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  • पीओके में बढ़ा असंतोष: पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्वतंत्र जांच की मांग तेज

    पीओके में बढ़ा असंतोष: पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई पर उठे सवाल, स्वतंत्र जांच की मांग तेज


    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी अशांति और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। हाल के दिनों में वहां प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई, गिरफ्तारियों और कथित मौतों को लेकर पाकिस्तान सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां आलोचनाओं के घेरे में हैं। खास बात यह है कि इस बार आवाज केवल स्थानीय स्तर से नहीं, बल्कि उन कश्मीरी समूहों की ओर से भी उठ रही है जो लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर अलग रुख रखते आए हैं।

    कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन के अध्यक्ष डॉ. मुबीन शाह ने पीओके की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान प्रशासन ने लोगों की आवाज सुनने के बजाय दमन का रास्ता अपनाया है, जिससे क्षेत्र में असंतोष और बढ़ा है। उनका कहना है कि पीओके में हो रही घटनाओं ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर रहने वाले कश्मीरियों को झकझोर दिया है।

    डॉ. शाह ने कहा कि कश्मीरी समाज के लिए यह क्षेत्र केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्व रखता है। ऐसे में वहां आम नागरिकों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई ने लोगों के मन में गहरी नाराजगी पैदा की है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि स्थानीय लोगों की समस्याओं और मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो स्थिति और अधिक जटिल हो सकती है।

    पीओके में चल रहे आंदोलन को जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी का समर्थन प्राप्त है। इस आंदोलन के समर्थन में कई प्रवासी कश्मीरी संगठनों ने पाकिस्तान सरकार के सामने 12 सूत्रीय मांग पत्र भी रखा है। इसमें प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग रोकने, गिरफ्तार लोगों की जानकारी सार्वजनिक करने और हिंसा तथा मौतों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग शामिल है। संगठनों का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है तथा नागरिकों की आवाज को दबाने के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तलाशा जाना चाहिए।

    कश्मीर डायस्पोरा कोएलिशन, जो दुनिया के कई देशों में सक्रिय कश्मीरी संगठनों का संयुक्त मंच है, ने भी इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है। संगठन का मानना है कि पीओके में मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े सवालों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने मांग की है कि घटनाओं की स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच कराई जाए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जा सके।

    विश्लेषकों का मानना है कि पीओके में उभर रहा यह असंतोष केवल स्थानीय आर्थिक समस्याओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक नीतियों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में पाकिस्तान सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है, इस पर क्षेत्र की राजनीतिक दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • चाबहार पर पाकिस्तान की नजर, ग्वादर के साथ ‘सिस्टर पोर्ट’ योजना ने बढ़ाई भारत की चिंता, रणनीतिक समीकरण बदलने की आशंका

    चाबहार पर पाकिस्तान की नजर, ग्वादर के साथ ‘सिस्टर पोर्ट’ योजना ने बढ़ाई भारत की चिंता, रणनीतिक समीकरण बदलने की आशंका

    नई दिल्ली । ईरान के चाबहार बंदरगाह को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के साथ जोड़कर ‘सिस्टर पोर्ट’ के रूप में विकसित करने की चर्चा ने क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस प्रस्ताव को ऐसे समय में सामने रखा गया है जब चाबहार परियोजना में भारत की भूमिका और भविष्य को लेकर कई तरह की चर्चाएं जारी हैं। रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस दिशा में कोई ठोस प्रगति होती है तो इसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और समुद्री सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

    पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों द्वारा प्रस्तुत इस विचार में चाबहार और ग्वादर के बीच आर्थिक एवं लॉजिस्टिक सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। प्रस्ताव के अनुसार दोनों बंदरगाहों के बीच परिवहन, कस्टम प्रक्रियाओं और व्यापारिक गतिविधियों को एकीकृत कर बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया जा सकता है। ग्वादर पहले से ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जबकि चाबहार को भारत ने अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के वैकल्पिक मार्ग के रूप में विकसित करने में निवेश किया है।

    चाबहार बंदरगाह भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक परियोजनाओं में शामिल रहा है। यह बंदरगाह पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक व्यापारिक पहुंच प्रदान करता है। यही कारण है कि इसे केवल आर्थिक परियोजना नहीं बल्कि भारत की व्यापक क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों ने इस परियोजना के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण चाबहार परियोजना की गति प्रभावित हुई है। इसी बीच यह भी चर्चा रही कि भारत अपनी कुछ हिस्सेदारी और संचालन व्यवस्था को लेकर वैकल्पिक विकल्पों पर विचार कर रहा है ताकि परियोजना पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। हालांकि भारत ने चाबहार को लेकर अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को कई बार दोहराया है।

    रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में चाबहार और ग्वादर के बीच किसी प्रकार का औपचारिक सहयोग विकसित होता है तो इससे क्षेत्र में चीन, पाकिस्तान और ईरान के बीच सहयोग का नया आयाम उभर सकता है। ऐसे परिदृश्य में भारत की समुद्री रणनीति और पश्चिमी समुद्री क्षेत्र में उसकी उपस्थिति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से अरब सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने के लिए भारत को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है।

    जानकारों के अनुसार मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में बंदरगाह केवल व्यापारिक केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सामरिक और कूटनीतिक महत्व के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में उनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी कारण चाबहार और ग्वादर से जुड़ी हर गतिविधि पर क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की नजर बनी हुई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए आने वाले वर्षों में चाबहार परियोजना का महत्व कम नहीं होगा। मध्य एशिया, रूस और पश्चिम एशिया के साथ संपर्क बढ़ाने की रणनीति में यह बंदरगाह अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ऐसे में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच भारत के लिए अपनी आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक प्राथमिकताओं के अनुरूप संतुलित और सक्रिय नीति अपनाना आवश्यक होगा।

  • भारत की परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी, SIPRI रिपोर्ट के अनुसार 190 हथियारों के साथ पाकिस्तान को छोड़ा पीछे

    भारत की परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी, SIPRI रिपोर्ट के अनुसार 190 हथियारों के साथ पाकिस्तान को छोड़ा पीछे

    नई दिल्ली । स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत ने परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में पाकिस्तान पर बढ़त बना ली है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जनवरी 2026 तक भारत के पास लगभग 190 परमाणु वारहेड्स मौजूद थे, जबकि पाकिस्तान का परमाणु भंडार करीब 170 वारहेड्स पर स्थिर रहा। यह आकलन दक्षिण एशिया के बदलते सामरिक परिदृश्य और दोनों देशों की रक्षा क्षमताओं को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले वर्ष की तुलना में अपने परमाणु भंडार में वृद्धि की है। वर्ष 2025 में भारत के पास लगभग 180 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया गया था, जो अब बढ़कर 190 तक पहुंच गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति और विकसित हो रही रक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप है।

    SIPRI ने अपनी रिपोर्ट में भारत की न्यूक्लियर ट्रायड क्षमता का विशेष उल्लेख किया है। न्यूक्लियर ट्रायड का अर्थ उन तीन माध्यमों से है जिनके जरिए परमाणु हथियारों का उपयोग किया जा सकता है। इसमें वायु आधारित प्लेटफॉर्म, जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें और परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत इस त्रिस्तरीय क्षमता को लगातार मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत नई मिसाइल प्रणालियों के लिए अतिरिक्त परमाणु वारहेड विकसित कर रहा है। साथ ही देश की रक्षा अनुसंधान गतिविधियां लंबी दूरी तक मार करने वाली प्रणालियों और उन्नत मिसाइल तकनीकों पर अधिक केंद्रित दिखाई दे रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रयासों का उद्देश्य क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना है।

    SIPRI ने यह भी संकेत दिया है कि भारत बहु-वारहेड क्षमता वाली मिसाइल तकनीकों की दिशा में प्रगति कर रहा है। इस तकनीक के तहत एक ही मिसाइल से कई अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसी क्षमताओं को आधुनिक सामरिक प्रतिरोधक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    दूसरी ओर रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने भी वर्ष 2025 के दौरान अपनी परमाणु डिलीवरी प्रणालियों के विकास पर काम जारी रखा। हालांकि उसके परमाणु हथियारों की अनुमानित संख्या में कोई विशेष बदलाव दर्ज नहीं किया गया। पाकिस्तान की भूमि और वायु आधारित परमाणु क्षमताएं पहले से स्थापित हैं, जबकि समुद्र आधारित क्षमता अभी विकास और परीक्षण की प्रक्रिया में बताई गई है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान भविष्य में अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर सकता है। इसके पीछे नई मिसाइल प्रणालियों का विकास और विखंडनीय सामग्री के बढ़ते भंडार को प्रमुख कारण माना गया है। हालांकि इस संबंध में सटीक आकलन करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है क्योंकि आधिकारिक सार्वजनिक आंकड़े सीमित उपलब्ध हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया में परमाणु संतुलन केवल हथियारों की संख्या का विषय नहीं है, बल्कि तकनीकी क्षमता, प्रतिरोधक रणनीति और कमांड-एंड-कंट्रोल ढांचे से भी जुड़ा हुआ है। SIPRI की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी सामरिक क्षमताओं को आधुनिक बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि हाल के वर्षों में क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण अधिक जटिल हुआ है। ऐसे में दोनों देशों द्वारा प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के प्रयास जारी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को समझने के लिए परमाणु रणनीति, तकनीकी विकास और क्षेत्रीय कूटनीति तीनों कारकों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होगा।

  • भारत-चीन रिश्तों पर पाकिस्तान के प्रभाव के सवाल पर चीन का जवाब, राजदूत बोले- सभी पड़ोसी हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण

    भारत-चीन रिश्तों पर पाकिस्तान के प्रभाव के सवाल पर चीन का जवाब, राजदूत बोले- सभी पड़ोसी हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण

    नई दिल्ली । भारत और चीन के संबंधों में हाल के समय में दिखाई दे रही सकारात्मक गतिविधियों के बीच भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देता है और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।

    एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भारत, चीन और पाकिस्तान के त्रिकोणीय संबंधों को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए चीनी राजदूत ने कहा कि चीन की विदेश नीति का आधार पड़ोसी देशों के साथ मित्रता, सहयोग और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया के देशों सहित सभी पड़ोसी राष्ट्र चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना बीजिंग की प्राथमिकताओं में शामिल है।

    राजदूत ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देश न केवल एक-दूसरे के पड़ोसी हैं बल्कि चीन के भी पड़ोसी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए संवाद का मार्ग सबसे उपयुक्त माना जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से अपने मतभेदों का समाधान खोजने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

    शू फेइहोंग ने कहा कि भौगोलिक वास्तविकताओं को बदला नहीं जा सकता और पड़ोसी देशों के बीच बेहतर संबंध पूरे क्षेत्र के विकास और समृद्धि में योगदान दे सकते हैं। उनके अनुसार, आपसी विश्वास और सहयोग न केवल संबंधित देशों के नागरिकों के लिए लाभकारी साबित होगा बल्कि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता को भी मजबूती देगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति और आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एशिया में बढ़ते आर्थिक महत्व और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच क्षेत्रीय सहयोग को लेकर विभिन्न देशों की सक्रियता बढ़ी है। चीन भी अपने पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर लगातार जोर देता रहा है।

    राजदूत ने भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर संपर्क बढ़ा है। उन्होंने आर्थिक और व्यापारिक सहयोग में आई वृद्धि को सकारात्मक संकेत बताया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार विस्तार कर रहा है और भविष्य में सहयोग की संभावनाएं और अधिक मजबूत हो सकती हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की दो बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के रूप में भारत और चीन के पास साझा विकास, निवेश, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार, आर्थिक साझेदारी का विस्तार दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है और क्षेत्रीय विकास को नई गति दे सकता है।

    राजनयिक हलकों में इस बयान को दक्षिण एशिया में संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने की चीन की सार्वजनिक नीति के अनुरूप माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में प्रमुख एशियाई देशों के बीच संवाद, व्यापारिक साझेदारी और विश्वास निर्माण की प्रक्रिया भविष्य की कूटनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

    भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे महत्वपूर्ण देशों के बीच संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहती है। ऐसे में संवाद, कूटनीति और सहयोग पर दिया गया जोर क्षेत्रीय शांति और दीर्घकालिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।

  • अवैध इमिग्रेशन और नशे की तस्करी रोकने के लिए साथ काम करेंगे रूस-पाकिस्तान, दोनों के बीच हुई बड़ी डील

    अवैध इमिग्रेशन और नशे की तस्करी रोकने के लिए साथ काम करेंगे रूस-पाकिस्तान, दोनों के बीच हुई बड़ी डील


    बिश्केक।
    किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) की राजधानी बिश्केक (Bishkek) में शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organization- SCO) के गृह और सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रियों की अहम बैठक के दौरान पाकिस्तान और रूस (Pakistan and Russia) के बीच एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के मुताबिक, दोनों देशों ने अवैध इमिग्रेशन और नशीले पदार्थों की तस्करी पर लगाम लगाने के लिए एक साथ मिलकर काम करने का फैसला किया है।

    पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी इस विशेष बैठक में हिस्सा लेने के लिए बिश्केक में मौजूद थे। इस दौरे पर उन्होंने रूस के अलावा कई अन्य सदस्य देशों के नेताओं से भी मुलाकात की, जिसमें अफगानिस्तान से पनप रहे ‘आतंकवाद’ का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया।


    रूस के साथ समझौते की अहम बातें

    पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के अनुसार, गृह मंत्री मोहसिन नकवी और उनके रूसी समकक्ष व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव के बीच जिन समझौतों पर मुहर लगी है, वे इस प्रकार हैं-
    – अवैध नागरिकों का डिपोर्टेशन: पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, दोनों देश एक-दूसरे के यहां अवैध रूप से रह रहे नागरिकों की पहचान करने और उनकी वतन वापसी सुनिश्चित करने में एक-दूसरे की मदद करेंगे।
    – घुसपैठ पर लगाम: अवैध इमिग्रेशन को रोकने के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाया जाएगा ताकि गैर-कानूनी तरीके से होने वाली आवाजाही को रोका जा सके।
    – ड्रग्स तस्करी पर एक्शन: नशीले पदार्थों की हेराफेरी को जड़ से खत्म करने के लिए भी दोनों पक्षों के बीच एक अलग और महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इसके तहत ड्रग सिंडिकेट्स के खिलाफ साझा कार्रवाई की जाएगी।

    SCO के मंच का फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी गृह मंत्री ने उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ भी अलग-अलग बैठकें कीं।
    – उज्बेकिस्तान: उज्बेक गृह मंत्री अजीज ताशपुलातो के साथ लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसियों (कानून लागू करने वाली संस्थाओं) के बीच सहयोग और जॉइंट ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करने पर चर्चा हुई। इसके लिए दोनों देशों के गृह मंत्रालयों के बीच एक ‘वर्किंग ग्रुप’ बनाने का भी फैसला लिया गया।
    – किर्गिस्तान: किर्गिस्तान के गृह मंत्री उलान नियाजबेकोव के साथ आपसी हितों वाले क्षेत्रों में सहयोग के विस्तार पर सहमति बनी। नकवी ने किर्गिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का गैर-स्थायी सदस्य चुने जाने पर बधाई दी और SCO बैठक के शानदार इंतजामों के लिए उनका शुक्रिया अदा किया।
    – कजाकिस्तान: कजाख समकक्ष यर्झान सादेनोव के साथ अवैध इमिग्रेशन को रोकने के लिए द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने और आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक वर्किंग ग्रुप बनाने पर रजामंदी हुई।


    अफगानिस्तान में रूस का ‘डबल गेम

    दूसरी तरफ रूस और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों ने क्षेत्रीय कूटनीति में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। कूटनीतिक मामलों की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रूस अब अफगानिस्तान को लेकर एक बेहद सधी हुई दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। मॉस्को और तालिबान के बीच तेजी से गहरे होते संबंध इस बात का साफ इशारा हैं कि अफगानिस्तान की विदेश नीति में बड़े बदलाव आ रहे हैं और इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को उठाना पड़ रहा है।


    रूस की दोहरी रणनीति क्या है?

    रिपोर्ट के मुताबिक, रूस अफगानिस्तान के मामले में एक साथ दो अलग-अलग मोर्चों पर काम कर रहा है। आतंकवाद पर सार्वजनिक रुख: रूस एक तरफ सार्वजनिक मंचों पर अफगानिस्तान से पनपने वाले आतंकवाद के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया के देशों में अपनी व्यापक सुरक्षा भूमिका और सैन्य दखल को सही ठहराना है।

    तालिबान के साथ सुरक्षा गठजोड़: वहीं दूसरी तरफ, रूस पर्दे के पीछे तालिबान के साथ अपने सुरक्षा संबंधों का लगातार विस्तार कर रहा है। मॉस्को का लक्ष्य तालिबान के साथ इस रणनीतिक गठजोड़ के जरिए मध्य एशिया में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए एक ठोस जमीनी हथियार तैयार करना है।


    पाकिस्तान के लिए सिकुड़ती जा रही है जमीन

    रूस और तालिबान के बीच इस नए समीकरण ने पाकिस्तान के रणनीतिक दांव-पेंच को बुरी तरह उलझा दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि पाकिस्तान के लिए अब अफगानिस्तान में पैंतरेबाजी की गुंजाइश लगातार खत्म होती जा रही है।

    रूस के साथ नए समझौते और संबंध स्थापित होने के बाद, अफगानिस्तान (काबुल) अब इस स्थिति का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ एक ‘लेवरेज’ या कूटनीतिक हथियार के तौर पर कर रहा है। पहले जो पाकिस्तान अफगानिस्तान के मामलों में एक ‘रिंगमास्टर’ की भूमिका में खुद को देखता था, अब रूस की सीधी एंट्री और तालिबान की स्वतंत्र विदेश नीति के कारण उसका प्रभाव तेजी से घट रहा है।

  • ‘असल दुनिया में सोचिए’, खामेनेई से मुलाकात की ट्रंप की इच्छा पर ईरान का तीखा जवाब

    ‘असल दुनिया में सोचिए’, खामेनेई से मुलाकात की ट्रंप की इच्छा पर ईरान का तीखा जवाब


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच बयानबाजी और सैन्य तनाव की स्थिति के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के हालिया बयान पर ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।

    गुरुवार को ट्रंप ने कहा था कि वह ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के साथ बैठक करने के लिए तैयार हैं, यदि इससे किसी समझौते का रास्ता निकलता है। उन्होंने यह भी कहा था कि खामेनेई उनके पसंदीदा व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन ऐसी मुलाकात होने पर वह इसे सम्मान की बात मानेंगे।

    इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ट्रंप पर सीधा तंज कसा। उन्होंने कहा कि सभी लोगों को “असली दुनिया में जीने और सोचने” की जरूरत है। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, अराघची ने कहा कि ट्रंप का यह बयान वास्तविकता से दूर है और मौजूदा परिस्थितियों को समझने की जरूरत है।

    ट्रंप की ओर से यह भी कहा गया था कि उन्होंने सीधे तौर पर बैठक का प्रस्ताव नहीं दिया, बल्कि कुछ व्हाइट हाउस अधिकारियों की ओर से इस तरह की बातचीत की संभावना पर चर्चा हुई थी।

    ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनावपूर्ण हालातों में हाल के समय में टकराव और बढ़ा है। दोनों पक्षों के बीच कई मोर्चों पर असहमति बनी हुई है और किसी ठोस समझौते की दिशा में अभी तक कोई निर्णायक प्रगति नहीं हुई है।

    इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। हालांकि ट्रंप ने दावा किया कि पहले जिन आशंकाओं में तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की बात कही जा रही थी, वे वास्तविकता में 96 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर बनी हुई हैं।

    ईरान की ओर से भी साफ किया गया है कि बातचीत की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है और दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर कायम हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए यह टकराव फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है।

  • पाकिस्तान में आटे का संकट! कीमत 100 किलो, रोटी के लिए हाहाकार?

    पाकिस्तान में आटे का संकट! कीमत 100 किलो, रोटी के लिए हाहाकार?

    इस्लामाबाद/कराची। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में गेहूं की कमी और बढ़ती महंगाई ने सरकार की खाद्य प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी खरीद लक्ष्य से काफी पीछे रहने के कारण खुले बाजार में गेहूं और आटे की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है, जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

    लक्ष्य का 8 प्रतिशत भी नहीं खरीद सकी सरकार

    सिंध सरकार ने इस वर्ष 10 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था, लेकिन 4 जून तक खाद्य विभाग केवल 79,835 मीट्रिक टन गेहूं ही खरीद पाया। यह कुल लक्ष्य का 8 प्रतिशत से भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य बाजार दर से कम होने के कारण किसानों ने सरकारी एजेंसियों को गेहूं बेचने के बजाय निजी व्यापारियों को प्राथमिकता दी।

    खुले बाजार में बढ़े दाम

    सरकारी खरीद कमजोर रहने और निजी कारोबारियों की सक्रियता के चलते गेहूं की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कराची में गेहूं का भाव 11,100 पाकिस्तानी रुपये प्रति 100 किलोग्राम तक पहुंच गया है, जबकि हैदराबाद में यह लगभग 10,900 रुपये प्रति 100 किलोग्राम बिक रहा है।

    गेहूं महंगा होने का असर आटे पर भी दिखाई दे रहा है। कई क्षेत्रों में आटा 135 से 140 पाकिस्तानी रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है, जो सरकार द्वारा निर्धारित 107 रुपये प्रति किलो की दर से काफी अधिक है। इसका सबसे ज्यादा असर निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है।

    मुख्यमंत्री ने बुलाई आपात बैठक

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिंध के मुख्यमंत्री सैयद मुराद अली शाह ने उच्च स्तरीय बैठक बुलाकर अधिकारियों को बाजार पर निगरानी बढ़ाने और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि गेहूं केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि प्रदेश की खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण संसाधन है।

    मुख्यमंत्री ने खाद्य विभाग और संबंधित एजेंसियों से नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा है, ताकि कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके।

    संकट से उबरने की चुनौती

    हालांकि सरकारी दावों और निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात में विशेष सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बाजार में जमाखोरी और आपूर्ति संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सिंध में खाद्य सुरक्षा संकट और गहरा सकता है।

    बढ़ती कीमतों और कमजोर सरकारी खरीद व्यवस्था ने पाकिस्तान में खाद्यान्न प्रबंधन को लेकर नई बहस छेड़ दी है, जबकि आम नागरिक महंगाई की मार झेलने को मजबूर हैं।

  • सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त संदेश, आतंकवाद बंद होने तक पाकिस्तान को नहीं मिलेगी कोई राहत

    सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त संदेश, आतंकवाद बंद होने तक पाकिस्तान को नहीं मिलेगी कोई राहत

    नई दिल्ली । सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर कूटनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। भारत ने पाकिस्तान के हालिया आरोपों और बयानों का कड़ा जवाब देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक सिंधु जल संधि स्थगित ही रहेगी। भारत ने दोहराया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर उसका रुख पूरी तरह स्पष्ट और अडिग है।

    विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग के दौरान भारत ने पाकिस्तान के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि भारत चिनाब नदी के जल प्रवाह से जुड़े ऐसे कदम उठा रहा है जो सिंधु जल संधि के प्रावधानों के खिलाफ हैं। भारत ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि पाकिस्तान तथ्यों से परे जाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहा है।

    हाल के दिनों में पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि भारत चिनाब नदी के जल को दूसरी दिशा में मोड़ने की संभावित योजनाओं पर काम कर रहा है, जिससे सिंधु जल संधि प्रभावित हो सकती है। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और द्विपक्षीय समझौतों के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि भारत ने इन दावों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि संधि के भविष्य को लेकर उसका निर्णय सुरक्षा परिस्थितियों और आतंकवाद से जुड़े व्यवहार पर निर्भर करेगा।

    भारत का कहना है कि सीमा पार से लगातार आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन मिलने के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास का माहौल कमजोर हुआ है। ऐसे में सामान्य द्विपक्षीय व्यवस्थाओं को पहले की तरह जारी रखना संभव नहीं है। सरकार का मानना है कि जब तक आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं दिखाई देती, तब तक किसी भी संवेदनशील समझौते पर आगे बढ़ना कठिन होगा।

    सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच जल संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण समझौता है। यह समझौता दशकों से दोनों देशों के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था का आधार रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में सुरक्षा संबंधी तनाव और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे ने इस समझौते को भी राजनीतिक और कूटनीतिक बहस का विषय बना दिया है।

    भारत ने यह भी संकेत दिया है कि राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा से जुड़े मामलों में वह किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। सरकार का मानना है कि आतंकवाद और सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। इसी वजह से संधि को लेकर उठाए गए कदमों को सुरक्षा परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इस बीच भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर भी सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। दोनों देशों के बीच हालिया वार्ताओं में आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने और व्यापारिक संबंधों को नई दिशा देने पर चर्चा हुई है। अधिकारियों का कहना है कि वार्ता रचनात्मक रही है और आने वाले समय में इस दिशा में और प्रगति देखने को मिल सकती है।

    फिलहाल सिंधु जल संधि को लेकर भारत का संदेश स्पष्ट है। सरकार ने संकेत दिया है कि जब तक आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस बदलाव नहीं दिखता, तब तक इस समझौते की बहाली की संभावना सीमित रहेगी। ऐसे में आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति पर इस मुद्दे का प्रभाव बना रह सकता है।

  • भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते

    भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते


    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बाद तुर्की एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखने वाले तुर्की ने साफ कहा है कि वह अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तुर्की का मानना है कि भारत को इस मुद्दे को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है और दोनों देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई सीमा विवाद या ऐतिहासिक दुश्मनी नहीं है, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेहतर होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

    फिदान ने कहा कि तुर्की के पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक और मित्रतापूर्ण संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के खिलाफ है। उनके अनुसार दुनिया के कई अन्य देशों के भी पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते हैं और किसी एक संबंध को लेकर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि कई देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे सहयोग के रास्ते तलाशते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तुर्की के रूस, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद संवाद और सहयोग जारी रहता है। उनका मानना है कि भारत और तुर्की को भी इसी तरह सकारात्मक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भारत में चिंता जताई जाती रही है। मीडिया रिपोर्टों में पहले यह दावा भी किया गया था कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को तकनीकी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। हालांकि इन दावों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुए सैन्य अभियान और उसके बाद दोनों देशों के बीच बढ़ी तनातनी को भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में तुर्की के बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर समय-समय पर रिश्तों में तनाव का कारण बनता रहा है।

  • विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस

    विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस


    नई दिल्ली। अमेरिका की सत्ता और नीति निर्धारण के केंद्र वाशिंगटन में पाकिस्तान की सक्रिय लॉबिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने अमेरिकी विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम यानी एफएआरए के सार्वजनिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर महीने औसतन नौ लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े आठ करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान कई कूटनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    एफएआरए के दस्तावेजों के अनुसार पाकिस्तान का वार्षिक लॉबिंग खर्च लगभग एक से 1.2 करोड़ डॉलर के बीच पहुंच चुका है। यह राशि अमेरिकी राजनीतिक गलियारों, सरकारी एजेंसियों और प्रभावशाली नीति निर्माताओं तक पहुंच बनाने के लिए खर्च की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश द्वारा लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लेना असामान्य नहीं है, लेकिन पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा खर्च उसकी मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए काफी बड़ा माना जा रहा है।

    रोबिंदर सचदेव के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारियों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए कई पेशेवर लॉबिंग फर्मों को अनुबंध पर रखा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी गृह विभाग से जुड़े स्तर पर संपर्क स्थापित करने के लिए एक फर्म को हर महीने 50 हजार डॉलर दिए जा रहे हैं। वहीं व्यापार और आर्थिक मामलों से संबंधित मुद्दों को संभालने वाली एक अन्य कंपनी को लगभग ढाई लाख डॉलर प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा उस अनुबंध को लेकर है जिसे हाल ही में बढ़ाया गया है। बताया गया है कि एक लॉबिंग फर्म को पहले 25 हजार डॉलर मासिक भुगतान किया जाता था, लेकिन अब उसके साथ लगभग 12 लाख डॉलर का बड़ा समझौता किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों को दर्शाता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से चलाया जा रहा यह अभियान उन दावों से अलग तस्वीर पेश करता है जो हाल के महीनों में पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से किए गए थे। विशेष रूप से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के उन बयानों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अमेरिकी मध्यस्थता से जुड़े दावे किए थे।

    एफएआरए दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह भी दावा किया गया है कि मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अपने संपर्क अभियान को तेज कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक 6 से 9 मई के बीच पाकिस्तानी प्रतिनिधियों और एजेंटों ने अमेरिकी संसद, पेंटागन और ट्रेजरी विभाग से जुड़े अधिकारियों के साथ दर्जनों आपातकालीन बैठकें की थीं। इन बैठकों का उद्देश्य पाकिस्तान के पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और अमेरिकी नीति निर्माताओं तक अपनी बात पहुंचाना बताया गया।

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लॉबिंग एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान के कथित खर्च और गतिविधियों को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक मंचों पर प्रभाव कायम रखने के लिए देश किस हद तक संसाधन झोंक रहे हैं। आने वाले समय में इन खुलासों पर पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय हलकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रहेगी।