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  • ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति पर अजीत डोभाल का बड़ा खुलासा, पीएम मोदी ने लौटते ही पूछा था हमले के जिम्मेदार कौन

    ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति पर अजीत डोभाल का बड़ा खुलासा, पीएम मोदी ने लौटते ही पूछा था हमले के जिम्मेदार कौन

    नई दिल्ली ।पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अहम जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि हमले के तुरंत बाद भारत सरकार ने जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया था। इसी प्रक्रिया में आगे की रणनीति तैयार हुई और ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया गया।

    अजीत डोभाल के अनुसार, पहलगाम हमले की जानकारी मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना विदेश दौरा बीच में ही समाप्त कर भारत लौटने का फैसला किया था। भारत पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री ने अधिकारियों के साथ बैठक की। इस बैठक में उन्होंने सबसे पहले यह जानना चाहा कि पहलगाम में हमला किसने किया और इसके पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं।

    प्रधानमंत्री ने अधिकारियों से हमले से जुड़ी पूरी जानकारी जुटाने को कहा। डोभाल के मुताबिक, हमले के पीछे मौजूद लोगों की पहचान करना शुरुआती प्राथमिकताओं में शामिल था। इसके बाद सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने तेजी से जानकारी जुटाने का काम शुरू किया। जांच के आधार पर हमले से जुड़े लोगों और उनके नेटवर्क के बारे में जानकारी एकत्र की गई।

    डोभाल ने बताया कि भारत की जवाबी कार्रवाई की रणनीति केवल सीधे तौर पर हमले में शामिल आतंकियों तक सीमित रखने की योजना नहीं थी। इसके पीछे आतंकवाद को समर्थन देने वाले ढांचे और उन्हें सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने वाले ठिकानों पर भी कार्रवाई करने की सोच शामिल थी। इसी व्यापक रणनीति के आधार पर ऑपरेशन सिंदूर की योजना तैयार की गई।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसियों ने समन्वय के साथ कार्रवाई की। इस अभियान के जरिए भारत ने आतंकवाद से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया। डोभाल के मुताबिक, कार्रवाई का उद्देश्य आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने वाले ढांचे पर स्पष्ट संदेश देना था कि भारत अपनी सुरक्षा से जुड़े मामलों में आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

    पहलगाम हमला भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती के रूप में सामने आया था। इस घटना के बाद देश में आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग तेज हुई। सरकार के स्तर पर भी हमले के जिम्मेदार लोगों की पहचान और उनके खिलाफ जवाबी कदमों को लेकर तेजी से निर्णय लिए गए।

    डोभाल ने भारत की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ रुख को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया। उनके अनुसार, भारत शांति और संयम में विश्वास रखता है, लेकिन इसे कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। देश की सुरक्षा, संप्रभुता और नागरिकों की रक्षा से जुड़े मामलों में जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

    ऑपरेशन सिंदूर की योजना से जुड़े इस खुलासे से यह भी सामने आता है कि पहलगाम हमले के बाद जवाबी कार्रवाई को लेकर निर्णय तत्काल प्रतिक्रिया के बजाय जानकारी जुटाने, जिम्मेदार लोगों की पहचान और रणनीतिक तैयारी के आधार पर आगे बढ़ाया गया था। प्रधानमंत्री की वापसी के बाद हुई शुरुआती बैठक से लेकर खुफिया जानकारी जुटाने और फिर कार्रवाई की योजना तैयार करने तक कई स्तरों पर समन्वय किया गया।

    अजीत डोभाल के बयान के मुताबिक, पहलगाम हमले के बाद भारत की प्राथमिकता हमले के पीछे मौजूद लोगों और नेटवर्क की पहचान करना थी। इसके बाद आतंकवाद के खिलाफ जवाबी रणनीति तैयार की गई। ऑपरेशन सिंदूर इसी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बना और इसके जरिए भारत ने अपनी सुरक्षा नीति तथा आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख को स्पष्ट किया।

  • दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल

    दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में दिमागी नक्सल शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में समाज को गलत दिशा में ले जाने वाले तत्वों को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस और वाम दलों के नेताओं ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री के बयान को विपक्ष और सरकार से असहमति रखने वाले लोगों के संदर्भ में देखा और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए अर्बन नक्सल शब्द के पुराने इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री की ओर से अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन संसद में इसकी परिभाषा को लेकर सवाल पूछे जाने पर स्पष्ट परिभाषा सामने नहीं आई थी।

    जयराम रमेश ने जाति जनगणना के मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक जाति जनगणना की मांग को अर्बन नक्सल सोच से जोड़कर देखा जाता था, जबकि बाद में सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, सरकार की ओर से पहले किसी मांग या विचार को एक विशेष राजनीतिक शब्दावली से जोड़ना और बाद में उसी दिशा में कदम उठाना सवाल खड़े करता है।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या उनसे असहमति जताने वालों को इस तरह के विशेषणों से संबोधित करना उचित नहीं है।

    वाम दलों ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीरता से लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के महासचिव एमए बेबी ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। वाम नेताओं ने दिमागी नक्सल जैसे शब्द के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक विमर्श के लिए गंभीर विषय बताया।

    इस पूरे विवाद की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से हुई। लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद चुनौतियों और समाज को प्रभावित करने वाली विचारधाराओं का उल्लेख किया। इसी दौरान उन्होंने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसे तत्वों को पहचानने की आवश्यकता बताई, जो उनके अनुसार समाज को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं।

    प्रधानमंत्री की टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद अब सार्वजनिक बहस का रूप ले चुके हैं। कांग्रेस और वाम दल जहां इस शब्दावली को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री के बयान का संदर्भ सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों से जुड़ा बताया जा रहा है।

    दिमागी नक्सल शब्द पर शुरू हुआ यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राजनीतिक दल स्वतंत्रता दिवस के संदेशों और देश की दिशा से जुड़े मुद्दों पर अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। चिदंबरम की टिप्पणी और विपक्षी नेताओं की आपत्तियों ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस शब्द को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच और बयानबाजी देखने को मिल सकती है।

  • अटल बिहारी वाजपेयी की आठवीं पुण्यतिथि पर राष्ट्रपति मुर्मू, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन और पीएम मोदी ने सदैव अटल पहुंचकर श्रद्धांजलि दी

    अटल बिहारी वाजपेयी की आठवीं पुण्यतिथि पर राष्ट्रपति मुर्मू, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन और पीएम मोदी ने सदैव अटल पहुंचकर श्रद्धांजलि दी

    नई दिल्ली । पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आठवीं पुण्यतिथि पर रविवार को देश ने उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया। नई दिल्ली स्थित उनके स्मारक सदैव अटल पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने पहुंचकर पुष्प अर्पित किए और पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि दी।

    श्रद्धांजलि कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री, सांसद और विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेता भी शामिल हुए। सभी ने वाजपेयी के सार्वजनिक जीवन, राष्ट्र के प्रति उनके योगदान और भारतीय राजनीति में उनकी विशिष्ट भूमिका को याद किया। इस अवसर पर उनके व्यक्तित्व को लोकतांत्रिक मूल्यों, प्रभावी नेतृत्व और राष्ट्रहित से जोड़कर देखा गया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वाजपेयी को याद करते हुए उनके नेतृत्व और विचारों को देश के लिए प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि वाजपेयी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित किया और उनके विचार तथा कार्य आज भी देशवासियों को दिशा देते हैं। वाजपेयी की पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि देने का सिलसिला जारी रहा।

    अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के उन नेताओं में शामिल रहे जिनकी पहचान केवल प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली वक्ता, कवि और राजनेता के तौर पर भी बनी। उनकी भाषण शैली, सरल व्यवहार और राजनीतिक संवाद का अलग अंदाज उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान देता था। संसद में उनके वक्तव्यों को लंबे समय तक राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।

    वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने। वर्ष 1996 में उन्होंने पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला, लेकिन उनकी सरकार 13 दिन ही चल सकी। इसके बाद वर्ष 1998 में उन्होंने दोबारा प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1999 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने 2004 तक सरकार का नेतृत्व किया। इस दौरान गठबंधन सरकार को स्थिरता के साथ चलाना उनके राजनीतिक कौशल की महत्वपूर्ण मिसाल माना गया।

    उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में वर्ष 1998 का पोखरण परमाणु परीक्षण भारत की महत्वपूर्ण रणनीतिक घटनाओं में शामिल रहा। इस निर्णय के बाद भारत की परमाणु क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई। इसके साथ ही उनके कार्यकाल में बुनियादी ढांचे और सड़क संपर्क को मजबूत करने से जुड़ी कई योजनाओं को आगे बढ़ाया गया।

    स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उनके कार्यकाल की प्रमुख विकास परियोजनाओं में रही। इसका उद्देश्य देश के प्रमुख महानगरों और महत्वपूर्ण शहरों को बेहतर सड़क नेटवर्क के माध्यम से जोड़ना था। इसके अलावा ग्रामीण सड़क संपर्क और दूरसंचार क्षेत्र में भी उनके कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण पहल हुईं।

    अटल बिहारी वाजपेयी को वर्ष 2015 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र के लिए किए गए योगदान के प्रति देश की मान्यता के रूप में देखा गया।

    16 अगस्त 2018 को वाजपेयी का निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि पर हर वर्ष उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। आठवीं पुण्यतिथि के अवसर पर भी उनके स्मारक सदैव अटल पर नेताओं ने पुष्प अर्पित कर उनके योगदान को याद किया। भारतीय राजनीति में वाजपेयी की विरासत आज भी उनके नेतृत्व, भाषण कला, कविताओं और राष्ट्रसेवा से जुड़ी स्मृतियों के रूप में मौजूद है।

  • PM मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान पर सियासी घमासान… विपक्षी दलों ने दी कड़ी प्रतिक्रिया

    PM मोदी के दिमागी नक्सल वाले बयान पर सियासी घमासान… विपक्षी दलों ने दी कड़ी प्रतिक्रिया


    नई दिल्ली।
    80वें स्वतंत्रता दिवस (80th Independence Day) (15 अगस्त 2026) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के लाल किले से दिए गए भाषण में “दिमागी नक्सल” (“Intellectual Naxal”) शब्द के इस्तेमाल ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।

    प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश में जहां एक तरफ हथियारबंद नक्सलवाद खात्मे की कगार पर है, वहीं दूसरी तरफ ‘दिमागी नक्सल’ समाज में अराजकता फैलाने और युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। इस बयान पर कांग्रेस, सीपीआई, तृणमूल कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) समेत तमाम विपक्षी दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

    लाल किले से PM मोदी का क्या था बयान?
    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में वैचारिक विरोधियों पर निशाना साधते हुए कहा, “सुरक्षा बलों ने जंगलों में जारी बंदूकधारी माओवादी उग्रवाद को लगभग ध्वस्त कर दिया है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन नक्सली विचारधारा वाले लोग अब ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में देश को गलत रास्ते पर ले जाने और युवाओं को गुमराह करने के मौकों की तलाश में हैं।”

    पीएम ने कहा कि माओवादी विचारधारा ने दशकों तक सत्ता के गलियारों और सलाहकार समितियों में पैठ बनाकर सरकारी नीतियों को प्रभावित किया था। हमें इन ‘दिमागी नक्सलियों’ को अलग-थलग करना होगा।

    विपक्षी नेताओं का तीखा पलटवार
    प्रधानमंत्री के इस बयान के सामने आते ही विपक्षी दलों ने उन पर स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों को निशाना बनाने के लिए करने का आरोप लगाया।

    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया X पर पोस्ट करते हुए लिखा, “पहले उन्होंने अपने विरोधियों को ‘अर्बन नक्सल’ कहा, अब वे उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ कह रहे हैं। यह उनकी हताशा का स्पष्ट संकेत है। पीएम अक्सर उन्हीं नीतियों को अपनाते हैं जिनकी सलाह उनकी तरफ से निशाना बनाए गए लोग देते हैं।”

    वहीं CJP के मुख्य प्रवक्ता और स्वतंत्र पत्रकार सौरभ दास ने पीएम की शब्दावली पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा, “दिमागी नक्सल या ऐसा कोई भी ठप्पा काम नहीं आने वाला, प्रधानमंत्री जी! आप देश के शिक्षित युवाओं को सिर्फ इसलिए ‘नक्सली’ कैसे कह सकते हैं क्योंकि वे आपकी सरकार से सवाल पूछते हैं? यह सरासर अहंकार और युवाओं की समस्याओं को हल करने में नाकामी है।”

    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के महासचिव डी. राजा ने कहा कि राइट-विंग ट्रॉप्स में ‘एंटी-नेशनल’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के बाद अब पीएम ने ‘दिमागी नक्सल’ का एक नया निरर्थक लेबल जोड़ दिया है। यह असहमति की आवाजों को दबाने और रोजगार-शिक्षा मांगने वाले युवाओं के मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास है।

    टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने पीएम के बयान पर तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “हां, मैं एक दिमागी नक्सल हूं। परिभाषा के मुताबिक सभी कॉकरोच होते हैं।” 2027 और 2028 के आगामी राज्य विधानसभा चुनावों से पहले लाल किले से आया यह बयान आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा बहस का एक मुख्य केंद्र बनने वाला है।

  • भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।

    भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को मिले दो द्विपक्षीय निमंत्रणों पर बांग्लादेश सरकार ने व्यस्तता का हवाला दिया।


    नई दिल्ली । 
    भारत की ओर से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को दिए गए दो अलग-अलग आधिकारिक निमंत्रणों पर पड़ोसी देश की ओर से अभी तक कोई अंतिम प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ढाका की ओर से संकेत दिए गए हैं कि प्रस्तावित भारत यात्रा का अंतिम ढांचा प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम और दोनों देशों के बीच जारी द्विपक्षीय बातचीत की प्रगति पर निर्भर करेगा।

    भारत ने सितंबर महीने में आयोजित होने जा रहे आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के विशेष सत्र के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया है। इसके अतिरिक्त एक पृथक द्विपक्षीय वार्ता के लिए भी नई दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा गया है। हालांकि, बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय की तरफ से कहा गया है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अभी पर्याप्त समय शेष है और सरकार इस दौरान कई महत्वपूर्ण घरेलू व संवैधानिक प्राथमिकताओं में व्यस्त है।

    विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, बिम्सटेक संगठन के वर्तमान अध्यक्ष के नाते भारत ने बांग्लादेश को ब्रिक्स सम्मेलन के संपर्क सत्र में शामिल होने का विशेष अवसर प्रदान किया है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से बने तनावपूर्ण माहौल को सामान्य बनाना और द्विपक्षीय वार्ता के जरिए आपसी संबंधों को नई दिशा देना है।

    ढाका में अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि सरकार सभी देशों के साथ सकारात्मक संबंधों की पक्षधर है। यदि आगामी दिनों में स्थितियां अनुकूल रहती हैं और बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है, तो निश्चित रूप से भारत यात्रा को अंतिम रूप दिया जाएगा। दोनों पड़ोसी मुल्कों के शीर्ष नेतृत्व के बीच प्रत्यक्ष संवाद से कई लंबित क्षेत्रीय व व्यापारिक मुद्दों के हल होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बांग्लादेश में बीते समय में हुए राजनीतिक बदलावों के बाद से ही नई दिल्ली और ढाका के बीच रणनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। ऐसे समय में शीर्ष स्तर की यह प्रस्तावित बैठक बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। द्विपक्षीय कूटनीति के जानकारों का मानना है कि व्यापार, सुरक्षा और ऊर्जा संकट जैसे संवेदनशील विषयों पर दोनों देशों का मिलकर काम करना बेहद आवश्यक है।

    अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की इस हलचल का सीधा असर भारत के विभिन्न राज्यों और व्यापारिक साझेदारियों पर भी देखा जा सकता है। मध्य प्रदेश जैसे औद्योगिक और कृषि प्रधान राज्य, जो वस्त्र और हस्तशिल्प निर्यात से जुड़े हैं, वे भी पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक स्थिरता की उम्मीद रखते हैं। मध्य प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक घरानों और नीति निर्माताओं की नजरें भी इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर बनी रहती हैं।

    दक्षिण एशियाई कूटनीति में बिम्सटेक और ब्रिक्स जैसे मंचों की भूमिका आने वाले समय में और अधिक निर्णायक होने की संभावना है। यदि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री इस सम्मेलन में भाग लेते हैं, तो यह क्षेत्र में आर्थिक सहयोग और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम सिद्ध हो सकता है।

    हाल के समय में पैदा हुए गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों देशों के राजनयिक लगातार संपर्क में हैं। अब सभी की नजरें ढाका के अंतिम आधिकारिक निर्णय पर टिकी हुई हैं कि क्या ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता संभव हो पाती है या नहीं।

  • संजय राउत ने पीएम मोदी की संसद में अनुपस्थिति पर कसा तंज, राहुल गांधी को लेकर कही राजनीतिक धुलाई की बात

    संजय राउत ने पीएम मोदी की संसद में अनुपस्थिति पर कसा तंज, राहुल गांधी को लेकर कही राजनीतिक धुलाई की बात

    नई दिल्ली । शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने संसद के मानसून सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री के 56 इंच वाले राजनीतिक संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए उन्हें सदन के भीतर आने की चुनौती दी।

    संजय राउत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में आने से डरना नहीं चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता संसद के मुख्य दरवाजे पर खड़े हैं और प्रधानमंत्री को हिम्मत दिखाकर सदन के अंदर आना चाहिए। राउत ने अपने बयान में राहुल गांधी को अच्छा और संस्कारी व्यक्ति बताते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री के साथ कुछ नहीं करेंगे, बल्कि केवल थोड़ी राजनीतिक धुलाई करेंगे।

    राउत का यह बयान संसद के जारी मानसून सत्र के बीच सामने आया है। इस दौरान विपक्षी दल विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की संसद में मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी राजनीतिक माहौल के बीच राउत ने दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर सरकार पर निशाना साधा।

    संजय राउत ने प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें राहुल गांधी से डरने की कोई जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री को सदन में आकर विपक्ष के सवालों और बहस का सामना करना चाहिए। राउत के बयान में संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच सीधे राजनीतिक संवाद की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    राउत ने अपने बयान में अमित शाह का भी उल्लेख किया और संसद में उनकी अनुपस्थिति को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार के शीर्ष नेताओं को महत्वपूर्ण संसदीय चर्चाओं के दौरान सदन में मौजूद रहना चाहिए। विपक्ष की ओर से लगातार यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि सरकार के वरिष्ठ नेताओं को संसद में उपस्थित रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में 56 इंच का उल्लेख भारतीय राजनीति में पहले से इस्तेमाल होने वाला राजनीतिक मुहावरा है। राउत ने इसी संदर्भ को अपने तंज में शामिल करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को अपनी राजनीतिक ताकत पर भरोसा है तो उन्हें संसद में आने से बचना नहीं चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री से सदन के भीतर आने और विपक्ष का सामना करने की बात कही।

    राउत की टिप्पणी के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से उनके बयान को राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया गया और इसे प्रचार पाने की कोशिश के तौर पर भी देखा गया। वहीं विपक्षी खेमे की ओर से संसद में सरकार की जवाबदेही और वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी का मुद्दा उठाया जा रहा है।

    इस बयान में राहुल गांधी भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे। राउत ने प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच संसद में राजनीतिक बहस का संकेत देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को राहुल गांधी से घबराने के बजाय सदन में आना चाहिए। उनका तंज मुख्य रूप से प्रधानमंत्री की संसद में अनुपस्थिति और विपक्ष के साथ सीधे मुकाबले को लेकर था।

    संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर राजनीतिक टकराव जारी है। ऐसे में संजय राउत की टिप्पणी ने दोनों पक्षों के बीच चल रही बयानबाजी को और प्रमुख बना दिया है। फिलहाल राउत ने प्रधानमंत्री की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी के संदर्भ में जो टिप्पणी की है, वह संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन गई है।

  • आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…

    आगा खान की भारत यात्रा को लेकर शहजाद पूनावाला ने पीएम मोदी के प्रति जताया आभार…


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी छोड़ने के बाद पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति एक बार फिर आभार जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट में प्रधानमंत्री को दो बार धन्यवाद कहा। उनके इस पोस्ट का संबंध वैश्विक इस्माइली समुदाय के आध्यात्मिक प्रमुख मौलाना हजार इमाम शाह रहीम अल-हुसैनी आगा खान की आगामी भारत यात्रा से है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में बताया कि भारत सरकार के निमंत्रण पर आगा खान 9 से 15 सितंबर 2026 तक भारत की आधिकारिक यात्रा पर आएंगे। उन्होंने इस निमंत्रण को भारत और वैश्विक इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति आभार व्यक्त किया।

    शहजाद पूनावाला का संबंध शिया इस्माइली समुदाय से बताया जाता है। इस समुदाय के आध्यात्मिक नेतृत्व का संबंध आगा खान की इमामत से है। ऐसे में आगा खान की भारत यात्रा को लेकर पूनावाला की प्रतिक्रिया व्यक्तिगत और सामुदायिक संदर्भ से भी जुड़ी हुई है।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि भारत सरकार की ओर से दिया गया निमंत्रण वैश्विक इस्माइली समुदाय द्वारा सराहा गया है। उन्होंने इसे भारत और इस्माइली इमामत के बीच मित्रता, पारस्परिक सम्मान तथा साझा मूल्यों पर आधारित लंबे संबंधों का संकेत बताया।

    उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस्माइली समुदाय ने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण विकास, संस्कृति और परोपकार के क्षेत्र में भारत तथा दुनिया के कई हिस्सों में योगदान दिया है। उनके अनुसार, आगा खान डेवलपमेंट नेटवर्क के माध्यम से भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य, विरासत संरक्षण, ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण से जुड़े कई कार्य किए गए हैं।

    पूनावाला ने अपने संदेश में कहा कि इन पहलों का लाभ विभिन्न वर्गों के लोगों तक पहुंचा है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर इस समुदाय की ओर से बहुलवाद, जीवन की गुणवत्ता और सतत विकास को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों का भी उल्लेख किया।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस्माइली समुदाय के बीच संबंधों को भी रेखांकित किया। पूनावाला के मुताबिक, दोनों के बीच संबंध पारस्परिक सम्मान, विकास के साझा दृष्टिकोण और निरंतर सहयोग पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि समुदाय आगा खान की यात्रा और भारत में अपनी जमात से उनकी मुलाकात को लेकर उत्साहित है।

    पूनावाला ने अपने संदेश के अंत में प्रधानमंत्री मोदी को एक बार फिर धन्यवाद दिया। उन्होंने भारत सरकार की ओर से दिए गए निमंत्रण को गर्मजोशी और उदारता से भरा कदम बताया। इसी वजह से उनका यह पोस्ट राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बना, क्योंकि वह हाल ही में बीजेपी से अलग हुए हैं।

    हालांकि पार्टी छोड़ने के बाद भी पूनावाला की ओर से प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक टिप्पणियां सामने आती रही हैं। इस बार उनका संदेश किसी राजनीतिक मुद्दे के बजाय आगा खान की प्रस्तावित आधिकारिक यात्रा और भारत-इस्माइली समुदाय के संबंधों पर केंद्रित रहा।

    आगा खान की सितंबर में प्रस्तावित यात्रा के दौरान भारत और इस्माइली इमामत के बीच लंबे समय से चले आ रहे संपर्क, सामुदायिक संबंधों और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग से जुड़े पहलुओं पर ध्यान रहने की संभावना है। पूनावाला का बयान इसी व्यापक संदर्भ में प्रधानमंत्री के प्रति उनके आभार को सामने रखता है।

  • PM Modi पर CEO मुग्धा प्रधान की विवादित टिप्पणी से मचा बवाल, वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं

    PM Modi पर CEO मुग्धा प्रधान की विवादित टिप्पणी से मचा बवाल, वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर हेल्थ और वेलनेस क्षेत्र से जुड़ी कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO मुग्धा प्रधान की एक कथित टिप्पणी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। वायरल वीडियो में मुग्धा प्रधान सरकार के कामकाज और देश से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी नाराजगी जाहिर करती नजर आती हैं। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर उनके द्वारा की गई थप्पड़ मारने वाली टिप्पणी ने विवाद खड़ा कर दिया है। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने उनके बयान की आलोचना की है और इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    वायरल वीडियो में मुग्धा प्रधान महिलाओं और बच्चों के गुस्से को दबाने की मानसिकता पर सवाल उठाती दिखाई देती हैं। वह देश में सार्वजनिक व्यवस्था, गंदगी और पर्यावरण जैसे मुद्दों का भी जिक्र करती हैं। इसी क्रम में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं। वीडियो के एक हिस्से में वह कहती नजर आती हैं कि यदि उनकी प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात हुई तो वह उन्हें थप्पड़ मारेंगी। इसके साथ ही वह प्रधानमंत्री पद छोड़ने और युवाओं को जिम्मेदारी देने जैसी बातें भी करती दिखाई देती हैं।

    मुग्धा प्रधान की यह टिप्पणी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस तेज हो गई। कई यूजर्स ने उनके शब्दों और प्रधानमंत्री को लेकर की गई टिप्पणी की आलोचना की। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े किसी व्यक्ति को राजनीतिक या नीतिगत असहमति व्यक्त करते समय भाषा की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। वहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे मुग्धा प्रधान के व्यक्तिगत विचारों के तौर पर देखने की बात कही। इस पूरे मामले में अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के कारण वीडियो तेजी से चर्चा में आ गया।

    मुग्धा प्रधान हेल्थ और वेलनेस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी iThrive की फाउंडर और CEO के तौर पर जानी जाती हैं। वह फंक्शनल न्यूट्रिशन के क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं और स्वास्थ्य तथा पोषण से संबंधित विषयों पर काम करती हैं। कंपनी की प्रोफाइल के अनुसार, उनके पास फूड साइंस और न्यूट्रिशन में मास्टर डिग्री है। वह कॉरपोरेट क्षेत्र में भी काम कर चुकी हैं और सार्वजनिक मंचों पर स्वास्थ्य एवं पोषण से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखती रही हैं।

    विवाद बढ़ने के बाद कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में मुग्धा प्रधान की टिप्पणी को उनकी कंपनी iThrive की ब्रांड छवि से जोड़कर भी सवाल उठाए गए। हालांकि, किसी व्यक्ति के निजी राजनीतिक विचारों और उसके व्यावसायिक संस्थान की आधिकारिक स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है। वायरल वीडियो में कही गई बातों को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के बीच कंपनी की व्यावसायिक गतिविधियों और मुग्धा प्रधान के व्यक्तिगत बयानों के बीच अंतर को भी ध्यान में रखा जा रहा है।

    यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हस्तियों के राजनीतिक बयानों को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है। किसी भी राजनीतिक नेता के कामकाज पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी और हिंसा का संकेत देने वाली भाषा को लेकर विवाद की संभावना बढ़ जाती है। मुग्धा प्रधान के वायरल वीडियो ने इसी मुद्दे पर नई बहस को जन्म दिया है। फिलहाल सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणी को लेकर प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है और यह मामला ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लगातार चर्चा में बना हुआ है।

  • सीएम योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी से की मुलाकात, उत्तर प्रदेश के विकास और राजनीतिक स्थिति पर बातचीत

    सीएम योगी आदित्यनाथ ने पीएम मोदी से की मुलाकात, उत्तर प्रदेश के विकास और राजनीतिक स्थिति पर बातचीत

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री आवास पहुंचे, जहां दोनों नेताओं के बीच उत्तर प्रदेश से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत हुई। इस मुलाकात में प्रदेश के विकास कार्यों, प्रशासनिक विषयों और मौजूदा राजनीतिक स्थिति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच हुई यह बैठक ऐसे समय में हुई है, जब उत्तर प्रदेश में कई विकास परियोजनाओं और प्रशासनिक कार्यों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। दोनों नेताओं की बातचीत में प्रदेश से जुड़े प्रमुख विकास कार्यों की प्रगति और उनसे संबंधित विषयों पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, बैठक में किन-किन मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच समय-समय पर उत्तर प्रदेश से जुड़े विषयों को लेकर बैठकें होती रही हैं। राज्य में केंद्र सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन, बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट, निवेश, रोजगार और विकास कार्यों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में दोनों नेताओं की मुलाकात को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

    बैठक के दौरान उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति से जुड़े विषयों पर भी बातचीत होने की संभावना जताई गई है। हालांकि, दोनों नेताओं की बैठक के बाद किसी विशेष राजनीतिक फैसले या चर्चा का आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है। इसलिए मुलाकात के राजनीतिक पहलू को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मिलने उनके आवास पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच भी उत्तर प्रदेश से जुड़े राजनीतिक और संगठनात्मक विषयों पर बातचीत होने की संभावना है। मुख्यमंत्री की दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात को राज्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और राष्ट्रीय राजनीति में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य में केंद्र और प्रदेश सरकार के स्तर पर चल रही योजनाओं और विकास परियोजनाओं की प्रगति पर नियमित समन्वय की जरूरत रहती है। मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री से मुलाकात में ऐसे विषयों पर चर्चा होना इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है।

    प्रदेश में बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश, सड़क और परिवहन व्यवस्था, रोजगार तथा विभिन्न केंद्रीय योजनाओं से जुड़े कार्य लगातार सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की बैठक के दौरान इन क्षेत्रों में चल रहे कार्यों की स्थिति और आगे की प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श किया जाना महत्वपूर्ण है।

    फिलहाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात के बाद किसी नए निर्णय या घोषणा की जानकारी सामने नहीं आई है। बैठक में उत्तर प्रदेश से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई है। आने वाले दिनों में यदि सरकार या पार्टी की ओर से बैठक के संबंध में विस्तृत जानकारी जारी की जाती है, तो मुलाकात में चर्चा किए गए मुद्दों की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

  • पंजाब चुनाव 2027 से पहले क्या फिर साथ आएंगे बीजेपी और अकाली दल, सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात अहम

    पंजाब चुनाव 2027 से पहले क्या फिर साथ आएंगे बीजेपी और अकाली दल, सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात अहम

    नई दिल्ली । पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। संसद भवन में हुई इस बैठक के बाद पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, दोनों दलों ने अभी तक किसी नए गठबंधन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    सुखबीर बादल ने मुलाकात के बाद बताया कि प्रधानमंत्री के साथ पंजाब की कानून व्यवस्था और राज्य की सरकारी योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। बैठक का विस्तृत एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में इस मुलाकात को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और राज्य में बन रहे नए राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बीजेपी और अकाली दल का पंजाब में करीब ढाई दशक पुराना चुनावी गठबंधन रहा है। दोनों दल लंबे समय तक साथ चुनाव लड़ते रहे और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर एक-दूसरे को लाभ पहुंचाते रहे। अकाली दल का प्रभाव मुख्य रूप से ग्रामीण और किसान वर्ग में रहा, जबकि बीजेपी ने शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की।

    हालांकि, वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुए किसान आंदोलन ने दोनों दलों के रिश्तों को बदल दिया। पंजाब में किसानों के व्यापक विरोध के बीच शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने का फैसला किया। इसके साथ ही बीजेपी और अकाली दल की करीब 25 वर्ष पुरानी राजनीतिक साझेदारी टूट गई।

    बाद में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए, लेकिन दोनों दलों के बीच पुराना गठबंधन तुरंत बहाल नहीं हुआ। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। दोनों दलों को इसके बाद राज्य में अपने राजनीतिक आधार को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत महसूस हुई।

    अकाली दल फिलहाल अपने पारंपरिक जनाधार को वापस मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। बीजेपी भी पंजाब में अपने संगठन को विस्तार देने और स्वतंत्र राजनीतिक आधार तैयार करने में जुटी है। इसके बावजूद राज्य की जटिल सामाजिक और क्षेत्रीय राजनीति में दोनों दलों के पुराने तालमेल को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

    पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। पुराने गठबंधन में बीजेपी सीमित सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल अधिक सीटों पर मैदान में उतरता था। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत बीजेपी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा और तीन सीटें जीती थीं। 2022 में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे और बीजेपी को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

    दोनों दलों के लिए गठबंधन की अपनी-अपनी राजनीतिक जरूरतें भी हैं। अकाली दल को ग्रामीण और पारंपरिक वोट आधार को मजबूत करने के साथ व्यापक राजनीतिक विकल्प खड़ा करना है। वहीं बीजेपी के सामने पंजाब में संगठनात्मक विस्तार के बावजूद अकेले दम पर सत्ता की दौड़ में मजबूत स्थिति बनाने की चुनौती है।

    पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ बीजेपी, कांग्रेस और अकाली दल अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। ऐसे में यदि बीजेपी और अकाली दल के बीच किसी तरह का समझौता होता है तो इसका सीधा असर चुनावी मुकाबले और सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।

    फिलहाल सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात को गठबंधन की औपचारिक शुरुआत नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन चुनावी तैयारियों के बीच हुई इस बैठक ने इतना जरूर संकेत दिया है कि पंजाब में 2027 के चुनाव से पहले पुराने राजनीतिक रिश्तों और नए समीकरणों को लेकर संभावनाएं खुली हुई हैं।