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  • भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर

    भारत श्रीलंका रिश्तों में नया अध्याय उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन दो दिवसीय यात्रा पर


    नई दिल्ली ।
    भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन 19 और 20 अप्रैल 2026 को दो दिवसीय आधिकारिक दौरे पर श्रीलंका जाएंगे। यह दौरा कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह उपराष्ट्रपति के रूप में उनका पहला द्विपक्षीय श्रीलंका दौरा होगा और इससे दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    इस दौरे के दौरान उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके और प्रधानमंत्री डॉ हरिनी अमरसूर्या से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा वह अन्य वरिष्ठ नेताओं अधिकारियों और श्रीलंका में रह रहे भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी संवाद करेंगे।

    भारत और श्रीलंका के संबंध ऐतिहासिक सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद मजबूत रहे हैं। श्रीलंका भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” और “विजन महासागर” नीति का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे में यह दौरा हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद द्विपक्षीय सहयोग को नई दिशा देने का अवसर प्रदान करेगा।

    इस बीच वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेषकर अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की स्थिति ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका असर श्रीलंका पर भी पड़ा जहां ईंधन संकट की स्थिति बनने लगी थी। ऐसे समय में भारत ने आगे बढ़कर मदद करते हुए 38 000 मीट्रिक टन ईंधन की आपूर्ति की जिससे श्रीलंका को राहत मिली।

    भारत की इस सहायता के लिए श्रीलंका के नेताओं ने आभार व्यक्त किया। सांसद नमल राजपक्षे ने भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति की सराहना करते हुए कहा कि भारत संकट के समय हमेशा श्रीलंका के साथ खड़ा रहा है। उन्होंने श्रीलंका सरकार को भारत की आर्थिक नीतियों विशेष रूप से फ्यूल टैक्स एडजस्टमेंट मॉडल को अपनाने की सलाह भी दी।

    वहीं राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने भी भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत हुई थी जिसमें उन्होंने ईंधन संकट की स्थिति साझा की थी और भारत ने तुरंत सहायता उपलब्ध कराई। कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति का यह दौरा न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह दोनों देशों के बीच सहयोग विश्वास और साझेदारी को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

  • दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में एक पायदान नीचे खिसका भारत, छठे स्थान पर पहुंचा

    दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में एक पायदान नीचे खिसका भारत, छठे स्थान पर पहुंचा


    नई दिल्ली।
    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund.- IMF) ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं (World Economies) को लेकर नए अनुमान जारी किए हैं। इन ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत (India) डॉलर के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सूची में एक पायदान नीचे खिसक कर छठे स्थान पर आ गया है और ब्रिटेन फिर से भारत से आगे निकल गया है। इससे पहले भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था, लेकिन अब वह छठे स्थान पर आ गया है। हालांकि, वास्तविक विकास दर के मामले में भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।


    क्या हुआ है बदलाव?

    2024 की स्थिति: भारत 5वें स्थान पर था। भारत की जीडीपी 3.76 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि ब्रिटेन की जीडीपी 3.7 ट्रिलियन डॉलर थी। यानी भारत ब्रिटेन से आगे था।

    2025 (पिछले साल) की स्थिति: भारत की जीडीपी बढ़कर 3.92 ट्रिलियन डॉलर हो गई, लेकिन ब्रिटेन की जीडीपी भी तेजी से बढ़कर 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई। इसी वजह से ब्रिटेन ने भारत को पछाड़ दिया और भारत छठे नंबर पर आ गया।


    मौजूदा वैश्विक रैंकिंग इस प्रकार है (2026 अनुमान):

    अमेरिका
    चीन
    जर्मनी
    जापान
    यूके
    भारत


    भारत के पिछड़ने के दो मुख्य कारण क्या हैं?

    भले ही भारत तेजी से विकास कर रहा है, लेकिन डॉलर में गिनती करने पर दो कारणों से भारत की रैंक गिरी है।
    रुपये का कमजोर होना: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हुआ है। जब हम अपनी कमाई (जो रुपये में है) को मजबूत डॉलर में बदलते हैं, तो वह कम हो जाती है।
    बेस ईयर में बदलाव: जीडीपी को मापने के लिए इस्तेमाल होने वाले आधार वर्ष में बदलाव के कारण भी आंकड़ों पर यह असर पड़ा है।


    रुपये और डॉलर का गणित

    IMF के आंकड़ों के अनुसार रुपये की स्थिति कुछ इस तरह रही है।
    2024: 1 डॉलर = 84.57 रुपये
    2025: 1 डॉलर = 88.48 रुपये (रुपया कमजोर हुआ)
    इस साल (2026) का अनुमान: 1 डॉलर = 92.59 रुपये (रुपया और कमजोर हो सकता है)

    इसके बिल्कुल उलट, ब्रिटेन की मुद्रा (ब्रिटिश पाउंड) डॉलर के मुकाबले मजबूत हुई है। इसी करेंसी एक्सचेंज के खेल में ब्रिटेन आगे निकल गया।

    यह समझना बहुत जरूरी है कि भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। अगर हम डॉलर के बजाय अपने रुपयों में बात करें, तो हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से बढ़ रही है:

    2024 में जीडीपी 318 लाख करोड़ रुपये थी। 2025 में यह 9% बढ़कर लगभग 347 लाख करोड़ रुपये हो गई। इस साल इसके 11% बढ़कर 385 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यानी देश के अंदर विकास हो रहा है, लेकिन डॉलर के महंगा होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी वैल्यू कम दिख रही है।

    भविष्य को लेकर क्या उम्मीदें हैं?
    सरकार को उम्मीद थी कि भारत 2025-26 तक जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, लेकिन रुपये की कमजोरी के कारण अब इसके लिए थोड़ा और इंतजार करना होगा। इस साल भी भारत के छठे स्थान पर ही रहने की उम्मीद है। यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि रुपये और डॉलर का रेट क्या रहता है।


    विकास की कहानी बरकरार, भविष्य उज्ज्वल

    इस गिरावट के बावजूद IMF ने भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ फोरकास्ट बढ़ा दी है। FY27 के लिए 6.5% वृद्धि का अनुमान है, जबकि घरेलू अनुमान FY26 में 7.4% तक हैं। भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। 2021-2025 के बीच भारत की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 8.56% रही, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ऊंची है।


    कब बनेगा दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था?

    अनुमान है कि अगले साल भारत न सिर्फ ब्रिटेन को पछाड़ेगा, बल्कि जापान को भी पीछे छोड़ देगा। IMF के इन आंकड़ों को देखते हुए ऐसा लगता है कि भारत को नंबर 3 की कुर्सी तक पहुंचने के लिए 2031 तक का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो भारत की कमाई (रुपये में) लगातार बढ़ रही है, लेकिन चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तुलना डॉलर में होती है और डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो गया है, इसलिए रैंकिंग में हम एक कदम पीछे हो गए हैं।

  • भारत का सबसे बड़ा Trade पार्टनर बना चीन… अमेरिका को छोड़ा पीछे

    भारत का सबसे बड़ा Trade पार्टनर बना चीन… अमेरिका को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    चीन (China), अमेरिका (America) को पीछे छोड़कर 2025-26 में भारत (India) का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार (Largest Trading Partner) बन गया है। उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार (Bilateral Trade) 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस दौरान चीन के साथ देश का व्यापार घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर हो गया। अमेरिका 2024-25 तक लगातार चार वर्षों तक भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था।


    व्यापार घाटा भी रिकॉर्ड स्तर पर

    चीन 2013-14 से 2017-18 तक और फिर 2020-21 में भी भारत का शीर्ष व्यापारिक साझेदार रहा। चीन से पहले यूएई देश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। पिछले वित्त वर्ष के दौरान चीन को भारत का निर्यात 36.66 फीसदी बढ़कर 19.47 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 16 फीसदी बढ़कर 131.63 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा 2025-26 में बढ़कर 112.16 अरब डॉलर के अब तक के उच्च स्तर पर पहुंच गया, जो 2024-25 में 99.2 अरब डॉलर था।


    व्यापार संतुलन में बदलाव

    2025-26 में अमेरिका को निर्यात मामूली रूप से 0.92 प्रतिशत बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.95 फीसदी बढ़कर 52.9 अरब डॉलर हो गया। व्यापार अधिशेष 2024-25 के 40.89 अरब डॉलर से घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया। जिन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ भारत का निर्यात घटा है, उनमें नीदरलैंड, ब्रिटेन, सिंगापुर, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और मलयेशिया शामिल हैं। जिन प्रमुख देशों के साथ 2025-26 में आयात बढ़ा है, उनमें रूस, इराक, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कतर और ताइवान शामिल हैं।

  • जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज

    जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने अमेरिका (America) के व्यापार प्रतिनिधित (यूएसटीआर-USTR) की ओर से लगाए गए आरोपों को सख्ती के साथ खारिज किया। उन्होंने भारत समेत कई देशों पर अतिरिक्त उत्पादन (Excess Production) और औद्योगिक असंतुलन (Industrial Imbalance) का आरोप लगाया था। भारत ने कहा कि जांच शुरू करने वाले नोटिस में इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया है।

    भारत ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह यह निष्कर्ष निकाले कि भारत ने कोई नकारात्मक काम नहीं किया है और उसके खिलाफ जो जांच चल रही है, उसे समाप्त कर दे। यह बात भारत सरकार ने अपने जवाब में यूएसटीआर को बताई।

    11 मार्च को अमेरिका ने अपने व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ जांच शुरू करने की घोषणा की। इनमें भारत, चीन, जापान और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इस जांच का उद्देश्य उन ‘अनुचित विदेशी नीतियों या तरीकों’ को देखना और उन पर कार्रवाई करना है, जिनसे अमेरिकी विनिर्माण उद्योग को नुकसान होता है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने जांच शुरू करने की घोषणा की। यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301(बी) के तहत की गई है। इस जांच में अलग-अलग देशों की ‘नीतियों, कार्यों और तरीकों’ की जांच की जाएगी। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि क्या उन देशों में उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता है और विनिर्माण क्षेत्र में असंतुलन है।


    जांच के दायर में कौन-कौन देश?

    इस जांच के दायरे में आने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं- बांग्लादेश, कंबोडिया, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, इंडोनेशिया, जापान, कोरिया, मलयेशिया, मेक्सिको, नॉर्वे, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, ताइवान, थाईलैंड और वियतनाम।


    अमेरिकी जांच पर भारत ने क्या कहा?

    अमेरिका के जांच नोटिस के जवाब में भारत सरकार ने कहा कि वह इस नोटिस में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह और सख्ती से खारिज करती है। भारत ने कहा कि यह जांच नोटिस सिर्फ बड़े आर्थिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें भारत सरकार की किसी खास नीति या काम का नाम नहीं बताया गया है, जिसे गलत या भेदभावपूर्ण कहा जा सके या जो अमेरिका के व्यापार को नुकसान पहुंचाता हो, जैसा कि कानून की धारा 301(b) में जरूरी है।

    भारत ने कहा है कि नोटिस में इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस कारण या शुरुआती सबूत नहीं दिए गए हैं। यह दावा कि भारत के बड़े उद्योगों में ‘जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता’ है और इससे अमेरिका के साथ व्यापार में अधिक लाभ (ट्रेड सरप्लस) होता है, उसके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है।

    भारत ने कहा कि यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 और 302 के नियमों के अनुसार सही तरीके से शुरू नहीं की गई है। इसलिए भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से अनुरोध किया है कि वह भारत के पक्ष में फैसला दे, जांच को खत्म करे और इसे तुरंत बंद कर दे।

    भारत ने आगे कहा है कि चूंकि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू हो चुकी है, इसलिए किसी भी व्यापारिक चिंता को इसी बातचीत के जरिए हल किया जाना चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दों का समाधान एकतरफा कदमों से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत के ढांचे के भीतर होना चाहिए।

  • भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी

    भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी


    वाशिंगटन।
    ईरान युद्ध (Iran War) के बाद गहराए ईंधन संकट के बीच अमेरिका (America) ने रूसी तेल (Russian oil) खरीद पर लगाई पाबंदी में ढील दी थी। इसकी मियाद 11 अप्रैल को पूरी हो गई। इस दौरान भारत ने अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद देश रूस से जमकर कच्चे तेल (Crude oil) की खरीद की। अब अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ताजा फैसले ने भारत समेत कई एशियाई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका रूसी और ईरानी तेल खरीद के लिए दी गई प्रतिबंधों की छूट की समय सीमा को नहीं बढ़ाएगा।

    अमेरिका का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के तेल बाजार में भारी अस्थिरता है। भारत जैसे देशों ने अपनी आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए इन छूटों का भरपूर लाभ उठाया था।

    क्या है पूरा मामला?
    फरवरी के अंत में अमेरिका-ईरान युद्ध छिड़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। दुनिया के तेल बाजार को स्थिर करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने एक अस्थायी नीति अपनाई थी। इसके तहत 12 मार्च को भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी गई थी। यह केवल उस तेल के लिए थी जो 11 मार्च से पहले जहाजों पर लद चुका था। इसी तरह ईरान के लिए भी 30 दिनों का लाइसेंस दिया गया था। रूस के लिए दी गई छूट 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई है, जबकि ईरान के लिए यह छूट 19 अप्रैल को समाप्त होने जा रही है।


    भारत के लिए बड़ा झटका

    भारत इस छूट का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों ने पहले रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसे रूसी आपूर्तिकर्ताओं से किनारा कर लिया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, छूट मिलने के बाद भारत ने रूस से लगभग 3 करोड़ बैरल तेल के ऑर्डर दिए थे। भारत समेत कई एशियाई देशों ने अमेरिका से इन छूटों को आगे बढ़ाने की अपील की थी, जिसे अब अमेरिकी ट्रेजरी ने ठुकरा दिया है।

    ट्रंप के फैसले की खूब हुई आलोचना
    ट्रंप प्रशासन के इस रुख की अमेरिका के भीतर खासकर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही थी। सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल और अल्पसंख्यक नेता चक शूमर जैसे नेताओं ने आरोप लगाया कि इस छूट से रूस को यूक्रेन के खिलाफ अपनी युद्ध मशीनरी के लिए भारी पैसा मिल रहा है।

    डेमोक्रेट्स का कहना है कि एक तरफ रूस यूक्रेन में बच्चों की हत्या कर रहा है, तो दूसरी तरफ वह ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने के लिए खुफिया जानकारी दे रहा है। ऐसे में उन्हें आर्थिक राहत देना खतरनाक है। ट्रेजरी सचिव बेसेंट ने स्पष्ट किया कि अब कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा क्योंकि समुद्र में जो तेल 11 मार्च से पहले था, वह इस्तेमाल किया जा चुका है।


    अब आगे क्या?

    रूस और ईरान से तेल की आयात बंद होने से भारत को अब खाड़ी के अन्य देशों या अमेरिकी घरेलू बाजार पर निर्भरता बढ़ानी होगी, जो महंगा पड़ सकता है। आपूर्ति कम होने से घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। भारत को अब रूस के साथ व्यापार करने के लिए वैकल्पिक पेमेंट गेटवे जैसे रुपया-रुबल पर गंभीरता से विचार करना होगा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में न आए।

  • ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत

    ईरान युद्ध के चलते कई देशों में आसमान पर पहुंचे पेट्रोल-डीजल के दाम… भारत में अब तक राहत


    नई दिल्ली।
    ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध (Iran–US–Israel War.) शुरू होने के बाद से अबतक कई देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम (Petrol-Diesel Price) आसमान पर पहुंच गए। फिलीपिंस में डीजल के रेट में 172 प्रतिशत उछाल आया तो म्यांमार में पेट्रोल के रेट डबल हो गए। लेकिन, भारत में पेट्रोल-डीजल के रेट में अभी राहत है। दिल्ली में पेट्रोल 94.77 और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर पर पिछले कई साल से अटका हुआ है। यह आशंका प्रबल है कि यह राहत चुनाव के बाद छिन सकती है।


    पेट्रोल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    globalpetrolprices.com के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक पेट्रोल के सबसे अधिक दाम बढ़ाने वाले देशों में म्यांमार (101.1%), फिलीपींस (72.6%), मलेशिया (68.1%), लाओस (45.6%), जिम्बाब्वे (42.9%) पाकिस्तान (42.0%), यूएई (40.8%), कंबोडिया (40.4%) और नेपाल (39.5%)।


    डीजल के दाम सबसे अधिक बढ़ाने वाले देश

    फिलीपींस 172.0%
    लाओस 169.5%
    म्यांमार 161.4%
    मलेशिया 124.7%
    न्यूजीलैंड 89.9%
    यूएई 86.1%
    कंबोडिया 84.0%
    लेबनान 80.5%
    वियतनाम 77.9%
    ऑस्ट्रेलिया 65.3%
    स्रोत: globalpetrolprices.com


    कई देशों को क्यों बढ़ाने पड़े पेट्रोल-डीजल के दाम

    युद्ध के शुरू होने के बाद ्रबेंट क्रूड की कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 111 डॉलर तक पहुंच गईं। सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी, जिससे मार्च के मध्य तक ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के ऊपर पहुंच गया। 6 अप्रैल तक यह 111.73 डॉलर पर था। हालांकि, सीजफायर के बीच इसमें गिरावट आई और कीमत 95.49 डॉलर पर आ गई।

    इस उतार-चढ़ाव का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा। दुनिया भर में औसत पेट्रोल कीमत 1.2 डॉलर प्रति लीटर से बढ़कर 1.44 डॉलर और डीजल 1.2 से 1.6 डॉलर प्रति लीटर तक पहुंच गया। डेटा के अनुसार कुछ देशों में ईंधन कीमतों में विस्फोटक उछाल देखने को मिली। खासतौर पर एशिया और छोटे आयात-निर्भर देशों में दाम तेजी से बढ़े।


    भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं बढ़े?

    एक ओर जब पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल की कीमतो में आग लगी हई है तो दूसरी ओर भारत में शांति है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में इस दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बंगाल समेत 5 राज्यों का चुनाव और सरकार द्वारा टैक्स में कटौती। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल को महंगा होने से बचाने के लिए 10-10 रुपये टैक्स कम कर दिए। वहीं, निर्यात पर टैक्स बढ़ाया, ताकि घरेलू सप्लाई में दिक्कत न हो।

    क्या चुनाव बाद पेट्रोल-डीजल हो जाएगा महंगा?
    चाय की दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक यह चर्चा आम है कि पेट्रोल-डीजल के दाम 5 राज्यों के चुनाव के बाद बढ़ जाएंगे। Macquarie Group ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोल पर कंपनियों को 18 और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। क्यांकि, एक बैरल कच्चे तेल में 10 डॉलर की बढ़ोतरी की वजह से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होता है।

  • भारत से इतनी नफरत, पाकिस्तान में आशा भोसले के गाने चलाए तो चैनल को नोटिस भेजा

    भारत से इतनी नफरत, पाकिस्तान में आशा भोसले के गाने चलाए तो चैनल को नोटिस भेजा

    इस्‍लामाबाद। दिग्गज भारतीय गायिका आशा भोसले पर कंटेंट चलाने को लेकर पाकिस्तान में एक चैनल को कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान में नियामक की तरफ से जारी पत्र में कहा गया है कि भारतीय कंटेंट का प्रसारण करना मना है। साथ ही चैनल से इस संबंध में जवाब भी तलब किया गया है। भोसले का रविवार को मुंबई के अस्पताल में निधन हो गया था। सोमवार को उनका अंतिम संस्कार किया गया।

    पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण (PEMRA) ने जियोन्यूज को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह स्पष्टीकरण मांगा है कि उसने भोसले की मौत की खबर के साथ भारतीय सामग्री क्यों प्रसारित की। पाकिस्तान में भारतीय कंटेंट पर प्रतिबंध 2018 से लागू है।
    PEMRA ने कहा कि भोसले की मौत की खबर प्रसारित करते समय जियोन्यूज ने भारतीय गाने और भारतीय फिल्मों के दृश्य प्रसारित करना, पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले का जानबूझकर उल्लंघन है। जिसमें भारतीय सामग्री के प्रसारण पर प्रतिबंध लगाया गया है।
    जियोन्यूज के प्रबंध निदेशक अजहर अब्बास ने एक पोस्ट में कहा, ‘प्रतिष्ठित कलाकारों के बारे में रिपोर्टिंग करते समय उनके कार्यों को याद करना और उनकी सराहना करना हमेशा से एक परंपरा रही है। वास्तव में, आशा भोसले जैसी कलाकार के लिए, हमें उनके कालजयी और यादगार गीतों को और भी अधिक साझा करना चाहिए था। फिर भी, पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक, PEMRA ने इसे प्रतिबंधित करने का विकल्प चुना है।’
    भोसले का मुंबई के शिवाजी पार्क श्मशान घाट पर सोमवार शाम हिंदू रीति-रिवाज और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। संगीत जगत की जानी-मानी हस्ती को अंतिम विदाई देने के लिए शिवाजी पार्क के अंदर और बाहर काफी संख्या में लोग एकत्र थे। पृष्ठभूमि में आशा का गाया गीत, ‘अभी ना जाओ छोड़कर…’ बज रहा था।

    लता मंगेशकर की बहनों में से एक, आशा भोसले का रविवार को निधन हो गया था। वह 92 वर्ष की थीं। उनकी बड़ी बहन लता का भी फरवरी 2022 में 92 वर्ष की आयु में रविवार के ही दिन निधन हुआ था। भोसले के बेटे आनंद ने उन्हें मुखाग्नि दी। आशा भोसले ने महज 10 साल की उम्र में गाना शुरू किया था और वह आठ दशक लंबे अपने करियर में लगभग 12,000 गीत गाए।

    दिवंगत गायिका को अंतिम विदाई देने वालों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और सुनेत्रा पवार तथा निर्देशक रमेश सिप्पी, अभिनेता आमिर खान और विक्की कौशल शामिल थे।

  • LPG कालाबाजारी पर बड़ा प्रहार 2840 जगह छापे हजारों सिलेंडर जब्त

    LPG कालाबाजारी पर बड़ा प्रहार 2840 जगह छापे हजारों सिलेंडर जब्त

    भोपाल । मध्य प्रदेश में एलपीजी गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए सरकार ने बड़ा और सख्त अभियान चलाया है। खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की अगुवाई में पूरे प्रदेश में व्यापक जांच अभियान चलाया गया जिसमें बड़े स्तर पर अनियमितताएं सामने आईं।

    अभियान के तहत प्रदेशभर में कुल 2840 स्थानों पर जांच की गई जहां से 3691 एलपीजी गैस सिलेंडर जब्त किए गए। यह कार्रवाई आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत की गई है जिसका उद्देश्य जरूरी वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकना है। इस दौरान 11 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई जबकि पेट्रोल पंपों पर भी सख्ती दिखाई गई और 734 रिटेल आउटलेट की जांच में एक मामला दर्ज किया गया।

    सरकार ने केवल कार्रवाई तक ही खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि आगे की व्यवस्था को भी मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। जिन इलाकों में पाइप्ड नेचुरल गैस यानी PNG की पाइपलाइन पहुंच चुकी है वहां के घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को जल्द से जल्द पीएनजी कनेक्शन लेने के निर्देश दिए गए हैं।

    स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि उपभोक्ता आगामी तीन महीनों में पीएनजी कनेक्शन नहीं लेते हैं तो उन्हें एलपीजी गैस की सप्लाई बंद की जा सकती है। यह कदम गैस वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की दिशा में उठाया गया है ताकि कालाबाजारी पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सके।

    सरकार ने सीजीडी संस्थाओं को भी निर्देशित किया है कि वे पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन मिलने के 24 घंटे के भीतर पाइपलाइन बिछाने की स्वीकृति जारी करें। इसके साथ ही पुलिस, रक्षा प्रतिष्ठान, सरकारी कॉलोनियों और सुधार गृहों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर पीएनजी कनेक्शन देने को कहा गया है।

    औद्योगिक क्षेत्रों को भी इस बदलाव में शामिल किया जा रहा है। जहां जहां पाइपलाइन उपलब्ध है वहां की औद्योगिक इकाइयों को चिन्हित कर उन्हें पीएनजी पर शिफ्ट करने के निर्देश दिए गए हैं जिससे गैस आपूर्ति प्रणाली अधिक नियंत्रित और प्रभावी बन सके।

    इस अभियान के तहत विभिन्न गैस कंपनियों जैसे GAIL Gas Limited Indian Oil Corporation Bharat Petroleum और Gujarat Gas को कंट्रोल रूम नंबर जारी कर उपभोक्ताओं को पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन करने की सुविधा दी गई है।

    सरकार का यह कदम साफ संकेत देता है कि अब गैस वितरण में पारदर्शिता और सख्ती दोनों साथ साथ लागू की जाएंगी। एलपीजी की कालाबाजारी पर लगाम कसने के साथ साथ पीएनजी को बढ़ावा देकर एक स्थायी और सुरक्षित विकल्प की ओर बढ़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।

  • भारत के लिए गुड न्यूज है सीजफायर, LPG पर पड़ेगा बड़ा असर; कितने दिन खुलेगा होर्मुज

    भारत के लिए गुड न्यूज है सीजफायर, LPG पर पड़ेगा बड़ा असर; कितने दिन खुलेगा होर्मुज


    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर हालात सामान्य हो सकते हैं। एक ओर जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो सप्ताह के युद्ध विराम का ऐलान किया है। वहीं, ईरान ने भी होर्मुज जलमार्ग खोलने पर सहमति जता दी है। अब यह घोषणा भारत के लिए भी खुशखबरी साबित हो सकती है, क्योंकि पश्चिम एशिया में तनाव के बीच देश में ईंधन संकट गहराता जा रहा था।
    कब तक मिलेगी राहत

    ट्रंप ने लिखा, ‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल असीम मुनीर से हुई बातचीत के आधार पर, जिसमें उन्होंने मुझसे ईरान पर आज रात होने वाले विनाशकारी हमले को रोकने का अनुरोध किया था। साथ ही ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरा, तत्काल और सुरक्षित तरीके से खोलने के मद्देनजर मैं दो सप्ताह के लिए ईरान पर दो हफ्ते के लिए बमबारी और हमले रोकने के लिए तैयार हो गया हूं।’

    एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान भी सीजफायर के लिए तैयार हो गया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने माना है कि तेहरान की तरफ से मांगें स्वीकार कर ली गई हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी बलों के समन्वय के साथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से इन दो सप्ताह के लिए जहाजों को सुरक्षित तरीके से निकलने दिया जाएगा।
    भारत पर क्यों पड़ा था होर्मुज बंद होने का असर

    युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने का ऐलान कर दिया था। अब इसके चलते भारत में ईंधन सप्लाई को बड़ा झटका लगा था।

    खबरें हैं कि भारत का 40 फीसदी कच्चा तेल आयात, 50 प्रतिशत से ज्यादा LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस और 90 प्रतिशत LPG इस स्ट्रेट के जरिए ही पश्चिम एशिया से आता था।
    भारत को दे दी थी अनुमति

    होर्मुज जलमार्ग ईरान की तरफ से बंद किए जाने के बाद यहां जहाजों का आवागमन करीब 95 प्रतिशत गिर गया था। हालांकि, इसके कुछ समय बाद ईरान ने भारत समेत कुछ देशों को मित्र करार दिया और होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी थी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की तरफ से जारी बयान के अनुसार, चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान को गुजरने की अनुमति दी गई थी।
    कितने भारतीय जहाज अटके

    पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय ध्वज वाले दो एलपीजी टैंकर सुरक्षित रूप से होर्मुज पार कर भारतीय बंदरगाहों की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि 16 अन्य मालवाहक जहाज अब भी फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी।

    बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव मुकेश मंगल ने कहा कि 46,650 टन एलपीजी से लदा टैंकर ‘ग्रीन सानवी’ सात अप्रैल को भारत पहुंचेगा। जबकि 15,500 टन गैस लेकर ‘ग्रीन आशा’ टैंकर नौ अप्रैल को भारतीय तट पर पहुंचेगा।

    फिलहाल फारस की खाड़ी में फंसे जहाजों में एक एलएनजी पोत, दो एलपीजी टैंकर, छह कच्चा तेल ले जाने वाले जहाज, तीन कंटेनर पोत, एक ड्रेजर, एक रसायन ले जाने वाला पोत और दो थोक मालवाहक शामिल हैं।

    वरिष्ठ अधिकारी ने इस स्ट्रेट को पार करने के लिए ईरान द्वारा शुल्क लिए जाने की खबरों के बारे में पूछे जाने पर कहा, ‘हमें इस तरह के भुगतान की कोई जानकारी नहीं है।’

    भारतीयों को मिलेगी राहत

    भारत रसोई गैस की अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात से पूरा करता है, जिसमें से करीब 90 प्रतिशत आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है। ऐसे में इन टैंकरो का आगमन देश में एलपीजी आपूर्ति पर दबाव को कम करने में मदद करेगा। वहीं, अब जब होर्मुज दो सप्ताह के लिए खुलने जा रहा है, तो भारत आने वाले जहाजों में तेजी आएगी। ऐसे में भारत को बड़ी राहत मिल सकती है। दरअसल, भारत की सालाना एलपीजी खपत 33 मिलियन टन से ज्यादा की है।

  • भारत के टेक्सटाइल सेक्टर तेजी से कर रहा विस्तार… 14 साल में 3 गुना बढ़ा कपड़ा मार्केट

    भारत के टेक्सटाइल सेक्टर तेजी से कर रहा विस्तार… 14 साल में 3 गुना बढ़ा कपड़ा मार्केट


    नई दिल्ली।
    भारत (India) का कपड़ा और अपैरल बाजार (Textile and Apparel Market) तेजी से विस्तार कर रहा है और इसकी झलक हाल ही में जारी रिपोर्ट में साफ दिखाई देती है। वस्त्र मंत्रालय के सर्वे के अनुसार, देश का टेक्सटाइल मार्केट (Textile market) 2024 में बढ़कर 14.95 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो 2010 में सिर्फ 4.89 लाख करोड़ रुपये था, यानी पिछले करीब 14 साल में इस सेक्टर ने शानदार ग्रोथ दिखाई है और यह हर साल औसतन 8.3% की दर से बढ़ा है। इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह घरेलू मांग में लगातार इजाफा है। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ रही है और लाइफस्टाइल बदल रहा है, वैसे-वैसे कपड़ों पर खर्च भी बढ़ता जा रहा है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, आज के समय में सिंथेटिक और मिक्स फाइबर वाले कपड़ों की मांग सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ी है। इनका कुल बाजार में हिस्सा 52.2% तक पहुंच गया है, जबकि कॉटन यानी सूती कपड़ों की हिस्सेदारी 41.2% है। वहीं, सिल्क और ऊन जैसे रेगुलर फाइबर की हिस्सेदारी काफी कम है। खास बात यह है कि सिंथेटिक और मिक्स फाइबर का बाजार 2010 के 1.47 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 4.47 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जो उपभोक्ताओं की बदलती पसंद को दर्शाता है। लोग अब ऐसे कपड़े पसंद कर रहे हैं, जो सस्ते, टिकाऊ और मेंटेन करने में आसान हों।

    इस ग्रोथ में घरेलू उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा योगदान है। रिपोर्ट के अनुसार, परिवारों द्वारा कपड़ों पर खर्च 2010 के 4.18 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024 में 8.77 लाख करोड़ रुपये हो गया है, यानी कुल बाजार का बड़ा हिस्सा घरेलू खपत से ही आ रहा है। इसके अलावा प्रति व्यक्ति खर्च भी तेजी से बढ़ा है। 2010 में जहां एक व्यक्ति औसतन 2,119 रुपये कपड़ों पर खर्च करता था, वहीं 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 6,066 रुपये हो गया है। यह दिखाता है कि लोग अब फैशन और ब्रांड्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

    एक और दिलचस्प बात यह है कि कपड़ा बाजार में महिलाओं की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुल खरीद में महिलाओं का योगदान 55.5% है, जबकि मेल की हिस्सेदारी 44.5% है, यानी इस सेक्टर की ग्रोथ में महिला उपभोक्ता सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी हैं।

    भारत का टेक्सटाइल सेक्टर न सिर्फ तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि इसमें बड़े बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ती आय और फैशन के प्रति बढ़ती जागरूकता इस ग्रोथ को आगे भी गति दे सकती है। आने वाले समय में यह सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत इंजन साबित हो सकता है।