ओर, भारत की आर्थिक वृद्धि में घरेलू मांग, सर्विसेज और निजी खपत की बड़ी भूमिका रही है. 2024 में भारत में घरेलू खपत GDP का करीब 61% थी. व्यापक तौर पर देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 70% हिस्सा खपत से जुड़ा है. चीन में घरेलू खपत का GDP में हिस्सा करीब 40% रहा।


    चीन की धीमी रफ्तार के पीछे क्या वजह

    चीन की मौजूदा सुस्ती को सिर्फ एक कमजोर साल के तौर पर नहीं देखा जा सकता. वहां प्रॉपर्टी सेक्टर का संकट, डेवलपर्स पर कर्ज का दबाव, संपत्तियों की गिरती कीमतें, कमजोर उपभोक्ता भरोसा और जनसांख्यिकीय चुनौतियां आर्थिक मांग पर असर डाल रही हैं. इन चुनौतियों के बीच चीन EV, बैटरी, सोलर उपकरण और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पर जोर दे रहा है. हालांकि, इन क्षेत्रों में बढ़ती उत्पादन क्षमता के कारण ओवरकैपेसिटी की चिंता भी बढ़ी है. इससे चीन की बाहरी बाजारों पर निर्भरता और ट्रेड बैरियर का जोखिम बढ़ सकता है।


    भारत के सामने बड़ा मौका, आर्थिक आंकड़े पॉजिटिव

    पोस्ट-कोविड दौर में ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव भारत के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है. कई मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग बेस नहीं, बल्कि बड़े कंज्यूमर मार्केट के तौर पर भी देख रही हैं. लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है. अगर हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग चीन, वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में बनी रहती है और भारत मुख्य रूप से दूसरे देशों में तैयार सामान का बड़ा बाजार बन जाता है, तो इसका फायदा सीमित रह सकता है. भारत के मौजूदा आर्थिक आंकड़े उम्मीद जगाते हैं. देश का कंजम्पशन इंजन मजबूत है, सर्विस सेक्टर टिकाऊ बना हुआ है, और यहां की आबादी व बाजार का आकार ऐसे मौके देता है जो बहुत कम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को मिलते हैं।


    असली चुनौती ग्रोथ को रोजगार और आय में बदलना

    भारत का चीन से तेज बढ़ना निश्चित तौर पर एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन सिर्फ GDP ग्रोथ रेट पूरी तस्वीर नहीं बताती. चीन अब भी आर्थिक आकार, प्रति व्यक्ति आय और औद्योगिक क्षमता के मामले में भारत से काफी आगे है. भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह तेज आर्थिक वृद्धि को ज्यादा रोजगार, बेहतर आय, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और जीवन स्तर में सुधार में बदल पाता है. IMF और वर्ल्ड बैंक के अनुमान फिलहाल भारत की ग्रोथ रफ्तार को चीन से बेहतर दिखा रहे हैं. लेकिन अब सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि क्या भारत चीन से तेजी से विकास कर सकता है. बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत उस बढ़त को इतने लंबे समय तक बनाए रख सकता है जिससे इन दो एशियाई दिग्गजों के बीच पैदा हुए भारी आर्थिक अंतर को खत्म किया जा सके।

  • भारत का 'जैसे को तैसे' वाला जवाब…. पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहरी अतिक्रमण पर चलाया बुलडोजर

    भारत का 'जैसे को तैसे' वाला जवाब…. पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहरी अतिक्रमण पर चलाया बुलडोजर


    नई दिल्ली।
    भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्ते हैं। इस बीच पाकिस्तान (Pakistan) ने फिर कुछ ऐसा कर दिया जिससे भारत (India) को ‘जैस को तैसे’ वाला जवाब देने पड़ा। नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन (Pakistan High Commission) के बाहर बनी कुछ अनधिकृत संरचनाओं और अतिक्रमण को बुलडोजर चलाकर हटा दिया गया है। बताया जा रहा है कि ये ढांचे पाकिस्तानी मिशन के वीजा सेक्शन के पास थे और हाई कमीशन के तय परिसर की सीमा के बाहर बने हुए थे। संबंधित एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए इन्हें साफ कर दिया।

    WION की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हुई इस कार्रवाई को पाकिस्तान की ओर से इस्लामाबाद में भारतीय हाई कमीशन के बाहर की गई हालिया कार्रवाई के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ दिन पहले पाकिस्तानी अधिकारियों ने भारतीय हाई कमीशन के बाहर लगे पार्किंग पोल हटा दिए थे। भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में लंबे समय से चली आ रही तनातनी के बीच दोनों देशों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई पहले भी होती रही है।


    पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर क्या हुआ?

    नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर, खास तौर पर उसके वीजा सेक्शन के आसपास कुछ ऐसी संरचनाएं थीं जो निर्धारित परिसर की सीमा के बाहर थीं। इनको अनधिकृत माना गया और संबंधित एजेंसियों ने इन्हें हटा दिया।

    यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब भारत और पाकिस्तान के बीच राजनयिक रिश्ते बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि कार्रवाई का सीधा कारण अतिक्रमण और निर्धारित सीमा से बाहर बनी संरचनाएं होना बताया गया है, लेकिन इसका समय इसे दोनों देशों के बीच चल रही पारस्परिक कार्रवाई से जोड़कर देखा जा रहा है।


    इस्लामाबाद में भारत के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई थी?

    नई दिल्ली की कार्रवाई से कुछ दिन पहले पाकिस्तान ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय हाई कमीशन के बाहर लगे पार्किंग पोल हटा दिए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में जब भी तनाव बढ़ा है, दोनों देशों ने कई बार एक-दूसरे के खिलाफ समान या जवाबी प्रशासनिक कदम उठाए हैं। इनमें राजनयिक कर्मचारियों की संख्या घटाना, आवाजाही और पहुंच पर पाबंदियां लगाना तथा मिशन से जुड़ी सुविधाओं को सीमित करना जैसे कदम शामिल रहे हैं। इसलिए पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर दिल्ली में हुई ताजा कार्रवाई को भी इसी व्यापक सिलसिले की कड़ी माना जा रहा है।


    भारत-पाकिस्तान के रिश्ते इतने खराब क्यों हैं?

    भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव की सबसे बड़ी वजह सीमा पार आतंकवाद है। पाकिस्तान की जमीन से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन मिलता है। पिछले साल केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के रिश्ते और ज्यादा खराब हो गए। अप्रैल 2025 में हुए इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारतीय कार्रवाई में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकी ढांचों को निशाना बनाया गया।

    इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कई दिनों तक गंभीर सैन्य तनाव रहा। यह संघर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकरावों में से एक माना गया। आखिरकार पाकिस्तान की ओर से संपर्क किए जाने के बाद संघर्ष विराम की स्थिति बनी।


    ऑपरेशन सिंदूर के बाद क्या बदला?

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सामान्य स्थिति वापस नहीं आ सकी है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लगभग ठप हैं और प्रमुख जमीनी सीमा मार्ग भी बंद है। वीजा व्यवस्था भी पहले की तुलना में काफी सीमित कर दी गई है। दोनों देशों में स्थित हाई कमीशन पहले की तुलना में कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। यानी दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संपर्क पूरी तरह खत्म तो नहीं हुआ है, लेकिन रिश्तों में सामान्य गर्मजोशी फिलहाल दिखाई नहीं देती।


    सिंधु जल संधि भी बनी बड़ा मुद्दा

    भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को भी फिलहाल स्थगित रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को विश्वसनीय और पूरी तरह समाप्त करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाता। सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चली आ रही एक महत्वपूर्ण जल समझौता है। ऐसे में इसका स्थगन दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की गंभीरता को दिखाता है।

  • भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म

    भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म


    नई दिल्ली। भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए कच्चा तेल खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है। ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत पिछले दो हफ्तों में करीब 10 डॉलर बढ़कर 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। वहीं, खाड़ी और पश्चिम अफ्रीकी तेल की कीमतों पर भी सप्लाई की कमी के चलते प्रीमियम बढ़ गया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो चुकी है, जबकि वेनेजुएला के क्रूड पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।

    अगर खाड़ी क्षेत्र में तेल की सप्लाई सामान्य नहीं होती और रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट वापस नहीं आती, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत और बढ़ सकती है। इसका असर तेल कंपनियों के मार्जिन के साथ आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो सकता है।

    खाड़ी का तेल ब्रेंट से करीब 10 डॉलर महंगा

    ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, बाजार में कच्चे तेल की कमी का फायदा ट्रेडर्स उठा रहे हैं। भारतीय रिफाइनरियों को खाड़ी देशों से तेल खरीदने के लिए स्पॉट मार्केट का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जा रहा है।

    खाड़ी के सप्लायर दुबई-ओमान बेंचमार्क पर करीब 3 से 4 डॉलर प्रति बैरल अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट से करीब 6 से 7 डॉलर महंगा है। इस तरह भारतीय रिफाइनरों के लिए खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट की तुलना में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा पड़ रहा है।

    सऊदी अरामको की आधिकारिक सेल प्राइस दुबई-ओमान बेंचमार्क से 1.5 से 3 डॉलर नीचे जरूर हैं, लेकिन लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण टर्म डील के तहत मिलने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे भारतीय रिफाइनरियों की स्पॉट मार्केट पर निर्भरता बढ़ गई है।

    जहाजों की कमी ने बढ़ाई लागत

    संघर्ष वाले क्षेत्रों से कच्चा तेल लाने में जहाजों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बन गई है। जोखिम वाले समुद्री रास्तों से तेल पहुंचाने के लिए ट्रेडर्स अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। टर्म कॉन्ट्रैक्ट में तेल सस्ता होने के बावजूद भारत तक उसे पहुंचाने के लिए पर्याप्त जहाज नहीं मिलना रिफाइनरों की लागत बढ़ा रहा है।

    पश्चिम अफ्रीकी क्रूड भी महंगा

    खाड़ी के बाद पश्चिम अफ्रीका से मिलने वाला कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगा हो गया है। इसके चलते कंपनियां अब वैकल्पिक स्रोतों पर नजर डाल रही हैं। अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है।

    रूसी तेल की सबसे बड़ी बढ़त खत्म

    कुछ समय पहले तक रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए सबसे आकर्षक विकल्पों में था। इसकी बड़ी वजह उस पर मिलने वाली भारी छूट थी। अब यह डिस्काउंट लगभग खत्म हो चुका है। वेनेजुएला के तेल पर मिलने वाली छूट भी काफी कम हो गई है।

    इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है और दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल भी पहले जैसा उपलब्ध नहीं है।

    अमेरिकी प्रतिबंध बढ़े तो मुश्किल और बढ़ेगी

    भारतीय तेल कंपनियों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी बड़ा जोखिम हैं। अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो भारत के लिए रूसी क्रूड खरीदना और मुश्किल हो सकता है। ऐसे में रिफाइनरियों को दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है।

  • भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश, वैश्विक उत्पादन में करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज

    भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश, वैश्विक उत्पादन में करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी दर्ज

    नई दिल्ली ।भारत का मत्स्य और जलीय कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरकार के अनुसार भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है और वैश्विक मत्स्य उत्पादन में करीब 8 प्रतिशत योगदान करता है। जलीय कृषि उत्पादन के मामले में भी भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि झींगा उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में देश दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है।

    मत्स्य क्षेत्र का विस्तार सीधे तौर पर बड़ी आबादी की आजीविका से जुड़ा हुआ है। सरकार के मुताबिक देश में करीब तीन करोड़ मछुआरों और मत्स्य किसानों की आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर है। मछली पकड़ने और उत्पादन के अलावा प्रसंस्करण, परिवहन, भंडारण, विपणन और निर्यात जैसी गतिविधियों के जरिए भी मत्स्य मूल्य शृंखला में रोजगार के बड़े अवसर पैदा होते हैं।

    सरकार ने बताया कि वर्ष 2015 से अब तक मत्स्य क्षेत्र के सतत विकास और आधुनिकीकरण के लिए 39,272 करोड़ रुपये का संचयी निवेश किया गया है। यह निवेश ब्लू रिवोल्यूशन, फिशरीज एंड एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना जैसी विभिन्न पहलों के माध्यम से किया गया है।

    इन योजनाओं का उद्देश्य मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्र में आधुनिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी मूल्य शृंखला को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि मछुआरों और मत्स्य किसानों को बेहतर बाजार, तकनीक और आय के अवसर उपलब्ध हो सकें।

    मत्स्य क्षेत्र में युवाओं और उद्यमशील किसानों की भागीदारी को भी सरकार महत्वपूर्ण मान रही है। आधुनिक जलीय कृषि तकनीक, डिजिटल ट्रेसबिलिटी, कोल्ड चेन प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में नई तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इससे पारंपरिक मत्स्य गतिविधियों को अधिक संगठित और बाजार आधारित बनाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।

    सरकार का मानना है कि युवाओं की सक्रिय भागीदारी भारत की ब्लू इकोनॉमी को मजबूती दे सकती है। मत्स्य उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और निर्यात क्षमता बढ़ने से ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है।

    प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फरवरी 2024 में मंजूरी दी थी। यह प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत केंद्रीय क्षेत्र की उप-योजना है और वित्त वर्ष 2023-24 से 2026-27 तक चार वर्षों के लिए लागू की जा रही है। इसके लिए करीब 6,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

    यह योजना देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है। इसका उद्देश्य वित्तीय और तकनीकी सहायता के जरिए मत्स्य क्षेत्र की संरचनात्मक कमियों को दूर करना, संस्थागत सुधारों को बढ़ावा देना, उत्पादकता बढ़ाना और आधुनिक तकनीक को अपनाने में मदद करना है।

    योजना के तहत बाजार तक पहुंच मजबूत करने और मत्स्य किसानों की आय बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उत्पादन के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बेहतर भंडारण और कोल्ड चेन सुविधाओं का विस्तार भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    स्वतंत्रता दिवस समारोह के बाद मत्स्य पालन विभाग ने योजना के लाभार्थियों और उनके जीवनसाथियों के साथ विशेष संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। इसका उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र से जुड़े लोगों के योगदान को सम्मानित करना और सरकारी योजनाओं से मिले बदलावों को सामने लाना था। भारत की बढ़ती उत्पादन क्षमता, आधुनिक तकनीक और निर्यात संभावनाओं को देखते हुए मत्स्य क्षेत्र आने वाले वर्षों में देश की ब्लू इकोनॉमी और ग्रामीण रोजगार का अहम आधार बन सकता है।

  • भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण अधिकारियों की बैठक, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु सहयोग के लिए साझा रणनीति पर बनेगी सहमति

    नई दिल्ली ।भारत सोमवार 17 अगस्त को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह यानी ईडब्ल्यूजी के वरिष्ठ अधिकारियों तथा जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की बैठक की मेजबानी करेगा। भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित इस बैठक में पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच चर्चा होगी।

    बैठक की शुरुआत वरिष्ठ अधिकारियों के उद्घाटन सत्र से होगी। इसके बाद ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह और जलवायु परिवर्तन तथा सतत विकास पर संपर्क समूह की प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श किया जाएगा। चर्चा का प्रमुख उद्देश्य सदस्य देशों के बीच पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर साझा समझ विकसित करना और सहयोग को और मजबूत करना होगा।

    इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मंगलवार को ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की 12वीं बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें सदस्य देशों के पर्यावरण मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भाग लेंगे। दोनों बैठकों के माध्यम से पर्यावरणीय चुनौतियों पर सामूहिक दृष्टिकोण तैयार करने का प्रयास किया जाएगा।

    भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए इस बार की व्यापक थीम ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रखी गई है। पर्यावरण क्षेत्र में इस थीम के तहत सदस्य देशों के बीच ऐसे क्षेत्रों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर रहेगा, जिनका संबंध जलवायु परिवर्तन से निपटने, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास से है।

    बैठक में अंतिम दस्तावेज से जुड़े संभावित परिणामों पर भी चर्चा होगी। इसके अलावा पर्यावरण से संबंधित अन्य प्राथमिक विषयों पर विचार किया जाएगा। इन चर्चाओं के जरिए ब्रिक्स देशों के बीच साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक कार्रवाई को मजबूत करने की दिशा में सहमति बनाने का प्रयास किया जाएगा।

    ब्रिक्स पर्यावरण कार्य समूह की स्थापना वर्ष 2015 में मॉस्को में हुई पहली ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियमित रूप से सहयोग करने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था। इसके माध्यम से देश अपने अनुभव साझा करने, प्रभावी कार्यप्रणालियों को एक-दूसरे तक पहुंचाने और संयुक्त पर्यावरणीय कार्रवाई को मजबूत करने पर काम करते रहे हैं।

    वहीं जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर संपर्क समूह की स्थापना वर्ष 2024 में की गई थी। इसका उद्देश्य ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर सहयोग के लिए एक व्यवस्थित ढांचा तैयार करना है। यह समूह जलवायु संबंधी प्राथमिकताओं पर संवाद और समन्वय को बढ़ावा देने की दिशा में काम करता है।

    नई दिल्ली में होने वाली बैठक ऐसे समय आयोजित हो रही है जब जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास वैश्विक नीति विमर्श के प्रमुख विषय बने हुए हैं। ब्रिक्स देशों के बीच इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से साझा नीतिगत अनुभवों और व्यावहारिक उपायों के आदान-प्रदान को गति मिलने की उम्मीद है। बैठकों में होने वाली चर्चा आगे की सामूहिक प्राथमिकताओं और सहयोग के क्षेत्रों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    दक्षिण एशियाई देशों में भारत की वैश्विक छवि पर प्यू रिसर्च सर्वे, श्रीलंका में भारत के प्रति सर्वाधिक सकारात्मक दृष्टिकोण

    नई दिल्ली ।अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा दक्षिण एशिया के चार प्रमुख देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में किए गए एक ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े सामने आए हैं। इस सर्वेक्षण में अंतरराष्ट्रीय संबंधों, पड़ोसी देशों की धारणाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर वयस्कों की राय ली गई। रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका दक्षिण एशिया का एकमात्र ऐसा मुल्क उभरकर सामने आया है, जहां के नागरिक भारत के प्रति अत्यधिक सकारात्मक रुख रखते हैं।

    सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, श्रीलंका में 79 प्रतिशत लोगों ने भारत के पक्ष में अपनी राय दी है, जबकि 63 प्रतिशत श्रीलंकाई नागरिकों ने भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी देश माना है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में केवल सात प्रतिशत लोगों ने ही भारत के प्रति सकारात्मक भावना व्यक्त की। बांग्लादेश में 42 प्रतिशत लोगों का रुख भारत के प्रति सकारात्मक पाया गया, हालांकि वहां भारत को खतरा मानने वालों की संख्या भी उल्लेखनीय रही।

    रिपोर्ट में बांग्लादेश और भारत के बीच द्विपक्षीय धारणाओं में आई गिरावट को भी रेखांकित किया गया है। वर्तमान में केवल 25 प्रतिशत भारतीय बांग्लादेश के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं। पिछले दो वर्षों के दौरान दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर धारणा में कमी दर्ज की गई है। ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, वर्ष 2024 में जहां 57 प्रतिशत बांग्लादेशी भारत के पक्ष में थे, वहीं भारत में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

    भारत और पाकिस्तान के बीच पारस्परिक संबंधों पर सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि दोनों देशों की बहुसंख्यक आबादी एक-दूसरे को अपने लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानती है। वहीं वैश्विक सहयोगियों के प्रश्न पर 36 प्रतिशत भारतीयों ने रूस को अपना सबसे प्रमुख और भरोसेमंद सहयोगी बताया, जबकि 16 प्रतिशत ने अमेरिका का नाम लिया। मध्य प्रदेश सहित देश भर के विदेश नीति विशेषज्ञों की नजरें इस रणनीतिक रिपोर्ट पर टिकी हुई हैं।

    वैश्विक स्तर पर भारत के प्रभाव को लेकर अमेरिका में किए गए अध्ययन में 54 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना है कि वैश्विक मंच पर भारत का प्रभाव स्थिर बना हुआ है। वहीं 30 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि भारत का प्रभाव वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ा है। राजनीतिक आधार पर अमेरिकी डेमोक्रेट्स के बीच भारत के प्रति समर्थन अधिक देखने को मिला। यह सर्वेक्षण दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक और क्षेत्रीय समीकरणों की एक स्पष्ट झलक पेश करता है।

  • भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    नई दिल्ली । भारत की वैश्विक छवि को लेकर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में अलग-अलग देशों के लोगों की राय में बड़ा अंतर सामने आया है। 36 देशों में किए गए अध्ययन के मुताबिक भारत के प्रति दुनिया की औसत सकारात्मक धारणा 45 प्रतिशत रही, जबकि 41 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक राय व्यक्त की। आंकड़े बताते हैं कि भारत की लोकप्रियता कई देशों में मजबूत है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसकी छवि को लेकर मतभेद भी स्पष्ट हैं।

    सर्वे में भारत के पड़ोसी देशों की राय सबसे ज्यादा चर्चा में रही। श्रीलंका में भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का अनुपात 79 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा भारत के लिए सर्वे में शामिल देशों के बीच सबसे मजबूत सकारात्मक प्रतिक्रियाओं में शामिल है। इसके विपरीत पाकिस्तान में केवल 7 प्रतिशत लोगों ने भारत के बारे में सकारात्मक राय व्यक्त की।

    भारत की बेहतर छवि केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रही। केन्या और ब्रिटेन में भी लगभग दस में सात लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक रुख जताया। जर्मनी, इजरायल, इटली, स्वीडन, जापान और थाईलैंड में भी भारत को लेकर सकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही।

    यूरोपीय देशों में भारत की छवि में पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले सुधार भी दर्ज किया गया है। ब्रिटेन में एक वर्ष के दौरान भारत के प्रति सकारात्मक राय में 11 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। जर्मनी में सकारात्मक धारणा छह प्रतिशत अंक बढ़ी। फ्रांस में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय 2023 के 39 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।

    श्रीलंका में भारत की छवि में विशेष सुधार दिखाई दिया। वहां 2024 के मुकाबले भारत के प्रति सकारात्मक राय में 14 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज की गई। इससे दोनों देशों के बीच सामाजिक और क्षेत्रीय स्तर पर भारत की स्वीकार्यता की एक मजबूत तस्वीर सामने आती है।

    हालांकि अमेरिका में भारत को लेकर तस्वीर अपेक्षाकृत कमजोर रही। वहां 45 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय व्यक्त की, जबकि 50 प्रतिशत लोगों की राय नकारात्मक रही। यह भारत के लिए 2008 के बाद अमेरिका में दर्ज सबसे कम सकारात्मक रेटिंग बताई गई है। वर्ष 2023 में अमेरिका में भारत को लेकर 51 प्रतिशत सकारात्मक राय सामने आई थी।

    अमेरिका में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी भारत को लेकर अंतर दिखाई दिया। डेमोक्रेट समर्थकों में 50 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि रिपब्लिकन समर्थकों में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत रहा। इससे अमेरिकी समाज में भारत की छवि को लेकर राजनीतिक विभाजन का संकेत मिलता है।

    सर्वे में भारत के वैश्विक प्रभाव को लेकर भी अमेरिकी नागरिकों से सवाल किया गया। 54 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने माना कि दुनिया में भारत का प्रभाव लगभग पहले जैसा ही है। वहीं 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 13 प्रतिशत ने इसके कम होने की बात कही।

    तुर्किये में भारत के प्रति सकारात्मक राय केवल 15 प्रतिशत रही। वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत था। इजरायल में भी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर राय में अंतर सामने आया, जहां दक्षिणपंथी विचार रखने वालों में सकारात्मक धारणा 68 प्रतिशत और वामपंथी विचार रखने वालों में 46 प्रतिशत रही।

    कुल मिलाकर सर्वे भारत की वैश्विक छवि की मिश्रित तस्वीर पेश करता है। जहां श्रीलंका, ब्रिटेन, जर्मनी और कई अन्य देशों में भारत के प्रति सकारात्मक धारणा मजबूत हुई है, वहीं पाकिस्तान, तुर्किये और अमेरिका जैसे देशों में अलग रुझान दिखाई देता है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता एक समान नहीं है और अलग-अलग देशों में उसकी छवि क्षेत्रीय संबंधों, राजनीतिक परिस्थितियों और वैश्विक धारणा के अनुसार बदल रही है।

  • अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 40 से अधिक देशों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए कुछ तीसरे देशों के रास्ते अपने सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचा सकता है। इस प्रक्रिया को ट्रांसशिपमेंट के तौर पर चिन्हित किया गया है।

    अमेरिकी रिपोर्ट में भारत, कनाडा और यूरोपीय संघ के अलावा ताइवान, मैक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम सहित कई व्यापारिक साझेदारों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में कुछ ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां चीन से आने वाले सामान की मामूली प्रोसेसिंग, पैकेजिंग या लेबल बदलकर उसके मूल स्रोत को अलग तरीके से प्रदर्शित किया जा सकता है।

    ट्रंप प्रशासन के मुख्य व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रांसशिपमेंट की गतिविधियों में 2018 के बाद बढ़ोतरी देखने को मिली। इसी अवधि में अमेरिका ने चीन के कथित अनुचित व्यापारिक तौर-तरीकों के खिलाफ सेक्शन 301 के तहत अतिरिक्त टैरिफ लागू किए थे। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इन शुल्कों के प्रभाव से बचने के लिए चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए भेजने की कोशिशें बढ़ी हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामलों में चीन से तैयार या निर्मित वस्तुओं को किसी तीसरे देश में भेजकर उनका री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग, री-इनवॉइसिंग या मामूली स्तर का प्रसंस्करण किया जा सकता है। इसके बाद सामान को उस देश का उत्पाद दिखाकर अमेरिका में भेजने की कोशिश की जा सकती है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इस तरह सामान पर लागू होने वाले टैरिफ में अंतर का लाभ उठाया जा सकता है।

    अमेरिका ने इस पूरी व्यवस्था को अवैध ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क से जोड़ते हुए कहा है कि इससे व्यापार नियमों और सीमा शुल्क व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि चीनी कंपनियां ऐसे देशों और क्षेत्रों का इस्तेमाल कर सकती हैं जहां श्रम लागत अपेक्षाकृत कम हो, सीमा शुल्क निगरानी सीमित हो या मुक्त व्यापार क्षेत्रों में प्रक्रियात्मक लचीलापन उपलब्ध हो।

    इस मामले में अमेरिकी सरकार अब तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस और यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन मिलकर सीमा पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करना और यह पता लगाना है कि कहीं किसी वस्तु को तीसरे देश के माध्यम से भेजकर उसके वास्तविक मूल को छिपाने का प्रयास तो नहीं किया गया।

    भारत का नाम इस सूची में आने से अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर भी चर्चा बढ़ सकती है। हालांकि किसी देश का रिपोर्ट में उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां से होने वाला प्रत्येक व्यापार या शिपमेंट गैरकानूनी है। अमेरिकी प्रशासन ने मुख्य रूप से संभावित जोखिम और निगरानी की जरूरत पर जोर दिया है।

    ट्रंप प्रशासन का यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में टैरिफ, सप्लाई चेन और चीन से जुड़े आयात को लेकर अमेरिकी नीतियां लगातार सख्त हो रही हैं। आने वाले समय में अमेरिकी सीमा शुल्क जांच और एआई आधारित निगरानी बढ़ने से उन देशों के निर्यातकों पर भी अतिरिक्त जांच का दबाव पड़ सकता है, जिनका नाम जोखिम वाले व्यापारिक साझेदारों में शामिल किया गया है।

  • जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    नई दिल्ली । देश में जनगणना 2027 की प्रक्रिया का दूसरा चरण 17 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। इस चरण में पहली बार आजादी के बाद देशव्यापी स्तर पर जातिगत आंकड़े जुटाए जाएंगे। केंद्र सरकार ने जनगणना के लिए पूछे जाने वाले 40 सवालों की सूची अधिसूचित कर दी है। नागरिकों से उनकी सामाजिक, जनसांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति से जुड़ी विभिन्न जानकारियां दर्ज की जाएंगी।

    जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना होगी, जबकि स्वतंत्रता के बाद यह आठवीं जनगणना के रूप में आयोजित की जा रही है। इस बार की जनगणना कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसमें जाति से संबंधित जानकारी भी आधिकारिक तौर पर दर्ज की जाएगी। इससे देश में विभिन्न सामाजिक समूहों की जनसंख्या से जुड़े आंकड़े सामने आने की संभावना है।

    निर्धारित 40 सवालों में नागरिकों से जाति, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी। इसके अलावा कोविड-19 टीकाकरण से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जनगणना के दौरान प्रत्येक परिवार और व्यक्ति से निर्धारित प्रश्नों के आधार पर जानकारी एकत्र की जाएगी।

    जनगणना दो चरणों में पूरी की जा रही है। पहले चरण में मकानों और आवास से संबंधित विवरण जुटाने की प्रक्रिया रखी गई है। दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक की जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी दर्ज की जाएगी। इसी दूसरे चरण में जातिगत आंकड़ों को भी शामिल किया गया है।

    इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से संचालित किया जा रहा है। मोबाइल उपकरणों के माध्यम से आंकड़े दर्ज करने के साथ नागरिकों को स्वयं अपनी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने की सुविधा भी दी गई है। इससे कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता कम करने और आंकड़ों को डिजिटल रूप में संग्रहित करने में मदद मिलेगी।

    पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों के लिए जनगणना का कार्यक्रम अलग रखा गया है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले एवं असमान क्षेत्रों में जनगणना का दूसरा चरण 1 सितंबर से 30 सितंबर तक चलेगा। इन क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए समयसीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इन क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को 17 अगस्त से 31 अगस्त तक स्वयं ऑनलाइन जानकारी दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध रहेगी। वहीं देश के अन्य हिस्सों में जनसंख्या की गणना फरवरी 2027 में की जाएगी। इस तरह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जनगणना का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है।

    जनगणना 2027 की प्रक्रिया में जातिगत जानकारी शामिल किए जाने को सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे सरकार के पास विभिन्न सामाजिक वर्गों की जनसंख्या से संबंधित अधिक विस्तृत आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे। इन आंकड़ों का उपयोग भविष्य में नीतियों और योजनाओं के निर्माण में किया जा सकता है।

    यह जनगणना मूल रूप से वर्ष 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसकी प्रक्रिया निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो सकी। अब कई वर्षों की देरी के बाद जनगणना की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन स्व-पंजीकरण और पहली बार जातिगत आंकड़ों का समावेश इस जनगणना को पिछली जनगणनाओं से अलग बनाता है।