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  • अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    नई दिल्ली । अमेरिका और चीन के बीच एक बार फिर चुनावी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर जुबानी टकराव तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर अमेरिकी चुनावों में दखल देने और करोड़ों मतदाताओं का डेटा हासिल करने के आरोप लगाए जाने के बाद बीजिंग ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। चीन ने कहा है कि उसने कभी अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया और न ही उसकी ऐसी कोई मंशा है।

    चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अमेरिका की ओर से लगाए गए आरोप तथ्यहीन और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि चीन को बदनाम करने के उद्देश्य से इस प्रकार के बयान दिए जा रहे हैं। उनके अनुसार चीन हमेशा दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करता है और अमेरिकी चुनाव उसके लिए किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का विषय नहीं हैं।

    चीन ने अमेरिका से अपील की कि वह चुनावी राजनीति में चीन का नाम घसीटना बंद करे और दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करे। प्रवक्ता ने संकेत दिया कि यदि दोनों देश स्थिर और रचनात्मक संबंध चाहते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप की बजाय संवाद और सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बनाए रखने की कोशिशें भी जारी हैं। इसी वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का दौरा कर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए संवाद तंत्र पर सहमति जताई थी। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे की भी तैयारी चल रही है, जिसे दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन ने अमेरिकी चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने के उद्देश्य से करोड़ों मतदाताओं का डेटा अवैध रूप से हासिल किया। उनके अनुसार इस कथित डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक संबद्धता और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप ने दावा किया कि इन सूचनाओं का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और अन्य गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

    ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास चीन की कथित गतिविधियों से संबंधित जानकारी थी, लेकिन वह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि कुछ रिपोर्टों में चीन द्वारा अमेरिकी कारोबारी नेताओं और मीडिया से जुड़े लोगों को प्रभावित करने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं शीर्ष स्तर तक समय पर नहीं पहुंचाई गईं।

    हालांकि चीन ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि ऐसे दावों का कोई आधार नहीं है। बीजिंग का कहना है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और आपसी सम्मान के माध्यम से होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर पहले से ही तनाव बना हुआ है। ऐसे में चुनावी हस्तक्षेप जैसे आरोप दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

    फिलहाल दोनों देशों की ओर से अपने-अपने दावों पर कायम रहने के कारण यह विवाद कूटनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में उच्चस्तरीय बैठकों और आधिकारिक संवाद के दौरान इस मुद्दे पर दोनों पक्षों का रुख अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जाएगा।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. यौन शोषण मामले में जीन कैरोल को मिले 5.63 मिलियन डॉलर


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी लेखिका ई. जीन कैरोल (American writer E. Jean Carroll) को डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) से करीब 56 लाख 30 हजार डॉलर (लगभग 5.63 मिलियन डॉलर) मिल गए हैं. यह पैसा उन्हें 2023 में एक जूरी के फैसले के बाद मिला है, जिसमें ट्रंप को कैरोल का यौन उत्पीड़न करने और उन्हें बदनाम करने का दोषी ठहराया गया था।

    अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक यह रकम सोमवार को कैरोल की लॉ फर्म को भेज दी गई. यह फैसला ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद लिया गया. जज लुईस कैप्लान (Judge Lewis Kaplan) ने पांच दिन पहले ही इस भुगतान को मंजूरी दी थी। यह रकम मूल रूप से 5 मिलियन डॉलर के सिविल वर्डिक्ट और उस पर लगे ब्याज को मिलाकर बनी है. यह पहली बार है जब ट्रंप को कैरोल को कोई भुगतान करने पर मजबूर होना पड़ा है।

    पिछले सात साल में कैरोल कुल 88.3 मिलियन डॉलर के सिविल फैसले ट्रंप के खिलाफ जीत चुकी हैं. यह मामला 1996 के आसपास न्यूयॉर्क के बर्गडॉर्फ गुडमैन डिपार्टमेंट स्टोर की एक ड्रेसिंग रूम में हुई कथित घटना से जुड़ा है, जिसे ट्रंप ने हमेशा नकारा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप कैरोल के आरोपों को झूठा बताते रहे हैं. उनका कहना है कि वे कैरोल को जानते तक नहीं और कैरोल ने अपनी किताब बेचने के लिए यह कहानी गढ़ी है. पिछले महीने अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रंप की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने 5 मिलियन डॉलर के फैसले को चुनौती दी थी. ट्रंप की कानूनी टीम ने मंगलवार को फिर कहा कि यह पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है।

    इससे पहले ट्रंप के वकील ने अदालत से भुगतान रोकने की मांग की थी. वकील का कहना था कि अगर कैरोल यह पैसा दान कर देती हैं, जैसा उन्होंने पहले कहा था, तो यह रकम वापस मिलनी मुश्किल हो जाएगी. हालांकि कैरोल ने बाद में भरोसा दिलाया कि वे इस पैसे को अपने रिटायरमेंट के लिए एक ब्याज वाले खाते में रखेंगी।

  • होर्मुज को लेकर फिर बढ़ा तनाव….. ईरान ने दूसरा रास्ता बनाया, ट्रंप ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम

    होर्मुज को लेकर फिर बढ़ा तनाव….. ईरान ने दूसरा रास्ता बनाया, ट्रंप ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम


    वाशिंगटन।
    होर्मुज (Hormuz) को लेकर अमेरिका और ईरान (America and Iran) में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। पिछले चार दिनों से दक्षिणी तटीय इलाकों में धमाके हो रहे हैं। वहीं ईरान ने भी अमेरिका के सहयोगी खाड़ी देशों में मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक बंदर अब्बास, केश्म, मूसा और चाबहार जैसी पोर्ट सिटी में भी धमाके की आवाजें सुनी जा रही हैं। दो सप्ताह पहले किया गया समझौता और सीजफायर एक तरह से खटाई में पड़ गया है।

    इस बार लड़ाई होर्मुज को लेकर है। ईरान ने होर्मुज के अंदर एक अलग रास्ता बना दिया है और उसका कहना है कि इसी रास्ते से जहाजों को उसके नियंत्रण में गुजरना है। जबकि अमेरिका एक अलग कॉरिडोर चलाने के प्रयास में है। ऐसे में लड़ाई होर्मुज के अंदर अलग-अलगर रास्तों को लेकर है।

    अमेरिका ने दिया 24 घंटे का अल्टिमेटम
    अमेरिका के सुझाए रास्ते से जब जहाज गुजरते हैं तो ईरान उनपर हमला कर देता है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान को धमकी देते हुए कहा है कि होर्मुज को सार्वजनिक तौर पर खुला हुआ डिक्लेयर कर दिया जाए। अगर 24 घंटे के अंदर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बुरा होने वाला है। बता दें कि होर्मुज के रास्ते से ही दुनियाभर के तेल का पांचवां हिस्सा सप्लाई होता है। 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के बाद समझौता होने तक इस रास्ते में हजारों जहाज फंसे रहे और पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया।

    अमेरिका ने कहा कि ईरान को यह संदेश क्षेत्रीय मध्यस्थों के जरिए भेज दिया गया है। ऐक्सियस की रिपोर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन चाहता है कि ईरान सार्वजनिक तौर पर ऐलान करे कि होर्मुज सबके लिए खुला है। इसके अलावा ईरान कसम खा ले कि वह किसी भी कमर्शियल शिप को निशाना नहीं बनाएगा। अमेरिका अधिकारियों ने कहा, ट्रंप यही चाहते हैं कि होर्मुज के सारे शिपिंग चैनल बिना किसी शुल्क के खोल दिए जाएं।

    अमेरिका ने कहा कि ईरान पिछले सप्ताह हुए समझौते का उल्लंघन कर रहा है। शनिवार को ओमान और ईरान के अधिकारी मस्कट में मुलाकात कर सकते हैं। अमेरिका के अधिकारी भी बैठक में शामिल हो सकते हैं। एक दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान ने उनसे बात करने का अनुरोध किया था और वह बात करने के लिए सहमत हो गए हैं।

    ट्रंप का यह बयान अमेरिकी वायुसेना के ईरान के प्रमुख ठिकानों पर कुछ दिन पहले की गई भीषण बमबारी के बाद आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी लड़ाकू विमानों और मिसाइलों ने ईरान के पश्चिमी हिस्से में स्थित महत्वपूर्ण बिजली उपकरण निर्माण संयंत्रों, बड़े बिजली घरों और खारे पानी को मीठा बनाने वाले तटीय बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया। तब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने दावा किया था कि इस कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की उस आर्थिक और तकनीकी क्षमता को पंगु बनाना है जिसका उपयोग सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसी बीच इजरायल की ओर से यह संकेत मिला है कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है। हालांकि इजरायली सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में शामिल होने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों और सेना को हर संभावित परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क रखा गया है।

    बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा सैन्य टकराव आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे परिदृश्य में यदि अमेरिका अपने सहयोगी देशों से समर्थन चाहता है तो इजरायल भी संभावित सैन्य अभियान का हिस्सा बन सकता है। अधिकारियों का कहना है कि देश पहले भी अपने रणनीतिक सहयोगियों के साथ सुरक्षा अभियानों में भाग ले चुका है और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहेगा।

    इजरायल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि यदि हालात की मांग हुई तो देश दोबारा कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी पक्ष क्षेत्र में नए युद्ध की स्थिति नहीं चाहता, लेकिन ईरान की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। सुरक्षा से जुड़े निर्णय क्षेत्रीय हालात और सहयोगी देशों के साथ समन्वय को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    दूसरी ओर इजरायली रक्षा बलों का आकलन है कि वर्तमान समय में ईरान भी सीधे इजरायल को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है। सेना का मानना है कि निकट भविष्य में इजरायल पर किसी बड़े हमले की आशंका सीमित है। इसके बावजूद सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई है और सभी सैन्य इकाइयों को उच्च स्तर की तैयारियों में रखा गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का तुरंत जवाब दिया जा सके।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। अमेरिका ने हालिया सैन्य कार्रवाई को इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति तथा वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि कई देशों की नजर इस क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर बनी हुई है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी हाल के दिनों में ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए गए हैं। अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसकी प्राथमिकता क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिले हैं कि कूटनीतिक विकल्पों के साथ-साथ सैन्य तैयारियों को भी बनाए रखा जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसके व्यापक असर पड़ सकते हैं। ऐसे में दुनिया की प्रमुख शक्तियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और उम्मीद की जा रही है कि तनाव को नियंत्रित रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से जारी रहेंगे।

  • अमेरिका-ईरान तनाव फिर चरम पर, सीजफायर टूटने के बाद बढ़ी सैन्य कार्रवाई, पाकिस्तान ने संयम और बातचीत की अपील की

    अमेरिका-ईरान तनाव फिर चरम पर, सीजफायर टूटने के बाद बढ़ी सैन्य कार्रवाई, पाकिस्तान ने संयम और बातचीत की अपील की


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव तेजी से बढ़ गया है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच हुआ अंतरिम युद्धविराम प्रभावी नहीं रह गया है। इससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। ताजा घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक माध्यमों से समाधान तलाशने की अपील की है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच लागू अंतरिम युद्धविराम अब प्रभावी नहीं है। उनके इस बयान के बाद क्षेत्र में सैन्य तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं, जिससे पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर व्यापक असर पड़ सकता है। हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा है कि बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं और संवाद की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त की है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सभी पक्षों से संयम बरतने, किसी भी प्रकार की उकसाने वाली कार्रवाई से बचने और विवाद का समाधान बातचीत तथा कूटनीति के माध्यम से निकालने का आग्रह किया है। पाकिस्तान ने यह भी कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए संवाद ही सबसे प्रभावी माध्यम है और यदि आवश्यकता हुई तो वह मध्यस्थता के प्रयासों में सहयोग देने के लिए तैयार है।

    क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य टकराव लंबा खिंचता है तो इसका प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है और किसी भी बड़े संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक निवेशक और विभिन्न देश इस घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    तनाव बढ़ने के साथ ऊर्जा बाजार में भी अस्थिरता देखने को मिली है। निवेशकों के बीच यह आशंका बनी हुई है कि यदि संघर्ष और व्यापक हुआ तो समुद्री व्यापार मार्गों तथा ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना बनी रहेगी, जिसका असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    ईरान की ओर से भी हालिया घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाया गया है। वहां के वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर समझौता नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर अमेरिका ने भी अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात दोहराई है। दोनों पक्षों के सख्त बयानों ने तनाव कम होने की उम्मीदों को फिलहाल कमजोर किया है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश और संगठन लगातार संयम बरतने तथा संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की अपील कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी भी प्रकार की अतिरिक्त सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को व्यापक अस्थिरता की ओर ले जा सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता और दोनों देशों की अगली रणनीति पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।

  • ट्रंप ने खुद को बताया ईरान का 'नंबर वन टारगेट'…. बोले- उनकी हत्या की रच रहा साजिश!

    ट्रंप ने खुद को बताया ईरान का 'नंबर वन टारगेट'…. बोले- उनकी हत्या की रच रहा साजिश!


    अंकारा।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को खुलकर कहा कि वे ईरान (Iran) के नंबर वन टारगेट हैं और तेहरान उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। ट्रंप ने NATO समिट के दौरान यह बयान देते हुए कहा कि ईरानी लीडरशिप (Iranian Leadership) उनसे बदला लेने पर तुली हुई है। उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि ईरान के साथ कोई समझौता अब संभव नहीं है। उनके इस बयान के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसी डर के चलते उन्होंने ईरान के साथ चल रही डील को पूरी तरह खत्म कर दिया?


    ट्रंप ने क्या कहा?

    ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान उनकी हत्या की साजिश रच रहा है। इस दौरान उन्होंने खुद को ईरान का ‘नंबर वन टारगेट’ बताया। तुर्की की राजधानी अंकारा में NATO शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा कि उनके कुछ लीडर थे जो अब नहीं रहे। उनके पास कुछ और लीडर थे जो शायद अब नहीं रहे। मैं भी शायद जाऊं, क्योंकि मैं उनका नंबर वन टारगेट हूं। वे घटिया लोग हैं। उन्होंने 47 साल से ऐसा ही किया है।

    इस दौरान ट्रंप ने ईरान की पिछली नेतृत्व व्यवस्था को दुश्मन करार दिया, लेकिन कहा कि मौजूदा लीडरशिप थोड़ी ज्यादा समझदारी से काम कर रही दिख रही है। उन्होंने साफ कहा कि वे तनाव बढ़ाने के बजाय ईरान मुद्दे को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं। बता दें कि यह बयान दोनों देशों के बीच हालिया सैन्य टकराव के बाद वॉशिंगटन और तेहरान के बढ़ते तनाव के बीच आया है।


    समझौता का प्रयास खत्म

    गौरतलब है कि ट्रंप ने कुछ घंटे पहले ही घोषणा की कि ईरान के साथ चल रही बातचीत और समझौते की कोशिशें पूरी तरह खत्म हो गई हैं। उन्होंने कहा कि उनके साथ डील करना बस समय की बर्बादी है। NATO समिट में ट्रंप ने आगे कहा कि हम आज रात उन्हें कड़ी टक्कर देंगे। वे हर दिन समझौते का उल्लंघन करते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या युद्धविराम अभी भी लागू है, तो उन्होंने जवाब दिया कि जहां तक मेरा सवाल है, यह खत्म हो चुका है।


    ईरान का जवाबी हमला

    इस बीच, ईरान ने ताजा अमेरिकी हमलों के जवाब में बुधवार को फारस की खाड़ी क्षेत्र में मिसाइलों और ड्रोन से जवाबी हमला किया। ईरानी सशस्त्र बलों ने कहा कि उन्होंने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जिसके बाद दोनों देशों में हवाई हमले के सायरन बजाये गये। अमेरिकी केंद्रीय कमान (सेंटकॉम) ने इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। उधर, कतर की मंत्रिपरिषद ने ओमान तट के निकट उसके तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) वाहक जहाज पर हुए हमले के बाद ईरान से होर्मुज में खतरनाक गतिविधियां बंद करने की मांग की है।

    कतर सरकार ने बयान में कहा कि देश अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने का अधिकार सुरक्षित रखता है। कतर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) के महासचिव आर्सेनियो डोमिंगुएज ने भी जहाज परिचालकों से फिलहाल होर्मुज से जहाज नहीं भेजने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इससे फारस की खाड़ी में फंसे लगभग 6000 नाविकों की सुरक्षा को अनावश्यक खतरा हो सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से वैश्विक तेल बाजार में उछाल, कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब; भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट

    अमेरिका-ईरान तनाव से वैश्विक तेल बाजार में उछाल, कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब; भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जिससे ब्रेंट क्रूड लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। तेल बाजार में आई इस तेजी का प्रभाव वैश्विक निवेशकों की धारणा पर भी पड़ा और भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली।

    बाजार के आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी उल्लेखनीय तेजी के साथ करीब 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी आशंकाओं ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेलने में प्रमुख भूमिका निभाई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

    तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमलों की जानकारी देते हुए कहा कि हालिया घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम प्रभावी नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व की तीखी आलोचना करते हुए भविष्य में किसी समझौते या वार्ता की संभावना पर भी संदेह व्यक्त किया।

    होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या सुरक्षा जोखिम अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों पर तत्काल प्रभाव डालता है। निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों की नजर फिलहाल इस क्षेत्र की स्थिति पर बनी हुई है, क्योंकि आगे की घटनाएं तेल की कीमतों की दिशा तय कर सकती हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सेंसेक्स में 1,600 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी दो प्रतिशत से ज्यादा फिसल गया। इसके साथ ही मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंची तेल कीमतें आयात लागत बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई, चालू खाते के घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। ऊर्जा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य तेल-निर्भर क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों की निगाहें मध्य पूर्व की स्थिति, कूटनीतिक प्रयासों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े आगामी घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर आने वाले दिनों में तेल बाजार और शेयर बाजार की दिशा तय होगी।

  • कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी

    कच्चे तेल में उछाल और वैश्विक तनाव का असर, तीन महीने की सबसे बड़ी गिरावट के साथ धड़ाम हुए सेंसेक्स-निफ्टी


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर बुधवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। वैश्विक स्तर पर बढ़ी अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और निवेशकों की सतर्कता के चलते घरेलू बाजार में पूरे कारोबारी सत्र के दौरान बिकवाली हावी रही। दिन के अंत में प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ बंद हुए। इसके साथ ही पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी तेजी का सिलसिला भी थम गया और निवेशकों की संपत्ति में एक ही दिन में 8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई।

    बाजार बंद होने पर बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1,677.12 अंक यानी 2.15 प्रतिशत टूटकर 76,503.60 अंक पर बंद हुआ। वहीं एनएसई का निफ्टी 50 भी 516.65 अंक यानी 2.12 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,882.05 अंक पर पहुंच गया। कारोबार के दौरान दोनों सूचकांकों ने दिन का निचला स्तर भी छुआ और पिछले तीन महीनों की सबसे बड़ी दैनिक गिरावट दर्ज की।

    गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी उल्लेखनीय कमजोरी के साथ बंद हुए। इससे स्पष्ट संकेत मिला कि बिकवाली लगभग सभी वर्गों के शेयरों में फैली रही और निवेशकों ने जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाना उचित समझा।

    सेक्टरवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो बैंकिंग, निजी बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, एफएमसीजी, मीडिया, ऑटो, ऑयल एंड गैस तथा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के शेयरों में सबसे अधिक दबाव रहा। हालांकि फार्मा और मेटल क्षेत्र में भी गिरावट दर्ज हुई, लेकिन अन्य क्षेत्रों की तुलना में नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता के दौरान निवेशक रक्षात्मक क्षेत्रों की ओर झुकाव दिखाते हैं, जिससे कुछ सेक्टरों में गिरावट सीमित रही।

    दिनभर की बिकवाली का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ा तनाव माना गया। हालिया घटनाक्रम के बाद पश्चिम एशिया में हालात फिर से संवेदनशील हो गए हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी ने आयातक देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए कच्चे तेल की महंगाई का असर महंगाई, व्यापार घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर पड़ सकता है।

    विदेशी घटनाक्रम का असर भारतीय मुद्रा पर भी दिखाई दिया। रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर बंद हुआ, जिससे आयात लागत बढ़ने की आशंका और मजबूत हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं तो भारतीय बाजारों में निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

    तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 23,780 से 23,750 अंक का दायरा महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है। यदि सूचकांक इस स्तर से नीचे टिकता है तो गिरावट और गहरी हो सकती है। वहीं 24,020 से 24,050 अंक का स्तर निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध रहेगा। बाजार की अगली दिशा काफी हद तक वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर निर्भर करेगी। निवेशकों को फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाने और अंतरराष्ट्रीय संकेतों पर लगातार नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

    अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। बुधवार को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती सत्र में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स 78 हजार के स्तर से नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी में भी उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। वैश्विक अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।

    शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूटकर 77 हजार के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 24,300 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार में बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने व्यापक स्तर पर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई।

    क्षेत्रवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऑयल एवं गैस, ऑटो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, कमोडिटी और एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर फार्मा, हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में निवेशक ऐसे क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

    वैश्विक बाजारों में भी मिश्रित संकेत देखने को मिले। एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में दबाव के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाहें अब पश्चिम एशिया की स्थिति और उससे जुड़े अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का पड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल का प्रभाव शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया।

    निवेशक फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर यदि स्थिति सामान्य होती है तो निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर अल्पकालिक अस्थिरता पैदा करती हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं।

    एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है।

    नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है।

    इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है।

    साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।