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  • ईरान को ट्रंप का सख्त संदेश…., बोले- अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होगा समझौता…!

    ईरान को ट्रंप का सख्त संदेश…., बोले- अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होगा समझौता…!


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि ईरान (Iran) वाशिंगटन (Washington) के साथ समझौता करना चाहता है। लेकिन उनकी राय में ईरान अभी इसके लिए तैयार नहीं है। ट्रंप ने संकेत दिया कि कोई भी समझौता अमेरिका की उम्मीदों के मुताबिक होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अगले हफ्ते न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ट्रंप की खाड़ी सहयोग परिषद यानी जीसीसी (Gulf Cooperation Council- GCC) के सदस्य देशों के नेताओं और विदेश मंत्रियों से मुलाकात होने की उम्मीद है।


    राष्ट्रपति ट्रंप ने क्या कहा?

    ट्रंप ने ‘एबीसी 11’ से बातचीत में कहा, ईरान समझौता करना चाहता है। मेरी राय में, वे तैयार नहीं हैं। हम या तो ऐसा समझौता करेंगे जो अच्छा हो या फिर कोई समझौता नहीं करेंगे। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है, जब उनका प्रशासन ईरान के साथ जारी संघर्ष के अगले चरण का आकलन कर रहा है। प्रशासन युद्ध के बाद की रणनीति भी तैयार कर रहा है।

    एक्सिओस ने तीन सूत्रों के हवाले से बताा कि ट्रंप की छह जीसीसी देशों के प्रतिनिधियों से मुलाकात होने की उम्मीद है। इन छह देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान शामिल हैं। प्रस्तावित बैठक में युद्ध के बाद की रणनीति को लेकर वाशिंगटन के विचारों पर चर्चा हो सकती है। संघर्ष में अगले कदमों पर भी बात हो सकती है।

    अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बुधवार को शुरुआती निमंत्रण भेजे थे। इस बैठक में दूसरे अरब और इस्लामी देशों के नेताओं को भी शामिल किया जा सकता है। ट्रंप ने बुधवार को कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि वाशिंगटन ‘युद्ध के अंत की ओर’ बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि अमेरिका को ईरान की ओर से सीधे संदेश मिला है कि तेहरान समझौता करना चाहता है।

    खाड़ी देशों में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे हैं। संघर्ष के दौरान इन देशों पर ईरान की ओर से हमले हुए हैं। तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात में रुकावटों का असर क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ा है।


    ट्रंप ने किन सरकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए?

    ट्रंप ने गुरुवार शाम (स्थानीय समय) व्हाइट हाउस में 100 से ज्यादा शिकार करने वालों, मछली पकड़ने वालों और बाहरी गतिविधियों से जुड़े उद्योग (आउटडोर) के प्रतिनिधियों की मेजबानी की। इस दौरान उन्होंने कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इन आदेशों का मकसद शिकार और मछली पकड़ने के अवसरों को बढ़ाना है। कुछ संघीय नियमों में बदलाव करना भी इसका हिस्सा है।

    मछली पकड़ने के नियमों पर बात करते हुए ट्रंप ने राष्ट्रपति के अधिकारों के दायरे का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा, इस पद की ताकत बहुत ज्यादा है। मैं मछली पकड़ने पर प्रतिबंध लगा सकता था और जॉनी का कारोबार पूरी तरह बंद कर सकता था। मुझे लगता है कि मैं ऐसा सिर्फ एक या दो दिन के लिए करने जा रहा हूं। जब तक वह मुझे फोन करके नहीं कहता- राष्ट्रपति जी, आप मेरा कारोबार बंद कर रहे हैं।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किया है। इसके तहत लाखों एकड़ संघीय जमीन शिकारियों और मछली पकड़ने वालों के लिए खोली जाएगी। उन्होंने एक और आदेश पर भी हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य समुद्री मछली पकड़ने वालों, नाव चलाने वालों, चार्टर कैप्टनों और तटीय समुदायों पर लागू संघीय नियमों को कम करना है।


    ट्रंप की शक्ति सीमित करने वाला प्रस्ताव

    इस बीच, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने मंगलवार को एक प्रस्ताव पर मतदान किया। प्रस्ताव के पक्ष में 220 और विरोध में 204 वोट पड़े। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने के ट्रंप के अधिकार को सीमित करना है। यह प्रस्ताव डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद सेठ मौल्टन ने पेश किया था। इसमें प्रशासन से कहा गया है कि वह ईरान के साथ संघर्ष से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाए। हालांकि, इसमें कुछ खास रक्षात्मक परिस्थितियों को अपवाद रखा गया है। प्रस्ताव के समर्थन में सात रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ वोट किया।

    अलग से, प्रतिनिधि सभा ने 2026 का लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध कानून भी पारित कर दिया। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को कुछ शर्तों के आधार पर उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं।

  • कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ी रणनीतिक साझेदारी, एसोसिएट सदस्यता प्रस्ताव से अमेरिका के साथ तनाव गहराया

    कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ी रणनीतिक साझेदारी, एसोसिएट सदस्यता प्रस्ताव से अमेरिका के साथ तनाव गहराया

    नई दिल्ली । कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम सामने आया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कनाडा के साथ मौजूदा सहयोग को एक नई और अधिक व्यापक साझेदारी में बदलने का प्रस्ताव रखा है। इसी क्रम में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने यूरोपीय संसद में यूरोप के साथ गहरे संबंधों का समर्थन किया। दोनों पक्षों के बीच चर्चा अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, अंतरिक्ष और डिजिटल व्यापार जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच रही है।

    कनाडा को यूरोपीय संघ का पहला एसोसिएट सदस्य बनाने की संभावना ने इस पूरी पहल को खास बना दिया है। यह पूर्ण सदस्यता से अलग व्यवस्था होगी। इसके तहत कनाडा यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की तरह संगठन के सभी फैसलों में मतदान नहीं करेगा, लेकिन कई अहम क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ गहरा सहयोग कर सकेगा। मौजूदा समय में यूरोपीय संघ में 27 देश शामिल हैं। एसोसिएट सदस्यता की यह व्यवस्था अभी मौजूदा ढांचे में निर्धारित नहीं है, इसलिए इसे लागू करने के लिए आगे कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया की जरूरत होगी।

    मार्क कार्नी ने यूरोप के साथ संबंधों को आने वाले समय के लिए महत्वपूर्ण बताया है। उनका जोर इस बात पर है कि दोनों पक्ष अपनी रणनीतिक क्षमता और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने के लिए साथ काम करें। कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच पहले से व्यापारिक संबंध मौजूद हैं, लेकिन अब दोनों पक्ष इन्हें रक्षा और आर्थिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों तक विस्तार देने पर विचार कर रहे हैं। महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा औद्योगिक क्षमता, AI और उन्नत तकनीक को इस साझेदारी के प्रमुख क्षेत्र माना जा रहा है।

    कनाडा और यूरोपीय संघ के बीच मौजूदा व्यापारिक समझौता भी इस नई पहल की आधारभूमि है। दोनों पक्ष अब उस ढांचे से आगे बढ़कर अधिक व्यापक आर्थिक और रणनीतिक संबंध विकसित करने की बात कर रहे हैं। कनाडा यूरोपीय रक्षा खरीद व्यवस्था में शामिल होने वाला पहला गैर-यूरोपीय देश भी बन चुका है। इससे रक्षा क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच सहयोग का दायरा बढ़ा है।

    इस घटनाक्रम का असर अमेरिका के साथ कनाडा के संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के संभावित एसोसिएट सदस्य बनने के प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यदि यूरोपीय संघ के साथ यह व्यवस्था अमेरिका के लिए प्रतिकूल मानी गई, तो यूरोप पर भारी टैरिफ लगाए जा सकते हैं। उन्होंने इस प्रस्ताव को लेकर आपत्ति जताई है और इसे अमेरिका के लिए संभावित रूप से शत्रुतापूर्ण कदम बताया है।

    दूसरी ओर, कनाडा यूरोप के साथ अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है। कनाडा का फोकस भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को विविध बनाने तथा महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी रणनीतिक क्षमता मजबूत करने पर है। ऊर्जा, खनिज, रक्षा, तकनीक और वित्तीय सेवाओं से जुड़े सहयोग पर भी बातचीत आगे बढ़ रही है।

    कनाडा और अमेरिका के बीच टैरिफ तथा व्यापार को लेकर जारी मतभेदों के बीच यूरोप के साथ बढ़ती नजदीकी महत्वपूर्ण है। हालांकि, कनाडा और अमेरिका के पुराने संबंध भी बने हुए हैं। वहीं यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित नई व्यवस्था का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है। एसोसिएट सदस्यता की प्रकृति, अधिकार और जिम्मेदारियां आगे होने वाली बातचीत में निर्धारित होंगी। फिलहाल यह पहल कनाडा और यूरोप के बीच संबंधों को व्यापार से आगे रणनीतिक साझेदारी तक ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आई है।

  • अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    नई दिल्ली ।अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का रास्ता महंगा होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने Optional Practical Training यानी OPT से संबंधित करीब 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 96 लाख रुपये बताई गई है। प्रस्ताव को व्हाइट हाउस की मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे आगे नियम के रूप में लाया जा सकता है।

    OPT अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सीमित अवधि तक काम करने की अनुमति देता है। इसका उद्देश्य छात्रों को उनके अध्ययन से जुड़े क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर देना है। आम तौर पर OPT के तहत छात्र 12 महीने तक काम कर सकते हैं। STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स से जुड़े पाठ्यक्रमों के छात्रों को इसके अलावा 24 महीने का अतिरिक्त समय मिल सकता है। इस तरह पात्र छात्रों को पढ़ाई के बाद कुल तीन साल तक काम करने का अवसर मिल सकता है।

    प्रस्तावित बदलाव के तहत OPT से जुड़ी फीस 1 लाख डॉलर निर्धारित करने की बात सामने आई है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी रकम का भुगतान कौन करेगा। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के प्रस्ताव में इस जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं होने की बात कही गई है।

    फीस का भुगतान छात्र को करना होगा या उसे नौकरी देने वाली कंपनी को, यह फिलहाल तय नहीं है। कुछ कानूनी जानकारों के मुताबिक, OPT वाले विदेशी छात्र को नौकरी देने वाली कंपनी पर यह खर्च डाला जा सकता है। वहीं, इस बात को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं कि यदि भुगतान की जिम्मेदारी विश्वविद्यालयों पर आती है तो किसी दूसरी कंपनी में काम करने वाले छात्र के लिए कॉलेज इतनी बड़ी राशि क्यों वहन करेगा।

    प्रस्तावित फीस भारतीय छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए नौकरी करना वहां काम का अनुभव हासिल करने का एक प्रमुख रास्ता है। इसी अवधि में कुछ छात्रों को आगे चलकर नियोक्ता की मदद से H-1B वीजा के लिए अवसर मिल सकता है।

    यदि प्रस्तावित 1 लाख डॉलर की राशि छात्रों को स्वयं देनी पड़ती है, तो पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में नौकरी शुरू करना उनके लिए काफी महंगा हो सकता है। यदि इसका भुगतान कंपनियों या विश्वविद्यालयों को करना पड़ता है, तो इसका असर विदेशी छात्रों की भर्ती और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    प्रस्ताव का असर केवल छात्रों तक सीमित रहने की बात भी सामने आई है। यदि विश्वविद्यालयों पर बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी आती है, तो कुछ संस्थान विदेशी छात्रों की संख्या कम करने पर विचार कर सकते हैं। इससे अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अध्ययन विकल्पों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह कंपनियों को भी विदेशी छात्रों से मिलने वाले प्रशिक्षित प्रतिभाशाली कर्मचारियों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले साल करीब 3 लाख विदेशी छात्रों के पास OPT के जरिए अमेरिका में नौकरी करने की अनुमति थी। ऐसे में प्रस्तावित फीस का दायरा बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच सकता है। फिलहाल प्रस्ताव से जुड़े प्रमुख सवालों में यह शामिल है कि 1 लाख डॉलर की फीस का भुगतान कौन करेगा और अंतिम नियम लागू होने पर उसकी वास्तविक शर्तें क्या होंगी।

  • US: मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप को बड़ा झटका…. SC ने मेल मतपत्र प्रतिबंधों को किया खारिज

    US: मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप को बड़ा झटका…. SC ने मेल मतपत्र प्रतिबंधों को किया खारिज


    न्यूयॉर्क।
    सोमवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) के मेल मतपत्र प्रतिबंधों को फिलहाल खारिज कर दिया। इस निर्णय से राज्यों को अपनी पुरानी मेल मतपत्र प्रक्रियाओं को जारी रखने की अनुमति मिल गई है। यह फैसला मध्यावधि चुनावों (Mid-term elections) में मतदान शुरू होने के बीच आया है। ट्रंप प्रशासन कांग्रेस पर नियंत्रण के लिए नवंबर के चुनावों से पहले इन प्रतिबंधों को लागू करना चाहता था।

    डाक मतपत्र के मामले में जजों की राय क्या?
    जस्टिस सैमुअल एलिटो और जस्टिस क्लेरेंस थॉमस ने इस संक्षिप्त आदेश का विरोध किया। जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने प्रतिबंधों को मध्यावधि चुनावों के लिए लागू न करने पर सहमति जताई। हालांकि, उन्होंने बाद में ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाने का संकेत दिया। यह मामला महत्वपूर्ण है क्योंकि देश का लगभग एक तिहाई हिस्सा मेल द्वारा मतदान करता है।


    2020 में मिली हार का कारण डाक मतपत्र को मानते हैं ट्रंप

    चुनाव अधिकारियों ने कहा कि मध्यावधि चुनावों से पहले पूर्ण बदलाव करना संभव नहीं था। अलाबामा, उत्तरी कैरोलिना और विस्कॉन्सिन ने पिछले सप्ताह ही मतदाताओं को मेल मतपत्र भेजना शुरू कर दिया था। उस समय भी नई प्रणाली सक्रिय नहीं थी। ट्रंप ने लंबे समय से मेल मतदान का विरोध किया है। उन्होंने 2020 के चुनाव में जो बाइडेन से अपनी हार के लिए इसे गलत तरीके से दोषी ठहराया था। हालांकि, वह खुद अक्सर इसी तरीके से मतदान करते रहे हैं, जिसमें इस साल भी शामिल है।


    ट्रंप प्रशासन की क्या थी योजना?

    ट्रंप प्रशासन की योजना में राज्यों को एक समान लिफाफा शैली अपनानी थी। उन्हें योग्य मतदाताओं की सूची एक ऑनलाइन माध्यम पर जमा करनी होती। पोस्टल सर्विस उन राज्यों को मतपत्र देने से मना कर सकती थी जो नियमों का पालन नहीं करते। एक व्हिसलब्लोअर रिपोर्ट ने इस प्रणाली पर चिंता जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन माध्यम ठीक से नहीं बना था। एक बार कोड त्रुटि से लाखों मेल मतपत्रों का पूरा समूह रद्द हो सकता था।


    प्रतिबंधों को क्यों चुनौती दी गई?

    डेमोक्रेटिक राज्य अधिकारियों और मतदान अधिकार समूहों ने इन प्रतिबंधों को अदालत में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति के पास चुनाव नियम तय करने का सांविधानिक अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, ये नियम एक बड़े चुनाव की पूर्व संध्या पर मेल मतदान को लगभग समाप्त कर देंगे। निचली अदालतों ने ट्रंप की योजना को अवरुद्ध कर दिया था। इसमें राष्ट्रपति द्वारा नामित एक न्यायाधीश द्वारा जारी किया गया प्रारंभिक निषेधाज्ञा भी शामिल था।


    सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

    ट्रंप प्रशासन ने निचली अदालतों के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। प्रशासन ने तर्क दिया कि पोस्टल सर्विस पर संघीय नियंत्रण उन्हें मेल मतपत्रों के लिए नियम तय करने की अनुमति देता है। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों का पालन करना संभव था। संघीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक प्रारंभिक प्रक्रियात्मक निर्णय जीता था। हालांकि, जस्टिस ने योजना की वैधता पर स्पष्ट रूप से कोई फैसला नहीं सुनाया था।

  • ट्रंप ने एआई को बताया भविष्य की ताकत, चीन की जासूसी, शी जिनपिंग और कनाडा के नेताओं पर भी खुलकर बोले

    ट्रंप ने एआई को बताया भविष्य की ताकत, चीन की जासूसी, शी जिनपिंग और कनाडा के नेताओं पर भी खुलकर बोले

    नई दिल्ली ।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयरलैंड से अमेरिका लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, चीन, कनाडा और व्यापार से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। ट्रंप ने एआई को लेकर अमेरिका की स्थिति को मजबूत बताया, वहीं चीन और कनाडा के साथ संबंधों पर भी अपनी बात रखी।

    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को लेकर ट्रंप ने कहा कि उनका रवैया अब तक ठीक रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने चीन के साथ सही व्यवहार किया है। चीन की ओर से अमेरिका की जासूसी किए जाने से जुड़े सवाल पर ट्रंप ने कहा कि चीन अमेरिका पर नजर रखता है, लेकिन अमेरिका भी चीन की जानकारी लेता है।

    ट्रंप ने अमेरिकी बाजार में चीनी कारों की स्थिति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अभी तक उन्होंने चीनी कारों को अमेरिका में आने की अनुमति नहीं दी है। इसके पीछे उन्होंने चीन के सामान पर लगाए गए भारी टैक्स को प्रमुख कारण बताया। ट्रंप के अनुसार, इन उत्पादों पर टैक्स 100 से 150 प्रतिशत तक रहा है।

    उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विदेशी कारों की वजह से परेशानी बढ़ रही है। इसके विपरीत अमेरिका में अभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है। ट्रंप ने इस संदर्भ में अमेरिकी बाजार में चीनी वाहनों के प्रवेश को लेकर अपनी नीति का संकेत दिया।

    बोइंग के विमानों से जुड़े सौदे के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि वह इसे पूरा करेंगे। उन्होंने अपनी बातचीत और कारोबारी शैली का जिक्र करते हुए कहा कि वह हर डील पूरी कर लेते हैं। इस दौरान उन्होंने व्यापार से जुड़े अपने रुख को भी स्पष्ट किया।

    कनाडा के साथ संबंधों को लेकर ट्रंप ने कहा कि वहां की सरकार के साथ काम करना उनके लिए मुश्किल है। हालांकि उन्होंने कनाडा के आम लोगों और वहां के नेताओं के बीच अंतर करते हुए कहा कि उन्हें कनाडा के लोगों से कोई परेशानी नहीं है। उनके मुताबिक, कनाडा के लोग अच्छे हैं, लेकिन वहां के नेताओं के साथ काम करना आसान नहीं है।

    ट्रंप ने दावा किया कि कनाडा अब अमेरिका के साथ समझौता करना चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा ने लंबे समय तक अमेरिका से फायदा उठाया, लेकिन अब स्थिति बदल गई है और ऐसा नहीं हो रहा है।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर ट्रंप ने इसे भविष्य की महत्वपूर्ण ताकत के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि जिस देश का एआई सबसे आगे होगा, वही आगे रहेगा। ट्रंप ने दावा किया कि इस क्षेत्र में अमेरिका काफी आगे है।

    जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या वह खुद एआई का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्होंने इसका जवाब हां में दिया। हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि वह एआई का इस्तेमाल किस काम के लिए करते हैं।

    ट्रंप की इस बातचीत में एआई के साथ-साथ चीन और कनाडा के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर उनका मौजूदा रुख भी सामने आया। चीन के साथ जासूसी और व्यापार, कनाडा के साथ बातचीत तथा एआई में अमेरिकी बढ़त जैसे मुद्दों पर उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया।

  • ‘24 घंटे में सरकार गिराने का था प्लान, लेकिन…’, ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ट्रंप को सुनाया

    ‘24 घंटे में सरकार गिराने का था प्लान, लेकिन…’, ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ट्रंप को सुनाया

    तेहरान। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका को उम्मीद थी कि वह महज 24 घंटे में ईरान की मौजूदा सरकार को गिराकर अपनी पसंद की नई सरकार स्थापित कर देगा, लेकिन उसका यह अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुआ। पेजेश्कियन के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता के साथ-साथ वहां के लोगों के हौसले और एकजुटता को भी कम करके आंका।

    एक इंटरव्यू में ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका को लगता था कि ईरान के शीर्ष नेताओं, सैन्य कमांडरों और महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले करने के बाद जनता सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाएगी। उनका दावा है कि इसके उलट हमलों के बाद बड़ी संख्या में लोग सरकार और देश की एकता के समर्थन में सड़कों पर उतर आए।

    वेनेजुएला और सीरिया जैसा मॉडल अपनाने का आरोप

    पेजेश्कियन ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने ईरान के मामले में वेनेजुएला जैसा रास्ता अपनाने की कोशिश की। उन्हें लगा कि सैन्य कार्रवाई के जरिए 24 घंटे के भीतर ईरान पर नियंत्रण हासिल किया जा सकता है और इसके बाद अपनी पसंद की सरकार बनाई जा सकती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को ईरान में सीरिया जैसी स्थिति पैदा होने की उम्मीद थी। अमेरिकी आकलन था कि ईरान के सुप्रीम लीडर, सैन्य कमांडरों और वरिष्ठ अधिकारियों की मौत के बाद सरकार कमजोर पड़ जाएगी और कुछ ही दिनों में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। हालांकि, पेजेश्कियन के मुताबिक ऐसा नहीं हुआ।

    हमलों के बाद और मजबूत हुई एकजुटता

    ईरानी राष्ट्रपति ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद देश के लोग पहले की तुलना में और अधिक एकजुट हो गए। यहां तक कि सरकार से नाराज रहने वाले कुछ लोगों ने भी देश की जमीन और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए सरकार का साथ दिया।

    पेजेश्कियन ने कहा कि इस संघर्ष ने ईरान के भीतर एकता को मजबूत किया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि विदेशों में रह रहे कुछ ईरानी नागरिक हमलों के बाद अपने देश वापस लौट आए।

    उनके मुताबिक, ईरान की सरकार, सेना और जनता ने मिलकर अमेरिका के दबाव का सामना किया और देश के खिलाफ बनाई गई रणनीति को सफल नहीं होने दिया।

    सैन्य ताकत के बावजूद ईरान के सामने नहीं झुका

    पेजेश्कियन ने कहा कि अमेरिका ने शुरुआत में सैन्य शक्ति के दम पर ईरान की सरकार को गिराने की कोशिश की, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हुआ। इसके बाद ईरान के महत्वपूर्ण ढांचे और ठिकानों को निशाना बनाया गया, फिर भी अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सका।

    उन्होंने कहा कि ईरान ने अत्याधुनिक सैन्य तकनीक से लैस ताकत के सामने भी मुकाबला जारी रखा। पेजेश्कियन ने जोर देकर कहा कि किसी देश की ताकत का आकलन केवल उसके हथियारों और सैन्य तकनीक के आधार पर नहीं किया जा सकता।

    अमेरिका पर खाद्य और दवाओं की सप्लाई रोकने का आरोप

    ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका पर ईरान में जरूरी सामान, भोजन और दवाओं की आवाजाही बाधित करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका समुद्री रास्तों को रोकने की कोशिश कर रहा है और जमीन के रास्तों को भी बंद करने का प्रयास किया जा रहा है।

    पेजेश्कियन के मुताबिक, इन तमाम दबावों के बावजूद ईरान की सरकार, सेना और जनता ने मिलकर परिस्थितियों का सामना किया और देश की एकता को बनाए रखा।

  • हूतियों की बढ़ती ताकत से सऊदी अरब चिंतित, अमेरिकी मदद की मांग के बीच ट्रंप ने सैन्य हमले से किया इनकार

    हूतियों की बढ़ती ताकत से सऊदी अरब चिंतित, अमेरिकी मदद की मांग के बीच ट्रंप ने सैन्य हमले से किया इनकार

    नई दिल्ली ।यमन में हूती लड़ाकों की बढ़ती ताकत और रणनीतिक इलाकों की ओर उनके बढ़ते प्रभाव ने सऊदी अरब की चिंता बढ़ा दी है। हालात को देखते हुए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन पर बातचीत की और हूतियों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की। हालांकि, ट्रंप ने यमन में सीधे अमेरिकी हमले से इनकार कर दिया।

    हूतियों के मोचा शहर पर कब्जे और दक्षिण की ओर उनकी बढ़ती गतिविधियों के बीच सऊदी समर्थित यमनी बलों के पीछे हटने की खबर सामने आई है। इसी स्थिति के बीच सऊदी नेतृत्व ने अमेरिका से मदद की अपील की। बातचीत के दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस ने क्षेत्र में बिगड़ते हालात की जानकारी ट्रंप को दी और इसके बाद दोबारा संपर्क कर हूतियों के खिलाफ अमेरिकी स्ट्राइक की मांग रखी।

    ट्रंप ने यमन में संघर्ष बढ़ने को लेकर चिंता जताई, लेकिन हूती समूह के खिलाफ सीधे हमले के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अमेरिका ने हालांकि सऊदी अरब को हूतियों से संबंधित खुफिया जानकारी और टारगेटिंग डेटा उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है। बताया गया है कि करीब 200 अमेरिकी सैन्यकर्मी पहले से सऊदी अरब में गैर-गतिशील सहायता प्रदान कर रहे हैं।

    सऊदी अरब की चिंता का एक बड़ा कारण हूतियों का रणनीतिक समुद्री क्षेत्रों की ओर बढ़ना है। उनकी गतिविधियां बढ़ने से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास स्थिति और महत्वपूर्ण हो गई है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए अहम माना जाता है और सऊदी अरब के तेल निर्यात से भी इसका सीधा संबंध है। हूतियों की बढ़ती गतिविधियों के बीच तेल की कीमतों में भी उछाल देखा गया है।

    मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि ईरान पहले से होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए समुद्री आवाजाही पर दबाव बना रहा है। ऐसे में बाब अल-मंदेब क्षेत्र में हूतियों का प्रभाव बढ़ने से अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों पर दबाव बढ़ने की आशंका सऊदी अरब के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

    मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर गुरुवार को सऊदी अरब पहुंचे। बताया गया कि उन्होंने क्षेत्र की स्थिति को लेकर तत्काल चर्चा के लिए अहम बैठकें कीं। हालांकि, वाशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास और व्हाइट हाउस की ओर से इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।

    अमेरिका फिलहाल हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने से बचने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वाशिंगटन की प्राथमिकता लाल सागर में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और खुला रखना है। यमन के व्यापक संघर्ष से निपटने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय सहयोगियों पर छोड़ने की नीति पर जोर दिया जा रहा है।

    इसी वजह से सऊदी अरब की सैन्य हस्तक्षेप की मांग के बावजूद अमेरिका फिलहाल सीधे हमले के बजाय खुफिया जानकारी और सैन्य सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखने की कोशिश कर रहा है।

    यमन में हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है। यह शहर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर बताया गया है। मोखा पर पहले सऊदी समर्थित यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स का नियंत्रण था। दोनों पक्षों के बीच नौ दिनों से लड़ाई चल रही थी। मोखा पर कब्जे के बाद हूतियों की स्थिति और मजबूत हुई है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री मार्गों को लेकर सऊदी अरब की चिंता बढ़ गई है।

  • ट्रंप ने किया H-1B Visa की नई फीस को सपोर्ट…. बोले- 'अमेरिकी वर्कर को मिले जॉब

    ट्रंप ने किया H-1B Visa की नई फीस को सपोर्ट…. बोले- 'अमेरिकी वर्कर को मिले जॉब


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में H-1B वीजा (US H-1B Visa) सरकार के निशाने पर आ चुका है और इसके जरिए विदेशों से होने वाली हायरिंग को मुश्किल बनाया जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने H-1B वीजा याचिका पर लगाई जाने वाली फीस को लेकर पेश किए गए एक प्रस्ताव को सपोर्ट किया है। उनका कहना है कि इससे कंपनियां अब विदेश से स्किल वर्कर को लाने से पहले अमेरिकी वर्कर्स को नौकरी और ट्रेनिंग देंगी। फीस से उन्हें ऐसा करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

    अमेरिका में लेबर डे के मौके पर दिए गए एक संदेश में उन्होंने H-1B वीजा को लेकर ये सारी बातें कही हैं। ट्रंप ने कहा, ‘ये तय करने के लिए कि हम अमेरिकी वर्कर्स को काम पर रखें और उन्हें ट्रेनिंग दें, हम H-1B वीजा याचिकाओं पर एक नई फीस का प्रस्ताव रख रहे हैं। इससे कंपनियां विदेश से लेबर देखने से पहले योग्य अमेरिकियों में निवेश करने के लिए प्रेरित होंगी।’ उनके इस बयान के बाद अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों की परेशानियां बढ़ गई हैं।


    जिस प्रस्ताव को ट्रंप ने सपोर्ट किया, उसमें क्या है?

    दरअसल, ट्रंप के संदेश में जिस फीस का जिक्र किया गया है, वो लेबर डे पर शुरू किया गया कोई नया चार्ज नहीं है। अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट (DHS) ने इससे पहले कैप-सब्जेक्ट H-1B आवेदनों के लिए 1,03,265 डॉलर (लगभग 97 लाख रुपये) की फीस का प्रस्ताव रखा था। इस फीस से एडवांस डिग्री यानी मास्टर्स-पीएचडी वाले लोगों को भी छूट नहीं दी जा रही है। ये प्रस्तावित फीस मौजूदा इमिग्रेशन खर्चों के अलावा, H-1B याचिका दाखिल करते समय चुकानी होगी। ये कदम फेडरल रेगुलेटरी प्रोसेस का हिस्सा है और फिलहाल कोई एक्टिव चार्ज नहीं है।


    अमेरिकी कंपनियां अब वापस लौट रहीं देश: ट्रंप

    राष्ट्रपति ट्रंप ने इस प्रस्तावित H-1B फीस को डॉमेस्टिक एंप्लॉयमेंट और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के अपने बड़े अभियान से जोड़ा है। उनकी लेबर डे की स्पीच का फोकस अमेरिकी वर्कर्स, इंडस्ट्रियल कंपनियां और ट्रेड नीतियां रहीं। ट्रंप ने कहा, ‘दशकों से विनाशकारी ट्रेड पॉलिसी की वजह से हमारी इंडस्ट्रियल ताकत दूसरे देशों को सौंप दी गई, अब कंपनियां वापस लौट रही हैं, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में खरबों डॉलर निवेश कर रही हैं और 9 लाख से ज्यादा जॉब्स जोड़ी गई हैं।’


    भारतीयों की चिंता क्यों बढ़ी?

    दरअसल, अमेरिका में H-1B वीजा प्रोग्राम के जरिए बड़ी टेक कंपनियां और अन्य सेक्टर्स की कंपनियां स्किल वर्कर्स की हायरिंग करती हैं। H-1B वीजा पाने में भारतीय सबसे आगे रहते हैं। 2024 में अकेले वीजा का 71% भारतीयों को मिला। इस वीजा पर जॉब करने वाले भारतीयों को ये डर सता रहा है कि अगर उनकी नौकरी चली जाती है और फिर ये नई फीस लागू हो जाती है, तो ऐसी स्थिति में अमेरिकी कंपनियां उन्हें दोबारा से नौकरी नहीं देंगी।

    अमेरिकी कंपनियों के लिए उनकी हायरिंग महंगी हो जाएगी। इसी तरह से अमेरिका में पढ़ाई करने वाले भारतीय भी चिंतित हैं, क्योंकि नई फीस के दायरे में वो भी होंगे। कोई भी कंपनी इतनी महंगी फीस देकर उन्हें भी नौकरी देने से बचेगी। भारत में भी जो लोग अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करने का प्लान कर रहे हैं, उनके लिए भी मुश्किलें कम नहीं हुई हैं, क्योंकि उन्हें भी वीजा पाने में दिक्कत आ सकती है।

  • ट्रंप ने पुतिन को मिलाया फोन, यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर हुई चर्चा

    ट्रंप ने पुतिन को मिलाया फोन, यूक्रेन युद्ध खत्म करने पर हुई चर्चा

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से करीब एक घंटे फोन पर बातचीत की। दोनों नेताओं के बीच यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की संभावनाओं और आगे की कूटनीतिक पहल को लेकर चर्चा हुई। क्रेमलिन ने बातचीत को सकारात्मक बताते हुए कहा कि युद्ध का अंत अमेरिका और रूस के संबंधों को सामान्य बनाने का रास्ता खोल सकता है।

    अमेरिकी दूतों की मॉस्को-कीव यात्रा के बाद हुई बातचीत

    ट्रंप और पुतिन के बीच यह फोन वार्ता अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की हालिया मॉस्को तथा कीव यात्रा के बाद हुई। दोनों अमेरिकी प्रतिनिधि यूक्रेन युद्ध को लेकर लंबे समय से रुकी बातचीत को फिर शुरू कराने की कोशिश में जुटे हैं।

    क्रेमलिन के अधिकारी यूरी उशाकोव के मुताबिक, पुतिन और ट्रंप ने अमेरिकी दूतों की ओर से किए जा रहे प्रयासों को सकारात्मक माना। बातचीत के दौरान पुतिन ने ट्रंप को युद्धक्षेत्र की मौजूदा स्थिति की जानकारी दी और यह भी बताया कि संघर्ष खत्म कराने में अमेरिका किस तरह भूमिका निभा सकता है।

    ट्रंप चाहते हैं अपने कार्यकाल में युद्ध का अंत

    उशाकोव ने बताया कि ट्रंप की इच्छा है कि उनके मौजूदा राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ही यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की दिशा में कोई बड़ी सफलता हासिल हो। ट्रंप ने यह भी कहा कि युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका और रूस के बीच व्यापार तथा आर्थिक संबंधों को मजबूत करने की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

    क्रेमलिन ने कहा कि युद्ध खत्म होने की स्थिति में दोनों देशों के रिश्तों को पूरी तरह सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

    यूरोप को लेकर पुतिन ने क्या कहा?

    फोन बातचीत में पुतिन ने यूरोपीय देशों को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट किया। क्रेमलिन के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति ने ट्रंप से कहा कि रूस की यूरोप के खिलाफ कोई आक्रामक मंशा नहीं है।

    पुतिन ने आरोप लगाया कि रूस से संभावित खतरे को लेकर यूरोपीय देशों में पैदा की जा रही चिंताएं उन्हें यूक्रेन के लिए सैन्य समर्थन बढ़ाने और अपने रक्षा खर्च में वृद्धि करने का आधार देती हैं।

    हालांकि, क्रेमलिन ने यह भी दोहराया कि रूस अपने घोषित सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    बातचीत से क्या निकला?

    ट्रंप और पुतिन की बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका युद्ध को समाप्त करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी दूतों की मॉस्को और कीव यात्राओं के बाद दोनों पक्षों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ा है। ऐसे में ट्रंप-पुतिन की फोन वार्ता को आगे की बातचीत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चांद को लेकर दिए गए बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर चांद पर किसका अधिकार है। ट्रंप ने रविवार को सोशल मीडिया पर चांद की तस्वीर साझा की, जिस पर ‘चंद्रमा हमारा है’ लिखा था और अमेरिकी झंडा भी दिखाई दे रहा था। इसके साथ ही चांद की जमीन खरीदने और उसके प्रमाणपत्र देने के दावे भी चर्चा में हैं।

    चांद पर जमीन खरीदने के दावे लंबे समय से सामने आते रहे हैं। कई लोग जन्मदिन, शादी या अन्य खास मौकों पर चांद की जमीन उपहार में देने की बात कहते हैं। कुछ संस्थाएं चांद की जमीन के नाम पर प्रमाणपत्र और दस्तावेज भी बेचती हैं। हालांकि इन दस्तावेजों से चांद की जमीन पर वास्तविक कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं होता।

    चांद और दूसरे खगोलीय पिंडों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रमुख आधार 1967 की अंतरिक्ष संधि है। इस संधि में भारत और अमेरिका समेत 114 देश शामिल हैं। संधि के अनुसार बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के लाभ और हित में होना चाहिए। चांद और दूसरे खगोलीय पिंड भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

    संधि का अनुच्छेद 2 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और अन्य खगोलीय पिंड शामिल हैं, किसी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आ सकते। कोई देश संप्रभुता, कब्जे या किसी अन्य तरीके से चांद के किसी हिस्से को अपना राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित नहीं कर सकता। इसलिए किसी देश का चांद पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप नहीं है।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि देश चांद पर मिशन नहीं भेज सकते। अंतरिक्ष संधि सभी देशों को अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों की खोज तथा इस्तेमाल की स्वतंत्रता देती है। वैज्ञानिक अनुसंधान भी किया जा सकता है, लेकिन अंतरिक्ष गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

    चांद पर पहुंचने वाले यान और उपकरणों को लेकर भी संधि में अलग व्यवस्था है। अनुच्छेद 8 के अनुसार किसी देश के पंजीकरण में दर्ज अंतरिक्ष वस्तु पर उस देश का अधिकार और नियंत्रण बना रहता है। चांद पर उतरने के बाद भी किसी यान या उपकरण का स्वामित्व केवल इसलिए खत्म नहीं होता कि वह खगोलीय पिंड पर मौजूद है। लेकिन इससे चांद की जमीन पर उस देश का मालिकाना हक नहीं बनता।

    निजी कंपनियों के लिए भी नियम स्पष्ट हैं। अनुच्छेद 6 के तहत सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी संबंधित देश की होती है। निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए संबंधित देश की अनुमति और लगातार निगरानी व्यवस्था के तहत काम करना होता है।

    चांद पर जमीन बेचने के दावे भी कई दशकों से होते रहे हैं। जर्मनी के नागरिक मार्टिन जुर्गेंस ने चांद को अपने परिवार की संपत्ति बताया था। बाद में अमेरिकी कारोबारी डेनिस होप ने लूनर एंबेसी नाम की संस्था के जरिए चांद की जमीन बेचने का दावा किया और लोगों को प्रमाणपत्र देने शुरू किए।

    ऐसे प्रमाणपत्र कुछ लोग मनोरंजन, कल्पना या उपहार के तौर पर खरीदते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में निजी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए चांद की जमीन के मालिकाना हक का कोई मान्य पंजीकरण तंत्र नहीं है। इसलिए इन प्रमाणपत्रों को कानूनी संपत्ति अधिकार नहीं माना जाता।

    चांद पर गतिविधियों से होने वाले नुकसान को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय नियम मौजूद हैं। अनुच्छेद 7 के अनुसार अंतरिक्ष वस्तुओं से दूसरे देशों या उनके लोगों को नुकसान होने की स्थिति में लॉन्च करने वाले देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बन सकती है। अनुच्छेद 9 देशों को ऐसी गतिविधियों से बचने और दूसरे देशों के हितों का ध्यान रखने की बात कहता है।

    चांद तक पहुंचने में सोवियत संघ, अमेरिका, जापान, यूरोप, भारत और चीन समेत कई देशों ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत के चंद्रयान-1 और चंद्रयान-3 जैसे मिशनों ने चंद्रमा के अध्ययन में योगदान दिया है। अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इंसानों को चांद की सतह तक पहुंचाया, जबकि हाल के वर्षों में सरकारी और निजी मिशनों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं।

    इसलिए चांद पर यान भेजना, वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करना या शोध करना और चांद की जमीन का मालिक बनना अलग-अलग बातें हैं। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियम किसी देश को चांद पर संप्रभुता स्थापित करने की अनुमति नहीं देते और जमीन खरीदने के प्रमाणपत्र भी वास्तविक कानूनी मालिकाना हक प्रदान नहीं करते।