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  • चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    नई दिल्ली । अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच हाल के महीनों में बढ़े तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है। दावा किया गया है कि चीन, पाकिस्तान के रास्ते ईरान को 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) या रॉकेट लॉन्चर उपलब्ध कराने की तैयारी में है। इन दावों के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हैरानी जताते हुए कहा कि यदि चीन वास्तव में ईरान को हथियार उपलब्ध करा रहा है तो यह बेहद निराशाजनक होगा। दूसरी ओर चीन ने ऐसे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

    हालिया संघर्ष के बाद ईरान अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। इसी संदर्भ में यह दावा सामने आया कि ईरान ने चीन से 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इन हथियारों की आपूर्ति पाकिस्तान के माध्यम से गुप्त तरीके से की जा रही है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और चीन ने आधिकारिक तौर पर किसी भी प्रकार की सैन्य आपूर्ति से इनकार किया है।

    बताया जा रहा है कि इस कथित रक्षा सौदे का मूल्य लगभग 6 से 7 करोड़ डॉलर के बीच हो सकता है। यदि ऐसी कोई डील होती है तो इससे ईरान की कम दूरी की हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूती मिल सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि MANPADS जैसे सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन के खिलाफ प्रभावी माने जाते हैं। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज या सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें पहले भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार उपलब्ध नहीं कराएगा। ट्रंप ने कहा कि यदि इन रिपोर्टों में सच्चाई है तो यह उनके लिए निराशाजनक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई अप्रत्याशित घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन देशों के बीच किए गए भरोसे का सम्मान किया जाना चाहिए।

    चीन ने इन आरोपों का स्पष्ट रूप से खंडन करते हुए कहा है कि वह किसी भी अवैध हथियार आपूर्ति में शामिल नहीं है। चीन का कहना है कि उसकी विदेश नीति जिम्मेदार और संतुलित सिद्धांतों पर आधारित है तथा वह क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का पक्षधर है। ऐसे में सामने आए दावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी चर्चा में बनी हुई है। ट्रंप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिका इस तकनीकी दौड़ में चीन से आगे है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच तकनीकी, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

    फिलहाल ईरान को कथित हथियार आपूर्ति से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। चीन इन आरोपों को नकार चुका है, जबकि अमेरिका ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की है। आने वाले दिनों में यदि इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी या अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।

  • ईरान समर्थित हमले के बाद ट्रंप का कड़ा संदेश, सैन्य जवाबी कार्रवाई के संकेतों से मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव

    ईरान समर्थित हमले के बाद ट्रंप का कड़ा संदेश, सैन्य जवाबी कार्रवाई के संकेतों से मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान समर्थित समूहों की ओर से हुए हालिया हमले के बाद कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना ने आने वाली मिसाइलों को सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया, लेकिन इस घटना के बाद अब अमेरिका की ओर से जवाबी कार्रवाई का समय आ गया है। ट्रंप के इस बयान ने क्षेत्र में पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।

    वाशिंगटन में एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि हालिया हमले में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी। उनके अनुसार अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने सभी मिसाइलों को रास्ते में ही रोक दिया, जिससे किसी बड़े नुकसान की स्थिति नहीं बनी। उन्होंने अमेरिकी सैनिकों और रक्षा प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि उनकी तत्परता के कारण संभावित खतरे को समय रहते टाल दिया गया।

    राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि अमेरिका इस तरह के हमलों को नजरअंदाज नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जिन समूहों ने हमला किया है, उन्हें इसका परिणाम भुगतना होगा और अमेरिका आवश्यक होने पर सैन्य कार्रवाई करेगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि भविष्य में बातचीत और समझौते की कोई संभावना बनती है तो उसके लिए भी दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हैं। इस बयान से यह संकेत मिला कि अमेरिका एक ओर सुरक्षा के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक विकल्पों को भी पूरी तरह खारिज नहीं कर रहा है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी बलों को क्षेत्र से हटाने का फिलहाल कोई विचार नहीं है। उनके अनुसार मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और मौजूदा परिस्थितियों में उनकी तैनाती जारी रहेगी। उन्होंने भरोसा जताया कि अमेरिकी सेना किसी भी संभावित खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।

    बयान के दौरान ट्रंप ने ईरान को संभावित हथियार आपूर्ति से जुड़ी खबरों पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी तीसरे देश के माध्यम से ईरान को बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराए जाते हैं तो यह चिंताजनक होगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस विषय पर उन्हें पहले सकारात्मक आश्वासन मिल चुके हैं और उन्हें उम्मीद है कि क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाने वाले कदम नहीं उठाए जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने की भी वकालत की। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया कि मौजूदा प्रतिबंधों के अलावा अतिरिक्त आर्थिक उपायों पर भी विचार किया जाए। उनका मानना है कि आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के साथ-साथ सुरक्षा संबंधी रणनीति अपनाना आवश्यक हो सकता है।

    इस दौरान ट्रंप ने यूक्रेन संकट का भी उल्लेख किया और कहा कि उनकी इच्छा युद्ध को समाप्त करने की है। उन्होंने दोनों पक्षों के साथ संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए उम्मीद जताई कि कूटनीतिक प्रयास आगे भी जारी रहेंगे। हालांकि उनका मुख्य फोकस मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति और अमेरिकी सुरक्षा हितों पर रहा।

    हाल के दिनों में ईरान समर्थित समूहों और क्षेत्र में तैनात अमेरिकी बलों के बीच कई घटनाएं सामने आई हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ी हैं। अमेरिका पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि उसके सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर किसी भी हमले का जवाब दिया जाएगा। ऐसे में ट्रंप का ताजा बयान यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और अधिक संवेदनशील बनी रह सकती है।

  • मिडिल ईस्ट से यूक्रेन तक बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दांव नेतन्याहू और जेलेंस्की संग बंद कमरे में हुई अहम वार्ता

    मिडिल ईस्ट से यूक्रेन तक बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दांव नेतन्याहू और जेलेंस्की संग बंद कमरे में हुई अहम वार्ता


    नई दिल्ली । दुनिया इस समय एक साथ कई बड़े भू राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। एक ओर मध्य पूर्व में इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है तो दूसरी ओर रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक सुरक्षा को नई चुनौती दी है। ऐसे माहौल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से अलग अलग बंद कमरे में मुलाकात कर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इन बैठकों को अमेरिका की भविष्य की रणनीति तय करने की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार दोनों बैठकें पूरी तरह बंद कमरे में हुईं और उनकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। हालांकि व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने इन्हें सकारात्मक और रचनात्मक बताया। माना जा रहा है कि इन चर्चाओं में अमेरिका की सुरक्षा नीति सहयोगी देशों के साथ रणनीतिक तालमेल और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति पर विस्तार से विचार किया गया।

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बैठक में ईरान सबसे प्रमुख मुद्दा रहा। हाल के महीनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर अमेरिका और इजरायल लगातार चिंतित रहे हैं। बैठक से पहले ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को दिए एक बयान में कहा था कि उन्हें इजरायल की ओर से किसी विशेष ब्रीफिंग की आवश्यकता नहीं है और उन्होंने संकेत दिया था कि नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका इस पूरे मामले में सक्रिय भूमिका निभाता रहे। हालांकि बाद में ओवल ऑफिस से जारी तस्वीरों में दोनों नेता बेहद सकारात्मक माहौल में नजर आए। बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी मौजूद रहे।

    सूत्रों के अनुसार इस दौरान लेबनान सीमा पर बढ़ते तनाव हिज्बुल्लाह की गतिविधियों और अब्राहम समझौते के भविष्य जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। इन मुद्दों को मध्य पूर्व की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के साथ हुई बैठक का मुख्य फोकस रूस के खिलाफ जारी युद्ध और यूक्रेन की रक्षा जरूरतें रहीं। जेलेंस्की ने ट्रंप के साथ हुई बातचीत को रचनात्मक बताते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने पर चर्चा की। खास तौर पर पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों के लाइसेंस और एयर डिफेंस सहयोग को लेकर विचार विमर्श हुआ। रूस की ओर से लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच यूक्रेन इन रक्षा प्रणालियों को अपनी सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानता है।

    बैठक में ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और रूस के साथ संभावित शांति प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई। इसके बाद जेलेंस्की अमेरिकी सांसदों से मुलाकात के लिए कैपिटल हिल पहुंचे जहां यूक्रेन को भविष्य में सैन्य सहायता जारी रखने पर भी विचार किया गया।

    इन बैठकों से पहले ट्रंप नेतन्याहू और जेलेंस्की ने दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में भी हिस्सा लिया। ग्राहम अमेरिका में इजरायल और यूक्रेन दोनों के प्रबल समर्थक माने जाते थे और उनकी विदेश नीति पर गहरी पकड़ थी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में जब दुनिया कई मोर्चों पर अस्थिरता का सामना कर रही है तब ट्रंप की ये कूटनीतिक बैठकें आने वाले दिनों में अमेरिका की विदेश नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दे सकती हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि इन अहम बैठकों के बाद अमेरिका कौन से रणनीतिक फैसले लेता है।

  • ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका ने ईरान के खिलाफ पिछले कई दिनों से जारी रात के हवाई हमलों को फिलहाल रोक दिया है। इस फैसले के साथ ही वाशिंगटन में युद्ध के संभावित विस्तार, सैन्य संसाधनों की उपलब्धता और कूटनीतिक विकल्पों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी प्रशासन के भीतर हुई उच्चस्तरीय बैठकों में सुरक्षा, रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया, जिसके बाद अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय सामने आया।

    जानकारी के अनुसार, व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक के दौरान ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई के प्रभाव, संभावित जोखिम और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी क्रम में अभियान को कुछ समय के लिए रोकने का फैसला किया गया।

    बताया गया कि अमेरिकी सेना ने लगभग दो सप्ताह तक लगातार रात के समय सैन्य अभियान चलाया था। इसके बाद रक्षा प्रतिष्ठान की ओर से संकेत मिला कि फिलहाल सभी अभियान ‘होल्ड’ पर रखे गए हैं। हालांकि प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह निर्णय स्थायी है या परिस्थितियों के अनुसार भविष्य में इसमें बदलाव किया जा सकता है।

    बैठक के दौरान जनरल डैन केन ने विशेष रूप से सैन्य हथियारों के भंडार और लंबे समय तक अभियान जारी रहने के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने उपलब्ध सैन्य विकल्पों की प्रभावशीलता पर विश्वास जताते हुए यह भी कहा कि किसी भी आगे की कार्रवाई से पहले उसके व्यापक परिणामों का गंभीरता से आकलन किया जाना आवश्यक है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा के बाद ही सैन्य अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, हथियारों के भंडार की स्थिति बैठक में उठाए गए कई महत्वपूर्ण विषयों में से एक थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यही कारण अंतिम निर्णय का आधार बना या फिर क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका और अन्य रणनीतिक कारकों ने भी इसमें भूमिका निभाई। अमेरिकी प्रशासन ने इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अमेरिका अब भी कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है। प्रशासन का कहना है कि यदि ईरान क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां जारी रखता है या अपने सहयोगियों के माध्यम से सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न करता है, तो अमेरिका के पास सभी विकल्प उपलब्ध रहेंगे। साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के बाद ईरान के लिए बातचीत का रास्ता अपनाना अधिक व्यावहारिक होगा।

    बैठक के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिकी अधिकारी ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए हैं और विभिन्न स्तरों पर संवाद जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की रणनीति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि आवश्यक हुआ तो सैन्य अभियान दोबारा शुरू किया जा सकता है या उसकी तीव्रता भी बढ़ाई जा सकती है। उनके अनुसार, मौजूदा बातचीत में ईरान पहले की तुलना में अधिक गंभीर रुख अपनाता दिखाई दे रहा है।

    अमेरिका के इस कदम को पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि कूटनीतिक प्रयास कितने सफल होते हैं और आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है या सैन्य गतिविधियां फिर से तेज होती हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर इस घटनाक्रम का प्रभाव लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी

    ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच संघर्ष जारी है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि चीन और रूस इस संघर्ष में ईरान की मदद नहीं करेंगे. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर दोनों देश इसमें शामिल होते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

    डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बीजिंग में हाल ही में हुई मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार नहीं देगा या बेचेगा, और न ही चीनी कंपनियों के जरिए ऐसा किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने भी उनसे कहा था कि रूस तेहरान को हथियार नहीं बेचेगा।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं उन पर भरोसा करता हूं.’ उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी देश इस टकराव में ईरान की मदद कर रहा है।

    रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप की यह टिप्पणी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के सांसदों को यह बताने के कुछ दिनों बाद आई है कि रूस और चीन ऐसे मामलों में शामिल थे, जो ईरान की कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे. हालांकि उन्होंने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।

    बताया जा रहा है कि गल्फ में CIA के ठिकानों पर हुए ईरानी हमलों के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि क्या रूस ने टारगेटिंग इंफॉर्मेशन या ड्रोन तकनीक के जरिए ईरान की मदद की है. हालांकि, क्रेमलिन ने इस रिपोर्ट पर कोई भी कमेंट करने से इनकार कर दिया है।

  • सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    नई दिल्ली । अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रस्तावित असैन्य परमाणु सहयोग समझौता एक बार फिर अनिश्चितता में घिर गया है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के महज 24 घंटे के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसके लिए नई शर्त जोड़ दी। ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध सामान्य करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब दोनों देशों के बीच लगभग दो दशक से परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत चल रही थी। हाल ही में हुए हस्ताक्षर समारोह के बाद माना जा रहा था कि समझौते का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन ट्रम्प के नए बयान ने पूरी प्रक्रिया को फिर से जटिल बना दिया। अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं, जिससे समझौते की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन में आयोजित हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में समझौते की घोषणा की गई थी। बाद में यह जानकारी सामने आई कि व्हाइट हाउस इस घोषणा के समय और प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से अपनी नई शर्तों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नीति के अनुसार क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग और इजराइल के साथ संबंध सामान्य करना इस समझौते का अहम हिस्सा रहेगा।

    ट्रम्प की नई घोषणा ने सऊदी अरब को भी असमंजस में डाल दिया है। पहले तैयार किए गए मसौदे में कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सीमित परमाणु गतिविधियों की संभावना पर चर्चा हुई थी, लेकिन अब यूरेनियम संवर्धन की अनुमति को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। अमेरिका का मानना है कि संवर्धित यूरेनियम का उपयोग केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता और भविष्य में इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण वॉशिंगटन इस तकनीक को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाता है।

    इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अब्राहम अकॉर्ड्स है। वर्ष 2020 में अमेरिका की पहल पर शुरू हुए इस समझौते के तहत कई अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इस प्रक्रिया में शामिल हो। हालांकि सऊदी नेतृत्व लगातार यह कहता रहा है कि फिलिस्तीन मुद्दे पर ठोस प्रगति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के रास्ते के बिना वह इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। यही मतभेद अब परमाणु समझौते की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल आधारित मॉडल से बाहर निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, बिजली उत्पादन में विविधता और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वह परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना चाहता है। ऐसे में अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग उसके दीर्घकालिक विकास कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि ट्रम्प की नई शर्तों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते का भविष्य अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।

  • ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका

    ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका (America) अगस्त 2028 से विदेश से आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं (Generic medicines) पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) (Hefty Import Duties- Tariffs) लगाएगा। उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका के भीतर कराना है। इस फैसले का असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है।

    ट्रंप ने ट्रथु सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक टैरिफ शून्य फीसदी रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए इसे 100 फीसदी कर दिया जाएगा। उसके बाद यह बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा।


    ट्रंप ने क्या कहा?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में लाई जाने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक शून्य फीसदी आयात शुल्क रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए यह 100 फीसदी होगा और उसके बाद 200 फीसदी कर दिया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है, ताकि जेनेरिक दवाओं का उत्पादन फिर से अमेरिका में शुरू हो। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में कारखाने और जरूरी उपकरण नहीं लगाएंगे, उन्हें इस नीति के तहत दंड का सामना करना पड़ेगा।


    नई नीति में क्या बदलेगा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस नीति का मकसद अमेरिका के लोगों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह भी कहा कि पेटेंट वाली, ब्रांडेड और नई दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और वह पहले की तरह जारी रहेगी।

    भारत का अमेरिका को दवाओं का कितना निर्यात है?
    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब अमेरिकी डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात 25.8 अरब अमेरिकी डॉलर का 36 प्रतिशत था।


    जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल कहां होता है?

    भारत में बनी जेनेरिक दवाएं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, संक्रामक रोगों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं।

  • ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका

    ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में आव्रजन नियमों (Immigration rules) में एक बड़े बदलाव के चलते भारतीय छात्रों (Indian students) समेत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लौटने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालयों ने सलाह दी है कि अगर वे मौजूदा आव्रजन व्यवस्था का लाभ बनाए रखना चाहते हैं तो 15 सितंबर से पहले अमेरिका लौट आएं। यह सलाह उन छात्रों के लिए है जो शैक्षणिक अवकाश के दौरान अपने देश आए हुए हैं और एफ-1 या जे-1 वीजा पर पढ़ाई कर रहे हैं।

    यह सलाह अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के नए “अंतिम नियम” के लागू होने से पहले दी गई है। यह नियम लंबे समय से लागू “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस यानी डी/एस व्यवस्था” की जगह लेगा।


    15 सितंबर से लागू होगा नया नियम

    नए नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका में अधिकतम चार वर्ष की निश्चित अवधि के लिए ही प्रवेश मिलेगा। मौजूदा व्यवस्था में एफ-1 वीजा धारक छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम की शर्तों का पालन करते रहते हैं। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपने नोटिस में कहा, “इस अंतिम नियम को लागू करने के लिए 60 दिन का समय दिया गया है। हम सभी छात्रों को सलाह देते हैं कि वे 8 सितंबर, 2026 से शुरू होने वाली कक्षाओं से पहले न्यूयॉर्क लौट आएं।”


    क्या-क्या बदलेगा?

    – डीएचएस ने एफ-1 छात्र वीजा, जे-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी पत्रकारों के लिए आई वीजा पर अधिकतम चार वर्ष की अवधि तय कर दी है।
    – नए नियम के तहत पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में रहने की छूट 60 दिन से घटाकर 30 दिन कर दी जाएगी।
    – अगर किसी छात्र को अपनी अवधि बढ़ानी होगी तो उसे अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) से फॉर्म आई-539 के माध्यम से मंजूरी लेनी होगी।


    किन छात्रों पर लागू नहीं होगा नया नियम?

    डीएचएस के अनुसार, जो छात्र 15 सितंबर को पहले से अमेरिका में “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस” के तहत मौजूद होंगे, वे अपने फॉर्म आई-20 में दर्ज कार्यक्रम पूरा होने तक या स्वीकृत ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी/एसटीईएम ओपीटी) की अवधि तक अमेरिका में रह सकेंगे। हालांकि, यह छूट भी नए नियम के लागू होने की तारीख से अधिकतम चार वर्ष तक ही मान्य होगी और किसी भी स्थिति में 14 नवंबर, 2030 के बाद लागू नहीं रहेगी। इसमें देश छोड़ने के लिए मिलने वाली अवधि भी शामिल होगी।


    भारतीय छात्रों में बढ़ी चिंता

    नए नियम के बाद भारतीय छात्रों और पेशेवरों के बीच चिंता बढ़ गई है। उन्हें आशंका है कि इसका असर उनकी पढ़ाई और करियर की योजनाओं पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है, “चार वर्ष की सीमा आधुनिक डिग्री पाठ्यक्रमों के अनुरूप नहीं है। स्नातक की डिग्री पूरी करने में औसतन 52 महीने और पीएचडी पूरी करने में लगभग 5.7 वर्ष लगते हैं। यूएससीआईएस के पास पहले से ही 1.1 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं और उनके निपटारे में करीब एक वर्ष लग रहा है।”

    विशेषज्ञों का कहना है, “छात्रों को पढ़ाई या शोध के बीच में ही अमेरिका छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे प्रयोगशालाओं को प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं का नुकसान होगा और अमेरिका अपनी नवाचार क्षमता अपने प्रतिस्पर्धी देशों के हाथों सौंप देगा।” एफआईआईडीएस के अनुसार, शोध आधारित कई पाठ्यक्रम, विशेषकर पीएचडी और चिकित्सा शिक्षा, सामान्य तौर पर चार वर्ष से अधिक समय लेते हैं। वहीं, जे-1 श्रेणी के शोधकर्ता और चिकित्सकों को अपना कार्यक्रम पूरा करने में अक्सर पांच से सात वर्ष तक लग जाते हैं।

  • ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    नई दिल्ली । अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी और गंभीर आपराधिक मामलों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू करते हुए 10 मामलों में अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल की है। इन मामलों में पाकिस्तान में जन्मा एक व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर अलग-अलग पहचान का उपयोग कर अमेरिकी आव्रजन प्रणाली का लाभ उठाने और बाद में नागरिकता हासिल करने का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान अमेरिकी नागरिकता प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने और कथित धोखाधड़ी के मामलों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और न्याय विभाग के अनुसार पिछले एक महीने के दौरान ऐसे कई मामलों में न्यायिक कार्रवाई शुरू की गई है, जिनमें नागरिकता प्राप्त करने के दौरान गलत जानकारी देने, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने या फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों में केवल आव्रजन धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि बच्चों के यौन शोषण, स्वास्थ्य बीमा धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े आरोप भी शामिल हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सभी मामलों में अंतिम निर्णय अदालतों द्वारा ही किया जाएगा।

    कार्रवाई के केंद्र में 65 वर्षीय पाकिस्तानी मूल के मुर्तजा अली का मामला है। अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने अमेरिका में स्थायी निवास और बाद में नागरिकता प्राप्त करने के लिए अलग-अलग नामों से कई आव्रजन आवेदन दाखिल किए। आरोपों के अनुसार उन्होंने अमेरिकी नागरिकता “मोहम्मद इकबाल” नाम से हासिल की थी। बाद में फिंगरप्रिंट मिलान और जांच के दौरान विभिन्न आवेदनों को एक ही व्यक्ति से जुड़ा पाया गया।

    संघीय अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2014 में मुर्तजा अली ने अमेरिकी सरकारी एजेंसी को झूठी और भ्रामक जानकारी देने के मामले में दोष स्वीकार किया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि उन्होंने तीन अलग-अलग पहचान का उपयोग करते हुए अलग-अलग आव्रजन लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी आधार पर अब उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।

    सरकार ने टेक्सास की संघीय अदालत में दायर शिकायत में आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति ने इमिग्रेशन धोखाधड़ी, नागरिकता प्रक्रिया के दौरान झूठी गवाही देने और आवश्यक तथ्यों को छिपाने जैसे कृत्यों के माध्यम से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त की। प्रशासन का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देकर नागरिकता हासिल करता है तो वह उस नागरिकता पर अपना वैधानिक अधिकार खो देता है।

    ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि अमेरिकी नागरिकता एक विशेष कानूनी अधिकार है और इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में ईमानदारी सर्वोपरि है। प्रशासन का दावा है कि जिन मामलों में कार्रवाई की गई है, उनमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग शामिल हैं और कानून के अनुसार ऐसे मामलों में नागरिकता रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में भी इसी प्रकार के अन्य मामलों की समीक्षा जारी रहेगी।

    इन मामलों में पाकिस्तान के अलावा क्यूबा, मेक्सिको, पेरू और पोलैंड में जन्मे कुछ अन्य नागरिक भी शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतें संघीय अदालतों में दायर की गई हैं और फिलहाल ये आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अंतिम निर्णय अदालतों के आदेश के बाद ही प्रभावी होगा। प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखना और नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कथित धोखाधड़ी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान

    मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिका ने लगातार 10वीं रात ईरान के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और तेज होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका उपयोग क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा सकता है। इस घटनाक्रम ने पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है।

    अमेरिकी सैन्य कमान का कहना है कि हालिया अभियान के दौरान ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइट्स, समुद्री ठिकानों तथा वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का मकसद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समुद्री मार्गों पर किसी भी संभावित खतरे को कम करना है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल माना जाता है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया कि उसकी सैन्य गतिविधियों के कारण हॉर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित नहीं हुई है। अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ समय में अमेरिकी बलों ने सैकड़ों वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित रूप से इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने में सहायता प्रदान की है। इसके साथ ही करोड़ों बैरल कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी दावा किया गया है। ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख दोहराया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका जवाब बेहद सख्त और कई गुना अधिक होगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं और किसी भी हमले का जवाब पूरी ताकत के साथ दिया जाएगा। उनके इस बयान को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने दावा किया है कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैन्य अभियान के तहत की गई, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दोनों देशों की ओर से लगातार सामने आ रहे सैन्य दावों और जवाबी कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और कच्चे तेल की कीमतों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते संघर्ष को रोकने में सफल होंगे या फिर क्षेत्र में तनाव और अधिक गंभीर रूप लेगा।