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  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।

  • दिल्ली में शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर भड़का बांग्लादेश, भारत के सामने जताई कड़ी नाराजगी और प्रत्यर्पण की मांग दोहराई

    दिल्ली में शेख हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर भड़का बांग्लादेश, भारत के सामने जताई कड़ी नाराजगी और प्रत्यर्पण की मांग दोहराई


    नई दिल्ली ।
    बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच राजनीतिक तनाव एक बार फिर चर्चा में आ गया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने हसीना को भारत में मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखने का अवसर दिए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। ढाका ने आरोप लगाया कि हसीना और उनके सहयोगियों ने भारत की जमीन से बांग्लादेश और उसके लोगों के खिलाफ जहरीली बयानबाजी की। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस कार्यक्रम को लेकर उसने पहले ही भारत सरकार के सामने अपनी चिंता रखी थी, इसके बावजूद प्रेस कॉन्फ्रेंस होने दी गई।

    बांग्लादेश सरकार ने हसीना के बयानों को इतिहास की धारा को पलटने की नाकाम कोशिश करार दिया। ढाका का कहना है कि जिस समय बांग्लादेश में जुलाई क्रांति की दूसरी बरसी मनाई जा रही थी, उसी समय भारत से हसीना का मीडिया को संबोधित करना वहां के लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला कदम है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने इसे देश की संप्रभुता और जुलाई आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के प्रति अपमान बताया। सरकार ने संयुक्त राष्ट्र की ओर से जुलाई-अगस्त 2024 की हिंसा और नागरिकों की मौत से जुड़े तथ्यों का भी हवाला दिया।

    ढाका ने हसीना और उनके सहयोगियों के बयानों को खारिज करते हुए कहा कि बांग्लादेश के लोग देश को दोबारा उस दौर में नहीं ले जाना चाहते, जिसे वह फासीवाद का अंधेरा दौर बताता है। बांग्लादेश सरकार ने यह भी कहा कि देश किसी दूसरे राष्ट्र का क्लाइंट स्टेट नहीं बनेगा। इस बयान से स्पष्ट है कि हसीना के राजनीतिक भविष्य और उनके भारत में रहने को लेकर ढाका का रुख अभी भी बेहद सख्त है।

    बांग्लादेश ने भारत के साथ संबंधों को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह भारत के साथ संप्रभु समानता, आपसी सम्मान और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप के आधार पर रचनात्मक संबंध चाहता है। हालांकि, इसी के साथ ढाका ने हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा फिर उठा दिया। बांग्लादेश ने कहा कि वर्ष 2013 में दोनों देशों के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते के तहत वह शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कई बार कर चुका है, लेकिन भारत की ओर से उसकी मांग पर अभी तक स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।

    बांग्लादेश सरकार के मुताबिक, हसीना को भारत में खुले तौर पर मीडिया से बातचीत का अवसर मिलना वहां के लोगों के लिए बेहद पीड़ादायक है। ढाका ने आशंका जताई कि इस तरह की घटनाएं भारत-बांग्लादेश संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। दूसरी ओर, भारत में मौजूद हसीना की सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर बांग्लादेश की आपत्ति इस बात का संकेत है कि दोनों देशों के बीच उनके प्रत्यर्पण का मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।

    शेख हसीना को लेकर बांग्लादेश का रुख आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। ढाका एक तरफ भारत के साथ बेहतर और सम्मानजनक संबंधों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ हसीना के प्रत्यर्पण और दिल्ली में उनकी सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर लगातार दबाव बना रहा है। ऐसे में दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद राजनीतिक मतभेदों को एक बार फिर सामने ला दिया है।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    नई दिल्ली । भारत और चीन ने सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र यानी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक में सीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। नई दिल्ली में 6 अगस्त को आयोजित बैठक में दोनों देशों ने सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, मौजूदा तंत्र को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग से जुड़े विषयों पर विचार साझा किए। वार्ता के दौरान लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर मौजूदा स्थिति की भी समीक्षा की गई।

    बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई चीन के विदेश मंत्रालय के बाउंड्री और ओशनिक अफेयर्स डिपार्टमेंट की महानिदेशक होउ यांकी ने की। दोनों पक्षों के बीच बातचीत को स्पष्ट और व्यावहारिक बताया गया। चर्चा का मुख्य उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने और लंबित मुद्दों के समाधान के लिए संवाद को आगे बढ़ाना रहा।

    भारत और चीन ने इस बात पर जोर दिया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। एलएसी पर किसी भी तरह की गलतफहमी या गलत आकलन को रोकने के लिए दोनों पक्षों ने मौजूदा राजनयिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई।

    इन माध्यमों में डब्ल्यूएमसीसी के अलावा स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकें और पहले से निर्धारित अन्य संवाद तंत्र शामिल हैं। दोनों देशों का मानना है कि नियमित बातचीत के जरिए सीमा पर पैदा होने वाली परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और लंबित मामलों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

    बैठक में 24वें विशेष प्रतिनिधि स्तर के दौर की वार्ता के परिणामों के बाद सीमा से जुड़े विषयों पर आगे चर्चा की गई। इसमें सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, संस्थागत तंत्र के निर्माण और सीमा पार सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। दोनों पक्षों ने इन क्षेत्रों में आपसी संवाद और समन्वय बनाए रखने की जरूरत पर सहमति जताई।

    भारत ने सीमा पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर के तंत्र की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की आवश्यकता भी दोहराई। भारतीय पक्ष ने विशेष रूप से चीन की ओर से ऊपरी क्षेत्रों में प्रस्तावित या संचालित परियोजनाओं से जुड़े तकनीकी विवरण साझा करने के महत्व पर जोर दिया। सीमा पार नदियों से जुड़े विषय भारत के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में हाल के समय में लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने से जुड़े कुछ कदम भी उठाए गए हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा की दोबारा शुरुआत और दोनों देशों के बीच नागरिक विमानन संपर्क बहाल करना शामिल है। इन कदमों को दोनों देशों के बीच जनस्तरीय संपर्क सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विदेश मंत्रालय ने भी भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद जताई है। मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए लोगों के बीच संपर्क बेहतर करने वाले कदम उठाए जा रहे हैं। भारत का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक माहौल मजबूत हो सकता है।

    इस बीच चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीयों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री बढ़ने को लेकर भी भारतीय समुदाय की चिंताएं सामने आई हैं। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के एक खुले संवाद कार्यक्रम में समुदाय के सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया था। सीमा संबंधी बातचीत के साथ लोगों के बीच संपर्क और आपसी विश्वास मजबूत करना भी भारत-चीन संबंधों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।

  • ऊर्जा संकट से जूझ रहे बांग्लादेश ने भारत से मांगी अतिरिक्त डीजल आपूर्ति, पाइपलाइन के जरिए बढ़ेगा ईंधन सहयोग

    ऊर्जा संकट से जूझ रहे बांग्लादेश ने भारत से मांगी अतिरिक्त डीजल आपूर्ति, पाइपलाइन के जरिए बढ़ेगा ईंधन सहयोग


    नई दिल्ली । बांग्लादेश में बिजली और गैस की कमी के बीच ऊर्जा संकट लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। इस स्थिति से निपटने के लिए बांग्लादेश ने भारत से सीमा पार पाइपलाइन के जरिए डीजल की अतिरिक्त आपूर्ति करने की अपील की है। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में बिजली और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के साथ ईंधन सुरक्षा को मजबूत करने पर चर्चा हुई।

    बांग्लादेश के पावर, एनर्जी और मिनरल रिसोर्सेज मंत्री इकबाल हसन महमूद ने भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी के साथ बैठक के बाद ऊर्जा सहयोग को चर्चा के प्रमुख मुद्दों में शामिल बताया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश पहले से ही पाइपलाइन के माध्यम से भारत से डीजल आयात करता है और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उसने भारत से इसकी आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध किया है।

    बांग्लादेश इस समय बिजली उत्पादन के लिए जरूरी ईंधन और गैस की उपलब्धता को लेकर दबाव का सामना कर रहा है। ऊर्जा की मांग पूरी करने के लिए डीजल की पर्याप्त आपूर्ति महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में भारत से अतिरिक्त ईंधन मिलने पर बांग्लादेश की घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है और बिजली उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच ऊर्जा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार महत्वपूर्ण हुआ है। दोनों देशों के बीच बिजली के आदान-प्रदान के साथ ईंधन आपूर्ति और सीमा पार ऊर्जा संपर्क से जुड़ी व्यवस्थाएं भी विकसित हुई हैं। इसी सहयोग के तहत भारत से बांग्लादेश तक डीजल पहुंचाने के लिए सीमा पार पाइपलाइन का इस्तेमाल किया जाता है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने बिजली और ऊर्जा क्षेत्र में आपसी सहयोग को और मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया। बांग्लादेश की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि भारत के साथ ऊर्जा संबंध दोनों देशों के साझा हितों से जुड़े हैं। पड़ोसी देशों के बीच ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करने के लिए सहयोग को आगे बढ़ाना दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन के जरिए डीजल आपूर्ति ने बांग्लादेश की ईंधन जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाई है। अप्रैल की शुरुआत में इस पाइपलाइन के माध्यम से भारत से बांग्लादेश को करीब 5,000 टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति शुरू हुई थी। उस समय पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच ईंधन आयात पर दबाव बढ़ने की आशंका थी। ऐसे माहौल में पाइपलाइन के जरिए आपूर्ति को बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।

    मौजूदा बिजली और गैस संकट के बीच बांग्लादेश की अतिरिक्त डीजल मांग से दोनों देशों के ऊर्जा संबंधों का महत्व और बढ़ गया है। यदि भारत की ओर से अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराई जाती है, तो इससे बांग्लादेश को बिजली उत्पादन और परिवहन समेत कई क्षेत्रों में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

    ऊर्जा सहयोग के साथ दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध भी इस समय चर्चा के केंद्र में हैं। सीमा पार बिजली और ऊर्जा संपर्क को मजबूत करने से क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को गति देने की संभावना है। बांग्लादेश की ताजा अपील ऐसे समय आई है जब वह अपनी तत्काल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भरोसेमंद ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है।

  • प्लास्टिक के 10-20 रुपये के नोट कब आएंगे? आरबीआई गवर्नर ने फील्ड ट्रायल और लॉन्च प्लान पर दी अहम जानकारी

    प्लास्टिक के 10-20 रुपये के नोट कब आएंगे? आरबीआई गवर्नर ने फील्ड ट्रायल और लॉन्च प्लान पर दी अहम जानकारी

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक देश में पॉलिमर यानी प्लास्टिक बैंक नोटों को प्रचलन में लाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल 10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर नोटों का फील्ड ट्रायल जारी है। इन परीक्षणों के नतीजों का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद ही इन्हें बड़े स्तर पर बाजार में उतारने का अंतिम फैसला लिया जाएगा। यदि सभी परीक्षण सफल रहते हैं तो वित्त वर्ष 2027-28 तक इन नोटों को चरणबद्ध तरीके से जारी किए जाने की संभावना है।

    आरबीआई के अनुसार, पॉलिमर नोटों का परीक्षण देश के विभिन्न क्षेत्रों और अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ये नोट भारतीय मौसम, लगातार उपयोग और दैनिक लेनदेन की परिस्थितियों में कितने टिकाऊ और प्रभावी साबित होते हैं। परीक्षण के दौरान नोटों की मजबूती, घिसाव, सुरक्षा और परिचालन संबंधी कई पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है।

    केंद्रीय बैंक का मानना है कि पॉलिमर नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक समय तक उपयोग योग्य रहते हैं। विशेष रूप से 10 और 20 रुपये जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों का लेनदेन सबसे अधिक होता है, जिसके कारण वे जल्दी खराब हो जाते हैं। ऐसे में पॉलिमर सामग्री से बने नोट लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं और बार-बार नए नोट छापने की आवश्यकता भी कम हो सकती है। इससे नोटों की छपाई और प्रतिस्थापन पर होने वाले खर्च में भी कमी आने की उम्मीद है।

    सरकार पहले ही 10 रुपये और 20 रुपये के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे चुकी है। पायलट परियोजना के तहत दोनों मूल्यवर्ग के बड़ी संख्या में नोट जारी कर विभिन्न परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता का परीक्षण किया जा रहा है। इन परीक्षणों से प्राप्त आंकड़ों और अनुभवों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

    पॉलिमर नोटों में आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का भी उपयोग किया जाएगा। इनमें पारदर्शी विंडो, उन्नत सुरक्षा फीचर और नकली नोटों की पहचान आसान बनाने वाली तकनीक शामिल हो सकती है। इससे जालसाजी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही नोटों की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों में सुधार होगा।

    आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कागजी मुद्रा को पूरी तरह बंद करने की कोई योजना नहीं है। पॉलिमर नोट जारी होने के बाद भी मौजूदा कागजी नोट कानूनी रूप से मान्य रहेंगे और दोनों प्रकार की मुद्रा समानांतर रूप से प्रचलन में रहेगी। इससे लोगों को नए नोटों को अपनाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा और नकदी व्यवस्था पर किसी प्रकार का अचानक प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फील्ड ट्रायल सफल रहता है तो भारत भी उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जहां पॉलिमर मुद्रा का व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे नोटों की उम्र बढ़ाने, नकली मुद्रा पर अंकुश लगाने और नकदी प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल सभी की नजर फील्ड ट्रायल के परिणामों और आरबीआई के अंतिम निर्णय पर बनी हुई है।

  • मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    मार्क जुकरबर्ग ने भारत सरकार से मांगी माफी, सीएसएएम, डीपफेक और सिस्टम एरर को लेकर जताया खेद

    नई दिल्ली । मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम), डीपफेक कंटेंट और ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी त्रुटियों को लेकर भारत सरकार से माफी मांगी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कंपनी ने कुछ मामलों में हुई चूक पर खेद व्यक्त करते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन को लेकर सरकार लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है।

    जानकारी के अनुसार, भारत सरकार ने मेटा को स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका केवल तकनीकी माध्यम तक सीमित नहीं मानी जा सकती। सरकार का कहना है कि यदि कोई मंच सामग्री के प्रसार और दृश्यता को प्रभावित करता है, तो उस पर भारतीय कानूनों के अनुरूप आवश्यक जिम्मेदारियां भी लागू होती हैं। इसी संदर्भ में कंपनी के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत चर्चा की गई और स्थानीय नियमों के पूर्ण अनुपालन पर जोर दिया गया।

    सरकारी सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान मेटा की ओर से सीएसएएम और डीपफेक जैसे संवेदनशील विषयों पर विशेष चिंता व्यक्त की गई। कंपनी ने स्वीकार किया कि इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अपने तकनीकी तंत्र और निगरानी प्रणाली को लगातार मजबूत बनाने की आवश्यकता है। साथ ही ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ी कुछ तकनीकी त्रुटियों पर भी खेद जताते हुए उन्हें दूर करने की प्रक्रिया तेज करने की बात कही गई।

    यह मामला उस विवाद के बाद और अधिक चर्चा में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक पर उपलब्ध नहीं रहा। इस घटना को गंभीरता से लेते हुए संबंधित संसदीय समिति ने मेटा से जवाब मांगा था और निर्धारित समय के भीतर बिना शर्त माफी की मांग की थी। समिति ने यह भी संकेत दिया था कि यदि कंपनी संतोषजनक जवाब देने में विफल रहती है तो नियामकीय स्तर पर आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    इसी क्रम में मेटा के एक वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बैठक के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री प्रबंधन, पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों के पालन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भारत में संचालित सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को देश के लागू नियमों और कानूनी प्रावधानों का पूर्ण पालन करना होगा।

    मेटा और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों ने बैठक में कहा कि उनके प्लेटफॉर्म पर पहले से ही कंटेंट मॉडरेशन, फैक्ट-चेकिंग और सुरक्षा संबंधी कई आंतरिक व्यवस्थाएं लागू हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग रोकने और आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ कार्रवाई को और प्रभावी बनाने के लिए लगातार तकनीकी सुधार किए जा रहे हैं। सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच हुई यह बातचीत भविष्य में ऑनलाइन सुरक्षा, पारदर्शिता और डिजिटल जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

  • भारतीय कार्गो शिप पर समुद्र में बड़ा हमला, रेस्क्यू ऑपरेशन से बचाए गए सभी नाविक, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

    भारतीय कार्गो शिप पर समुद्र में बड़ा हमला, रेस्क्यू ऑपरेशन से बचाए गए सभी नाविक, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । यमन के तटीय क्षेत्र के पास भारतीय मालवाहक जहाज पर हुए हमले ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। भारतीय मालवाहक पोत ‘फैज नूरे औलिया’ अज्ञात दिशा से आए एक प्रोजेक्टाइल की चपेट में आने के बाद गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। टक्कर के प्रभाव से जहाज का संतुलन बिगड़ गया और उसमें तेजी से पानी भरने लगा। कुछ ही समय बाद जहाज समुद्र में पलटकर डूब गया। राहत की बात यह रही कि जहाज पर सवार सभी 14 चालक दल के सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

    घटना के तुरंत बाद यमन के तटरक्षक बलों ने बड़े स्तर पर बचाव अभियान शुरू किया। समुद्र में फंसे चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित निकालने के लिए कई बचाव इकाइयों को तैनात किया गया। अभियान के दौरान 13 भारतीय नागरिकों सहित सभी 14 नाविकों को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया। इसके बाद उन्हें मोखा बंदरगाह पहुंचाया गया, जहां उनकी आवश्यक चिकित्सा जांच और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं की गईं। अधिकारियों ने बताया कि सभी नाविक सुरक्षित हैं और उनकी स्थिति सामान्य बनी हुई है।

    घटना की जानकारी मिलते ही भारत सरकार ने इस हमले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने इसे बिना किसी उकसावे के किया गया हमला बताया और समुद्री व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर इस प्रकार की घटनाएं वैश्विक व्यापार और नौवहन व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। भारत ने स्पष्ट किया कि ऐसे हमलों को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    सरकार की ओर से महानिदेशक समुद्री प्रशासन को तत्काल आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर पूरे मामले की निगरानी करने, प्रभावित चालक दल को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने तथा क्षेत्र में मौजूद अन्य भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही स्थिति पर लगातार नजर रखने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए आवश्यक उपायों पर भी जोर दिया गया है।

    भारत ने इस कठिन परिस्थिति में त्वरित बचाव अभियान चलाने वाले यमन के अधिकारियों और तटरक्षक बलों के प्रति आभार भी व्यक्त किया है। सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कारण ही सभी नाविकों की जान बचाई जा सकी। इस बीच समुद्री मार्गों पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है। भारत ने सुरक्षित समुद्री आवाजाही, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित पक्षों से प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री व्यापार पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकती हैं, इसलिए संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना समय की आवश्यकता बन गई है।

  • PoJK Unrest: अधिकार मांगने वालों का दमन, खौफनाक हालात में बेबस मां ने सुनाई पीड़ा, पीओके पर भारत ने क्या कहा?

    PoJK Unrest: अधिकार मांगने वालों का दमन, खौफनाक हालात में बेबस मां ने सुनाई पीड़ा, पीओके पर भारत ने क्या कहा?


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर अर्थात पीओके में अपने बुनियादी अधिकारों की मांग कर रहे आम नागरिकों पर वहां की सुरक्षा बलों द्वारा किए जा रहे दमन और अत्याचार की खौफनाक तस्वीरें सामने आ रही हैं। रावलकोट में एक 15 वर्षीय निर्दोष किशोर की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद परिजनों की बेबसी और चीत्कार ने क्षेत्र में व्याप्त भयावह स्थिति को उजागर कर दिया है।

    पीओके की जनता पिछले काफी समय से सस्ता आटा, किफायती बिजली और मूलभूत जनसुविधाओं की मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन कर रही है। हालांकि जवाब में पाकिस्तानी प्रशासन और सुरक्षा बल नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारों की आवाज उठाने के एवज में युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे दर्जनों परिवारों के चिराग बुझ चुके हैं।

    क्षेत्र में इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया गया है और सड़कों पर कड़ा पहरा लगा दिया गया है, ताकि हिंसा की खबरें बाहर न आ सकें। स्थानीय अस्पतालों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय बनी हुई है। डॉक्टरों के अनुसार प्राथमिक इलाज की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है और इलाज कराने आने वाले घायल युवाओं में डर का माहौल है। लोगों को भय है कि अस्पताल जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा या फिर मार दिया जाएगा।

    दूसरी ओर भारत ने पीओके में हाल ही में आयोजित कराए गए चुनावों को पूरी तरह से एक ढोंग और छलावा करार दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान लोकतंत्र का दिखावा करके वहां चल रहे जनविरोध और हत्याओं के कड़वे सच को छिपाने का प्रयास कर रहा है। फर्जी चुनावों के जरिए अपनी अवैध वैधता साबित करने की यह कोशिश अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धोखा देने जैसी है।

    विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जून 2026 से लेकर अब तक वहां पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 90 बेगुनाह नागरिकों की जान जा चुकी है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से मांग की है कि वैश्विक समुदाय को पाकिस्तान द्वारा नागरिकों पर किए जा रहे इन अत्याचारों, संचार प्रतिबंधों और मानवाधिकारों के दोहरे रवैये के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए उसे जवाबदेह ठहराना चाहिए।

  • भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    नई दिल्ली । भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े संवेदनशील सुस्ता क्षेत्र में एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। नेपाल की ओर से आरोप लगाया गया है कि भारतीय सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने नेपाली क्षेत्र में प्रवेश कर वहां बनाया जा रहा एक अस्थायी मिट्टी का बांध हटा दिया। नेपाली पक्ष का कहना है कि यह बांध नारायणी नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ से स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया जा रहा था। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया, हालांकि प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद स्थिति सामान्य बताई जा रही है।

    बताया जा रहा है कि विवाद उस समय सामने आया जब स्थानीय स्तर पर अस्थायी तटबंध निर्माण का कार्य चल रहा था। नेपाल का दावा है कि भारतीय सुरक्षा कर्मियों ने इस निर्माण पर आपत्ति जताई और बाद में बांध को हटाने की कार्रवाई की। इस दौरान स्थानीय लोगों और भारतीय सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस भी हुई। घटना का एक वीडियो भी सामने आने की चर्चा है, जिसके बाद मामला दोनों देशों के अधिकारियों तक पहुंच गया।

    नेपाल सरकार ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए राजनयिक स्तर पर भारत के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया है। नेपाल का कहना है कि सीमा से जुड़े मामलों में पहले से तय व्यवस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और किसी भी कार्रवाई से पहले आपसी समन्वय आवश्यक है। वहीं भारतीय पक्ष की ओर से यह बताया गया कि जिस क्षेत्र में निर्माण किया जा रहा था, वह लंबे समय से विवादित माना जाता है और ऐसे इलाकों में यथास्थिति बनाए रखने पर दोनों देशों के बीच पहले भी सहमति बन चुकी है।

    सुस्ता क्षेत्र भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दोनों देश इस क्षेत्र पर अपना-अपना दावा करते रहे हैं। समय-समय पर सीमा निर्धारण, नदी की धारा में बदलाव और स्थानीय गतिविधियों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी समय के साथ बदलती रही है, जिससे सीमा संबंधी विवाद और जटिल हो गया है।

    स्थानीय प्रशासन ने बताया कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं और किसी प्रकार की अप्रिय घटना नहीं हुई है। एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है ताकि दोनों ओर के नागरिकों के बीच किसी प्रकार का तनाव न बढ़े। प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।

    भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बेहद मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था के कारण लाखों लोग रोजमर्रा के आवागमन और व्यापार से जुड़े हैं। ऐसे में सीमा से जुड़े किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण और आपसी सहमति से समाधान निकालना दोनों देशों के हित में माना जाता है। जानकारों का मानना है कि संवाद और कूटनीतिक स्तर पर निरंतर संपर्क बनाए रखने से इस प्रकार के विवादों का स्थायी समाधान संभव हो सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास कायम रहेगा।

  • नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नई दिल्ली । नेपाल ने भारत सरकार से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि वह नेपाली नागरिकों के राष्ट्रीय पहचान पत्र (नेशनल आइडेंटिटी कार्ड) को सीमा पार यात्रा और हवाई सफर के लिए वैध यात्रा दस्तावेज के रूप में मान्यता दे। नेपाल का कहना है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही अधिक सुरक्षित, आसान और आधुनिक पहचान प्रणाली के अनुरूप हो सकेगी।

    नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से खुली सीमा व्यवस्था लागू है, जिसके तहत दोनों देशों के नागरिकों को सामान्य परिस्थितियों में बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे के देश में आने-जाने की अनुमति है। हालांकि, वर्तमान व्यवस्था में भारत मुख्य रूप से नेपाली नागरिकों के पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र को आधिकारिक पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार करता है। अब नेपाल चाहता है कि उसके राष्ट्रीय पहचान पत्र को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाए।

    नेपाल के आव्रजन विभाग के अनुसार, इस संबंध में जून के अंतिम सप्ताह में भारत सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजा गया था। प्रस्ताव में अनुरोध किया गया है कि नेपाली नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को सीमा पार आवागमन और हवाई यात्रा के दौरान वैध पहचान दस्तावेज के रूप में मान्यता दी जाए।

    नेपाल सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय पहचान पत्र आधुनिक बायोमेट्रिक तकनीक पर आधारित है। इसमें फिंगरप्रिंट, चेहरे की पहचान और आईरिस स्कैन जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सुरक्षित रहती हैं। इसके कारण यह पारंपरिक नागरिकता प्रमाण पत्र की तुलना में अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय माना जाता है।

    नेपाल में सरकार विभिन्न सरकारी सेवाओं के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र के उपयोग को लगातार बढ़ावा दे रही है। पासपोर्ट आवेदन, बैंक खाता खोलने, भूमि पंजीकरण और अन्य कई सरकारी कार्यों में इस पहचान पत्र को अनिवार्य बनाया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य धीरे-धीरे पुराने नागरिकता प्रमाण पत्रों की जगह डिजिटल रूप से सत्यापित किए जा सकने वाले पहचान पत्रों को लागू करना है।

    नेपाल की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने के बाद काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने राष्ट्रीय पहचान पत्र से जुड़े तकनीकी और सुरक्षा पहलुओं के बारे में जानकारी भी प्राप्त की है। बताया गया कि यह औपचारिक वार्ता नहीं थी, बल्कि कार्ड की विशेषताओं और सुरक्षा व्यवस्था को समझने के उद्देश्य से जानकारी का आदान-प्रदान किया गया।

    नेपाल के अधिकारियों का मानना है कि यदि राष्ट्रीय पहचान पत्र को भारत में भी वैध यात्रा दस्तावेज का दर्जा मिल जाता है तो दोनों देशों की सुरक्षा व्यवस्था और पहचान सत्यापन प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाएगी। इससे सीमा पार आवाजाही के दौरान पहचान संबंधी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

    वर्तमान व्यवस्था के तहत भारत आने वाले नेपाली नागरिकों के लिए पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र स्वीकार किए जाते हैं। वहीं नेपाल जाने वाले भारतीय नागरिक पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र अथवा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी कुछ अन्य मान्य पहचान पत्रों का उपयोग कर सकते हैं।

    नेपाल के राष्ट्रीय पहचान एवं नागरिक पंजीकरण विभाग के अनुसार अब तक 45 लाख से अधिक नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं, जबकि लगभग दो करोड़ लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया है। नेपाल को उम्मीद है कि भविष्य में इस डिजिटल पहचान प्रणाली को भारत की मान्यता मिलने से दोनों देशों के बीच आवागमन और अधिक सुरक्षित तथा सुविधाजनक हो सकेगा।