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  • ईरान से युद्ध जीते तो सस्ता होगा तेल-गैस, ट्रंप का दावा; एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयास बिगाड़ने का आरोप

    ईरान से युद्ध जीते तो सस्ता होगा तेल-गैस, ट्रंप का दावा; एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयास बिगाड़ने का आरोप

    वाशिंगट। अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि युद्ध में अमेरिका की जीत के बाद तेल और गैस की कीमतों में बड़ी गिरावट आएगी। ट्रंप ने कहा कि गैस की कीमत पहले तीन डॉलर प्रति गैलन तक आ सकती है और बाद में यह दो डॉलर प्रति गैलन से भी नीचे जा सकती है। दूसरी ओर ईरान ने अपनी ऊर्जा सुविधाओं और तेल टैंकरों पर किसी भी हमले की स्थिति में अमेरिका को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है।

    तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने इस्राइल पर अमेरिका और ईरान के बीच शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है। वहीं, इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरानी शासन के अंत को अपना प्रमुख लक्ष्य बताते हुए कहा है कि तेहरान की सरकार कमजोर पड़ चुकी है।

    ट्रंप का दावा- युद्ध के बाद घटेंगी तेल और गैस की कीमतें

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को अपने ट्रुथ सोशल अकाउंट पर कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध में जीत हासिल करने के बाद तेल की कीमतों में तेज गिरावट आएगी। उन्होंने कहा कि गैस की कीमत करीब तीन डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है और अंततः दो डॉलर प्रति गैलन से भी नीचे जाने की संभावना है।

    ट्रंप ने एक बार फिर कहा कि अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं देगा।

    ईरान ने ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले की दी चेतावनी

    ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने अमेरिका को ईरान की ऊर्जा सुविधाओं पर हमला करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि ईरान का तेल और गैस उत्पादन तंत्र व्यापक क्षेत्र में फैला हुआ है और उसकी सुरक्षा आसान नहीं है।

    गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान की संपत्तियों को निशाना बनाया गया तो ईरान भी जवाबी कार्रवाई करेगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान पहले ही इस तरह के जवाब की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है।

    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिकी अधिकारियों की ओर से ईरान के तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने की बात कही जा रही है।

    अमेरिकी अधिकारियों ने तेल टैंकरों को लेकर दी चेतावनी

    अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ ने कहा है कि यदि ईरान अमेरिकी जहाजों पर हमला करता है तो अमेरिका उसके तेल टैंकरों को निशाना बनाएगा। उन्होंने दावा किया कि ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान हो चुका है।

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने तीन ईरानी कच्चे तेल के टैंकरों पर कार्रवाई का वीडियो भी साझा किया है। अमेरिकी कमांड के अनुसार, ये टैंकर ऐसे नेटवर्क का हिस्सा थे, जिसके माध्यम से ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को आर्थिक मदद मिलती थी।

    सेंटकॉम कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने कहा कि अमेरिकी जहाजों पर हमला होने की स्थिति में ईरान की तेल आपूर्ति पर और बड़ी आर्थिक कीमत थोपी जा सकती है।

    एर्दोगन ने इस्राइल पर लगाया शांति प्रयासों को नुकसान पहुंचाने का आरोप

    तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के लिए इस्राइल को जिम्मेदार ठहराते हुए उस पर शांति प्रयासों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस्राइल की कार्रवाई के कारण जून में ईरान और अमेरिका के बीच हुआ 14 सूत्री इस्लामाबाद समझौता प्रभावित हुआ।

    एर्दोगन के अनुसार, युद्ध का असर केवल ईरान और खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जब तक शांति को खतरे के रूप में देखने वाली सोच में बदलाव नहीं आता, तब तक क्षेत्रीय संकट समाप्त करना मुश्किल होगा।

    बताया गया है कि प्रस्तावित समझौते में सैन्य कार्रवाई रोकने, होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, प्रतिबंधों में राहत और ईरान के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर के अमेरिकी समर्थित आर्थिक विकास कार्यक्रम जैसे प्रावधान शामिल थे।

    नेतन्याहू बोले- ईरानी शासन का अंत करीब

    इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि ईरान की सरकार कमजोर हो चुकी है और उसके अस्तित्व पर संकट है। उन्होंने कहा कि ईरानी शासन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।

    नेतन्याहू ने कहा कि इस्राइल अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और अपने दुश्मनों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा। उन्होंने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें इस्राइल को आजमाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि ईरानी शासन को समाप्त करना अभी प्रमुख लक्ष्य है और इसके पूरा होने से मध्य पूर्व की स्थिति तथा क्षेत्र के लोगों का इतिहास स्थायी रूप से बदल सकता है।

  • ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती

    ट्रंप की रेटिंग ऑल टाइम लो, मिडटर्म में रिपब्लिकन के लिए बढ़ी चुनौती


    नई दिल्ली। अमेरिका में मिडटर्म चुनाव का काउंटडाउन शुरू होते ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट रिपब्लिकन पार्टी के लिए चिंता का कारण बन गई है। चुनाव से करीब दो महीने पहले सामने आए ताजा सर्वे में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, मतदाताओं के बीच डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन पर बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। ऐसे संकेत हैं कि नवंबर में होने वाले चुनाव में डेमोक्रेट्स प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में वापसी कर सकते हैं।

    रॉयटर्स और इप्सॉस के ताजा सर्वे के मुताबिक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग ऑल टाइम लो पर है। बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक ईरान युद्ध और देश की आर्थिक स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। ट्रंप की घटती लोकप्रियता का सीधा असर रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    सर्वे में रजिस्टर्ड वोटरों से पूछा गया कि अगर अभी कांग्रेस के चुनाव कराए जाएं तो वे किस पार्टी के उम्मीदवार को वोट देंगे। जवाबों में डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन पर 5 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली। खास बात यह है कि डेमोक्रेट समर्थक चुनाव को लेकर रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में ज्यादा उत्साहित नजर आए।

    हाउस में बहुमत का बेहद करीबी मुकाबला

    मिडटर्म चुनाव में सबसे बड़ा मुकाबला प्रतिनिधि सभा को लेकर माना जा रहा है। फिलहाल हाउस में रिपब्लिकन के पास 218 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 214 सीटें हैं। बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए डेमोक्रेट्स को केवल 3 सीटें और हासिल करनी होंगी। करीब 50 सीटों पर मुकाबला कड़ा माना जा रहा है, ऐसे में कुछ सीटों के नतीजे ही सदन का पूरा समीकरण बदल सकते हैं।

    अगर डेमोक्रेट्स हाउस में बहुमत हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। उनके पास प्रशासन के खिलाफ कई जांच शुरू करने की ताकत होगी। साथ ही, सरकार को अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए डेमोक्रेट्स के साथ समझौते करने पड़ सकते हैं।

    सीनेट में भी रिपब्लिकन के सामने चुनौती

    सीनेट की तस्वीर फिलहाल हाउस की तुलना में कम स्पष्ट है, लेकिन यहां भी कई सीटों पर मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है। डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल करने के लिए रिपब्लिकन की 4 सीटें जीतनी होंगी।

    अगर डेमोक्रेट्स सीनेट पर भी नियंत्रण हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप प्रशासन के लिए कई अहम नियुक्तियों को मंजूरी दिलाना मुश्किल हो सकता है। खासतौर पर राष्ट्रपति के नामित उम्मीदवारों की नियुक्ति रोकने की उनकी क्षमता बढ़ जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में किसी जज का पद खाली होने की स्थिति में सीनेट का यह समीकरण और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।

    ट्रंप की लोकप्रियता क्यों बन रही चुनावी मुद्दा?

    अमेरिका में मिडटर्म चुनाव को अक्सर मौजूदा राष्ट्रपति के कार्यकाल पर जनता के अप्रत्यक्ष जनमत संग्रह के तौर पर देखा जाता है। राष्ट्रपति की पार्टी को इन चुनावों में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। इस बार ट्रंप की कम अप्रूवल रेटिंग रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।

    इतिहास भी रिपब्लिकन के लिए ज्यादा राहत देने वाला नहीं है। 1938 के बाद से केवल दो मिडटर्म चुनाव ऐसे रहे हैं, जब राष्ट्रपति की पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई। ऐसे में नवंबर का चुनाव सिर्फ ट्रंप की लोकप्रियता की परीक्षा नहीं, बल्कि संसद में रिपब्लिकन की मौजूदा पकड़ बचाने की भी बड़ी लड़ाई माना जा रहा है।

  • APEC समिट में पहुंचेंगे पुतिन और ट्रंप…. रूस-अमेरिका-चीन के बीच हो सकती है त्रिपक्षीय बैठक

    APEC समिट में पहुंचेंगे पुतिन और ट्रंप…. रूस-अमेरिका-चीन के बीच हो सकती है त्रिपक्षीय बैठक


    मॉस्को।
    एपेक शिखर सम्मेलन (APEC Summit) के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हो सकती है। रूसी समाचार एजेंसी TASSS ने रविवार को बताया कि एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (Asia-Pacific Economic Cooperation- APEC) शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अपने अमेरिकी समकक्ष डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात कर सकते हैं। क्रेमलिन ने यह भी स्पष्ट किया है कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं की त्रिपक्षीय बैठक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    क्रेमलिन के सहयोगी यूरी उशाकोव ने कहा कि पुतिन और ट्रंप दोनों एपेक शिखर सम्मेलन में भाग लेने की योजना बना रहे हैं। मॉस्को रूसी राष्ट्रपति के लिए अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें आयोजित करने का प्रयास करेगा, जिनमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मुलाकात भी शामिल है।

    उशाकोव ने कहा कि सभी नेता एपेक शिखर सम्मेलन में भाग लेने की योजना बना रहे हैं। स्वाभाविक रूप से हम अपने नेता के लिए अलग बैठकें आयोजित करने का प्रयास करेंगे, जिनमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक भी शामिल है। और अगर अवसर मिला, तो हमारे नेता अमेरिका के राष्ट्रपति से भी मिलेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पुतिन-ट्रंप मुलाकात होती है, तो बातचीत का विषय बैठक की अवधि पर निर्भर करेगा।

    इस बीच उप विदेश मंत्री सर्गेई रियाबकोव ने कहा कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं की त्रिपक्षीय बैठक की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि ऐसी बैठक की तैयारी अभी शुरू नहीं हुई है। रियाबकोव ने TASSS से कहा कि यह विचार मौजूद है और इसे सार्वजनिक मंच पर रखा जा चुका है। हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि यह तैयारी के चरण में आगे बढ़ रहा है।

    उन्होंने जोर दिया कि मुख्य प्रश्न ऐसी बैठक का ठोस एजेंडा और अपेक्षित परिणाम तय करना होगा। उन्होंने कहा कि यहां भी मुख्य प्रश्न यही है कि ठोस पक्ष को कैसे तैयार किया जाएगा और हम परिणाम के रूप में क्या अपेक्षा कर सकते हैं। रियाबकोव ने आगे कहा कि रूस, चीन और अमेरिका के नेताओं वाला त्रिपक्षीय प्रारूप अभी व्यवहार में नहीं आया है। उन्होंने किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर फिलहाल कुछ और जोड़ने से इनकार कर दिया।

    वहीं, अमेरिका-रूस राजनयिक संपर्क के संदर्भ में क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने रविवार को कहा कि राष्ट्रपति पुतिन की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर के साथ मुलाकात ने संचार के इस माध्यम से विश्वास का माहौल दर्शाया है। पेस्कोव ने आगे कहा कि बैठक का होना ही इस बात का प्रमाण है कि कम से कम संचार के इस माध्यम से विश्वास का माहौल मौजूद है और यह मजबूत हो रहा है।

  • भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना

    भारत दौरे पर बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने संरक्षणवाद पर जताई चिंता, अमेरिका और चीन की व्यापार रणनीतियों पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । 
    भारत दौरे पर आए बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति और चीन की आर्थिक रणनीतियों को लेकर परोक्ष रूप से तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने बिना किसी देश या नेता का नाम लिए कहा कि व्यापार में मनमाने प्रतिबंध, अचानक लगाए जाने वाले टैरिफ और बाजारों को व्यवस्थित तरीके से प्रभावित करने की कोशिशें वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं।

    डी वेवर भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से जुड़ी उच्चस्तरीय चर्चा के दौरान बोल रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने संरक्षणवाद और अप्रत्याशित व्यापारिक फैसलों की आलोचना करते हुए कहा कि दुनिया में ऐसे फैसलों का चलन बढ़ रहा है, जिनमें किसी देश की व्यापार नीति अचानक बदल जाती है। उन्होंने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अस्थिरता पैदा करने वाला बताया।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि कुछ लोग एक दिन व्यापार संबंधी फैसला लेते हैं और कुछ समय बाद उसी फैसले को वापस ले लेते हैं, फिर उसे दोबारा लागू कर देते हैं। उनकी इस टिप्पणी पर कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच हंसी और तालियां भी सुनाई दीं। इसके बाद डी वेवर ने संकेत दिया कि उपस्थित लोग समझ रहे हैं कि उनका इशारा किस दिशा में है।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी का नाम नहीं ले रहे हैं। हालांकि, उनके बयान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति पर परोक्ष टिप्पणी के रूप में देखा गया। ट्रंप प्रशासन की ओर से अलग-अलग देशों और व्यापारिक साझेदारों पर शुल्क लगाने तथा व्यापारिक नीतियों में बदलाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा होती रही है।

    डी वेवर ने केवल अमेरिकी व्यापार नीति तक अपनी टिप्पणी सीमित नहीं रखी। उन्होंने चीन की आर्थिक गतिविधियों और बाजारों को प्रभावित करने वाली रणनीतियों की ओर भी संकेत किया। उनका कहना था कि कुछ देश जानबूझकर और व्यवस्थित तरीके से बाजारों में ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिससे उनके व्यापारिक साझेदारों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है।

    बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार, इस तरह की रणनीतियों का उद्देश्य दूसरे देशों को आर्थिक रूप से कमजोर करना और उनकी निर्भरता बढ़ाना हो सकता है। उन्होंने संरक्षणवाद और अनुचित प्रतिस्पर्धा को ऐसी दो प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और देशों के बीच राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।

    उनकी टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने और मुक्त व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत यूरोपीय बाजारों के साथ व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि यूरोपीय संघ भी भारत के साथ आर्थिक संबंधों को महत्वपूर्ण मानता है।

    ऐसे माहौल में बेल्जियम के प्रधानमंत्री का संरक्षणवाद के खिलाफ बयान भारत-यूरोपीय संघ व्यापार वार्ता के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को लेकर विभिन्न देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में स्थिर और पूर्वानुमान योग्य व्यापार नीति की जरूरत लगातार रेखांकित की जा रही है।

    डी वेवर ने अपने संबोधन में यह संदेश देने की कोशिश की कि व्यापारिक साझेदारों के बीच भरोसा तभी मजबूत हो सकता है, जब नीतियों में स्थिरता और आर्थिक तर्क को प्राथमिकता मिले। उनके बयान में अमेरिका और चीन दोनों की ओर संकेत था, लेकिन उन्होंने किसी देश का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया।

    भारत यात्रा के दौरान बेल्जियम के प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी वैश्विक व्यापार व्यवस्था में चल रहे बदलावों और बढ़ते संरक्षणवाद के बीच सामने आई है। उनका जोर इस बात पर रहा कि मनमाने व्यापारिक फैसलों और अनुचित प्रतिस्पर्धा से केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि इसका असर देशों के बीच संबंधों और व्यापक भू-राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

  • भारतीय IT प्रोफेशनल्स को एक और झटका देने की तैयारी में ट्रंप…. H-1B वीजा पर बढ़ेगी फीस

    भारतीय IT प्रोफेशनल्स को एक और झटका देने की तैयारी में ट्रंप…. H-1B वीजा पर बढ़ेगी फीस


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में काम करने का सपना देख रहे भारतीय IT प्रोफेशनल्स (Indian IT Professionals) के लिए H-1B वीजा (H-1B Visa) को लेकर मुश्किलें बढ़ सकती हैं. ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वर्कर वीजा पर 1 लाख डॉलर से ज्यादा की फीस लगाने का प्रस्ताव पेश किया है. प्रस्ताव के तहत यह फीस 1,03,265 डॉलर तय की जा सकती है. खास बात यह है कि नई फीस सिर्फ विदेश से आवेदन करने वालों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि ज्यादातर नए H-1B आवेदकों पर लागू हो सकती है>

    अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (U.S. Department of Homeland Security) ने इस प्रस्ताव को फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया है. अगर इसे अंतिम मंजूरी मिल जाती है तो यह फीस स्थायी तौर पर लागू हो सकती है. प्रशासन इसे साल के अंत तक अंतिम रूप देने की तैयारी में है।


    पहले भी लगाई गई थी भारी फीस

    ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल H-1B वीजा पर अस्थायी तौर पर 1 लाख डॉलर की फीस लगाई थी. हालांकि, जून में एक फेडरल जज ने इस फीस को गैरकानूनी बताते हुए प्रशासन को इसे वसूलने से रोक दिया था. अब अमेरिकी प्रशासन उस फैसले के खिलाफ अपील कर रहा है. एक अपीलीय अदालत इस मामले की सुनवाई कर रही है, जबकि एक दूसरी अदालत में भी फीस को चुनौती देने से जुड़ा मामला चल रहा है।


    H-1B वीजा क्या है?

    H-1B वीजा के जरिए अमेरिकी कंपनियां खास तकनीकी और विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखती हैं. टेक्नोलॉजी, शिक्षा और रिसर्च जैसे सेक्टर में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. हर साल 65 हजार सामान्य H-1B वीजा जारी किए जाते हैं. एडवांस डिग्री वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए 20 हजार अतिरिक्त वीजा का प्रावधान है. आम तौर पर ये वीजा 3 से 6 साल तक के लिए मंजूर किए जाते हैं. ट्रंप के प्रस्ताव से पहले H-1B वीजा से जुड़ी फीस आमतौर पर करीब 2 हजार से 5 हजार डॉलर के बीच होती थी. ऐसे में 1,03,265 डॉलर की प्रस्तावित फीस कई गुना ज्यादा है।


    सभी पर नहीं पड़ेगा असर

    हालांकि, प्रस्तावित फीस हर H-1B वीजा पर लागू नहीं होगी. अमेरिका में पहले से स्टूडेंट वीजा पर मौजूद विदेशी नागरिकों को मिलने वाले नए H-1B वीजा इससे बाहर रखे जाएंगे. मौजूदा H-1B वीजा के रिन्यूअल पर भी यह फीस लागू नहीं होगी। फिर भी अगर यह नियम स्थायी होता है तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेश से नए हाई-स्किल्ड कर्मचारियों को हायर करना काफी महंगा हो सकता है. इसका असर भारत जैसे देशों के IT प्रोफेशनल्स पर पड़ने की आशंका है, जिनकी बड़ी संख्या H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम करती है।

  • अमेरिका-कनाडा व्यापार वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा तनाव, पीएम मार्क कार्नी ने अमेरिकी शुल्क का जवाब देने का ऐलान किया

    अमेरिका-कनाडा व्यापार वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा तनाव, पीएम मार्क कार्नी ने अमेरिकी शुल्क का जवाब देने का ऐलान किया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। दोनों देशों के बीच नई व्यापारिक डील को अंतिम रूप देने के लिए कई दौर की बातचीत के बावजूद सहमति नहीं बन सकी। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लागू कर दिया है। यह कदम दोनों देशों के बीच पहले से चल रहे व्यापारिक विवाद को और गहरा करने वाला माना जा रहा है।

    अमेरिकी प्रशासन के अनुसार यह शुल्क कनाडा के कुछ उत्पादों पर लगाया गया है और इसका उद्देश्य अमेरिकी व्यापारिक हितों के खिलाफ माने जा रहे कनाडाई कदमों का जवाब देना है। अमेरिका ने कनाडा पर अमेरिकी उत्पादों के साथ भेदभावपूर्ण व्यापारिक व्यवहार का आरोप लगाया है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने कहा कि कनाडा ने बातचीत के दौरान तय शर्तों के आधार पर समझौते को अंतिम रूप देने से इनकार कर दिया।

    टैरिफ लागू करने का फैसला अचानक नहीं हुआ। दोनों देशों के बीच कई सप्ताह से व्यापार समझौते को लेकर गहन बातचीत चल रही थी। अगस्त के मध्य में दोनों पक्षों के बीच प्रगति के संकेत मिले थे और अमेरिका ने नई टैरिफ व्यवस्था लागू करने की समयसीमा भी कुछ दिनों के लिए आगे बढ़ाई थी। इसके बावजूद अंतिम चरण में दोनों सरकारें किसी साझा समझौते तक नहीं पहुंच सकीं।

    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी कदम पर कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि बातचीत के दौरान कुछ महत्वपूर्ण प्रगति जरूर हुई थी, लेकिन अंतिम समय में अमेरिका की ओर से ऐसी शर्तें और बदलाव सामने आए जिन्हें कनाडा अपने हितों के अनुरूप नहीं मान सकता था। इसके बाद कनाडा ने व्यापार वार्ता को रोकने का फैसला किया है।

    कार्नी ने स्पष्ट किया है कि कनाडा अमेरिकी टैरिफ का जवाब डॉलर के बदले डॉलर के आधार पर देगा। इसका अर्थ है कि कनाडा अमेरिकी उत्पादों पर भी समान आर्थिक प्रभाव वाला शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। कनाडाई सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य अपने श्रमिकों, किसानों और कारोबारियों के हितों की रक्षा करना है।

    अमेरिकी कदम से प्रभावित होने वाले सामान कनाडा के कुल अमेरिकी निर्यात का एक सीमित हिस्सा हैं। फिर भी इसका राजनीतिक और रणनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है, क्योंकि अमेरिका और कनाडा लंबे समय से एक-दूसरे के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार रहे हैं। दोनों देशों के बीच हर वर्ष बड़े पैमाने पर वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार होता है।

    नए टैरिफ से हॉकी उपकरण, कुछ औद्योगिक उत्पाद, डेयरी और अन्य निर्धारित श्रेणियों के सामान प्रभावित हो सकते हैं। इससे कारोबारियों की लागत बढ़ने और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव आने की आशंका है। यदि कनाडा भी जवाबी शुल्क लागू करता है तो दोनों देशों के उत्पादों की कीमतों और व्यापारिक गतिविधियों पर अतिरिक्त असर पड़ सकता है।

    यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है जब दोनों देश उत्तर अमेरिकी व्यापार व्यवस्था को लेकर भविष्य की दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको के बीच मौजूदा व्यापार समझौते की समीक्षा भी आगे महत्वपूर्ण विषय बनने वाली है। ऐसे में मौजूदा टैरिफ विवाद आने वाली व्यापार वार्ताओं को और जटिल कर सकता है।

    अमेरिका और कनाडा के बीच रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश सुरक्षा, रक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के मामलों में भी लंबे समय से साझेदार रहे हैं। इसलिए व्यापारिक टकराव का असर व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल दोनों पक्षों के रुख से साफ है कि तत्काल समझौते के बजाय आर्थिक दबाव और जवाबी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

  • अमेरिका का सरकारी कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार, ट्रंप के लिए बढ़ी आर्थिक चुनौती

    अमेरिका का सरकारी कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार, ट्रंप के लिए बढ़ी आर्थिक चुनौती

    वॉशिंगटन। अमेरिका का कुल सरकारी कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार को कारोबार खत्म होने तक सरकार का कुल बकाया कर्ज बढ़कर 40.05 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया। कर्ज का यह स्तर कांग्रेस के बजट कार्यालय (CBO) के अनुमान से भी ज्यादा है।

    कर्ज में यह तेज बढ़ोतरी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती मानी जा रही है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने सरकारी खर्च कम करने और सरकारी कामकाज में दक्षता बढ़ाने का वादा किया था।

    CBO के अनुमान से भी आगे निकला कर्ज

    CBO ने वित्त वर्ष 2026 के अंत तक अमेरिका के कुल सरकारी कर्ज के करीब 39.4 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान लगाया था। लेकिन वित्त वर्ष समाप्त होने से पहले ही कर्ज इस अनुमान से ऊपर निकल गया।

    सरकारी कर्ज में तेजी के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें बढ़ता संघीय खर्च, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च तथा पुराने कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान प्रमुख हैं।

    ब्याज भुगतान ने बढ़ाई मुश्किल

    अमेरिकी सरकार के लिए कर्ज का बढ़ता ब्याज खर्च एक बड़ी चिंता बन गया है। जैसे-जैसे सरकारी कर्ज बढ़ता है, उस पर ब्याज का बोझ भी बढ़ता जाता है। इसके साथ ही महंगाई और सरकारी खर्च को लेकर बाजार में बनी चिंता के कारण सरकार के लिए नए सिरे से कर्ज लेना भी महंगा हुआ है।

    सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर लगातार बढ़ता खर्च भी अमेरिका के दीर्घकालिक वित्तीय दबाव को बढ़ा रहा है।

    ट्रंप के खर्च घटाने के दावे पर सवाल

    ट्रंप प्रशासन ने संघीय कर्मचारियों, सरकारी एजेंसियों और सरकारी खर्च में कटौती के लिए डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) के जरिए कई कदम उठाए हैं। सरकार की वेबसाइट पर फिलहाल करीब 215 अरब डॉलर की बचत का दावा किया गया है।

    हालांकि, स्वतंत्र विशेषज्ञ इन आंकड़ों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार की ओर से बताई गई बचत और वास्तव में हासिल हुई बचत में अंतर हो सकता है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि खर्च में कटौती का सरकारी कर्ज पर कितना वास्तविक असर पड़ा है।

    दोनों पार्टियों के सांसदों ने जताई चिंता

    अमेरिकी सरकारी कर्ज के 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने पर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के सांसदों की ओर से चिंता जताई गई है। बढ़ता कर्ज अमेरिका की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भविष्य के बजट पर भी दबाव बढ़ा रहा है।

    कर्ज का यह रिकॉर्ड स्तर ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका को सामाजिक योजनाओं, रक्षा और अन्य सरकारी कार्यक्रमों पर बड़े पैमाने पर खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में खर्च घटाने, टैक्स नीति और कर्ज नियंत्रण को लेकर ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव और बढ़ सकता है।

  • अमेरिका-कनाडा व्यापार विवाद निर्णायक मोड़ पर, ट्रंप की समयसीमा से पहले समझौते की कोशिशें तेज, टैरिफ बढ़ने का खतरा मंडराया

    अमेरिका-कनाडा व्यापार विवाद निर्णायक मोड़ पर, ट्रंप की समयसीमा से पहले समझौते की कोशिशें तेज, टैरिफ बढ़ने का खतरा मंडराया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और कनाडा के बीच लंबे समय से चल रहा व्यापार विवाद अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां आने वाले कुछ घंटे दोनों देशों के आर्थिक और राजनीतिक संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के साथ समझौते के लिए बुधवार दोपहर 12 बजकर 1 मिनट तक की समयसीमा तय की है। निर्धारित समय तक सहमति नहीं बनने की स्थिति में कनाडा से अमेरिका पहुंचने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है। इससे दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण व्यापारिक रिश्तों पर दबाव और बढ़ गया है।

    ट्रंप की ओर से रखी गई मांगें केवल टैरिफ व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका चाहता है कि कनाडा अधिक अमेरिकी सैन्य उपकरण खरीदे। इसके अलावा कनाडा की अमेरिका के गोल्डन डोम मिसाइल रक्षा प्रणाली में भागीदारी और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों तक अमेरिकी पहुंच भी बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल है। रणनीतिक खनिजों को लेकर अमेरिका की चिंता का संबंध चीन पर निर्भरता कम करने की व्यापक नीति से है। ऐसे खनिज आधुनिक रक्षा उपकरणों, ऊर्जा तकनीक और उच्च तकनीक वाले उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और ट्रंप के बीच पिछले दो दिनों में दो बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। कार्नी ने बातचीत को गहन और नाजुक बताया है और संकेत दिया है कि इस स्तर की चर्चा के विवरण को सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष अंतिम समय तक समझौते की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों की प्राथमिकताओं में अंतर इतना बड़ा है कि समयसीमा समाप्त होने से पहले सहमति बनना आसान नहीं माना जा रहा।

    ट्रंप का कनाडा के प्रति मौजूदा रुख पारंपरिक अमेरिकी नीति से काफी अलग दिखाई देता है। उन्होंने कनाडाई उत्पादों पर अलग-अलग स्तर के टैरिफ लगाए हैं और कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी टिप्पणियां भी की हैं। इन बयानों और व्यापारिक कदमों से कनाडा में अमेरिका के प्रति असंतोष बढ़ा है। कनाडाई सरकार पर घरेलू स्तर पर यह दबाव भी है कि वह अमेरिकी दबाव के सामने अपने आर्थिक हितों से समझौता न करे।

    अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक मतभेद हालांकि नए नहीं हैं। सॉफ्टवुड लकड़ी, डेयरी बाजार और कई अन्य उत्पादों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहे हैं। मौजूदा टैरिफ संघर्ष ने इन पुराने मतभेदों को और गंभीर बना दिया है। हॉकी स्टिक और टंग डिप्रेशर जैसे उत्पादों पर भी अमेरिकी शुल्क लगाए जाने से विवाद का दायरा स्पष्ट होता है।

    दोनों देशों के बीच करीब 5,525 मील लंबी सीमा है और इस सीमा के जरिए रोजाना लगभग 3.3 लाख लोग तथा करीब 2 अरब डॉलर का सामान आवाजाही करता है। कनाडा के कुल माल निर्यात का लगभग 72 प्रतिशत अमेरिका को जाता है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाला व्यापार युद्ध कनाडा की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है, जबकि अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी महंगे आयात और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का असर पड़ सकता है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप की तय समयसीमा समाप्त होने से पहले दोनों पक्ष कोई समझौता कर पाएंगे। अंतिम दौर की बातचीत जारी रहने से उम्मीद बनी हुई है, लेकिन अमेरिकी मांगों और कनाडा की घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के बीच संतुलन बनाना कठिन है। यदि आखिरी समय में समझौता हो जाता है तो दोनों देशों को तत्काल आर्थिक दबाव से राहत मिल सकती है, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो नए और ऊंचे टैरिफ व्यापारिक संबंधों को और तनावपूर्ण बना सकते हैं।

  • भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी SIR ….. वोटर लिस्ट की सफाई में जुटे ट्रंप, अब तक मिले 24 हजार फर्जी मतदाता

    भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी SIR ….. वोटर लिस्ट की सफाई में जुटे ट्रंप, अब तक मिले 24 हजार फर्जी मतदाता


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में वोटर लिस्ट (Voter List) की शुद्धता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने दावा किया है कि 2020 के वोटर रिकॉर्ड और नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड के मिलान किया गया है. इस दावे के मुताबिक, 12.8 करोड़ मतदाताओं के शुरुआती विश्लेषण में 24 हजार से अधिक गैर-नागरिक मतदाताओं की पहचान हुई है।

    ट्रंप ने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth पर पोस्ट की और कहा कि अब बचे हुए 3.2 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की भी जांच की जाएगी जिसके बाद यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।

    ट्रंप ने लिखा, ‘पहले 12.8 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच में यूएस सेंसस ब्यूरो ने साबित कर दिया है कि 24,000 से अधिक गैर-नागरिकों ने अवैध वोट डाले. अभी अगले 3.2 करोड़ मतदाताओं का विश्लेषण बाकी है और यह आंकड़ा और बढ़ेगा. मैं चुनाव जीता था! हमें हर हाल में ‘सेव अमेरिका एक्ट’ पास करना होगा.।

    व्हाइट हाउस द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, जिन गैर-नागरिकों के वोटर रिकॉर्ड मिले हैं उनमें मेक्सिको में जन्मे लोगों की संख्या सबसे अधिक (3,800) बताई गई है. इसके बाद कनाडा (950), फिलीपींस (900), जमैका (900), जर्मनी (700), ब्रिटेन (650), क्यूबा (450), वियतनाम (400), हैती (400) और दक्षिण कोरिया (350)का नंबर आता है. ट्रंप का दावा है कि है कि बाकी बचे 3.2 करोड़ वोटों के विश्लेषण के बाद यह संख्या और बढ़ सकती है।

    ट्रंप ने कहा कि यूएस सेंसस ब्यूरो 2020 के मतदाता रिकॉर्ड की नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड के साथ जांच कर रहा है. उन्होंने इसे चुनावी पारदर्शिता से जोड़ते हुए दावा किया कि इससे 2020 के चुनाव को लेकर उनकी पुरानी आपत्तियां पुख्ता होती हैं. हालांकि, ट्रंप के इन दावों को लेकर भी सवार उठ रहे हैं।

    इस पूरे विवाद के बीच ट्रंप ने एक बार फिर ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पारित करने की मांग दोहराई है. इस प्रस्तावित कानून के तहत संघीय चुनावों में मतदान के लिए नागरिकता का प्रमाण और फोटो पहचान पत्र अनिवार्य करने का प्रावधान है. साथ ही राज्यों को मतदाता सूचियों से गैर-नागरिकों के नाम हटाने की दिशा में भी कदम उठाने होंगे।

    भारत के चुनावी मॉडल की कर चुके हैं तारीफ
    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर भारत के चुनावी मॉडल की भी सराहना की थी. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा था कि भारत में 64.6 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया और लगभग सभी मतदाताओं के पास वैध फोटो पहचान पत्र था. ट्रंप ने भारत की मतदाता पहचान प्रणाली को अमेरिका के लिए एक उदाहरण बताया।

    हालांकि, इस मुद्दे पर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं. आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर गैर-नागरिकों के मतदान के दावों के समर्थन में पर्याप्त सार्वजनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, जबकि ट्रंप प्रशासन इसे चुनावी सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार मान रहा है।

  • ट्रंप प्रशासन ने बिग बेंड नेशनल पार्क में विवादित सीमा परियोजना पर लगाई रोक, पर्यावरणीय नुकसान को लेकर उठे थे सवाल

    ट्रंप प्रशासन ने बिग बेंड नेशनल पार्क में विवादित सीमा परियोजना पर लगाई रोक, पर्यावरणीय नुकसान को लेकर उठे थे सवाल

    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने दक्षिणी टेक्सास में बिग बेंड नेशनल पार्क से होकर गुजरने वाली विवादित सीमा परियोजना के निर्माण पर अस्थायी रोक लगा दी है। यह परियोजना लंबे समय से पर्यावरण और राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक संरचना को लेकर विवादों में रही थी। परियोजना के विरोध में उठाई गई प्रमुख आपत्तियों में क्षेत्र के संवेदनशील पर्यावरणीय भू-भाग पर संभावित असर और सीमा सुरक्षा के लिए इसकी वास्तविक जरूरत शामिल थी।

    बिग बेंड नेशनल पार्क टेक्सास के दक्षिणी हिस्से में स्थित एक विशाल और दूरस्थ प्राकृतिक क्षेत्र है। यहां का भू-भाग कठिन होने के कारण सामान्य आवाजाही पहले से ही सीमित मानी जाती है। सीमा परियोजना के आलोचकों का तर्क रहा है कि इस प्राकृतिक क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां अपने आप में प्रवासियों और तस्करों के लिए बड़ी चुनौती हैं। ऐसे में इस इलाके में अतिरिक्त सीमा अवरोध खड़ा करने की आवश्यकता पर सवाल उठाए गए।

    विवादित परियोजना को राजनीतिक स्तर पर भी विरोध का सामना करना पड़ा। आलोचकों में दोनों प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दलों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं। उनका कहना था कि सीमा सुरक्षा के उद्देश्य से बनाई जाने वाली किसी भी परियोजना में पर्यावरणीय प्रभाव और क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को ध्यान में रखना जरूरी है। विशेष रूप से राष्ट्रीय उद्यान जैसे संवेदनशील इलाके में निर्माण कार्य को लेकर अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता बताई गई।

    ट्रंप प्रशासन की ओर से परियोजना को अस्थायी रूप से रोकने का फैसला एक एजेंसी प्रमुख के टेक्सास दौरे के बाद किए गए जमीनी मूल्यांकन से जुड़ा बताया गया है। अधिकारियों की ओर से क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों को देखने और परियोजना के संभावित प्रभावों का आकलन करने के बाद निर्माण रोकने का निर्णय लिया गया।

    दक्षिणी टेक्सास में प्रस्तावित सीमा परियोजना का एक हिस्सा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र से होकर गुजरना था। इसे लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों और अन्य आलोचकों ने आशंका जताई थी कि निर्माण से प्राकृतिक भू-भाग प्रभावित हो सकता है। उनका कहना था कि बिग बेंड जैसे संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य से वहां के पारिस्थितिक संतुलन और प्राकृतिक स्वरूप पर असर पड़ सकता है।

    परियोजना पर रोक लगाए जाने के बाद अब आगे की प्रक्रिया को लेकर निगाहें प्रशासन के अगले फैसले पर टिकी हैं। अस्थायी रोक का अर्थ यह नहीं है कि परियोजना को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया गया है। प्रशासन की ओर से क्षेत्र के मूल्यांकन और परियोजना की उपयोगिता पर आगे भी विचार किया जा सकता है।

    बिग बेंड में सीमा परियोजना को लेकर विवाद अमेरिका में सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बहस को भी सामने लाता है। एक तरफ सीमा पर अवैध प्रवेश और तस्करी रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था की मांग की जाती रही है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय उद्यानों और संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों को निर्माण से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता है।

    फिलहाल ट्रंप प्रशासन के फैसले से बिग बेंड नेशनल पार्क के उस क्षेत्र में प्रस्तावित सीमा निर्माण को तत्काल राहत मिली है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे किए जाने वाले मूल्यांकन के बाद परियोजना को पूरी तरह रद्द किया जाता है या किसी संशोधित योजना के साथ इसे दोबारा आगे बढ़ाया जाता है।