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  • मोदी सरकार के 12 साल की उपलब्धियां गिनाते हुए खट्टर ने सराहा मध्य प्रदेश, इंदौर-उज्जैन कॉरिडोर को बताया क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का गेम चेंज

    मोदी सरकार के 12 साल की उपलब्धियां गिनाते हुए खट्टर ने सराहा मध्य प्रदेश, इंदौर-उज्जैन कॉरिडोर को बताया क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का गेम चेंज

     मध्य प्रदेश: में अधोसंरचना विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे इंदौर-उज्जैन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर को लेकर केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इसे मालवा क्षेत्र के भविष्य को बदलने वाली परियोजना बताया है। भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल होते हुए उन्होंने कहा कि राज्य आज विकास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को समान प्राथमिकता देकर आगे बढ़ रहा है, जो देश के समग्र विकास मॉडल का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

    कार्यक्रम के दौरान खट्टर ने कहा कि इंदौर और उज्जैन केवल दो शहर नहीं, बल्कि मालवा क्षेत्र की आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रमुख केंद्र हैं। इंदौर जहां उद्योग, व्यापार और रोजगार का प्रमुख हब है, वहीं उज्जैन देश की धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। ऐसे में दोनों शहरों को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ने वाली यह परियोजना क्षेत्रीय विकास को नई गति प्रदान करेगी।

    उन्होंने कहा कि लगभग 48 किलोमीटर लंबा प्रस्तावित ग्रीनफील्ड कॉरिडोर यात्रा समय कम करने के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देगा। बेहतर कनेक्टिविटी के कारण उद्योगों, निवेशकों और पर्यटन क्षेत्र को लाभ मिलेगा। इसके परिणामस्वरूप नए रोजगार अवसरों का सृजन होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। उनके अनुसार यह परियोजना केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र के समग्र आर्थिक विकास का आधार बनने की क्षमता रखती है।

    केंद्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार शहरी विकास, बुनियादी ढांचे के विस्तार और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के क्षेत्र में तेजी से कार्य कर रही है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं, शहरी सुविधाओं और आधुनिक परिवहन नेटवर्क के विकास से मध्य प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।

    अपने संबोधन में खट्टर ने उज्जैन में हुए विकास कार्यों का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों ने शहर को नई पहचान दी है। आधुनिक सुविधाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों का विकास केवल पर्यटन तक सीमित नहीं होता, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया जिसमें विकास और विरासत को साथ लेकर चलने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि आधुनिक भारत के निर्माण के साथ-साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। इसी सोच के तहत देशभर में कई महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं को विकसित किया गया है।

    अपने भाषण में उन्होंने केंद्र सरकार के पिछले 12 वर्षों के कार्यकाल का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि सड़क, रेल, आवास, पेयजल, बिजली और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लाखों परिवारों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई गई हैं, जिससे जीवन स्तर में सुधार देखने को मिला है।

    राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर बोलते हुए खट्टर ने आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ उठाए गए कदमों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं और देश के कई क्षेत्रों में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार जिन इलाकों में कभी विकास की पहुंच सीमित थी, वहां अब बुनियादी सुविधाओं और निवेश के अवसरों का विस्तार हो रहा है।

    कार्यक्रम में विभिन्न शहरी विकास और आवास योजनाओं के लाभार्थियों को भी लाभ वितरित किए गए। इस अवसर पर अधोसंरचना और शहरी विकास से जुड़ी कई परियोजनाओं का उल्लेख किया गया। खट्टर ने विश्वास व्यक्त किया कि इंदौर-उज्जैन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर आने वाले वर्षों में मालवा क्षेत्र की आर्थिक प्रगति, धार्मिक पर्यटन और औद्योगिक विस्तार का प्रमुख आधार बनेगा तथा मध्य प्रदेश को तेज विकास की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • राष्ट्रपति के मध्य प्रदेश दौरे के बीच गरमाई आदिवासी राजनीति, ‘आदिवासी बनाम वनवासी’ विवाद पर कांग्रेस-बीजेपी आमने-सामने

    राष्ट्रपति के मध्य प्रदेश दौरे के बीच गरमाई आदिवासी राजनीति, ‘आदिवासी बनाम वनवासी’ विवाद पर कांग्रेस-बीजेपी आमने-सामने

     मध्य प्रदेश: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के मध्य प्रदेश दौरे के बीच राज्य की राजनीति में आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ‘आदिवासी’ और ‘वनवासी’ शब्दों के प्रयोग को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच तीखी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। दोनों दल इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, जिससे प्रदेश का राजनीतिक माहौल गर्मा गया है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व ने राष्ट्रपति के राज्य प्रवास के दौरान आदिवासी समुदाय से जुड़े विभिन्न मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। कांग्रेस ने दावा किया कि आदिवासी समाज की पहचान, अधिकारों और विकास से जुड़े कई प्रश्न आज भी अनसुलझे हैं और इन पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। पार्टी का कहना है कि आदिवासी समुदाय की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को किसी भी रूप में कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

    कांग्रेस नेताओं ने विशेष रूप से ‘आदिवासी’ और ‘वनवासी’ शब्दों के प्रयोग को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क है कि आदिवासी शब्द केवल एक सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि उस समुदाय के इतिहास, परंपरा, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों का प्रतीक है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इस पहचान को बदलने या किसी अन्य शब्द से परिभाषित करने का प्रयास समुदाय की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

    इसी क्रम में आदिवासी भूमि से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक बहस का केंद्र बन गए हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अनुमतियों के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों की भूमि के हस्तांतरण और उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पार्टी ने संकेत दिया कि भविष्य में सत्ता में आने पर ऐसे मामलों की विस्तृत जांच कराई जा सकती है। साथ ही आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित पदों में रिक्तियों, सामाजिक सुरक्षा और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया।

    दूसरी ओर, राज्य सरकार और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति का यह दौरा आदिवासी समाज के विकास, स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए है तथा ऐसे अवसरों पर राजनीतिक विवाद खड़ा करना उचित नहीं माना जा सकता। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस तथ्यों से अधिक राजनीतिक संदेश देने का प्रयास कर रही है।

    सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए लगातार योजनाएं संचालित की जा रही हैं। विशेष रूप से जनजातीय समुदायों में गंभीर बीमारियों की रोकथाम और सामाजिक विकास के लिए कई कार्यक्रम लागू किए गए हैं। भाजपा का दावा है कि राज्य और केंद्र सरकार दोनों स्तरों पर जनजातीय कल्याण को प्राथमिकता दी जा रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे विवाद के पीछे प्रदेश की जनजातीय राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारण है। मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जहां आदिवासी आबादी का प्रभाव व्यापक है। विधानसभा की बड़ी संख्या में सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जिसके कारण सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने का प्रयास करते हैं।

    राष्ट्रपति के दौरे के दौरान उभरा यह विवाद केवल शब्दों की बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहचान, अधिकार, विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे व्यापक मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में यह विषय राज्य की राजनीति में और अधिक चर्चा का केंद्र बन सकता है, क्योंकि दोनों प्रमुख दल आदिवासी समाज के समर्थन को अपने पक्ष में करने के लिए लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं।

  • मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

    मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

     
     मध्य प्रदेश : में चर्चित नर्सिंग कॉलेज मामले में हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दे पर स्पष्टता प्रदान कर दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि केवल वे नर्सिंग कॉलेज, जिन्हें जांच और निर्धारित मानकों के आधार पर फिट घोषित किया गया है, उनके छात्र ही जीएनएम थर्ड ईयर की परीक्षा में शामिल हो सकेंगे। इसके साथ ही सत्र 2022-23 के जीएनएम फर्स्ट ईयर के परिणाम जारी करने का रास्ता भी खुल गया है।

    मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिन संस्थानों को जांच में अनफिट पाया गया है, उन्हें परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्रों के हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे संस्थानों को परीक्षा संबंधी किसी भी लाभ का पात्र नहीं माना जाएगा।

    यह पूरा मामला राज्य में संचालित नर्सिंग कॉलेजों की गुणवत्ता और वैधता को लेकर उठे गंभीर सवालों के बाद सामने आया था। जांच प्रक्रिया के दौरान यह पाया गया कि कई संस्थान आवश्यक आधारभूत सुविधाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों और निर्धारित संसाधनों के बिना संचालित हो रहे थे। इसके बाद व्यापक स्तर पर सत्यापन और निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे शिक्षा क्षेत्र को झकझोर दिया। प्रदेश में संचालित 695 नर्सिंग कॉलेजों की समीक्षा के दौरान केवल 165 संस्थान ही निर्धारित मानकों पर पूरी तरह खरे उतर सके। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि बड़ी संख्या में कॉलेज आवश्यक शैक्षणिक और प्रशासनिक मानकों का पालन नहीं कर रहे थे।

    हालांकि, अदालत ने उन संस्थानों को राहत देने का अवसर भी दिया जिन्होंने अपनी कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए थे। ऐसे 89 कॉलेजों को अतिरिक्त अवसर प्रदान किया गया और बाद में उन्हें आवश्यक शर्तें पूरी करने के बाद फिट घोषित कर दिया गया। इस निर्णय से उन छात्रों को राहत मिली है जो मान्यता प्राप्त संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं और लंबे समय से परीक्षा तथा परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

    दूसरी ओर, जांच में गंभीर अनियमितताओं वाले और मानकों पर खरे न उतरने वाले शेष कॉलेजों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया है। ऐसे संस्थानों को संचालन के लिए अयोग्य मानते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन अनिवार्य है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल वर्तमान छात्रों के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि भविष्य में नर्सिंग शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशिक्षित और योग्य नर्सिंग पेशेवरों की आवश्यकता को देखते हुए संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।

    अदालत के इस आदेश के बाद अब फिट घोषित कॉलेजों में अध्ययनरत छात्रों के लिए परीक्षा और परिणामों से जुड़ी अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त हो गई है। वहीं, राज्य में नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मानक आधारित बनाने की दिशा में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • मानसूनी बादल हुए कमजोर, मध्य भारत से लेकर उत्तर भारत तक सूखे जैसे हालात; मौसम विभाग की निगाह अगले कुछ दिनों पर

    मानसूनी बादल हुए कमजोर, मध्य भारत से लेकर उत्तर भारत तक सूखे जैसे हालात; मौसम विभाग की निगाह अगले कुछ दिनों पर

    नई दिल्ली । देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत के बाद जिस तेज प्रगति की उम्मीद की जा रही थी, वह फिलहाल थमती हुई दिखाई दे रही है। मानसून के आगमन को कई दिन बीत जाने के बावजूद देश के बड़े हिस्से में अपेक्षित वर्षा नहीं हो पाई है। मौसम संबंधी ताजा आंकड़ों और उपग्रह चित्रों से संकेत मिल रहे हैं कि मानसूनी गतिविधियां अचानक कमजोर पड़ गई हैं, जिसके कारण कई राज्यों में बारिश का इंतजार लगातार बढ़ता जा रहा है।

    मौसम विभाग के अनुसार मानसून वर्तमान में महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों के आसपास ठहराव की स्थिति में है। पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंचने के बाद इसकी प्रगति बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल क्षेत्र में भी धीमी हो गई है। परिणामस्वरूप मध्य भारत, उत्तर भारत और पूर्वी भारत के कई हिस्से अब भी पर्याप्त वर्षा से वंचित हैं।

    देश के लगभग 17 राज्यों में सामान्य मानसूनी गतिविधियां अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हो सकी हैं। इनमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य शामिल हैं। इन क्षेत्रों में किसानों, जल प्रबंधन एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन की चिंता बढ़ने लगी है क्योंकि खरीफ फसलों की बुआई का समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।

    आंकड़ों के अनुसार मानसून के आगमन के बाद शुरुआती अवधि में सामान्य रूप से 53.7 मिलीमीटर वर्षा दर्ज होती है, जबकि इस बार अब तक केवल 19.2 मिलीमीटर बारिश हुई है। यह सामान्य से लगभग 64 प्रतिशत कम है। इतनी बड़ी कमी ने कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियों की आशंका को जन्म दिया है, हालांकि विशेषज्ञ फिलहाल इसे स्थायी संकट मानने के बजाय अस्थायी मौसमीय व्यवधान बता रहे हैं।

    उपग्रह चित्रों में भी मानसूनी बादलों की सक्रियता सामान्य वर्षों की तुलना में काफी कम दिखाई दे रही है। आमतौर पर जून के मध्य तक मध्य और दक्षिण भारत के बड़े हिस्से घने बादलों से ढके रहते हैं, लेकिन इस बार कई क्षेत्रों में बादलों की उपस्थिति सीमित नजर आई है। इससे वर्षा की तीव्रता और विस्तार दोनों प्रभावित हुए हैं।

    मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान स्थिति को मानसून का अस्थायी ठहराव माना जा रहा है। इसके पीछे ऊपरी वायुमंडल में चल रही हवाओं के पैटर्न को प्रमुख कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिमी हवाओं की जेट स्ट्रीम सामान्य स्थिति से अधिक दक्षिण की ओर खिसक गई है, जिसके कारण मानसून को आगे बढ़ाने वाली पूर्वी हवाओं की प्रणाली प्रभावित हुई है। यही कारण है कि मानसून की गति कमजोर पड़ गई है।

    हालांकि मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों में कई राज्यों में वर्षा गतिविधियों में सुधार की संभावना जताई है। पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों, विशेषकर बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और सिक्किम में बारिश की संभावना व्यक्त की गई है। पूर्वोत्तर राज्यों में भी भारी वर्षा के संकेत हैं। वहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और विदर्भ क्षेत्र में गरज-चमक के साथ वर्षा और तेज हवाएं चलने की संभावना जताई गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी सप्ताह में मानसून दोबारा सक्रिय होता है तो वर्षा की कमी काफी हद तक पूरी हो सकती है। फिलहाल कृषि क्षेत्र, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसके संभावित प्रभावों को देखते हुए मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। आने वाले कुछ दिन मानसून की दिशा और उसकी तीव्रता तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

  • राज्यसभा चुनाव विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश, मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज, संवैधानिक सीमाओं का दिया हवाला

    राज्यसभा चुनाव विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश, मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज, संवैधानिक सीमाओं का दिया हवाला

    मध्य प्रदेश : से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार रहीं मीनाक्षी नटराजन को उस समय बड़ा कानूनी झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन पत्र को निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता और संविधान में इसके लिए स्पष्ट सीमाएं निर्धारित की गई हैं।

    न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 329 का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं में न्यायिक हस्तक्षेप पर प्रतिबंध है। अदालत ने माना कि इस चरण में रिट याचिका पर विचार करना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगा। इसी आधार पर याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया गया।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन निर्वाचन अधिकारी द्वारा निरस्त किया जाता है तो उसके लिए उपलब्ध वैधानिक उपाय चुनाव आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखना होता है। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा कि क्या ऐसे मामलों में पहले किसी अदालत ने चुनावी प्रक्रिया के बीच हस्तक्षेप किया है, हालांकि याचिकाकर्ता पक्ष कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सका।

    मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल का नामांकन अनुचित आधार पर खारिज किया गया। उनका कहना था कि जिस आपराधिक मामले का उल्लेख न करने का आरोप लगाया गया है, वह ऐसा मामला नहीं था जिसके प्रकटीकरण की कानूनी बाध्यता बनती हो। उन्होंने तर्क दिया कि संबंधित मामले में केवल समन जारी हुए थे और उसे नामांकन निरस्त करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए था।

    विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब राज्यसभा चुनाव के लिए दाखिल किए गए नामांकन पत्रों की जांच के दौरान यह आरोप लगाया गया कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने शपथपत्र में एक लंबित न्यायालयीन शिकायत का उल्लेख नहीं किया। निर्वाचन अधिकारी द्वारा उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रस्तुत शपथपत्र अधूरा है, जिसके चलते उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया।

    चुनावी प्रक्रिया के दौरान इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। आपत्ति दर्ज कराने वाले पक्ष का दावा था कि उम्मीदवार ने अपने खिलाफ दर्ज एक मामले की जानकारी छिपाई है, जबकि कांग्रेस ने इसे तकनीकी आधार पर लिया गया निर्णय बताते हुए निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इसे केवल व्यक्तिगत हार के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि यह लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उनकी शिकायतों पर अपेक्षित तत्परता से कार्रवाई नहीं की और पूरे मामले में निष्पक्षता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।

    कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि शुरू से ही उन्हें चुनावी प्रक्रिया के संचालन को लेकर संदेह था और अदालत के फैसले के बावजूद उनकी चिंताएं समाप्त नहीं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि उनका संघर्ष किसी राज्य सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए था।

    इस फैसले के साथ फिलहाल राज्यसभा चुनाव से जुड़े इस विवाद का न्यायिक अध्याय समाप्त हो गया है। हालांकि राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रह सकता है, क्योंकि विपक्ष चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है।

  • आईएएस अवि प्रसाद की तीसरी शादी चर्चा में, प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अंकिता धाकरे संग बंधे विवाह बंधन में, पहली दो पत्नियां भी हैं वरिष्ठ अफसर

    आईएएस अवि प्रसाद की तीसरी शादी चर्चा में, प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अंकिता धाकरे संग बंधे विवाह बंधन में, पहली दो पत्नियां भी हैं वरिष्ठ अफसर

    मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अवि प्रसाद एक बार फिर अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में हैं। प्रशासनिक सेवा में अपनी कार्यशैली और विभिन्न जिम्मेदारियों के लिए पहचाने जाने वाले अवि प्रसाद ने हाल ही में प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अंकिता धाकरे के साथ विवाह किया है। यह उनकी तीसरी शादी है, जिसके बाद उनका नाम एक बार फिर सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।

    अवि प्रसाद वर्तमान में मध्य प्रदेश रोजगार गारंटी परिषद में मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। प्रशासनिक सेवा में उनके अनुभव और विभिन्न जिलों में निभाई गई जिम्मेदारियों ने उन्हें राज्य के प्रमुख अधिकारियों में शामिल किया है। उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाले अवि प्रसाद ने सिविल सेवा में आने से पहले भी महत्वपूर्ण पेशेवर जिम्मेदारियां संभाली थीं और बाद में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के माध्यम से प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया।

    उनकी निजी जिंदगी का सफर भी उतना ही चर्चित रहा है जितना उनका प्रशासनिक करियर। उनकी पहली शादी 2014 बैच की आईएएस अधिकारी रिजु बाफना से हुई थी। हालांकि यह वैवाहिक संबंध अधिक समय तक नहीं चल सका और दोनों ने बाद में अलग होने का निर्णय लिया। प्रशासनिक सेवा में कार्यरत दोनों अधिकारियों ने अपने-अपने पेशेवर जीवन को आगे बढ़ाया और अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं।

    पहले वैवाहिक संबंध के समाप्त होने के बाद अवि प्रसाद ने दूसरी शादी आईएएस अधिकारी मिशा सिंह से की। यह विवाह भी प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारियों के बीच हुआ था और कुछ वर्षों तक दोनों साथ रहे। बताया जाता है कि इस दौरान मिशा सिंह ने अपना कैडर परिवर्तन कर मध्य प्रदेश में सेवाएं देना शुरू किया था। हालांकि समय के साथ यह संबंध भी आगे नहीं बढ़ सका और दोनों के रास्ते अलग हो गए।

    हाल ही में अवि प्रसाद ने तीसरी बार विवाह किया है। इस बार उनकी जीवनसंगिनी प्रशासनिक सेवा की अधिकारी अंकिता धाकरे बनी हैं। अंकिता धाकरे राज्य मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत हैं और प्रशासनिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। दोनों का विवाह फरवरी 2026 में आयोजित एक निजी समारोह में संपन्न हुआ। विवाह की जानकारी सामने आने के बाद प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में इस संबंध को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।

    अवि प्रसाद की पेशेवर यात्रा भी काफी उल्लेखनीय मानी जाती है। सिविल सेवा में आने से पहले उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। इसके बाद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर पहले पुलिस सेवा में स्थान प्राप्त किया। बाद में बेहतर रैंक हासिल करने के बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया और विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए अपनी पहचान बनाई।

    प्रशासनिक सेवा में कार्यरत अधिकारियों की निजी जिंदगी सामान्यतः सार्वजनिक चर्चा से दूर रहती है, लेकिन जब किसी अधिकारी का व्यक्तिगत जीवन असाधारण परिस्थितियों के कारण सुर्खियों में आता है तो लोगों की दिलचस्पी स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। अवि प्रसाद के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला है, जहां उनके प्रशासनिक करियर के साथ-साथ उनके वैवाहिक जीवन को लेकर भी लोगों के बीच चर्चा बनी हुई है।

    फिलहाल अवि प्रसाद और अंकिता धाकरे अपने-अपने प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। वहीं उनकी यह नई वैवाहिक शुरुआत प्रशासनिक सेवा से जुड़े लोगों और आम नागरिकों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है।

  • राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    राज्यसभा की 26 सीटों पर मुकाबले से पहले तेज हुई रणनीतिक जंग, भाजपा के दांव से कांग्रेस सतर्क

    नई दिल्ली । राज्यसभा की रिक्त हो रही 26 सीटों के लिए 18 जून को होने वाले चुनाव से पहले देश की राजनीति में गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन राज्यसभा में अपनी स्थिति और मजबूत करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्षी दल अपने मौजूदा संख्या बल को सुरक्षित रखने और संभावित राजनीतिक चुनौतियों से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही कई राज्यों में राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    इस बार सबसे अधिक चर्चा मध्य प्रदेश और झारखंड की हो रही है, जहां भाजपा के कुछ फैसलों ने विपक्षी दलों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों राज्यों में उम्मीदवारों के चयन और चुनावी गणित ने मुकाबले को अपेक्षा से अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा की कोशिश केवल अपनी सीटें सुरक्षित करने तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि वह विपक्षी दलों पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने का प्रयास भी कर रही है।

    मध्य प्रदेश में भाजपा द्वारा तीसरे उम्मीदवार के रूप में महेश केवट को मैदान में उतारना राजनीतिक हलकों में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है। विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है और वह दो सीटों पर सहज जीत की स्थिति में मानी जा रही है। हालांकि तीसरे उम्मीदवार की एंट्री ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, को सतर्क कर दिया है। कांग्रेस का मानना है कि यह कदम चुनावी मुकाबले को जटिल बनाने और विपक्षी खेमे में असहजता पैदा करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट बनाए रखने के लिए विशेष कदम उठा सकती है। संभावित क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति की आशंकाओं के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार अपने विधायकों के संपर्क में बताया जा रहा है। इसी कारण राज्यसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में गतिविधियां सामान्य से अधिक तेज हो गई हैं।

    विधानसभा के वर्तमान गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत के लिए निर्धारित संख्या में मतों की आवश्यकता होगी। ऐसे में अतिरिक्त उम्मीदवार की मौजूदगी चुनाव को केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनाकर रणनीतिक मुकाबले में बदल सकती है। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल लगातार एक-दूसरे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी कर रहे हैं।

    झारखंड में भी राजनीतिक तस्वीर कम दिलचस्प नहीं है। यहां दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय स्वरूप ले चुका है। झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को समर्थन देकर चुनावी समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इस फैसले ने राज्य में राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

    झारखंड में अब नजर इस बात पर रहेगी कि उपलब्ध संख्या बल और सहयोगी दलों के समर्थन के आधार पर कौन-सा उम्मीदवार बढ़त हासिल कर पाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मतदान के दौरान कोई अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आता है तो परिणामों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

    दूसरी ओर राजस्थान में स्थिति अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे रही है। यहां रिक्त सीटों के मुकाबले उतने ही उम्मीदवार मैदान में होने के कारण निर्विरोध निर्वाचन की संभावना मजबूत मानी जा रही है। वहीं गुजरात में भी भाजपा के उम्मीदवारों की राह अपेक्षाकृत आसान दिखाई दे रही है और वहां बड़े मुकाबले की संभावना कम नजर आ रही है।

    राज्यसभा चुनाव भले ही प्रत्यक्ष जनमत से नहीं लड़े जाते, लेकिन इनका राजनीतिक महत्व बेहद व्यापक होता है। संसद के उच्च सदन में संख्या बल किसी भी सरकार की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले प्रत्येक सीट को लेकर राजनीतिक दल पूरी ताकत और रणनीति के साथ मैदान में उतरते हैं। इस बार भी मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में विकसित हो रहे समीकरण चुनावी प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहे हैं।

  • दिग्विजय सिंह को फिर राज्यसभा भेजने की मांग तेज, दिल्ली में कांग्रेस करेगी मंथन

    दिग्विजय सिंह को फिर राज्यसभा भेजने की मांग तेज, दिल्ली में कांग्रेस करेगी मंथन


    भोपाल । मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस के भीतर एक बार फिर वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजने की मांग जोर पकड़ने लगी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने खुलकर कहा है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजा जाना चाहिए।

    पीसी शर्मा ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार हाईकमान के साथ चर्चा कर अंतिम निर्णय लेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि जल्द ही कांग्रेस अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर सकती है। उनके अनुसार दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे वरिष्ठ नेता भी इस मामले में अपना निर्णय और राय देंगे।

    इधर राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस आलाकमान के स्तर पर दिल्ली में रणनीतिक बैठक होने जा रही है। बताया जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे। इस बैठक में मध्यप्रदेश की राज्यसभा सीटों को लेकर विस्तार से चर्चा होगी और संभावित नामों पर मंथन किया जाएगा।

    सूत्रों के मुताबिक तीन दिनों में दूसरी बार राज्यसभा उम्मीदवारों को लेकर चर्चा हो रही है। पार्टी के भीतर रायशुमारी कर एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस फिलहाल अपने एकमात्र संभावित सीट के लिए ऐसा चेहरा तलाश रही है जो संगठन और सियासी समीकरण दोनों के लिहाज से मजबूत माना जाए।

    वहीं कांग्रेस के इस मंथन पर बीजेपी ने भी तंज कसा है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि कांग्रेस में नेताओं के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की हालत ऐसी हो चुकी है कि उसकी हर बैठक विवाद और खींचतान का कारण बन रही है।

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 1 जून 2026 से नामांकन प्रक्रिया शुरू होगी। उम्मीदवार 8 जून तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच होगी जबकि 11 जून नाम वापसी की अंतिम तारीख तय की गई है। मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू की जाएगी।

    देश के 10 राज्यों की कुल 24 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है। मध्यप्रदेश में तीन सीटों पर मतदान होगा। इनमें दिग्विजय सिंह, जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
    मध्यप्रदेश विधानसभा में वर्तमान संख्या बल के हिसाब से भाजपा के 164 और कांग्रेस के 64 विधायक हैं। इसी गणित के अनुसार बीजेपी को दो सीटें और कांग्रेस को एक सीट मिलने की संभावना जताई जा रही है।

  • मध्यप्रदेश में बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन: E-5 हाथी को मिला सहारा, तनाव में था हिंसक व्यवहार

    मध्यप्रदेश में बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन: E-5 हाथी को मिला सहारा, तनाव में था हिंसक व्यवहार


    शहडोल । मध्यप्रदेश के शहडोल और अनूपपुर वन क्षेत्र में पिछले कई दिनों से दहशत का कारण बना जंगली हाथी E-5 आखिरकार वन विभाग की टीम द्वारा सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया है। इस हाथी पर तीन ग्रामीणों की मौत और कई मवेशियों व घरों को नुकसान पहुंचाने के आरोप थे, जिसके चलते इसे अत्यंत खतरनाक माना जा रहा था।

    लेकिन इस पूरे ऑपरेशन में जो बात सामने आई, उसने विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, E-5 वास्तव में स्वभाव से हिंसक नहीं था, बल्कि अपने झुंड से अलग हो जाने के कारण लंबे समय से अकेलेपन और तनाव में था। माना जा रहा है कि इसी मानसिक स्थिति ने उसके व्यवहार को आक्रामक बना दिया था।

    रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से प्रशिक्षित पालतू हाथी रामा को मैदान में उतारा गया। आमतौर पर जंगली हाथी अन्य हाथियों या इंसानों के संपर्क में आने पर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन E-5 ने रामा को देखते ही अलग व्यवहार दिखाया। वह शांत हुआ और धीरे-धीरे उसके करीब आने लगा। विशेषज्ञों ने इसे सामाजिक जुड़ाव की तलाश के रूप में देखा।

    वन विभाग की टीम ने इससे पहले 22 मई को हाथी को काबू में करने की कोशिश की थी, लेकिन वह प्रयास असफल रहा था। उस दौरान E-5 ने पिंजरा और GPS कॉलर तक तोड़ दिया था। इसके बाद रणनीति बदली गई और रातों-रात एक नया प्लान तैयार किया गया।

    मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. समिता राजौरा के नेतृत्व में अगले चरण में पालतू हाथियों और माहूतों की मदद से उसे सफलतापूर्वक रेडियो कॉलर पहनाया गया। इसके बाद उसे सुरक्षित रूप से बांधवगढ़ रेंज में शिफ्ट किया गया।

    अब E-5 को अन्य हाथियों के झुंड के करीब रखा गया है, ताकि वह दोबारा सामाजिक वातावरण में लौट सके और सामान्य जीवन जी सके। यह पूरा मामला वन्यजीव व्यवहार और उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक नई समझ भी सामने लाता है।

  • रेत माफिया का कहर: चेकिंग के दौरान आरक्षक पर चढ़ाया ट्रैक्टर, हालत गंभीर

    रेत माफिया का कहर: चेकिंग के दौरान आरक्षक पर चढ़ाया ट्रैक्टर, हालत गंभीर


    भोपाल । बालाघाट जिले के लालबर्रा थाना क्षेत्र में अवैध रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई के दौरान रेत माफिया की दबंगई का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। कामथी क्षेत्र में मंगलवार देर शाम चेकिंग के दौरान एक ट्रैक्टर चालक ने पुलिस आरक्षक पर वाहन चढ़ा दिया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया।

    जानकारी के अनुसार, लालबर्रा थाने में पदस्थ आरक्षक सुनील और राजेश्वर रहांगडाले को मुखबिर से सूचना मिली थी कि क्षेत्र में अवैध रेत का परिवहन किया जा रहा है। सूचना पर दोनों आरक्षक मौके पर पहुंचे और कार्रवाई शुरू की। इसी दौरान जब पुलिस टीम घटनास्थल का वीडियो बनाने लगी, तभी ट्रैक्टर चालक ने अचानक वाहन आरक्षक राजेश्वर रहांगडाले पर चढ़ा दिया।

    घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। गंभीर रूप से घायल आरक्षक को तुरंत जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी हालत नाजुक देखते हुए उन्हें गोंदिया रेफर कर दिया गया। फिलहाल उनका इलाज जारी है और स्थिति गंभीर बनी हुई है।

    घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। देर रात आईजी ललित शाक्यवार और एसपी आदित्य मिश्रा जिला अस्पताल पहुंचे और घायल आरक्षक का हाल जाना। अधिकारियों ने मामले को बेहद गंभीर मानते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

    आईजी ललित शाक्यवार ने बताया कि घटना के तुरंत बाद आरोपी ट्रैक्टर चालक को पुलिस अभिरक्षा में ले लिया गया है और वाहन को जब्त कर लिया गया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर अवैध रेत खनन और माफिया के बढ़ते हौसले पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस और स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश देखा जा रहा है।