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  • स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का पारंपरिक ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत, सांस्कृतिक सम्मान की अनोखी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

    स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का पारंपरिक ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत, सांस्कृतिक सम्मान की अनोखी परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्लोवाकिया दौरे ने भारत और यूरोप के बीच कूटनीतिक संबंधों को नई चर्चा दी है। स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का जिस पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया, उसने न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। स्लोवाक परंपरा के अनुसार उन्हें ‘ब्रेड और नमक’ भेंट कर सम्मानित किया गया, जिसे वहां अतिथि सत्कार, मित्रता और सद्भावना का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

    स्लोवाकिया की स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली आधिकारिक यात्रा मानी जा रही है। ऐसे में इस दौरे को दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री के आगमन पर स्लोवाकिया के वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुरूप सम्मान प्रदान किया।

    ब्रातिस्लावा पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का भारतीय समुदाय के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक स्वागत किया। बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय मूल के लोगों ने उनका अभिनंदन किया और भारत तथा स्लोवाकिया के बीच बढ़ती मित्रता पर खुशी व्यक्त की। इस दौरान दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों की झलक भी देखने को मिली।

    प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने स्वागत को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि ‘ब्रेड और नमक’ की यह परंपरा स्लोवाकिया की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सुंदर प्रतीक है। उन्होंने इसे मित्रता, सम्मान और सद्भावना के उन मूल्यों का प्रतिनिधि बताया जिन्हें दोनों देश महत्व देते हैं। उनके अनुसार ऐसी परंपराएं देशों के बीच लोगों से लोगों के संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    पूर्वी और मध्य यूरोप के कई देशों में ‘ब्रेड और नमक’ से स्वागत करने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ब्रेड समृद्धि, जीवन और खुशहाली का प्रतीक है, जबकि नमक सम्मान, सुरक्षा और स्थायी संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है। किसी विशिष्ट अतिथि को इन दोनों वस्तुओं का उपहार देना अत्यंत सम्मानजनक माना जाता है।

    स्लोवाकिया के अलावा रूस, पोलैंड, यूक्रेन, सर्बिया और अन्य कई स्लाव देशों में भी यह परंपरा आज तक जीवित है। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेताओं, राजनयिकों और विशिष्ट मेहमानों के स्वागत में इस रीति का उपयोग किया जाता है। इसे केवल औपचारिक स्वागत नहीं बल्कि विश्वास और मित्रता का प्रतीकात्मक संदेश माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक यात्राओं में सांस्कृतिक प्रतीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे अवसर देशों के बीच केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक पहचान और आपसी सम्मान को भी सामने लाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में अपनाई गई यह परंपरा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारत और स्लोवाकिया के बीच व्यापार, प्रौद्योगिकी, निवेश और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा देने वाली मानी जा रही है। स्वागत समारोह में दिखाई गई सांस्कृतिक आत्मीयता ने इस यात्रा को और अधिक विशेष बना दिया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की सांस्कृतिक परंपराएं देशों के बीच विश्वास और सौहार्द का वातावरण तैयार करती हैं। ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री मोदी का ‘ब्रेड और नमक’ से हुआ स्वागत इसी संदेश को मजबूत करता है कि कूटनीति केवल समझौतों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सांस्कृतिक सम्मान और मानवीय जुड़ाव से भी संचालित होती है।

  • अमेरिकी हमले में 3 भारतीयों की मौत पर घिरी सरकार, उधर ट्रंप से पीएम मोदी की होनी है मुलाकात, क्या-क्या होगा?

    अमेरिकी हमले में 3 भारतीयों की मौत पर घिरी सरकार, उधर ट्रंप से पीएम मोदी की होनी है मुलाकात, क्या-क्या होगा?

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 17 जून को होने वाली प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक ऐसे समय में आयोजित होने जा रही है, जब ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नागरिकों की मौत का मामला राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा के केंद्र में है। इस घटना के बाद देश के भीतर सरकार पर दबाव बढ़ा है और विपक्ष लगातार अमेरिका से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग कर रहा है। ऐसे में दोनों नेताओं की यह मुलाकात सामान्य राजनयिक बैठक से कहीं अधिक महत्व रखती है।

    फ्रांस में आयोजित होने वाले जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तावित इस बैठक पर अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों स्तरों पर नजरें टिकी हुई हैं। भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा संबंधों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने द्विपक्षीय संबंधों के सामने एक संवेदनशील चुनौती भी खड़ी कर दी है।

    ओमान की खाड़ी में हुई सैन्य कार्रवाई के दौरान तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से अधिक सक्रिय और स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। राजनीतिक दलों का कहना है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मामलों में सरकार को ठोस जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। विपक्ष का तर्क है कि यह केवल विदेश नीति का नहीं बल्कि भारतीय नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा का भी प्रश्न है।

    इस बीच भारत की ओर से राजनयिक स्तर पर इस मुद्दे को उठाए जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि अमेरिकी पक्ष की ओर से अब तक कोई सार्वजनिक खेद या विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसी वजह से मोदी-ट्रंप वार्ता में इस विषय के शामिल होने की संभावना को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय नेतृत्व इस मामले को संवेदनशीलता और संतुलन के साथ उठाने का प्रयास कर सकता है।

    बैठक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से जुड़ा हुआ है। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही है। उम्मीद की जा रही है कि दोनों नेता वार्ता की प्रगति की समीक्षा करेंगे और भविष्य के आर्थिक सहयोग की दिशा पर चर्चा करेंगे। हालांकि तत्काल किसी अंतिम समझौते की संभावना कम मानी जा रही है, फिर भी यह बैठक आगे की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी साझेदारी, आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी संभावित एजेंडे का हिस्सा मानी जा रही हैं। पश्चिम एशिया की बदलती स्थिति, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े मुद्दे भी दोनों देशों के बीच चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। विशेष रूप से ओमान की खाड़ी और उससे जुड़े समुद्री मार्गों का महत्व वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात केवल विदेश नीति का विषय नहीं है, बल्कि इसका घरेलू राजनीतिक प्रभाव भी पड़ सकता है। विपक्ष पहले से ही सरकार के रुख पर सवाल उठा रहा है और वह इस बैठक के परिणामों को बारीकी से देखेगा। यदि भारतीय नागरिकों की मौत का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता है, तो यह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण संदेश माना जाएगा।

    आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देशों के बीच वार्ता किन ठोस निष्कर्षों तक पहुंचती है। फिलहाल इतना तय है कि जी-7 सम्मेलन के दौरान होने वाली मोदी-ट्रंप बैठक भारत-अमेरिका संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और भारतीय नागरिकों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के कारण विशेष महत्व रखती है।

  • स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत, भारतीय समुदाय और स्थानीय कलाकारों ने बताया मुलाकात को गर्व और सम्मान का क्षण

    स्लोवाकिया में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत, भारतीय समुदाय और स्थानीय कलाकारों ने बताया मुलाकात को गर्व और सम्मान का क्षण

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्लोवाकिया यात्रा ने भारत और मध्य यूरोप के इस महत्वपूर्ण देश के बीच संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान की है। राजधानी ब्रातिस्लावा पहुंचने पर प्रधानमंत्री का भारतीय समुदाय और स्थानीय नागरिकों द्वारा उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया। इस अवसर पर प्रवासी भारतीयों और स्लोवाक कलाकारों ने उनसे मुलाकात को विशेष सम्मान और गर्व का क्षण बताते हुए अपनी खुशी व्यक्त की।

    ब्रातिस्लावा के प्रमुख आयोजन स्थल पर प्रधानमंत्री के आगमन के दौरान भारतीय संस्कृति और परंपरा की झलक देखने को मिली। भारतीय समुदाय के सदस्यों ने पूरे उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पारंपरिक अभिनंदन ने आयोजन को विशेष बना दिया। स्थानीय परंपराओं के अनुरूप किए गए स्वागत ने दोनों देशों के बीच बढ़ते सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को भी प्रदर्शित किया।

    प्रधानमंत्री के स्वागत समारोह में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय उपस्थित रहे। समुदाय के सदस्यों ने कहा कि विदेश में रहते हुए भारत के प्रधानमंत्री से सीधे मिलना उनके लिए भावनात्मक और गर्व का विषय है। कई लोगों ने इसे जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक बताया। उनके अनुसार प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने उन्हें अपने देश से और अधिक जुड़ाव का अनुभव कराया।

    प्रवासी भारतीयों ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में भारत की वैश्विक पहचान मजबूत हुई है और इसका सकारात्मक प्रभाव विदेशों में बसे भारतीयों पर भी दिखाई देता है। समुदाय के सदस्यों ने उम्मीद जताई कि इस यात्रा से भारत और स्लोवाकिया के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग को और बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा मिलने की संभावना भी व्यक्त की।

    कार्यक्रम में स्थानीय स्लोवाक कलाकारों की भागीदारी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। कई कलाकारों ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपने सम्मान और रुचि को प्रस्तुतियों के माध्यम से व्यक्त किया। सांस्कृतिक समूहों ने भारतीय संगीत और परंपराओं से प्रेरित कार्यक्रम पेश किए, जिन्हें उपस्थित लोगों ने सराहा। कलाकारों ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री के स्वागत समारोह में शामिल होना उनके लिए एक अनूठा अवसर था।

    विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय भावना से जुड़े सांस्कृतिक प्रस्तुतीकरण ने कार्यक्रम को अलग पहचान दी। कलाकारों ने भारतीय संगीत और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को प्रस्तुत करते हुए दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने का प्रयास किया। प्रस्तुति के बाद कलाकारों ने कहा कि उन्हें खुशी है कि उनके प्रयासों को सराहा गया और उन्हें इस ऐतिहासिक अवसर का हिस्सा बनने का अवसर मिला।

    विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री की यह यात्रा केवल राजनयिक महत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संवाद और स्थानीय सांस्कृतिक समूहों की भागीदारी ने इस यात्रा को विशेष आयाम प्रदान किया है। इससे दोनों देशों के बीच आपसी समझ और सहयोग को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    ब्रातिस्लावा में हुए इस स्वागत समारोह ने यह भी दिखाया कि विदेशों में बसे भारतीय समुदाय का अपने देश के साथ भावनात्मक संबंध कितना गहरा है। वहीं स्थानीय समाज की भागीदारी ने भारत के प्रति बढ़ती रुचि और सम्मान को भी रेखांकित किया। इस यात्रा को भारत-स्लोवाकिया संबंधों के लिए सकारात्मक और यादगार पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है।

  • राफेल डील में निर्णायक मोड़ की उम्मीद, मैक्रों-मोदी वार्ता में भारत की ‘सोर्स कोड एक्सेस’ मांग पर टिकी रणनीतिक साझेदारी की नजर

    राफेल डील में निर्णायक मोड़ की उम्मीद, मैक्रों-मोदी वार्ता में भारत की ‘सोर्स कोड एक्सेस’ मांग पर टिकी रणनीतिक साझेदारी की नजर

    नई दिल्ली । भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने वाली प्रस्तावित 114 राफेल लड़ाकू विमानों की डील एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की हालिया मुलाकात को इस सौदे के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से भारतीय वायु सेना की उस प्रमुख मांग पर सभी की नजरें टिकी हैं, जिसके तहत भारत राफेल विमान के कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी इंटरफेस और सिस्टम तक अधिक पहुंच चाहता है, ताकि भविष्य में स्वदेशी हथियारों और तकनीकों का बेहतर एकीकरण किया जा सके।

    भारत पहले ही राफेल लड़ाकू विमानों को अपनी वायु शक्ति का अहम हिस्सा बना चुका है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और स्वदेशी हथियार प्रणालियों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए केवल विमान खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की है कि देश में विकसित मिसाइलों और अन्य उन्नत हथियारों को राफेल प्लेटफॉर्म पर अपेक्षाकृत स्वतंत्र तरीके से एकीकृत किया जा सके।

    यही कारण है कि इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट्स और संबंधित तकनीकी पहुंच का मुद्दा इस डील में विशेष महत्व रखता है। ये तकनीकी दस्तावेज विमान के विभिन्न सिस्टमों के बीच संचार और संचालन की संरचना को परिभाषित करते हैं। इनके अभाव में किसी भी नए हथियार या सिस्टम को विमान में शामिल करने के लिए मूल निर्माता की तकनीकी स्वीकृति और सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है। भारत लंबे समय से ऐसी व्यवस्था चाहता है जिससे स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं को अधिक गति मिल सके।

    फ्रांस ने अब तक राफेल के कुछ अत्यंत संवेदनशील एवियोनिक्स और मिशन सिस्टम से जुड़े पूर्ण सोर्स कोड साझा करने में सावधानी बरती है। इन प्रणालियों में उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट और मिशन कंप्यूटर जैसे महत्वपूर्ण घटक शामिल हैं। रक्षा क्षेत्र में इन तकनीकों को किसी भी लड़ाकू विमान की सबसे संवेदनशील और रणनीतिक संपत्तियों में गिना जाता है। यही वजह है कि इस विषय पर दोनों देशों के बीच विस्तृत तकनीकी और रणनीतिक बातचीत जारी है।

    प्रस्तावित नई डील की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका विनिर्माण मॉडल है। योजना के अनुसार शुरुआती सीमित संख्या में विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि अधिकांश विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। यदि यह व्यवस्था अंतिम रूप लेती है तो पहली बार राफेल लड़ाकू विमान का बड़े पैमाने पर निर्माण फ्रांस के बाहर होगा। इससे भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलने के साथ-साथ रोजगार, तकनीकी कौशल और औद्योगिक क्षमता में भी वृद्धि होने की संभावना है।

    भारत इस परियोजना में अधिक स्वदेशी भागीदारी और स्थानीय सामग्री के उपयोग पर भी जोर दे रहा है। सरकार का उद्देश्य केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक तकनीकी साझेदारी और रक्षा आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तकनीकी पहुंच और स्थानीय उत्पादन से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनती है तो यह सौदा भारत-फ्रांस रणनीतिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है।

    आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच होने वाली चर्चाएं इस बात को तय करेंगी कि रक्षा सहयोग का यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम किस दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल रक्षा और रणनीतिक समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत की प्रमुख तकनीकी मांगों पर कितना सकारात्मक समाधान निकल पाता है।

  • भारत-अमेरिका संबंधों को नई मजबूती का संदेश, अमेरिकी नेताओं और कॉर्पोरेट जगत ने पीएम मोदी को दी विशेष बधाई

    भारत-अमेरिका संबंधों को नई मजबूती का संदेश, अमेरिकी नेताओं और कॉर्पोरेट जगत ने पीएम मोदी को दी विशेष बधाई

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने पर अमेरिका के राजनीतिक और कारोबारी जगत से उन्हें व्यापक स्तर पर बधाई संदेश प्राप्त हुए हैं। अमेरिकी सांसदों, सीनेटरों और प्रमुख उद्योगपतियों ने इस अवसर को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए प्रधानमंत्री के नेतृत्व, आर्थिक नीतियों और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका की सराहना की है।

    अमेरिकी नेताओं ने अपने संदेशों में भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते संबंधों का विशेष उल्लेख किया। उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी सहयोग आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस दौरान कई सांसदों ने लोकतांत्रिक मूल्यों और साझा हितों को दोनों देशों की साझेदारी का मजबूत आधार बताया।

    अमेरिका के विभिन्न राजनीतिक प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री मोदी के लंबे कार्यकाल को भारतीय जनता के विश्वास और समर्थन का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि लगातार वर्षों तक देश का नेतृत्व करना केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और लोकतांत्रिक स्वीकार्यता का भी प्रमाण है। अमेरिकी नेताओं ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में रेखांकित करते हुए उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका की प्रशंसा की।

    कई अमेरिकी सांसदों ने भारत-अमेरिका संबंधों को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में और अधिक महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच सहयोग न केवल आर्थिक विकास बल्कि वैश्विक स्थिरता, सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभा रहा है। उन्होंने भविष्य में दोनों देशों के बीच और गहरे सहयोग की उम्मीद भी व्यक्त की।

    कारोबारी जगत के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की आर्थिक प्रगति को उल्लेखनीय बताया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में भारत ने वैश्विक निवेशकों के लिए एक आकर्षक और भरोसेमंद बाजार के रूप में अपनी पहचान मजबूत की है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, निवेश-अनुकूल वातावरण और बुनियादी ढांचे के विकास ने अंतरराष्ट्रीय कंपनियों का विश्वास बढ़ाया है।

    अमेरिकी निवेशकों ने भारत को वैश्विक निवेश के प्रमुख केंद्रों में शामिल बताते हुए कहा कि देश में दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं। उनका मानना है कि सुधारों, स्थिर नीतियों और बढ़ते उपभोक्ता बाजार ने भारत को वैश्विक व्यापार समुदाय के लिए महत्वपूर्ण गंतव्य बना दिया है। कई कंपनियों ने भारत में अपने निवेश और साझेदारी को आगे भी जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है।

    तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भारत के डिजिटल परिवर्तन की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार, तकनीकी नवाचार और डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की दिशा में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इससे न केवल आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है बल्कि उद्यमिता और नवाचार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेजी से विस्तार वैश्विक तकनीकी कंपनियों के लिए भी नए अवसर लेकर आया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कनेक्टिविटी और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में भारत की सक्रिय भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है।

    अमेरिकी राजनीतिक और कारोबारी समुदाय की ओर से मिले इन संदेशों को भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और मजबूत होती अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यह भी माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक सहयोग के नए आयाम विकसित हो सकते हैं।

  • वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक मोर्चे पर सक्रिय सरकार, पीएम मोदी ने सलाहकार परिषद संग बनाई नई रणनीति

    वैश्विक संकटों के बीच आर्थिक मोर्चे पर सक्रिय सरकार, पीएम मोदी ने सलाहकार परिषद संग बनाई नई रणनीति


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और आर्थिक चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक में देश की आर्थिक प्रगति को गति देने, विकास दर को स्थिर बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से उत्पन्न संभावित चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने की रणनीतियों पर व्यापक चर्चा की गई। आर्थिक विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के साथ हुए इस विचार-विमर्श का केंद्र भारत की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती और विकास की निरंतरता सुनिश्चित करना रहा।

    बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई जब दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं कमजोर मांग, आपूर्ति शृंखला में बाधाओं, क्षेत्रीय संघर्षों और बढ़ती आर्थिक अनिश्चितताओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। इन परिस्थितियों के बावजूद भारत लगातार मजबूत आर्थिक प्रदर्शन दर्ज कर रहा है और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए हुए है। इसी पृष्ठभूमि में बैठक के दौरान आर्थिक गतिविधियों को और अधिक प्रोत्साहित करने के उपायों पर विशेष जोर दिया गया।

    चर्चा के दौरान व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक नीतिगत कदमों की समीक्षा की गई। विशेषज्ञों ने विकास दर को मजबूत बनाए रखने, निवेश आकर्षित करने और उत्पादक क्षेत्रों को प्रोत्साहन देने से जुड़े विभिन्न सुझाव प्रस्तुत किए। प्रधानमंत्री ने भी बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

    बैठक में शासन व्यवस्था को अधिक प्रभावी और नागरिक केंद्रित बनाने के प्रयासों पर भी चर्चा हुई। लोगों के दैनिक जीवन को सरल बनाने और कारोबार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने से जुड़े सुधारों की समीक्षा की गई। अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को आसान बनाने, प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार किया गया। सरकार का मानना है कि बेहतर कारोबारी माहौल आर्थिक गतिविधियों को गति देने और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    विचार-विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभावों को लेकर रहा। विशेषज्ञों ने ऊर्जा बाजारों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले असर का आकलन प्रस्तुत किया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता का असर ऊर्जा कीमतों और व्यापारिक लागतों पर पड़ सकता है। इसी कारण सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि वैश्विक संकटों के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। कृषि, निर्माण और सेवा क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन ने आर्थिक वृद्धि को समर्थन दिया है। हाल के आर्थिक संकेतक भी यह दर्शाते हैं कि घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही हैं। विशेषज्ञों ने माना कि संरचनात्मक सुधारों और बुनियादी ढांचे में निवेश के कारण भारत की विकास संभावनाएं अन्य कई देशों की तुलना में अधिक सकारात्मक बनी हुई हैं।

    प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों का समूह है, जो सरकार को आर्थिक और विकास संबंधी विषयों पर स्वतंत्र सुझाव प्रदान करता है। बैठक में भविष्य की विकास प्राथमिकताओं, वैश्विक आर्थिक रुझानों और बदलती चुनौतियों के अनुरूप नीतिगत तैयारियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

    बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आयोजित यह बैठक इस बात का संकेत है कि सरकार आर्थिक स्थिरता, विकास और निवेश को लेकर सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है। आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत निर्णयों के माध्यम से भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

  • PM मोदी की सुरक्षा में बड़ी चूक पर सख्त एक्शन: बेंगलुरु में रूट के पास विस्फोटक मिलने के बाद 6 पुलिसकर्मी सस्पेंड

    PM मोदी की सुरक्षा में बड़ी चूक पर सख्त एक्शन: बेंगलुरु में रूट के पास विस्फोटक मिलने के बाद 6 पुलिसकर्मी सस्पेंड


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की चूक को बेहद गंभीर माना जाता है और बेंगलुरु में सामने आए एक मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और जिम्मेदारियों पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री के निर्धारित दौरे के दौरान उनके रूट के पास विस्फोटक सामग्री मिलने के मामले में अब प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है। सुरक्षा व्यवस्था में कथित लापरवाही को गंभीर मानते हुए छह पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इस कार्रवाई ने पुलिस विभाग के भीतर भी हलचल तेज कर दी है और पूरे मामले को अत्यधिक संवेदनशील माना जा रहा है।

    बताया जा रहा है कि यह घटना प्रधानमंत्री के निर्धारित कार्यक्रम के दौरान सामने आई थी। जिस इलाके से विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, वह सुरक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जा रहा था। सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि उस इलाके में पहले से सुरक्षा बलों की तैनाती मौजूद थी और संबंधित अधिकारियों को विशेष जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। इसके बावजूद संदिग्ध सामग्री का समय पर पता न चलना सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    मामले की जानकारी सामने आते ही प्रशासनिक स्तर पर हड़कंप मच गया था। प्रधानमंत्री की सुरक्षा देश की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल होती है और इस तरह की घटनाओं को किसी भी स्थिति में सामान्य नहीं माना जाता। घटना के तुरंत बाद पूरे मामले की आंतरिक जांच शुरू की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर सुरक्षा घेरे के भीतर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्यों की समीक्षा की गई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।

    प्रारंभिक जांच में सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध और लापरवाहीपूर्ण पाई गई। जांच रिपोर्ट के आधार पर एक पुलिस सब इंस्पेक्टर, एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर और चार कांस्टेबलों पर कार्रवाई की गई है। विभाग का मानना है कि संवेदनशील ड्यूटी के दौरान अपेक्षित सतर्कता नहीं बरती गई, जिसके कारण यह स्थिति पैदा हुई। इसी आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई को जरूरी माना गया।

    सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री जैसे अति विशिष्ट व्यक्ति की यात्रा के दौरान बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की जाती है। इसमें रूट की जांच, निगरानी और संदिग्ध गतिविधियों पर लगातार नजर रखने की प्रक्रिया शामिल होती है। ऐसे में किसी भी प्रकार की चूक न केवल सुरक्षा तंत्र के लिए चिंता का विषय बनती है बल्कि भविष्य की रणनीतियों पर भी असर डालती है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा से जुड़े मामलों में छोटी से छोटी गलती भी बड़े खतरे का कारण बन सकती है। प्रशासन अब इस मामले की गहराई से जांच कर रहा है और उम्मीद की जा रही है कि आगे सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाए जाएंगे ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।

  • राष्ट्रीय मुद्दों पर मंथन के लिए दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठक, सरकार की रणनीति और संभावित बदलावों पर नजर

    राष्ट्रीय मुद्दों पर मंथन के लिए दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठक, सरकार की रणनीति और संभावित बदलावों पर नजर


    नई दिल्ली ।
    विदेश दौरे से लौटने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर सक्रिय राजनीतिक और प्रशासनिक मोड में दिखाई दे रहे हैं। गुरुवार को राजधानी दिल्ली में होने वाली मंत्रिपरिषद की अहम बैठक को लेकर पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब देश के सामने कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियाँ मौजूद हैं और सरकार की नीतिगत दिशा पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। इस उच्च स्तरीय बैठक में सभी केंद्रीय मंत्रियों, स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी रहने की संभावना है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि चर्चा केवल औपचारिक समीक्षा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें महत्वपूर्ण निर्णय और भविष्य की रणनीति पर भी मंथन किया जा सकता है।

    सूत्रों के अनुसार बैठक में सरकार विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों की विस्तृत समीक्षा कर सकती है। खासतौर पर ऐसे विभाग जिन पर हाल के समय में प्रदर्शन को लेकर सवाल उठे हैं, उन पर अधिक ध्यान दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। इसके साथ ही देश की मौजूदा आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए नीतिगत सुधारों पर भी विचार किया जा सकता है। बैठक में वैश्विक परिस्थितियों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ रहा है, इस विषय को भी गंभीरता से लिया जा सकता है। विशेष रूप से ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता और उसके घरेलू प्रभाव जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहने की संभावना है।

    इसी बीच देश में NEET परीक्षा से जुड़े विवाद ने सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी कर दी है। लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ा यह मुद्दा लगातार राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और संस्थागत कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच सरकार पर दबाव बढ़ा है कि वह इस पूरे मामले में ठोस और भरोसेमंद कदम उठाए। माना जा रहा है कि बैठक में इस विषय पर भी विस्तृत चर्चा हो सकती है और भविष्य में परीक्षा प्रणाली को अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाने के लिए कुछ नए निर्णय सामने आ सकते हैं।

    इसके अलावा वैश्विक स्तर पर चल रहे तनावपूर्ण हालात भी भारत की नीति निर्धारण प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संसाधनों की स्थिति और आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं को देखते हुए सरकार इस दिशा में पहले से अधिक सतर्क रुख अपनाने की कोशिश कर रही है। बैठक में यह भी विचार किया जा सकता है कि आम जनता पर किसी भी तरह के आर्थिक दबाव को कम करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

    राजनीतिक दृष्टि से भी इस बैठक को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसे सरकार के वर्तमान कार्यकाल की एक बड़ी समीक्षा बैठक के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि आने वाले समय में कुछ विभागों में बदलाव या नई जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण संभव है। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है, लेकिन बैठक के एजेंडे को लेकर उत्सुकता लगातार बढ़ती जा रही है।

  • राहुल गांधी के बयान से गरमाई राजनीति, पीएम मोदी और अमित शाह पर टिप्पणी के बाद BJP का जोरदार पलटवार

    राहुल गांधी के बयान से गरमाई राजनीति, पीएम मोदी और अमित शाह पर टिप्पणी के बाद BJP का जोरदार पलटवार

    नई दिल्ली /उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक जनसभा के दौरान दिए गए राहुल गांधी के बयान के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाते हुए तीखी टिप्पणी की, जिसके बाद राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है। उनके इस बयान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों की जंग तेज हो गई है।

    राहुल गांधी ने अपने भाषण में मौजूदा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए महंगाई और आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि देश में आम जनता पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है और जरूरी वस्तुओं की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में देश को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और आम लोगों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

    अपने संबोधन में उन्होंने सरकार पर बड़े उद्योगपतियों के हित में काम करने का आरोप भी लगाया और देश की आर्थिक दिशा को लेकर सवाल खड़े किए। इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी और अमित शाह को लेकर जो टिप्पणी की, उसने राजनीतिक विवाद को और गहरा कर दिया।

    राहुल गांधी के इस बयान के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी ने उनके बयान को आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि यह न केवल प्रधानमंत्री का बल्कि देश की जनता का भी अपमान है। बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी की भाषा और सोच पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीति से प्रेरित और निराशा से भरा बयान करार दिया।

    बीजेपी ने अपने जवाब में कहा कि देश के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले सुरक्षा और विकास के प्रयासों को गलत ठहराना उचित नहीं है। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार ने आतंकवाद, नक्सलवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मजबूत कदम उठाए हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी माहौल या राजनीतिक तनाव के बीच ऐसे बयान अक्सर विवाद को बढ़ा देते हैं और जनता के बीच भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं। वहीं, बीजेपी ने इस मुद्दे को लेकर राहुल गांधी पर लगातार हमले तेज कर दिए हैं और इसे आगामी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बताया है।

  • पश्चिम एशिया युद्ध की स्थिति में भी अफवाह फैला रही कांग्रेस : मोदी

    पश्चिम एशिया युद्ध की स्थिति में भी अफवाह फैला रही कांग्रेस : मोदी


    गुवाहाटी। प्र
    धानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट और युद्ध की परिस्थितियों के बीच भी कांग्रेस देश में अफवाह फैलाने और गलत जानकारी देने में लगी हुई है, जबकि भाजपा-एनडीए सरकार किसानों के हित, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और पूर्वोत्तर के विकास के लिए लगातार काम कर रही है।

    प्रधानमंत्री ने यहां एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान असम के लिए 19,500 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह किसी भी स्थिति में देश के प्रति ईमानदार नहीं है। उन्होंने कांग्रेस नेताओं को सलाह देते हुए कहा कि वे 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भाषण को सुनें। मोदी ने कहा कि पंडित नेहरू ने एक बार कहा था कि उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच चल रहे युद्ध की वजह से भारत में महंगाई बढ़ रही है। आज कांग्रेस के लोग भी उसी तरह देश को गुमराह करने में लगे हैं, जबकि वैश्विक संकटों का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ता है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा-एनडीए सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यापक काम किया है। आज भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों का ध्यान रख रहा है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। असम सहित पूरे पूर्वोत्तर में गैस पाइपलाइन और ऊर्जा बुनियादी ढांचे के विकास पर अभूतपूर्व निवेश किया जा रहा है।

    उन्होंने बताया कि किसानों के लिए भी बड़ा कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ ही समय पहले पूरे देश के करोड़ों किसानों के खातों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत 18 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे भेजी गई है। यह योजना देश के छोटे और सीमांत किसानों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत माध्यम बन चुकी है।

    उन्होंने कहा कि 2014 से पहले ऐसे लाखों किसान थे जिनके पास न तो मोबाइल फोन था और न ही बैंक खाता, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय समावेशन के माध्यम से करोड़ों किसानों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया है और अब तक उनके खातों में सवा चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि भेजी जा चुकी है।

    प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि जब प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना शुरू की गई थी, तब कांग्रेस के लोगों ने इसके बारे में झूठ फैलाया था। कांग्रेस के नेता किसानों से कहते थे कि चुनाव के बाद उन्हें यह पैसा वापस करना पड़ेगा, लेकिन आज यह योजना किसानों के लिए एक मजबूत सहारा बन चुकी है। मोदी ने कहा कि भाजपा-एनडीए सरकार के लिए किसान हित सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 से पहले केंद्र में दस वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही और उस दौरान किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के रूप में लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये मिले थे। इसके विपरीत पिछले दस वर्षों में उनकी सरकार ने किसानों को एमएसपी के रूप में 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया है। एमएसपी, सस्ता कृषि ऋण, फसल बीमा और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि वैश्विक संकटों का असर भारत की खेती पर कम से कम पड़े।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड महामारी और उसके बाद हुए वैश्विक संघर्षों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई थी। कई देशों में इसकी कमी हो गई थी, लेकिन भारत सरकार ने किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने दी। जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की एक बोरी की कीमत लगभग 3000 रुपये तक पहुंच गई थी, वहीं भारत में किसानों को यह मात्र 300 रुपये में उपलब्ध कराई गई। इसके लिए केंद्र सरकार ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी दी है।

    उन्होंने कहा कि पिछले दशक में देश को कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। लंबे समय तक कांग्रेस सरकारों ने देश को कई क्षेत्रों में विदेशों पर निर्भर बनाए रखा, जिससे अंतरराष्ट्रीय संकटों का सीधा असर भारत के किसानों और आम लोगों पर पड़ता था।

    प्रधानमंत्री ने बताया कि खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए सरकार ने “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” नीति लागू की है, जिसके तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही किसानों को सोलर पंप से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि डीजल पर उनकी निर्भरता कम हो सके। असम के विकास का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्य आज पूरे पूर्वोत्तर के लिए एक मॉडल बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि असम की प्रगति का प्रभाव पूरे नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है और यह क्षेत्र देश के विकास में नई गति प्रदान कर रहा है।

    प्रधानमंत्री ने असम के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिक परिवारों का जिक्र किया और कहा कि राज्य सरकार ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करते हुए चाय बागान श्रमिकों को भूमि के पट्टे प्रदान कर रही है। इससे हजारों परिवारों को पहली बार भूमि का अधिकार मिल रहा है। असम आज शांति, विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह राज्य पूरे पूर्वोत्तर के उज्ज्वल भविष्य का मार्गदर्शक बनेगा।