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  • छिंदवाड़ा में दर्दनाक सड़क हादसा, कार की टक्कर से पति-पत्नी की मौत, तीन बेटियां घायल, एक बच्ची नागपुर रेफर

    छिंदवाड़ा में दर्दनाक सड़क हादसा, कार की टक्कर से पति-पत्नी की मौत, तीन बेटियां घायल, एक बच्ची नागपुर रेफर


    मध्य प्रदेश।
    के छिंदवाड़ा क्षेत्र में पांढुर्णा के तिगांव हाईवे पर रविवार देर रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में पति-पत्नी की मौत हो गई, जबकि उनकी तीन मासूम बेटियां घायल हो गईं। परिवार देवियों के दर्शन करने के बाद बाइक से अपने गांव चाटवा लौट रहा था। इसी दौरान फोरलेन सड़क पार करते समय एक कार ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। हादसा रात करीब 12 बजे हुआ। दुर्घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। सूचना मिलने पर डायल 112 की टीम पहुंची और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। वहां डॉक्टरों ने पति-पत्नी को मृत घोषित कर दिया। घायल बच्चियों में से एक की हालत गंभीर होने के कारण उसे बेहतर इलाज के लिए नागपुर रेफर किया गया है।

    मृतकों की पहचान चाटवा गांव निवासी वासुदेव उईके, उम्र 40 वर्ष, और उनकी पत्नी सुनीता उईके, उम्र 35 वर्ष, के रूप में हुई है। दोनों अपनी तीन बेटियों के साथ बाइक पर सवार होकर घर लौट रहे थे। धार्मिक दर्शन के बाद परिवार की यात्रा उस समय हादसे में बदल गई, जब तिगांव हाईवे पर फोरलेन सड़क पार करते हुए उनकी बाइक कार की चपेट में आ गई। टक्कर इतनी गंभीर थी कि दंपती की जान नहीं बचाई जा सकी। तीनों बच्चियां भी दुर्घटना में घायल हो गईं।

    हादसे के बाद स्थानीय स्तर पर घायलों को तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत पड़ी। सूचना मिलने पर डायल 112 की टीम घटनास्थल पर पहुंची। टीम ने घायल बच्चियों को अस्पताल पहुंचाने में मदद की। अस्पताल में जांच के बाद चिकित्सकों ने वासुदेव और सुनीता को मृत घोषित कर दिया। माता-पिता की मौत के बाद तीनों बच्चियों के इलाज की व्यवस्था की गई। परिवार पर एक साथ आई इस विपत्ति से गांव में भी दुख का माहौल है।

    दुर्घटना में घायल तीन वर्षीय वैष्णवी को गंभीर चोट आई है। उसके पैर की हड्डी टूटने की जानकारी सामने आई है। उसकी स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे बेहतर उपचार के लिए नागपुर रेफर करने का निर्णय लिया। उसे आगे के इलाज के लिए नागपुर भेजा गया है। वहीं, पांच वर्षीय राखी और सात वर्षीय सोनू को पांढुर्णा के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है। दोनों बच्चियों का उपचार जारी है। चिकित्सक उनकी स्थिति पर नजर रख रहे हैं। परिवार के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता घायल बच्चियों के स्वास्थ्य और इलाज की है।

    प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हादसा उस समय हुआ जब परिवार बाइक से फोरलेन सड़क पार कर रहा था। सड़क पर कार की टक्कर से बाइक सवार दंपती और उनकी बेटियां गिरकर घायल हो गईं। हालांकि, दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई और कार की गति कितनी थी, इसकी विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है। पुलिस घटना से जुड़े तथ्यों की जांच कर रही है।

    थाना प्रभारी अमित दानी के अनुसार, दुर्घटना के बाद कार चालक मौके से फरार हो गया। पुलिस ने संबंधित कार की पहचान कर ली है और फरार चालक के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है। मामले में आगे की कार्रवाई के लिए जांच की जा रही है। चालक की तलाश और हादसे के कारणों का पता लगाना जांच का अहम हिस्सा है।

    यह हादसा एक परिवार के लिए बेहद दुखद साबित हुआ है। देवियों के दर्शन कर घर लौट रहे माता-पिता की मौत के बाद उनकी तीनों बेटियां घायल अवस्था में अस्पताल पहुंचीं। एक बच्ची को गंभीर चोट के कारण नागपुर भेजना पड़ा, जबकि अन्य दो का पांढुर्णा में उपचार जारी है। पुलिस की जांच के बाद दुर्घटना से जुड़ी परिस्थितियों के बारे में और जानकारी सामने आ सकेगी।

  • पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले

    पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले


    मध्य प्रदेश। में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य देशभर में पराली जलाने के मामलों में पहले स्थान पर रहा। पूरे देश में इस साल कुल 33,028 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 17,067 मामलों की रही। यह राष्ट्रीय आंकड़े का आधे से भी अधिक है। उपग्रह आधारित आंकड़ों से सामने आई इस स्थिति ने खेतों में फसल अवशेष जलाने और उससे होने वाले प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में वर्ष 2021 से पहले पराली जलाने की घटनाएं सालाना पांच हजार से कम रहती थीं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने के साथ बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में प्रदेश में पराली जलाने के 16,074 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,067 हो गई। इस तरह एक साल में 993 घटनाओं की वृद्धि दर्ज की गई।

    वर्तमान सीजन में भी पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 350 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों के निपटान से जुड़ी चुनौती को दर्शाता है। यदि खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उनके प्रबंधन के प्रभावी उपाय उपलब्ध नहीं होते, तो ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।

    राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी पराली जलाने के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में 5,769 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में बढ़कर 7,290 हो गईं। राजस्थान में भी इनकी संख्या 2024 के 2,762 मामलों से बढ़कर 2025 में 2,890 हो गई।

    इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। पंजाब में वर्ष 2021 में 71,304 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। हरियाणा में भी 2021 के 6,984 मामलों की तुलना में 2025 में 662 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से अलग-अलग राज्यों में पराली प्रबंधन की स्थिति में आए बदलाव का पता चलता है।

    देशभर में पराली जलाने की कुल घटनाओं में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। वर्ष 2021 में कुल 92,407 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या घटकर 56,157 और 2023 में 57,242 रही। वर्ष 2024 में कुल 36,893 मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 33,028 हो गई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में बढ़ते मामले राज्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।

    पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। सर्दियों में जब धुआं और कोहरा एक साथ मौजूद रहते हैं, तो स्मॉग की स्थिति बन सकती है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर खराब या बहुत खराब श्रेणी तक पहुंचने की आशंका रहती है, हालांकि इसका वास्तविक स्तर स्थान और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है। सांस की एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए धुएं के संपर्क में आना विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, फेफड़ों की कार्यक्षमता में किसी निश्चित प्रतिशत की कमी या अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने का आकलन करने के लिए संबंधित अध्ययन और स्वास्थ्य आंकड़ों की पुष्टि आवश्यक है।

    पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई, जुर्माने और जागरूकता संबंधी प्रयास किए जाते हैं। लेकिन किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग और उनका उचित प्रबंधन पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है। मध्य प्रदेश में बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभावी रोकथाम और किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

  • मध्य प्रदेश के सिंगरौली में 3.5 तीव्रता का भूकंप, दोपहर 2:12 बजे आए झटकों का केंद्र 10 किलोमीटर गहराई में

    मध्य प्रदेश के सिंगरौली में 3.5 तीव्रता का भूकंप, दोपहर 2:12 बजे आए झटकों का केंद्र 10 किलोमीटर गहराई में

    मध्य प्रदेश। के सिंगरौली जिले में शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को भूकंप के झटके दर्ज किए गए। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 3.5 मापी गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भूकंप दोपहर 2 बजकर 12 मिनट 35 सेकंड पर आया। इसका केंद्र जमीन से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में स्थित था। सिंगरौली में भूकंप दर्ज होने की जानकारी सामने आने के बाद इस घटना का समय, तीव्रता और केंद्र की गहराई प्रमुख विवरण रहे।

    भूकंप की तीव्रता 3.5 होने के कारण इसे हल्की श्रेणी का भूकंप माना जाता है। इस स्तर के भूकंप के झटके कुछ लोगों को महसूस हो सकते हैं, जबकि कई बार लोग इन्हें महसूस नहीं कर पाते। झटकों का अनुभव आसपास के क्षेत्र, इमारत की स्थिति और व्यक्ति के स्थान जैसे कारकों पर निर्भर कर सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि सिंगरौली में कितने लोगों ने झटके महसूस किए।भूकंप का केंद्र जमीन से 10 किलोमीटर नीचे बताया गया है। भूकंप विज्ञान में केंद्र की गहराई महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इससे सतह पर झटकों के प्रभाव को समझने में मदद मिलती है। हालांकि, केवल तीव्रता और गहराई के आधार पर किसी क्षेत्र में हुए नुकसान का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए स्थानीय स्थिति और नुकसान से जुड़ी अलग जानकारी की जरूरत होती है।

    सिंगरौली मध्य प्रदेश का एक प्रमुख ऊर्जा क्षेत्र है। यहां भूकंप के झटके दर्ज होने की खबर शनिवार दोपहर सामने आई। उपलब्ध विवरण में भूकंप की तीव्रता, समय और केंद्र की गहराई की जानकारी दी गई है। हालांकि, घटना के बाद किसी तरह के जान-माल के नुकसान, भवनों में दरार या अन्य प्रभावों के बारे में कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।भूकंप की तीव्रता को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि रिक्टर स्केल पर दर्ज संख्या भूकंप के परिमाण को दर्शाती है। 3.5 तीव्रता का भूकंप सामान्य तौर पर हल्के स्तर का होता है, लेकिन अलग-अलग स्थानों पर इसका अनुभव अलग हो सकता है। कम तीव्रता के झटके भी कुछ परिस्थितियों में महसूस किए जा सकते हैं, जबकि कुछ जगहों पर उनका पता नहीं चलता।

    भूकंप की घटना के संबंध में उपलब्ध जानकारी में किसी बड़े नुकसान या आपात स्थिति का उल्लेख नहीं है। ऐसे में नुकसान होने या नहीं होने के बारे में अतिरिक्त पुष्टि के बिना कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। घटना से जुड़े विवरणों में फिलहाल सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि भूकंप शनिवार दोपहर दर्ज किया गया और इसकी तीव्रता 3.5 रही।भूकंप जैसी घटनाओं के दौरान लोगों को घबराने के बजाय सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए। यदि झटके महसूस हों, तो मजबूत मेज के नीचे सुरक्षित स्थान लेना, खिड़कियों और भारी वस्तुओं से दूरी बनाए रखना तथा लिफ्ट का उपयोग नहीं करना उपयोगी सावधानियां हैं। झटके रुकने के बाद आसपास की स्थिति देखकर ही बाहर निकलना चाहिए और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों पर ध्यान देना चाहिए।

    सिंगरौली में 17 अक्टूबर को दर्ज इस भूकंप का केंद्र 10 किलोमीटर की गहराई में था और इसकी तीव्रता 3.5 मापी गई। घटना से संबंधित उपलब्ध जानकारी में किसी नुकसान की पुष्टि नहीं की गई है। आगे की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन या संबंधित विभागों की ओर से जारी होने वाली पुष्ट जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • एमपी टीईटी 2026 में शिक्षकों का विरोध बरकरार, तारीख तीन बार बढ़ाने और ऑफलाइन परीक्षा के फैसले के बावजूद आवेदन कम

    एमपी टीईटी 2026 में शिक्षकों का विरोध बरकरार, तारीख तीन बार बढ़ाने और ऑफलाइन परीक्षा के फैसले के बावजूद आवेदन कम

    मध्य प्रदेश। में शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी 2026 को लेकर शिक्षकों का विरोध जारी है। आवेदन की समयसीमा तीन बार बढ़ाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षकों ने परीक्षा के लिए पंजीयन नहीं कराया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, परीक्षा के लिए करीब 30 हजार शिक्षकों ने ही आवेदन किया है, जबकि प्रदेश में लगभग डेढ़ लाख शिक्षक इसके दायरे में आते हैं। इस तरह करीब 1.20 लाख शिक्षकों ने निर्धारित समय तक फॉर्म नहीं भरा। आवेदन की अंतिम तारीख 11 अक्टूबर थी।

    आवेदन प्रक्रिया के दौरान शिक्षकों को अतिरिक्त समय देने के लिए तीन बार समयसीमा बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद पंजीयन की संख्या अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ी। कुल डेढ़ लाख शिक्षकों की तुलना में लगभग 30 हजार पंजीयन का आंकड़ा बताता है कि बड़ी संख्या में शिक्षक अभी भी परीक्षा से दूर हैं। इस स्थिति के पीछे शिक्षकों का विरोध प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। शिक्षक संगठन लंबे समय से सेवा दे रहे अध्यापकों के लिए टीईटी की अनिवार्यता समाप्त करने की मांग कर रहे हैं।

    शिक्षक संगठनों का कहना है कि जो शिक्षक पहले से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, उन्हें दोबारा पात्रता परीक्षा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर प्रदेश में आंदोलन किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शिक्षकों की समस्या के समाधान के लिए आयोग बनाने का भरोसा दिया था और उनसे परीक्षा के फॉर्म भरने की अपील की थी। इसके बाद शिक्षकों ने अपना आंदोलन स्थगित किया, लेकिन उनकी मांगें पूरी नहीं होने की स्थिति में दोबारा प्रदर्शन करने का विकल्प खुला रखा है। टीईटी की अनिवार्यता खत्म करने की मांग अब भी विवाद का मुख्य विषय बनी हुई है।

    सरकार ने परीक्षा के तरीके को लेकर भी बदलाव का फैसला किया था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन परीक्षा कराने की घोषणा की थी। इसके बाद ऑफलाइन परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया। यह कदम शिक्षकों की मांगों के बीच उठाया गया था, लेकिन इससे विरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। शिक्षकों की मुख्य मांग परीक्षा के माध्यम को बदलने के बजाय टीईटी की अनिवार्यता से राहत देने की है।

    शुरुआत में परीक्षा आयोजित कराने की जिम्मेदारी ईएसबी को दी गई थी। इसके तहत 12 अक्टूबर से परीक्षा कराने की तैयारी की गई थी, लेकिन ऑफलाइन परीक्षा के लिए जरूरी व्यवस्थाएं पूरी नहीं हो सकीं। इसी कारण तय कार्यक्रम के अनुसार परीक्षा नहीं हो पाई। ऑफलाइन परीक्षा में अभ्यर्थियों को कंप्यूटर के बजाय कागज पर प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं। इसके लिए परीक्षा केंद्रों और अन्य जरूरी संसाधनों की अलग व्यवस्था करनी पड़ती है।

    अब परीक्षा कराने के लिए दूसरी एजेंसी की तलाश की जा रही है। हायर एजुकेशन बोर्ड के माध्यम से दिसंबर में परीक्षा आयोजित कराने की तैयारी बताई गई है। हालांकि, यह योजना अभी तैयारी के स्तर पर है और परीक्षा की नई तारीख या आगे की प्रक्रिया को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में शिक्षकों के सामने परीक्षा की तारीख और अनिवार्यता से जुड़ी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार बना हुआ है। आवेदन के आंकड़े बताते हैं कि तारीख बढ़ाने और परीक्षा के तरीके में बदलाव के बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षक अब तक पंजीयन से दूर हैं।

  • कूनो नेशनल पार्क में नामीबियाई चीता आशा के आठ महीने के शावक की मौत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलेगा कारण

    कूनो नेशनल पार्क में नामीबियाई चीता आशा के आठ महीने के शावक की मौत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलेगा कारण

    मध्य प्रदेश । के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाई गई मादा चीता आशा के आठ महीने के एक शावक की मौत हो गई है। सोमवार को नियमित निगरानी के दौरान वन विभाग की टीम को आशा के साथ पांच के बजाय चार शावक दिखाई दिए। एक शावक के गायब होने की जानकारी मिलने के बाद उसकी तलाश शुरू की गई। कुछ समय बाद तलाशी अभियान के दौरान उसका शव बरामद कर लिया गया। फिलहाल शावक की मौत की वजह स्पष्ट नहीं हुई है और अधिकारी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।

    वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, शावक के दिखाई नहीं देने पर पार्क में उसकी तलाश के लिए अभियान चलाया गया। इसके तहत वन कर्मियों ने पार्क के बड़े हिस्से में खोजबीन की। तलाशी के दौरान शावक का शव मिलने के बाद उसकी मौत के कारणों का पता लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट आने के बाद ही इस संबंध में स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

    मादा चीता आशा भारत में चीता पुनर्वास कार्यक्रम के तहत नामीबिया से लाए गए चीतों में शामिल है। उसे विशेष विमान के जरिए कूनो नेशनल पार्क पहुंचाया गया था। इस साल की शुरुआत में आशा ने पांच शावकों को जन्म दिया था। इन शावकों के जन्म को देश में चीता पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया था। अब उसके एक शावक की मौत के बाद वन विभाग उसके कारणों की जांच कर रहा है।

    कूनो नेशनल पार्क के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने बताया कि शावक की मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि शव का पोस्टमॉर्टम कराया जा रहा है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही मौत की वजह के बारे में स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी। फिलहाल किसी निश्चित कारण की पुष्टि नहीं हुई है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि शावक की मौत किन परिस्थितियों में हुई।

    यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब कूनो नेशनल पार्क में चीतों के प्रजनन से जुड़ी सकारात्मक खबरें भी सामने आती रही हैं। पार्क में शावकों के जन्म से भारत में चीते की आबादी को स्थापित करने और उसे स्थायी बनाने की उम्मीदों को बल मिला है। हालांकि, आशा के आठ महीने के शावक की मौत के बाद इस मामले में वन विभाग की जांच और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो गई है।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कूनो नेशनल पार्क में चीतों की कुल संख्या 59 बताई गई है। इनमें 40 शावक भारत में जन्मे हैं। वहीं, 15 चीते खुले जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे हैं। शावक की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए वन विभाग रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि मौत प्राकृतिक कारणों से हुई या इसके पीछे कोई अन्य वजह थी।

  • .पूजा-पाठ और त्योहारों को लेकर विवाद में पति पर पत्नी की हत्या का आरोप, राजगढ़ में कुल्हाड़ी से हमला कर वारदात को दिया अंजाम

    .पूजा-पाठ और त्योहारों को लेकर विवाद में पति पर पत्नी की हत्या का आरोप, राजगढ़ में कुल्हाड़ी से हमला कर वारदात को दिया अंजाम

    मध्य प्रदेश: के राजगढ़ जिले में धार्मिक मान्यताओं और पूजा-पाठ को लेकर पति-पत्नी के बीच चल रहा विवाद एक गंभीर आपराधिक घटना में बदल गया। गुराड़खेड़ा गांव में रामबाबू गुर्जर पर अपनी पत्नी गायत्रीबाई गुर्जर (36) की कुल्हाड़ी से हमला कर हत्या करने का आरोप है। घटना शनिवार सुबह करीब 9:30 बजे की बताई गई है। वारदात के बाद आरोपी पति के फरार होने की जानकारी सामने आई है। यह घटना राजगढ़ कोतवाली थाना क्षेत्र की है। मृतका के पिता ने बताया कि गायत्रीबाई ने घटना से पहले फोन कर अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई थी। उसने पिता से जल्द आने के लिए कहा था और आशंका व्यक्त की थी कि उसका पति उसे मार देगा। इस फोन कॉल के बाद हुई वारदात से परिवार में शोक का माहौल है। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और आरोपी की तलाश की जा रही है।

    परिजनों के मुताबिक, रामबाबू और गायत्रीबाई के बीच भगवान में आस्था रखने, पूजा-पाठ करने और त्योहार मनाने को लेकर अक्सर विवाद होता था। मृतका के पिता ने आरोप लगाया कि रामबाबू अपनी पत्नी के पूजा करने पर आपत्ति जताता था। वह उससे कहता था कि भगवान को नहीं मानना चाहिए और भगवान ही सब कुछ नहीं हैं। परिवार के अनुसार, गायत्रीबाई धार्मिक गतिविधियों में रुचि रखती थी, जबकि पति को उसके पूजा-पाठ और त्योहार मनाने से परेशानी थी। यह भी बताया गया कि रामबाबू अधिकतर समय घर से बाहर रहता था। परिजनों ने धार्मिक मान्यताओं को लेकर होने वाले विवाद को इस घटना की पृष्ठभूमि बताया है। हालांकि, घटना के सभी पहलुओं की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी।

    शुरुआती जानकारी के अनुसार, शनिवार सुबह गायत्रीबाई पर कुल्हाड़ी से चार वार किए गए। उसकी पीठ पर तीन और गर्दन पर एक वार किया गया था। हमले में महिला की मौत हो गई। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। राजगढ़ कोतवाली थाना प्रभारी मंजू मखेनिया के मुताबिक, पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाने के लिए फॉरेंसिक साइंस लैब यानी एफएसएल की टीम को बुलाया। टीम ने मौके से जरूरी साक्ष्य एकत्र किए। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी रामबाबू गुर्जर की तलाश शुरू कर दी है। जांच में घटना से जुड़े तथ्यों और पारिवारिक विवाद की परिस्थितियों की पड़ताल की जा रही है।

    गुराड़खेड़ा गांव राजगढ़ कोतवाली थाने से करीब 32 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव राजस्थान की सीमा से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर है। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद गायत्रीबाई का शव उसके पिता को सौंप दिया गया। शनिवार शाम करीब 5:30 बजे शव जिला अस्पताल पहुंचा था। मृतका के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा गब्बर 14 साल का है, जबकि छोटा बेटा धनराज आठ साल का है। मां की मौत के बाद दोनों बच्चों के सिर से मां का साया उठ गया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और आरोपी की तलाश जारी है। फिलहाल पुलिस की ओर से मामले में आगे की कार्रवाई की जा रही है।

  • कमलनाथ ने भाजपा पर ओबीसी का 27% आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया, सुप्रीम कोर्ट जाने और विधानसभा में नया कानून लाने की मांग

    कमलनाथ ने भाजपा पर ओबीसी का 27% आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया, सुप्रीम कोर्ट जाने और विधानसभा में नया कानून लाने की मांग

    मध्य प्रदेश । में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में हाई कोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2019 में उनकी सरकार की ओर से दिया गया 27 प्रतिशत आरक्षण भाजपा सरकारों के कार्यकाल में समाप्त हो गया। कमलनाथ ने कहा कि आरक्षण की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन वर्ष 2020 से प्रदेश की सत्ता में रही भाजपा सरकारों ने इस मामले में अदालत के सामने ओबीसी वर्ग का पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखा।

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग से जुड़ी याचिकाएं खारिज कर दीं। साथ ही, जिन 13 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां रोककर रखी गई थीं, उन पर तीन महीने के भीतर नियुक्तियां करने के निर्देश दिए। इस फैसले के बाद कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। कमलनाथ ने फैसले के संदर्भ में भाजपा सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी सरकार ने ओबीसी वर्ग के हित में आरक्षण का प्रावधान किया था, लेकिन बाद की सरकारों ने इसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए।

    कमलनाथ ने कहा कि वर्ष 2019 में उनकी सरकार ने मध्य प्रदेश विधानसभा में कानून पारित कर ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया था। उनके मुताबिक, यह फैसला संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए लिया गया था। उन्होंने भाजपा नेताओं के उन बयानों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें कांग्रेस सरकार पर जल्दबाजी में आरक्षण लागू करने का आरोप लगाया जा रहा है। कमलनाथ ने ऐसे बयानों को भ्रामक बताते हुए कहा कि इससे अदालत के आदेश की गलत व्याख्या होने की स्थिति बनती है।

    पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 से प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और पिछले छह वर्षों के दौरान ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या से जुड़े सही आंकड़े अदालत के सामने नहीं रखे गए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह न्यायालय में इस मामले को मजबूती से प्रस्तुत करे। कमलनाथ के अनुसार, भाजपा नेताओं के बयानों से यह सवाल उठता है कि वर्ष 2019 में आरक्षण लागू होने के बाद उसके संरक्षण के लिए सरकार ने क्या प्रयास किए।

    कमलनाथ ने कहा कि यदि भाजपा नेताओं के दावों को सही मान लिया जाए, तो यह सवाल खड़ा होता है कि पिछले छह वर्षों में अदालत के समक्ष ओबीसी वर्ग का पक्ष रखने के लिए क्या कदम उठाए गए। उन्होंने भाजपा पर आरक्षण के मुद्दे पर जिम्मेदारी निभाने में विफल रहने का आरोप लगाया। हालांकि, अदालत में ओबीसी आरक्षण से संबंधित पक्ष रखने और आंकड़े प्रस्तुत करने को लेकर कमलनाथ ने जो आरोप लगाए, वे उनके राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं।

    कमलनाथ ने प्रदेश सरकार से मांग की कि वह ओबीसी वर्ग के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करे। उन्होंने यह भी कहा कि विधानसभा में नया कानून पारित करके 27 प्रतिशत आरक्षण बहाल किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, आरक्षण को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को न्यायिक और विधायी स्तर पर कदम उठाने चाहिए। हाई कोर्ट के फैसले के बाद कमलनाथ की यह मांग मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच सामने आई है।

  • मध्यप्रदेश में 10 DSP स्तर के अधिकारियों की नई पोस्टिंग, गृह विभाग ने जारी किए आदेश, भोपाल सहित कई जिलों में बदली जिम्मेदारियां

    मध्यप्रदेश में 10 DSP स्तर के अधिकारियों की नई पोस्टिंग, गृह विभाग ने जारी किए आदेश, भोपाल सहित कई जिलों में बदली जिम्मेदारियां

    मध्यप्रदेश । में पुलिस विभाग के भीतर अधिकारियों की नई पदस्थापना की गई है। राज्य सरकार के गृह विभाग ने राज्य पुलिस सेवा के 10 अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव करते हुए नई पोस्टिंग के आदेश जारी किए हैं। इन अधिकारियों को अलग-अलग स्थानों पर पुलिस अधीक्षक, सहायक पुलिस महानिरीक्षक और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पदों पर पदस्थ किया गया है। नई व्यवस्था के तहत भोपाल पुलिस मुख्यालय के साथ बालाघाट, नर्मदापुरम, सागर और उज्जैन में भी अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस फेरबदल में इंदौर और भोपाल में पहले से पदस्थ दो सहायक पुलिस आयुक्त स्तर के अधिकारियों को भी नई पोस्टिंग दी गई है।

    जारी आदेश के अनुसार, प्रीतम सिंह बालरे को बालाघाट में सहायक पुलिस महानिरीक्षक की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, मनोहर सिंह गवली को नर्मदापुरम की अजाक रेंज में पुलिस अधीक्षक के पद पर पदस्थ किया गया है। इन दोनों अधिकारियों की नई तैनाती के साथ संबंधित स्थानों पर पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया है। गृह विभाग के आदेश में सभी 10 अधिकारियों के लिए अलग-अलग पद और कार्यस्थल निर्धारित किए गए हैं।

    भोपाल में भी कई अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां मिली हैं। बाबूलाल वर्मा को भोपाल स्थित रेडियो मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। राम शंकर सिलावट को भोपाल पुलिस मुख्यालय में सहायक पुलिस महानिरीक्षक के पद पर पदस्थ किया गया है। इसी तरह महेंद्र रायपुरिया को भोपाल में विसबल के सहायक पुलिस महानिरीक्षक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन नियुक्तियों के माध्यम से पुलिस मुख्यालय और उससे संबंधित इकाइयों में अधिकारियों की नई तैनाती की गई है।

    भोपाल पुलिस मुख्यालय की क्यूडी शाखा में भी दो अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। ऋतुराज गुप्ता को यहां अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर पदस्थ किया गया है। सत्येन्द्र कुमार वर्मा को भी इसी शाखा में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। दोनों अधिकारियों की नई पोस्टिंग के साथ क्यूडी शाखा में राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित की गई है। गृह विभाग के आदेश में इन पदों पर तैनाती का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

    अन्य जिलों और इकाइयों में भी नई पदस्थापनाएं की गई हैं। विनोद कुमार दीक्षित को उज्जैन लोकायुक्त में पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी दी गई है। सतीश कुमार चतुर्वेदी को सागर जोन में सहायक पुलिस महानिरीक्षक के पद पर नियुक्त किया गया है। वहीं, बिट्टू शर्मा को भोपाल पुलिस मुख्यालय में सहायक पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है। इन आदेशों के तहत अधिकारियों को उनके नए पदस्थापना स्थलों पर जिम्मेदारी संभालनी होगी।

    गृह विभाग की ओर से जारी इस आदेश में कुल 10 राज्य पुलिस सेवा अधिकारियों की नई पोस्टिंग शामिल है। इसमें भोपाल पुलिस मुख्यालय की विभिन्न शाखाओं के साथ क्षेत्रीय इकाइयों और अन्य स्थानों पर पदस्थापना की गई है। बालाघाट, नर्मदापुरम, सागर और उज्जैन में अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां दी गई हैं, जबकि भोपाल में रेडियो मुख्यालय, विसबल, क्यूडी शाखा और पुलिस मुख्यालय से जुड़े पदों पर नियुक्तियां की गई हैं। आदेश में अधिकारियों के नाम और उनके नए पदस्थापना स्थलों का उल्लेख किया गया है।

  • मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को तीन महीने में नियुक्ति के निर्देश

    मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को तीन महीने में नियुक्ति के निर्देश

    मध्यप्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 27 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी नहीं दी और कहा कि ओबीसी वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है। कोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर सकी। अदालत ने यह भी माना कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से आगे जाने के लिए जरूरी असाधारण परिस्थितियां भी सरकार साबित नहीं कर पाई।

    इस फैसले से सरकारी भर्तियों में लंबे समय से अटके 13 प्रतिशत पदों को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है। हाईकोर्ट ने इन होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सरकार को तीन महीने के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने को कहा है। इन पदों पर नियुक्तियां लंबे समय से लंबित थीं, जिससे संबंधित अभ्यर्थियों को इंतजार करना पड़ रहा था। फैसले के बाद अनारक्षित वर्ग के उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी नियुक्तियां आरक्षण विवाद के कारण रुकी हुई थीं।

    अदालत ने पहले से नियुक्त उम्मीदवारों को भी राहत दी है। फैसले के अनुसार, मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच हुई कुछ नियुक्तियां रद्द नहीं की जाएंगी। इस अवधि में 14 प्रतिशत से अधिक ओबीसी आरक्षण के आधार पर नियुक्ति पाने वाले उम्मीदवारों की नौकरी पर भी फैसले का असर नहीं पड़ेगा। इस तरह अदालत ने लंबित पदों पर नियुक्तियों के साथ पहले से कार्यरत अभ्यर्थियों की स्थिति को लेकर भी निर्देश दिए हैं।

    यह फैसला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डबल बेंच ने सुनाया। दोनों न्यायाधीशों ने लाइव कोर्ट में पांच प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से निर्णय का सार समझाया। इनमें ओबीसी वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण को सही मानना, 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े नहीं होना, 50 प्रतिशत की सीमा पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियों का साबित नहीं होना, 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर नियुक्तियां और पहले से नियुक्त उम्मीदवारों को राहत देना शामिल है।

    मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विवाद वर्ष 2019 से चल रहा है। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने मार्च 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला लिया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं और बढ़े हुए आरक्षण को लागू करने पर कानूनी रोक लगी। जुलाई 2019 में राज्य सरकार ने संबंधित आरक्षण कानून में संशोधन कर 27 प्रतिशत आरक्षण को वैधानिक आधार देने की कोशिश की, लेकिन विवाद जारी रहा।

    भर्तियों के परिणाम अटकने के बीच सितंबर 2022 में सरकार ने 87-13 प्रतिशत का फार्मूला अपनाया। इसके तहत 14 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के आधार पर 87 प्रतिशत पदों के परिणाम जारी करने और शेष 13 प्रतिशत पदों को होल्ड रखने की व्यवस्था की गई। इससे कई भर्तियों में नियुक्तियों का मामला लंबित रहा। ओबीसी वर्ग की ओर से प्रदेश में अपनी आबादी लगभग 52 प्रतिशत होने का दावा करते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग की जाती रही, जबकि सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों ने इसका विरोध किया।

    यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा में रहा। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने और होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पदों पर निर्णय लेने की मांग की थी। इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के बाद भी यह मुद्दा उठाया गया था। अब हाईकोर्ट के फैसले से आरक्षण और नियुक्तियों से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण दिशा सामने आई है। हालांकि, फैसले के सभी कानूनी प्रभावों की विस्तृत स्थिति लिखित आदेश के सामने आने के बाद स्पष्ट होगी।

  • मध्य प्रदेश में एक करोड़ रुपये के कथित शराब रिश्वत मामले में घिरे डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी दीपम रायचूरा पद से हटाए गए

    मध्य प्रदेश में एक करोड़ रुपये के कथित शराब रिश्वत मामले में घिरे डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी दीपम रायचूरा पद से हटाए गए

    मध्य प्रदेश। के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने अपने विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) दीपम रायचूरा को पद से हटा दिया है। रायचूरा पर वर्ष 2024-25 में शराब ठेके दिलाने के बदले एक करोड़ रुपये की कथित रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं। मामला सामने आने के बाद देवड़ा ने संबंधित वाणिज्यिक कर विभाग को जल्द जांच करने के निर्देश दिए हैं। आरोपों का आधार करीब 930 करोड़ रुपये की ठगी के मामले में आरोपी मोहित गोगिया का कथित बयान बताया जा रहा है। हालांकि, इस बयान में किए गए दावों की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। रायचूरा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को गलत और मनगढ़ंत बताया है।

    उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने इस मामले में कहा कि दीपम रायचूरा वर्तमान में उनके ओएसडी हैं, लेकिन वर्ष 2024-25 में वे भोपाल में सहायक आबकारी अधिकारी के पद पर तैनात थे। उस समय रायचूरा उनके ओएसडी नहीं थे। देवड़ा के अनुसार, शराब ठेकों में कथित गड़बड़ियों की जानकारी उन्हें अखबारों के माध्यम से मिली। इसके बाद उन्होंने संबंधित विभाग को मामले की जल्द जांच करने के निर्देश दिए और रायचूरा को ओएसडी के पद से हटा दिया। अब मामले में विभागीय जांच के जरिए आरोपों की पड़ताल की जानी है।

    मोहित गोगिया के नाम से सामने आए कथित बयान में भोपाल के टीटी नगर क्षेत्र की दो शराब दुकानों का उल्लेख है। आरोप है कि वर्ष 2024-25 में इन दुकानों के ठेके दिलाने के बदले कुल एक करोड़ रुपये लिए गए। कथित बयान के मुताबिक, इसमें 50 लाख रुपये नकद और बाकी 50 लाख रुपये बैंक खाते के माध्यम से दिए जाने की बात कही गई है। इसके अलावा शराब ठेकों के लिए आवश्यक बैंक गारंटी से संबंधित फर्जी सावधि जमा रसीद यानी एफडीआर के इस्तेमाल का भी दावा किया गया है। आरोपों में फर्जी एफडीआर को मंजूरी दिलाने में मदद करने और बिना लाइसेंस शराब उपलब्ध कराने में सहयोग की बात भी शामिल है। कथित बयान में बिचौलियों की भूमिका और एक मोबाइल नंबर पर बातचीत होने का दावा भी किया गया है। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में सत्यापित कॉल रिकॉर्ड या चैट की जानकारी उपलब्ध नहीं है और दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी सामने नहीं आई है।

    दीपम रायचूरा ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि मोहित गोगिया से उनका नाम जोड़कर जो बातें कही जा रही हैं, वे पूरी तरह मनगढ़ंत हैं। रायचूरा के मुताबिक, भोपाल में सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर रहते हुए गोगिया से लाइसेंसधारी के तौर पर मुलाकात हुई होगी, लेकिन उन्होंने उससे किसी अन्य संबंध की बात स्वीकार नहीं की है। उन्होंने रिश्वत लेने के आरोपों को भी झूठा बताया है। ऐसे में मामले में एक ओर कथित बयान के आधार पर आरोप लगाए गए हैं, जबकि दूसरी ओर रायचूरा ने उन्हें गलत बताते हुए अपना पक्ष रखा है।

    इस मामले में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। पटवारी ने मामले की जांच के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग रखी है। उनकी मांगों में शराब ठेकों के आवंटन, बैंक एफडीआर और कथित लेन-देन की जांच शामिल है। उन्होंने 50-50 लाख रुपये के बताए गए भुगतानों और संबंधित बैंक खातों की पड़ताल के साथ जांच के लिए समय-सीमा निर्धारित करने की मांग भी की है। पटवारी ने जांच और कार्रवाई की जानकारी जनता के सामने रखने तथा आरोप सिद्ध होने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। ये कांग्रेस की ओर से रखी गई मांगें हैं, सरकार का घोषित निर्णय नहीं।

    फिलहाल वाणिज्यिक कर विभाग को जांच के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी में जांच पूरी करने की निश्चित समय-सीमा या विस्तृत जांच प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है। कथित बयान में किए गए दावों की सत्यता, बैंक लेन-देन और एफडीआर से जुड़े आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। एसआईटी गठित करने की मांग पर सरकार का निर्णय भी सामने नहीं आया है। ओएसडी को पद से हटाने की कार्रवाई हो चुकी है, जबकि आरोपों की वास्तविकता और आगे की संभावित कानूनी कार्रवाई जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।