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  • AI वीडियो शेयर कर ट्रंप फिर विवादों में, ओबामा दंपति को बंदर दिखाने पर मचा राजनीतिक तूफान

    AI वीडियो शेयर कर ट्रंप फिर विवादों में, ओबामा दंपति को बंदर दिखाने पर मचा राजनीतिक तूफान


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) एक बार फिर अपने सोशल मीडिया पोस्ट (Social Media post) को लेकर जबरदस्त विवाद में घिर गए हैं। इस बार मामला देश के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा (Former President Barack Obama.) और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा (Michelle Obama) से जुड़ा है। ट्रंप द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में ओबामा दंपति को बंदर के रूप में दिखाए जाने के बाद सियासी हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इस कथित नस्लभेदी कंटेंट को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप पर जमकर निशाना साधा है।

    दरअसल, गुरुवार रात ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कई पोस्ट साझा किए। इन्हीं में से एक 62 सेकंड का वीडियो क्लिप सबसे ज्यादा चर्चा में है। शुरुआती जांच में यह वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार किया गया प्रतीत होता है। वीडियो में 2020 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर यह दावा किया गया है कि कुछ अहम राज्यों में वोटिंग मशीनों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई थी।


    वीडियो में क्या दिखाया गया?

    इस क्लिप के एक हिस्से में दो चिम्पैंजी नजर आते हैं, जिन पर बराक ओबामा और मिशेल ओबामा के मुस्कुराते हुए चेहरे एडिट कर दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि यह दृश्य एक लंबे वीडियो से लिया गया है, जिसे पहले एक मीम पेज पर शेयर किया गया था। उसी वीडियो में डोनाल्ड ट्रंप को खुद को “जंगल का राजा” बताते हुए दिखाया गया है। इतना ही नहीं, वीडियो में मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन समेत कई अन्य डेमोक्रेटिक नेताओं को भी जानवरों के रूप में पेश किया गया है। बाइडेन को केले खाते हुए चिम्पैंजी के रूप में दर्शाया गया, जिससे डेमोक्रेटिक खेमे में नाराजगी और बढ़ गई।


    डेमोक्रेट्स का तीखा पलटवार

    देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा और उनकी पत्नी के खिलाफ इस तरह के चित्रण को लेकर डेमोक्रेटिक नेताओं ने इसे नस्लवादी और अपमानजनक करार दिया है। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप का यह कदम राजनीतिक मर्यादाओं को तोड़ने वाला है।

    कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूज़ोम ने इस पोस्ट की कड़ी निंदा करते हुए इसे “घिनौना” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “राष्ट्रपति का यह व्यवहार बेहद शर्मनाक है। हर एक रिपब्लिकन को इसकी निंदा करनी चाहिए। अभी।” वहीं, बराक ओबामा के पूर्व वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेन रोड्स ने भी ट्रंप पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि इतिहास डोनाल्ड ट्रंप को एक नकारात्मक और विभाजनकारी व्यक्ति के रूप में याद रखेगा।


    पहले भी रहे हैं विवाद

    गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब डोनाल्ड ट्रंप ओबामा परिवार को लेकर विवादों में आए हों। इससे पहले भी वह बराक ओबामा और मिशेल ओबामा पर व्यक्तिगत हमले कर चुके हैं और कई मौकों पर उनके बयानों को भड़काऊ और नस्लभेदी बताया गया है। फिलहाल इस वीडियो को लेकर अमेरिका की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। एक ओर ट्रंप समर्थक इसे राजनीतिक व्यंग्य बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विरोधी इसे खुले तौर पर नस्लभेदी मानसिकता का उदाहरण बता रहे हैं।

  • ट्रेड डील पर नया खुलासा…. डोभाल ने US से दो टूक कहा था- ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा भारत

    ट्रेड डील पर नया खुलासा…. डोभाल ने US से दो टूक कहा था- ट्रंप के दबाव में नहीं आएगा भारत


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच रिश्तों में फिर से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो गई है। दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर सहमति और भारत द्वारा टैरिफ में कमी करने की जानकारी दी। अब यह खुलासा हुआ है कि सितंबर में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Advisor of India-NSA) अजीत डोभाल (Ajit Doval) ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्क रुबियो को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहा था कि भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनके अधिकारियों के दबाव में नहीं आएगा।

    भारत और चीन के बीच एससीओ बैठक में पीएम मोदी की मुलाकात के बाद अजीत डोभाल ने अमेरिका यात्रा की थी। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, डोभाल ने इस बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री को एक अहम संदेश दिया – भारत अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव को पीछे छोड़ते हुए फिर से व्यापारिक बातचीत शुरू करना चाहता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अमेरिकी दबाव के सामने नहीं झुकेगा और ट्रंप के कार्यकाल के अंत तक इंतजार करने को तैयार है, जैसा कि भारत ने पहले भी अमेरिकी विरोधी सरकारों का सामना किया था।

    डोभाल ने बैठक में यह भी कहा कि भारत चाहता है कि ट्रंप और उनके सलाहकार भारत की सार्वजनिक आलोचना कम करें, ताकि दोनों देशों के रिश्ते और भी मजबूत हो सकें।


    तनाव घटने के संकेत

    इस बैठक के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच तनाव में कमी के संकेत मिलना शुरू हो गए। 16 सितंबर को, ट्रंप ने मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनकी सराहना की। इसके बाद, दोनों नेताओं ने फोन पर चार बार बातचीत की और व्यापारिक सौदे को लेकर सहमति बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए।

    ट्रंप ने घोषणा की कि दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौता हुआ है, जिसके तहत भारत के सामानों पर टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा, जो एशिया के अधिकांश देशों से कम है। इसके अलावा, रूसी तेल खरीदने पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ को भी हटा दिया गया है। बदले में, भारत ने 500 बिलियन डॉलर का अमेरिकी सामान खरीदने, वेनेजुएला का तेल न खरीदने और अमेरिकी आयात पर टैरिफ को शून्य करने पर सहमति जताई है।

  • रूस का ट्रंप को जवाब…. भारत को तेल खरीदने की पूरी स्वतंत्रता, कोई नई बात नहीं

    रूस का ट्रंप को जवाब…. भारत को तेल खरीदने की पूरी स्वतंत्रता, कोई नई बात नहीं


    मास्को।
    भारत और अमेरिका (India and America) के बीच नए व्यापार समझौते (New trade Agreements.) के बाद एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा या नहीं? हालांकि, इस मुद्दे पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन रूस (Russia) ने अब इस पर स्पष्ट जवाब दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने हाल ही में दावा किया था कि भारत अब रूसी तेल की खरीद रोक देगा, लेकिन रूस ने इस पर प्रतिकार करते हुए कहा है कि भारत पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह किस देश से तेल खरीदे।

    रूस के राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि भारत कोई एकमात्र देश नहीं है जो रूस से तेल खरीदता है। भारत हमेशा से विभिन्न देशों से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करता रहा है, और इसमें कोई नई बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रूस और अन्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञ जानते हैं कि भारत रूस का एकमात्र तेल आपूर्तिकर्ता नहीं है। यह बयान ट्रंप के उस दावे पर आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी ने रूस से तेल खरीद बंद करने और अमेरिका से तेल खरीदने पर सहमति जताई है। पेस्कोव ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि रूस को इस मामले में नई दिल्ली से कोई जानकारी नहीं मिली है, और रूस अपने भारत के साथ संबंधों को बहुत महत्व देता है।

    ट्रंप का दावा और भारत का रुख
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को घोषणा की थी कि भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते में भारत के लिए टैरिफ में कमी शामिल है, और इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि भारत अब रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। हालांकि, इस पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है, और न ही प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट में रूस से तेल खरीदने पर कोई उल्लेख किया गया है। रूसी तेल आयात को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के बयान में कोई प्रतिबद्धता या समझौता नहीं था, जबकि ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद यह तय हुआ कि भारत अमेरिकी तेल का आयात बढ़ाएगा और रूस से तेल खरीदने की मात्रा घटाएगा।

    भारत और रूस के ऊर्जा संबंध
    रूस के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत रूस से प्रतिदिन 15 लाख से 20 लाख बैरल तेल आयात करता है, जो अमेरिका से प्राप्त शेल तेल के मुकाबले कहीं ज्यादा है। शेल तेल हल्के ग्रेड का होता है, जबकि रूस का यूराल तेल भारी और सल्फर युक्त होता है। इस वजह से भारत को अमेरिकी कच्चे तेल को अन्य ग्रेड के तेल के साथ मिलाना होगा, जिससे अतिरिक्त लागत आएगी। इसलिए, रूस का कहना है कि ट्रंप का दावा एक तरह से दिखावा हो सकता है, क्योंकि अमेरिकी तेल रूस के तेल का सीधे विकल्प नहीं बन सकता। यह स्थिति दिखाती है कि भारत और रूस के बीच तेल संबंधों में कोई तत्काल बदलाव होने की संभावना नहीं है, और भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विभिन्न स्रोतों से आपूर्ति पर निर्भर रहेगा।

  • उल्टे निकल रहे ट्रंप की विदेश नीति के नतीजे… EU-India ने कर ली डील, चीन से हाथ मिला रहे कनाडा-बिट्रेन

    उल्टे निकल रहे ट्रंप की विदेश नीति के नतीजे… EU-India ने कर ली डील, चीन से हाथ मिला रहे कनाडा-बिट्रेन


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) अपनी विदेश नीति से जो भी हासिल करने निकले हों, नतीजा उल्टा निकलता दिख रहा है। ईयू-भारत ने डील (EU-India deal) कर ली। हाल तक एक-दूसरे के लिए आक्रामक रहे कनाडा और चीन हाथ मिला रहे हैं और करीब आठ साल बाद कोई ब्रिटिश पीएम (British PM) चीन पहुंच रहे हैं। कभी अमेरिकी खेमे का अनिवार्य अंग रहे पश्चिमी देश अपने हितों की तलाश में एशिया का रुख कर रहे हैं। इस शृंखला में ताजा नाम है, ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर। चीन के साथ राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का मकसद लिए स्टार्मर 28 जनवरी को बीजिंग पहुंचे हैं।


    ट्रंप चाहते कुछ हैं, हो कुछ और रहा है?

    इसके पीछे सबसे बड़ी वजह माने जा रहे हैं ट्रंप। अमेरिकी राष्ट्रपति का मनमाना और एकतरफा रवैया इतना नियमित हो गया है कि पश्चिमी सहयोगियों के लिए हैरान होने की भी सहूलियत नहीं बची है। विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिमी गठबंधन की हालत डांवाडोल है और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी वक्त गंवाए बिना अपने लिए बैकअप खोज रहे हैं। मसलन, करीब दो दशक से भारत और ईयू में व्यापारिक समझौते पर सहमति नहीं बन पाई थी। अब ट्रंप फैक्टर ने बातचीत को इतनी रफ्तार दे दी कि डील हो गई।

    ब्रिटेन और अमेरिका सबसे करीबी दोस्त रहे हैं। ब्रिटेन अब भी अमेरिका को अपना सबसे प्राथमिक सहयोगी मानता है। पहले यह भावना साझा थी, लेकिन ट्रंप के आने के बाद खासतौर पर ट्रंप 2.0 में ब्रिटेन अब इस दोस्ती पर आश्वस्त रहने की हालत में नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में किएर स्टार्मर बतौर प्रधानमंत्री पहली बार चीन पहुंचे हैं। बल्कि, आठ साल बाद यह पहली बार है जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चीन गए हैं। पिछली बार मई 2018 में थिरेसा मे चीन गई थीं।

    अपनी यात्रा का आशय स्पष्ट करते हुए स्टार्मर ने कहा कि चीन जिस तरह के आर्थिक मौके दे रहा है, उसकी अनदेखी कर पाना ब्रिटेन के लिए मुमकिन नहीं होगा। बीजिंग जाते हुए अपने विमान में पत्रकारों से बात करते हुए स्टार्मर ने शुतुरमुर्ग के रेत में सिर घुसाने वाली कहावत दोहराते हुए कहा कि चीन से “बातचीत करना हमारे हित में है। यह ट्रिप हमारे लिए वाकई अहम होने वाली है और हम असल में आगे बढ़ेंगे।” चीन में स्टार्मर की मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से होनी है। इसके बाद 30 जनवरी को वह स्थानीय कारोबारियों से बातचीत के लिए शंघाई जाएंगे। स्टार्मर अपने साथ 50 से ज्यादा कारोबारियों का प्रतिनिधिमंडल ले गए हैं।


    स्वाभाविक सहयोगी नहीं रहे हैं चीन और ब्रिटेन?

    औपनिवेशिक अतीत और सम-सामयिक रिश्तों का भार चीन और ब्रिटेन के रिश्तों का स्वभाव तय करता आया है। इसमें हांगकांग भी एक कारक है, जो कभी ब्रिटेन के नियंत्रण में था। यहां राजनीतिक आजादी का दमन और मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति, दोनों देशों के बीच रुखेपन की वजह रही। उसपर यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस के लिए चीन के समर्थन ने दोनों के हितों को विरोधाभासी बनाया।

    5जी नेटवर्क देने वाली चीनी कंपनियों पर गहरा अविश्वास, ब्रिटेन की सुरक्षा चिंताओं का एक हिस्सा है। वह चीन को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम मानता है। ब्रिटिश खुफिया सेवाओं का आरोप है कि चीन उनके अधिकारियों और नेताओं की जासूसी करवाता है, ब्रिटेन के सार्वजनिक जीवन में दखल देने और आलोचकों-विरोधियों को डराने की कोशिश करता है। इस तरह के मुद्दे और आरोप-प्रत्योरोप सालों से दोनों देशों के संबंध को दिशा देते आए हैं।

    ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई5 के प्रमुख केन मैककैलम ने चेताया था कि ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “चीन के स्टेट ऐक्टर्स” जोखिम हैं। ऐसे में स्टार्मर की यात्रा चीन और ब्रिटेन के आपसी रिश्तों में गर्माहट लाने का एक अहम बिंदु बन सकती है। हालांकि, स्टार्मर कह चुके हैं कि चीन की तरफ से मिलने वाले आर्थिक मौकों को लेने के लिए वह “राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता” नहीं करेंगे।


    स्टार्मर की चीन यात्रा पर हावी है ट्रंप फैक्टर?

    ट्रंप का रुख और यूरोपीय देशों के प्रति बहुत हद तक उनका अपमानजनक रवैया, स्टार्मर की चीन यात्रा का प्रमुख बैकड्रॉप मानी जा रही है। स्टार्मर की छवि ऐसे नेता की रही है जो गहरे तनाव के बीच भी अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखने को अपना कंपास बनाकर चलते हैं। कई झटकों और सार्वजनिक फब्तियों के बावजूद वह ट्रंप पर बहुत नापतौल कर बोलते आए हैं। मगर बीते दिनों तीन ऐसे प्रकरण हुए, जहां स्टार्मर का रवैया और बयान अपेक्षाकृत सख्त रहा।

    पहला प्रकरण ग्रीनलैंड से जुड़ा है, जब ट्रंप ने वहां सैन्य अभ्यास के लिए अपने सैनिक भेजने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी। फिर, ट्रंप ने चागोस द्वीपसमूह मॉरीशस की संप्रभुता मॉरीशस को लौटाने के लिए ब्रिटेन की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की। इसके अलावा, अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों के योगदान पर ट्रंप की टिप्पणी ने भी काफी असहज स्थिति पैदा की।

    कई लीडर मुखरता से कह रहे हैं कि अमेरिका की बदली प्राथमिकताओं के मद्देनजर अब यूरोपीय ब्लॉक के लिए दूसरी जगहों पर अपने हित तलाशना अनिवार्य सा हो गया है। हाल ही में दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में भी यह बात कई बार सुनाई दी। यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने पत्रकारों से कहा, “हम जानते हैं हमें एक आजाद यूरोप की तरह काम करना होगा।”

    पॉलिटिको के लिए एक लेख में17 विशेषज्ञों ने बताया कि किस तरह दुनिया अमेरिका से दूर होते हुए नए अवसर खोज रही है। इसी आर्टिकल में ‘कार्निगी एनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के सीनियर फेलो स्टीवर्ट पैट्रिक लिखते हैं, “हम कभी जिस वैश्विक व्यवस्था को जानते थे, वो मर चुकी है। ट्रंप प्रशासन इसका हत्यारा भी है और वह भी, जिसपर इसके अंतिम संस्कार का दायित्व है। पुराने सहयोगी भी अब इस सच्चाई के साथ तारतम्य बिठाने लगे कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक शिकारी सुप्रीम लीडर बन गया है।”

    पैट्रिक ने लिखा कि किस तरह ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों ने अपने कूटनीतिक पोर्टफोलियो में विवधता लाना शुरू कर दिया था। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का दूसरा साल शुरू होते-होते ये कोशिशें सबसे ऊपर के गीयर में पहुंच गई हैं। इस एहसास के साथ ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश आर्थिक और सुरक्षा समीकरणों में विविधता लाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल वे ट्रंप को सीधे से नाराज नहीं करने का प्रयास भी कर रहे हैं। हालांकि, ट्रंप की राजनीतिक शैली के हिसाब से यह आसान नहीं होगा।

    जैसा कि पूर्व विदेश सचिव जेरमी हंट ने बीबीसी से बातचीत में ध्यान दिलाया कि प्रधानमंत्री के आगे वाकई एक कूटनीतिक मुश्किल है, “चीन के साथ ज्यादा व्यापार से बेशक कुछ फायदे होंगे, लेकिन इसमें बहुत बड़ा जोखिम भी है।” स्टार्मर भी लगातार कहते रहे हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच सहयोग का इतिहास कितना समृद्ध और पुराना है। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर जब ट्रंप ने टैरिफ का एलान किया, तो अपना विरोध जताते हुए भी स्टार्मर ने ब्रिटेन और अमेरिका के गहरे रिश्तों की याद दिलाई। चीन जाते हुए भी उन्होंने यह दोहराया, “संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हमारा जो रिश्ता है, वह हमारे सबसे करीबी संबंधों में से एक है। रक्षा में, सुरक्षा में, खुफिया सेवाओं और व्यापार समेत बहुत से क्षेत्रों में है।”


    चीन को लेकर स्टार्मर पर घरेलू दबाव भी है

    चीन जाने की अहमियत को रेखांकित करते हुए पीएम ने कहा कि ब्रिटेन में आर्थिक विकास को गति देने और जीवनस्तर सुधारने की उनकी योजनाओं को पूरा करने में यह मददगार होगा। हालांकि, स्टार्मर की इस रणनीति की घर और बाहर, खासकर अमेरिका में आलोचना भी हो रही है। चीन और ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था का आधारभूत अंतर भी संदेह की एक बड़ी वजह है। बीजिंग के प्रति कायम अविश्वास के मद्देनजर आशंका जताई जा रही है कि स्टार्मर चीन की ओर से मिल रहे सुरक्षा जोखिमों को कम करके आंक रहे हैं।

    विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बाडेनॉख ने कहा, “बात जब चीन की हो, तो किएर स्टार्मर बहुत ज्यादा कमजोर हैं।” हां, हमें चीन के साथ रिश्ता चाहिए। लेकिन, चीन लोकतंत्र में यकीन नहीं करना। उसने हमारे सांसदों पर प्रतिबंध लगाया, वह वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था में व्यवधान डालता है और ताइवान पर उसकी योजनाएं हैं।

    स्टार्मर पर जिनपिंग के साथ वार्ता में कुछ खास मुद्दों को उठाने का दबाव है। इनमें तीन मुद्दे अहम हैं। एक, लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जिमी लाई की कैद। जिमी ब्रिटिश नागरिक हैं और जिस तरह उनपर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई, उसपर गंभीर सवाल हैं। ब्रिटेन में एक वर्ग स्टार्मर से अपेक्षा करता है कि वह मजबूती से जिमी लाई को रिहा करने की मांग करें। इसके अलावा, वह चीनी नेतृत्व से यूक्रेन युद्ध पर दो-टूक बात करें और बेलाग कहें कि वे रूस पर लड़ाई खत्म करने का दबाव बनाएं। तीसरा विषय, उइगर अल्पसंख्यकों का भी मुद्दा उठाएं।

    स्टार्मर ये मसले उठाएंगे या नहीं, इसका उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया है। बल्कि चीन रवाना होने से पहले जब उनसे इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। चीनी लीडरों के साथ वह किन मुद्दों पर बात करेंगे, इस विषय में भी बात करने से वह हिचकते दिखे। उन्होंने कहा, “अतीत में, मैंने जितनी भी यात्राएं की हैं, उनमें मैंने हमेशा उन मुद्दों को उठाया है जिन्हें उठाए जाने की जरूरत है। लेकिन मैं समय से पहले ही इन ब्योरों पर बात नहीं करना चाहता।”

  • ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते

    ट्रम्प का कनाडा पर तीखा हमला: बोले-चीन एक साल में निगल जाएगा, गोल्डन डोम विरोध से बिगड़े रिश्ते


    नई दिल्ली।ट्रम्प का बयान कनाडा अमेरिका की बजाय चीन की ओर झुक रहा है। ट्रम्प ने कहा कि यह उत्तर अमेरिका की सामूहिक सुरक्षा के लिए खतरा है।

    व्यापार विवाद

    कनाडा-चीन व्यापार समझौते में चीनी ईवी पर टैरिफ 100% से घटाकर 6.1% किया गया।

    चीन ने कनाडा के कृषि उत्पादों पर जवाबी शुल्क कम करने पर सहमति दी।

    अमेरिका इसे अपने हितों के खिलाफ मान रहा है।

    गोल्डन डोम प्रोजेक्ट पर मतभेद

    अमेरिका का मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट 175 अरब डॉलर इजराइल के आयरन डोम पर आधारित है।

    ट्रम्प इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए अहम मानते हैं, जबकि कार्नी इसे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ाने वाला कदम बताते हैं।

    दावोस फोरम में तल्खी

    वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कार्नी ने बड़ी शक्तियों के दबदबे की आलोचना की।

    ट्रम्प ने इसे अमेरिका के प्रति कृतज्ञता की कमी बताया।

    पूर्व विवाद और संभावित भविष्य

    ग्रीनलैंड और नाटो मुद्दों पर दोनों नेताओं के पहले भी मतभेद रहे।

    विशेषज्ञों के अनुसार, चीन, रक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन के मुद्दों से अमेरिका-कनाडा संबंध और जटिल हो सकते हैं।

  • ट्रंप के दावे को लेकर कांग्रेस का PM मोदी पर तंज, कहा-70 बार मजाक उडा… फिर भी चुप्पी

    ट्रंप के दावे को लेकर कांग्रेस का PM मोदी पर तंज, कहा-70 बार मजाक उडा… फिर भी चुप्पी


    नई दिल्ली।
    भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) के बीच पिछले साल हुए तनाव को खत्म करने का श्रेय एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने लिया है। ट्रंप के इस ताजा दावे के बाद कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) पर हमला तेज कर दिया है। कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि ट्रंप अब तक 70 बार इस तरह का दावा कर चुके हैं, लेकिन भारत सरकार की ओर से इस पर कोई कड़ा रुख नहीं दिख रहा। वाइट हाउस में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष की उपलब्धियां गिनाते हुए ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने दुनिया की 8 अंतहीन लड़ाइयां रुकवाई हैं।

    भारत-पाक के संदर्भ में उन्होंने कहा, “पाकिस्तान और भारत एक-दूसरे पर हमला कर रहे थे। आठ विमान मार गिराए गए थे। मेरी राय में दोनों देश परमाणु युद्ध की ओर बढ़ रहे थे। अगर मैं हस्तक्षेप नहीं करता, तो करोड़ों लोग मारे जाते।” ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने 10 महीनों में कंबोडिया-थाईलैंड, कोसोवो-सर्बिया और इजरायल-ईरान जैसे आठ बड़े संघर्षों को शांत कराया है।


    जयराम रमेश का तीखा हमला

    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप की दोस्ती पर निशाना साधा। उन्होंने लिखा, “कल से पहले यह संख्या 68 थी। लेकिन कल ही यह आंकड़ा 69 नहीं, बल्कि सीधे 70 पर पहुंच गया। एक बार व्हाइट हाउस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के अपने शुरुआती बयान में और बाद में सवाल-जवाब के दौरान। यही वह संख्या है, जितनी बार प्रधानमंत्री के ‘अच्छे दोस्त’ और जिन्हें कई बार पीएम की जबरन झप्पी मिल चुकी है- ने यह दावा किया है कि 10 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के अचानक और अप्रत्याशित रूप से रुकने के लिए वही जिम्मेदार थे।”

    नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत
    ट्रंप ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी मलाल जताया कि इन युद्धों को रुकवाने के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए था। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकने से कम से कम 1.5 से 2 करोड़ लोगों की जान बची है, जो उनके लिए नोबेल से बड़ी बात है।

    गौरतलब है कि भारत सरकार हमेशा से यह कहती रही है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी मुद्दे पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, 10 मई 2025 को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की थी कि वाशिंगटन की मध्यस्थता के बाद दोनों देश पूर्ण युद्धविराम पर सहमत हुए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि ट्रंप के बार-बार इस तरह के दावे करना भारतीय संप्रभुता और प्रधानमंत्री के दावों पर सवाल खड़ा करता है।

  • कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने ड्रैगन की धरती से ट्रंप को दिखाई आंखें

    कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने ड्रैगन की धरती से ट्रंप को दिखाई आंखें

    वाशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप की लगातार धमकियों के बीच यूरोपीय देशों के अलावा अब अमेरिका के पड़ोसी देश कनाडा ने भी आंखें दिखानी शुरू कर दी है। चीन की यात्रा पर पहुंचे कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान साफ किया कि ओटावा किसी भी सूरत में ट्रंप के ग्रीनलैंड प्लान का समर्थन नहीं करता है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर कनाडा और चीन के बीच चर्चा हुई है। इस पर दोनों देशों के विचार एक जैसे हैं।

    बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के संबोधित करते हुए कार्नी ने अपने नाटो सहयोगी देश डेनमार्क को अपने पूर्ण समर्थन का ऐलान किया। इसके साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि नाटो का सामूहिक रक्षा सिद्धांत किसी अपरिवर्तनीय है। उन्होंने कहा, “हम डेनमार्क के साथ नाटो के साझेदार हैं।

    हमारी पूर्ण साझेदारी कायम है। अनुच्छेद 5 और अनुच्छेद 2 के तहत हमारे दायित्व कायम हैं और हम उनका पूरी तरह से समर्थन करते हैं।”

    कार्नी ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ग्रीनलैंड के भविष्य पर चर्चा की थी और कहा कि संप्रभुता के मुद्दे पर उनके विचार काफी हद तक एक जैसे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने ग्रीनलैंड की स्थिति और डेनमार्क के लोगों की संप्रभुता के बारे में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात की है। कनाडा और चीन के विचार इस मामले पर काफी हद तक एक समान हैं।” कनाडा के रुख को दोहराते हुए, कार्नी ने कहा कि डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को बाहरी दबाव के बिना अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार होना चाहिए।

    आपको बता दें, कनाडा के प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने खुले आम अन्य देशों को धमकाते हुए कहा था कि अगर कोई देश उनके ग्रीनलैंड समझौते के खिलाफ जाता है, या उसका समर्थन नहीं करता है, तो उसके ऊपर वह टैरिफ लगा सकते हैं।

    दरअसल, ट्रंप बार-बार अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देते हुए ग्रीन लैंड को अमेरिकी प्रभुत्व में लाने की वकालत कर रहे हैं। इस मामले में उन्होंने सैन्य शक्ति के प्रयोग का विकल्प भी खुला रखा है। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और अब डेनमार्क की जमीन पर अमेरिका की नजर से यूरोपीय देश पिसते नजर आ रहे हैं।
    ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता है अमेरिका: रुबियो

    ट्रंप के अलावा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी खुले तौर पर ग्रीनलैंड को लेकर कहा कि अमेरिका इस क्षेत्र को खरीदना चाहता है। हालांकि उनके इस प्रस्ताव को ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों प्रशासनों ने सिरे से खारिज कर दिया था। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि किसी भी अमेरिकी अधिग्रहण से नाटो का अंत हो जाएगा।

    ट्रम्प ने यह भी दावा किया है कि अमेरिकी नियंत्रण के बिना ग्रीनलैंड रूस या चीन के प्रभाव में आ सकता है, जिसे आर्कटिक विशेषज्ञों ने निराधार बताया है। हालांकि चीन खुद को “निकट-आर्कटिक राज्य” कहता है, विश्लेषकों का कहना है कि इस क्षेत्र में बीजिंग की बढ़ती उपस्थिति में कनाडा के पास और अलास्का के आसपास रूस के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास शामिल हैं।

    रूस और अमेरिका के बीच पिसते यूरोपीय देश

    दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की गोदी में बैठे यूरोपीय देशों ने अब रूस के साथ सीधी बातचीत का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। कनाडा के पहले इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और जर्मनी के चांसलर फैड्रिक मर्त्ज ने भी रूस के साथ बातचीत करने के प्रस्ताव पर विचार करने की बात कही है।
    कनाडा और ट्रंप का विवाद

    अमेरिका और कनाडा दोनों ही देश एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध साझा करते हैं। हालांकि, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान कई बार उन्होंने ऐसी बात कही है, जो कनाडाई लीडरशिप के लिए असहज करने वाली स्थिति की वजह बनी है। पूर्व कनाडाई प्रधानमंत्री को ट्रंप बार-बार गवर्नर कहकर संबोधित करते रहे हैं। उनका तात्पर्य कनाडा को भी अमेरिका में 51वें राज्य को रूप में समाहित करने से था।

  • अमेरिका सांसदों ने ट्रंप से किया आग्रह… बोले- भारत से टैरिफ कम करवाने के लिए करें बात

    अमेरिका सांसदों ने ट्रंप से किया आग्रह… बोले- भारत से टैरिफ कम करवाने के लिए करें बात


    नई दिल्ली।
    पूरी दुनिया के देश जहां ट्रंप (Trump) से टैरिफ (Tariffs) कम करने की अपील कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के सांसद (American MP) अपने राष्ट्रपति से आग्रह करते नजर आ रहे हैं कि वह भारत से बात करके टैरिफ कम करवाने की कोशिश करें। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के दो सांसद स्टीव डेंस (मोंटाना) और क्रेविन क्रेमर (नॉर्थ डकोटा) ने पत्र लिखकर आग्रह किया है कि वह होने वाले समझौते में भारत को दलहन के ऊपर से टैरिफ कम करने का आग्रह करें।

    अमेरिकी राष्ट्रपति (American President Donald Trump) को लिखे अपने पत्र में सांसदों ने बताया कि उनके क्षेत्र मोंटाना और नॉर्थ डकोटा दलहन उत्पान में अग्रणी है। इन क्षेत्रों के दलहन उत्पादन का सबसे बड़ा उपभोक्ता भारत ही है। दलहन के क्षेत्र में भारत की कुल खपत वैश्विक खपत की 27 फीसदी है। लगातार चलते टैरिफ वॉर के बीच सांसदों ने कहा कि भारत ने अमेरिका से आने वाली पीली मटर पर 30 प्रतिशत टैरिफ की घोषणा की है। यह नवंबर 2025 से प्रभावी हो गया है। ऐसे में भारतीय बाजार में अमेरिकी निर्यातकों को नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

    सांसदों ने ट्रंप से आग्रह किया कि वह इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से बात करें और टैरिफ को कम करने के लिए मनाएं। अगर भारत ऐसा करने के लिए तैयार हो जाता है, तो इससे अमेरिकी निर्यातकों को फायदा होगा और एक हद तक भारत के उपभोक्ताओं को भी इसका लाभ मिलेगा। आपको बता दें,अमेरिकी सांसदों द्वारा ट्रंप को लिखा गया यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका ने भारतीय आयात पर 50 फीसदी टैरिफ लागू किया हुआ है। इस 50 फीसदी में से 25 फीसदी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीद के लिए दंड के रूप में लगाया है।


    भारत ने अमेरिकी दलहनों पर क्यों लगाया 30 फीसदी टैरिफ?

    भारत सरकार के राजस्व विभाग ने पीली मटर के आयात के ऊपर 30 प्रतिशत शुल्क की घोषणा पिछली साल अक्तूबर में कर दी थी। विभाग की तरफ से जारी आदेश में कहा गया था कि इस 30 फीसदी टैरिफ में से 10 प्रतिशत मानक दर और 20 फीसदी कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर के रूप में था। नवंबर से जारी हुआ यह आदेश मार्च 2026 तक जारी रहने वाला है। इस आदेश से पहले भारत में पीली मटर के आयात पर कोई शुल्क नहीं था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार की तरफ से उठाया गया यह कदम सस्ते आयात की वजह से घरेलू दालों की गिरती कीमत की वजह था।


    अमेरिकी सांसदों ने किया भारत के कदम का विरोध

    नॉर्थ डकोटा और मोंटाना के सांसदों ने भारत के इस कदम का विरोध किया। उन्होंने कहा कि भारत में पीली मटर के निर्यात को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए 2020 में प्रधानमंत्री मोदी को उन्होंने स्वयं यह पत्र दिया था। लेकिन इसका ज्यादा कोई फायदा नहीं हुआ। भारत ने फिर से वही कदम उठाया है।

  • वेनेजुएला के बाद अब ट्रंप की क्यूबा को धमकी, कहा-समझौता कर ले नहीं तो परिणआम भुगतने तैयार

    वेनेजुएला के बाद अब ट्रंप की क्यूबा को धमकी, कहा-समझौता कर ले नहीं तो परिणआम भुगतने तैयार

    वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के करीबी सहयोगी क्यूबा को रविवार को एक और चेतावनी जारी की। वेनेजुएला में अमेरिका के हवाई हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अपदस्थ किए जाने के बाद क्यूबा में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन भड़कने की आशंका है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि या तो क्यूबा अमेरिका के साथ समझौता कर ले नहीं तो उसे परिणआम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा, क्यूबा समय रहते फैसला कर ले, कहीं ऐसा ना हो कि देर हो जाए।

    वेनेजुएला के तेल का प्रमुख खरीदार रहा क्यूबा अब इसकी खेप से वंचित हो गया है, क्योंकि अमेरिकी सेना वेनेजुएला के तेल उत्पादों के उत्पादन, शोधन और वैश्विक वितरण को नियंत्रित करने के प्रयासों के तहत टैंकर को जब्त करना जारी रखे हुए है। ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, ‘क्यूबा लंबे समय से वेनेजुएला के तेल और धन का इस्तेमाल कर रहा था और बदले में उसे सुरक्षा प्रदान कर रहा था, लेकिन अब और नहीं! क्यूबा को अब न तो तेल मिलेगा और न ही धन।’

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने लिखा, ‘मैं उन्हें कड़ी सलाह देता हूं कि वे बहुत देर होने से पहले समझौता कर लें।’ हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि वह किस तरह के समझौते की बात कर रहे हैं। क्यूबा सरकार ने कहा है कि पिछले वीकेंड मादुरो को पकड़ने के लिए चलाए गए अमेरिकी अभियान में उसके 32 सैन्यकर्मी मारे गए। क्यूबा की दो मुख्य सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े ये कर्मी क्यूबा और वेनेजुएला के बीच हुए समझौते के तहत वेनेजुएला की राजधानी काराकास में तैनात थे।

    ट्रंप ने कहा, ‘वेनेजुएला को अब उन गुंडों और जबरन वसूली करने वालों से सुरक्षा की जरूरत नहीं है, जिन्होंने उन्हें इतने वर्षों तक बंधक बनाकर रखा था। अब वेनेजुएला के पास अमेरिका है, जो (निस्संदेह!) दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है। हम उनकी रक्षा जरूर करेंगे।’
    वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद कैसे बदले समीकरण

    क्यूबा की अर्थव्यवस्था वेनेजुएला पर निर्भर है। वेनेजुएला से ही क्यूबा को पैसा और ईंधन मिलता है। बदले में क्यूब वेनेजुएला को मेडिकल फैसिलिटी और एक्सपर्ट देता है। ट्रंप दबाव डाल रहे हैं कि वेनेजुएला अमेरिका को तेल सप्लाई करे और ऐसे में क्यूबा बदहाल हो जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप की नजर अब क्यूबा पर भी है।
    क्यूबा पर कई बार कब्जे की कोशिश कर चुका है अमेरिका

    पहली बार नहीं जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर क्यूबा पर है.। क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रों और अमेरिका की दुश्मनी काफी लंबी चली। क्यूबा के ही खुफिया विभाग ने कहा था कि अमेरिका ने सैकड़ों बार क्यूबा की सरकार गिराने और कब्जा करने का प्रयास किया। कई बार फिदेल कास्त्रो को मारने का प्लान भी बनाया गया।

    अमेरिका ने क्यूबा से निर्वासित लोगों की फौज तैयार कर दी थी और ऑपरेशन चलाया था लेकिन यह ऑपरेशन तीन दिन में ही फेल हो गया।
    1961-62 का ऑपरेशन मॉन्गूज

    राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के कार्यकाल में क्यूबा में ऑपरेशन मॉन्गूज चलाया गया था। वहीं फिदेल कास्त्रो को मारने के लिए कई तरह के प्लान बनाए गए। इसमें उनकी सिगार में विस्फोट करवाने का प्लान भी शामिल था। इसके अलावा फिदेल कास्त्रो के मिल्कशेक में जहर मिलवाने का प्रयास किया गया। उनके डाइविंग सूट में जानलेवा केमिकल लगाए गए।
    पूर्व प्रेमिका से हत्या का प्लान

    अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो की पूर्व प्रेमिका को भी उनकी हत्या करने के लिए राजी कर लिया था। उससे कास्त्रो को जहर देने को कहा गया था। हालांकि इस बात का पता कास्त्रो को चल गया और उन्होंने खुद ही पूर्व प्रेमिका को पिस्तौल दे दी और कहा कि मुझे शूट कर दो। उनकी प्रेमिका ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। 1975 की चर्च कमेटी ने बताया था कि 1960 से 65 के बीच अमेरिका ने कम से कम 8 बार फिदेल कास्त्रो को मरवाने का प्लान बनाया था।

    क्यूबा के एक पूर्व अधिकारी फैबियान एस्कलांते के मुताबिक अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को मरवाने के 638 प्रयास किए. इनमें से 184 बार निक्सन के कार्यकाल में उनपर हमला करवाने का प्रयास किया गया।

  • US: महिला की हत्या के बाद फूटा गुस्सा, ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग.. कई शहरों में तनाव

    US: महिला की हत्या के बाद फूटा गुस्सा, ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग.. कई शहरों में तनाव


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में इमिग्रेशन अधिकारियों (Immigration officials) द्वारा 37 साल की महिला की गोली मारकर हत्या के बाद हालात संगीन हो गए हैं। गोली लगने के बाद ही रेनी गुड (Renee Good) नाम की महिला की मौत हो गई थी। इसके बाद अमेरिका के कई शहरों में लोगों को गुस्सा फूट पड़ा है। लॉस एंजेल्स, वॉशिंगटन से लेकर कंसास और मिसौरी तक लोग इस घटना के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। इस घटना के बाद डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन (Donald Trump administration) पर भी दबाव बढ़ गया है।

    सरकार के अधिकारियों के मुताबिक पहले आईसीई के एजेंट महिला की कार के पास पहुंचे थे। महिला ने जैसे ही कार आगे बढ़ाई कि अधिकारियों ने उसपर गोली चला दी। रेनी गुड आईसीई विरोधी गुट में भी शामिल नहीं थीं। इस गटना के बाद ट्रंप प्रशासन ने मिनेसोटा में भारी तैनाती कर दी है। जानकारी के मुताबिक महिला अमेरिकी ही थी और वह इमिग्रेशन अभियान का टारगेट भी नहीं थी।

    इस घटना के बाद मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ड ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की इस तरह की खौफ और हेडलाइन पैदा करने वाले ऐक्शन लोगों की जान लेने के अलावा कुछ नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि यहां टीवी स्टाइल में सरकार चल रही है और इसकी कीमत लोगों को जान देकर चुकानी पड़ रही है।

    मिनियापोलिस के मेयर जैकब फ्रे ने भी कहा कि यह गोली आत्मरक्षा में नहीं चलाई गई बल्कि जानबूझकर हत्या करने के लिए चलाई गई थी। उन्होंने कहा कि आईसीई को शहर छोड़ देना चाहिए और यहां के लोगों को शांति से रहने देना चाहिए। न्यूयॉर्क के नए मेयर ममदानी ने भी कहा कि आईसीई देशभर में हिंसा के लिए जिम्मेदार है।

    अमेरिका में भारी बवाल
    अमेरिका के सिविल ऐक्टिविस्ट अब सड़कों पर उतर चुके हैं। रविवार को कई समूहों ने रैली निकाली। ऐसे में अमेरिका में संघीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच तनाव बढ़ गया है। इसी बीच पोर्टलैं में यूएस बॉर्डर पट्रोल एजेंट ने दो लोगों को गोली मार दी। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एक हफ्ते के भीतर शूटिंग की दो घटनाएं हो चुकी हैं। इससे पता चलता है कि डोनाल्ड ट्रंप की नजर में किसी की जान की कोई कीमत नहीं है।