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  • ट्रंप के बयान पर ईरान का पलटवार… कहा- ट्वीट कर देने से नहीं हो जाएगा होर्मुज पर कब्जा

    ट्रंप के बयान पर ईरान का पलटवार… कहा- ट्वीट कर देने से नहीं हो जाएगा होर्मुज पर कब्जा


    वाशिंगटन।
    ईरान (Iran) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ((American President Donald Trump)) के उस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने युद्ध में ईरान को हराने के बाद होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को अपना क्षेत्र घोषित करने की बात कही थी। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने एक्स पर कहा कि होर्मुज को न तो किसी ट्वीट के जरिए कब्जे में लिया जा सकता है और न ही विमानवाहक पोत, सैन्य आदेश या चुनावी भाषण के जरिए। उन्होंने कहा कि ईरान धमकियों से डरने वाला नहीं है और शक्ति प्रदर्शन के आगे झुकता नहीं है। गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि होर्मुज ईरान का था, ईरान का है और ईरान का ही रहेगा।

    उप विदेश मंत्री ने डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका को वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अब तक ईरान के खिलाफ अमेरिका को रणनीतिक और भारी नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि होर्मुज को बंद या खोलने का फैसला केवल ईरान के नियंत्रण में होगा। जब तक अमेरिका ईरान की शर्तों को स्वीकार नहीं करता और अपनी हार की वास्तविकता को नहीं मानता, तब तक ईरान स्ट्रेट पर लगाए गए अवरोध को जारी रखेगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है और होर्मुज को फिर से खोलने को लेकर बातचीत में गतिरोध बना हुआ है।


    डोनाल्ड ट्रंप ने क्या किया था दावा

    इससे पहले न्यूयॉर्क के लॉन्ग आइलैंड में रैली को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ईरान को हराने के बाद वह जल्द ही होर्मुज को अमेरिका का क्षेत्र घोषित करेंगे। ट्रंप ने इससे पहले यह भी दावा किया था कि अमेरिका का इस जलमार्ग पर पूर्ण नियंत्रण है और वह इसे अपने नियंत्रण में बनाए रखेगा। उन्होंने अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को स्टील की दीवार बताते हुए कहा कि ईरान इसका कुछ नहीं कर सकता। ट्रंप ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर किए जाने का दावा भी किया और तेहरान पर महंगाई व केवल बयानबाजी करने का आरोप लगाया।

    राष्ट्रपति ट्रंप के दावों के तुरंत बाद ईरान ने उन्हें खारिज करते हुए कहा कि होर्मुज अभी भी बंद है और ईरान की शर्तें स्वीकार होने तक इसे नहीं खोला जाएगा। अमेरिकी अधिकारियों के बार-बार किए जा रहे दावे वास्तविक स्थिति को नहीं बदल सकते। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने पर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और व्यापक संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है। मौजूदा तनाव के बीच नौसैनिक गश्त बढ़ाई गई है, कई वाणिज्यिक जहाजों ने अपने मार्गों में बदलाव किया है।

  • US: ट्रंप के नए आदेश से बदल जाएगी बच्चों के टीकाकरण की व्यवस्था….

    US: ट्रंप के नए आदेश से बदल जाएगी बच्चों के टीकाकरण की व्यवस्था….


    वॉशिंगटन ।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) के नए कार्यकारी आदेश से बच्चों के टीकाकरण (Child Vaccination) की मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव आने की संभावना है। आदेश में खसरा, गलसुआ और रूबेला यानी एमएमआर जैसे संयुक्त टीकों को अलग-अलग टीकों में बांटने और जहां संभव हो, टीकों के बीच ज्यादा अंतर रखने की बात कही गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका असर सिर्फ टीका लगाने के तरीके पर नहीं पड़ेगा, बल्कि दवा कंपनियों, डॉक्टरों और माता-पिता पर भी पड़ेगा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अमेरिका में इन बीमारियों के अलग-अलग टीके दशकों से व्यापक रूप से इस्तेमाल नहीं हुए हैं।

    ट्रंप के आदेश में आखिर क्या बदलने की बात कही गई?
    ट्रंप के आदेश के तहत संघीय अधिकारियों को 90 दिनों के भीतर एमएमआर टीके को अलग-अलग करने और दूसरे टीकों के बीच अंतर बढ़ाने की योजना तैयार करने को कहा गया है। अभी एमएमआर टीका तीनों बीमारियों से एक साथ बचाव करता है। अमेरिका में इस तीन-इन-वन व्यवस्था का इस्तेमाल 1970 के दशक से मानक रूप में हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संयुक्त टीकों से बच्चों के स्कूल जाने की उम्र तक संक्रामक बीमारियों से पूरी तरह सुरक्षित होने की संभावना बढ़ती है।

    क्या कंपनियों को दशकों पुराने टीके फिर बनाने पड़ेंगे?
    अमेरिका में फिलहाल खसरा, गलसुआ और रूबेला के अलग-अलग टीके उपलब्ध नहीं हैं। इन तीनों बीमारियों के लिए खाद्य एवं औषधि प्रशासन से मंजूर टीके संयुक्त रूप में हैं। अगर उन्हें अलग किया जाता है तो दवा कंपनियों को पुराने व्यक्तिगत टीकों का उत्पादन फिर शुरू करना होगा। इसके लिए नए अध्ययन, उत्पादन सुविधाएं और संघीय मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक नई वैक्सीन फैक्टरी तैयार करने और उसे मंजूरी मिलने में करीब पांच साल तक लग सकते हैं। इसके अलावा कंपनियों को नए उत्पादन संयंत्रों पर करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं।


    क्या अलग-अलग टीकों को मंजूरी लेना भी मुश्किल होगा?

    अलग-अलग टीकों को तैयार करने के बाद उन्हें अलग-अलग मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। पूर्व एफडीए वैक्सीन प्रमुख जेसी गुडमैन के मुताबिक कंपनियों को यह दिखाने के लिए बड़े अध्ययन करने पड़ सकते हैं कि नए व्यक्तिगत टीके बच्चों में मौजूदा टीकों जैसी प्रतिरोधक क्षमता पैदा करते हैं। साथ ही उत्पादन की नई प्रक्रिया और संयंत्र की सुरक्षा भी साबित करनी होगी। अमेरिका में दशकों से व्यक्तिगत खसरा टीके का बड़े स्तर पर उत्पादन नहीं हुआ है। इसलिए यह प्रक्रिया सामान्य बदलाव की तुलना में काफी जटिल हो सकती है।

    माता-पिता को बच्चों को लेकर कितने ज्यादा चक्कर लगाने पड़ेंगे?
    एमएमआर टीका फिलहाल दो खुराक में दिया जाता है। पहली खुराक आम तौर पर एक साल की उम्र में और दूसरी चार साल की उम्र के बाद दी जाती है। अगर हर खुराक को खसरा, गलसुआ और रूबेला के तीन अलग-अलग टीकों में बांट दिया जाए तो छह अलग-अलग टीकाकरण यात्राएं करनी पड़ सकती हैं। दूसरे संक्रामक रोगों के टीकों के बीच भी अंतर बढ़ाया गया तो डॉक्टर के चक्कर और बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों को डर है कि ज्यादा समय और खर्च के कारण कुछ माता-पिता टीकाकरण के लिए अपॉइंटमेंट छोड़ सकते हैं।


    क्या इससे बच्चों का टीकाकरण कम हो सकता?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि टीकाकरण की प्रक्रिया जितनी लंबी और महंगी होगी, उतने ही ज्यादा लोगों के बीच इसे पूरा कराना मुश्किल हो सकता है। विशेषज्ञ एना डर्बिन ने कहा कि संयुक्त टीकों को अलग करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इससे व्यवस्था कम सुविधाजनक और महंगी हो सकती है। इसके विपरीत ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव से माता-पिता को बच्चों के टीकाकरण के समय और अंतर को लेकर ज्यादा विकल्प मिलेंगे और इससे तीनों बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण दर बढ़ सकती है।


    क्या ट्रंप का यह आदेश कंपनियों को टीके बनाने के लिए मजबूर कर सकता?

    आदेश के बावजूद दवा कंपनियों को नए व्यक्तिगत टीके बनाने और मंजूरी के लिए आवेदन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कंपनियों के लिए भी अलग टीके बनाना कारोबारी रूप से आकर्षक नहीं हो सकता, क्योंकि वे पहले से संयुक्त टीके बेच रही हैं। मर्क और जीएसके ने अपने मौजूदा टीकों की सुरक्षा और प्रभावशीलता पर भरोसा जताया है। मर्क ने कहा है कि अब तक ऐसा कोई प्रकाशित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, जो एमएमआर टीके को तीन अलग-अलग टीकों में बांटने से कोई फायदा दिखाता हो।


    क्या यह आदेश तुरंत लागू हो जाएगा?

    ट्रंप के आदेश के बावजूद बदलाव तुरंत लागू होना तय नहीं है। संघीय अधिकारियों को पहले योजनाएं तैयार करनी होंगी और फिर अलग-अलग टीकों के विकास, उत्पादन और मंजूरी की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। विशेषज्ञों ने भी इसकी कानूनी और व्यावहारिक प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं। व्हाइट हाउस और एफडीए दवा कंपनियों को नए टीके विकसित करने के लिए सीधे मजबूर नहीं कर सकते। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के आदेश और वास्तविक टीकाकरण व्यवस्था में बदलाव के बीच लंबी प्रक्रिया हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले समय में इस योजना को लेकर वैज्ञानिक, कारोबारी और कानूनी स्तर पर बहस तेज होने की संभावना है।

  • ट्रंप का समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का दावा…. बोले- होर्मुज में अमेरिका ने खड़ी की स्टील की दीवार

    ट्रंप का समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का दावा…. बोले- होर्मुज में अमेरिका ने खड़ी की स्टील की दीवार


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा है कि अल्लाह का शुक्र है कि अमेरिका (America) ने होर्मुज समुद्री मार्ग (Strait of Hormuz Maritime Route) में स्टील की दीवार खड़ी कर दी है और आगे भी उसे बरकरार रखेगा। उन्होंने इस अहम समुद्री मार्ग पर अमेरिकी नियंत्रण का दावा किया है। ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने अमेरिकी नौसेना की इस कार्रवाई की सफलता की तारीफ की और दावा किया कि इसे “स्टील की दीवार” बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब ईरान इसके बारे में कुछ नहीं कर सकता।

    ट्रंप ने बार-बार दावा किया है कि अमेरिका इस अहम जल मार्ग को कंट्रोल करता है, जो मिडिल ईस्ट से तेल-गैस और दूसरी चीज़ों के निर्यात के के लिए ज़रूरी है। दूसरी तरफ ईरान ने ट्रंप के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। दरअसल, ईरान होर्मुज जलमार्ग में एक टोल सिस्टम लागू करना चाहता है। इसीलिए उसने कई बार उन जहाज़ों पर हमला किया है। ईरान का कहना है कि वह 28 फरवरी को ट्रंप द्वारा शुरू किए गए युद्ध के जवाब में उसके पसंदीदा रास्ते को रोक रहा है।


    ईरान को कीमत चुकानी होगी

    इस बीच, ट्रंप ने होर्मुज पर नियंत्रण का दावा करते हुए कहा कि अगर ईरान स्थिति बदलने की कोशिश करता है तो उसे इसकी कीमत चुकानी होगी। उन्होंने कहा, “होर्मुज जलडमरूमध्य पर हमारा पूरा नियंत्रण है। उनका इसपर कोई नियंत्रण नहीं। हम उसे चला रहे हैं। अगर ईरान कभी कुछ करने की कोशिश करता है तो उसे ‘उड़ा दिया’ जायेगा।” उन्होंने कहा कि अमेरिका इस समय मजबूत स्थिति में है और दावा किया कि ईरान ने क्षेत्र में अपना पिछला प्रभाव खो दिया है। ट्रंप ने कहा, “अभी हमारी स्थिति बहुत अच्छी है। हमारे सामने एक ऐसा देश है जो 50 वर्षों से मध्य पूर्व में दबंग बना हुआ था… अब वह पश्चिम एशिया का दबंग नहीं रहा।”


    अमेरिका और ईरान में अंतिम समझौता नहीं

    गौरतलब है कि फरवरी के अंत में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद क्षेत्र में जारी तनाव के बीच उनकी इस तरह की टिप्पणियां आई हैं। अमेरिका और ईरान अब तक टकराव खत्म करने के लिए किसी अंतिम समझौते पर नहीं पहुंच सके हैं, जबकि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जारी व्यवधानों से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा बना हुआ है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है, जहां से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के एक बड़े हिस्से की कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति गुजरती है।


    ईरानी मीडिया क्या कह रहा

    ईरान के सरकारी प्रसारक प्रेस टीवी ने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई के हवाले से कहा है कि 28 फरवरी, 2026 तक यह जलमार्ग खुला रहा था। उन्होंने पश्चिमी प्रतिबंधों की भी आलोचना की। बघाई ने कहा, “यह नहीं भूलना चाहिए कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति और उसके साथ जो कुछ हुआ, वह अमेरिका और इजरायली शासन की सैन्य आक्रामकता के कारण हुआ है, जो अब भी जारी है। जहां तक ईरान द्वारा शर्तें रखे जाने के दावों का सवाल है, उन्हें यह मामला अपनी ही सरकार के समक्ष उठाना चाहिए।” रणनीतिक जलमार्ग को लेकर तनाव अब भी संघर्ष का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस बीच, तेहरान और ओमान के बीच इस महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही के लिए व्यवस्थाओं को लेकर बातचीत जारी है।

  • US खुफिया एजेंसी का दावा….नाटो समिट के दौरान ईरानी मिसाइल के निशाने पर थे ट्रंप!

    US खुफिया एजेंसी का दावा….नाटो समिट के दौरान ईरानी मिसाइल के निशाने पर थे ट्रंप!


    वॉशिंगटन।
    नाटो शिखर सम्मेलन (NATO Summit) के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर खतरे का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को कई इनपुट मिले थे कि ईरान (Iran) को तुर्किये (Türkiye) की राजधानी अंकारा में ट्रंप के ठिकाने की सटीक जानकारी थी। बताया गया कि ईरानी एजेंटों को उस होटल की मंजिल तक की जानकारी थी, जहां ट्रंप ठहरे हुए थे। सुरक्षा अधिकारियों ने इसी दौरान ट्रंप को निशाना बनाने वाले संभावित सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल खतरे का भी पता लगाया।


    क्या ट्रंप को मिसाइल से निशाना बनाने की तैयारी थी?

    खतरे का आकलन इतना गंभीर बताया गया कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने असाधारण सुरक्षा योजना तैयार की। रिपोर्ट के मुताबिक, नाटो सम्मेलन के आसपास एक व्यक्ति को कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल के साथ भी देखा गया था। साथ ही ऐसी जानकारी सामने आई कि ट्रंप को ले जाने वाले विमान को निशाना बनाया जा सकता है। इसके बाद ट्रंप की आवाजाही को सार्वजनिक रूप से सामान्य दिखाते हुए उन्हें गुप्त तरीके से दूसरे विमान में भेजने की योजना बनाई गई।


    ट्रंप को एयरपोर्ट से गुप्त तरीके से कैसे निकाला गया?

    सुरक्षा योजना के तहत ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से पुराने एयरफोर्स वन में सवार होने का दृश्य दिया। इसके बाद उन्हें एयरपोर्ट के अंदर एक कैटरिंग कंटेनर के जरिए गुप्त रूप से बाहर निकाला गया और सैन्य विमान से तुर्किये से बाहर ले जाया गया। दूसरी ओर, मूल एयरफोर्स वन को अंकारा से ब्रिटेन के लिए रवाना किया गया। इसमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो, वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और व्हाइट हाउस के वरिष्ठ सहयोगी स्टीफन मिलर तथा स्टीवन च्यूंग समेत कई अधिकारी मौजूद थे।


    क्या एयरफोर्स वन में बैठे लोगों को खतरे की जानकारी थी?

    रिपोर्ट के मुताबिक, मूल एयरफोर्स वन में मौजूद सभी यात्रियों को खतरे की पूरी गंभीरता की जानकारी नहीं दी गई थी। 8 जुलाई को अंकारा से ब्रिटेन की उड़ान के दौरान यात्रियों को विमान की खिड़कियों के पर्दे बंद रखने का निर्देश दिया गया। बाद में ट्रंप गुप्त रूप से फिर एयरफोर्स वन में शामिल हो गए और कैमरों के सामने ऐसे दिखाई दिए, जैसे वह पूरे समय उसी विमान में रहे हों। इस पूरी कार्रवाई को लेकर पूर्व व्हाइट हाउस अधिकारियों के बीच भी सवाल उठे हैं।


    क्या ट्रंप की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम सही था?

    इस सुरक्षा अभियान को लेकर दो तरह की राय सामने आई है। कुछ पूर्व अधिकारियों का मानना है कि जिस विमान को डिकॉय बनाया गया, उसमें मौजूद लोगों को खतरे की जानकारी दी जानी चाहिए थी। वहीं, इस फैसले का बचाव करने वालों का तर्क है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए विश्वसनीय खतरे की स्थिति में असाधारण कदम उठाना जरूरी था। ट्रंप ने बाद में कहा कि उन्होंने सीक्रेट सर्विस के निर्देशों का पालन किया और इस दावे को खारिज किया कि विमान में मौजूद लोगों को जानबूझकर ज्यादा खतरे में डाला गया।

  • गाजा में युद्धविराम की अमेरिकी पहल को झटका, नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ अभियान रोकने से इनकार किया

    गाजा में युद्धविराम की अमेरिकी पहल को झटका, नेतन्याहू ने हमास के खिलाफ अभियान रोकने से इनकार किया

    नई दिल्ली ।गाजा में जारी संघर्ष को खत्म करने और स्थायी शांति की दिशा में अमेरिका की कोशिशों को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के रुख से नया झटका लग सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रस्तावित गाजा फेस-2 योजना को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आने की बात कही जा रही है। नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिया है कि हमास के पूरी तरह निरस्त्रीकरण तक इजरायली सैन्य कार्रवाई समाप्त नहीं होगी।

    अमेरिका की पहल के तहत गाजा में युद्ध को रोकने, इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी और हमास के हथियार छोड़ने जैसे मुद्दों पर जोर दिया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप की प्रस्तावित 15 सूत्रीय योजना का उद्देश्य संघर्ष को एक नए चरण में ले जाना और गाजा में सुरक्षा तथा प्रशासन से जुड़ी व्यवस्था तैयार करना है।

    योजना में हमास के हथियारों को धीरे-धीरे गाजा के लिए प्रस्तावित नए प्रशासनिक ढांचे को सौंपने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इजरायली सेना को कुछ निर्धारित क्षेत्रों से पीछे हटाने की बात भी शामिल है। इस व्यवस्था में एक तथाकथित येलो लाइन का जिक्र किया गया है, जिसके आसपास सैन्य स्थिति में बदलाव प्रस्तावित है।

    अमेरिकी योजना के तहत इजरायल की सैन्य कार्रवाई को उन लोगों तक सीमित करने की बात भी सामने आई है, जिन्हें तत्काल सुरक्षा खतरा माना जाए। इसका उद्देश्य व्यापक सैन्य अभियान को कम करना और गाजा में सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ना बताया जा रहा है।

    हालांकि, नेतन्याहू का रुख इन प्रस्तावों से अलग दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा है कि जब तक हमास अपने हथियार पूरी तरह नहीं छोड़ता, तब तक इजरायली सेना गाजा से पीछे नहीं हटेगी। इस रुख का सीधा अर्थ यह है कि इजरायल हमास के सैन्य ढांचे और हथियारों को पूरी तरह समाप्त करने को अपनी कार्रवाई रोकने की प्रमुख शर्त मान रहा है।

    नेतन्याहू की स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब गाजा में युद्धविराम और भविष्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत जारी है। अमेरिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इजरायल की सुरक्षा संबंधी शर्तें और हमास के हथियारों का मुद्दा किसी भी समझौते के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं।

    इजरायल का कहना है कि हमास के पास हथियार और सैन्य क्षमता रहने की स्थिति में भविष्य में फिर से हमले का खतरा बना रहेगा। इसी कारण इजरायली नेतृत्व किसी ऐसे समझौते को स्वीकार करने से बच रहा है, जिसमें सैन्य वापसी तो हो लेकिन हमास की हथियारबंद क्षमता पूरी तरह समाप्त न हो।

    दूसरी ओर, गाजा में लंबे समय से जारी सैन्य संघर्ष ने मानवीय संकट को गंभीर बनाया है। युद्धविराम की किसी भी पहल में नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता की पहुंच और भविष्य के प्रशासन का सवाल भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका की योजना को लागू कराने के लिए इजरायल और अन्य संबंधित पक्षों के बीच सहमति जरूरी होगी।

    फिलहाल गाजा फेस-2 योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अमेरिका युद्धविराम और सैन्य वापसी की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, जबकि नेतन्याहू हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण को प्राथमिक शर्त मान रहे हैं। दोनों पक्षों के रुख में यह अंतर आने वाले दिनों में बातचीत की दिशा और गाजा में सैन्य गतिविधियों पर असर डाल सकता है।

  • अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के प्रावधान वाले विधेयक को सीनेट की मंजूरी मिलने के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति से जुड़े कई फैसलों पर अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव बढ़ गया है।

    केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने देश को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने और ट्रंप के दबाव में काम करने की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप की बातों को सही या गलत की परवाह किए बिना मानते हैं और अमेरिका की ओर से भारत के खिलाफ फैसले लिए जा रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम के इस विधेयक को सीनेट में 86 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 11 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों को आर्थिक रूप से प्रभावित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों से आने वाले सामान पर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है।

    भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आने वाले प्रमुख देश हैं। इसके अलावा रूस से ऊर्जा आयात करने वाले अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि सीनेट से पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को आगे की विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके प्रावधानों के लागू होने की स्थिति अलग प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

    अमेरिका की ओर से इस कदम के पीछे रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यापार पर दबाव बनाने की रणनीति बताई गई है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूस के तेल और गैस की खरीद से मिलने वाली आय उसकी युद्ध क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। ऐसे में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर आर्थिक दबाव डालकर मॉस्को की आय को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

    विधेयक में रूस से जुड़े प्रतिबंधों के अलावा ईरान पर लागू प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का भी प्रावधान शामिल है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

    भारत में इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठा रहा है। केजरीवाल ने भी इसी राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और रूस से भारत के ऊर्जा आयात को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि अमेरिकी विधेयक आगे की प्रक्रिया में किस रूप में आगे बढ़ता है और भारत समेत प्रभावित देशों के लिए संभावित टैरिफ व्यवस्था को लेकर अमेरिका क्या कदम उठाता है।

  • अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव का असर अब भारत और चीन समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है।

    सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से जुड़े आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से सबसे अधिक तेल और गैस खरीदने वाले पांच देशों को निशाने पर लिया जा सकता है। इनमें भारत और चीन के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि इन देशों पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है।

    दरअसल, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल भारत पर इस प्रस्ताव के तहत कोई नया 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है।

    इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू इसकी अधिकतम टैरिफ सीमा है। पिछले वर्ष पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस पहल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था।

    बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस के पांच सबसे बड़े तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प रखा गया। इससे यह साफ होता है कि प्रस्तावित कानून में अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन हर देश पर अनिवार्य रूप से इतनी ही दर लागू करना जरूरी नहीं होगा।

    कानून बनने की स्थिति में ट्रंप को टैरिफ की दर तय करने में महत्वपूर्ण अधिकार मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक परिस्थितियों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को ध्यान में रखते हुए वह शुल्क में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का निर्णय कर सकते हैं।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि रूस से कच्चे तेल की खरीद पिछले कुछ वर्षों में उसकी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अमेरिकी शुल्क नीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

    प्रस्ताव में रूस के अलावा ईरान को लेकर भी सख्ती का प्रावधान है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    अब सबकी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है, जिसका नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होना है। वहां विधेयक पर चर्चा और मतदान के बाद इसकी आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सीनेट की मंजूरी अंतिम टैरिफ फैसला नहीं है। आने वाले चरणों में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा कि भारत पर वास्तविक शुल्क कितना पड़ सकता है और इसका द्विपक्षीय व्यापार पर कितना असर होगा।

  • ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा

    ईरान से बातचीत पर अमेरिका ने गिनाए प्रमुख साझेदार, पाकिस्तान का नाम गायब रहने से बढ़ी राजनीतिक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया जारी है और इसमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात तथा कतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने बयान में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान की ओर से बातचीत की पहल हुई है और कई क्षेत्रीय देशों के सहयोग से संवाद आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब, यूएई और कतर इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ट्रंप के बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल नहीं होने को कई विश्लेषक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    पिछले कुछ समय से पाकिस्तान स्वयं को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता रहा है। इस दौरान उसने दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की रणनीति अपनाई। लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका सीमित या नगण्य मानी जा रही है।

    विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं रहे हैं। ईरान पहले भी पाकिस्तान की विदेश नीति और अमेरिका के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाता रहा है। वहीं अमेरिका के कुछ नेताओं ने भी समय-समय पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर चिंता जताई है। ऐसे माहौल में ट्रंप का बयान क्षेत्रीय कूटनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पाकिस्तान को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और दावों ने भी चर्चा को प्रभावित किया है। कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तान, चीन और ईरान के बीच रक्षा सहयोग तथा हथियारों की आपूर्ति से जुड़े दावे किए गए थे। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। इन घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान की संभावित भूमिका पर भी बहस जारी है।

    इसी दौरान ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते के मुद्दे पर भी कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौते का अवसर नहीं अपनाता है तो उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप के अनुसार मौजूदा समय किसी सकारात्मक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण अवसर है और सभी पक्षों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

    हालांकि दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक वार्ता की बात से इनकार किया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि ऐसी किसी प्रत्यक्ष बातचीत की पुष्टि नहीं की जा सकती। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच संवाद को लेकर अभी भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोगी देशों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी नए समझौते का रास्ता निकलता है, इस पर वैश्विक समुदाय की नजर बनी रहेगी। साथ ही पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग

    US : ट्रंप का शवोन के CEO पर तीखा हमला….. तेल कंपनी से की पेट्रोल-डीजल के रेट घटाने की मांग


    वॉशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने तेल कंपनी शवोन (Oil company Chevron) के चेयरमैन और सीईओ माइक वर्थ (Mike Wirth) पर तीखा हमला बोला है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्थ ने कंपनी की सफलता का श्रेय अपनी नीतियों को दिया, लेकिन यह भूल गए कि उनकी सरकार की नीतियों के बिना अमेरिकी तेल उद्योग और देश दोनों मुश्किल में पड़ जाते। साथ ही उन्होंने तेल कंपनियों से उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें तुरंत कम करने की मांग भी की।


    ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर क्या कहा?

    ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि माइक वर्थ ने एक इंटरव्यू में शवोन की सफलता के कई कारण गिनाए, लेकिन उन्होंने ट्रंप प्रशासन की भूमिका का जिक्र नहीं किया। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार की दूरदर्शिता, मजबूती और स्थिर नीतियों की वजह से ही अमेरिकी तेल उद्योग आज मजबूत स्थिति में है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार नहीं होती, तो तेल उद्योग लगभग खत्म हो चुका होता।


    वेनेजुएला का भी किया जिक्र

    ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल में वेनेजुएला पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने अमेरिकी रणनीति को मजबूती दी। उनके मुताबिक, शवोन को पहले वेनेजुएला से बाहर होना पड़ा था, लेकिन अब कंपनी पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में वहां लौट रही है और बड़ा मुनाफा कमाने की उम्मीद कर रही है।


    तेल कंपनियों को दी सीधी चेतावनी

    ट्रंप ने सिर्फ शवोन ही नहीं, बल्कि अन्य तेल कंपनियों को भी खुदरा ईंधन कीमतें तुरंत कम करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आम उपभोक्ताओं को राहत मिलनी चाहिए और कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के दाम घटाने चाहिए।


    शवोन CEO ने क्या कहा था?

    इससे पहले शवोन के सीईओ माइक वर्थ ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ईरान से जुड़े युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अब भी अस्थिर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जारी संकट के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जबकि लाल सागर में जारी व्यवधान के कारण भी वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ा है।


    ईंधन कीमतों पर बढ़ा दबाव

    रिपोर्टों के अनुसार, ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में पेट्रोल की औसत कीमत 4.10 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है, जो संघर्ष शुरू होने के समय की तुलना में एक डॉलर से अधिक ज्यादा है।


    ट्रंप पर भी बढ़ रहा राजनीतिक दबाव

    ईंधन की बढ़ती कीमतों और महंगाई को लेकर ट्रंप विपक्ष के निशाने पर हैं। अमेरिका में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले बढ़ती लागत उनके लिए राजनीतिक चुनौती बनती दिख रही है। हालांकि ट्रंप का दावा है कि यदि ईरान के साथ संघर्ष समाप्त हो जाता है, तो ईंधन की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। वहीं, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि युद्ध के आर्थिक प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं और कीमतों में तत्काल बड़ी गिरावट की संभावना सीमित है।

  • सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता

    सऊदी के प्रिंस ने ट्रंप को लगाया फोन…. ईरान पर अमेरिकी सेना के हमले के प्लान पर जताई चिंता


    नई दिल्ली।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Crown Prince Mohammed bin Salman) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) से फोन पर बात की है. इस दौरान उन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना की बड़े पैमाने पर नए हमले करने के प्लान पर चिंता जताई है।

    दो अमेरिकी अधिकारियों और इस फोन कॉल की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने इस बातचीत की पुष्टि की है. सूत्र ने ‘एक्सियोस’ को बताया, ‘सऊदी अरब ने अमेरिका की इस प्लानिंग पर गंभीर चिंता जताई है और पूरे प्लान पर सफाई मांगी है।

    दरअसल, जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए ईरानी मिसाइल हमले और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही में हो रही रुकावटों के जवाब में ट्रंप बेहद सख्त रुख अपना रहे हैं. वो आने वाले दिनों में ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर जोरदार हमले करने के बारे में सोच रहे हैं।

    बातचीत की जानकारी रखने वाले दूसरे सूत्र ने बताया कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से हमलों को रोकने की अपील की है. हालांकि व्हाइट हाउस और वॉशिंगटन स्थित सऊदी दूतावास ने इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।


    सऊदी रक्षा मंत्री ने भी दिया शांति का संदेश

    इससे पहले, बुधवार को ट्रंप ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से मुलाकात की थी. सूत्रों के मुताबिक, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ हुई बैठक में सऊदी रक्षा मंत्री ने बताया था कि उनका देश ईरान के साथ मामले को सुलझाने और तनाव घटाने के पक्ष में है।


    ईरान ने दी धमकी

    दूसरी तरफ, ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो वो इजरायल और खाड़ी देशों के ऊर्जा और बुनियादी ठिकानों पर पलटवार करेगा. ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्रियों से बात की।

    अपने टेलीग्राम चैनल पर जारी बयान के मुताबिक अराघची ने सऊदी विदेश मंत्री से कहा, ‘अमेरिका या इजरायल की किसी भी कार्रवाई या उसमें क्षेत्रीय देशों की भागीदारी का ईरान के सशस्त्र बल करारा और बराबर का जवाब देंगे।


    कतर कर रहा मध्यस्थता की कोशिश

    बता दें कि मिडिल-ईस्ट की जंग रोकने के लिए सऊदी अरब के साथ-साथ कतर, UAE, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश भी अमेरिका और ईरान पर दबाव बना रहे हैं. शनिवार को कतर ने ईरानी विदेश मंत्री, व्हाइट हाउस के दूत स्टीव विटकॉफ और ओमान के अधिकारियों से अलग-अलग बातचीत की, ताकि होर्मुज को फिर से खोलने पर सहमति बन सके।