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  • Q1 नतीजों से पहले मोतीलाल ओसवाल का बड़ा दांव, BSE से हिंडाल्को तक 5 शेयरों को मॉडल पोर्टफोलियो में दी जगह

    Q1 नतीजों से पहले मोतीलाल ओसवाल का बड़ा दांव, BSE से हिंडाल्को तक 5 शेयरों को मॉडल पोर्टफोलियो में दी जगह

    नई दिल्ली । वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के नतीजों का दौर शुरू होने के साथ ही भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की नजर प्रमुख कंपनियों के प्रदर्शन पर टिक गई है। इसी बीच ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल ने अपने मॉडल पोर्टफोलियो में बदलाव करते हुए पांच प्रमुख कंपनियों के शेयरों को शामिल किया है। फर्म का मानना है कि आने वाले तिमाही नतीजों में इन कंपनियों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत मजबूत रह सकता है, जिससे निवेशकों के लिए बेहतर अवसर बन सकते हैं।

    अर्निंग सीजन की शुरुआत सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी कंपनी के तिमाही नतीजों के साथ हो रही है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार कंपनियों की आय और लाभ में स्थिर सुधार देखने को मिल सकता है। इसी अनुमान के आधार पर ब्रोकरेज फर्म ने लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों की आय वृद्धि को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया है। फर्म का अनुमान है कि लार्जकैप कंपनियां सालाना आधार पर लगभग 17 प्रतिशत, मिडकैप कंपनियां 15 प्रतिशत और स्मॉलकैप कंपनियां 16 प्रतिशत तक राजस्व वृद्धि दर्ज कर सकती हैं।

    मॉडल पोर्टफोलियो में शामिल कंपनियों में अरविंद फैशन्स को मजबूत उपभोक्ता मांग और मौजूदा स्टोर्स की बिक्री में सुधार का लाभ मिलने की उम्मीद जताई गई है। ब्रोकरेज का मानना है कि कंपनी के राजस्व में अच्छी बढ़ोतरी के साथ लाभप्रदता में भी सुधार देखने को मिल सकता है। परिचालन मार्जिन और ग्रॉस मार्जिन में सुधार की संभावना को भी सकारात्मक संकेत माना गया है।

    एचडीएफसी एएमसी को लेकर फर्म का आकलन अपेक्षाकृत संतुलित है। अनुमान है कि कंपनी के प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियों में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा, जिससे राजस्व वृद्धि सीमित रह सकती है। इसके बावजूद मजबूत परिचालन दक्षता और ऊंचे ईबीआईटीडीए मार्जिन के कारण कंपनी की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी रहने की संभावना व्यक्त की गई है।

    ब्रोकरेज ने बीएसई को भी अपने पसंदीदा शेयरों में शामिल किया है। उसका मानना है कि नकद और डेरिवेटिव बाजार में बढ़ती गतिविधियों से कंपनी के ट्रांजैक्शन आधारित राजस्व में सुधार हो सकता है। साथ ही परिचालन लागत पर नियंत्रण और बेहतर दक्षता के कारण कंपनी के मार्जिन में भी सकारात्मक बदलाव आने की संभावना जताई गई है।

    किर्लोस्कर ऑयल इंजन्स के बारे में ब्रोकरेज का अनुमान है कि घरेलू कारोबार में मजबूत मांग कंपनी की आय को सहारा दे सकती है। निर्यात क्षेत्र में फिलहाल कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन आने वाली तिमाहियों में अंतरराष्ट्रीय मांग में सुधार की उम्मीद व्यक्त की गई है। निवेशकों की नजर कंपनी के जेनरेटर सेट कारोबार, मूल्य निर्धारण रणनीति, उच्च क्षमता वाले उत्पादों और विस्तार योजनाओं की प्रगति पर बनी रहेगी।

    हिंडाल्को को लेकर भी ब्रोकरेज ने सकारात्मक रुख अपनाया है। फर्म का मानना है कि वैश्विक बाजार में एल्युमीनियम की कीमतों में मजबूती और घरेलू कारोबार का स्थिर प्रदर्शन कंपनी के परिणामों को समर्थन दे सकता है। हालांकि विदेशी इकाई के एक संयंत्र में हुई आग की घटना के कारण कुछ परिचालन दबाव बने रहने की संभावना भी जताई गई है। इसके बावजूद समग्र कारोबार को मजबूत माना गया है।

    अर्निंग सीजन के दौरान कंपनियों के वास्तविक वित्तीय नतीजे और भविष्य को लेकर दिए जाने वाले प्रबंधन के संकेत बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में निवेशकों की निगाह केवल मुनाफे और आय पर ही नहीं, बल्कि कंपनियों की भविष्य की रणनीति, मांग के रुझान और विस्तार योजनाओं पर भी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि तिमाही परिणामों के आधार पर आने वाले दिनों में शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है और निवेशकों को सोच-समझकर निर्णय लेने की आवश्यकता होगी।

  • E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, अरविंद केजरीवाल ने 29 ऑटो कंपनियों से मांगा जवाब, माइलेज और इंजन सुरक्षा पर उठाए सवाल

    E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, अरविंद केजरीवाल ने 29 ऑटो कंपनियों से मांगा जवाब, माइलेज और इंजन सुरक्षा पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । एथनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल को लेकर देश में नई बहस शुरू हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 29 ऑटोमोबाइल कंपनियों को पत्र लिखकर E20 ईंधन के उपयोग से वाहनों के माइलेज, इंजन की कार्यक्षमता और उपभोक्ताओं को दी जा रही तकनीकी जानकारी पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कंपनियों से इन मुद्दों पर स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब देने की मांग की है।

    केजरीवाल ने कहा कि उन्होंने विभिन्न वाहन निर्माताओं को अलग-अलग पत्र भेजे हैं। उनके अनुसार कुछ प्रमुख ऑटो कंपनियों के प्रतिनिधियों ने हाल ही में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में कहा था कि वर्ष 2023 से पहले निर्मित वाहनों में भी E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से इंजन को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा और माइलेज में केवल तीन से पांच प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि यदि कंपनियों का यही आधिकारिक रुख है तो इसे स्पष्ट रूप से उपभोक्ताओं के सामने भी रखा जाना चाहिए।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि कई कंपनियों के वाहन उपयोग पुस्तिका में E10 से अधिक एथनॉल मिश्रित ईंधन को लेकर अलग प्रकार की सावधानियों का उल्लेख किया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि तकनीकी दस्तावेजों में अलग निर्देश दिए गए हैं तो सार्वजनिक मंचों पर कंपनियों के प्रतिनिधि अलग संदेश क्यों दे रहे हैं। उनका कहना है कि इस विषय पर उपभोक्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति नहीं रहनी चाहिए और कंपनियों को तथ्यात्मक जानकारी साझा करनी चाहिए।

    केजरीवाल ने यह भी कहा कि वह अगले दिन दिल्ली के विभिन्न पेट्रोल पंपों और सर्विस सेंटरों का दौरा करेंगे। उन्होंने संकेत दिया कि वहां उपलब्ध ईंधन और उससे संबंधित जानकारी का जायजा लिया जाएगा। उनका कहना है कि यदि वाहन मालिकों पर किसी प्रकार का अतिरिक्त आर्थिक या तकनीकी प्रभाव पड़ने की संभावना है तो उसके बारे में पहले से स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।

    दूसरी ओर केंद्र सरकार एथनॉल मिश्रित ईंधन कार्यक्रम को ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानती है। सरकार का कहना है कि भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और एथनॉल मिश्रण बढ़ाने से कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही जैव ईंधन के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने और घरेलू कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने का भी लक्ष्य रखा गया है।

    ऊर्जा और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि E20 ईंधन की सफलता काफी हद तक वाहन तकनीक, निर्माता कंपनियों के दिशा-निर्देश और उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराई जाने वाली जानकारी पर निर्भर करेगी। नई तकनीक के अनुरूप तैयार वाहनों और पुराने मॉडलों की आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में वाहन मालिकों को अपने वाहन निर्माता की आधिकारिक सलाह का पालन करना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की तकनीकी समस्या से बचा जा सके।

    E20 पेट्रोल को लेकर शुरू हुई यह बहस अब केवल तकनीकी विषय तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति, उपभोक्ता हित और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ गई है। आने वाले दिनों में ऑटो कंपनियों की प्रतिक्रिया और सरकार की ओर से दिए जाने वाले स्पष्टीकरण इस पूरे मुद्दे की दिशा तय कर सकते हैं। फिलहाल वाहन मालिकों की नजर इस बात पर बनी हुई है कि E20 ईंधन के व्यापक उपयोग से उनके वाहनों के प्रदर्शन, माइलेज और रखरखाव पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ता है।

  • भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति की प्रमुख ताकत बनकर उभर रही है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकों के विस्तार ने न केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच को व्यापक बनाया है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा में डिजिटल इकोसिस्टम की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित डिजिटल भुगतान विषयक एक विचार-विमर्श कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने डिजिटल परिवर्तन के कई पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। उनका कहना था कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी है और देश के करोड़ों नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके माध्यम से सरकारी सेवाओं, वित्तीय लेनदेन और डिजिटल सुविधाओं तक लोगों की पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हुई है।

    विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल तकनीक के विस्तार से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन, मजबूत संस्थागत ढांचा, अनुसंधान, नवाचार और लगातार निवेश की आवश्यकता है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने वाले देश भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकेंगे। इसलिए नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ कौशल विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को लेकर विशेषज्ञों ने कहा कि इसकी सफलता का सबसे बड़ा आधार नागरिकों का भरोसा है। यदि डिजिटल सेवाओं में डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, उपयोगकर्ता की सहमति और सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तभी डिजिटल परिवर्तन का वास्तविक लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंच सकेगा। उन्होंने तकनीकी विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    डिजिटल भुगतान प्रणाली के भविष्य को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों का मानना है कि अब तक डिजिटल भुगतान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य व्यापक पहुंच और इंटरऑपरेबिलिटी रहा है, लेकिन आने वाले समय में इसकी मजबूती, बैकअप सिस्टम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को प्राथमिकता देनी होगी। इससे लेनदेन अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बन सकेंगे।

    कार्यक्रम में सीमा पार डिजिटल भुगतान को आसान बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि इसके लिए एकीकृत डिजिटल अवसंरचना, समान तकनीकी मानक और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। इससे भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगी तथा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन भी सरल और सुरक्षित बनेंगे।

    साइबर सुरक्षा को डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया। विशेषज्ञों ने बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी को देखते हुए मजबूत संस्थागत समन्वय, आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और आम नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि डिजिटल वित्तीय प्रणाली में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करना आवश्यक है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत का डिजिटल इकोसिस्टम अब केवल भुगतान प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, नवाचार, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यदि तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा, भरोसा और समावेशिता को समान प्राथमिकता दी जाती है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।

  • हथकरघा क्षेत्र में नवाचार को नई उड़ान, सरकार ने लॉन्च किया ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’, युवाओं और बुनकरों को मिलेगा साझा मंच

    हथकरघा क्षेत्र में नवाचार को नई उड़ान, सरकार ने लॉन्च किया ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’, युवाओं और बुनकरों को मिलेगा साझा मंच

    नई दिल्ली । भारत के पारंपरिक हथकरघा क्षेत्र को आधुनिक तकनीक और नवाचार से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार ने ‘हैंडलूम हैकाथॉन 2026’ की शुरुआत की है। इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता का उद्देश्य तकनीक, डिजाइन, उद्यमिता और टिकाऊ समाधानों के माध्यम से हथकरघा उद्योग को नई गति देना है। सरकार का मानना है कि देश की समृद्ध बुनाई परंपरा को आधुनिक सोच और नवाचार के साथ जोड़कर इस क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।

    यह पहल राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित की जा रही है। प्रतियोगिता का ग्रैंड फिनाले 1 अगस्त को आयोजित होगा, जहां चयनित प्रतिभागी अपने नवाचारी विचार और समाधान विशेषज्ञों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। शिक्षा, उद्योग, डिजाइन, प्रौद्योगिकी और हथकरघा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इन प्रस्तावों का मूल्यांकन करेंगे और सबसे प्रभावी समाधानों का चयन करेंगे।

    हैकाथॉन का मुख्य उद्देश्य युवाओं की रचनात्मक सोच को देश की पारंपरिक बुनाई कला से जोड़ना है। सरकार चाहती है कि आधुनिक तकनीकी ज्ञान और पारंपरिक शिल्प कौशल के मेल से ऐसे समाधान विकसित हों, जो हथकरघा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर सकें। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और वैश्विक बाजार में भारतीय हथकरघा उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

    इस प्रतियोगिता में वस्त्र, फैशन, डिजाइन, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों के विद्यार्थी भाग ले सकेंगे। इसके अलावा हथकरघा बुनकर, कारीगर, शोधकर्ता, स्टार्टअप, उद्यमी, नवाचारकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के पेशेवर भी इसमें अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। इस तरह यह मंच पारंपरिक अनुभव और आधुनिक तकनीकी दृष्टिकोण को एक साथ लाने का अवसर प्रदान करेगा।

    प्रतियोगिता के लिए कई महत्वपूर्ण विषय निर्धारित किए गए हैं। इनमें उत्पाद एवं डिजाइन नवाचार, टिकाऊ विकास, सर्कुलर इकोनॉमी, डिजिटल तकनीक का उपयोग, बाजार तक पहुंच, ब्रांडिंग, आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता, उत्पादकता में वृद्धि, व्यवसाय विकास और सामाजिक प्रभाव जैसे क्षेत्र शामिल हैं। सरकार को उम्मीद है कि इन विषयों पर प्रस्तुत होने वाले नए विचार हथकरघा उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया निर्धारित अवधि तक खुली रहेगी, जिसके दौरान इच्छुक प्रतिभागी अपने विचार और परियोजनाएं प्रस्तुत कर सकेंगे। चयनित प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की ओर से मार्गदर्शन, मेंटरशिप और आवश्यकता पड़ने पर इनक्यूबेशन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे नवाचारों को व्यावसायिक रूप देने और उन्हें व्यवहार में लागू करने का मार्ग आसान होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का हथकरघा क्षेत्र न केवल लाखों लोगों की आजीविका का आधार है, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र को आधुनिक तकनीक, डिजिटल समाधान और नवाचार से जोड़ा जाता है तो इससे रोजगार, निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिल सकती है।

    सरकार की यह पहल पारंपरिक शिल्प और आधुनिक नवाचार के बीच मजबूत साझेदारी स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे हथकरघा उद्योग को नई पहचान मिलने के साथ-साथ देश के नवाचार और स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी पारंपरिक उद्योगों के साथ जुड़कर नए अवसर प्राप्त होने की उम्मीद है।

  • सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

    नई दिल्ली । भारतीय पूंजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (एफवीसीआई) के लिए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब इन निवेशकों की पंजीकरण फीस अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में निर्धारित की जाएगी। यह बदलाव करीब छह महीने बाद लागू होगा, ताकि सभी संबंधित संस्थाओं और निवेशकों को नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रक्रियाएं व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

    नए शुल्क ढांचे के अनुसार अब पहले लागू 1,000 अमेरिकी डॉलर की पंजीकरण फीस के स्थान पर 90,000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसी प्रकार कैटेगरी-1 एफपीआई और एफवीसीआई के लिए पहले निर्धारित 2,500 अमेरिकी डॉलर की फीस को बदलकर 2.30 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही विलंब शुल्क और पंजीकरण जारी रखने से संबंधित शुल्कों में भी संशोधन किया गया है, जिससे पूरी शुल्क प्रणाली भारतीय मुद्रा पर आधारित हो जाएगी।

    सेबी का मानना है कि रुपये में शुल्क निर्धारित करने से विदेशी मुद्रा आधारित भुगतान व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियां समाप्त होंगी। अब तक डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण लेखांकन, बिलिंग, भुगतान मिलान और वित्तीय रिपोर्टिंग जैसी प्रक्रियाओं में अतिरिक्त समय और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

    संशोधित नियमों के तहत डिपॉजिटरी संस्थानों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अब उन्हें एफपीआई और एफवीसीआई से प्राप्त शुल्क पंजीकरण स्वीकृत होने के पांच कार्य दिवसों के भीतर सेबी के पास जमा कराना होगा। इससे शुल्क संग्रह और नियामकीय प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने की उम्मीद है। नियामक का उद्देश्य पूरी प्रणाली को समयबद्ध और डिजिटल प्रक्रियाओं के अनुरूप बनाना है।

    सेबी ने पंजीकरण प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक सरल बनाने की दिशा में कदम उठाया है। अब सामान्य आवेदन पत्र में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए जन्मतिथि तथा संस्थागत आवेदकों के लिए कंपनी की स्थापना तिथि जैसी आवश्यक जानकारियों को शामिल किया गया है। इससे आवेदन प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित होगी और अन्य नियामकीय औपचारिकताओं को पूरा करना भी आसान हो जाएगा।

    यह बदलाव कर संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की व्यापक पहल के अनुरूप भी माना जा रहा है। विशेष रूप से स्थायी खाता संख्या (पैन) के आवेदन और उससे जुड़ी औपचारिकताओं को आसान बनाने के उद्देश्य से विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाया गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश और अनुपालन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सहज हो सकती है।

    इसके अतिरिक्त सेबी ने कस्टोडियन संस्थानों के शुल्क भुगतान के तरीके में भी संशोधन किया है। पहले जहां उन्हें वार्षिक आधार पर शुल्क जमा करना पड़ता था, वहीं अब मासिक भुगतान व्यवस्था लागू की गई है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक नियमित और प्रबंधन के लिहाज से सुविधाजनक बनने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारण से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, विनिमय दर के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम होगा और विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया अधिक स्पष्ट बनेगी। यह कदम भारतीय पूंजी बाजार को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • थाईलैंड की खुदाई में मिला भारत से जुड़ा बड़ा सबूत, ब्राह्मी लिपि की अंगूठी ने खोले इतिहास के राज

    थाईलैंड की खुदाई में मिला भारत से जुड़ा बड़ा सबूत, ब्राह्मी लिपि की अंगूठी ने खोले इतिहास के राज


    नई दिल्ली । भारत और थाईलैंड के बीच सांस्कृतिक तथा व्यापारिक संबंध आधुनिक दौर तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें करीब दो हजार वर्ष पुरानी हैं। इसका ताजा प्रमाण थाईलैंड में हुई एक पुरातात्विक खुदाई से मिला है, जहां वैज्ञानिकों को दो सोने की प्राचीन अंगूठियां मिली हैं। इनमें से एक अंगूठी पर भारतीय ब्राह्मी लिपि में अंकित शब्दों ने इतिहासकारों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज प्राचीन भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच मजबूत व्यापारिक संपर्क का महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

    यह खोज थाईलैंड के पेत्चाबुरी प्रांत स्थित दोन याई थोंग पुरातात्विक स्थल पर हुई। थाईलैंड के फाइन आर्ट्स डिपार्टमेंट के अनुसार यहां मानव कंकालों की खुदाई के दौरान ये अंगूठियां मिलीं। प्रारंभिक अध्ययन में पता चला कि इनका संबंध लगभग 2,000 वर्ष पुराने आयरन एज काल से हो सकता है।

    ब्राह्मी लिपि में मिला अहम संदेश

    विशेषज्ञों ने एक अंगूठी पर अंकित ब्राह्मी लिपि को पढ़ने की कोशिश की, जिसमें ‘पुस रखितस’ लिखा मिला। इसका अर्थ बताया गया है- “वह व्यक्ति जिसे पुष्य का संरक्षण प्राप्त है।” भारतीय परंपरा में पुष्य नक्षत्र को अत्यंत शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। दूसरी अंगूठी पर कोई लेख नहीं मिला, लेकिन दोनों आभूषणों की बनावट और शैली भारतीय प्रभाव की ओर संकेत करती है।

    भारतीय व्यापारी से जुड़ा हो सकता है संबंध

    पुरातत्वविदों का मानना है कि ये अंगूठियां किसी संपन्न भारतीय व्यापारी की हो सकती हैं, जो समुद्री व्यापार के जरिए उस समय थाईलैंड पहुंचा होगा। उस दौर में भारत के व्यापारी मसाले, वस्त्र, धातु, आभूषण और अन्य वस्तुओं का व्यापार दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से करते थे। यही कारण है कि थाईलैंड सहित कई क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति, भाषा और धार्मिक प्रभाव के प्रमाण समय-समय पर मिलते रहे हैं।

    धान के खेत से शुरू हुई बड़ी खोज

    इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान तब हुई जब स्थानीय ग्रामीणों को धान के खेत में प्राचीन वस्तुएं मिलीं। इसके बाद सरकार ने यहां वैज्ञानिक खुदाई शुरू कराई। फरवरी से अब तक यहां से आठ मानव कंकाल, सोने और कांसे के आभूषण, मिट्टी के बर्तन और कई अन्य प्राचीन वस्तुएं बरामद हो चुकी हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि खुदाई पूरी होने के बाद इन सभी अवशेषों को संग्रहालय में आम लोगों के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।

    राखीगढ़ी पर भी बढ़ी उम्मीदें

    उधर भारत में भी सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे बड़े स्थलों में शामिल राखीगढ़ी को लेकर शोध तेज हो गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वहां से मिले मानव कंकालों को वैज्ञानिक और डीएनए विश्लेषण के लिए भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण को सौंपा है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इन अध्ययनों से प्राचीन भारतीय सभ्यता, लोगों की जीवनशैली और आनुवंशिक इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आएंगे। थाईलैंड में मिली यह नई खोज एक बार फिर साबित करती है कि प्राचीन भारत का व्यापारिक और सांस्कृतिक प्रभाव समुद्री मार्गों के जरिए हजारों किलोमीटर दूर तक फैला हुआ था।

  • सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत

    सऊदी अरब की ऐतिहासिक तेल कटौती, 20 साल की सबसे बड़ी कीमत गिरावट से भारत को मिल सकती है बड़ी राहत


    नई दिल्ली । सऊदी अरब ने वैश्विक तेल बाजार में बड़ा कदम उठाते हुए एशियाई ग्राहकों के लिए अपने प्रमुख अरब लाइट क्रूड की कीमत में अगस्त 2026 से प्रभावी ऐतिहासिक कटौती का ऐलान किया है। सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने कीमत में 11 डॉलर प्रति बैरल की कमी की है, जिसे पिछले दो दशकों की सबसे बड़ी कटौती माना जा रहा है। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऑयल मार्केट में हलचल मचा दी है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए राहत की उम्मीद बढ़ा दी है।

    क्यों घटाई गई कीमत?

    तेल बाजार में हाल के दिनों में वैश्विक मांग कमजोर हुई है, जबकि आपूर्ति लगातार बढ़ रही है। इजरायल-ईरान तनाव कम होने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। इसी बीच ओपेक प्लस देशों ने भी उत्पादन बढ़ाने पर सहमति बनाई है, जिससे बाजार में सप्लाई और बढ़ गई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सऊदी अरब ने एशियाई बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने के लिए कीमतों में बड़ी कटौती की है।

    भारत को क्या होगा फायदा?

    भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। ऐसे में सऊदी की इस कीमत कटौती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    सबसे पहले, भारत का तेल आयात बिल कम हो सकता है, जिससे चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर दबाव घटेगा। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ कम होने और रुपये को मजबूती मिलने की भी संभावना है।

    यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं, तो इसका लाभ घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी के रूप में भी मिल सकता है। हालांकि, खुदरा ईंधन कीमतों में बदलाव सरकार की कर नीति और तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर भी निर्भर करेगा।

    महंगाई पर भी पड़ सकता है असर

    कच्चा तेल सस्ता होने से परिवहन लागत घट सकती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, औद्योगिक उत्पादों और लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है। इससे महंगाई नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही तेल विपणन कंपनियों के मुनाफे में भी सुधार होने की संभावना जताई जा रही है।

    एशियाई बाजार में बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब के इस फैसले के बाद अन्य तेल निर्यातक देशों पर भी कीमतों में प्रतिस्पर्धी बदलाव का दबाव बढ़ सकता है। इससे एशियाई बाजार में खरीदारों को बेहतर शर्तों पर कच्चा तेल मिलने की संभावना बनेगी। अगर वैश्विक परिस्थितियां स्थिर रहती हैं और कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत सहित कई आयातक देशों को आने वाले महीनों में आर्थिक राहत मिल सकती है।

  • भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं।

    एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है।

    नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है।

    इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है।

    साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।

  • 127 कट्स के विवाद के बाद रिलीज हुई 'सतलुज', 48 घंटों में लगा बैन, खालड़ा की पत्नी बोलीं- यही वो असली फिल्म

    127 कट्स के विवाद के बाद रिलीज हुई 'सतलुज', 48 घंटों में लगा बैन, खालड़ा की पत्नी बोलीं- यही वो असली फिल्म


    नई दिल्ली। लंबे समय से विवादों में रही दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘पंजाब 95’, जिसे बाद में ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया, आखिरकार दर्शकों तक पहुंची। कई वर्षों की देरी और सेंसर संबंधी विवादों के बाद फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन स्ट्रीमिंग शुरू होने के करीब 48 घंटे के भीतर ही इसे भारत में हटा दिया गया और फिल्म पर रोक लगा दी गई।

    फिल्म की खास बात यह रही कि इसे बिना किसी कट के मूल संस्करण में रिलीज किया गया था। इसकी जानकारी निर्देशक हनी त्रेहान और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने साझा की थी। फिल्म को जसवंत सिंह खालड़ा के परिवार का भी समर्थन मिला। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने कहा कि ओटीटी पर रिलीज हुई ‘सतलुज’ वही मूल फिल्म है, जो सबसे पहले उनके परिवार को दिखाई गई थी और जिसे उन्होंने मंजूरी दी थी। हालांकि, उनका यह बयान फिल्म पर रोक लगाए जाने से पहले का है।

    परमजीत कौर खालड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर खुशी जताई कि वर्षों की मुश्किलों के बाद उनके पति के जीवन, संघर्ष और न्याय की लड़ाई पर आधारित फिल्म दर्शकों तक पहुंच सकी। उन्होंने लिखा कि यह वही मूल संस्करण है, जिसे सबसे पहले उनके परिवार ने देखा था। उनके मुताबिक, तमाम दबाव और बदलाव की कोशिशों के बावजूद फिल्म की सच्चाई और मूल भावना को बरकरार रखा गया।

    उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह था कि जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को बिना किसी समझौते और तथ्यों से छेड़छाड़ किए ईमानदारी से प्रस्तुत किया जाए।

    अपने पोस्ट में परमजीत कौर खालड़ा ने दावा किया कि फिल्म में 25 हजार से अधिक लावारिस शवों के मामले और जसवंत सिंह खालड़ा की कानूनी लड़ाई को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया गया है। उन्होंने निर्देशक हनी त्रेहान की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने भारी दबाव के बावजूद फिल्म की ऐतिहासिक और कलात्मक सत्यता से समझौता नहीं किया। साथ ही उम्मीद जताई कि यह फिल्म लोगों को सच, न्याय, जवाबदेही और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर सोचने के लिए प्रेरित करेगी।

    यह फिल्म वर्षों तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रही। निर्देशक हनी त्रेहान के मुताबिक, इसे वर्ष 2022 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास भेजा गया था, लेकिन करीब तीन साल तक प्रमाणपत्र नहीं मिला। मेकर्स का दावा था कि बोर्ड ने फिल्म में 127 कट लगाने का सुझाव दिया था। इसके अलावा 2023 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रस्तावित प्रीमियर भी भारतीय अधिकारियों की आपत्तियों के बाद रद्द कर दिया गया था।

    <blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>On the release of <a href=”https://x.com/hashtag/Punjab95?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw”>#Punjab95</a> under the name of <a href=”https://x.com/hashtag/Satluj?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw”>#Satluj</a> <a href=”https://t.co/QASNh6Y9Fm”>pic.twitter.com/QASNh6Y9Fm</a></p>&mdash; Paramjit Kaur Khalra (@KaurKhalra) <a href=”https://x.com/KaurKhalra/status/2073120269271785885?ref_src=twsrc%5Etfw”>July 3, 2026</a></blockquote> <script async src=”https://platform.x.com/widgets.js” charset=”utf-8″></script>

    हनी त्रेहान ने बताया था कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म के पहले शीर्षक ‘गल्लूघारा’ पर भी आपत्ति जताई थी और शुरुआती क्रेडिट्स से ‘Inspired by True Events’ हटाने के लिए कहा था। इसके बाद फिल्म का नाम बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया और इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया।

    फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है। उनके अलावा कंवलजीत सिंह, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान भी प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए हैं।

    कई वर्षों के विवाद, सेंसर विवाद और लंबी प्रतीक्षा के बाद रिलीज हुई ‘सतलुज’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हालांकि, भारत में रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म पर लगी रोक ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है।

  • भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    भारत-जापान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी से चीन बेचैन, प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के भारत दौरे पर 'टैप वॉटर' विवाद उछालकर रिश्तों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची के हालिया भारत दौरे के बाद एशियाई कूटनीति में एक नया विवाद सामने आया है। चीन के सरकारी मीडिया ने इस यात्रा के दौरान जापानी प्रतिनिधिमंडल द्वारा कथित तौर पर केवल बोतलबंद पानी के इस्तेमाल के मुद्दे को प्रमुखता देते हुए भारत-जापान संबंधों पर सवाल खड़े करने का प्रयास किया है। हालांकि भारत और जापान की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन इसे दोनों देशों की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    चीनी सरकारी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में स्थानीय नल के पानी का उपयोग नहीं किया और पूरे दौरे के दौरान केवल पैक किए गए मिनरल वॉटर का ही इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रतिनिधिमंडल के लिए पहले से बड़ी मात्रा में बोतलबंद पानी की व्यवस्था की गई थी तथा साफ-सफाई और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए भी उसी का उपयोग किया गया। अखबार ने इस मामले को भारत के प्रति जापान के कथित दोहरे रवैये से जोड़ने की कोशिश की।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गर्मजोशीपूर्ण मुलाकात की और दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों पर जोर दिया। इसके बावजूद पानी के मुद्दे को उछालकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि व्यवहारिक स्तर पर जापान भारत को लेकर पूरी तरह सहज नहीं है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और न ही दोनों देशों ने इस विषय पर कोई आधिकारिक टिप्पणी की है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत और जापान के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। दोनों देशों ने हाल के वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित किया है। यही वजह है कि उनकी रणनीतिक साझेदारी को एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दोनों देशों के बीच नौसैनिक संचार प्रणाली, रक्षा तकनीक के संयुक्त विकास और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। इन क्षेत्रों में चीन का लंबे समय से प्रभाव माना जाता रहा है। ऐसे में भारत और जापान की बढ़ती भागीदारी को बीजिंग अपने रणनीतिक हितों के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

    हाल के संयुक्त बयानों में भारत और जापान ने दक्षिण चीन सागर तथा पूर्वी चीन सागर की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की है। दोनों देशों ने किसी भी क्षेत्र में बल प्रयोग या एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने के प्रयासों का विरोध किया है। यद्यपि किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसे क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े व्यापक संदेश के रूप में देखा गया। इसके बाद चीन ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी तीसरे देश को लक्ष्य बनाकर गठबंधन तैयार नहीं किए जाने चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि भारत की विनिर्माण क्षमता और जापान की उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता भविष्य में कई रणनीतिक क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा कर सकती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बढ़ते सहयोग पर चीन लगातार नजर बनाए हुए है। ऐसे माहौल में ‘टैप वॉटर’ जैसे मुद्दे को प्रमुखता देकर भारत-जापान संबंधों को लेकर संदेह पैदा करने की कोशिश को व्यापक कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है। फिलहाल दोनों देशों का ध्यान अपने दीर्घकालिक सहयोग को और मजबूत करने तथा क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।